आप बहुत बड़े हो सकते हैं.उच्च पद पर आसीन हो सकते है, बड़े ब्लॉगर हो सकते हैं, बड़े साहित्यकार हो सकते हैं, दार्शनिक भी हो सकते हैं, बड़े और गरिष्ठ वरिष्ठ कवि भी, बड़े कलाकार भी,बड़े व्यवहार कुशल भी,बड़े लेखक भी,बड़े व्यंग्यकार भी.लेकिन इन सबसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप परिणाम कैसे दे रहे हैं. यानि जो आप कर रहे हैं या करना चाह रहे हैं वह हासिल हो भी रहा है या नहीं या फिर आप बिना सूत-कपास के कोरी लट्ठमलट्ठा किये जा रहे हैं. यदि किसी काम का परिणाम अच्छा है तो यह उतना महत्वपूर्ण नहीं कि वह काम किसने किया.इट्स  द रिजल्ट्स दैट मैटर्स.

एक कहानी सुनें. एक बार के बहुत बड़े पुजारी,संत,योगाचार्य की मृत्यु हुई और वह ऊपर पहुंच गये. स्वर्ग के द्वार पर. और वहां खड़े होकर वह अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगे. उनके आगे एक व्यक्ति खड़ा था. उसने अच्छे,चमकदार कपड़े पहने हुए थे, आखों मे ग़ॉगल्स लगाये हुए थे, रंगीली शर्ट,चमड़े की जैकेट और जींस .

धर्मराज ने उस व्यक्ति से पूछा,कृपया मुझे बताएँ कि आप कौन हैं ताकि मैं जान सकूँ कि आपको स्वर्ग के द्वार से अंदर जाने दूँ या नहीं.

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया  मैं बंता सिंह हूं. मैं नई दिल्ली में टैक्सी ड्राइवर था.

धर्मराज ने अपना बही खाता खोला. उसे ध्यान से देखते हुए बंता सिंह से मुस्कराते हुए कहा

कृपया यह रेशमी वस्त्र पहन लें और सोने के द्वार से सोने के सिहांसन की ओर जायें. 

अब संत की बारी थी.धर्मराज ने उनसे भी वही प्रश्न पूछा कि वह कौन हैं. उन्होंने सीधे खड़े होकर और विश्वास भरी तेज आवाज में उत्तर दिया.

मैं हूं संत शिरोमणि बाबा अलां फलां 1008. मैं  अलां फलां मंदिर का प्रमुख पुजारी था. मैं पिछ्ले चालीस साल से लोगों को ईश्वर के बारे में बता रहा हूँ.

धर्मराज ने फिर अपना बही खाता खोला और संत से कहा.

आप कृपया यह सूती वस्त्र पहने और लकड़ी के द्वार से लकड़ी के सिंहासन की ओर प्रस्थान करें.

संत को गुस्सा आ गया. उन्होने धर्मराज से पूछा. यह आपका कैसा न्याय है भगवन. उस सदा गाली देते रहने वाले, ठीक से गाड़ी भी ना चला पाने वाले ड्राइवर को तो आपने रेशमी वस्त्र और सोने का सिंहासन दिया और मुझे, जिसने लोगों को उपदेश देने में अपना सारा जीवन लगा दिया, उसे सूती वस्त्र और लकड़ी का सिंहासन. ऐसा क्यों भगवन.

“परिणाम मेरे पुत्र, केवल परिणाम, “ परिणाम ही है जिसके कारण ऐसा हुआ.

जब तुम लोगों को ईश्वर की प्रार्थना करने का उपदेश देते थे तो लोग सोते थे और जब बंता सिंह टैक्सी चलाता था तो लोग सही सलामत घर पहुंचने के लिये ईश्वर की प्रार्थना करते थे.

तो शिक्षा यह मिली कि आप कौन है कितने बड़े हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह महत्वपूर्ण है आपका जो कर रहे हैं उसका परिणाम क्या हो रहा है. 

Moral of the story: Its PERFORMANCE and not POSITION that ultimately counts.

  15 Responses to “कौन हैं आप यह महत्वपूर्ण नहीं!”

  1. ज्ञानचक्षु खोलने के लिए कोटी-कोटी धन्यवाद गुरुदेव
    आस्था चैनल चालू आहे.

  2. धन्य हैं..आप नहीं..हम….
    हम धन्य हैं..इस बात से कि आप अपना गोला-बारूद समेटे आ पधारे हैं. पिछले चार दिनों से जो-जो परिणाम दे रहे हैं कि राजस्थान रोयल्स भी शर्मा गए है. कमाल का परफॉर्मेंस दे रहे हैं..

  3. असल में सभी में बन्ता/सन्त शिरोमणि/धर्मराज का समावेश है। अपने को सन्त शिरोमणि बताते हैं और दूसरों के लिये धर्मराज बन जाते हैं। मामला पेचीदा आहे!
    रिजल्ट इवैल्युयेशन में भी गोल बन्दी है। या आपका सोचना अलग है?

  4. अगर ऐसे ही ज्ञान देते देते कहीं आप संत टाईप के हो गये तो वहाँ लकड़ी की तो छोड़िये, चटाई पर बैठाया जायेगा:

    परिणाम मेरे पुत्र, केवल परिणाम!!

    :)

    बहुत बेहतरीन प्रवचन कह लेते हैं.

    शिव भाई बिल्कुल ठीक कह रहे हैं:

    पिछले चार दिनों से जो-जो परिणाम दे रहे हैं कि राजस्थान रोयल्स भी शर्मा गए है. कमाल का परफॉर्मेंस दे रहे हैं..

    लगे रहिये-जमाये रहिये-जमाते रहिये. अच्छे परिणाम आयेंगे. :)

  5. सर जी मैं नत मस्तक हो गया हूँ…खरी बात कह दी आपने…..

  6. मजेदार प्रसंग खोज निकाला आपने अपना संदेश देने के लिए !

  7. कथा प्रसंग तो बढ़िया है पर मूल बात कुछ अधूरी सी नहीं रह गयी? परिणाम से आपका ठीक-ठीक क्या आशय है?

  8. कहानी तो अच्छी है, हमने क्या पाया इसमें से ये सोच रहे हैं, सोच कर बता देगें …:)

  9. :) सारे संत आपको मारने आ जायेंगे और फ़िर आप भी इश्वर को याद करते नजर आयेंगे… फ़िर तो संतो को भी …. :)

  10. देखो भाई जो चाहे समझालो पर ये समझ लो हम नही टलने वाले, हम तो यही इसी जहा मे बाबा बन कर स्वर्ग का सुख भोगने की इच्छा रखने वाले जीव है आने वाले कल के लिये कोई जुगाड नही चाहिये जी , वैसे आपकी परफ़ार्मेंस देख कर आपको अपने यहा आश्रम मे विजिंटिंग बाबा की मानद उपाधी जरूर देने की सोच रहे है :)

  11. जमाये रहियेजी।

  12. ज्ञान-गर्भ और परिणाम मूलक पोस्ट.
    आभार
    डा.चंद्रकुमार जैन

  13. बहुत बहुत लाज़वाब लिखा…आनंद आ गया.

  14. बेचारा बन्ता स्वर्ग जाने तक इन्तेजार करता रहा सोने के सिंघासन का आजकल के संत तो धरती पर ही सोने के सिंघासन पर बिराज मान होते हैं रोज़ करोडो लोग आंखें फाड़ फाड़ कर टीवी पर उन्हें देखते हैं

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