Jul 292009
 

यदि इस पोस्ट का टाइटल पढ़कर आपको फिल्म शोले की याद आ जाये तो इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, लेकिन मैं ना तो आज आपको फिल्म शोले का गाना सुना रहा और ना ही अपनी महबूबा के बारे में बता ‘सच का सामना‘ कर अपने एक अदद पत्नी को परेशान ही कर रहा हूँ। मैं तो उस महबूबा की बात कर रहा हूँ जिसने अपने एक कदम से एक ओर यह बतलाया  कि लोकतंत्र की जड़ें कैसे मजबूत की जा सकती हैं और दूसरी ओर नारी की स्थिति को लेकर निंदित चिंतित लोगों को शुकुन की सांस लेने का मौका दिया। मैं बात कर रहा हूँ कश्मीर में विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती सईद की, जिन्होंने विधानसभा में स्पीकर के ऊपर माइक फैंक कर यह बता दिया कि वीरांगनाऐं घर में पति पर ही बेलन नहीं चला सकती वरन अपने इस कौशल का प्रदर्शन विधानसभा में भी कर सकती हैं।

mahbooba-mufti-saeed अपने इस वीरता भरे कृत्य से उन्होंने ना जाने कितनी चीजें स्पष्ट कर दीं। मैं उन्हें तहे दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने ऐसा किया, वरना नेता लोग तो सिर्फ बोलते ही हैं करते कुछ नहीं हैं। अब मेरा विश्वास इस देश पर, इस देश के लोकतंत्र पर, इस देश की महिलाओं पर मजबूत हुआ है। जो लोग बोलते थे कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है उनकी इस बात को लोग अब गंभीरता से लेने लगे हैं।  

एक चीज जो स्प्ष्ट हो गयी कि जम्मू-कश्मीर में भी अब लोकतंत्र आ गया है। हमेशा से हम सुना करते थे कि हमें जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करनी है। यह और बात है कि इस देश में जहां जहां लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुई हैं वहाँ रुपये पैसों के पेड़ भी लहलहाये हैं जो नेताओं को पुष्प-फल देते रहे हैं। आम जनता उन जड़ों को इस उम्मीद में खाद-पानी देती है कि जब नेताओं से सात पीढ़ियों का इन्तजाम हो जायेगा तो जनता को भी फल चखने को मिल सकते हैं। तो अब यह साबित हो गया है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र आ गया है। वरना हम तो यही लोकतंत्र के चैम्पियन के नाम पर तमिलनाडू, महाराष्ट्र या यू.पी. को रखते जहां जूते-चप्पल से लेकर माइक फैक कर लोकतंत्र के मजबूत होने का प्रमाण दिया जाता रहा है।

दूसरी ओर जब तमिलनाडू में इस तरह की घटना हुई थी तो महामहिम (उनके वजन के हिसाब से लिखना पड़ रहा है) जयललिता के साथ अभद्रता की गयी थी और उनकी ओर जूते-चप्पल, माइक फैंके गये थे। मैं तब से हैरान था कि माइक फैकने के वीर कर्म में कोई महिला कैसे पीछे रह सकती है, और वो भी किसी पुरुष पर। महिला की इस जन्मजात प्रतिभा का प्रदर्शन केवल घर तक ही सीमित रह जाय यह तो रीतिकालीन बात हुई। आज जब महिलायें हर मामले में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं….। वैसे जिन्होंने यह मुहावरा गढ़ा होगा मुझे उनके मांनव-ज्ञान पर हमेशा से ही शक रहा है। महिला और पुरुषों की ऊंचाई में हमेशा से ही अंतर रहा है, एक आध अपवाद छोड़ दें तो महिलाओं की ऊंचाई हमेशा ही कम रही है, तो फिर  कंधे से कंधा मिला कर कैसे चला जा सकता है। होना चाहिये था महिलायें हर मामले में पुरुष के साथ कंधे से सर मिलाकर चल रही हैं…खैर…जाने दीजिये…. तो महिला महबूबा ने पुरुष स्पीकर पर माइक फैक कर यह जता दिया कि अब महिलायें केवल घर की चहारदीवारी तक ही सीमित नहीं रही हैं। वह अब बाहर निकल रही हैं। मुझे लगता है कि मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और लालू यादव जैसे लोगों को इस बात का खूब अनुभव रहा होगा। इसीलिये वह राजनीति में महिलाओं के 33% आरक्षण का विरोध करते रहते हैं। शरद यादव ने तो आत्महत्या करने तक की धमकी दे दी थी। घर के अंदर बेलन झेलना और सार्वजनिक रूप से माइक झेलने में अंतर होता है। शरद-यादव ऐसी स्थिति आने से पहले ही दुनिया से कूच करना चाहते हैं तो क्या गलत चाहते हैं।

तीसरी चीज जो लोग जम्मू-कश्मीर का तालिबानीकरण करना चाहते हैं। महिलाओं को केवल बुर्के पहना घर के अंदर बैठा देना चाहते हैं, यह माइक उनके लिये भी एक करारा तमाचा है। हम खुश है कि ऐसी सोच वाले लोगों को महबूबा ने सही सबक सिखाया है।

तो क्या हमें महबूबा को धन्यवाद नहीं देना चाहिये। मैंने तो जब से यह समाचार सुना है तब से ही गा रहा हूँ…महबूबा..महबूबा…और अब तो उमर अब्दुल्ला भी निकल लिये। तो उन पर चर्चा कल करेंगे। आज इतना ही…

Jul 282009
 

इस ब्लॉग पर कुछ भी लिखे हुए एक साल से ऊपर हो गया है। इस बीच ना जाने कितने नये ब्लॉग आ गये होंगे.. कितने इस ब्लॉगजगत से उकता कर जा चुके हौंगे..लेकिन मैं ना तो उकताया हूँ ना ही ब्लॉग से बोर हुआ हूँ। हाँ… कुछ दिनों के लिये अपने दूसरी जिम्मेवारियों को निभाने में लगा हुआ हूँ। मुझे खुशी है कि इस बीच कई मित्रों ने फोन पर मुझे फिर से ब्लॉग पर लिखने के लिये कहा। कई लोगों ने मेल पर या टिप्पणीयों के माध्यम से यही निवेदन किया। अब चुंकि मंदी की मार भी कम हो रही है और गर्मी की भी- हाँ ब्लॉग-जगत की गर्मी का मुझे कोई अन्दाजा नहीं है- तो मैने सोचा है कि सप्ताह में कम से कम एक बार तो इस ब्लॉग पर दर्शन दे ही दूँ।

इस बीच कुछ ब्लॉगों को अनियमित पढ़ता रहा लेकिन ब्लॉग पर ना लिखने से हिन्दी की किताबें पढ़ने और खरीदने में कमी आयी। पिछ्ली बार जो किताबें खरीदी थी अभी उनमें से कई पढ़नी बाँकी है। सोचता हूँ कि एक बार ब्लॉग पर लिखना प्रारम्भ कर दुंगा तो फिर से यह सिलसिला भी शुरु हो जायेगा।

एक साल ना लिखने के बाबजूद मेरे ब्लॉग पर लोगों की आवजाही चलती रही। आँकड़े बताते है कि दो प्रमुख श्रेणियां जो सबसे ज्यादा पढी गयी वह थी व्यंग्यउत्तराखंड..तो अब अधिकतर इन्ही पर लिखुंगा…लेकिन लिखना क्या पहले से निर्धारित किया जा सकता है..देखिये की-बोर्ड क्या लिखवा दे। 

चलिये अभी इतना ही..जल्दी ही कुछ लिखता हूँ..