काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

महात्मा बुद्ध बिहारी थे

सेठ ने घोड़े के लंग के बारे में एकदम अज्ञानता व्यक्त की। उल्टा उन्हीं के सर हो गया कि ‘‘तुम घोड़े को देखने हाफ़-डजन टाइम तो आये होगे। घोड़ा तलक तुम को पिछानने लगा था। दस-दफ़े घोड़े के दांत गिने….क्या? तुमने हमको यहां तलक बोला कि घोड़ा नौ हाथ लम्बा हैं उस समय तुम्हें यह नौ-गजा दिखलाई पड़ता था। आज चार-पांच दिन बाद घोड़े के ग़ॉगल्ज ख़ुद पहन के इल्जाम लगाने आये हो….क्या? तीन दिन में तो क़ब्र में मुर्दे का भी हिसाब-किताब बरोबर खल्लास हो जाता है। उस टेम आपको माल में यह डिफ़ेक्ट दिखलायी नहीं पड़ा। तांगे में जोत के ग़रीबख़ाने ले गये तब भी नजर नहीं आया।" बिशारत सेठ के सामने अपने घर को इतनी बार ग़रीबख़ाना कह चुके थे कि वो यह समझा कि यह उनके घर का नाम है।

बिशारत ने कुछ कहना चाहा तो बात काटते हुए बोला-अरे बाबा! घोड़े का कोई पार्ट, कोई पुर्जा ऐसा नहीं बचा, जिसपे तुमने दस-दस दफ़े हाथ नहीं फेरा हो! क्या? तुम बिजनेसमेन हो के ऐसी कच्ची बात मुंह से निकालेगा तो हम किधर को जायेंगा? बोलो जी! हल्कट मानुस के माफ़िक़ बात नहीं करो….क्या?’’ सेठ जिम्मेदारी से बरी हो गया।

बिशारत ने तंग आकर कहा, ‘‘हद तो यह कि सौदा करने से पहले यह भी न बताया कि घोड़ा जनाजा उलट चुका है। आप ख़ुद को मुसलमान कहते हैं’’ सीने पर हाथ रखते हुए सेठ बोला तो क्या तुम्हारे को बुद्धिस्ट दिखलायी पड़ता हूं? हमने जूनागढ़ काठियावाड़ से माइग्रेट किया है….क्या? अपने पास बरोबर सिंध का डोमेसाइल है। महात्मा बुद्ध तो बिहारी था। (अपने मुंह के पान की ओर संकेत करते हुए) मेरे मुंह में रोजी है। तुम भी बच्चों की क़सम खा के बोलो। जब तुमने पूछा-घोड़ा काये को बेच रहे हो, हमने तुरंत बोल दिया। सौदा पक्का करने से पहले पूछते तो हम पहले बोल देते। तुम लकड़ी बेचते हो तो क्या ग्राहक को लक्कड़ की हर गांठ, हर दाग़ पे उंगली रख-रख के बताते हो कि पहले इसे देखो? हम साला अपना व्यापार करे कि तुम्हारे को घोड़े की बयाग्राफ़ी (बायोग्राफ़ी) बताये। फ़ादर मेरे को हमेशा बोलता था कि ग्राहक 420 हो तो पहले देखो भालो, फिर सौदे की टेम बोलो कम, तोलो जियादा। पर तुम्हारे ऊपर तो-खोलो, अभी खोलो!-की धुन सवार थी। तुम्हारे मुंह में पैसे बज रहे थे। गुजराती में कहावत है कि पैसा तो शेरनी का दूध है! इसे हासिल करना और पचाना दोनों बराबर मुश्किल है। पर तुम तो साला शेर को ही दुहना मांगता है । हम करोड़ों का बिजनेस करेला है। आज दिन-तलक जबान दे-के नईं फिरेला। अच्छा अगर तुम क़ुरान पर हाथ रख के बोल दो कि तुम घोड़ा ख़रीदते टेम पियेला था तो हम तुरंत एक-एक पाई रिफ़ंड कर देगा।’’

बिशारत ने मिन्नतें करते हुए कहा ‘‘सेठ, सौ-डेढ़ सौ कम में घोड़ा वापस ले लो। मैं बीबी-बच्चों वाला आदमी हूं। जिंदगी भर अहसानमंद रहूंगा।’’ सेठ आपे-से बाहर हो गया, ‘‘अरे बाबा! ख़च्चर के माफ़िक हमसे अड़ी नईं करो। हमसे एक दम कड़क उर्दू में डायलाग मत बोलो। तुम फ़िलम के विलन के माफ़िक़ गॉगल्ज लगा के इधर काये को तड़ी देता पड़ा हैं। भाई साहब! तुम पढ़ेला मानुस हो। कोई फ़ड्डेबाज मवाली, मल्बारी नईं, जो शरीफ़ों से दादागीरी करे। तुमने साइन-बोर्ड नईं पढ़ा। बाबा! यह री-रोलिंग मिल है। इसटील री-रोलिंग मिल। इधर घोड़े का धन्धा नईं होता…..क्या? कल को तुम बोलेंगा कि तांगा भी वापस ले लो। हम साला अक्खा उम्र इधर बैठा घोड़े-तांगे का धन्धा करेंगा तो हमारा फ़ेमिली क्या घर में बैठा क़व्वाली करेंगा? भाई साब! अपुन का घर तो गिरस्तियों का घर है, किसी बुजुर्ग का मजार नईं कि बाई लोग गज-गज भर के लम्बे बाल खोल के धम्माल डाल दें। धमा धम मस्त क़लन्दर!"

बिशारत ने तांगा स्टील री-रोलिंग मिल के बाहर खड़ा कर दिया और स्वयं एक थड़े पर पैर लटकाये प्रतीक्षा करने लगे कि अंधेरा जरा गहरा हो जाये तो वापस जायें, ताकि नौ घंटे में तीसरी बार चालान न हो। ग़ुस्से से अभी तक उनके कानों की लवें तप रही थीं और हल्क़ में कैक्टस उग रहे थे। बलबन गुलमोहर के पेड़ से बंधा सर झुकाये खड़ा था। उन्होंने पान की दुकान से एक लोमोनेड की गोली वाली बोतल ख़रीदी। एक ही घूंट में उन्होंने अनुमान लगा लिया कि उनकी प्रतीक्षा में यह बोतल कई महीनों से धूप में तप रही थी। फिर अचानक याद आया कि इस परेशानी में आज दोपहर बलबन को चारा और पानी भी नहीं मिला। उन्होंने बोतल रेत पर उंडेल दी और गॉगल्ज उतार दिये।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर

पहला और दूसरा भाग

इंजी पेन्नू का अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होने http://kerals.com/ पर एक मलयालम ब्लॉग द्वारा सामग्री को चुराने का आरोप लगाते हुए एक ई-मेल लिखा था. बदले में इस साइट की ओर से उन्हे धमकी भरे ई-मेल भेजे गये. उन्हे शारीरिक क्षति पहुंचाने की धमकी दी गयी. उनके प्रोफाइल को एक पोर्न साइट से लिंक कर दिया गया. उन्हे झूठा कानूनी नोटिस भेजा गया. और यह सब उस साइट के द्वारा किया गया जिसके मालिक, इंजी के अनुसार, शादी की साइट व पोर्न साइट एक साथ चलाते हैं. यह सारी बात इंजी अपनी इस पोस्ट में विस्तार से बता रही हैं.

इस बात से यह भी लगता है कि शादी की साइट पर अपना फोटो देना,विशेषकर महिलाओं के लिये,कितना खतरनाक है.इंटरनैट पर भी हमारे वास्तविक समाज की तरह गुंडे बैठे हुए हैं. जो खुद को फायदा पहुचाने के कुछ भी कर सकते हैं.  आप इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते. फिर भी मैं इंजी पेन्नू के साहस को सलाम करता हूँ.

इंजी आपकी इस लड़ाई में मैं आपके साथ हूँ.

इंजी के बारे में मुझे यहां से पता चला.

शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर

उसी समय एक सलोतरी को बुलाकर घोड़े को दिखाया। उसने बायीं नली हाथ से सूंती तो घोड़ा चमका। पता चला कि पुराना लंग है। सारा घपला अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा। संभवतः, नहीं निःसंदेह, घोड़ा इसी कारण रेस में डिसक्वालिफ़ाई हुआ होगा। ऐसे घोड़े को तो उसी समय गोली मार दी जाती है और यह उसके लिये तांगे में जुतकर जलील होने से कई गुना बेहतर सूरत होती है, लेकिन सलोतरी ने उम्मीद दिलाई कि छः महीने तक मुर्ग़ाबी के तेल की मालिश करायें। मालिश का मेहनताना पांच रुपये रोज! यानी डेढ़ सौ रुपया माहवार। छह महीने के नौ सौ रुपये हुए। नौ सौ का घोड़ा, नौ सौ की मालिश अर्थात टाट की गुदड़ी में मखमल का पैवंद! अभी कुछ दिन हुए अपने अब्बा की मालिश और पैर दबाने के लिये एक आदमी को अस्सी रुपये माहवार पर रखा था। इसका मतलब तो यह हुआ कि उनकी कमाई का आधा हिस्सा तो इन्कम टैक्स वाले रखवा लेंगे और एक-तिहाई चम्पी मालिश वाले खा जायेंगे। हलाल की कमाई के बारे में उन्होंने कभी नहीं सुना था कि वो इस अनुपात से ग़ैर हक़दारों में बंटती है। चार बजे तांगा जुतवा कर वो सेठ से निपटने के लिये रवाना हो गये। तांगे में बैठने से पहले उन्होंने गहरे रंग का धूप का चश्मा लगा लिया, ताकि कड़ी, खरी, खोटी सुनाने में झिझकें नहीं और चेहरे पर एक रहस्यमय ख़ूंख़ारी का भाव आ जाये। आधा रास्ता ही तय किया होगा कि एक व्यक्ति ने बम पकड़ कर तांगा रोक लिया। कहने लगा, आपका घोड़ा बुरी तरह लंगड़ा रहा है, चालान होगा। बिशारत भौंचक्के रह गये। पता चला ‘‘अत्याचार’’ वाले आजकल बहुत सख़्ती कर रहे हैं। हर मोड़ पर बात-बेबात चालान हो रहा है। वो किसी प्रकार न माना तो बिशारत ने क़ानूनी पेंच निकाला कि आज सुब्ह ही इसका चालान हो चुका है। सात घंटे में एक ही अपराध में दो चालान नहीं हो सकते। इंस्पेक्टर ने यह बात भी चार्जशीट में टांक ली और कहा कि इससे तो अपराध और संगीन हो गया। बचने का कोई रास्ता न सूझा तो बिशारत ने कहा, ‘‘अच्छा बाबा! तुम्हीं सच्चे सही, दस रुपये पे मामला रफ़ा-दफ़ा करो। ब्रांड न्यू घोड़ा है, खरीदे हुए तीसरा दिन है। ‘‘यह सुनते ही वो व्यक्ति आग बबूला हो गया।’’ कहने लगा ‘‘बड़े साब! गागल्ज के बावजूद आप भले आदमी मालूम होते हैं, मगर आपको पता होना चाहिये कि आप पैसे से लंगड़ा घोड़ा खरीद सकते हैं’’, आदमी नहीं ख़रीद सकते। चालान हो गया।

स्टील री-रोलिंग मिल पहुंचे तो सेठ घर जाने की तैयारी कर रहा था। आज इसके यहां एक पीर की याद में डेढ़-दो सौ फ़क़ीरों को पुलाव खिलाया जा रहा था। उसका मानना था कि इससे महीने-भर की कमाई पाक हो जाती है और यह संनदकमतपदह कोई अनोखी बात नहीं थी। एक बैंक में पंद्रह बीस वर्ष तक यह नियम रहा कि प्रत्येक ब्रांच में जितने नये खाते खुलते, शाम को उतने ही फ़क़ीर खिलाये जाते। यह पता नहीं चल पाया कि यह खाना, खाते खुलने की ख़ुशी में खिलाया जाता था या ब्याज के व्यापार में बढ़ोतरी के प्रायश्चित में। हमारा एक बार मुल्तान जाना हुआ। वहां उस दिन बैंक के मालिकों में से एक बहुत सीनियर सेठ इंस्पेक्शन पर आये हुए थे। शाम को ब्रांच में बराबरी का यह दृश्य देखकर हमारी ख़ुशी की सीमा न रही कि सेठ साहब पंद्रह-बीस फ़क़ीरों के साथ जमीन पर पंजों के बल बैठे पुलाव खा रहे हैं और हर फ़क़ीर और उसके बीबी-बच्चों का अकुशल-अमंगल पूछ रहे हैं। परन्तु मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग को ग़ुब्बारे पंक्चर करने की बड़ी बुरी आदत है। उन्होंने यह कहकर हमारी सारी ख़ुशी किरकिरी कर दी कि जब शेर और बकरी एक ही घाट पानी पीने लगें तो समझ लो कि शेर की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर है। महमूद व अयाज का एक ही पंक्ति में बैठकर खाना भी ‘‘ऑडिट एंड इंस्पेक्शन’’ का हिस्सा है। सेठ साहब वास्तव में यह पता लगाना चाहते हैं कि खाने वाले अस्ली फ़क़ीर हैं या मैनेजर ने अपने यारों-रिश्तेदारों की पंगत बिठा दी है।

हम कहां से कहां आ गये। बात स्टील मिल वाले सेठ की थी, जो सात-आठ वर्ष से काले धन को प्रत्येक महीने नियाज के लोबान की धूनी से पाक और ‘व्हाइट’ करता रहता था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम

पहला और दूसरा भाग

अलाहदीन अष्टम

उनके रोग न केवल बहुत से थे, बल्कि बहुत बढ़े हुए भी थे। इनमें सबसे खतरनाक रोग बुढ़ापा था। उनका एक दामाद विलायत से सर्जरी में नया-नया एफ़आर. सी.एस. करके आया था। उसने अपनी ससुराल में किसी का एपेंडिक्स बाक़ी नहीं छोड़ा। किसी की आंख में भी तकलीफ़ होती तो उसका एपेंडिक्स निकाल देता था। आश्चर्य इस पर होता कि आंख की तकलीफ़ जाती रहती। हालांकि वो सारीउम्र पेट के दर्द से परेशान रहे लेकिन अपने पेट पर हाथ रखकर सौगंध उठा कर कहते थे कि मैंने आज तक किसी डॉक्टर को अपने एपेंडिक्स पर हाथ नहीं डालने दिया। लंबे समय से बिस्तर पर पड़े थे लेकिन उनकी लाचारी अभी अपूर्ण थी। मतलब यह कि सहारे से चल-फिर सकते थे।

उन्होंने उद्घाटन इस प्रकार किया कि अपने कमरे के दरवाजे, जिससे निकले उन्हें कई महीने हो गये थे, एक लाल-रिबन बांध कर अपने डांवाडोल हाथ से कैंची से काटा। ताली बजाने वाले बच्चों में लड्डू बांटने के बाद शुक्राने (धन्यवाद) की नमाज अदा की। फिर घोड़े को अपने हाथ से गेंदे का हार पहनाया, उसके माथे पर एक बड़ी-सी भौंरी थी। केसर में उंगली डुबोकर उस पर ‘अल्लाह’ लिखा और कुछ पढ़कर फूंक मारी। चारों सुमों और दोनों पहियों पर शगुन के लिये सिंदूर लगाकर दुआ दी कि जीते रहो, सदा सरपट चलते रहो। रहीमबख़्श कोचवान का मुंह खुलवा कर उसमें पूरा लड्डू फ़िट किया। ख़ुद चांदी के वरक़ में लिपटा हुआ पान कल्ले में दबाया। पुरानी कश्मीरी शाल ओढ़-लपेट कर तांगे की पिछली सीट पर बैठे और अगली सीट पर अपना बीस साल पुराना हार्मोनियम रखवा कर उसकी मरम्मत कराने मास्टर बाक़र अली की दुकान रवाना हो गये।

घोड़े का नाम बदल कर उन्होंने बलबन रखा। कोचवान से कहा, हमें तुम्हारा नाम रहीमबख़्श बिल्कुल पसंद नहीं। तुम्हें अलादीन कह कर पुकारेंगे। जब से उनकी याददाश्त ख़राब हुई थी वो हर नौकर को अलादीन कह कर बुलाते थे। यह अलादीन-अष्टम था। इससे पहले वाला अलादीन सप्तम कई बच्चों का बाप था। हुक़्के के तम्बाक़ू और रोटियों की चोरी में निकाला गया। गरम रोटियां पेट पर बांध कर ले जा रहा था, चाल से पकड़ा गया। मान्यवर इस अलादीन अर्थात रहीमबख़्श को आमतौर से अलादीन ही कहते थे। हां, यदि कोई ख़ास काम जैसे पैर दबवाने हों या बेवक़्त चिलम भरवानी हो या महज प्यार जताना हो तो अलादीन मियां कहकर बुलाते। परन्तु गाली देना हो तो अस्ल नाम लेकर गाली देते थे।

हाफ़ मास्ट चाबुक़

दूसरे दिन से तांगा सुब्ह बच्चों को स्कूल ले जाने लगा। उसके बाद बिशारत को दुकान छोड़ने जाता। तीन दिन यही नियम रहा। चौथे दिन कोचवान बच्चों को स्कूल छोड़कर वापस आया तो बहुत परेशान दिखायी पड़ा। घोड़ा फाटक से बांध कर सीधा बिशारत के पास आया। हाथ में चाबुक़ ऐसे उठा रखा था जैसे पुराने समय में ध्वजवाहक युद्धध्वज लेकर चलता था, बल्कि यूं कहना चाहिये, जिस प्रकार न्यूयार्क की स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी ने अपने हाथ को आखिरी सेंटीमीटर तक ऊंचा करवा कर आजादी की मशाल बुलंद कर रखी है। आगे चलकर मालूम हुआ कि कोई बिजोग पड़ जाये या अशुभ समाचार सुनाना हो तो वो इसी प्रकार चाबुक़ का झंडा ऊंचा किये आता था। चाबुक़ को सीधी हालत में देख बिशारत ऐसे व्याकुल होते, जैसे हेमलेट घोस्ट देखकर होता था।

Here it cometh , my lord

बिशारत के निकट आकर उसने चाबुक़ को हाफ़-मास्ट किया और पंद्रह रुपये मांगे। कहने लगा ‘स्कूल की गली के नुक़्क़ड़ पे अचानक चालान हो गया। घोड़े के बायें पैर में लंगड़ापन है! स्कूल से निकला ही था कि अत्याचार वालों ने धर लिया। बड़ी मिन्नतों से पंद्रह रुपये देकर घोड़ा छुड़ाया है वरना उसके साथ सरकार भी बेफ़िजूल खिंचे-खिंचे फिरते। मेरी आंखों के सामने ‘‘अत्याचार’’ वाले एक गधागाड़ी के मालिक को चाबुक़ से मारते हुए हंकाल के थाने ले गये। उसके गधे का लंग तो अपने घोड़े के मुक़ाबले कुछ भी नहीं ‘‘कोचवान ने गधे के लंग की बात इतने मामूली ढंग से कही और अपने घोड़े का लंग इतना बढ़ा-चढ़ा कर बयान किया कि बिशारत ने क्रोध से कांपते हाथ से पंद्रह रुपये देकर उसे चुप किया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

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इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये

पहला और दूसरा भाग

1.
रेबीज के नये इंजेक्शन की कसम,
किसी कुत्ते में कहां है वह दम,
जो भोंकता भी हो, चाटता भी हो,
गरियाता भी हो, काटता भी हो,
हम तो ऐसे ही थे,
और
ऐसे ही रहेंगे सनम.

2.

तेरे बिना जिन्दगी का नूर चला जायेगा,
बिन काटे किसी को क्या मजा आयेगा,
गाली खाने से नहीं डरते हैं हम,मेरे दोस्त
खायी गाली तो ब्लॉग हिट हो जायेगा.

3.

हिट हो ना सके अच्छा लिख के तो क्या,
चलो किसी ब्लॉगर को हड़काया जाये.

4.

हमारे सामने टिक नहीं सकती शराफत,
ग़ुंडागर्दी में अपना नाम बहुत चलता है.

5.

ज़ज़बात सीने में हैं तो छुपा के रख,
यहां कौन तेरे ज़ज़बात के लिये सैंटी है.

6.

प्यार आता है उस भोली सूरत पर,
जिसने मुझको सिर्फ ब्लॉगर समझा.

7.

तेरे बस में कुछ नहीं है,उजबक
तू क्या समझा था,भले हैं हम?

अब दोहा भी झेलिये

शूल,फूल,पत्थर सहित,चलें पवन सी चाल
जो ब्लॉग़िंग से भागते, कैसे बनायें माल

फोटो साभार : पंगेबाज

संदर्भ : सैटीयापा

कविकार : केडीके

केडीके महोदय बालकिशन जी की इस पोस्ट पर अपना कुदरती कवितायी हुनर दिखाना चाहते थे लेकिन सफल नहीं हुए तो हमको बोले कि इस “कवि की कल्पना” को किसी तरह ठेल दो. हमको भला क्या तकलीफ.हम ठेल रहे हैं. गाली.प्रसंशा सब केडीके साहब की.  

बालकिशन जी आप किस शोध के चक्कर में पढ़ गये. हमें मालूम है कि यह शोध आपने हम जैसे सफल साहित्यकारों को ठेस पहुचाने के लिये ही किया है.

अब हमारी कवितायें भी झेलिये.

1. सर्द-दर्द और गर्द
जब मर्द के पास
आकर जम जाते है
तो हिमालय की बर्फ
पिघलने लगती है,
लालिमा,कालिख के
साथ मिल कर
देने लगती है हुंकार
कि बता तो दो कि
तुम आखिर हो कौन?

2. अहसान
जिन पैरों तले कुचला गया
वह पैर अब कांटो पर चल रहे हैं
और अहसास मिट्टी में पड़े हैं.

3. उस दाढ़ी में
दिखे कितने तिनके
जिस पर चिड़िया ने
घौसला बना लिया.

4. नम जमीन पर
अकुंरित होने के लिये
मचल रहे हैं
कितने बीज
लेकिन जमीन को
कर्ज की तलाश है.

5. आपस की समझदारी में
इतना तो करना ही था
मेरे पीठ के दाग को
दूसरों को दिखाने से पहले
मुझे ही दिखा दिया होता

6. तड़पते जमाने में
उफनती नदियां
किनारों को बहाती है
और किनारे
अपना दायरा बड़ा लेते हैं.

और अब कुछ कज़ल भी देखिये

दिखा नहीं

देकर हम ने खुद को, देखा
क्या देखा? यह दिखा नहीं

पानी निकला नाली से जब
कैसे बिखरा दिखा नहीं

बरबादी की  नादानी में
हमने पूरा गांव जलाया
लेकिन उसमें जलता सा
अपना घर तो दिखा नहीं.

पता नहीं

देखो हमने तीर चलाया
तुमको लगा क्या? पता नहीं

हम घी बनकर आहुति देते थे
आग लगी क्या? पता नहीं.

देखो हमसे बचकर रहना
कब सनकेंगे? पता नहीं

लाख टके की एक बात थी
पल्ले पड़ी क्या? पता नहीं

वो मुझको अब उल्लू कहता
खुद पट्ठा है पता नहीं

मैं सबको रोटी देता हूँ,
खुद के घर का पता नहीं.

अब आगे से साहित्यकारों से पंगा लेने की जुर्रत ना करें.

गरिष्ठ कवि केडीके (एक्स साहित्यकार करंट ब्लॉगर)

जनाज़े से दूर रखना

लम्बे समय से उन्हें जीवन में जो ख़ालीपन खटकता था वो इस घोड़े ने पूरा किया। उन्हें बड़ा आश्यर्च होता था कि इसके बिना अब तक कैसे बल्कि काहे को जी रहे थे।

I wonder by my troth what thou and I did till we loved-done.

इस घोड़े से उनका प्रेम इस हद तक बढ़ चुका था कि फ़िटन का विचार छोड़ कर सेठ का तांगा भी साढ़े चार सौ रुपये में खरीद लिया, हालांकि तांगा उन्हें जरा-भी पसंद नहीं आया था। बहुत बड़ा और गंवारू-सा था, लेकिन क्या किया जाये। सारे कराची में एक भी फ़िटन नहीं थी। सेठ घोड़ा और तांगा साथ बेचना चाहता था। यही नहीं उसने दाने की दो बोरियों, घास के पांच पूलों, घोड़े के फ्रेम किये हुए फ़ोटो, हाज्मे के नमक, दवा और तेल पिलाने की नाल, खरेरे और तोबड़े का मूल्य-साढ़े उन्तीस रुपये-अलग से धरवा लिया। वो इस धांधली को ‘‘पैकेज-डील’’ कहता था। घोड़े के भी मुंहमांगे दाम देने पड़े। घोड़ा यदि अपने मुंह से दाम मांग सकता तो सेठ के मांगे हुए दामों यानी नौ सौ रुपये से कम ही होते। घोड़े की ख़ातिर बिशारत को सेठ का तकिया कलाम ‘‘क्या’’ और ‘साला’ भी सहन करना पड़ा। हिसाब चुकता करके जब उन्होंने लगाम अपने हाथ में ले ली और उन्हें यह विश्वास हो गया कि अब संसार की कोई शक्ति उनसे उनकी इच्छा के स्वप्नफल को नहीं छीन सकती, तो उन्होंने सेठ से पूछा कि आपने इतना अच्छा घोड़ा बेच क्यों दिया? कोई ऐब है?

उसने जवाब दिया, ‘‘दो महीने पहले की बात है। मैं तांगे में लारेंस-रोड से ली-मार्केट जा रहा था। म्यूनिस्पिल वर्कशाप के पास पहुंचा होगा कि सामने से एक साला जनाजा आता दिखाई पड़ा……क्या? किसी पुलिस अफ़सर का था। घोड़ा आल-आफ़-ए-सडन बिदक गया, पर कन्धा देने वाले इससे भी अधिक बिदके। बेफ़िजूल डर के भाग खड़े हुए……क्या? बीच सड़क पे जनाज़े की मिट्टी खराब

हुई। हम साला उल्लू के माफ़िक़ बैठा देखता पड़ा। वो दिन है और आज का दिन, बेकार बंधा खा रहा है। दिल से उतर गया……क्या? वैसे ऐब कोई नहीं, बस जनाज़े से दूर रखना। अच्छा, सलामालेकुम।’’ ‘‘आपने पहले क्यों नहीं बताया?’’ ‘‘तुमने

पहले क्यों नहीं पूछा? सलामालेकुम।’’

जग में चले पवन की चाल

उन्होंने रहीम बख़्श नाम का एक कोचवान नौकर रख लिया। तनख़्वाह मुंह-मांगी, यानी पैंतालीस रुपये और खाना कपड़ा। घोड़ा उन्होंने केवल रंग, दांत और घनी दुम देखकर खरीदा था। वो इनसे इतने संतुष्ट थे कि बाक़ी घोड़े की जांच-पड़ताल आवश्यकता न समझी। कोचवान भी कुछ इसी प्रकार रखा अर्थात केवल जबान पर रीझ कर। बातें बनाने में माहिर था। घोड़े जैसा चेहरा, हंसता तो लगता कि घोड़ा हिनहिना रहा है। तीस वर्ष घोड़ों की संगत में रहते-रहते उनकी सारी आदतें, बुराइयां, और बदबुऐं अपना ली थीं। घोड़े की अगर दो टांगें होतीं तो इसी प्रकार चलता, बच्चों को कई बार अपना बायां कान हिला कर दिखाता। फुटबाल को एड़ी से दुलत्ती मारकर पीछे की ओर गोल करता तो बच्चे ख़ुशी से तालियां बजाते। घोड़े के चने की चोरी करता था। बिशारत कहते थे, ‘‘यह मनहूस चोरी-छुपे घास भी खाता है। वरना एक घोड़ा इतनी घास खा ही नहीं सकता। जभी तो इसके बाल अभी तक काले हैं। देखते नहीं, हरामख़ोर तीन औरतें कर चुका है!’’ विषय कुछ भी हो, सारी बातचीत साईसी भाषा में करता और रात को चाबुक़ साथ लेकर सोता। दो मील के भीतर कहीं भी घोड़ा या घोड़ी हो, वो तुरन्त बू सूंघ लेता और उसके नथुने फड़कने लगते। रास्ते में कोई सुन्दर घोड़ी दिखाई पड़ जाये तो वहीं रुक जाता और आंख मार-के तांगे वाले से उसकी उम्र पूछता। फिर अपने घोड़े से कहता ‘‘प्यारे! तू भी जलवा देख ले, क्या याद करेगा!’’ और पंकज मलिक की आवाज, अपनी लय और घोड़े की टाप की ताल पर ‘‘जग में चले पवन की चाल’’ गाता हुआ आगे बढ़ जाता। मिर्जा कहते थे कि यह व्यक्ति पूर्व-जन्म में घोड़ा था और अगले जन्म में भी घोड़ा ही होगा। ऐसा केवल महात्माओं और ऋषियों, मुनियों के साथ होता है कि वो जो पिछले जन्म में थे, अगले में भी वहीं हों। वरना ऐसे-वैसों की तो एक ही बार में जून पलट जाती है।

घोड़े-तांगे का उद्घाटन कहिये, मुहूर्त कहिये, जो कहिये-बिशारत के पिता के हाथों हुआ। सत्तर के पेटे बल्कि लपेटे में आने के पश्चात! लगातार बीमार रहने लगे थे। कराची आने के उपरांत उन्होंने बहुत हाथ-पांव मारे, मगर न कोई मकान और जायदाद अलाट करा सके, न कोई ढंग का बिजनेस शुरू कर पाये। बुनियादी तौर पर वो बहुत सीधे आदमी थे। बदली हुई परिस्थितियों में वो अपने बंधे-टिके उसूलों और आउट-आफ़-डेट जीवन-शैली में परिवर्तन लाने को सरासर बदमाशी मानते थे। इसलिए असफलता के कारण दुखी अथवा शर्मिंदा होने की बजाय एक गौरव और संतोष अनुभव करते। वो उन लोगों में से थे, जो जीवन में नाकाम होने को अपनी नेकी और सच्चाई की सबसे रोशन दलील समझते हैं।

अत्यंत भावुक और स्वाभिमानी व्यक्ति थे, किसी से अधिक मिलते-जुलते भी न थे। कभी किसी के सामने हाथ नहीं फ़ैलाया था। पामिस्ट के सामने भी नहीं। अब यह भी किया। ख़ुशामद से जबान को कभी दूषित नहीं किया था। यह क़सम भी टूटी मगर, काम न बनना था, न बना। मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग का कहना है कि, जब स्वाभिमानी और बाउसूल व्यक्ति अपनी हिम्मतानुसार धक्के खाने के पश्चात डीमॉरलाइज होकर कामयाब लोगों के हथकंडे अपनाने का भोंडा प्रयास करता है तो रही-सही बात और बिगड़ जाती है। एकाएक उनको लक़वा मार गया। शरीर के बायें भाग ने काम करना बंद कर दिया। डाइबिटीज, एलर्जी, पार्किंसन और ख़ुदा जाने कौन-कौन से रोगों ने घेर लिया। कुछ ने कहा उनके घायल स्वाभिमान ने रोगों में शरण ढूंढ ली है। स्वयं स्वस्थ नहीं होना चाहते कि फिर कोई तरस नहीं खायेगा। अब उन्हें अपनी असफलता का इतना अफ़सोस नहीं था जितना कि अपनी जीवनशैली हाथ से जाने का दुख। लोग आ-आ कर उनका साहस बढ़ाते और कामयाब होने के तरीक़े सुझाते तो उनके आंसू बहने लगते।

लज्जा और अपमान की सबसे जलील सूरत यह है कि व्यक्ति स्वयं अपनी दृष्टि में भी कुछ न रहे। सो वो इस नर्क से भी गुजरे-उनका बायां बेजान हाथ अलग लटका इस गुजरने की तस्वीर खींचता रहता। लेकिन बेबसी का चित्रण करने के लिये उन्हें कुछ अधिक चेष्टा करने की आवश्यकता न थी। वो सारी उम्र दाग़ की ग़जलों पर सर धुनते रहे थे। उन्होंने कभी किसी तवायफ़ को फ़ानी या मीर की ग़जल गाते नहीं सुना था। दरअस्ल उन दिनों नृत्य और गायन की महफ़िलों में किसी हसीना से फ़ानी या मीर की ग़जल गवाना ऐसा ही था जैसे शराब में बराबर का नींबू का रस निचोड़ कर पीना, पिलाना। गुस्ताख़ी माफ़, ऐसी शराब पीने के बाद तो आदमी केवल तबला बजाने योग्य रह जायेगा! तो साहब! बाबा सारी उम्र फ़ानी और मीर से दूर रहे। अब जो शरण मिली तो उन्हीं के शेरों में मिली। वो मजबूत और बहादुर आदमी थे। मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उनको कभी रोते हुए देखूंगा। मगर देखा, इन आंखों से, कई बार।’’

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की

पहला और दूसरा भाग

आप बहुत बड़े हो सकते हैं.उच्च पद पर आसीन हो सकते है, बड़े ब्लॉगर हो सकते हैं, बड़े साहित्यकार हो सकते हैं, दार्शनिक भी हो सकते हैं, बड़े और गरिष्ठ वरिष्ठ कवि भी, बड़े कलाकार भी,बड़े व्यवहार कुशल भी,बड़े लेखक भी,बड़े व्यंग्यकार भी.लेकिन इन सबसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप परिणाम कैसे दे रहे हैं. यानि जो आप कर रहे हैं या करना चाह रहे हैं वह हासिल हो भी रहा है या नहीं या फिर आप बिना सूत-कपास के कोरी लट्ठमलट्ठा किये जा रहे हैं. यदि किसी काम का परिणाम अच्छा है तो यह उतना महत्वपूर्ण नहीं कि वह काम किसने किया.इट्स  द रिजल्ट्स दैट मैटर्स.

एक कहानी सुनें. एक बार के बहुत बड़े पुजारी,संत,योगाचार्य की मृत्यु हुई और वह ऊपर पहुंच गये. स्वर्ग के द्वार पर. और वहां खड़े होकर वह अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगे. उनके आगे एक व्यक्ति खड़ा था. उसने अच्छे,चमकदार कपड़े पहने हुए थे, आखों मे ग़ॉगल्स लगाये हुए थे, रंगीली शर्ट,चमड़े की जैकेट और जींस .

धर्मराज ने उस व्यक्ति से पूछा,कृपया मुझे बताएँ कि आप कौन हैं ताकि मैं जान सकूँ कि आपको स्वर्ग के द्वार से अंदर जाने दूँ या नहीं.

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया  मैं बंता सिंह हूं. मैं नई दिल्ली में टैक्सी ड्राइवर था.

धर्मराज ने अपना बही खाता खोला. उसे ध्यान से देखते हुए बंता सिंह से मुस्कराते हुए कहा

कृपया यह रेशमी वस्त्र पहन लें और सोने के द्वार से सोने के सिहांसन की ओर जायें. 

अब संत की बारी थी.धर्मराज ने उनसे भी वही प्रश्न पूछा कि वह कौन हैं. उन्होंने सीधे खड़े होकर और विश्वास भरी तेज आवाज में उत्तर दिया.

मैं हूं संत शिरोमणि बाबा अलां फलां 1008. मैं  अलां फलां मंदिर का प्रमुख पुजारी था. मैं पिछ्ले चालीस साल से लोगों को ईश्वर के बारे में बता रहा हूँ.

धर्मराज ने फिर अपना बही खाता खोला और संत से कहा.

आप कृपया यह सूती वस्त्र पहने और लकड़ी के द्वार से लकड़ी के सिंहासन की ओर प्रस्थान करें.

संत को गुस्सा आ गया. उन्होने धर्मराज से पूछा. यह आपका कैसा न्याय है भगवन. उस सदा गाली देते रहने वाले, ठीक से गाड़ी भी ना चला पाने वाले ड्राइवर को तो आपने रेशमी वस्त्र और सोने का सिंहासन दिया और मुझे, जिसने लोगों को उपदेश देने में अपना सारा जीवन लगा दिया, उसे सूती वस्त्र और लकड़ी का सिंहासन. ऐसा क्यों भगवन.

“परिणाम मेरे पुत्र, केवल परिणाम, “ परिणाम ही है जिसके कारण ऐसा हुआ.

जब तुम लोगों को ईश्वर की प्रार्थना करने का उपदेश देते थे तो लोग सोते थे और जब बंता सिंह टैक्सी चलाता था तो लोग सही सलामत घर पहुंचने के लिये ईश्वर की प्रार्थना करते थे.

तो शिक्षा यह मिली कि आप कौन है कितने बड़े हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह महत्वपूर्ण है आपका जो कर रहे हैं उसका परिणाम क्या हो रहा है. 

Moral of the story: Its PERFORMANCE and not POSITION that ultimately counts.

शाही सवारी

उन्हें इस घोड़े से पहली नजर में मुहब्बत हो गयी और मुहब्बत अंधी होती है, चाहे घोड़े से ही क्यों न हो। उन्हें यह तक सुझायी न दिया कि घोड़े की प्रशंसा में उस्तादों के जो शेर वो ऊटपटांग पढ़ते फिरते थे, उनका संबंध तांगे के घोड़े से नहीं था। यह मान लेने में कोई हरज नहीं कि घोड़ा शाही सवारी है। शाही रोब और राजसी आन-बान की कल्पना घोड़े के बिना अधूरी, बल्कि आधी रह जाती है।

बादशाह के क़द में घोड़े का क़द भी बढ़ाया जाये, तब कहीं जा के वो क़द्दे-आदम दिखाई पड़ता है। परंतु जरा ध्यान से देखा जाये तो शाही सवारियों में घोड़ा दूसरे नंबर पर आता है। इसलिए कि बादशाहों और तानाशाहों की मनपसंद सवारी दरअस्ल जनता होती है। ये एक बार उस पर सवारी गांठ लें तो फिर उन्हें सामने कोई कुआं, खाई, बाड़ और रुकावट दिखाई नहीं देती। जोश में वो दीवार भी फलांग जाते हैं। ये लेख वो तब तक नहीं पढ़ सकते जब तक वो Braille में न लिखा हो।

जिसे वो अपना दरबार समझते हैं, वो वास्तव में उनका घेराव होता है, जो उन्हें यह समझने नहीं देता कि जिस मुंहजोर, सरकश घोड़े को केवल हिनहिनाने की इजाजत दे कर सरलता के साथ आगे से क़ाबू किया जा सकता है, उसे वो पीछे से क़ाबू करने की चेष्टा करते हैं, अर्थात लगाम की बजाय दुम मरोड़ते हैं। लेकिन इस सीधी-सादी लगने वाली सवारी का भरोसा नहीं, क्योंकि यह अबलक़ा सदा एक चाल नहीं चलती। परन्तु जो शासक होशियार, पारखी, और शासन में भले-बुरे के भेद से परिचित होते हैं वो पहले ही दिन ग़रीबों का सर कुचल कर सभी को पाठ समझा देते हैं।

वैसे बड़े और विशिष्ट व्यक्तियों को किसी और अंकुश की आवश्यकता नहीं होती। जो भी उन पर सोने का हौल, चांदी की घंटियां, जरबफ़्त की झूल और तम्ग़ों की माला डाल दे, उसी के निशान का हाथी बनने के लिये कमर बांधे रहते हैं। चार दिन की जिंदगी मिली थी, सो दो-जीहुजूरी की इच्छा में कट गये, दो जीहुजूरी में।

हमारा क़जावा

हमने एक दिन घोड़ों की शान में कुछ कह दिया तो बिशारत भिन्ना गये। हमने तो ठिठोली के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक हवाला दिया कि जब मंगोल हजारों के झुण्ड बना कर घोड़ों पर निकलते तो बदबू के ऐसे भभके उठते थे कि बीस मील दूर से पता चल जाता था। कहने लगे, क्षमा कीजिये, आपने राजस्थान में, जहां आपने जवानी गंवाई, ऊंट ही ऊंट देखे। जिनकी पीठ पर क़लफ़दार राजपूती साफ़े,चढ़वां दाढ़ियां और दस फ़ुट लम्बी नाल वाली तोड़ेदार बंदूकें सजी होती थीं और नीचे…कंधे पर रखी लाठी के सिरे पर तेल पिलाये हुए कच्चे चमड़े के जूतों को लटकाये अर्दली में नंगे पैर जाट।

कमर बांधे, और हाथ पैर बांधे, फिर मुंह बांधे’’

घोड़ा तो आपने यहां आन के देखा है। मियां अहसान इलाही गवाह हैं, उन्हीं के सामने आपने उन ठाकुर साहब का क़िस्सा सुनाया था जो महाराजा की ऊंटों की पल्टन में रिसालदार थे। जब रिटायर होकर अपने पुरखों के क़स्बे… क्या नाम था उसका-उदयपुर तोरावाटी-पहुंचे तो अपनी गढ़ी में भेंट करने आने वालों के लिए दस-बारह मोढ़े डलवा दिये और अपने लिये अपने सरकारी ऊंट जंग बहादुर का पुराना क़जावा, उसी पर अपनी पल्टन का लाल रंग का साफ़ा बांधे, सीने पर तम्ग़े सजाये, सुब्ह से शाम तक बैठे हिलते रहते। एक दिन हिल-हिल कर जंग बहादुर के कारनामे बयान कर रहे थे और मैडल झन-झन कर रहे थे कि दिल का दौरा पड़ा। क़जावे पर ही आत्मा का पंछी पंचभूत-रूपी पिंजड़े से उड़ कर अपनी यात्रा पर रवाना हो गया। वापसी के क्षणों में होंठों पर मुस्कान और जंग बहादुर का नाम, क्षमा कीजिये, ये सब आप ही के द्वारा लिये गये स्नेप शाट्स हैं, आप भी तो अपने क़जावे से नीचे नहीं उतरते। न उतरें! मगर यह क़जावा इस अधम की पीठ पर रखा हुआ है। साहब! आप घोड़े का मूल्य क्या जानें। आप तो यह भी नहीं जानते कि खच्चर का ‘क्रास’ कैसे होता है? खरेरा किस शक्ल का होता है? कनौतियां कहां होती है? बैल के आर कहां चुभोई जाती हैं? चिल्ग़ोजा किस भाषा का शब्द है? अन्तिम दो प्रश्न आवश्यक और निर्णायक थे क्योंकि इनसे पता चलता था कि बहस किस नाजुक मोड़ पर आ चुकी है।

यह बहस हमें इसलिए और अधिक नागवार गुजरी कि हमें एक भी सवाल का जवाब नहीं आता था। स्वभाव के लिहाज से वो टेढ़े नहीं, बड़े धीमे और मीठे आदमी हैं, लेकिन जब इस प्रकार पटरी से उतर जायें तो हमें दूर तक कच्चे में खदेड़ते, घसीटते ले जाते हैं। कहने लगे जो व्यक्ति घोड़े पर न बैठा हो वो कभी संतुष्ट स्वाभिमानी और शेर, दिलेर नहीं हो सकता। ठीक ही कहते होंगे क्योंकि वो स्वयं भी कभी घोड़े पर नहीं बैठे थे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है

पहला और दूसरा भाग

डार द्रुम पलना,बिछौना नवपल्लन के
सुमन झँगूला सौहे तन छवि भारी दें
मदन महीपजू को बालक बसंत
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दे.

- कविवर देव

पिछ्ले अंक में हमने होली में शास्त्रीय होली की बात की थी आज उसे ही आगे बढ़ाते हैं. कुछ लोग मानते हैं पर्वतीय क्षेत्र में और विशेषकर कुमाऊं में होली की शुरुआत बसंत पंचमी से होती है लेकिन बैठकी होली की शुरुआत इससे भी काफी पहले हो जाती है. पौष माह (जिसे पहाड़ में पूस मास कहा जाता है) के पहले रविवार से बैठी होली प्रारम्भ हो जाती है.लेकिन इस होली का स्वरूप और इसके कथ्य का स्वरूप बदलते रहता है. बसंत पंचमी तक कथ्य आध्यात्मिक रहता है, शिवरात्रि तक आते आते यह अर्ध-श्रंगारिक हो जाता है,शिवरात्रि की बाद पूर्ण श्रंगारिक होलियां गायी जाती हैं. तो बैठकी होली में भक्ति, छेड़-छाड़,वैराग्य,विरह, हंसी-ठिठोली, कृष्ण-गोपी प्रेम, कृष्ण की रास लीला, प्रेमी-प्रेमिका की रार तकरार, पति पत्नी का विरह, संयोग, देवर-भाभी की छेड़-छाड़ सभी तरह के रसों का अनोखा मिश्रण है.

बैठकी होली पर्वतीय अंचल की संस्कृति में रची-बसी होने के बावजूद ‘न्योली’ जैसे पारंपरिक लोकगीतों से भिन्न है. सबसे खास बात इस होली की है कि इसे कुमाऊंनी में नहीं गाया जाता. इसकी भाषा ब्रज की बोली है या फिर मिलीजुली है जिसमें अवध का प्रभाव भी स्पष्ट दिखता है. सभी बदिंशें राग-रागिनियों में गाई जाती हैं. यानी यह शुद्ध शास्त्रीय गायन है लेकिन यह शास्त्रीय गायन से कुछ मामलों में भिन्न भी है.यह शास्त्रीय गायन की तरह एकल गायन नहीं है और ना ही इसे सामूहिक गायन की श्रेणी में रखा जा सकता है.होली में भाग लेने वालों को होलियार कहा जाता है. मुख्य होलयार (जो अपनी अपनी बारी के हिसाब से बदल सकते हैं) गीत का मुखड़ा गाता है और बांकी लोग जो श्रोता भी है और होलियार भी वह बीच बीच में साथ देते हैं जिसे यहां ‘भाग लगाना’ कहते हैं.इस मामले में बैठक़ी होली महिलाओं की होली से अलग है जहाँ महिलाऐं समवेत स्वरों में होली गाती हैं.बैठकी होली में गीत घर की बैठक में राग रागनियों के साथ हारमोनियम और तबले पर गाए जाते हैं. इन गीतों में मीराबाई से लेकर नज़ीर और बहादुर शाह ज़फ़र की रचनाएँ सुनने को मिलती हैं.होली में जब रंग छाने लगता है तो बारी बारी से हर कोई छोड़ी गई तान उठाता है.

बैठक होली में श्रंगार है,लेकिन अश्लीलता नहीं है,भोंडापन नहीं है.प्रसिद्ध साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी ने कहीं कहा था ‘‘होली जैसे धमाल भरे त्यौहार को ‘बैठक होली’ गरिमा प्रदान करती है.’’

इसमें मूलत: पुरुष भाग लेते हैं लेकिन आजकल महिलायें भी इसमें शामिल होती हैं. यह होली रात में शुरु होती है और अक्सर सुबह दो-तीन बजे तक चलती रहती है.होली का राग धमार से आह्वान कर पहली होली राग श्याम कल्याण में गाई जाती है. समापन राग भैरवी पर होता है. बीच में समयानुसार अलग-अलग रागों में होलियां गाई जाती हैं. सभी तरह के राग और ताल इन होलियों में प्रयोग किये जाते हैं. जैसे राग काफी, जंगला, खम्माज, साहना,जैजैवंती, झिंझोटी, भैरवी में क्रमश: जैसे जैसे थकान  बढ़ती है, गाये जाते हैं. भीम पलासी, कलावती, हमीर राग भी चलता है.दादरा,कहरवा ताल सभी में होलियां गायी जाती हैं.होली को लोकप्रिय बनाने के भी प्रयास हुए.इसे लोकप्रिय बनाने के लिए जानकारों ने होली की धमार और चांचर ताल में परिवर्तन किया. सो, 14 मात्रा की धमार और चांचर तालें 16 मात्रा की हो गईं. रागों के अंग या चलन में भी थोड़ा-सा परिवर्तन किया गया. इससे होली गायन की एक नई शैली विकसित हुई और वह सहज आम जन की हो गई.

यहाँ आपको अलग अलग रंग की होली देखने को मिलती है. जैसे

” ये कैसी होरी खिलाई श्याम तुम बड़े हरजाई “

” जगाय दीन्हो रे मोहे निंदिया में आके “

” मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे “

” साकी लिये सागरे मुश्क बू है.

गुलिस्तां में जाकर हरेक गुल को देखा,

न तेरी सी रंगत न तेरी सी बू है”

और नजीर की होली तो खैर गायी ही जाती है.

“जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीशए*  जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
गुलज़ार*  खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की। “

- नजीर अकबराबादी

* शीशए : सागर / * गुलजार : बाग

गंगोलीहाट, लोहाघाट, चंपावत, पिथौरागढ़ , अल्मोड़ा, नैनीताल अपनी शास्त्रीय होलियों के लिये प्रसिद्ध हैं. लोहाघाट अपनी खड़ी होलियों के लिये भी प्रसिद्ध है.

बैठकी होली के कुछ गायकों की बात करें तो “चंचल प्रसाद जी” अभी भी होली गायक के रूप में विख्यात है. दिल्ली और उत्तरांचल के कद्रदानों में होली गायन के लिए खासे लोकप्रिय चंचल प्रसाद अपनी वंश परंपरा में तीसरी पीढ़ी के गायक हैं. कहते हैं, उनके दादा उस्ताद कालिया को नेपाल की राजशाही का वरदहस्त प्राप्त था, तो पिता राम गुलाम रामपुर के सहसवान घराने के पारंगत गायक और सारंगी वादक थे.कहा जाता है कि  होली की बैठकों में जान डालने वाले “गुलाम उस्ताद की” आवाज और अंगुली दोनों में जादू था. उनके बाद यहां किसी को ‘उस्ताद’ नहीं कहा गया.इन सबके अलावा जो नाम होली गायन से जोड़े जाते हैं उनमें रामप्यारी, अमानत खां, शिवलाल वर्मा, कांती लला, मोहन रईस, तारा प्रसाद पांडे, नारायण दत्त जोशी जैसे कलाकारों को ‘बैठक होली’ के दिग्गजों के रूप में याद किया जाता है.

अल्मोड़ा में ही एक प्रमुख क्लब है “हुक्का क्लब”. 1907 में स्थापित यह क्लब सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है.यह क्लब हर साल कुमाऊं की प्रसिद्ध रामलीला भी करवाता है. यहां नियमित रूप से होली की बैठकें आयोजित होती रही हैं. पिछले दशक से यह क्लब हर वर्ष अल्मोड़ा में ‘होलिकोत्सव’ का आयोजन कर रहा है, जिसमें उत्तरांचल के अलावा देश के कई भागों जैसे मथुरा, वृंदावन, जम्मू, कोलकाता इत्यादि की टीमें भी भाग लेती हैं.

अल्मोड़ा की शास्त्रीय होली की बात हो और स्वर्गीय तारा प्रसाद पांडे यानि तारी मास्साब की बात ना हो ऐसा कैसे हो सकता है. मेरा यह सौभाग्य रहा है दर्जा सात-आठ में वो हमारे संगीत के मास्साब थे. मुझे एक बैठी होली में बैठने का सौभाग्य भी मिला है जिसके तारी मास्साब ने भी होली गायी थे. संगीत में तारी मास्साब की पकड़ तो थी ही वो बहुत मजाकिया भी थे. अपना गायन खत्म करने के बाद वह ऐसी चुटकी लेते कि आसपास बैठे लोग हँसते रहते और वह “चहा लाओ हो” (चाय लाओ जी) या “आलू-गुटुक कां छ्न” (आलू के गुटके कहाँ हैं)  कह के दूसरी होली शुरु कर देते.उस जमाने में सीडी या एम.पी.3 तो चला नहीं था. रिकॉर्डिग की उन्नत सुविधायें भी नहीं थी और ना ही लोग रिकॉर्ड करने या व्यवसायिक उद्देशय के लिये होली गाते थे. यह सब तो एक स्वांत: सुखाय संस्कृति का हिस्सा था.इसलिये तारी मास्साब या उन जैसे कई अच्छे गायको की होलीयां समय के साथ खो गयीं.तारी मास्साब की कुछ कैसेट उनके चाहने वालों ने बनाये थे जो एक जमाने में अल्मोड़ा में बिके भी. ऐसा ही काफी पुराना कैसेट मेरे पास भी है. आइये उसी में से एक होली आपको सुनवाते चलूं.

मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे, मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे,
सब   सखियन संग मैं भी गयी थी ,  सब    सखियन   संग मैं भी गयी थी
रंग की   भरी   मोरि   उमंग नयी थी ,  रंग   की   भरी मोरि उमंग नयी थी
ऐसी ढीढ    डंगर   देखो रंग के रंगीलो , ऐसी ढीढ डंगर देखो रंग के रंगीलो
मोरि नरम कलाई मरोड़ गयो रे,    धक्का मार   गयो रे मोहे नंद को दुलारो
मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे, मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे,
मोरि नयी सी चुनरिया   फार  गयो रे,   मोरि नयी सी चुनरिया फार गयो रे
धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो,मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे

सरका के   अंगरुवा देखे मोरे अंग रे,  सरका  के   अंगरुवा देखे मोरे अंग रे,
लाज  से  सिमटी कोई नहीं संग रे , लाज से सिमटी कोई नहीं संग रे
सांवरों कान्ह  कैसो  छैल  छ्बीलो देखो ,सांवरों कान्ह कैसो छैल छ्बीलो देखो
देखो अंगिया मोरी उतार गयो रे, देखो अंगिया मोरी उतार गयो रे
धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो
मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे, मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे,
मोरि नयी सी चुनरिया   फार  गयो रे,   मोरि नयी सी चुनरिया फार गयो रे
धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो,मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे

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