काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

 

कल एक समाचार पढ़ा कि कानपुर के कलक्टरगंज थाने में रखे विस्फोटकों में विस्फोट हो गया.लिखा था कि यह विस्फोटक पुलिस द्वारा बरामद किये गये थे और थाने में ही रखे थे. एक हिन्दी के समाचार पत्र ने इस पर अपना संपादकीय भी बरबाद किया. इस बरबादी के पीछे तो कारण यह भी हो सकता है कि संपादक को बरबाद करने को कुछ और ना मिला हो लेकिन विस्फोटकों की किस्मत पर मुझे रस्क होने लगा. क्या किस्मत पायी उन विस्फोटकों ने. फटे भी तो ऐन थाने में, पुलिस के बीचों बीच.लेकिन मुझे यह समझ नहीं आया कि इस पर संपादकीय लिखने की क्या जरूरत थी. विस्फोटक हैं तो फटेंगे ही. उनका काम ही है फटना,फाड़ना. अब वह कोई पकड़े गये अपराधी तो थे नहीं कि पुलिस के डर से थाने में तब तक चुप बैठे रहते जब तक पुलिस की जेबें गरम ना होती और फिर उसी गरमी में पुलिस उन्ही अपराधियों से साथ चाय-बिस्कुट पी,खा कर  उन्हें छोड़ने के लिये प्रेरित ना हो जाती. या फिर वो ऐसे निरपराध अपराधी भी नहीं थे जो पुलिस के डंडे के डर से अपने सारे अनकिये अपराधों को उगल देते और जेल में सड़े रहने पर मजबूर होते. वो तो विस्फोटक थे. इसलिये भले ही पुलिस थाने में ही हों.वह फटे. शुक्र है पुलिस थाने में इतने दिन रहने के बाद भी उन्होने अपने कर्तव्य को पूरा किया. पुलिस से कोई प्रेरणा नहीं ली. मुझे इस बात की ही खुशी है.

मुझे विस्फोटकों की किस्मत पर इसलिये भी रस्क होता है कि वह विस्फोटक ही थे. इसलिये बरामद होने के बाद भी थाने में लावारिस की तरह पड़े रहे. अच्छा हुआ वह बरामद की हुई ज्वैलरी ना थे वरना अब तक किसी थानेदारिनी की सेवा में लगे होते. वह टीवी भी नहीं थे,फ्रिज भी नहीं, गाड़ी भी नहीं थे, इम्पोर्टेड सैट भी नहीं, वह फर्नीचर भी नहीं थे, इलेक्ट्रिकल अप्लायंस भी नहीं. वरना सोचिये अब तक वह किसी पुलिस वाले के वहाँ ओवर टाइम कर रहे होते. यही नहीं वह अपनी बिरादरी के अन्य हथियारों से भी अलग थे. वरना अब तक जिंनसे बरामद किये उन्हें ही या किसी और को बेच दिये गये होते.केवल विस्फोटक होना उनके काम आया.

संपादकीय में लिखा था कि उन्हे थाने में क्यों रखा गया था. ज़ाहिर सी बात है घर में नहीं रख सकते थे इसलिये.हो सकता है पुलिस वाले देखना चाहते हों कि उन्होने जो बरामद किया वह विस्फोटक ही है या नहीं. कहीं ऐसा तो नहीं अपराधियों ने विस्फोटकों की शक्ल में सोना छिपा रखा हो. हो सकता है पुलिस वाले दीवाली तक इंतजार कर रहे हों. क्योंकि विस्फोटकों की तात्कालिक जरूरत भी नहीं थी.हो सकता है पुलिस वाले किसी विस्फोटक जौहरी की तलाश में हो जो उन हीरों को पहचान कर उनकी कीमत पुलिस की जेब तक पहुंचा सके. हो सकता है पुलिस के यह विश्वास हो कि यह विस्फोटक पाकिस्तान के बने हुए नहीं हैं. खालिस मेड इन इंडिया है. इसलिये उनके फटने में पुलिस को डाउट हो. क्योंकि डाउट करना पुलिस का फ़र्ज़ है और वह सारे फ़र्ज़ तो एकसाथ नहीं भूल सकती.वैसे भी उन फ़र्जों को पुलिस कभी नहीं भूलती जो दूसरों को सताने और खुद को बचाने के काम आते हैं. कुछ नियमों को तो पुलिस भी मानेगी ही. ताकि साख भी बनी रही है और जेबें भी गरम रहे. 

यह भी लिखा गया कि विस्फोटकों को पहले डिफ्यूज कर देना चाहिये था. मुझे इस बात से भी सख्त ऐतराज़ है. इतना दिमाग पुलिस के पास होता तो वह पुलिस ही क्यों होते कोई सरकारी कर्मचारी ना होते. यह पुलिस की सरासर तौहीन है. यह ऐसा ही है जैसे आप गृह मंत्री शिवराज पाटिल से यह अपेक्षा करें कि वह सोच समझकर बयान दें. सोचना ही होता तो वह शरद पवार ना होते जो कृषि मंत्री होकर भी क्रिकेट के बारे में सोचते हैं. और फिर सोचने का काम सचिवों का होता है. पुलिस के पास तो सचिव भी नहीं तो वह इतनी बड़ी बात सोचते भी कैसे. पुलिस का काम माल बरामद करना है. वह उसने किया. आप क्या चाहते हैं कि पुलिस अपना काम छोड़कर दिमाग वाला काम करे.

कानपुर के कलक्टर गंज के बारे में एक कहावत है “झाड़े रहो कलट्टरगंज”. जब कहावत है तो उसका कोई मतलब भी होगा. यह मतलब इतना सरल है कि पुलिस तक की समझ में आ गया. इसी कहावत का पालन करते हुए पुलिस ने उन विस्फोटकों से पल्ला झाड़ लिया. हमारी लोक संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा व सम्मान पुलिस नहीं करेगी तो कौन करेगा. तो कलक्टरगंज की पुलिस ने ऐसा किया तो क्या गलत किया. क्या आप मेरे से सहमत हैं?

 

समय बदलता है. बदलना ही उसका काम है. कुछ लोग इस बदलाव का रोना रोते हैं. लेकिन रोने से भी समय रुकता नहीं. चोर,उचक्के,मर्डरर का मंत्री हो जाना समय का बदलना है. आप लाख सर पीटें यह रुकने वाला नहीं.गुडे का मंत्री हो जाना ही उसकी नियति है. पहले धमाका होता था तो केवल दीवाली में या फिर शब्बे-बारात में. साल में एक दो बार चुटपुटे बम का धमाका होने से बारूद बनाने वाली कंपनी प्रॉफिट में कैसे आती. सब जगह विकास हो रहा है. यहाँ भी होना चाहिये. तो फिर शादियों में बम फोड़ने का चलन हुआ. अब तो शादियों में पटाखे ही नहीं फूटते बल्कि गोलियां भी चलती हैं. वैसे यह हवाई फायर होते हैं लेकिन कभी कभी अति उत्साह में कोई आदमी हवा में उड़ने लगता है तो ये हवाई फायर उसे लग जाते हैं. इसमें कोई ग़म नही.सब चलता है. एक आध आदमी मर भी जाये तो क्या. वैसे भी इस देश में इतने लोग एक्सीडेंट और भी ना जाने किस किस तरह से मरते रहते हैं. शादियों में हवाई फायर से मरने का नया चलन है. कुछ दिनों में हमें इसकी आदत हो जायेगी.धमाकों से मरने की आदत धीरे धीरे हो ही रही है ना.

शादियों के बाद नेता लोग चुनाव जीतने पर भी बम फोड़ने लगे.अब चुनाव जीतने पर खुशी जाहिर करने के लिये बम फोड़े जाने लगे या फिर इस के द्वारा यह बताने के लिये कि अब हम जीत गये हैं हम से बचकर रहना वरना बम की तरह उड़ा दिये जाओगे.यह शोध का विषय है. मैं इस तरह के शोध से फिलहाल दूर ही रहता हूँ. आजकल बम फोड़ने का यह पुनीत कार्य कुछ आतंकवदियों ने अपने हाथ में ले लिया है. कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि सरकार ने इस काम को आउटसोर्स कर दिया है.मैं उन लोगों से सहमत हो भी जाता हूँ नहीं भी. क्योकि यदि निहत्थे, निर्दोष लोगों को मारने का काम आउटसोर्स हो गया है तो सरकार क्यों इस काम को कर रही है. किसान लोग आत्महत्या कर ही रहे हैं.हो सकता है सरकार आत्महत्या को दूसरी नजर से देखती हो या फिर किसान लोग जल्दी में हों वह आउटसोर्स एजेंसी से मरना ना चाहते हो या फिर अभी पूरी तरह आउटसोर्सिंग नहीं हुई हो. सरकार केवल ट्रायल ले रही हो. कुछ भी हो सकता है. सरकार की बात वैसे भी हम जैसा आम आदमी कैसे जान सकता है.

कुछ लोग कहते हैं कि सरकार और आतंकवादी आपस में मिले हुए है. मैं इस बात को समझने का प्रयास करता हूँ कि सरकार में आतंकवादी हैं या आतंकवादियों की सरकार है.कुछ भी हो सकता है. यह केवल पाकिस्तान में ही होता होगा जरुरी नहीं यहाँ भी होता है. होता तो जुरुर होगा लेकिन मैं इससे भी पूरी तरह सहमत नहीं हो पाता. मेरी असहमति का एक ही बिन्दु है. आतंकवादी जब निहत्थे,निर्दोष लोगों की बेमतलब हत्या करते हैं तो कुछ समय बाद उसकी जिम्मेवारी भी ले लेते हैं.सरकार कभी यह जिम्मेवारी नहीं लेती. सरकार जिम्मेवारी या तो विपक्ष पर डालती है या फिर विदेशी हाथ पर और फिर धमाकों के बाद पुलिस भी तत्परता दिखाती है और एक दो दिन में एक-दो स्केच जारी कर देती है. यह सरकार के केस में नहीं होता. उनके तो सिर्फ पोस्टर लगते हैं.वह भी अच्छे कामों के.

कहीं स्केच और पोस्टर एक ही चीज को इंगित तो नहीं करते कि हमको चुनो हम खास हैं.चुनो नहीं तो उड़ा दिये जाओगे. अब बतायें स्केच और पोस्टर में क्या अंतर रह गया भला.खैर जाने दीजिये हम तो खुश हैं देश विकास कर रहा है. बारूद बनाने वाली कंपनियां प्रॉफिट में है. कुछ लोग मर रहे हैं तो क्या. कुछ की रोजी रोटी छिन रही है तो क्या. क्या मॉल के बनने से ऐसा नहीं हो रहा या फिर नयी फैक्ट्री लगने से ऐसा नहीं हो रहा. देश के विकास में कुछ को कुरबानी देनी ही पड़ती है. हम भी यह कुरबानी देने को तैयार हैं. आओ बारूद की कंपनियों लाभ कमाओ. हम मरने को तैयार हैं.

 

हमारे एक नये नये मित्र बने हैं.नाम है कमलादत्त कांडपाल.नये नये पत्रकार बने हैं. रहने वाले हैं ग्राम कांडा, पट्टी कत्यालू, कफड़खान के. जनेऊ धारी ब्राह्मण है लेकिन खुद को बामण कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं.कान में जनेऊ डालने के बाद ही कोई शंका करते हैं चाहे वह लघु हो या दीर्घ. एक ढाई फुट की चुटिया भी है.जिसे बड़े जतन से संभाल कर रखते हैं.दिल्ली में नये नये आये हैं.करोल बाग में किराये पर कमरा लेकर रह रहे हैं.

अब इनसे हमारी दोस्ती कैसे हो गयी यह भी कमाल की ही बात है. दरअसल हमारे कमलादत्त जी को “क” वर्ण से कुत्ताप्यार है. कुत्ताप्यार यानि जैसे कुत्ते को कुत्ते से होता है मतलब काटना व चाटना दोनों इस प्यार में शामिल है. इनकी जिन्दगी का सबसे बड़ा दुख यह है कि इनका नाम कमलादत्त ना होकर कमलकांत क्यों नहीं है तब इनके नाम में भी तीन “K” या “क” होते. मतलब यह कि ये तीन ‘क’ के पीछे पागल हैं. अर्जुन हिंगोरानी, जो अक्सर तीन “K” वाली फिल्में बनाया करते थे जैसे “कब ? क्यों और कहां ?” (1970), “कहानी किस्मत की” (1973), “खेल खिलाड़ी का” (1977), “कातिलों के कातिल”. इनके आदर्श है.  तो एक दिन यह हमारे  ब्लॉग पर आये और “काकेश की कतरनें” देख ठिठक गये. तीन “क” देख कर इन्होने हमसे संपर्क किया और धीरे धीरे यह संपर्क दोस्ती में बदलने लगा.अब इनके अन्य मित्रों की तरह हम भी इन्हें “केडीके” कहते हैं.

खबरों के बारे में यह आत्मनिर्भर हैं. खबर हो ना हो लेकिन उसको अपने तगड़े विश्लेषण के छोंक के साथ पेश करने में केडीके माहिर हैं.

इधर कई दिनों से व्यस्तता के कारण नियमित लिखना नहीं हो पा रहा तो केडीके ने कहा.

“अमां यार आजकल तुम केवल “खोया पानी” छापते हो, हालांकी इसमें भी एक “k’ है लेकिन फिर भी  कुछ और लिखते क्यों नहीं”

“क्या बताऊँ केडीके, पेपर पढ़ने तक का टाइम नहीं है आजकल कुछ लिखें भी तो कैसे?”

“देख केके दोश्त तुमको हम खबर बतायेगें तुम उसको अपने अंदाज में लीख देना”

हम को और क्या चाहिये था.हम तैयार हो गये.किसी भी खबर के बारे में केडीके के अपने तर्क होते हैं,जिन्हे अक्सर इनका बॉस, संपादक नहीं मानता और उसे अखबार में छापने से इंकार कर देता है. यह उन्ही खबरों को हमें बतायेंगे. तो इन्होने वादा किया है कि यह हमें खबरें बतायेंगे जिन्हे हम अपने अंदाज में आप तक पहुंचाते रहेंगे.

तो कोशिश करते हैं केडीके के विश्लेषण के साथ कुछ खबरें आप तक पहुंचाने का.

 

रंजना जी अक्सर मेरे ब्लॉग पर आती रहती हैं और अपनी लंबी टिप्पणीयों का आशीर्वाद हमें प्रदान करती रहती हैं. उनकी टिप्पणी पर बनी मेरी पोस्ट स्त्रियां क्या खुद से सवाल पूछती हैं? अब तक की मेरी सबसे हिट और बहसात्मक पोस्ट रही है. पिछ्ले हफ्ते उन्होने मेरी एक पोस्ट भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी क्यों नहीं है?? पर एक लंबी टिप्पणी की. आप भी पढ़ें.

एक लंबे अरसे बाद ब्लॉग पर आ पाई हूँ.जो विषय आपने उठाया है,हमेशा ही इस तरह मुझे सालता रहा है कि वर्तमान परिस्थिति देख मन बड़ा ही आहत होता है. आहत अंग्रेजी के दिनो-दिन बढ़ते प्रभाव को देखकर नही, बल्कि अपनी हिन्दी भाषा, जो आज भी अपने देश के एक बहुत बड़े भाग मे आमजनों की भाषा है,गाँवों और कस्बों मे प्रादेशिक भाषा के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है, दिनोदिन आज की पीढ़ी द्वारा उपेक्षित त्याज्य होती जा रही है.यह सही है की अंग्रेजी एक ऐसी भाषा है जो विश्व मे सर्वाधिक प्रचलित भाषा है,पर हमारे मातृभाषा का हमारे अपने देश मे जो निरादर बढ़ता जा रहा है,विश्व के और कोई भी देश अपनी मातृभाषा के प्रति यह रवैया नही रखते. हिन्दीभाषी क्षेत्र मे कुछेक सरकारी विद्यालयों को छोड़ हिन्दी माध्यम के स्कूल लुप्तप्राय होते जा रहे हैं.करें भी तो क्या आज गावों कस्बों मे भी गरीबी से मुहाल वो अभिभावक जो अपने बच्चों के शिक्षा के प्रति जागरूक है हिन्दी माध्यम से अपने बच्चों को पढ़वा पाने की हिम्मत नही जुटा पता. कारण सबको पता है जीविकोपार्जन का कोई माध्यम नही जहाँ की अनिवार्यता यह भाषा न हो गई हो.

किंतु समस्या भाषा मे नही समस्या वह सोच पैदा करती है जो अंग्रेजी भाषा को ही सभ्रान्तता का मानक मानती है.और हिन्दीभाषी को हेय दृष्टि से देखती है. भाषा की परिभाषा जो हमने पढी जानी वह यही थी कि ” भाषा अपने भावों को सामने वाले तक पहुँचाने का,अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है” और यह ऐसी ही होनी चाहिए जिसके माध्यम से हम अधिक से अधिक सुगमता और प्रभावी ढंग से सामने वाले तक अपने उदगार संप्रेषित कर पाएं.भाषा एक ऐसा जरिया है जिसके माधयम से हम सामने वाले के ह्रदय मे अपना स्थान बना सकते हैं.फ़िर यह चाहे अंग्रेजी,फ्रेंच,जर्मन,हिन्दी या और कोई भी भाषा हो.अंग्रेजी ही क्यों, देश विदेश के अधिक से अधिक जितने भाषाओं का ज्ञान हो उतना अच्छा है.इस बात से कोई असहमत नही हो सकता कि जो सम्बन्ध मातृभाषा के जरिये बन सकती है वह अन्य भाषा के जरिये नही.फ़िर बात तो आपसी सम्पर्क को सुदृढ़ बनाने की ही हुई न. इसमे यह उच्च निम्न की बात क्यों.

एक दिन मेरी एक सहेली बड़े ही गर्व से बता रही थी कि उसकी बेटी के अंग्रेजी माध्यम स्कूल मे अंग्रेजी बोलने पर जितना ध्यान दिया जाता है और जिस प्रकार से बच्चों को ट्रेंड किया जाता है,वह लाजवाब है.एक घटना उसने बताई कि,आज सुबह उसकी ६ वर्ष की बेटी की क्लास टीचर ने एक दूसरी छात्र को क्लास मे हिन्दी मे बात करने पर उसकी बेटी से उस छात्र की जमकर पिटाई करवाई.यही नही क्योंकि उसकी बेटी सबसे अच्छे ढंग से अंग्रेजी मे बात कर पाती है इसलिए उसे यह अधिकार दिया गया है कि कभी भी किसी सहपाठी को हिन्दी मे बात करते हुए सुने तो उसे पीट सकती है. घटना सुन मुझे इतना क्षोभ हुआ कि सहेली को लताडे बिना न रह पाई.एक नन्हें से कोमल मन को क्या संस्कार दिए गए?यही न कि पहले तो हिन्दी एक हीन भाषा है और उसके प्रति इस तरह अहिष्णु हुआ जा सकता है कि अपने सहपाठी या आस पास बोलने वाले को प्रताड़ना भी दी जा सकती है.

यह केवल एक घटना नही,एक पूरी कौम तैयार की जा रही है जो -सी ऐ टी कैट से शुरू होकर अंग्रेजी भाषा खान पान संस्कार को ओढ़कर जीना जीवन की अपरिहार्यता और सफलता के लिए आवश्यक सिद्ध करती है. योग्यता का मानक ही एक भाषा की बंधक हो चुकी है. तकलीफ उन बच्चों को देखकर होती है जो हर प्रकार से योग्य होते हुए भी केवल अंग्रेजी न लिख बोल पाने के कारण रोजी रोटी के दौड़ मे पिछड़ जाते हैं. आज की पढी लिखी सभ्रांत मानी जाने वाली युवा पीढ़ी ने केवल भाषा को ही नही बल्कि एक पूरे पश्चिमी सभ्यता,संस्कृति का ही अपने संस्कारों का त्याग कर अंगीकार,अंधानुकरण करने का बीडा उठा रखा है.यह कोई शुभ संकेत नही.बहुत बड़ी बात नही जब हिन्दी भी संस्कृत की तरह केवल एक किताबी भाषा बनकर रह जाए.

इतनी लंबी टिप्प्णी करने के लिये उनका धन्य्वाद. रंजना जी से मेरा अनुरोध है कि वह जल्दी ही अपना ब्लॉग बनायें और हमें नियमित अपने विचारों से परिचित करवाते रहें.

 

घोड़े के साथ वीरता भी गयी

मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग कहते हैं कि मनुष्य जब बिल्कुल भावुक हो जाये तो उससे बुद्धिमानी की कोई बात कहना ऐसा ही है जैसे बगूले में बीज बोना। इसलिए बिशारत को इस फ़िजूल शौक़ से दूर रखने के बजाय उन्होंने उल्टा ख़ूब चढ़ाया। एक दिन आग को पेट्रोल से बुझाते हुए कहने लगे कि जबसे घोड़ा रुखसत हुआ, संसार से बहादुरी, जांबाजी और दिलेरी की रीत भी उठ गयी। जानवरों में कुत्ता और घोड़ा इंसान के सबसे पहले और पक्के मित्र हैं जिन्होंने उसकी खातिर हमेशा के लिये जंगल छोड़ा। कुत्ता तो खैर अपने कुत्तेपन के कारण चिपटा रहा, लेकिन इंसान ने घोड़े के साथ बेवफ़ाई की। घोड़े के जाने से मानव-संस्कृति का एक सामंती-अध्याय समाप्त होता है। वो अध्याय जब योद्धा अपने शत्रु को ललकार कर आंखों में आंखें डाल के लड़ते थे। मौत एक भाले की दूरी पर होती थी और यह भाला दोनों के हाथ में होता था। मृत्यु का स्वाद अजनबी सही, पर मरने वाला और मारने वाला दोनों एक-दूसरे का चेहरा पहचान सकते थे। बेखबर सोते हुए, बेचेहरा शहरों पर मशरूम-बादल की ओट से आग और एटमी मौत नहीं बरसती थी। घोड़ा केवल उस समय बुजदिल हो जाता है, जब उसका सवार बुजदिल हो। बहादुर घोड़े की टाप के साथ दिल धक- धक करते और धरती थर्राती थी। पीछे दौड़ते हुए बगूले,नालों से उड़ती चिंगारियां, भालों की नोक पर किरण-किरण बिखरते सूरज और सांसों की हांफती आंधियां कोसों दूर से शहसवारों के आक्रमण की घोषणा कर देती थीं। घोड़ों के एक साथ दौड़ने की आवाज से आज भी लहू में हजारों साल पुराने उन्माद के अलाव भड़क उठते हैं।

हमारी सवारीः केले के छिलका

फ़िटन और घोड़े से बिशारत के लगाव की चर्चा करते-करते हम कहां आ गये। मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग ने एक बार बड़े अनुभव की बात कही कि ‘‘जब आदमी केले के छिलके पर फिसल जाये तो फिर रुकने, ब्रेक लगाने का प्रयास कदापि नहीं करना चाहिये, क्योंकि इससे और अधिक चोट आयेगी। बस आराम से फिसलते रहना चाहिये और फिसलने का आनन्द लेना चाहिये। तुम्हारे उस्ताद जौक़ के कथनानुसार-

तुम भी चले चलो ये जहां तक चली चले

केले का छिलका जब रुक जायेगा तो स्वयं रुक जायेगा। Just Relax इसलिये केवल क़लम ही नहीं क़दम या कल्पना भी फिसल जाये तो हम इसी नियम पर अमल करते हैं। बल्कि साफ़-साफ़ क्यों न मान लें कि इस लम्बी जीवन-यात्रा में केले का छिलका ही हमारी एक मात्र सवारी रहा है। ये जो कभी-कभी हमारी चाल में जवानों की-सी तेजी और स्वस्थ प्रकार की चलत-फिरत आ जाती है तो यह उसी के कारण है। एकबार रपट जायें तो फिर यह क़दम चाल जो भी कुएं झंकवाये और जिन गलियों-गलियारों में ले जाये, वहां बिना इरादे के, लेकिन बड़े शौक़ से जाते हैं। ख़ुद को रोकने-थामने का जरा भी प्रयास नहीं करते और जब दवात फूट कर काग़ज पर बिखर जाती है, तो हमारी मिसाल उस बच्चे की-सी होती है, जिसकी ठसाठस-भरी जेब के सारे राज कोई अचानक निकालकर सबके सामने मेज पर नुमाइश लगा दे। सबसे अधिक संकोच बड़ों को होता है, क्योंकि उन्हें अपना भूला-बिसरा बचपन और अपनी वर्तमान मेज की दराज़ें याद आ जाती हैं। जिस दिन बच्चे की जेब से फ़िजूल चीजों की बजाय पैसे बरामद हों तो समझ लेना चाहिये कि अब उसे चिंता-मुक्त नींद कभी नसीब नहीं होगी।

रेसेकोर्स से तांगे तक

जैसे-जैसे बिजनेस में मुनाफ़ा बढ़ता गया, फ़िटन की इच्छा भी तीव्र होती गई। बिशारत महीनों घोड़े की तलाश में भटकते रहे। ऐसा लगता था जैसे घोड़े के बिना उनके सारे काम बंद हैं और राजा रिचर्ड तृतीय की भांति घोड़े के लिए वह हर चीज का त्याग करने के लिए तैयार हैं-

“ A horse! A horse! My kingdom for horse!”

उनके पड़ौसी चौधरी करम इलाही ने सलाह दी कि जिला सरगोधा के पुलिस स्टड-फ़ार्म से संपर्क कीजिये। वहां पुलिस की निगरानी में धारू ब्रीड और ऊंची जात के घोड़ों से नस्ल बढ़वाते हैं। घोड़ों का बाप, विशुद्ध और अस्ली हो तो बेटा उसी पर पड़ेगा। कहावत है कि बाप पर पूत, घोड़े पर घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा। मगर बिशारत कहने लगे, ‘‘मेरा दिल नहीं ठुकता। बात यह है कि जिस घोड़े की पैदाइश में पुलिस का हस्तक्षेप बल्कि गर्भक्षेप हो, वो विशुद्ध हो ही नहीं सकता। वो घोड़ा पुलिस पर पड़ेगा।’’

घोड़े के बारे में यह बातचीत सुनकर प्रोफ़ेसर क़ाजी अब्दुल क़ुद्दूस एम.ए.बी.टी. ने वो मशहूर शेर पढ़ा और हमेशा की तरह ग़लत अवसर पर पढ़ा, जिसमें देखने वाले की पैदाइश में होने वाली पेचीदगियों के डर से नर्गिस हजारों साल रोती है। मिर्जा कहते हैं कि प्रोफ़ेसर क़ाजी अब्दुल क़ुद्दूस अपनी समझ में कोई बहुत ही बुद्धिमानी की बात कहने के लिए अगर बीच में बोलें तो बेवक़ूफ़ लगने लगते हैं,अगर न बोलें तो अपने चेहरे के सामान्य भाव के कारण और अधिक बेवक़ूफ़ दिखाई पड़ते हैं।

प्रोफ़ेसर साहब के सामान्य-भाव से तात्पर्य चेहरे पर वो रंग हैं जो उस समय आते और जाते हैं जब किसी की जिप अध-बीच में अटक जाती है।

ख़ुदा-ख़ुदा करके एक घोड़ा पसंद आया जो एक स्टील री-रोलिंग मिल के सेठ का था। तीन-चार बार उसे देखने गये और हर बार पहले से अधिक संतुष्ट लौटे। उसका सफ़ेद रंग ऐसा भाया कि उठते-बैठते उसी के चर्चे, उसी की स्तुति।

हमने एक बार पूछा ‘‘पंच-कल्याण है?’’

‘पंच-कल्याण तो भैंस भी हो सकती है। केवल चेहरा और हाथ-पैर सफ़ेद होने से घोड़े की दुम में सुर्ख़ाब का पर नहीं लग जाता। घोड़ा वो, जो आठों-गांठ कुमैत हो, चारों टख़नों और चारों घुटनों के जोड़ मजबूत होने चाहिए। यह भाड़े का टट्टू नहीं, रेस का खानदानी घोड़ा है। यह घोड़ा उनके दिमाग़ पर इस बुरी तरह सवार था कि अब उसे उन पर से कोई घोड़ी ही उतार सकती थी।

सेठ ने उन्हें ऐसोसिएटिड प्रिंटर्ज में प्रकाशित कराची रेस क्लब की वो किताब भी दिखाई जो उस रेस से संबंधित थी, जिसमें उस घोड़े ने हिस्सा लिया और प्रथम आया था। इसमें उसकी तस्वीर और स्थिति पूरी वंशावली के साथ दर्ज थी।

नाम-व्हाइट रोज, पिता-वाइल्ड ओक, दादा ओल्ड डेविल। जब से यह ऊंची-नस्ल का घोड़ा देखा, उन्होंने अपने पुरखों पर गर्व करना छोड़ दिया। उनके कथनानुसार, इसके दादा ने मुंबई में तीन रेसें जीतीं। चौथी में दौड़ते हुए हार्ट फ़ेल हो गया। इसकी दादी बड़ी नरचुग थी। अपने समय के नामी घोड़ों से उसका संबंध रह चुका था। उनसे फ़ायदा उठाने के नतीजे में उसकी छः पुत्र संतानें हुई। प्रत्येक अपने संबंधित बाप पर पड़ी। सेठ से पहले व्हाइट रोज एक बिगड़े रईस की संपत्ति था। जो बाथ आइलैंड में ‘वंडर-लैंड’ नाम की एक कोठी अपनी एंग्लो इंडियन पत्नी ऐलिस के लिए बनवा रहा था। री-रोलिंग मिल से जो सरिया खरीद कर ले गया, उसकी रक़म कई महीने से उसके नाम खड़ी थी। रेस और सट्टे में दीवाला निकलने के कारण वंडर-लैंड का निर्माण रुक गया और एलिस उसे वंडर की लैंड में छोड़ कर, मुल्तान के एक जमींदार के साथ यूरोप की सैर को चली गई। सेठ को एक दिन जैसे ही यह खबर मिली कि एक क़र्ज लेने वाला अपनी रक़म के बदले प्लाट पर पड़ी सीमेंट की बोरियां और सरिया उठवा के ले गया, उसने अपने मैनेजर को पांच लट्ठ-बंद चैकीदारों को साथ लेकर बाथ-आइलैंड भेजा कि भागते भूत की जो भी चीज हाथ लगे खसोट लायें। इसलिए वो यह घोड़ा अस्तबल से खोल लाये। वहीं एक सियामी बिल्ली नजर आ गई, उसे भी बोरी में भर कर ले आये। घोड़े की ट्रेजडी की पूरी तरह समझाने के लिए बिशारत ने हमसे हमदर्दी जताते हुए कहा ‘‘यह घोड़ा तांगे में जुतने के लिए तो पैदा नहीं हुआ था। सेठ ने बड़ी जियादती की, मगर भाग्य की बात है। साहब! तीन साल पहले कौन कह सकता था कि आप यूं बैंक में जोत दिये जाएंगे। कहां डिप्टी कमिश्नर और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की कुर्सी और कहां बैंक का चार फ़ुट ऊंचा स्टूल!’’

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का

पहला और दूसरा भाग

 

यह क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का है

उन दिनों वो नये-नये स्कूल मास्टर नियुक्त हुए थे और फ़िटन उनकी सर्वोच्च आकांक्षा थी। सच तो यह है कि इस यूनिफ़ार्म यानी सफ़ेद अचकन, सफ़ेद जूते,सफ़ेद कुर्ते-पाजामे और सफ़ेद कमरबंद की खखेड़ केवल अपने आपको सफ़ेद घोड़े से मैच करने के लिए थी। वरना इस बत्तखा भेस पर कोई बत्तख ही आशिक़ हो सकती थी। उन्हें चूड़ीदार से सख़्त चिढ़ थी। केवल सुंदर कन्या के हाथ के बुने सफ़ेद कमरबंद का प्रयोग करने के लिए यह सितार का ग़िलाफ़ टांगों पर चढ़ाना पड़ा। इस हवाई क़िले की हर ईंट सामंती गारे से निर्मित हुई थी, जो संपन्न सपनों से गुंथा था। केवल इतना ही नहीं कि प्रत्येक ईंट का साइज और रंग भिन्न था, बल्कि उनकी आकृति भी उकेरी हुई थी। कुछ ईंटें गोल भी थीं। बारीक-से-बारीक बात यहां तक कि शालीनता की उस सीमा को भी तय कर दिया गया था कि उनकी उपस्थिति में सफ़ेद घोड़े की दुम कितनी डिग्री के कोण तक उठ सकती है और उनकी सवारी के रूट पर किस-किस खिड़की की चिक़ के पीछे किस कलाई में किस रंग की चूंड़ियां छनक रही हैं, किसकी हथेली पर उनका नाम मय बी.ए. की डिग्री, मेंहदी से लिखा है और किस-किस की सुरमई आंखें पर्दे से लगी राह तक रही हैं कि कब इंक़लाबी शाहजादा ये दावत देता हुआ आता है कि-

तुम परचम लहराना साथी मैं बरबत पर गाऊंगा

यहां ये निवेदन करता चलूं कि इससे बढ़िया तथा सुरक्षित कार्य विभाजन क्या होगा कि घमासान के रण में परचम (युद्ध ध्वज) तो साथी उठाये, कटता-मरता फिरे और ख़ुद शायर दूर किसी संगे-मरमर के मीनार पर बैठा एक फटीचर और वाहियात वाद्य ‘बरबत’ पर वैसी ही कविता यानी ख़ुद अपनी-ही कविता गा रहा है। गद्य में इसी सिचुएशन को ‘चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेंगे राम’ में जियादा फूहड़ ईमानदारी से बयान किया गया है।

लीजिये! प्रारंभ में ही गड़बड़ हो गयी, वरना कहना सिर्फ़ इतना था कि मज़े की बात यह थी कि इस सोते जागते सपने के दौरान बिशारत ने स्वयं को स्कूल मास्टर के ही ‘शैल’ में देखा, पद बदलने का साहस सपने में भी न हुआ! संभवतः इसलिए भी कि फ़िटन और रेशमी कमरबंद से केवल स्कूल मास्टरों पर ही रोब डाल सकते थे। जमींदारों और जागीरदारों के लिए इन चीजों की क्या हैसियत थी।

अपनी पीठ पर बीस वर्ष बाद भी उस आग की लकीर की जलन वो अनुभव करते थे जो चाबुक़ लगने से उस समय उभरी थी जब मुहल्ले के लौंडों के साथ शोर मचाते और चाबुक़ खाते वो एक रईस की सफ़ेद घोड़े वाली फ़िटन का पीछा कर रहे थे।

चौराहे बल्कि संकोच-राहे पर

शेरो-शायरी छोड़कर स्कूल-मास्टरी अपनायी। स्कूल मास्टरी को धता बताकर दुकानदारी की और अंततः दुकान बेच खोंच कर कराची आ गये, जहां हरचंद राय रोड पर दोबारा लकड़ी का कारोबार शुरू किया। नया देश, बदला-बदला सा रहन-सहन, एक नयी और व्यस्त दुनिया में क़दम रखा, मगर उस सफ़ेद घोड़े और फ़िटन वाली फैंटेसी ने पीछा नहीं छोड़ा। Day Dreaming और फ़ेटेंसी से दो ही सूरतों में छुटकारा मिल सकता है। पहली जब वह फ़ेंटेसी न रहे, वास्तविकता बन जाये, दूसरे इंसान किसी चौराहे बल्कि संकोच-राहे पर अपने सारे सपने माफ़ करवा के विदा हो जाये Heart breaker, dream maker, thank you for the dream और उस खूंट निकल जाये, जहां से कोई नहीं लौटा यानी घर-गृहस्थी की ओर, परंतु बिशारत को इससे भी लाभ नहीं हुआ। वो भरा-पूरा घर औने-पौने बेचकर अपने हिसाब से लुटे-पिटे आये थे। यहां एक-दो साल में ख़ुदा ने ऐसी कृपा की कि कानपुर तुच्छ लगने लगा। सारी इच्छायें पूरी हो गयीं, अर्थात घर अनावश्यक वस्तुओं से अटाअट भर गया। बस एक कमी थी।

सब कुछ अल्लाह ने दे रक्खा है घोड़े के सिवा!

अब वो चाहते तो नयी न सही, सेकेंड-हैंड कार आसानी से ख़रीद सकते थे। जितनी रक़म में आज कल चार टायर आते हैं, इससे कम में उस जमाने में कार मिल जाती थी, लेकिन कार में उन्हें वह रईसाना ठाट और जमींदाराना ठस्सा नजर नहीं आता था, जो फ़िटन और बग्घी में होता है। घोड़े की बात ही कुछ और है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच

पहला और दूसरा भाग

 

खोया पानी में जहां हास्य और व्यंग्य के नायाम ज़ुमले हैं वहीं उसमें जीवन का फलसफा भी बिखरा पड़ा है. आइये तीसरे भाग की शुरुआत ज़िन्दगी के इसी फ़लसफे से करें.आप पायेंगे कि यूसूफ़ी साहब ने कितनी सच्ची बात इन शब्दों में उतार दी है.

=====

हर व्यक्ति के मन में ऐश्वर्य और भोग-विलास का एक नक़्शा होता है। ये नक़्शा दरअस्ल उस ठाट-बाट की नक़्ल होता है जो दूसरों के हिस्से में आया है, परन्तु जो दुख आदमी सहता है वो अकेला उसका अपना होता है, बिना किसी साझेदारी के, एकदम निजी, एकदम अनोखा। हड्डियों को पिघला देने वाली जिस आग से वो गुजरता है, उसका अनुमान कौन लगा सकता है। नर्क की आग में यह गर्मी कहां। जैसा दाढ़ का दर्द मुझे हुआ है, वैसा किसी और को न कभी हुआ, न होगा। इसके विपरीत ठाट-बाट का ब्लू-प्रिंट हमेशा दूसरों से चुराया हुआ होता है। बिशारत के दिमाग़ में ऐश्वर्य और विलास का जो सौ-रंगा और हजार पैवंद लगा चित्र था, वो बड़ी-बूढ़ियों की उस रंगारंग रल्ली की भांति था जो वो भिन्न-भिन्न रंगों की कतरनों को जोड़-जोड़ कर बनाती हैं। उसमें, उस समय का जागीरदाराना दबदबा और ठाट, बिगड़े रईसों का जोश और ठस्सा, मिडिल-क्लास दिखावा, क़स्बाती-उतरौनापन, नौकरी- पेशा हुस्न, सादा-दिली और नदीदापन सब बुरी तरह गडमड हो गये। उन्हीं का कहना है कि बचपन में मेरी सबसे बड़ी इच्छा थी कि तख़्ती फेंक-फांक, किताब फाड़-फूड़ मदारी बन जाऊं, शहर-शहर डुगडुगी बजाता, बंदर, भालू, जमूरा नचाता और “बच्चा लोग” से ताली बजवाता फिरूं। जब जरा अक़्ल आई अर्थात बुरे और बहुत बुरे की समझ पैदा हुई तो मदारी की जगह स्कूल मास्टर ने ले ली और जब धीरजगंज में सच में मास्टर बन गया तो मेरी राय में अय्याशी की चरम-सीमा ये थी कि मक्खन जीन की पतलून, दो-घोड़ा बोस्की की क़मीज, डबल कफ़ों में सोने के छटांक-छटांक भर के बटन, नया सोला हैट और पेटेंट लैदर के पम्प-शूज पहनकर स्कूल जाऊं और लड़कों को केवल अपनी ग़जलें पढ़ाऊं। सफ़ेद सिल्क की अचकन जिसमें बिदरी के काम वाले बटन गले तक लगे हों, जेब में गंगा-जमनी काम की पानों की डिबिया, सर पर सफ़ेद किमख़्वाब की रामपुरी टोपी, तिरछी मगर जरा शरीफ़ना ढंग से, लेकिन ऐसा भी नहीं कि निरे शरीफ़ ही हो के रह जायें। छोटी बूटी की चिकन का सफ़ेद कुर्ता जो मौसम के लिहाज से हिना या खस की ख़ुशबू में बसा हो। चूड़ीदार पाजामे में सुंदर लड़की के हाथ का बुना हुआ रेशमी कमरबंद। सफ़ेद सलीमशाही जूता। पैरों पर डालने के लिये इटालियन कम्बल, जो फ़िटन में जुते हुए सफ़ेद घोड़े की दुम और उससे दूर तक उड़ने वाले पेशाब-पाखाने के छींटों से पाजामे को सुरक्षित रखे। फ़िटन के पिछले पायदान पर ‘‘हटो! बचो!’’ करते और उस पर लटकने का प्रयास करने वाले बच्चों को चाबुक़ मारता हुआ साईस। जिसकी कमर पर जरदोजी के काम की पेटी और टखने से घुटने तक खाकी नम्दे की पट्टियां बंधी हों। बच्चा अब सयाना हो गया था। बचपन विदा हो गया था, पर बचपना नहीं गया था।

बच्चा अपने खेल में जिस उत्साह और सच्ची लगन के साथ तल्लीन होता है कि अपने-आप को भूल जाता है, बड़ों के किसी मिशन और मुहिम में इसका दसवें का दसवां भाग भी दिखाई नहीं पड़ता। इसमें शक नहीं कि संसार का बड़े-से-बड़ा दार्शनिक भी किसी खेल में मग्न बच्चे से अधिक गंभीर नहीं हो सकता। खिलौना टूटने पर बच्चे ने रोते-रोते अचानक रौशनी की ओर देखा तो आंसू में इंद्रधनुष झिलमिल-झिलमिल करने लगा। फिर वो सुबकियां लेते-लेते सो गया। वही खिलौना बुढ़ापे में किसी जादू के जोर से उसके सामने लाकर रख दिया जाये तो वो भौंचक्का रह जायेगा कि इसके टूटने पर भला कोई इस तरह जी-जान से रोता है। यही हाल उन खिलौनों का होता है, जिनसे आदमी जीवन भर खेलता रहता है। हां, उम्र के साथ-साथ यह भी बदलते और बड़े होते रहते हैं। कुछ खिलौने  अपने-आप टूट जाते हैं, कुछ को दूसरे तोड़ देते हैं। कुछ खिलौने प्रमोट होकर देवता बन जाते हैं और कुछ देवियां दिल से उतरने के बाद गूदड़ भरी गुड़ियां निकलती हैं। फिर एक अभागिन घड़ी ऐसी आती है, जब वो इन सबको तोड़ देता है। उस घड़ी वो खुद भी टूट जाता है।

‘‘तराशीदम, परस्तीदम, शिकस्तम’’

(मैने तराशा, मैने पूजा मैने तोड़ दिया )

आज इन बचकानी इच्छाओं पर स्वयं उनको हँसी आती है। मगर यह उस समय की हक़ीक़त थीं। बच्चे के लिये उसके खिलौने से अधिक ठोस और अस्ल हक़ीक़त पूरे ब्रह्मांड में कुछ और नहीं हो सकती। सपना, चाहे वह आधी रात का सपना हो या जागते में देखा जाने वाला सपना हो, देखा जा रहा होता है तो वही और केवल वही उस क्षण की एकमात्र वास्तविकता होती है। यह टूटा खिलौना, यह आंसुओं में भीगी पतंग और उलझी डोर, जिस पर अभी इतनी मार-कुटाई हुई, यह जलता-बुझता जुगनू, यह तना हुआ ग़ुब्बारा जो अगले पल रबड़ के लिजलिजे टुकड़ों में बदल जायेगा, मेरी हथेली पर सरसराती यह मखमली बीरबहूटी, आवाज की रफ़्तार से भी तेज चलने वाली यह माचिस की डिब्बियों की रेलगाड़ी, यह साबुन का बुलबुला-जिसमें मेरा सांस थर्रा रहा है, इंद्रधनुष पर यह परियों का रथ-जिसे तितलियां खींच रही हैं इस पल, इस क्षण बस यही और केवल यही हक़ीक़त है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

पहला और दूसरा भाग

 

ये कौन हज़रते-‘आतिश’ का हम जबां निकला

इसमें कोई शक नहीं कि सागर जालौनवी के कई शेर बड़े दमपुख्त निकलते थे. कुछ शेर तो वाकई ऐसे थे कि “मीर” और “आतिश” भी उन पर गर्व करते,जिसका एक कारण यह भी था कि ये खुद उन्ही के थे. खुद को एक विद्यार्थी और अपनी शायरी को वो देवीय अवतरण बताता था. चुनांचे एक अरसे तक तो उसके भक्त और शिष्यगण इसी खुशगमानी में रहे कि चोरी नहीं अवतरण में साम्य हो गया. रुदौली में अपनी ग़ज़ल पढ़ रहा था कि किसी गुस्ताख़ ने भरे मुशायरे में टोक दिया कि ये तो नासिख़ का है.चोरी हओ चोरी! ज़रा जो घबराया हो. उलटा मुस्कुराया , बिल्कुल ग़लत! आतिश का है.

फिर अपनी डायरी मुशायरे के अध्यक्ष की नाक के नीचे बढ़ाते हुए बोला “हुज़ूर देख लें, ये शेर डायरी में Inverted Commas में लिखा है और आगे आतिश का नाम भी लिख दिया है.” मुशायरे के अध्यक्ष ने इसकी पुष्टि की और एतराज़ करने वाला अपना-सा मुँह ले के रह गया.

सागर अपने छोड़े हुए वतन जालौन के कारण प्यार से छोटा सागर (जाम) कहलाता था,मगर वो खुद अपना रिश्ता शायरी के लखनऊ स्कूल से जोड़ता था और ज़बान के मामले में दिल्ली वालों और पंजाब वालों से पक्षपात करता था ,चुनांचे केवल लखनऊ के शायरों के कलाम चोरी करता था.

माई डियर मौलवी मज्जन : दिन तो जैसे तैसे काटा लेकिन शाम पड़ते ही बिशारत एक क़रीबी गांव सटक गये। वहां अपने एक परिचित के यहां (जिसने कुछ महीने पहले एक यतीम तलाश करने में मदद दी थी) अंडरग्राउंड हो गये। अभी जूतों के फ़ीते ठीक से खोले भी नहीं थे कि हर जानने वाले को अलग-अलग लोगों के जरिये, अपने गोपनीय भूमिगत स्थान की जानकारी भिजवाई। उन्होंने धीरजगंज में सवा साल रो-रो कर गुजारा था। देहात में वक़्त भी बैलगाड़ी में बैठ जाता है। उन्हें अपनी सहनशक्ति पर आश्चर्य हुआ। नौकरी के सब रास्ते बंद नजर आयें तो असहनीय भी सहन हो जाता है। उत्तरी भारत में कोई स्कूल ऐसा नहीं बचा जिसका नाम उन्हें पता हो और उन्होंने वहां दरख़्वास्त न भेजी हो। आसाम के एक मुस्लिम स्कूल में उन्हें जिम्नास्टिक मास्टर तक की नौकरी न मिली। चार-पांच जगह अपने ख़र्च पर जा कर इंटरव्यू में नाकाम हो चुके थे। हर असफलता के बाद उन्हें समाज में एक नयी ख़राबी नजर आती थी, जिसे सिर्फ़ रक्त-क्रांति से ही दूर किया जा सकता था। लेकिन जब कुछ दिन एक दोस्त की मेहरबानी से सन्डीला के हाईस्कूल में एप्वाइंटमेंट लेटर मिला तो अनायास मुस्कुराने लगे। दस-बारह बार ख़त पढ़ने और हर बार नई ख़ुशी अनुभव करने के बाद उन्होंने चार लाइन वाले काग़ज पर इस्तीफ़ा लिख कर मौली मज्जन को भिजवा दिया। एक ही झटके में बेड़ी उतार फैंकी। इस्तीफ़ा लिखते हुए वो आजादी के भक-से उड़ा देने वाले नशे में डूब गये अतः इस्तीफ़े की इ की टांग त के पेट में घुस गई। लिफ़ाफ़े को थूक कर ऐसे चिपकाया जैसे मौली मज्जन के मुंह पर थूक रहे हों। लिफ़ाफ़ा मौलवी मज्जन को थमाया तो जो कांटा सवा साल से उनके तलवे को छेदता हुआ तालू तक पहुंच चुका था एक झटके से निकल गया। उन्हें इस बात पर हैरत थी कि वो सवा साल ऐसे फटीचर आदमी से इस तरह अपनी औक़ात ख़राब क्यों करवा रहे थे।

मौलवी मज्जन को भी शायद इसका अहसास था उन्होंने विदा के समय हाथ तो मिलाया आंखें न मिला सके।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

[दूसरा भाग यहीं पर समाप्त होता है. अगले शुक्रवार से तीसरा भाग प्रस्तुत किया जायेगा.दूसरे भाग में बीच बीच बीच में कुछ छोटे छोटे अंश काट दिये गये हैं.]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया 20. अजब-गजब मुशायरा 21. तिरे कूचे से हम निकले 22. कई पुश्तों की नालायकी का निचोड़

पहला भाग

 

कई पुश्तों की नालायकी का निचोड़

ये शायर जो भूचाल लाया बल्कि जिसने मुशायरा अपनी मूंछों पर उठा लिया, बिशारत का ख़ानसामा निकला. पुरानी टोपी और उतरन की अचकन का तोहफ़ा उसे पिछ्ली ईद पर मिला था. राह चलतों को पकड़-पकड़ के अपना कलाम फ़रमाता. सुनने वाला दाद देता तो उसे खींच कर लिपटा लेता, और दाद ना देता तो खुद आगे बढ़कर उससे लिपट जाता. अपने कलाम के दैवीय होने में उसे कोई शक ना था.शक औरों को भी नहीं था क्योंकि केवल अक़्ल या खाली-ख़ूली इल्म के ज़ोर से कोई शख़्स ऐसे ख़राब शेर नहीं कह सकता. दो पंक्तियों में इतनी सारी गलतियां और झोल आसानी से सुमो देना दैवीय मदद के बग़ैर मुमकिन ना था. काव्य चिंतन में अक्सर यह भी हुआ कि अभी पंक्ति पे ठीक से दूसरी पंक्ति भी नहीं लगी थी कि हंडिया धुंआ देने लगी. सालन के भुट्टे लग गये. पांचवी क्लास तक पढ़ाई की थी, जो उसकी निजी जुरुरत और बर्दाश्त से कहीं जियादा थी.वो अपनी संक्षिप्त सी अंग्रेजी और ताजा शेर को रोक नहीं सकता था. अगर आप उससे दस मिनट भी बात करें तो उसे अंग्रेजी के जितने भी लफ्ज आते थे वो सब आप पर दाग देता. अपने को सागर साहब कहलवाता लेकिन घर में जब ख़ानसमा का काम अंज़ाम दे रहा होता तो अपने नाम अब्दुल क़य्यूम से पुकारा जाना पसंद करता. सागर कहके बुलायें तो बहुत बुरा मानता.कहता था, नौकरी में हाथ बेचा है, उपनाम नहीं बेचा. ख़ानसामागिरी में भी शायराना तूल ना देने से बाज ना आता. ख़ुद को वाजिद अली शाह, अवध के नबाब का ख़ानदानी ख़ानसामा बताता था. कहता था, कि मैं फ़ारसी में लिखी डेढ़ सौ साल पुरानी डायरी देख-देख कर खाना पकाता हूँ. उसके हाथ का अस्वादिष्ट खाना दरअस्ल कई पुस्तों की जमा की गयी नालायक़ी का निचोड़ होता था.

मगर इसमें पड़ती है मेहनत ज़ियादा

उसका दावा था कि मैं एक सौ एक क़िस्म के पुलाव पका सकता हूँ और ऐसा ग़लत भी न था.बिशारत हर इतवार को पुलाव पकवाते थे. साल भर में करीब बावन बार जुरुर पकवाया होगा. हर बार हर अलग तरीके से ख़राब करता था. सिर्फ वो खाने ठीक पकाता था जिनको और ख़राब करना मामूली क़ाबिलियत रखने वाले आदमी के बस का काम नहीं.उदाहरण के तौर पर खिचड़ा,आलू का भुरता,लगी हुई खीर, रात भर की पकी देग,खिचड़ा,अरहर की दाल और मुतनजन जिसमें मीठे चावलों के साथ गोस्त और नींबू की खटायी डाली जाती थी. फूहड़ औरतों की तरह खाने की तमाम ख़राबियों को मिर्च से और शायरी की ख़राबियों को तरन्नुम से दूर कर देता था. मीठा बिल्कुल नहीं पका सकता था, इसलिये कि इसमें मिर्च डालने का रिवाज नहीं.अक्सर चांदनी रातों में जियोग्राफी टीचर को उसी बैजो पर अपनी ग़जलें गा के सुनाता,जिन्हें सुनकर वो अपनी महबूबा को ,जिसकी शादी मुरादाबाद में एक पीतल के पीकदान बनाने वाले से हो गयी थी, याद कर-कर षणज में रोता था.

बिशारत ने एक दिन छेड़ा कि भई, तुम ऐसी मुश्किल जमीनों में ऐसे अच्छे शेर निकालते हो , फिर ख़ानसामागिरी क्यों करते हो? कहने लगा आपने मेरे दिल की बात पूछ ली. अच्छा खाना पकाने के बाद जो रूह को खुशी मिलती है वो शेर के बाद नहीं मिलती. किस वास्ते कि खाना पकाने में वज्न का कहीं ज़ियादा ख़याल रखना पड़ता है. खाने वाले जिसे बुरा कह दे उसे बुरा मानना पड़ता है. खाना पकाने में मेहनत भी ज़ियादा पड़ती है. इसीलिये तो आज तक किसी शायर ने बावर्ची का पेशा नहीं पकड़ा.

शायरी को सागर जालौनवी ने कभी ज़रिया-ए-इज़्ज़त नहीं समझा, जिसका एक कारण ये था कि शायरी के कारण अक्सर उसकी बेइज़्ज़ती होती रहती थी.खाना पकाने में जितना दिमागदार था,शेर कहने में उतनी ही उदारता से काम लेता था. अक्सर बड़ खुले दिल से स्वीकार करता था कि ग़ालिब उर्दू में मुझसे बेहतर कह लेता था.”मीर” को मुझसे कहीं जियादा तनख्वाह और दाद मिली. उदारता से इतना मानने के बाद ये जुरुर कहता, हुजुर वो जमाने और थे,उस्ताद सिर्फ शेर कहते और शागिर्दों की ग़ज़ले बनाते थे, कोई उनसे चपाती नहीं बनवाता था.

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया 20. अजब-गजब मुशायरा 21. तिरे कूचे से हम निकले

पहला भाग

 

“गिरीश तिवारी जी” अर्थात गिरदा पर ना जाने कब से लिखना चाहता था.लेकिन समय ही नहीं मिल पा रहा था. शाम को जब युनुस भाई की पोस्ट पर फैज की रचना का जिक्र सुना तो अपना खजाना देखा कि यह रचना तो मेरे पास थी ही और वह भी ‘गिरदा’ की आवाज में. ‘गिरदा’ ने यह रचना पिछ्ले साल दिल्ली में एक कार्यक्रम में गाई थी और सौभाग्य से उस कार्यक्रम में मैं भी शामिल था. मैने तब वह रचना रिकॉर्ड कर ली थी. उसे सहेज कर तो रखा था कि गिरदा पर पूरी एक श्रंखला के लिये लेकिन आज युनुस भाई ने जब अपनी पोस्ट डाली तो मुझे लगा कि मुझे इसे डाल देना चाहिये.

तो लीजिये पेश है गिरदा की आवाज में फैज की रचना जिसे गिरदा ने हिन्दी और कुमांऊनी दोनों में गाया है.

हिन्दी में

हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.
यहां पर्वत पर्वत हीरे हैं, यहां सागर सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे
जो खून बहे, जो बाग उजड़े, जो गीत दिलों में कत्ल हुए,
हर कतरे का,हर गूंचे का,हर ईंट  का  बदला मांगेगे
हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.

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कुमांऊनी में

हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो.
यां डाना काना हीरा हरया छ्न,यां गाढ़ गध्यारा मोत्यूं भरया छ्न,
यो माल खजान सब हमरै तो छू, हम एक एक पाई को हिसाब ल्यूंलो
जो ल्वै को सिखा जो मौकु गुजरी, जौ मन सुकू मन मे कतल भईं
हर ल्वै को तोपक, हर धुरि को ढुंगक, हर एक कतल को जबाब ल्यूंलों
हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो.

कैसी लगी यह रचना मज़दूर दिवस पर टिप्पणी द्वारा बतायें.

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