Aug 152010
 

creativity जब से ब्लॉगिंग से अल्पविराम(?) लिया है तब से कई मित्रों, पाठकों, शुभचिंतकों ने कई तरीकों से उलाहना दिया है कि मैं लिखता क्यों नहीं। बीच में ऐसे ही कुछ उलाहने सुनने के बाद आने का मन बना लिया था लेकिन एक पोस्ट लिखने के बाद मन बना ही नही।

इधर अतुल भाई कई बार जगाने का प्रयास कर चुके हैं और खुद भी कुम्भकर्णी नींद सो लेने के बाद पुन: नये ठिकाने पर अवतरित हो चुके हैं। चिट्ठाजगत में एक दीदी (लिंक नहीं लगा रहा हूँ) ने एक दिल को छू लेनी वाली लंबी मेल भेज कर ढेर सारा ज्ञान दे डाला।

सही है कि महानगरों में जीवन बड़ा ही दुरूह है…जीवन यापन के लिए लोग कोल्हू के बैल बन्ने को बाध्य हैं..दिन रात कितना संघर्षशील रहना पड़ता है भीड़ के बीच अपने को साबित करने के लिए , खुद को सरवाइव कराने के लिए. समय सबसे मूल्यवान है,क्योंकि सदा इस की कितनी किल्लत रहती है…पर यह भी सत्य है न कि जीवन हमें एक ही मिला है…वह समय कभी नहीं आएगा ,जब सारे जद्दोजहद समाप्त हो जायेंगे और अलग से एकदम निश्चिन्त समय मिलेगा आपको लेखन कार्य करने के लिए..तो क्या कर रहे हैं ???? जीवन के चूहे दौड़ में जीवन खपा देना,सही है क्या???दिन हमेशा चौबीस घंटों का ही रहेगा और इसीमे से जैसे सबको समय दे रहे हैं आप वैसे ही इसके लिए भी समय निकलना पडेगा…

——

आपसे विनती है कि ब्लॉग पर लिखना पुनः आरम्भ कर दें..कोई आवश्यक नहीं कि दिन भर में चार पोस्ट डाली जाय..महीने में एक पोस्ट भी ऐसी जो सचमुच किसी ह्रदय को छूकर उसमे सकारात्मक कुछ जोड़ सके,डाली जाय तो बहुत है..आशा है आप मेरे आग्रह पर गंभीरता से विचार करेंगे..

उनसे वादा किया कि कुछ लिखता हूँ। तो फिर लिखने बैठ गया।अब चुंकि लिखने का वादा किया है तो गाहे-बगाहे लिखते रहेंगे। अभी तो जँग लग चुकी कलम को तेज करने की कोशिश में हैं।

दरअसल लिखने की प्रक्रिया में आपका लिखा आपके मस्तिष्क से शुरु होते हुए कलम या की-बोर्ड के माध्यम से लोगों के सामने आता है। तो लिखने की इस प्रक्रिया में हमारी सोच का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसा नहीं कि लिखने के लिये विषय़ों की कुछ कमी हो या फिर व्यस्तता इतनी ज्यादा हो गयी हो कि लिखने के थोड़ा सा समय भी ना निकाला जा सके। लेकिन कई बार यह प्रश्न उठता है कि आखिर लिखें तो लिखें क्यों? क्या होगा लिख कर?

अजदक जी छुट्टी के दिन इसी प्रश्न से दो-चार होते हैं, आखिर लिखना चाहते क्यों हैं? प्रत्यक्षा जी को तो अन्दर की किसी "इल्यूसिव चीज" को पकड़ने की तमन्ना है। ऐसी ही तमन्ना सभी को होती होगी। अब ना जाने उनको कुछ मिला कि नहीं यह तो पता नहीं लेकिन साहित्य के राजमार्ग पर जाने की न तो अपन की इच्छा है और ना ही हम इतने काबिल हैं कि इस भीड़ भरे राजमार्ग पर राजनीति की कीचड़ में सनते-सनाते, उसे लांघते आगे बढ़ सकें। अपन तो किसी तरह पहाड़ की टेड़ी-मेड़ी, उतराती-गहराती पगडंडियों से ही पार पा लें तो बहुत है। 

हाँ अन्दर एक अजीब तरह की बेचैनी तो है ही जो कुछ लिखने को …कुछ कह जाने को….कुछ रच जाने को प्रेरित करती है। यह रचनात्मकता किसी भी रूप में हो सकती है, जरूरी नहीं इसकी परिणति एक ब्लॉग पोस्ट के रूप में ही हो।

कभी कभी हम किसी एक कहानी, एक विचारधारा, एक दृश्य से इतने प्रेरित हो जाते हैं कि हम दुनिया को सिर्फ एक ही चश्में से देखने लगते हैं। इसलिये भी लिखना शायद जरूरी है कि हम दुनिया को एक से अधिक कहानी दे सके..इसको नये नये रंगों में ढाल सकें.. समय को पकड़ने की कोशिश कर सकें। वरना पहाड़ के बारे में बात करने में आप पहाड़ को सिर्फ मंगलेश डबराल की गरीब वाली दृष्टि से ही देखेंगे। आपकी दृष्टि में शायद वह नराई ना होगी जो शायद किसी पहाड़ के रहने वाले को लगती होगीवही लेखन, शिवानी के माध्यम से, कम से कम यह तो बताता है कि पहाड़ में रोटी के ऊपर रखकर पालक की सब्जी खायी जाती है भले ही हम यह ना जान पायें कि और भी बहुत कुछ खाया जाता है। तो लेखन की यही महत्ता है।

 

आइये एक वीडियो देखें। यह भी कुछ ऐसा ही कहता है, लेखन ना होता तो दुनिया कितनी एकरंगी होती। यथार्थ व सच्चाई से दूर केवल काल्पनिक दुनिया। आप क्या कहते हैं?

 

Jun 052008
 

इंजी पेन्नू का अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होने http://kerals.com/ पर एक मलयालम ब्लॉग द्वारा सामग्री को चुराने का आरोप लगाते हुए एक ई-मेल लिखा था. बदले में इस साइट की ओर से उन्हे धमकी भरे ई-मेल भेजे गये. उन्हे शारीरिक क्षति पहुंचाने की धमकी दी गयी. उनके प्रोफाइल को एक पोर्न साइट से लिंक कर दिया गया. उन्हे झूठा कानूनी नोटिस भेजा गया. और यह सब उस साइट के द्वारा किया गया जिसके मालिक, इंजी के अनुसार, शादी की साइट व पोर्न साइट एक साथ चलाते हैं. यह सारी बात इंजी अपनी इस पोस्ट में विस्तार से बता रही हैं.

इस बात से यह भी लगता है कि शादी की साइट पर अपना फोटो देना,विशेषकर महिलाओं के लिये,कितना खतरनाक है.इंटरनैट पर भी हमारे वास्तविक समाज की तरह गुंडे बैठे हुए हैं. जो खुद को फायदा पहुचाने के कुछ भी कर सकते हैं.  आप इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते. फिर भी मैं इंजी पेन्नू के साहस को सलाम करता हूँ.

इंजी आपकी इस लड़ाई में मैं आपके साथ हूँ.

इंजी के बारे में मुझे यहां से पता चला.

Feb 142008
 

यह प्रयास है मेरी आवाज की मधुशाला को कैसेट के संगीत के साथ मिला कर प्रस्तुत करने का. संगीत मन्नाडे वाली कैसेट से लिया है.

 

और जैसा कि मैने पिछ्ली पोस्ट में बताया कि अभी कुछ दिनों पहले मैं मधुशाला का पाठ कर रहा था तो एक मित्र ने उसे रिकॉर्ड कर लिया. प्रस्तुत है वही एक पॉडकास्ट के रूप में. मैं मधुशाला की तरंग में था इसलिये माईक हिल रहा था और उसी कारण आवाज कम ज्यादा हो रही है. झेल लीजिये.

 

 

पूरी श्रंखला

1. खैयाम की मधुशाला..

2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..

3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये

4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में 

5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद

6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से

7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

9. उमर की मधुशाला के निहितार्थ

10. अगर पिलाने का दम है तो जारी रख यह मधुशाला

11. मैं और मेरी मधुशाला..

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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Feb 142008
 

मुझे मधुशाला सदा से ही प्रिय रही है. मेरी मधुशाला की कहानी शुरु हुई सन 1986 में जब मैं पहले पहल दिल्ली आया था. उस समय मैने बच्चन व मन्नाडे की आवाज में मधुशाला वाला कैसेट सुना. सुनकर तो मानिये मैं पागल हो गया. उस कैसेट को ना जाने कितनी बार सुनता रहा. साथ में गाता भी रहा. तब से यह फितूर चालू हुआ.

1989 में पहली बार मधुशाला की किताब को पढ़ा तभी पता चला कि बच्चन की मधुशाला अंग्रेजी के किसी किताब का अनुवाद है.1990 में लाइब्रेरी से जॉन फ़िट्ज़राल्ड की किताब लाकर पढ़ी तब  उमर खैय्याम के बारे में और अधिक जानकारी मिली.उस समय  अंग्रेजी इतनी तो समझ नहीं आती थी लेकिन डिक्सनरी साथ में रख पूरी किताब पढ़ी. फिर इसी झोंक में मैने भी अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में कुछ पदों की रचना की.छंद विधान रुबाई वाला ही रखा.   

Going higher and higher,Getting success Night n Day,
IS NO more MORTAL, must be descended into Clay.
THUS FILL your cup with the wine of Luv and Light,
AND Share it with all people like light Ray .

No need for the Last sleep, to prepare ,
You know not why you go nor where.
Drink! the wine of Joy and Happiness
Make lively today’s silence n future despair

People have tried to Unfold and find
The concealed truth of LIFE , behind
No LAMP they got in midnight dark
BLIND they were and remained blind.

Kakesh : 12.12.90

1993 में सुमित्रानंदन पंत की किताब “मधुज्वाल” हाथ लगी. उसने भी काफी प्रभावित किया और मैने कुछ और पदों की रचना की.

“मधुज्वाल व मधुशाला”

बच्चन जी के छंद में

अद्वितीय साकी वह कैसी, कैसी अद्भुत है हाला?
कर  डाला उमर को पागल ऎसा जादूगर प्याला
पंत,बच्चन को प्रेरित कर,मधुरस से नहलाया उनको
लिख डाली उन दोनों ने यों, ‘मधुज्वाल’ औ ‘मधुशाला’

बच्चन जपते रहे रात दिन, मधुशाला, मदिरा माला
मधुज्वाल की लपटों ने कवि पंत को तपा डाला
पीकर कविता की मधु मदिरा,मदमस्त हुए सब पाठकगण
देती हैं संदेश प्रेम का , ‘मधुज्वाल’ औ ‘मधुशाला’

पंत जी के छंद में

नहीं धरा में कोई साकी ,
नहीं मूर्त है मधुबाला.
ये तो जीवन के प्रतीक है
हाला, प्याला, मधुशाला

ये अपना संदेश कामना
मधु की वर्षा हो नित भू पर
मधु, जीवन कोई ज्योति बने अब
मधु में पगे रहें नारी नर

मधु सी मीठी बोली बोलें सब जन
हर कण मधुकण हो प्यारा
सब भ्राता सम रहें परस्पर
मधुमय हो संसार हमारा

काकेश : 21.02.93

हॉस्टल में जब रहा तो एक पीने पिलाने का दौर चालू हुआ. उस समय हॉस्टल में होने वाली अधिकतर मधु-पार्टियों में मुझे बुलाया जाता और हर पार्टी का अंत मेरे मधुशाला के गायन से ही होता.बहुत दिनों तक यह सिलसिला चला. मुझे उस समय मधुशाला के करीब साठ पद कंठस्थ थे. अब तो शायद दस भी याद नहीं है.

बाद में अंग्रेजी के अनुवाद, मैथिली शरण गुप्त और रघुवंश प्रसाद गुप्त का अनुवाद भी पढ़ा.बांग्ला अनुवाद के कुछ पद भी पढ़े. बीच में फारसी सीखने की भी असफल कोशिश की ताकि उमर खैय्याम की मूल रुबाइयों को पढ़ सकूं.अभी भी मुझे कुमांऊनी में हुए अनुवाद और फिर उसी के हिन्दी अनुवाद की तलाश है. साथ ही मैं पं बलदेव प्रसाद मिश्र द्वारा किये अनुवाद को भी ढूंढ रहा हूँ.  

तो यह श्रंखला मधुशाला के पीछे मेरी दीवानगी का ही परिणाम है.

कुछ दिनों पहले जब मैं मधुशाला गा रहा था तो मेरे एक मित्र ने उसे रिकॉर्ड भी किया. कोशिश करता हूँ शाम तक उसको भी यहाँ चढ़ा पाऊँ.

[इस श्रंखला का यह अंतिम भाग  है ]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !! 9. उमर की मधुशाला के निहितार्थ 10. अगर पिलाने का दम है तो जारी रख यह मधुशाला

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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Feb 072008
 

हरिवंशराय बच्चन और मधुशाला को जानने वाले बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होने मधुशाला पर दो पुस्तकें लिखी. पहली पुस्तक जो 1933 में लिखी वह थी “खैयाम की मधुशाला” . इस पुस्तक में जॉन फिट्ज़राल्ड की पुस्तक के प्रत्येक पद का अनुवाद था. दूसरी पुस्तक जो लिखी गयी वो थी “मधुशाला”. अधिकांश लोग इस पुस्तक के बारे में ही जानते हैं. सामान्यत: जब हम बच्चन की मधुशाला की चर्चा करते हैं या उनका कोई पद उदघृत करते हैं तो इसी किताब से करते हैं.मन्नाडे की आवाज में जो कैसेट भी निकला वह भी दूसरी किताब मधुशाला पर था.

khaiyyam-madhushalaआइये पहले “खैयाम की मधुशाला “की चर्चा करें. यह किताब 1933 में आयी और इसमें जॉन के प्रत्येक पद का हिन्दी अनुवाद था .

एक उदाहरण देखिये

The Moving Finger writes; and, having writ,
Moves on: nor all your Piety nor Wit
Shall lure it back to cancel half a Line,
Nor all your Tears wash out a Word of it

किसी की लौह लेखनी भाल शिला पर लिख जाती कुछ लेख
न फिर फिरती पीछे की ओर, लिखा क्या , इतना तो ले देख
न  कम  कर  देगी  आधी पंक्ति देख सब तेरी भक्ति , विवेक ,
न  तेरे  आंसू  की  ही  धार  सकेगी  धो   लघु  अक्षर    एक ! 

इस प्रकार जॉन के 75 पदों का अनुवाद बच्चन ने 1933 में किया. khaiyyam-madhushala1इस पुस्तक के तीसरे संस्करण में हिन्दी के प्रत्येक पद के साथ मूल पुस्तक का अंग्रेजी पद भी दिया गया. यह पहले व दूसरे संस्करण में नहीं था. तीसरे संस्करण ने बच्चन ने एक भूमिका भी लिखी जिसमें उन्होंने मधुशाला के रचे जाने के बारे में उनकी सोच का परिचय देते हुए उमर खैय्याम और जॉन फिट्जराल्ड की रचना प्रक्रिया और उस समय की परिस्थितियों पर विशद टिप्पणी की थी.

दूसरी पुस्तक 1934 में आयी जो इन्ही भावों पर अधारित एक स्वतंत्र पुस्तक थी. इसमें 135 रुबाइयाँ हैं. इसका सस्वर पाठ भी बच्चन कई कार्यक्रमों और कवि-सम्मेलनों में करते रहे. मधुशाला की रूबाइयो का प्रथम पाठ बच्चन ने सन् 1934-35 में बनारस में किया था. अपने प्रथम पाठ से अब तक मधुशाला स्वर्ण जयंती से गुजर के हीरक जयंती मना चुकी है. 1984 में इसकी स्वर्ण जयंती के अवसर पर उन्होंने एक नई रुबाई भी लिखी थी

घिस-घिस जाता कालचक्र में हर मिट्टी के तनवाला
पर अपवाद बनी बैठी है मेरी यह साक़ी बाला
जितनी मेरी उम्र वृद्ध मैं, उससे ज़्यादा लगता हूँ
अर्धशती की होकर के भी षोडष वर्षी मधुशाला

कवि सम्मेलनों में मधुशाला के साथ साथ इस पर बनी पैरोडियाँ भी खूब चलीं. प्रोफेसर मनोरजंन प्रसाद सिन्हा, जो कि उस कवि सम्मेलन में सभापति थे जिसमें बच्चन से मधुशाला का पाठ किया था,  ने अपने एक संस्मरण में खुद उन्ही के द्वारा बनायी गयी कुछ पैरोडियों की चर्चा की ही.वह पैरोडियां कुछ ऎसी हैं. 

भूल गया तस्बीह नमाजी, पंडित भूल गया माला,
चला दौर जब पैमानों का, मग्न हुआ पीनेवाला।
आज नशीली-सी कविता ने सबको ही बदहोश किया,
कवि बनकर महफ़िल में आई चलती-फिरती मधुशाला।

रूपसि, तूने सबके ऊपर कुछ अजीब जादू डाला
नहीं खुमारी मिटती कहते दो बस प्याले पर प्याला,
कहाँ पड़े हैं, किधर जा रहे है इसकी परवाह नहीं,
यही मनाते हैं, इनकी आबाद रहे यह मधुशाला।

भर-भर कर देता जा, साक़ी मैं कर दूँगा दीवाला,
अजब शराबी से तेरा भी आज पड़ा आकर पाला,
लाख पिएँ, दो लाख पिएँ, पर कभी नहीं थकनेवाला,
अगर पिलाने का दम है तो जारी रख यह मधुशाला।

इसी संस्मरण में वह कहते हैं.

उस शाम बच्चन को सुनकर नवयुवक पागल हो रहे थे। पागल मैं भी हो रहा था किन्तु वह पागलपन उसी प्रकार का न रहा। यह गिलहरी कुछ दूसरा ही रंग लाई; और वह रंग प्रकट हुआ दूसरे दिन के कवि-सम्मेलन में जो केवल ‘मधुशाला’ का सम्मेलन था-बच्चन का और मेरा सम्मेलन था-‘मधुशाला’ का सर्वप्रथम कवि सम्मेलन-केवल ‘मधुशाला’ का। बच्चन  ने अपनी अनेकानेक रुबाइयाँ सुनाई थीं और मैंने केवल आठ। बच्चन आदि और अन्त में थे और मैं था मध्य में, इण्टरवल में, जब सुनाते-सुनाते वे थक-से गए थे और शीशे के गिलास में सादे पानी से गले की खुश्की मिटा रहे थे।

‘मधुशाला’ की चुनी हुई बीस रूबाइयों का रेकार्ड दि ग्रामोफ़ोन कम्पनी आफ इंडिया लिमिटेड द्वारा तैयार किया गया.इसका संगीत जयदेव ने दिया.पहली रुबाई बच्चन के स्वर में है, शेष रुबाइयाँ मन्ना डे के स्वर में हैं.

[यह श्रंखला कुछ खास चल नहीं रही. ऎसा टिप्पणीयाँ और आंकड़े बताते हैं. इसलिये अगले अंक में इसे समाप्त कर रहा हूँ]

क्रमश :….

[इस श्रंखला का अंतिम भाग  अगले गुरुवार को प्रकाशित किया जायेगा]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !! 9. उमर की मधुशाला के निहितार्थ

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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Jan 312008
 

अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे कि उमर खैय्याम की रुबाइयों में कितनी व्यापकता है. जब मैं उमर खैय्याम की रुबाइयों और उनके उन अनुवादों के बारे में सोचता हूँ जो भारत में हुए तो उनमें एक साम्य जैसा लगता है. पहले उमर खैय्याम की मूल रचना की बात करें. उमर खैयाम ने इतिहास के उस युग में जन्म लिया जब युरोप के लोग इतने सभ्य नहीं थे…या यूं कहें कि निरे जंगली थे तो अतिशयोक्ति ना होगी. उस समय स्कॉटलैंड में मैलकम कैमोर का दबदबा था और इंग्लैंड में सैक्सन राजाओं का आधिपत्य था. ये सब राजा प्रजा को गुलाम की तरह रखते थे…लेकिन इसके विपरीत फारस (पारस) में ज्योति थी, जीवन था, ज्ञान था और साहित्य था. सूफी संस्कृति, वैज्ञानिक सोच की अपनी महत्ता थी. ऎसे सामाजिक परिदृश्य में उमर ने सांसारिकता को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर रखने के अपनी रुबाइयों का सहारा लिया.

जॉन फिटजराल्ड सहित कई अनुवादकों का मानना है कि उमर खुद सुरा-प्रेमी थी और उनके इन पदों में केवल सुरा,सुन्दरी का ही जिक्र है लेकिन उमर की रुबाईयों को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर देखने वालों की भी कमी नहीं है. मैने भी अब तक जितना उमर को पढ़ा उसके आधार पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि ये रुबाइयाँ मात्र सुरा-वन्दना हीं है. यह रुबाइयाँ उससे अधिक बहुत कुछ कह जाती हैं.मैं अपने और विचार लेख के अगले अंक में आने वाले सप्ताह में रखूंगा.

उमर की रुबाइयों के अनुवाद हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में 1930 से 1945 के बीच हुए. इस समय देश में अंग्रेजों का शासन था लेकिन स्वतंत्रता का सूरज भी धीरे धीरे आंखे खोल रहा था. यह नवजागरण का काल था. लोगों में पर्याप्त मात्रा में असंतोष था. यह ऎसा समय था जब लोग खुद-ब-खुद उमर की दार्शनिकता की ओर खिंचे चले आये.लोगों की आंखों में सपने थे, दिलों में जोश था और चाल में मस्ती. यह समय था जब लोगों ने उमर को पढना और गुनना प्रारम्भ किया.

हरिवंश राय बच्चन ने एक जगह इसी परिस्थिति का वर्णन कुछ ऎसे किया है.

” सात-आठ बरस बाद जब मैंने उमर खैयाम की रुबाइयों को पहली बार पढ़ा, तो मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने उनमें किसी रोदन, किसी वेदना या किसी निराशा की प्रत्याशा करते हुए पढ़ा था। मेरी यही प्रत्याशा कहाँ तक पूरी हुई होगी इसे ‘रुबाइयात उमर खैयाम’ का हरेक पाठक अपने आप समझ सकता है। मुमकिन है, यहाँ मेरी बात काटकर कुछ लोग मुझसे अपनी असहमति जताएँ। साधारण जनता के बीच, और इसमें प्रायः ऐसे लोग अधिक हैं जिन्होंने उमर खैयाम की कविता स्वयं नहीं पढ़ी, बस यदा-कदा दूसरों से उसकी चर्चा सुनी है, या कभी उसके भावों को व्यक्त करने वाले चित्रों को उड़ती नज़र से देखा है, कवि की एक और ही तसवीर घर किए हुए है। उनके ख़याल में उमर खैयाम आनन्दी जीव है, प्याली और प्यारी का दीवाना है, मस्ती का गाना गाता है, सुखवादी है या जिसे अंग्रेज़ी में ‘हिडोनिस्ट’ या ‘एपीक्योर’ कहेंगे। इतिहासी व्यक्ति उमर खैयाम ऐसा ही था या इससे विपरीत, इस पर मुँह खोलने का मुझे हक़ नहीं है। फ़ारसी की रुबाइयों में उमर ख़ैयाम का जो व्यक्तित्व झलका है, उस पर अपनी राय देने का मैं अधिकारी नहीं हूँ क्योंकि फ़ारसी का मेरा ज्ञान बहुत कम है, लेकिन, एडवर्ड फ़िट्ज़जेरल्ड ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में अपने अंग्रेज़ी तरजुमे के अन्दर उमर खैयाम का जो खाका खींचा है उसके बारे में बिना किसी संकोच या सन्देह के मैं कह सकता हूँ कि वह किसी सुखवादी आनन्दी जीवन अथवा किसी हिडोनिस्ट या ‘एपीक्योर’ का नहीं है।

इन रुबाइयों का लिखने वाला वह व्यक्ति है जिसने मनुष्य की आकांक्षाओं को संसार की सीमाओं के अन्दर घुटते देखा है, जिसने मनुष्य की प्रत्याशाओं को संसार की प्राप्तियों पर सिर धुनते देखा है, जिसने मनुष्य के सुकुमार स्वप्नों को संसार के कठोर सत्यों से टक्कर खाकर चूर-चूर होते देखा है। इन रूबाइयों के अन्दर एक उद्विग्न और आर्त आत्मा की पुकार है, एक विषण्ण और विपन्न मन का रोदन है, एक दलित और भग्न हृदय का क्रन्दन है। संक्षेप में कहना चाहें तो यह कहेंगे कि रुबाइयात मनुष्य की जीवन के प्रति आसक्ति और जीवन की मनुष्य के प्रति उपेक्षा का गीत है-रुबाइयों का क्रम जैसा रक्खा गया है उससे वे अलग-अलग न रहकर एक लम्बे गीत के ही रूप में हो गई हैं। यह गीत जीवन-मायाविनी के प्रति मानव का एकांतिक प्रणय निवेदन है। पर कौन सुनता है ? वह अपना क्रोध-विरोध प्रकट करता है-पर उसे हार ही माननी पड़ती है। मानव की दुर्बलता, उसकी असमर्थता, उसकी परवशता, उसकी अज्ञानता और उसकी लघुता के साथ उसका दम्भ, उसका क्रोध-विरोध और उसकी क्रान्ति उसे कितना दयनीय बना देती है ! रुबाइयात सुख का नहीं दुख का गीत है, सन्तोष का नहीं असन्तोष का गान है।”

बच्चन जी की ’मधुशाला‘ में ही देखें तो पायेंगे कि इसके पूर्वाद्ध में यदि कवि ने मरणोपरांत क्रियाओं में भी मधु की महत्ता स्थापित की है तो इसके उत्तरार्द्ध में दर्द,अस्थिरता,क्षण भंगुरता और मोह भंग का यह रूप भी है -

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गई सुरभित हाला

कहाँ गया स्वप्निल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला

पीने वालों ने मदिरा का मूल्य हाय कब पहचाना

फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला

तो उमर की रुबाइयों को मात्र सुरा,सुन्दरी से जोड़कर देखना शायद सही नहीं है. इसके और भी कई पहलू हैं…जिनकी चर्चा अगले अंक में करेंगे.

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

Jan 262008
 

वैसे तो टिप्पणीकार टिप्पणीचर्चा करते ही हैं लेकिन अपने ब्लॉग के लिये यह काम हमने ही शुरु कर दिया है.कई बार किसी भी ब्लॉग पर बहुत अच्छी टिप्पणीयाँ आती हैं… कभी कभी कई अच्छी टिप्पणीयाँ दब जाती हैं उनको भी लोगों तक पहुचाना मुझे जरूरी लगता है. इसलिये सोचा कि अब अपने ब्लॉग पर आयी कुछ सार्वजनिक महत्व की टिप्पणीयों की चर्चा यहीं शुरु कर दूँ..वैसे पहले भी करता रहा हूँ

आलोक जी ने मेरी एक पोस्ट पर कहा

” लेखकीय पहचान एक्सचेंज आफर से मिलती है। जो आपको अच्छा लेखक ना माने, उसे लेखक तक मानने से इनकार दीजिये।”

आजकल ब्लॉग में स्त्री-विमर्श खूब चल रहा है. मेरी एक पोस्ट में तो सारे रिकॉर्ड ही टूट गये. यह अभी भी जारी है.

मैने एक टिप्पणी पोस्ट बनायी थी जिस पर विस्तृत टिप्पणीयाँ आयीं. उसी से संबंधित एक पोस्ट में स्वप्नदर्शी जी ने कहा

“बहस का कोइ अंत नही है, और ये समस्या बहस से सुलझने वाली भी नही है. [ये समस्या] सिर्फ और सिर्फ व्यवहार और अनुभूतियों से ही सुलझेंगी. खासकर किसी भी समाज की असभ्यता का सबसे ज्यादा शिकार इसके सबसे कमज़ोर वर्ग ही होते है, जैसे औरते, बच्चे, बूढे. जिस तरह का विमर्श यहां देखने को मिला, मुझे बहुत शर्म है अपने भारत पर, इसके बाशिन्दो पर. और अगर वाकई सभ्य समाज बनाना है तो सभ्यता इसी में है कि सबको समान अवसर दिया जाय, एक इंसान के बतौर. स्त्री विमर्श को छोड भी दिया जाय, तो बूढो कि स्थिति, अपाहिज लोगों के लिये सार्वजनिक जीवन में इससे भी कम जगह है. किस शहर की बसें, यायायात के साधन,ऑफिस, और तमाम दूसरी सार्वजनिक जगह हैं, जहां, स्वभिमान के साथ ये लोग जा सकते है? शिरकत कर सकते है?

य़े टकराव का ज़माना है, समस्या का सीधा समाधान और नैतिक और राजनैतिक दृष्टि के अभाव में, सवर्ण-दलित, अगडे-पिछड़े, औरत-मर्द, जवान-बूढे, क्षेत्रियता, धर्म, सभी की वाट लगने वाली है.

ये मन की ग़ांठें है, इतनी आसानी से नही खुलेंगी……….

एक मरतबा, एक जमीन्दार रशूख वाले साहब, होस्टल में पढने गये, और टोयलेट का फ्लश चलाना उन्हे अपनी शान के खिलाफ लगा. इस काम को उन्होने, भंगी का काम माना. पर होस्टल मे कौन था जो उनका भंगी बनता? अंत मे उनकी पेशी हुयी, और फिर उन्होने अपनी गन्द साफ करनी सीखी.

इसीलिये, जिनके दिमाग मे गन्द भरी है, फ्लश उन्ही को चलाना पड़ेगा. नही तो उसकी गन्द से सबसे पहले उनके आसपास वाले, परिवार वाले बीमार होंगे, उनके अपनो को सबसे ज्यादा तकलीफ होगी. बाकी छ अरब लोगों के साथ किसी भी औरत का सिर्फ, माँ, बहन, प्रेमिका या पत्नी का समबन्ध नही हो सकता और इस परिधी मे दुनिया के अधिकांश लोगो को क्या उसके अपमान का लायसेंस मिला हुआ है?

लेकिन कुछ लोग इससे सहमत नहीं भी हैं. डॉक्टर अमर कुमार ने कहा

बहुत खूब,
ऎसा कतई नहीं है कि मैं प्रभुसत्तावादी हूं, या कि पुरातन विचारों का हूं किंतु हम
क्यों नहीं स्वीकार कर पाते कि पुरुष और नारी का संबन्ध अधुनातन काल से ही
वृक्ष और लता का सा रहा है । बराबरी का अधिकार ? यह किंन्ही निहितार्थ के
चलते कुछ पुरुषों द्वारा ही गढ़ा गया है , और अबला अब बला की बला बन बैठी है।
चित्त और पट्ट दोंनों ही हथियाने की जुगत है, यह स्वांग

इसी विषय पर प्रत्यक्षा जी की गुस्से वाली यह पोस्ट पढ़ना ना भूलें.

चलिये अब विषयांतर….

मेरे संकल्पों को लेकर आलोक जी ने एक अच्छी बात कही कि “अनुशासित सिर्फ कंप्यूटर होते हैं या कुत्ते। हम रचनाधर्मी लोग हैं। अनंत के साधक हैं, यूं तुच्छ संकल्पों की सीमाओं में अपने पुरुषार्थ को ना बांधिये।”. उनसे पूरी सहमति और इतना अनुशासन है भी नहीं अपन में…….लेकिन फिर भी इस ब्लॉग के पाठको के लिये राह आसान हो इसका प्रबन्ध कर रहा हूँ.

शास्त्री जी समय समय पर विषय आधारित चिट्ठों की वकालत करते रहते हैं. अब अपने से कोई दस ब्लॉग तो मैंटेन हो नहीं पायेंगे इसलिये फिलहाल के लिये दिनों के हिसाब से इस ब्लॉग को विभिन्न भागों में बांटने का प्रयास कर रहा हूँ.

सोमवार : समसामयिक/व्यंग्य/पॉडकास्ट

मंगलवार: समसामयिक/व्य़ंग्य/मौज

बुधवार : पहाड़ी नराई

गुरुवार : मधुशाला या उस जैसी ही कोई श्रंखला

शुक्रवार : खोया पानी

शनिवार : टिप्पणी चर्चा/ पाठकों के जबाब/ब्लॉग संबंधी

रविवार : खोया पानी

ये सभी पोस्ट सुबह आठ बजे से पहले प्रकाशित कर दी जायेंगी. इसके अतिरिक्त यदि कभी कोई अन्य विषय हुआ तो उसे अलग से दिन के किसी भी समय प्रकाशित कर दिया जायेगा. आशा करता हूँ कि इससे पाठको को सुविधा होगी और वो अपने हिसाब से इस ब्लॉग को पढ़ सकेंगे.

आपके कोई सुझाव हों तो जरूर बताइयेगा…..

Jan 242008
 

मैने उमर के रुबाइयों के बहुतेरे अनुवाद पढ़े..हिन्दी में भी अंग्रेजी में भी. हिन्दी में मुझे ‘मधुशाला’ (जो कि अनुवाद नहीं है पर इसकी चर्चा बाद में) और ‘मधुज्वाल‘ ने बहुत प्रभावित किया.हाँलाकि रघुवंश गुप्त जी का अनुवाद भी काफी अच्छा है….पर ‘मधुज्वाल’ मुझे उसके नये प्रतिमानों और छंद के नये नये प्रयोगो की वजह से ज्यादा सुन्दर प्रतीत होता है. बांकी अनुवाद एक ही शैली में बँध गये से लगते हैं. हाँलाकि बच्चन की ‘मधुशाला’ जितनी लोकप्रिय हुई उतना लोकप्रिय इसके समवर्ती रुबाइयों का कोई भी अनुवाद हिन्दी में नहीं हुआ.. लेकिन मुझे लगता है इसका मूल कारण यह रहा कि मधुशाला एक गेय रचना है.जो लोगों की जबान पर तुरंत चढ़ जाती है इस कारण इसको याद रखना ज्यादा आसान होता है.

आइये आज आपको मधुज्वाल से मेरे पसंद के कुछ छंदो से परिचित करवाता हूँ.

यह जग मेघों की चल माया
भावी, स्वप्नों की छ्ल छाया !
तू बहती सरिता के जल पर
देख रहा अपनी प्रतिछवि नर !

उठ रे , कल के दुख से व्याकुल,
जीवन सतरँग वाष्पों का पुल !
कल का दुख केवल पागलपन,
पल पल बहता स्वप्निल जीवन !
ले, उर में हाला ज्वाला भर ,
सुरा पान कर , सुधा पान कर !

स्वर्गिक अप्सरि सी प्रिय सहचरि
हो हँसमुख संग ,
मधुर गान हो ,सुरा पान हो
लज्जारुण रंग !
कल कल छ्ल छ्ल बहता हो जल
तट हो कुसुमित
कोमल शाद्वल चूमे पद तल
साकी हो स्मित !
इससे अतिशय स्वर्ग न सुखमय
यही सुर सदन ,
छोड़ मोह भय , मदिरा में लय
हो विमूढ़ मन!

वह ह्रदय नहीं
जिसमें प्रियतम की चाह नहीं!
वह प्रणय नहीं
जिसमें विरहानल दाह नहीं !
वह दिवस नहीं
यदि अविरत सुरा प्रवाह नहीं !
वह वयस नहीं
जो बाला के गल बाँह नहीं !

वह मनुष्य जिसके रहने को
हो छोटा आंगन , गृह द्वार ,
खाने को रोटी का टुकड़ा ,
पीने को मदिरा की धार !
जो न किसी का सेवक शासक ,
हँसमुख हों जिसके सहचर ,
कहता उमर सुखी है वह नर ,
स्वर्ग उसे है यह संसार !

मदिर नयन की , फूल बदन की
प्रेमी को ही चिर पहचान ,
मधुर गान का , सुरा पान का
मौजी ही करता सम्मान !
स्वर्गोत्सुक जो , सुरा विमुख जो
क्षमा करें उनको भगवान ,
प्रेयसि का मुख , मदिरा का सुख
प्रणयी के , मद्यप के प्राण !

उमर न कभी हरित होगा फिर
पलित बयस का गलित लिबास,
मेरे मन अनुकूल फिरेगा
भाग्य चक्र ,यह व्यर्थ प्रयास !
पान पात्र भर ले मदिरा से
शोक न कर , मदिरा कर पान ,
कभी सुराही टूट , सुरा ही
रह जायेगी , कर विश्वास! 

धर्म चक्रों को यदि मुझसे
कभी मित्रता हो स्वीकार
वो मेरे दुखों के बदले
इतना मात्र करें उपकार-
मेरे मरने बाद देह की
रज से ईंटे कर तैयार
चुनवा दें वे मदिरालय के
खँडहर की टूटी दीवार !

surahi-toot

 

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

Jan 172008
 

madhujwal_cover उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद सुमित्रानंदन पंत ने 1929 में उर्दु के प्रसिद्ध शायर असगर साहब गोडवी की सहायता और इंडियन प्रेस के आग्रह पर किया था. यह अनुवाद “मधुज्वाल” नाम से 1948 में प्रकाशित हुआ था. अन्य हिन्दी अनुवादकों की तरह उनका यह अनुवाद फिट्जराल्ड की की पुस्तक पर आधारित नहीं था बल्कि उन्होने मूल फारसी से हिन्दी अनुवाद किया था. मूल फारसी को समझने में उनकी सहायता असगर साहब ने की थी. इसीलिये इस पुस्तक में पाठक को कल्पनाशीलता के कुछ नये रंग मिलते हैं. इसी कल्पनाशीलता की वजह से यह अनुवाद स्वयं के ज्यादा करीब लगता है. नये प्रतिमानों में कोयल है, बुलबुल है,गुलाब और आम्र मंजरी की गंध भी है.”मधुज्वाल” में नये छंद विधान हैं जो कहीं कहीं रुबाई वाले छंद में परिणित हो जाते हैं और कहीं एक्दम दूसरा ही रूप ले लेते हैं.इस पुस्तक में पदों की संख्या भी अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले कहीं ज्यादा है. “मधुज्वाल” के द्वितीय संस्करण में कुल 151 पद हैं.

आइये कुछ पदों पर नजर डालें.

खोलकर मदिरालय का द्वार
प्रात: ही कोई  उठा पुकार
मुग्ध श्रवणों में मधु रव घोल,
जाग उन्मद मदिरा के छात्र!
 
  ढुलक कर यौवन मधु अनमोल
शेष रह जाय नहीं मृदु मात्र,
ढाल जीवन मदिरा जी खोल
लबालब भर ले उर का पात्र! [2]
सुरालय हो मेरा संसार,
सुरा-सुरभित उर के उदगार!
सुरा ही प्रिय सहचरि सुकुमार,
सुरा,लज्जारुण मुख साकार!
 
  उमर को नहीं स्वर्ग की चाह,
सुरा में भरा स्वर्ग का सार!
सुरालय राह स्वर्ग की राह,
सुरालय द्वार स्वर्ग का द्वार्!  [11]
अधर मधु किसने किया सृजन ?
तरल गरल !
रची क्यों नारी चिर निरुपम ?
रूप अनल !
अगर इनसे रहना वंचित
यही विधान ,
दिये विधि ने तप संयम हित
न क्यों दृढ़ प्राण ? [16]

छूट जायें जब तन से प्राण
सुरा में मुझे कराना स्नान !
सुरा,साकी,प्याले का नाम
सुनाना मुझे उमर अविराम!

खोजना चाहे कोई भूल
मुझे मेरे मरने के बाद ,
पांथशाल की सूंघे धूल,
दिलायेगी वो मेरी याद! [18]

madhujwaal_2
इस जीवन का भेद
जिसे मिल गया गभीर अपार,
रहा ना उसको क्लेद
मरण भी बना स्वर्ग का द्वार !
 
  करले आत्म विकास ,
खोज पथ, जब तक दीपक हाथ,
मरने बाद , निराश ,
छोड़ देगा प्रकाश भी साथ! [23]
रम्य मधुवन हो स्वर्ग समान,
सुरा हो सुरबाला का ज्ञान !
तरुण बुलबुल की विह्वल तान
प्रणय ज्वाला से भर दे प्राण !
 
  न विधि का भय , न जगत का ज्ञान,
स्वर्ग की स्पृहा , नरक का ध्यान ,-
मदिर चितवन पर दूँ जय बार
चूम अधरों की मदिरा-धार ! [28]
उमर दो दिन का यह संसार
लबालब भर ले उर भ्रंगार
क्षणिक जीवन यौवन का मेल,
सुरा प्याली का फेनिल खेल !
 
  देख , वन के फूलों की डाल
ललक खिलती , झरती तत्काल !
व्यर्थ मत चिंता कर , नादान ,
पान कर मदिराधर कर पान ! [30]
लज्जारुण मुख , बैठी सम्मुख ,
प्रेयसि कंपित कर से उत्सुक
भर ज्वाला रस , हाला हँस हँस
उमर पिलाए , ह्र्दय हो अक्श !
 
  ह्रदय हीन कह लें मलीन,
मैं मधु वारिधि का मुग्ध मीन !
अपवर्ग व्यर्थ , केवल निसर्ग
संगीत, सुरा , सुन्दरी , – स्वर्ग ! [33]
पंचम पिकरव , विकल मनोभव ,
        यौवन उत्सव !
मधुवन गुंजित , नीर तंरंगित
        तीर कल ध्वनित !
हँसमुख सुन्दर प्रिय सुख सहचर ,
        प्रिया मनोहर ,
पी मदिराधर सखे , निरंतर ,
       जीवन क्षण भर ! [35]
 
अपना   आना   किसने    जाना ?
जग में आ फिर क्या पछताना ?
जो   आते   वो   निश्चय    जाते,
तुझको   मुझको  भी    है  जाना !
 
 
  बाँध  कमर , ओ साकी सुन्दर ,
उठ कंपित कर में प्याली धर ,
प्रीति सुधा भर,भीति द्विधा हर,
चिर विस्मृति में डूबे अंतर ! [49]

मधुज्वाल के पद हिन्दी के बांकी अनुवादों से थोड़े अलग हैं. इसलिये इनको पढ़ने में एक नयी ताजगी का अहसास होता है. अगले अंक में इसी किताब के कुछ और पदों की चर्चा करेंगे और कुछ चर्चा होगी बच्चन और सुमित्रानंदन पंत के बीच हुए पत्र व्यवहार के बारे में भी.

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों के माध्यम से बतायें…

क्रमश:…………………………

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

Jan 132008
 

कल एक दिन के लिये कलकत्ता के लिये रवाना हुआ.आज सुबह तीन घंटे की देरी से राजधानी एक्सप्रेस से हावड़ा पहुंचा तो रास्ते में ही पता चला कि कलकत्ता के प्रमुख वाणिज्यिक ठिकाने “बड़ा बाजार” के एक इलाके में शनिवार सुबह या यूँ कहें कि शुक्रवार रात से ही भयानक आग लगी है. जो अभी तक यानि रविवार शाम तक भी नहीं बुझायी जा सकी. आग को बुझाने के लिये सेना बुला ली गयी है जिनका आग बुझाने का प्रयास जारी है.

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“बड़ा बाजार” कलकत्ता का एक प्रमुख व्यवसायिक बाजार है. “बड़ा बाजार” घनी आबादी वाला इलाका है. यह भारत की सबसे बड़ी और पुरानी थोक व्यापार मार्केट है. यह हावड़ा के पास ही है.चुंकि यहाँ मेरे भी कई जानने वालों की दुकाने हैं तो आज शाम मैं भी यहाँ पहुंचा. बड़ा ही भयानक सा दृश्य था. नंदराम मार्किट की इमारत तब भी धू धू कर जल रही थी. ऊपर वाली मंजिलों में अभी भी आग लगी हुई थी. हमारे सामने ही 13 वीं मंजिल में कई विस्फोट हुए. वहाँ पर लोगों ने बताया कि 13 वीं मंजिल में जनरेटर चलता था और वहाँ करीबन तीन सौ लीटर डीजल तेल रखा हुआ था. वहाँ मैं उन लोगों से मिला जिनकी जिन्दगी की पूरी कमाई नष्ट हो गयी थी. एक व्यक्ति के वहाँ पांच गोदाम थे. एक नये ऑफिस का उदघाटन तो उन्होने शुक्रवार को ही किया था. सारा सामान और ऑफिस जल के नष्ट हो गये. एक व्यक्ति का कहना था उसके पचास लाख रुपये कैश उसके ऑफिस में रखे हुए थे जो जल कर खाक हो गये.

सभी लोगों से बातचीत कर जो बातें पता चली वो जरूर कुछ सोचने पर विवश कर देती हैं.

1. आग शुक्रवार रात को जमनालाल बजाज स्ट्रीट में लगी जो धीरे धीरे नंदराम मार्केट तक फैल गयी. दमकल वाले आये तो सही लेकिन पहले उन्हे गंगा प्राधिकरण वालों ने गंगा से पानी नहीं लेने दिया.जिस कारण उन्हे आग बुझाने में देरी हुई.

2. सरकार नें अपने दमकल विभाग की प्रारंभिक असफलताओं के बाद भी इस काम को सेना को देना उचित नहीं समझा. सेना को तब बुलाया गया जब आग काफी हद तक बढ़ चुकी थी.

3. नंदीबागान के दो भाइयों की दुकाने भी इस मार्किट में थीं जो पूरी तरह जल कर राख हो गयी. उनके देनदारों ने उनसे सहानुभूति जताना तो दूर अपना पैसा मांगने में भी देर नहीं की.इस प्रकार पैसे मांगने वालों को देख दोनों भाई नर्वस हो गये और उन्होने आत्महत्या कर ली.

4. दमकल विभाग के आग बुझाने वाले उपकरण इस तरह की आग को बुझाने के लिये अपर्याप्त थे. उनकी सीढियां बमुश्किल पांचवी मंजिल तक ही पहुंच पा रही थीं और वो केवल छ्ह-सात मंजिल तक ही पानी पहुंचा पा रहे थे.

5. इतनी बड़ी आग लगने के बाद भी सीपीएम वालों नें “कलकत्ता मैदान” में अपनी पूर्व-निर्धारित रैली जारी रखी. जिसमें हमेशा की तरह बसों और ट्रकों में भरे सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया. यह रैली उसी “मैदान” में हुई जिसमें अब पुस्तक मेले को आयोजित करने की इजाजत नहीं दी जाती इस डर से कि इससे मैदान को नुकसान होगा लेकिन सीपीएम की रैली के लिये इस मैदान को तंबू लगाने के लिये खोदा गया और फिर एक लाख से ज्यादा सीपीएम के कार्यकर्ताओं द्वारा रौंदा गया.

6. सरकार के कुछ मंत्रियों से जब आग के फैलने के बारे में पूछा गया तो उन्होने अपने गिरेबान में झांकने के बजाय यह कह कर खुद का बचाव किया कि इस इलाके में अधिकतर दुकाने गैरकानूनी थीं.

[उपरोक्त जानकारियां अग्निस्थल पर उपस्थित लोगों से बातचीत पर आधारित है.इनकी कोई पुष्टि नहीं की गयी है ]