Feb 142008
 

यह प्रयास है मेरी आवाज की मधुशाला को कैसेट के संगीत के साथ मिला कर प्रस्तुत करने का. संगीत मन्नाडे वाली कैसेट से लिया है.

 

और जैसा कि मैने पिछ्ली पोस्ट में बताया कि अभी कुछ दिनों पहले मैं मधुशाला का पाठ कर रहा था तो एक मित्र ने उसे रिकॉर्ड कर लिया. प्रस्तुत है वही एक पॉडकास्ट के रूप में. मैं मधुशाला की तरंग में था इसलिये माईक हिल रहा था और उसी कारण आवाज कम ज्यादा हो रही है. झेल लीजिये.

 

 

पूरी श्रंखला

1. खैयाम की मधुशाला..

2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..

3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये

4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में 

5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद

6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से

7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

9. उमर की मधुशाला के निहितार्थ

10. अगर पिलाने का दम है तो जारी रख यह मधुशाला

11. मैं और मेरी मधुशाला..

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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Feb 142008
 

मुझे मधुशाला सदा से ही प्रिय रही है. मेरी मधुशाला की कहानी शुरु हुई सन 1986 में जब मैं पहले पहल दिल्ली आया था. उस समय मैने बच्चन व मन्नाडे की आवाज में मधुशाला वाला कैसेट सुना. सुनकर तो मानिये मैं पागल हो गया. उस कैसेट को ना जाने कितनी बार सुनता रहा. साथ में गाता भी रहा. तब से यह फितूर चालू हुआ.

1989 में पहली बार मधुशाला की किताब को पढ़ा तभी पता चला कि बच्चन की मधुशाला अंग्रेजी के किसी किताब का अनुवाद है.1990 में लाइब्रेरी से जॉन फ़िट्ज़राल्ड की किताब लाकर पढ़ी तब  उमर खैय्याम के बारे में और अधिक जानकारी मिली.उस समय  अंग्रेजी इतनी तो समझ नहीं आती थी लेकिन डिक्सनरी साथ में रख पूरी किताब पढ़ी. फिर इसी झोंक में मैने भी अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में कुछ पदों की रचना की.छंद विधान रुबाई वाला ही रखा.   

Going higher and higher,Getting success Night n Day,
IS NO more MORTAL, must be descended into Clay.
THUS FILL your cup with the wine of Luv and Light,
AND Share it with all people like light Ray .

No need for the Last sleep, to prepare ,
You know not why you go nor where.
Drink! the wine of Joy and Happiness
Make lively today’s silence n future despair

People have tried to Unfold and find
The concealed truth of LIFE , behind
No LAMP they got in midnight dark
BLIND they were and remained blind.

Kakesh : 12.12.90

1993 में सुमित्रानंदन पंत की किताब “मधुज्वाल” हाथ लगी. उसने भी काफी प्रभावित किया और मैने कुछ और पदों की रचना की.

“मधुज्वाल व मधुशाला”

बच्चन जी के छंद में

अद्वितीय साकी वह कैसी, कैसी अद्भुत है हाला?
कर  डाला उमर को पागल ऎसा जादूगर प्याला
पंत,बच्चन को प्रेरित कर,मधुरस से नहलाया उनको
लिख डाली उन दोनों ने यों, ‘मधुज्वाल’ औ ‘मधुशाला’

बच्चन जपते रहे रात दिन, मधुशाला, मदिरा माला
मधुज्वाल की लपटों ने कवि पंत को तपा डाला
पीकर कविता की मधु मदिरा,मदमस्त हुए सब पाठकगण
देती हैं संदेश प्रेम का , ‘मधुज्वाल’ औ ‘मधुशाला’

पंत जी के छंद में

नहीं धरा में कोई साकी ,
नहीं मूर्त है मधुबाला.
ये तो जीवन के प्रतीक है
हाला, प्याला, मधुशाला

ये अपना संदेश कामना
मधु की वर्षा हो नित भू पर
मधु, जीवन कोई ज्योति बने अब
मधु में पगे रहें नारी नर

मधु सी मीठी बोली बोलें सब जन
हर कण मधुकण हो प्यारा
सब भ्राता सम रहें परस्पर
मधुमय हो संसार हमारा

काकेश : 21.02.93

हॉस्टल में जब रहा तो एक पीने पिलाने का दौर चालू हुआ. उस समय हॉस्टल में होने वाली अधिकतर मधु-पार्टियों में मुझे बुलाया जाता और हर पार्टी का अंत मेरे मधुशाला के गायन से ही होता.बहुत दिनों तक यह सिलसिला चला. मुझे उस समय मधुशाला के करीब साठ पद कंठस्थ थे. अब तो शायद दस भी याद नहीं है.

बाद में अंग्रेजी के अनुवाद, मैथिली शरण गुप्त और रघुवंश प्रसाद गुप्त का अनुवाद भी पढ़ा.बांग्ला अनुवाद के कुछ पद भी पढ़े. बीच में फारसी सीखने की भी असफल कोशिश की ताकि उमर खैय्याम की मूल रुबाइयों को पढ़ सकूं.अभी भी मुझे कुमांऊनी में हुए अनुवाद और फिर उसी के हिन्दी अनुवाद की तलाश है. साथ ही मैं पं बलदेव प्रसाद मिश्र द्वारा किये अनुवाद को भी ढूंढ रहा हूँ.  

तो यह श्रंखला मधुशाला के पीछे मेरी दीवानगी का ही परिणाम है.

कुछ दिनों पहले जब मैं मधुशाला गा रहा था तो मेरे एक मित्र ने उसे रिकॉर्ड भी किया. कोशिश करता हूँ शाम तक उसको भी यहाँ चढ़ा पाऊँ.

[इस श्रंखला का यह अंतिम भाग  है ]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !! 9. उमर की मधुशाला के निहितार्थ 10. अगर पिलाने का दम है तो जारी रख यह मधुशाला

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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Feb 072008
 

हरिवंशराय बच्चन और मधुशाला को जानने वाले बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होने मधुशाला पर दो पुस्तकें लिखी. पहली पुस्तक जो 1933 में लिखी वह थी “खैयाम की मधुशाला” . इस पुस्तक में जॉन फिट्ज़राल्ड की पुस्तक के प्रत्येक पद का अनुवाद था. दूसरी पुस्तक जो लिखी गयी वो थी “मधुशाला”. अधिकांश लोग इस पुस्तक के बारे में ही जानते हैं. सामान्यत: जब हम बच्चन की मधुशाला की चर्चा करते हैं या उनका कोई पद उदघृत करते हैं तो इसी किताब से करते हैं.मन्नाडे की आवाज में जो कैसेट भी निकला वह भी दूसरी किताब मधुशाला पर था.

khaiyyam-madhushalaआइये पहले “खैयाम की मधुशाला “की चर्चा करें. यह किताब 1933 में आयी और इसमें जॉन के प्रत्येक पद का हिन्दी अनुवाद था .

एक उदाहरण देखिये

The Moving Finger writes; and, having writ,
Moves on: nor all your Piety nor Wit
Shall lure it back to cancel half a Line,
Nor all your Tears wash out a Word of it

किसी की लौह लेखनी भाल शिला पर लिख जाती कुछ लेख
न फिर फिरती पीछे की ओर, लिखा क्या , इतना तो ले देख
न  कम  कर  देगी  आधी पंक्ति देख सब तेरी भक्ति , विवेक ,
न  तेरे  आंसू  की  ही  धार  सकेगी  धो   लघु  अक्षर    एक ! 

इस प्रकार जॉन के 75 पदों का अनुवाद बच्चन ने 1933 में किया. khaiyyam-madhushala1इस पुस्तक के तीसरे संस्करण में हिन्दी के प्रत्येक पद के साथ मूल पुस्तक का अंग्रेजी पद भी दिया गया. यह पहले व दूसरे संस्करण में नहीं था. तीसरे संस्करण ने बच्चन ने एक भूमिका भी लिखी जिसमें उन्होंने मधुशाला के रचे जाने के बारे में उनकी सोच का परिचय देते हुए उमर खैय्याम और जॉन फिट्जराल्ड की रचना प्रक्रिया और उस समय की परिस्थितियों पर विशद टिप्पणी की थी.

दूसरी पुस्तक 1934 में आयी जो इन्ही भावों पर अधारित एक स्वतंत्र पुस्तक थी. इसमें 135 रुबाइयाँ हैं. इसका सस्वर पाठ भी बच्चन कई कार्यक्रमों और कवि-सम्मेलनों में करते रहे. मधुशाला की रूबाइयो का प्रथम पाठ बच्चन ने सन् 1934-35 में बनारस में किया था. अपने प्रथम पाठ से अब तक मधुशाला स्वर्ण जयंती से गुजर के हीरक जयंती मना चुकी है. 1984 में इसकी स्वर्ण जयंती के अवसर पर उन्होंने एक नई रुबाई भी लिखी थी

घिस-घिस जाता कालचक्र में हर मिट्टी के तनवाला
पर अपवाद बनी बैठी है मेरी यह साक़ी बाला
जितनी मेरी उम्र वृद्ध मैं, उससे ज़्यादा लगता हूँ
अर्धशती की होकर के भी षोडष वर्षी मधुशाला

कवि सम्मेलनों में मधुशाला के साथ साथ इस पर बनी पैरोडियाँ भी खूब चलीं. प्रोफेसर मनोरजंन प्रसाद सिन्हा, जो कि उस कवि सम्मेलन में सभापति थे जिसमें बच्चन से मधुशाला का पाठ किया था,  ने अपने एक संस्मरण में खुद उन्ही के द्वारा बनायी गयी कुछ पैरोडियों की चर्चा की ही.वह पैरोडियां कुछ ऎसी हैं. 

भूल गया तस्बीह नमाजी, पंडित भूल गया माला,
चला दौर जब पैमानों का, मग्न हुआ पीनेवाला।
आज नशीली-सी कविता ने सबको ही बदहोश किया,
कवि बनकर महफ़िल में आई चलती-फिरती मधुशाला।

रूपसि, तूने सबके ऊपर कुछ अजीब जादू डाला
नहीं खुमारी मिटती कहते दो बस प्याले पर प्याला,
कहाँ पड़े हैं, किधर जा रहे है इसकी परवाह नहीं,
यही मनाते हैं, इनकी आबाद रहे यह मधुशाला।

भर-भर कर देता जा, साक़ी मैं कर दूँगा दीवाला,
अजब शराबी से तेरा भी आज पड़ा आकर पाला,
लाख पिएँ, दो लाख पिएँ, पर कभी नहीं थकनेवाला,
अगर पिलाने का दम है तो जारी रख यह मधुशाला।

इसी संस्मरण में वह कहते हैं.

उस शाम बच्चन को सुनकर नवयुवक पागल हो रहे थे। पागल मैं भी हो रहा था किन्तु वह पागलपन उसी प्रकार का न रहा। यह गिलहरी कुछ दूसरा ही रंग लाई; और वह रंग प्रकट हुआ दूसरे दिन के कवि-सम्मेलन में जो केवल ‘मधुशाला’ का सम्मेलन था-बच्चन का और मेरा सम्मेलन था-‘मधुशाला’ का सर्वप्रथम कवि सम्मेलन-केवल ‘मधुशाला’ का। बच्चन  ने अपनी अनेकानेक रुबाइयाँ सुनाई थीं और मैंने केवल आठ। बच्चन आदि और अन्त में थे और मैं था मध्य में, इण्टरवल में, जब सुनाते-सुनाते वे थक-से गए थे और शीशे के गिलास में सादे पानी से गले की खुश्की मिटा रहे थे।

‘मधुशाला’ की चुनी हुई बीस रूबाइयों का रेकार्ड दि ग्रामोफ़ोन कम्पनी आफ इंडिया लिमिटेड द्वारा तैयार किया गया.इसका संगीत जयदेव ने दिया.पहली रुबाई बच्चन के स्वर में है, शेष रुबाइयाँ मन्ना डे के स्वर में हैं.

[यह श्रंखला कुछ खास चल नहीं रही. ऎसा टिप्पणीयाँ और आंकड़े बताते हैं. इसलिये अगले अंक में इसे समाप्त कर रहा हूँ]

क्रमश :….

[इस श्रंखला का अंतिम भाग  अगले गुरुवार को प्रकाशित किया जायेगा]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !! 9. उमर की मधुशाला के निहितार्थ

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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Jan 312008
 

अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे कि उमर खैय्याम की रुबाइयों में कितनी व्यापकता है. जब मैं उमर खैय्याम की रुबाइयों और उनके उन अनुवादों के बारे में सोचता हूँ जो भारत में हुए तो उनमें एक साम्य जैसा लगता है. पहले उमर खैय्याम की मूल रचना की बात करें. उमर खैयाम ने इतिहास के उस युग में जन्म लिया जब युरोप के लोग इतने सभ्य नहीं थे…या यूं कहें कि निरे जंगली थे तो अतिशयोक्ति ना होगी. उस समय स्कॉटलैंड में मैलकम कैमोर का दबदबा था और इंग्लैंड में सैक्सन राजाओं का आधिपत्य था. ये सब राजा प्रजा को गुलाम की तरह रखते थे…लेकिन इसके विपरीत फारस (पारस) में ज्योति थी, जीवन था, ज्ञान था और साहित्य था. सूफी संस्कृति, वैज्ञानिक सोच की अपनी महत्ता थी. ऎसे सामाजिक परिदृश्य में उमर ने सांसारिकता को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर रखने के अपनी रुबाइयों का सहारा लिया.

जॉन फिटजराल्ड सहित कई अनुवादकों का मानना है कि उमर खुद सुरा-प्रेमी थी और उनके इन पदों में केवल सुरा,सुन्दरी का ही जिक्र है लेकिन उमर की रुबाईयों को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर देखने वालों की भी कमी नहीं है. मैने भी अब तक जितना उमर को पढ़ा उसके आधार पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि ये रुबाइयाँ मात्र सुरा-वन्दना हीं है. यह रुबाइयाँ उससे अधिक बहुत कुछ कह जाती हैं.मैं अपने और विचार लेख के अगले अंक में आने वाले सप्ताह में रखूंगा.

उमर की रुबाइयों के अनुवाद हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में 1930 से 1945 के बीच हुए. इस समय देश में अंग्रेजों का शासन था लेकिन स्वतंत्रता का सूरज भी धीरे धीरे आंखे खोल रहा था. यह नवजागरण का काल था. लोगों में पर्याप्त मात्रा में असंतोष था. यह ऎसा समय था जब लोग खुद-ब-खुद उमर की दार्शनिकता की ओर खिंचे चले आये.लोगों की आंखों में सपने थे, दिलों में जोश था और चाल में मस्ती. यह समय था जब लोगों ने उमर को पढना और गुनना प्रारम्भ किया.

हरिवंश राय बच्चन ने एक जगह इसी परिस्थिति का वर्णन कुछ ऎसे किया है.

” सात-आठ बरस बाद जब मैंने उमर खैयाम की रुबाइयों को पहली बार पढ़ा, तो मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने उनमें किसी रोदन, किसी वेदना या किसी निराशा की प्रत्याशा करते हुए पढ़ा था। मेरी यही प्रत्याशा कहाँ तक पूरी हुई होगी इसे ‘रुबाइयात उमर खैयाम’ का हरेक पाठक अपने आप समझ सकता है। मुमकिन है, यहाँ मेरी बात काटकर कुछ लोग मुझसे अपनी असहमति जताएँ। साधारण जनता के बीच, और इसमें प्रायः ऐसे लोग अधिक हैं जिन्होंने उमर खैयाम की कविता स्वयं नहीं पढ़ी, बस यदा-कदा दूसरों से उसकी चर्चा सुनी है, या कभी उसके भावों को व्यक्त करने वाले चित्रों को उड़ती नज़र से देखा है, कवि की एक और ही तसवीर घर किए हुए है। उनके ख़याल में उमर खैयाम आनन्दी जीव है, प्याली और प्यारी का दीवाना है, मस्ती का गाना गाता है, सुखवादी है या जिसे अंग्रेज़ी में ‘हिडोनिस्ट’ या ‘एपीक्योर’ कहेंगे। इतिहासी व्यक्ति उमर खैयाम ऐसा ही था या इससे विपरीत, इस पर मुँह खोलने का मुझे हक़ नहीं है। फ़ारसी की रुबाइयों में उमर ख़ैयाम का जो व्यक्तित्व झलका है, उस पर अपनी राय देने का मैं अधिकारी नहीं हूँ क्योंकि फ़ारसी का मेरा ज्ञान बहुत कम है, लेकिन, एडवर्ड फ़िट्ज़जेरल्ड ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में अपने अंग्रेज़ी तरजुमे के अन्दर उमर खैयाम का जो खाका खींचा है उसके बारे में बिना किसी संकोच या सन्देह के मैं कह सकता हूँ कि वह किसी सुखवादी आनन्दी जीवन अथवा किसी हिडोनिस्ट या ‘एपीक्योर’ का नहीं है।

इन रुबाइयों का लिखने वाला वह व्यक्ति है जिसने मनुष्य की आकांक्षाओं को संसार की सीमाओं के अन्दर घुटते देखा है, जिसने मनुष्य की प्रत्याशाओं को संसार की प्राप्तियों पर सिर धुनते देखा है, जिसने मनुष्य के सुकुमार स्वप्नों को संसार के कठोर सत्यों से टक्कर खाकर चूर-चूर होते देखा है। इन रूबाइयों के अन्दर एक उद्विग्न और आर्त आत्मा की पुकार है, एक विषण्ण और विपन्न मन का रोदन है, एक दलित और भग्न हृदय का क्रन्दन है। संक्षेप में कहना चाहें तो यह कहेंगे कि रुबाइयात मनुष्य की जीवन के प्रति आसक्ति और जीवन की मनुष्य के प्रति उपेक्षा का गीत है-रुबाइयों का क्रम जैसा रक्खा गया है उससे वे अलग-अलग न रहकर एक लम्बे गीत के ही रूप में हो गई हैं। यह गीत जीवन-मायाविनी के प्रति मानव का एकांतिक प्रणय निवेदन है। पर कौन सुनता है ? वह अपना क्रोध-विरोध प्रकट करता है-पर उसे हार ही माननी पड़ती है। मानव की दुर्बलता, उसकी असमर्थता, उसकी परवशता, उसकी अज्ञानता और उसकी लघुता के साथ उसका दम्भ, उसका क्रोध-विरोध और उसकी क्रान्ति उसे कितना दयनीय बना देती है ! रुबाइयात सुख का नहीं दुख का गीत है, सन्तोष का नहीं असन्तोष का गान है।”

बच्चन जी की ’मधुशाला‘ में ही देखें तो पायेंगे कि इसके पूर्वाद्ध में यदि कवि ने मरणोपरांत क्रियाओं में भी मधु की महत्ता स्थापित की है तो इसके उत्तरार्द्ध में दर्द,अस्थिरता,क्षण भंगुरता और मोह भंग का यह रूप भी है -

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गई सुरभित हाला

कहाँ गया स्वप्निल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला

पीने वालों ने मदिरा का मूल्य हाय कब पहचाना

फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला

तो उमर की रुबाइयों को मात्र सुरा,सुन्दरी से जोड़कर देखना शायद सही नहीं है. इसके और भी कई पहलू हैं…जिनकी चर्चा अगले अंक में करेंगे.

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

Jan 242008
 

मैने उमर के रुबाइयों के बहुतेरे अनुवाद पढ़े..हिन्दी में भी अंग्रेजी में भी. हिन्दी में मुझे ‘मधुशाला’ (जो कि अनुवाद नहीं है पर इसकी चर्चा बाद में) और ‘मधुज्वाल‘ ने बहुत प्रभावित किया.हाँलाकि रघुवंश गुप्त जी का अनुवाद भी काफी अच्छा है….पर ‘मधुज्वाल’ मुझे उसके नये प्रतिमानों और छंद के नये नये प्रयोगो की वजह से ज्यादा सुन्दर प्रतीत होता है. बांकी अनुवाद एक ही शैली में बँध गये से लगते हैं. हाँलाकि बच्चन की ‘मधुशाला’ जितनी लोकप्रिय हुई उतना लोकप्रिय इसके समवर्ती रुबाइयों का कोई भी अनुवाद हिन्दी में नहीं हुआ.. लेकिन मुझे लगता है इसका मूल कारण यह रहा कि मधुशाला एक गेय रचना है.जो लोगों की जबान पर तुरंत चढ़ जाती है इस कारण इसको याद रखना ज्यादा आसान होता है.

आइये आज आपको मधुज्वाल से मेरे पसंद के कुछ छंदो से परिचित करवाता हूँ.

यह जग मेघों की चल माया
भावी, स्वप्नों की छ्ल छाया !
तू बहती सरिता के जल पर
देख रहा अपनी प्रतिछवि नर !

उठ रे , कल के दुख से व्याकुल,
जीवन सतरँग वाष्पों का पुल !
कल का दुख केवल पागलपन,
पल पल बहता स्वप्निल जीवन !
ले, उर में हाला ज्वाला भर ,
सुरा पान कर , सुधा पान कर !

स्वर्गिक अप्सरि सी प्रिय सहचरि
हो हँसमुख संग ,
मधुर गान हो ,सुरा पान हो
लज्जारुण रंग !
कल कल छ्ल छ्ल बहता हो जल
तट हो कुसुमित
कोमल शाद्वल चूमे पद तल
साकी हो स्मित !
इससे अतिशय स्वर्ग न सुखमय
यही सुर सदन ,
छोड़ मोह भय , मदिरा में लय
हो विमूढ़ मन!

वह ह्रदय नहीं
जिसमें प्रियतम की चाह नहीं!
वह प्रणय नहीं
जिसमें विरहानल दाह नहीं !
वह दिवस नहीं
यदि अविरत सुरा प्रवाह नहीं !
वह वयस नहीं
जो बाला के गल बाँह नहीं !

वह मनुष्य जिसके रहने को
हो छोटा आंगन , गृह द्वार ,
खाने को रोटी का टुकड़ा ,
पीने को मदिरा की धार !
जो न किसी का सेवक शासक ,
हँसमुख हों जिसके सहचर ,
कहता उमर सुखी है वह नर ,
स्वर्ग उसे है यह संसार !

मदिर नयन की , फूल बदन की
प्रेमी को ही चिर पहचान ,
मधुर गान का , सुरा पान का
मौजी ही करता सम्मान !
स्वर्गोत्सुक जो , सुरा विमुख जो
क्षमा करें उनको भगवान ,
प्रेयसि का मुख , मदिरा का सुख
प्रणयी के , मद्यप के प्राण !

उमर न कभी हरित होगा फिर
पलित बयस का गलित लिबास,
मेरे मन अनुकूल फिरेगा
भाग्य चक्र ,यह व्यर्थ प्रयास !
पान पात्र भर ले मदिरा से
शोक न कर , मदिरा कर पान ,
कभी सुराही टूट , सुरा ही
रह जायेगी , कर विश्वास! 

धर्म चक्रों को यदि मुझसे
कभी मित्रता हो स्वीकार
वो मेरे दुखों के बदले
इतना मात्र करें उपकार-
मेरे मरने बाद देह की
रज से ईंटे कर तैयार
चुनवा दें वे मदिरालय के
खँडहर की टूटी दीवार !

surahi-toot

 

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

Jan 172008
 

madhujwal_cover उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद सुमित्रानंदन पंत ने 1929 में उर्दु के प्रसिद्ध शायर असगर साहब गोडवी की सहायता और इंडियन प्रेस के आग्रह पर किया था. यह अनुवाद “मधुज्वाल” नाम से 1948 में प्रकाशित हुआ था. अन्य हिन्दी अनुवादकों की तरह उनका यह अनुवाद फिट्जराल्ड की की पुस्तक पर आधारित नहीं था बल्कि उन्होने मूल फारसी से हिन्दी अनुवाद किया था. मूल फारसी को समझने में उनकी सहायता असगर साहब ने की थी. इसीलिये इस पुस्तक में पाठक को कल्पनाशीलता के कुछ नये रंग मिलते हैं. इसी कल्पनाशीलता की वजह से यह अनुवाद स्वयं के ज्यादा करीब लगता है. नये प्रतिमानों में कोयल है, बुलबुल है,गुलाब और आम्र मंजरी की गंध भी है.”मधुज्वाल” में नये छंद विधान हैं जो कहीं कहीं रुबाई वाले छंद में परिणित हो जाते हैं और कहीं एक्दम दूसरा ही रूप ले लेते हैं.इस पुस्तक में पदों की संख्या भी अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले कहीं ज्यादा है. “मधुज्वाल” के द्वितीय संस्करण में कुल 151 पद हैं.

आइये कुछ पदों पर नजर डालें.

खोलकर मदिरालय का द्वार
प्रात: ही कोई  उठा पुकार
मुग्ध श्रवणों में मधु रव घोल,
जाग उन्मद मदिरा के छात्र!
 
  ढुलक कर यौवन मधु अनमोल
शेष रह जाय नहीं मृदु मात्र,
ढाल जीवन मदिरा जी खोल
लबालब भर ले उर का पात्र! [2]
सुरालय हो मेरा संसार,
सुरा-सुरभित उर के उदगार!
सुरा ही प्रिय सहचरि सुकुमार,
सुरा,लज्जारुण मुख साकार!
 
  उमर को नहीं स्वर्ग की चाह,
सुरा में भरा स्वर्ग का सार!
सुरालय राह स्वर्ग की राह,
सुरालय द्वार स्वर्ग का द्वार्!  [11]
अधर मधु किसने किया सृजन ?
तरल गरल !
रची क्यों नारी चिर निरुपम ?
रूप अनल !
अगर इनसे रहना वंचित
यही विधान ,
दिये विधि ने तप संयम हित
न क्यों दृढ़ प्राण ? [16]

छूट जायें जब तन से प्राण
सुरा में मुझे कराना स्नान !
सुरा,साकी,प्याले का नाम
सुनाना मुझे उमर अविराम!

खोजना चाहे कोई भूल
मुझे मेरे मरने के बाद ,
पांथशाल की सूंघे धूल,
दिलायेगी वो मेरी याद! [18]

madhujwaal_2
इस जीवन का भेद
जिसे मिल गया गभीर अपार,
रहा ना उसको क्लेद
मरण भी बना स्वर्ग का द्वार !
 
  करले आत्म विकास ,
खोज पथ, जब तक दीपक हाथ,
मरने बाद , निराश ,
छोड़ देगा प्रकाश भी साथ! [23]
रम्य मधुवन हो स्वर्ग समान,
सुरा हो सुरबाला का ज्ञान !
तरुण बुलबुल की विह्वल तान
प्रणय ज्वाला से भर दे प्राण !
 
  न विधि का भय , न जगत का ज्ञान,
स्वर्ग की स्पृहा , नरक का ध्यान ,-
मदिर चितवन पर दूँ जय बार
चूम अधरों की मदिरा-धार ! [28]
उमर दो दिन का यह संसार
लबालब भर ले उर भ्रंगार
क्षणिक जीवन यौवन का मेल,
सुरा प्याली का फेनिल खेल !
 
  देख , वन के फूलों की डाल
ललक खिलती , झरती तत्काल !
व्यर्थ मत चिंता कर , नादान ,
पान कर मदिराधर कर पान ! [30]
लज्जारुण मुख , बैठी सम्मुख ,
प्रेयसि कंपित कर से उत्सुक
भर ज्वाला रस , हाला हँस हँस
उमर पिलाए , ह्र्दय हो अक्श !
 
  ह्रदय हीन कह लें मलीन,
मैं मधु वारिधि का मुग्ध मीन !
अपवर्ग व्यर्थ , केवल निसर्ग
संगीत, सुरा , सुन्दरी , – स्वर्ग ! [33]
पंचम पिकरव , विकल मनोभव ,
        यौवन उत्सव !
मधुवन गुंजित , नीर तंरंगित
        तीर कल ध्वनित !
हँसमुख सुन्दर प्रिय सुख सहचर ,
        प्रिया मनोहर ,
पी मदिराधर सखे , निरंतर ,
       जीवन क्षण भर ! [35]
 
अपना   आना   किसने    जाना ?
जग में आ फिर क्या पछताना ?
जो   आते   वो   निश्चय    जाते,
तुझको   मुझको  भी    है  जाना !
 
 
  बाँध  कमर , ओ साकी सुन्दर ,
उठ कंपित कर में प्याली धर ,
प्रीति सुधा भर,भीति द्विधा हर,
चिर विस्मृति में डूबे अंतर ! [49]

मधुज्वाल के पद हिन्दी के बांकी अनुवादों से थोड़े अलग हैं. इसलिये इनको पढ़ने में एक नयी ताजगी का अहसास होता है. अगले अंक में इसी किताब के कुछ और पदों की चर्चा करेंगे और कुछ चर्चा होगी बच्चन और सुमित्रानंदन पंत के बीच हुए पत्र व्यवहार के बारे में भी.

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों के माध्यम से बतायें…

क्रमश:…………………………

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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Oct 112007
 

[कुछ पाठकों ने मेल भेज कर कहा कि मैं 'उमर खैयाम'  के जीवन-वृत के बारे में विस्तार से लिखुं. तो उन सभी सुधी पाठकों से कहना चाहुंगा कि 'उमर' के बारे में नैट पर पहले से ही बहुत जानकारी उपलब्ध है.हाँलाकि अधिकतर जानकारी अंग्रेजी में है फिर भी उसी जानकारी का अनुवाद कर यहां पेश करना एक तरह का दुहराव ही होगा. मेरा प्रयास 'उमर' की रुबाइयों को हिन्दी अनुवादकों की नजर से देखना और उस पर अपने विश्लेषण को नैट पर डालना मात्र है. जिन पुस्तकों की बात मैं इस आलेख में कर रहा हूँ उनमें से अधिकांश अब दुकानों में उपलब्ध नहीं है.इसलिये उनकी झलक नैट पर डालना मैं समझता हूँ अधिक श्रेयस्कर होगा. उमर के जीवन पर मौलाना सुलेमान नदवी की एक पुस्तक है "खैयाम" जो दारुल्मुसन्नफीब,आजमगढ़ से प्रकाशित हुई थी.मूल पुस्तक उर्दू में थी लेकिन इसका हिन्दी अनुवाद भी छ्पा था. यदि ज्यादा मांग रही तो फिर कभी इस विषय पर विस्तार से लिखुंगा.अभी तो आप मूल आलेख ही पढें]

पिछ्ले अंको में आपने पढ़ा कि उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद श्री रघुवंशलाल गुप्त ने 1938 में किया था. यह पुस्तक किताबिस्तान,इलाहाबाद से छ्पी थी.इसमें भूमिका के रूप में उमर खैयाम का एक वृहत जीवन परिचय भी है.खैयाम के बारे में प्रचलित एक अंग्रेजी पद का सुन्दर अनुवाद रघुवंश जी ने इसी भूमिका में किया है.  raghuvansh_cover

Khayyam, who stitched the tents of science,
Has fallen in grief’s furnace and been suddenly burned,
The shears of Fate have cut the tent ropes of his life,
And the broker of Hope has sold him for nothing!

जो खैयाम सिया करता था “हिकमत” के खेमे अनमोल,
गिरा वही दुख की भट्टी में,अनायास हा गया फफोल.
काल-कतरनी ने दी उसकी ,अल्प आयु की डोरी काट,
“किस्मत” के दलाल ने उसको बेच दिया मिट्टी के मोल.

आइये अब अनुवाद की चर्चा करें. रघुवंश जी ने भी अपनी इस पुस्तक में उमर की रुबाइयों वाले छंद का ही प्रयोग किया है. हाँलाकि पुस्तक की भूमिका के अनुसार उन्होने फिट्जराल्ड की पुस्तक ही अनुवाद के लिये प्रयोग की थी.लेकिन ऎसा लगता है कि रघुवंश जी को उर्दू का काफी अच्छा ज्ञान था. अपनी भूमिका में भी वो उर्दु के एक अनुवाद की चर्चा करते हुए कहते हैं

” उर्दु में खैयाम की मूल रुबाइयों का अनुवाद हमने देखा है;परंतु यह बहुत अच्छा नहीं. न तो इसमें फारसी भाषा का प्राकृतिक पद लालित्य है और न मूल रुबाइयों का प्रसाद गुण”

इसी तरह परिशिष्ट में भी वह खैयाम की पारसी रुबाइयों का हवाला देते हैं. एक बानगी देखिये (चित्र:परिशिष्ट का एक पन्ना).तो लगता है कि उन्होने मूल फारसी को भी पढ़ा था.

raghuvansh_apendix आइये अब कुछ पद देखें.

कवि को जल्दी है कि कहीं जीवन की रात ना हो जाये इससे पहले कि ऎसा हो वो मधु के प्याले में डूब जाना चाहता है.

पौ फटते ही मधुशाला में , गूँजा शब्द निराला एक,
मधुबाला से हँस हँस कर यों कहता था मतवाला एक-
“स्वाँग बहुत है रात रही पर थोड़ी; ढालो,ढालो शीघ्र
जीवन ढल जाने के पहिले ढालो मधु का प्याला एक.”[2]

कवि कहता है कि तू अपने ज्ञान को भूल जा और बस मधुरस का पान किये जा.यह तेरा यौवन थोड़ा ही है इसे जी ले.

ला,ला,साकी! और,और ला;फिर प्याले पर प्याला ढाल;
धर रख ,गूढ़-ज्ञान गाथा को ,व्रत विवेक चूल्हे में डाल.
सिखला रहा ‘त्याग’ की पट्टी,कैसा ज्ञानी है तू मित्र!-
नहीं सूझता क्या तुझको यह यौवन,यह मधु,यह मधुकाल [8]

कवि हर रोज सोचता है कि वो पीना छोड़ देगा लेकिन आज तो बसंतोत्सव है और कवि छ्क कर पीना चाहता है.

यों तो मैं भी नित्य सोचता हूँ अब खाऊंगा सौगन्ध -
इस प्याले का मोह तजूँगा ,पीना कर दूंगा अब बन्द.
किंतु आज तक प्रकृति-प्रिया है आई सज फूलों का साज,
आज बसंतोत्सव है प्रियतम,आज न पीऊँ तो सौगन्ध.[9]

कवि कहता है ये जीवन नश्वर है.इसलिये तेरे-मेरे का चक्कर छोड़ और जीवन को पूरी तरह जीने का माध्यम बन.

नित्य रहेगा नहीं यहाँ, प्रिय, जीवन का यह डेरा कुछ;
प्राण-बटोही उठ जायेंगे करके रैन बसेरा कुछ.
यहाँ पड़े सोते हो जब तक करते हो “तेरा”-”मेरा”,
जीवन-स्वप्न टूट जाने पर, मेरा रहे ना तेरा कुछ.[11]

कवि कहता है असली स्वर्ग तो यहीं इसी धरती पर है.उसके लिये भविष्य की प्रतीक्षा करने की क्या आवश्यकता. इन पदों में देखिये दो मुहावरों “नौ नकद ना तेरह उधार” तथा ” दूर के ढोल सुहावने” का कितना सुन्दर उपयोग किया गया है.

दो मधूकरी हों खाने को , मदिरा हो मनमानी जो,
पास धरी हो मर्म-काव्य की पुस्तक फटी पुरानी जो,
बैठ समीप तान छेड़े, प्रिय, तेरी वीणा-वाणी जो,
तो इस विजन-विपिन पर वारूँ,मिले स्वर्ग सुखदानी जो.[14]

कोई स्वर्ग-लोक के सुख को कहता है अतोल, अनमोल;
कोई राजपाट के ऊपर करता है मन डाँवाडोल ;
गाँठ बाद ले मूर्ख नक़द के नौ, तेरह उधार के छोड़-
यों तो लगते हैं सुहावने सबको सदा दूर के ढोल. [15]

कवि कहता है.चाहे वो राजा हो या रंक सब की मंजिल एक ही है.सबको इस दुनिया को छोड़ जाना ही है.दुख-सुख तो आते जाते रहते हैं. इसलिये इन सब की चिंता में समय मत गंवा और भविष्य की चिताओं की मत सोच. बस यह वर्तमान है इसका जी भर सुख लूट ले.

वह कंगाल जिसे जीवन में जुटे न दाने भी दो सेर-
राजा जो न खर्च कर पाया ,भरे खजानों के भी ढेर,
दोनों ‘माटी’ मिले , किसी का बना न कोई सोना,जो कि
एक बार के गड़े हुए को कोई खोद निकाले फेर.[20]

कब तक, कब तक,मित्र ! फिरोगे जिस-तिस की चिंता में व्यस्त?
कब तक, क्ब तक और रहोगे, दीन और दुनिया में ग्रस्त?
आओ,लो,प्याला भर दो फिर, दो दिन खुल खेलो खैयाम,
सुख-दुख का शशि तो यों ही नित होता अस्त ,उदय ,फिर अस्त.[34]

लो प्याला भर भर दो फिर फिर ,फिर फिर कहने का क्या फल?
हाथों से निकला जाता है लाख लाख का इक इक पल.
बीत चुका जो ‘कल’ होना था ,क्या जाने होगा क्या ‘कल’
आज चैन से कटती है तो ‘कल’ के हित क्यों हो बेकल
[ 46]

यह प्रकृति का नियम है कि जो आया है उसे एक ना एक दिन जाना ही है. यह तो सदियों से पूछा जाने वाला प्रश्न है कि मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? कहाँ जाउंगा? लेकिन इन सबका उत्तर आखिर जानता कौन है. यह धर्म,रीति-रिवाज सब बेकार हैं. मैं तो बस मदिरा में डूब जाना चाहता हूँ ताकि सदियों से अनुत्तरित प्रश्नों को भी भूल जाऊं.

हा इस क्रूर चक्र के आगे चलता है कोई ना उपाय
अन्त भाग्य के हाथों ही में ,रहता हार जीत का न्याय
कौन,कहाँ से,क्यों आया था ? जान कहाँ, और क्यों,अन्त?
प्रश्न जानता हूँ मै भी सब,उत्तर कौन बताये हाय.[
55]  

बैर ना धर्म से हैं कुछ ,न कुछ विशेष पाप से प्रीति ,
न कुछ बुरी ही लगती मुझको , प्रिय,बे-बात लोक की रीति.
मैं जो प्याले पर मरता हूँ ,सो बस इसी लिये खैयाम,
एक घड़ी को बिसर जाय यह नियति चक्र की निर्मम नीति.[66]

हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है सब किसी अदृश्य सत्ता के हाथ में हैं यदि यह हमारे हाथ में होता तो हम एक नयी सृष्टि की रचना करते जहाँ मन की आशाऎं पूरी हो पातीं.

प्रियतम ! हम-तुम कर पाते जो कहीं नियति नटनी से मेल,
अपने हाथों में होता जो जीवन का यह दुखमय खेल.
तो फिर इसे मिटाकर फिर से रचते ऎसी सृष्टि नवीन
मन की साधें पुजती जिसमें,फलती जहँ आशा की बेल.[71]

इस पुस्तक के द्वितीय संस्करण में कुल 72 छंद हैं.अगले अंक में चर्चा करेंगे सुमित्रानंदन पंत की पुस्तक “मधुज्वाल” की…

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों के माध्यम से बतायें…

क्रमश:…………………………

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद

 

Oct 092007
 

जैसा कि बताया जा चुका है कि मैथिलीशरण गुप्त और रघुवंश गुप्त दोनो ने उमर की रुबाइयों का हिन्दी अनुवाद किया था. आइये पहले मैथिलीशरण गुप्त के अनुवाद की चर्चा करें.

गुप्त जी अपनी भूमिका में लिखते हैं कि उन्हें उमर की रुबाइयों का हिन्दी अनुवाद करने के लिये राय कृष्णदास जी ने प्रेरित किया था. मैथिली जी फारसी नहीं जानते थे इसलिये उनका अनुवाद जान फिट्जराल्ड के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित था. उन्होने फिट्जराल्ड के अनुवाद का शब्दश: अनुवाद ना कर भावानुवाद ही किया जिसमें कुछ वाक्य उन्होने अपनी ओर से भी बढ़ाये. उनकी इस पुस्तक में कुल 75 छ्न्द हैं. उन्होने भी छंद रचना में उमर के छंद को ही प्रयुक्त किया है. मदिरा , जो कि उमर की रुबाइयों का मूल तत्व है उसके लिये मैथिली जी मधु, अंगुरी, द्राक्षा,द्राक्षा-रस आदि का प्रयोग किया है.आइये कुछ पंक्तियां देखें. mathily_cover

आओ, मधुर बसंत विभा में मधु ढालो,भर दो प्याला,
अनुतापों के शिशिर-वसन से बढ़े होलिका की ज्वाला.
समय विहंगम को थोड़ा ही मार्ग पार करना है अब,
फैला दिये पंख लो, उसने,है वह उड़ने ही वाला.[7]

जीवन की नश्वरता के बारे में मैथिली जी लिखते हैं.

सांसारिक लिप्साऎं, जिन पर आशा करते हैं हम लोग,
मिट्टी में मिल जाती हैं सब पाकर सौ विघ्नों के रोग.
कहीं फूलती फलती भी हैं तो बस घड़ी दो घड़ी ही,
ज्यों मरु के धूसर मुख पर हो हिमकण की आभा का योग.[14]

उमर की रुबाइयां जीवन और मृत्यु के बीच झूलते मानव को बार बार अहसास कराती हैं कि इस जग में जो भी है वो क्षणिक है.चाहे आप जीवन में कितना भी पालें सब एक ना एक दिन छूटना ही है. इसी बात को मैथिली जी कहते हैं.

यह प्राचीन पथिकशाला है,अहो-रात्र जिसके दो द्वार,
खुलते और बन्द होते हैं बारी बारी बारंबार.
कितनी तड़क भड़क से इसमें आये हैं कितने सम्राट
एक द्वार से  घुसे, घड़ी भर ठहरे,हुए अन्य से पार.[16]

भूमंडल के मध्य भाग से उठकर मैं ऊपर आया,
सातों द्वार पार कर ऊंचा ,शनि का सिंहासन पाया.
कितनी ही उलझने मार्ग में सुलझा डाली मैने , किंतु
मनुज मृत्यु की और नियति की खुली न ग्रंथिमयी माया.[
31]

कब तक, किया करोगे कब तक इससे उससे वाद विवाद?
कब तक,बना रहेगा कब तक, यह चिर यत्नों का उन्माद ?
मरते हो किस फल के पीछे , वह कटु है या मिथ्या है,
अच्छा तो है यही ,छोड़ सब लो उस अंगूरी का स्वाद.[39] 

यह उलटा प्याला है , जिसको आसमान कहते हैं हम,
जिसके नीचे मरते-जीते कसे गँसे रहते हैं हम .
है बेकार हाथ फैलाना ,किसी लिये इसके आगे,
पड़ा उसी चक्कर में यह भी ,विवश जिसे सहते हैं हम.[52]

हाँ मेरे बुझते जीवन को द्राक्षा-रस से दीप्त करो,
और उसी से मृत शरीर को धोकर उस की धूलि हरो
द्राक्षा-दल का कफन बनाकर उसमें मुझे लपेटो फिर ,
और किसी उद्यान-पार्श्व में गर्त बनाकर गाड़ धरो.[67]maithily_picture

पिछ्ले अंक में मैने बताया था कि उमर की रुबाइयों पर कई लोगों ने चित्र भी बनाये थे.मैथिली जी की इस पुस्तक में भी बीच में कुछ दर्जन भर चित्र भी हैं. ये सारे चित्र काशी के रामप्रसाद जी ने बनाये हैं. उमर की रुबाइयों पर आमतौर पर जो चित्र बनाये गये वो या तो फारस की सभ्यता की तड़क भड़क है या फिर जीवन के ऎहिक या श्रांगारिक तात्पर्य की अभिव्यक्ति.  अपने दर्जन भर चित्रों और 75 छ्न्दों के साथ जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तो हाथों हाथ बिक गयी.

अगले अंक में चर्चा करेंगे रघुवंश गुप्त के अनुवाद की.

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों से बतायें…

क्रमश:…………………………

श्रंखला के पिछ्ले लेख. 1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, नारायन दास, योगानंद, डुलाक, नजरुल

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, निशा निमंत्रण, पंकज उधास, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan

Oct 062007
 

5. कुछ प्रमुख अनुवादों की चर्चा

पिछ्ले अंक में हमने रुबाइयों के कुछ हिन्दी अनुवादों की चर्चा की. आज कुछ और अनुवादों की चर्चा करते हैं. हिन्दी के अलावा विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में उमर की रुबाइयों के अनुवाद हो चुके हैं. जिनमें जर्मन, रशियन, अफ्रिकन, इटेलियन, डच, थाइ, अल्बेनियन भाषा शामिल हैं. अनेक भारतीय भाषाओं में भी रुबाइयों के अनुवाद हुए हैं.

बांग्लादेश के राष्ट्र कवि काज़ी नजरूल इस्लाम ने रुबाइयों का बंगला में अनुवाद 1958 में  किया.ज्ञात रहे कि नजरूल की गेय रचनाऎ नजरुल गीतिका की नाम से काफी प्रसिद्ध हैं जैसे रवीन्द्र नाथ टैगोर की रचनाऎं रवीन्द्र संगीत के अंतर्गत गायी जाती हैं उसी तरह. नजरूल ने उमर की रुबाइयों को ओमार खैय्याम गीति के अंतर्गत रखा है. बंगला भाषा में ही मुहम्मद शहीदुल्लाह का अनुवाद 1942 में ‘रुबाईयत-ई-ओमार खैय्याम’ (Rubaiyat-i-Omar Khaiyam) नाम से प्रकाशित हुआ था.ज़फर सिकन्दर अबू का बंगाला अनुवाद 1966 में ‘ओमार खय्याम’ नाम से आया है. इसके अलावा भी बंगला में अनेक अनुवाद हुए जिसमे कांती घोष, नरेन्द्र देव और शक्ति चट्टोपाध्याय के नाम प्रमुख हैं.

परमहंस योगानंद जिनकी पुस्तक ‘एक योगी की आत्मकथा’(Autobiography of a Yogi )  काफी प्रसिद्ध है उन्होने भी “वाइन ओफ द मिस्टिक’ (Wine of the Mystic) के नाम से एक पुस्तक लिखी है जिसमें खैय्याम की रुबाइयों के आध्यात्मिक पक्ष को समझाया गया.यह किताब करीब 60 वर्ष पहले लिखी गयी थी. कुछ सालों पहले इसे “रुबाइयत ऑफ ओमार खैय्याम एक्स्प्लेन्ड” (Rubaiyat” of Omar Khayyam Explained) के नाम से फिर निकाला गया.

narayan_das_cover_page पंडित नारायन दास, जिनका पूरा नाम पंडित अज्जदा अदिभतला नारायन दास था Pandit Ajjada Adibhatla Narayana Das और जो हिन्दी ,तेलगू,संस्कृत ,फारसी समेत नौ भाषाओं के जानकार थे, भी उमर खैय्याम से बहुत प्रभावित थे. उनका मानना था कि फिट्जराल्ड का अनुवाद उमर की रुबाइयों के साथ पूरा न्याय नहीं करता. इसी बात को सिद्ध करने के लिये उन्होने संस्कृत और तेलगू दो भाषाओं में रुबाइयों का अनुवाद कर डाला.यह अनुवाद 1932 में छ्पा और इसे उस समय का बहुत बड़ा साहित्यिक योगदान माना गया.

(बांये किताब का मुखपृष्ठ)

नीचे पहली रुबाई का संस्कृत अनुवाद.narayan_das_1st_page

जी शंकर कुरुप ने 1932 में मलयालम में रुबाइयों का अनुवाद किया.

1946 में ओमार खैय्याम नाम की एक हिन्दी फिल्म भी आयी थी. मुरली पिक्चर्स द्वारा निर्मित इस फिल्म में के.एल.सहगल,सुरैया,वस्ती और बैंजामिन शाकिर की प्रमुख भुमिकाऎं थी. इसके निर्देशक थे मोहन सिन्हा और इसमें संगीत दिया था इकबाल मोहम्मद ने. इसके एक गाने के बोल मुझे बहुत पसंद हैं जो इस प्रकार हैं.

बेदर्द ज़रा सुन ले ग़रीबों की कहानी
खाना तो है खाना इन्हें मिलता नही पानी

मालामाल के बिछौने पे है तू ऐश में खोया
हमसाया तेरा रात को पत्थर पे है सोया
तू ख़ुश है मुसलमानों को आराम कहाँ है
बतला मेरे हमदर्द इस्लाम कहाँ है
दोज़ख को भुला क्यों शोलाफ़शानी
बेदर्द ज़रा सुन ले … 
——————————-

बीमार ग़रीबों के लिए बन के भिखारी
ऎ भाइयों आए हैं खिदमत में तुम्हारी
है कार-ए-सबब आँख अगर रहम की खोली
दाता भला हो भर दे फ़क़ीरों की झोली
इस शाम से पैदा करो सुबह सुहानी
बेदर्द ज़रा सुन ले … 

इस गाने को  सुरैया ने गाया था.

अन्य भाषाओं में भी उमर पर बहुत फिल्में बनी पर उन पर चर्चा इस लेख का हिस्सा नहीं है. कई चित्रकारों ने उमर की रुबाइयों पर अनेक पेंटिग्स भी बनायी. अंग्रेजी की अनेक किताबें नामी गिरामी चित्रकारों की पेंटिग्स के साथ छ्पी.   RubaiyatDula

Dulac2

 

ऊपर जो दो चित्र आप देख रहे हैं वो एडमंड डुलाक के चित्रों से भरपूर अंग्रेजी अनुवाद है. ये पुस्तक 1915 के आसपास प्रकाशित हुई थी. यह संस्करण अब तक का सबसे मंहगा और विशिष्ट संस्करण माना जाता है.

अगले अंक में चर्चा करेंगे मैथिलीशरण गुप्त और रघुवंश गुप्त के हिन्दी अनुवादों की…..

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों से बतायें…

क्रमश:…………………………

श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला..

2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..

3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, निशा निमंत्रण, पंकज उधास, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan

Oct 052007
 

मधुशाला के निर्धारित क्रम को तोड़ते हुए आइये एक चर्चा करे पिछ्ले लेखों में हुई टिप्पणीयों पर.कुछ बहुत ही अच्छी टिप्पणीयां आयी जिंन्होने सोचने पर भी बाध्य किया और आगे लिखने के लिये प्रेरित भी. सबसे पहले राकेश जी का धन्यवाद जिन्होने डिजिटल लाइब्रेरी का पता बताया और मैं मैथिलीशरण गुप्त जी की पुस्तक को खोज सका. इसके कुछ अंश भी इस लेख में शामिल किये जायेंगे. तो शुरु करें चर्चा.

पहली पोस्ट पर अनिल रघुराज जी ने टिप्पणी की.

हमारे बच्चन साहब पूरी तरह खय्याम (तंबू बनाने वाले) थे और आठ सौ साल पुरानी रुबाइयों को पैबंद लगाकर पेश कर दिया?

अनिल जी खैयाम ने सबको तंबू (खेमा) बनाने वाला बना दिया और ना जाने कितने लोगों ने अपने अपने हिसाब से तंबू बनाये.एक जानकारी और देता चलूं.जैसे अपने देश में बहुत से शायर अपने नाम के आगे अपने शहर का नाम जोड़ लेते हैं वैसे ही फारसी कवि अपने काम के हिसाब से अपना उपनाम रख लेते थे जैसे अत्तार: इत्र बेचने वाला;अस्सार:तेल बेचने वाला,हमगर:कपड़े रफू करने वाला इत्यादि.

आलोक पुराणिक जी भी अपनी पुरानी यादों के खजाने से निकाल के कुछ

लाये.

मुझे याद पड़ता है कि पंकज उदास ने सिर्फ उमर खैयाम पर केंद्रित दो कैसेटों का एक संग्रह निकाला था। बहुत बढ़िया था।

ये दो कैसेट का सैट ‘रुबाई’ नाम से आया था. जिसके गायक-संगीतकार ‘पंकज उधास’ थे. गीत ‘जमीर काज़मी’ के थे. कैसेट में ज़मीर के अलावा ‘उमर खैयाम’ का नाम भी बतौर गीतकार के रूप में था.एक गीत के बोल कुछ इस तरह थे.

खोते न हों जो होश उन्हें घर बुला के पी pankaj-udhas-rybayee
या फिर बुतों को सामने, अपने बिठा के पी
बेहद ना पी, ना बोल बहुत, जोश में न आ
रुक रुक के पी, सुकून से पी, सर झुका के पी

दौलत है फ़क़त चार दिनों की पी ले
इज़्ज़त है फ़क़त चार दिनों की पी ले
है वक़्त शब-ओ-रोज़ तबाही की तरफ़
मोहलत है फ़क़त चार दिनों की पी ले

चलो पी लें के यार आये न आये
ये मौसम बार बार, आये न आये

गुलाबों की तरह तुम ताज़ा रहना
ज़माने में बहार आये न आये

ये सोचा है कि उसको भूल जायें
अब इस दिल को क़रार आये न आये

“ज़मीर” इस ज़िन्दगी से क्यूं ख़फ़ा हो
इसे फिर तुमपे प्यार आये न आये

ये दो कैसेटों का सैट शायद 1990 में आया था. जहां तक मुझे याद पड़ता है ये उस समय के हिसाब से काफी मंहगा था तकरीबन 45 रुपये का था. 

संजय पटेल ने कहा.

उमर ख़ैयाम के अलावा बच्चन जी की प्रथम पत्नी श्यामा के असामयिक निधन का दर्द भी शामिल है मधुशाला में.इसका ज़िक्र बच्चनजी की आत्मकथा क्या भूलूँ क्या याद करूँ में भी आया है.यदि मन्ना डे स्वरांकित और जयदेव द्वारा स्वरबध्द एलबम मधुशाला को सुना जाए तो उसके दूसरे भाग (जो शुरू हो तो है इस पंक्ति से..छोटे से जीवन में कितना प्यार करूँ,पी लूँ हाला,आने के ही साथ जगत में कहलाया जानेवाला)में भी युवावस्था में विदुर हुए बच्चन जी की पीड़ा सुनी जा सकती है.इसमें कोई शक नहीं कि मधुशाला पूरी तरह उमर ख़ैयाम की भावधारा से अनुप्राणित है लेकिन उसमें बच्चनजी जैसे वरिष्ठ काव्य हस्ताक्षर का कारनामा भी मौजूद है.

बहुत से लोगों का ये मानना  है कि मधुशाला में बच्चन जी की पत्नी श्यामा जी के निधन का दर्द भी शामिल था.लेकिन यह पूरी तरह गलत है. बच्चन जी ने मधुशाला की रचना 1933 में की थी. यह पुस्तक 1935 में प्रकाशित हो गयी थी. श्यामा जी की मृत्यू 1936 में हुई थी. अपनी पुस्तक निशा निमंत्रण की भूमिका में बच्चन ने इस बारे में विस्तार से लिखा है. लीजिये प्रस्तुत है कुछ अंश.

‘रुबाइयात उमर खैयाम’ से मेरा परिचय तो पुराना था पर अब वह मेरी परम प्रिय पुस्तक हो गई थी। रात को मेरे तकिए के नीचे रहती, दिन को मेरी जेब में। अपने ऊपर खैयाम के प्रभाव को मैंने इन पंक्तियों में स्वीकार किया है :

तुम्हारी मदिरा से अभिषिक्त
हुए थे जिस दिन मेरे प्राण
उसी दिन मेरे मुख की बात
हुई थी अंतरतम की तान

(आरती और अंगारे)

मैंने ‘रुबाइयात उमर खैयाम’ का अनुवाद कर डाला। खैयाम की दुनिया की रंगीनी ने मुझे इतना मोह लिया कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए भी मुझे सबसे उपयुक्त प्रतीक वे ही जान पड़े जिनकी ओर खैयाम ने संकेत किया था-हाला, प्याला, मधुशाला और मधुबाला।
1933-’34 में मैंने ‘मधुशाला’ लिखी।
1934’35 में मैंने ‘मधुबाला’ लिखी।

हर तूफान मन्द पड़ता है, हर नशा उतरता है। मेरी भावनाओं ने तीव्रतम स्थिति छू ली थी। वहाँ पर ज्यादा देर टिका रहना असम्भव था। जीवन का पहिया घूम गया- nisha_nimantran

गिर-गिर टूटे घट-प्याले,
बुझ दीप गए सब क्षण में,
सब चले किए सिर नीचे
ले अरमानों की झोली।
गूँजी मदिरालय भर में
लो चलो-चलो की बोली।
(मधुबाला)

अब वे मेरे गान कहाँ हैं !
टूट गई मरकत की प्याली,
लुप्त हुई मदिरा की लाली,

मेरा व्याकुल मन बहलानेवाले अब सामान कहाँ हैं ?
(निशा-निमंत्रण)

और उल्लास की चोटी से अवसाद के गहर में गिरकर मैंने हलाहल मरघट’ और ‘अतीत का गीत’ की प्रतिध्वनि से अपने को व्यक्त करना चाहा। (‘हलाहल’    पुस्तक-रूप में प्रकाशित हो चुका है। ‘मरघट’ और ‘अतीत का गीत’ दीमकों की जूठन के रूप में मेरे कागज-पत्रों में कहीं पड़े हैं।)
नियति का व्यंग्य कि जब मधुशाला टूट चुकी है और मधु का प्याला फूट चुका तब मुझसे मधु के गीत लिखने की कैफियत माँगी जाने लगी और क्षय के रोग में पड़े हुए मैंने इस प्रकार उत्तर दिया :

एक दिन मैंने लिया था काल से कुछ श्वास का ऋण,
आज भी उसको चुकाता, ले रहा वह क्रूर गिन-गिन;
ब्याज में मुझसे उगाहा है हृदय का गान उसने,
किंतु होने में उऋण अब शेष केवल और दो दिन;
गिर पड़ूंगा तान चादर सर्वथा निश्चिंत होकर,
भूलकर जग ने किया किस-किस तरह अपमान मेरा।

क्या किया मैंने, नहीं जो कर चुका संसार अब तक ?
वृद्ध जग को क्यों अखरती है क्षणिक मेरी जवानी ?

हैं लिखे मधुगीत मैंने ही खड़े जीवन-समर में।

(मधुकलश)

लेकिन नियति का व्यंग्य अभी पूरा नहीं हुआ था। मरण की प्रतीक्षा में मैं था। जीवन के पार क्या होगा, इसकी चिन्ता मुझे थी-इस पार, प्रिये, मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा ?-पर नियति को तो मरण से भी अधिक भयंकर एकाकीपन मेरे जीवन में लाना था।

न झिझका औ’ न हुआ भयभीत
न भागा ही लेकर के प्राण,
दिखा जब मुझको आता काल
कफन का ले हाथों में थान;
बढ़ाया पट जब मेरी ओर,
उठा, तैयार हुआ तत्काल,
निकट जो मेरे थे वरदान
दिया, पर, उसने उन पर डाल।

(हलाहल)

मेरी पत्नी श्यामा बीमार हो गई और दो सौ सोलह दिन चारपाई पर पड़ी रहकर, हमारे बचाने के सारे उपायों को विफल कर, उस पार चली गई।

‘गुलहजारा’ कविता की इन पंक्तियों में,
मृत्यु शैया पर पड़े अति
रुग्ण की अंतिम हँसी-सी,
यत्न करके लिख रही है,
एक लघु कलिका निराली।

(मधुकलश)

उसी का एक चित्र है :
उठा करता था मन में प्रश्न
कि जाने क्या होगा उस पार

निवारण करने में संदेह
मजहबी पोथे थे बेकार
चले तुम, पूछा हैं ! किस ओर !
कहा बस तुमने एक जबान
तुम्हें थी जिसकी खोज-तलाश,
उसी का करने अनुसन्धान।

(हलाहल)

मेरा ‘इस पार-उस पार’ गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। शायद आज भी है, पर उसके पीछे जो दर्शन है, उसका अनुभव उन लोगों को नहीं होता जो मुझसे बार-बार इस गीत को सुनाने का अनुरोध करते हैं। कई लोगों ने इस कविता की पैरोडियाँ भी लिखी हैं। नियति ने मेरे साथ इतना बड़ा व्यंग्य किया था कि इन नटखट पैरोडियों पर दुखी होने के बजाय मैं मुस्करा दिया हूँ।

अन्त का इतना था विश्वास
विदा का लिख डाला था गीत,
कलेजे को हाथों से थाम
सुना करते थे मन के गीत;

गए थे वे तज मेरा साथ
मगर वह गीत लगा है संग,
ध्वनित हो बहु कण्ठों से आज,
किया करता है मुझ पर व्यंग्य।

(हलाहल)

1930 के अन्त से जो संघर्ष मेरे जीवन में आरम्भ हुआ था उस की चरम स्थिति 1936 के अन्त में श्यामा के देहावसान में पहुँची।

सत्य मिटा, सपना भी टूटा।

तो यह तो सत्य है कि मधुशाला में कवि का दर्द भी शामिल था लेकिन श्यामा जी तब तक जीवित थी पर बीमार थीं.सोचिये किन परिस्थितियों में हुई थी मधुशाला की रचना.

मैथिलीशरण जी की पुस्तक पढ़कर ज्ञान के नये द्वार खुल रहे हैं. शीघ्र ही हाजिर होता हूँ कुछ नया लेकर मधुशाला की अगली कड़ी में.

पसंद करने के लिये आप सभी का धन्यवाद.

पिछ्ली कडियां…….

1. खैयाम की मधुशाला..

2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..