[कुछ पाठकों ने मेल भेज कर कहा कि मैं 'उमर खैयाम'  के जीवन-वृत के बारे में विस्तार से लिखुं. तो उन सभी सुधी पाठकों से कहना चाहुंगा कि 'उमर' के बारे में नैट पर पहले से ही बहुत जानकारी उपलब्ध है.हाँलाकि अधिकतर जानकारी अंग्रेजी में है फिर भी उसी जानकारी का अनुवाद कर यहां पेश करना एक तरह का दुहराव ही होगा. मेरा प्रयास 'उमर' की रुबाइयों को हिन्दी अनुवादकों की नजर से देखना और उस पर अपने विश्लेषण को नैट पर डालना मात्र है. जिन पुस्तकों की बात मैं इस आलेख में कर रहा हूँ उनमें से अधिकांश अब दुकानों में उपलब्ध नहीं है.इसलिये उनकी झलक नैट पर डालना मैं समझता हूँ अधिक श्रेयस्कर होगा. उमर के जीवन पर मौलाना सुलेमान नदवी की एक पुस्तक है "खैयाम" जो दारुल्मुसन्नफीब,आजमगढ़ से प्रकाशित हुई थी.मूल पुस्तक उर्दू में थी लेकिन इसका हिन्दी अनुवाद भी छ्पा था. यदि ज्यादा मांग रही तो फिर कभी इस विषय पर विस्तार से लिखुंगा.अभी तो आप मूल आलेख ही पढें]

पिछ्ले अंको में आपने पढ़ा कि उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद श्री रघुवंशलाल गुप्त ने 1938 में किया था. यह पुस्तक किताबिस्तान,इलाहाबाद से छ्पी थी.इसमें भूमिका के रूप में उमर खैयाम का एक वृहत जीवन परिचय भी है.खैयाम के बारे में प्रचलित एक अंग्रेजी पद का सुन्दर अनुवाद रघुवंश जी ने इसी भूमिका में किया है.  raghuvansh_cover

Khayyam, who stitched the tents of science,
Has fallen in grief’s furnace and been suddenly burned,
The shears of Fate have cut the tent ropes of his life,
And the broker of Hope has sold him for nothing!

जो खैयाम सिया करता था “हिकमत” के खेमे अनमोल,
गिरा वही दुख की भट्टी में,अनायास हा गया फफोल.
काल-कतरनी ने दी उसकी ,अल्प आयु की डोरी काट,
“किस्मत” के दलाल ने उसको बेच दिया मिट्टी के मोल.

आइये अब अनुवाद की चर्चा करें. रघुवंश जी ने भी अपनी इस पुस्तक में उमर की रुबाइयों वाले छंद का ही प्रयोग किया है. हाँलाकि पुस्तक की भूमिका के अनुसार उन्होने फिट्जराल्ड की पुस्तक ही अनुवाद के लिये प्रयोग की थी.लेकिन ऎसा लगता है कि रघुवंश जी को उर्दू का काफी अच्छा ज्ञान था. अपनी भूमिका में भी वो उर्दु के एक अनुवाद की चर्चा करते हुए कहते हैं

” उर्दु में खैयाम की मूल रुबाइयों का अनुवाद हमने देखा है;परंतु यह बहुत अच्छा नहीं. न तो इसमें फारसी भाषा का प्राकृतिक पद लालित्य है और न मूल रुबाइयों का प्रसाद गुण”

इसी तरह परिशिष्ट में भी वह खैयाम की पारसी रुबाइयों का हवाला देते हैं. एक बानगी देखिये (चित्र:परिशिष्ट का एक पन्ना).तो लगता है कि उन्होने मूल फारसी को भी पढ़ा था.

raghuvansh_apendix आइये अब कुछ पद देखें.

कवि को जल्दी है कि कहीं जीवन की रात ना हो जाये इससे पहले कि ऎसा हो वो मधु के प्याले में डूब जाना चाहता है.

पौ फटते ही मधुशाला में , गूँजा शब्द निराला एक,
मधुबाला से हँस हँस कर यों कहता था मतवाला एक-
“स्वाँग बहुत है रात रही पर थोड़ी; ढालो,ढालो शीघ्र
जीवन ढल जाने के पहिले ढालो मधु का प्याला एक.”[2]

कवि कहता है कि तू अपने ज्ञान को भूल जा और बस मधुरस का पान किये जा.यह तेरा यौवन थोड़ा ही है इसे जी ले.

ला,ला,साकी! और,और ला;फिर प्याले पर प्याला ढाल;
धर रख ,गूढ़-ज्ञान गाथा को ,व्रत विवेक चूल्हे में डाल.
सिखला रहा ‘त्याग’ की पट्टी,कैसा ज्ञानी है तू मित्र!-
नहीं सूझता क्या तुझको यह यौवन,यह मधु,यह मधुकाल [8]

कवि हर रोज सोचता है कि वो पीना छोड़ देगा लेकिन आज तो बसंतोत्सव है और कवि छ्क कर पीना चाहता है.

यों तो मैं भी नित्य सोचता हूँ अब खाऊंगा सौगन्ध -
इस प्याले का मोह तजूँगा ,पीना कर दूंगा अब बन्द.
किंतु आज तक प्रकृति-प्रिया है आई सज फूलों का साज,
आज बसंतोत्सव है प्रियतम,आज न पीऊँ तो सौगन्ध.[9]

कवि कहता है ये जीवन नश्वर है.इसलिये तेरे-मेरे का चक्कर छोड़ और जीवन को पूरी तरह जीने का माध्यम बन.

नित्य रहेगा नहीं यहाँ, प्रिय, जीवन का यह डेरा कुछ;
प्राण-बटोही उठ जायेंगे करके रैन बसेरा कुछ.
यहाँ पड़े सोते हो जब तक करते हो “तेरा”-”मेरा”,
जीवन-स्वप्न टूट जाने पर, मेरा रहे ना तेरा कुछ.[11]

कवि कहता है असली स्वर्ग तो यहीं इसी धरती पर है.उसके लिये भविष्य की प्रतीक्षा करने की क्या आवश्यकता. इन पदों में देखिये दो मुहावरों “नौ नकद ना तेरह उधार” तथा ” दूर के ढोल सुहावने” का कितना सुन्दर उपयोग किया गया है.

दो मधूकरी हों खाने को , मदिरा हो मनमानी जो,
पास धरी हो मर्म-काव्य की पुस्तक फटी पुरानी जो,
बैठ समीप तान छेड़े, प्रिय, तेरी वीणा-वाणी जो,
तो इस विजन-विपिन पर वारूँ,मिले स्वर्ग सुखदानी जो.[14]

कोई स्वर्ग-लोक के सुख को कहता है अतोल, अनमोल;
कोई राजपाट के ऊपर करता है मन डाँवाडोल ;
गाँठ बाद ले मूर्ख नक़द के नौ, तेरह उधार के छोड़-
यों तो लगते हैं सुहावने सबको सदा दूर के ढोल. [15]

कवि कहता है.चाहे वो राजा हो या रंक सब की मंजिल एक ही है.सबको इस दुनिया को छोड़ जाना ही है.दुख-सुख तो आते जाते रहते हैं. इसलिये इन सब की चिंता में समय मत गंवा और भविष्य की चिताओं की मत सोच. बस यह वर्तमान है इसका जी भर सुख लूट ले.

वह कंगाल जिसे जीवन में जुटे न दाने भी दो सेर-
राजा जो न खर्च कर पाया ,भरे खजानों के भी ढेर,
दोनों ‘माटी’ मिले , किसी का बना न कोई सोना,जो कि
एक बार के गड़े हुए को कोई खोद निकाले फेर.[20]

कब तक, कब तक,मित्र ! फिरोगे जिस-तिस की चिंता में व्यस्त?
कब तक, क्ब तक और रहोगे, दीन और दुनिया में ग्रस्त?
आओ,लो,प्याला भर दो फिर, दो दिन खुल खेलो खैयाम,
सुख-दुख का शशि तो यों ही नित होता अस्त ,उदय ,फिर अस्त.[34]

लो प्याला भर भर दो फिर फिर ,फिर फिर कहने का क्या फल?
हाथों से निकला जाता है लाख लाख का इक इक पल.
बीत चुका जो ‘कल’ होना था ,क्या जाने होगा क्या ‘कल’
आज चैन से कटती है तो ‘कल’ के हित क्यों हो बेकल
[ 46]

यह प्रकृति का नियम है कि जो आया है उसे एक ना एक दिन जाना ही है. यह तो सदियों से पूछा जाने वाला प्रश्न है कि मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? कहाँ जाउंगा? लेकिन इन सबका उत्तर आखिर जानता कौन है. यह धर्म,रीति-रिवाज सब बेकार हैं. मैं तो बस मदिरा में डूब जाना चाहता हूँ ताकि सदियों से अनुत्तरित प्रश्नों को भी भूल जाऊं.

हा इस क्रूर चक्र के आगे चलता है कोई ना उपाय
अन्त भाग्य के हाथों ही में ,रहता हार जीत का न्याय
कौन,कहाँ से,क्यों आया था ? जान कहाँ, और क्यों,अन्त?
प्रश्न जानता हूँ मै भी सब,उत्तर कौन बताये हाय.[
55]  

बैर ना धर्म से हैं कुछ ,न कुछ विशेष पाप से प्रीति ,
न कुछ बुरी ही लगती मुझको , प्रिय,बे-बात लोक की रीति.
मैं जो प्याले पर मरता हूँ ,सो बस इसी लिये खैयाम,
एक घड़ी को बिसर जाय यह नियति चक्र की निर्मम नीति.[66]

हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है सब किसी अदृश्य सत्ता के हाथ में हैं यदि यह हमारे हाथ में होता तो हम एक नयी सृष्टि की रचना करते जहाँ मन की आशाऎं पूरी हो पातीं.

प्रियतम ! हम-तुम कर पाते जो कहीं नियति नटनी से मेल,
अपने हाथों में होता जो जीवन का यह दुखमय खेल.
तो फिर इसे मिटाकर फिर से रचते ऎसी सृष्टि नवीन
मन की साधें पुजती जिसमें,फलती जहँ आशा की बेल.[71]

इस पुस्तक के द्वितीय संस्करण में कुल 72 छंद हैं.अगले अंक में चर्चा करेंगे सुमित्रानंदन पंत की पुस्तक “मधुज्वाल” की…

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों के माध्यम से बतायें…

क्रमश:…………………………

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद

 

 

जैसा कि बताया जा चुका है कि मैथिलीशरण गुप्त और रघुवंश गुप्त दोनो ने उमर की रुबाइयों का हिन्दी अनुवाद किया था. आइये पहले मैथिलीशरण गुप्त के अनुवाद की चर्चा करें.

गुप्त जी अपनी भूमिका में लिखते हैं कि उन्हें उमर की रुबाइयों का हिन्दी अनुवाद करने के लिये राय कृष्णदास जी ने प्रेरित किया था. मैथिली जी फारसी नहीं जानते थे इसलिये उनका अनुवाद जान फिट्जराल्ड के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित था. उन्होने फिट्जराल्ड के अनुवाद का शब्दश: अनुवाद ना कर भावानुवाद ही किया जिसमें कुछ वाक्य उन्होने अपनी ओर से भी बढ़ाये. उनकी इस पुस्तक में कुल 75 छ्न्द हैं. उन्होने भी छंद रचना में उमर के छंद को ही प्रयुक्त किया है. मदिरा , जो कि उमर की रुबाइयों का मूल तत्व है उसके लिये मैथिली जी मधु, अंगुरी, द्राक्षा,द्राक्षा-रस आदि का प्रयोग किया है.आइये कुछ पंक्तियां देखें. mathily_cover

आओ, मधुर बसंत विभा में मधु ढालो,भर दो प्याला,
अनुतापों के शिशिर-वसन से बढ़े होलिका की ज्वाला.
समय विहंगम को थोड़ा ही मार्ग पार करना है अब,
फैला दिये पंख लो, उसने,है वह उड़ने ही वाला.[7]

जीवन की नश्वरता के बारे में मैथिली जी लिखते हैं.

सांसारिक लिप्साऎं, जिन पर आशा करते हैं हम लोग,
मिट्टी में मिल जाती हैं सब पाकर सौ विघ्नों के रोग.
कहीं फूलती फलती भी हैं तो बस घड़ी दो घड़ी ही,
ज्यों मरु के धूसर मुख पर हो हिमकण की आभा का योग.[14]

उमर की रुबाइयां जीवन और मृत्यु के बीच झूलते मानव को बार बार अहसास कराती हैं कि इस जग में जो भी है वो क्षणिक है.चाहे आप जीवन में कितना भी पालें सब एक ना एक दिन छूटना ही है. इसी बात को मैथिली जी कहते हैं.

यह प्राचीन पथिकशाला है,अहो-रात्र जिसके दो द्वार,
खुलते और बन्द होते हैं बारी बारी बारंबार.
कितनी तड़क भड़क से इसमें आये हैं कितने सम्राट
एक द्वार से  घुसे, घड़ी भर ठहरे,हुए अन्य से पार.[16]

भूमंडल के मध्य भाग से उठकर मैं ऊपर आया,
सातों द्वार पार कर ऊंचा ,शनि का सिंहासन पाया.
कितनी ही उलझने मार्ग में सुलझा डाली मैने , किंतु
मनुज मृत्यु की और नियति की खुली न ग्रंथिमयी माया.[
31]

कब तक, किया करोगे कब तक इससे उससे वाद विवाद?
कब तक,बना रहेगा कब तक, यह चिर यत्नों का उन्माद ?
मरते हो किस फल के पीछे , वह कटु है या मिथ्या है,
अच्छा तो है यही ,छोड़ सब लो उस अंगूरी का स्वाद.[39] 

यह उलटा प्याला है , जिसको आसमान कहते हैं हम,
जिसके नीचे मरते-जीते कसे गँसे रहते हैं हम .
है बेकार हाथ फैलाना ,किसी लिये इसके आगे,
पड़ा उसी चक्कर में यह भी ,विवश जिसे सहते हैं हम.[52]

हाँ मेरे बुझते जीवन को द्राक्षा-रस से दीप्त करो,
और उसी से मृत शरीर को धोकर उस की धूलि हरो
द्राक्षा-दल का कफन बनाकर उसमें मुझे लपेटो फिर ,
और किसी उद्यान-पार्श्व में गर्त बनाकर गाड़ धरो.[67]maithily_picture

पिछ्ले अंक में मैने बताया था कि उमर की रुबाइयों पर कई लोगों ने चित्र भी बनाये थे.मैथिली जी की इस पुस्तक में भी बीच में कुछ दर्जन भर चित्र भी हैं. ये सारे चित्र काशी के रामप्रसाद जी ने बनाये हैं. उमर की रुबाइयों पर आमतौर पर जो चित्र बनाये गये वो या तो फारस की सभ्यता की तड़क भड़क है या फिर जीवन के ऎहिक या श्रांगारिक तात्पर्य की अभिव्यक्ति.  अपने दर्जन भर चित्रों और 75 छ्न्दों के साथ जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तो हाथों हाथ बिक गयी.

अगले अंक में चर्चा करेंगे रघुवंश गुप्त के अनुवाद की.

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों से बतायें…

क्रमश:…………………………

श्रंखला के पिछ्ले लेख. 1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, नारायन दास, योगानंद, डुलाक, नजरुल

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, निशा निमंत्रण, पंकज उधास, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan

 

5. कुछ प्रमुख अनुवादों की चर्चा

पिछ्ले अंक में हमने रुबाइयों के कुछ हिन्दी अनुवादों की चर्चा की. आज कुछ और अनुवादों की चर्चा करते हैं. हिन्दी के अलावा विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में उमर की रुबाइयों के अनुवाद हो चुके हैं. जिनमें जर्मन, रशियन, अफ्रिकन, इटेलियन, डच, थाइ, अल्बेनियन भाषा शामिल हैं. अनेक भारतीय भाषाओं में भी रुबाइयों के अनुवाद हुए हैं.

बांग्लादेश के राष्ट्र कवि काज़ी नजरूल इस्लाम ने रुबाइयों का बंगला में अनुवाद 1958 में  किया.ज्ञात रहे कि नजरूल की गेय रचनाऎ नजरुल गीतिका की नाम से काफी प्रसिद्ध हैं जैसे रवीन्द्र नाथ टैगोर की रचनाऎं रवीन्द्र संगीत के अंतर्गत गायी जाती हैं उसी तरह. नजरूल ने उमर की रुबाइयों को ओमार खैय्याम गीति के अंतर्गत रखा है. बंगला भाषा में ही मुहम्मद शहीदुल्लाह का अनुवाद 1942 में ‘रुबाईयत-ई-ओमार खैय्याम’ (Rubaiyat-i-Omar Khaiyam) नाम से प्रकाशित हुआ था.ज़फर सिकन्दर अबू का बंगाला अनुवाद 1966 में ‘ओमार खय्याम’ नाम से आया है. इसके अलावा भी बंगला में अनेक अनुवाद हुए जिसमे कांती घोष, नरेन्द्र देव और शक्ति चट्टोपाध्याय के नाम प्रमुख हैं.

परमहंस योगानंद जिनकी पुस्तक ‘एक योगी की आत्मकथा’(Autobiography of a Yogi )  काफी प्रसिद्ध है उन्होने भी “वाइन ओफ द मिस्टिक’ (Wine of the Mystic) के नाम से एक पुस्तक लिखी है जिसमें खैय्याम की रुबाइयों के आध्यात्मिक पक्ष को समझाया गया.यह किताब करीब 60 वर्ष पहले लिखी गयी थी. कुछ सालों पहले इसे “रुबाइयत ऑफ ओमार खैय्याम एक्स्प्लेन्ड” (Rubaiyat” of Omar Khayyam Explained) के नाम से फिर निकाला गया.

narayan_das_cover_page पंडित नारायन दास, जिनका पूरा नाम पंडित अज्जदा अदिभतला नारायन दास था Pandit Ajjada Adibhatla Narayana Das और जो हिन्दी ,तेलगू,संस्कृत ,फारसी समेत नौ भाषाओं के जानकार थे, भी उमर खैय्याम से बहुत प्रभावित थे. उनका मानना था कि फिट्जराल्ड का अनुवाद उमर की रुबाइयों के साथ पूरा न्याय नहीं करता. इसी बात को सिद्ध करने के लिये उन्होने संस्कृत और तेलगू दो भाषाओं में रुबाइयों का अनुवाद कर डाला.यह अनुवाद 1932 में छ्पा और इसे उस समय का बहुत बड़ा साहित्यिक योगदान माना गया.

(बांये किताब का मुखपृष्ठ)

नीचे पहली रुबाई का संस्कृत अनुवाद.narayan_das_1st_page

जी शंकर कुरुप ने 1932 में मलयालम में रुबाइयों का अनुवाद किया.

1946 में ओमार खैय्याम नाम की एक हिन्दी फिल्म भी आयी थी. मुरली पिक्चर्स द्वारा निर्मित इस फिल्म में के.एल.सहगल,सुरैया,वस्ती और बैंजामिन शाकिर की प्रमुख भुमिकाऎं थी. इसके निर्देशक थे मोहन सिन्हा और इसमें संगीत दिया था इकबाल मोहम्मद ने. इसके एक गाने के बोल मुझे बहुत पसंद हैं जो इस प्रकार हैं.

बेदर्द ज़रा सुन ले ग़रीबों की कहानी
खाना तो है खाना इन्हें मिलता नही पानी

मालामाल के बिछौने पे है तू ऐश में खोया
हमसाया तेरा रात को पत्थर पे है सोया
तू ख़ुश है मुसलमानों को आराम कहाँ है
बतला मेरे हमदर्द इस्लाम कहाँ है
दोज़ख को भुला क्यों शोलाफ़शानी
बेदर्द ज़रा सुन ले … 
——————————-

बीमार ग़रीबों के लिए बन के भिखारी
ऎ भाइयों आए हैं खिदमत में तुम्हारी
है कार-ए-सबब आँख अगर रहम की खोली
दाता भला हो भर दे फ़क़ीरों की झोली
इस शाम से पैदा करो सुबह सुहानी
बेदर्द ज़रा सुन ले … 

इस गाने को  सुरैया ने गाया था.

अन्य भाषाओं में भी उमर पर बहुत फिल्में बनी पर उन पर चर्चा इस लेख का हिस्सा नहीं है. कई चित्रकारों ने उमर की रुबाइयों पर अनेक पेंटिग्स भी बनायी. अंग्रेजी की अनेक किताबें नामी गिरामी चित्रकारों की पेंटिग्स के साथ छ्पी.   RubaiyatDula

Dulac2

 

ऊपर जो दो चित्र आप देख रहे हैं वो एडमंड डुलाक के चित्रों से भरपूर अंग्रेजी अनुवाद है. ये पुस्तक 1915 के आसपास प्रकाशित हुई थी. यह संस्करण अब तक का सबसे मंहगा और विशिष्ट संस्करण माना जाता है.

अगले अंक में चर्चा करेंगे मैथिलीशरण गुप्त और रघुवंश गुप्त के हिन्दी अनुवादों की…..

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों से बतायें…

क्रमश:…………………………

श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला..

2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..

3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, निशा निमंत्रण, पंकज उधास, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan

 

मधुशाला के निर्धारित क्रम को तोड़ते हुए आइये एक चर्चा करे पिछ्ले लेखों में हुई टिप्पणीयों पर.कुछ बहुत ही अच्छी टिप्पणीयां आयी जिंन्होने सोचने पर भी बाध्य किया और आगे लिखने के लिये प्रेरित भी. सबसे पहले राकेश जी का धन्यवाद जिन्होने डिजिटल लाइब्रेरी का पता बताया और मैं मैथिलीशरण गुप्त जी की पुस्तक को खोज सका. इसके कुछ अंश भी इस लेख में शामिल किये जायेंगे. तो शुरु करें चर्चा.

पहली पोस्ट पर अनिल रघुराज जी ने टिप्पणी की.

हमारे बच्चन साहब पूरी तरह खय्याम (तंबू बनाने वाले) थे और आठ सौ साल पुरानी रुबाइयों को पैबंद लगाकर पेश कर दिया?

अनिल जी खैयाम ने सबको तंबू (खेमा) बनाने वाला बना दिया और ना जाने कितने लोगों ने अपने अपने हिसाब से तंबू बनाये.एक जानकारी और देता चलूं.जैसे अपने देश में बहुत से शायर अपने नाम के आगे अपने शहर का नाम जोड़ लेते हैं वैसे ही फारसी कवि अपने काम के हिसाब से अपना उपनाम रख लेते थे जैसे अत्तार: इत्र बेचने वाला;अस्सार:तेल बेचने वाला,हमगर:कपड़े रफू करने वाला इत्यादि.

आलोक पुराणिक जी भी अपनी पुरानी यादों के खजाने से निकाल के कुछ

लाये.

मुझे याद पड़ता है कि पंकज उदास ने सिर्फ उमर खैयाम पर केंद्रित दो कैसेटों का एक संग्रह निकाला था। बहुत बढ़िया था।

ये दो कैसेट का सैट ‘रुबाई’ नाम से आया था. जिसके गायक-संगीतकार ‘पंकज उधास’ थे. गीत ‘जमीर काज़मी’ के थे. कैसेट में ज़मीर के अलावा ‘उमर खैयाम’ का नाम भी बतौर गीतकार के रूप में था.एक गीत के बोल कुछ इस तरह थे.

खोते न हों जो होश उन्हें घर बुला के पी pankaj-udhas-rybayee
या फिर बुतों को सामने, अपने बिठा के पी
बेहद ना पी, ना बोल बहुत, जोश में न आ
रुक रुक के पी, सुकून से पी, सर झुका के पी

दौलत है फ़क़त चार दिनों की पी ले
इज़्ज़त है फ़क़त चार दिनों की पी ले
है वक़्त शब-ओ-रोज़ तबाही की तरफ़
मोहलत है फ़क़त चार दिनों की पी ले

चलो पी लें के यार आये न आये
ये मौसम बार बार, आये न आये

गुलाबों की तरह तुम ताज़ा रहना
ज़माने में बहार आये न आये

ये सोचा है कि उसको भूल जायें
अब इस दिल को क़रार आये न आये

“ज़मीर” इस ज़िन्दगी से क्यूं ख़फ़ा हो
इसे फिर तुमपे प्यार आये न आये

ये दो कैसेटों का सैट शायद 1990 में आया था. जहां तक मुझे याद पड़ता है ये उस समय के हिसाब से काफी मंहगा था तकरीबन 45 रुपये का था. 

संजय पटेल ने कहा.

उमर ख़ैयाम के अलावा बच्चन जी की प्रथम पत्नी श्यामा के असामयिक निधन का दर्द भी शामिल है मधुशाला में.इसका ज़िक्र बच्चनजी की आत्मकथा क्या भूलूँ क्या याद करूँ में भी आया है.यदि मन्ना डे स्वरांकित और जयदेव द्वारा स्वरबध्द एलबम मधुशाला को सुना जाए तो उसके दूसरे भाग (जो शुरू हो तो है इस पंक्ति से..छोटे से जीवन में कितना प्यार करूँ,पी लूँ हाला,आने के ही साथ जगत में कहलाया जानेवाला)में भी युवावस्था में विदुर हुए बच्चन जी की पीड़ा सुनी जा सकती है.इसमें कोई शक नहीं कि मधुशाला पूरी तरह उमर ख़ैयाम की भावधारा से अनुप्राणित है लेकिन उसमें बच्चनजी जैसे वरिष्ठ काव्य हस्ताक्षर का कारनामा भी मौजूद है.

बहुत से लोगों का ये मानना  है कि मधुशाला में बच्चन जी की पत्नी श्यामा जी के निधन का दर्द भी शामिल था.लेकिन यह पूरी तरह गलत है. बच्चन जी ने मधुशाला की रचना 1933 में की थी. यह पुस्तक 1935 में प्रकाशित हो गयी थी. श्यामा जी की मृत्यू 1936 में हुई थी. अपनी पुस्तक निशा निमंत्रण की भूमिका में बच्चन ने इस बारे में विस्तार से लिखा है. लीजिये प्रस्तुत है कुछ अंश.

‘रुबाइयात उमर खैयाम’ से मेरा परिचय तो पुराना था पर अब वह मेरी परम प्रिय पुस्तक हो गई थी। रात को मेरे तकिए के नीचे रहती, दिन को मेरी जेब में। अपने ऊपर खैयाम के प्रभाव को मैंने इन पंक्तियों में स्वीकार किया है :

तुम्हारी मदिरा से अभिषिक्त
हुए थे जिस दिन मेरे प्राण
उसी दिन मेरे मुख की बात
हुई थी अंतरतम की तान

(आरती और अंगारे)

मैंने ‘रुबाइयात उमर खैयाम’ का अनुवाद कर डाला। खैयाम की दुनिया की रंगीनी ने मुझे इतना मोह लिया कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए भी मुझे सबसे उपयुक्त प्रतीक वे ही जान पड़े जिनकी ओर खैयाम ने संकेत किया था-हाला, प्याला, मधुशाला और मधुबाला।
1933-’34 में मैंने ‘मधुशाला’ लिखी।
1934’35 में मैंने ‘मधुबाला’ लिखी।

हर तूफान मन्द पड़ता है, हर नशा उतरता है। मेरी भावनाओं ने तीव्रतम स्थिति छू ली थी। वहाँ पर ज्यादा देर टिका रहना असम्भव था। जीवन का पहिया घूम गया- nisha_nimantran

गिर-गिर टूटे घट-प्याले,
बुझ दीप गए सब क्षण में,
सब चले किए सिर नीचे
ले अरमानों की झोली।
गूँजी मदिरालय भर में
लो चलो-चलो की बोली।
(मधुबाला)

अब वे मेरे गान कहाँ हैं !
टूट गई मरकत की प्याली,
लुप्त हुई मदिरा की लाली,

मेरा व्याकुल मन बहलानेवाले अब सामान कहाँ हैं ?
(निशा-निमंत्रण)

और उल्लास की चोटी से अवसाद के गहर में गिरकर मैंने हलाहल मरघट’ और ‘अतीत का गीत’ की प्रतिध्वनि से अपने को व्यक्त करना चाहा। (‘हलाहल’    पुस्तक-रूप में प्रकाशित हो चुका है। ‘मरघट’ और ‘अतीत का गीत’ दीमकों की जूठन के रूप में मेरे कागज-पत्रों में कहीं पड़े हैं।)
नियति का व्यंग्य कि जब मधुशाला टूट चुकी है और मधु का प्याला फूट चुका तब मुझसे मधु के गीत लिखने की कैफियत माँगी जाने लगी और क्षय के रोग में पड़े हुए मैंने इस प्रकार उत्तर दिया :

एक दिन मैंने लिया था काल से कुछ श्वास का ऋण,
आज भी उसको चुकाता, ले रहा वह क्रूर गिन-गिन;
ब्याज में मुझसे उगाहा है हृदय का गान उसने,
किंतु होने में उऋण अब शेष केवल और दो दिन;
गिर पड़ूंगा तान चादर सर्वथा निश्चिंत होकर,
भूलकर जग ने किया किस-किस तरह अपमान मेरा।

क्या किया मैंने, नहीं जो कर चुका संसार अब तक ?
वृद्ध जग को क्यों अखरती है क्षणिक मेरी जवानी ?

हैं लिखे मधुगीत मैंने ही खड़े जीवन-समर में।

(मधुकलश)

लेकिन नियति का व्यंग्य अभी पूरा नहीं हुआ था। मरण की प्रतीक्षा में मैं था। जीवन के पार क्या होगा, इसकी चिन्ता मुझे थी-इस पार, प्रिये, मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा ?-पर नियति को तो मरण से भी अधिक भयंकर एकाकीपन मेरे जीवन में लाना था।

न झिझका औ’ न हुआ भयभीत
न भागा ही लेकर के प्राण,
दिखा जब मुझको आता काल
कफन का ले हाथों में थान;
बढ़ाया पट जब मेरी ओर,
उठा, तैयार हुआ तत्काल,
निकट जो मेरे थे वरदान
दिया, पर, उसने उन पर डाल।

(हलाहल)

मेरी पत्नी श्यामा बीमार हो गई और दो सौ सोलह दिन चारपाई पर पड़ी रहकर, हमारे बचाने के सारे उपायों को विफल कर, उस पार चली गई।

‘गुलहजारा’ कविता की इन पंक्तियों में,
मृत्यु शैया पर पड़े अति
रुग्ण की अंतिम हँसी-सी,
यत्न करके लिख रही है,
एक लघु कलिका निराली।

(मधुकलश)

उसी का एक चित्र है :
उठा करता था मन में प्रश्न
कि जाने क्या होगा उस पार

निवारण करने में संदेह
मजहबी पोथे थे बेकार
चले तुम, पूछा हैं ! किस ओर !
कहा बस तुमने एक जबान
तुम्हें थी जिसकी खोज-तलाश,
उसी का करने अनुसन्धान।

(हलाहल)

मेरा ‘इस पार-उस पार’ गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। शायद आज भी है, पर उसके पीछे जो दर्शन है, उसका अनुभव उन लोगों को नहीं होता जो मुझसे बार-बार इस गीत को सुनाने का अनुरोध करते हैं। कई लोगों ने इस कविता की पैरोडियाँ भी लिखी हैं। नियति ने मेरे साथ इतना बड़ा व्यंग्य किया था कि इन नटखट पैरोडियों पर दुखी होने के बजाय मैं मुस्करा दिया हूँ।

अन्त का इतना था विश्वास
विदा का लिख डाला था गीत,
कलेजे को हाथों से थाम
सुना करते थे मन के गीत;

गए थे वे तज मेरा साथ
मगर वह गीत लगा है संग,
ध्वनित हो बहु कण्ठों से आज,
किया करता है मुझ पर व्यंग्य।

(हलाहल)

1930 के अन्त से जो संघर्ष मेरे जीवन में आरम्भ हुआ था उस की चरम स्थिति 1936 के अन्त में श्यामा के देहावसान में पहुँची।

सत्य मिटा, सपना भी टूटा।

तो यह तो सत्य है कि मधुशाला में कवि का दर्द भी शामिल था लेकिन श्यामा जी तब तक जीवित थी पर बीमार थीं.सोचिये किन परिस्थितियों में हुई थी मधुशाला की रचना.

मैथिलीशरण जी की पुस्तक पढ़कर ज्ञान के नये द्वार खुल रहे हैं. शीघ्र ही हाजिर होता हूँ कुछ नया लेकर मधुशाला की अगली कड़ी में.

पसंद करने के लिये आप सभी का धन्यवाद.

पिछ्ली कडियां…….

1. खैयाम की मधुशाला..

2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..

 

 

पिछ्ले लेख में आपने उमर खैयाम और उनकी प्रसिद्ध रुबाईयों के बारे में जाना.अब आगे पढिये.

3. रुबाइयों के अंग्रेजी अनुवाद: उमर खैय्याम की रुबाइयों के कई अंग्रेजी अनुवाद हुए.लेकिन इन सभी अनुवादों में जो सर्वप्रमुख और सर्वप्रसिद्ध अनुवाद है वो है जॉन फिट्जराल्ड का. जॉन का पहला अनुवाद सन 1859 में आया उसके बाद इसी अनुवाद के कुल पांच संस्करण आये. पहला संस्करण  – 1859 ,दूसरा संस्करण  – 1868, तीसरा संस्करण  – 1872 , चौथा संस्करण  – 1879 और पांचवां संस्करण  – 1889 में आया. पहले चार संस्करण जॉन के जीवन काल में ही प्रकाशित हो गये थे. पांचवा संस्करण उनके मृत्युपरांत,उनके द्वारा छोड़ी गयी अधूरी पांडुलिपि से तैयार किया गया.

Rubaiyat अन्य प्रमुख अनुवादों में हैं एडवर्ड हैनरी विनफील्ड का अनुवाद जो उन्होने 1882-83 के दौरान अपना अनुवाद प्रकाशित किया. इसके अलावा भी रुबाइयों के कई अनुवाद हुए. इनके बारे में पूरी जानकारी आप अंग्रेजी में यहां देख सकते हैं.  

एक उदाहरण चार अनुवादों का देना चाहुंग़ा. ( इनमें से तीन किताबें मैने पुस्तकालय में पढ़ी है और कुछ पंक्तियां मेरी डायरी में नोट हैं उन्ही में से कुछ उदाहरण )

ये है फिट्जराल्ड की एक पंक्ति

Whether at Naishapur or Babylon,
Whether the Cup with sweet or bitter run,
The Wine of Life keeps oozing drop by drop,
The Leaves of Life keep falling one by one.

शायद उसी पंक्ति का अनुवाद एडवर्ड विनफील्ड द्वारा

When life is spent, what’s Balkh or Nishapore?
What sweet or bitter, when the cup runs o’er?
Come drink! full many a moon will wax and wane
In times to come, when we are here no more.

आर्थर टालबोट जिनकी किताब 1908 में प्रकाशित हुई. उसी पंक्ति का अनुवाद.

Who cares for Balkh or Baghdad? Life is fleet;
And what though bitter be the cup, or sweet,
So it be full? This moon, when we are gone,
The circling months will day by day repeat.

रिचर्ड ब्रॉडी की किताब 2001 में आयी जिसे अभी तक किसी पुस्तकालय में खोज नहीं पाया.इस किताब की कुछ पंक्तियां नैट पर कभी मिली थीं.

If  People one safe happy Zenith know,
Or trapped by Hell with Woe in Terror be;
Ah, the bubbly River of our fleeting Weeks
Doth flow unceasing there into the Sea

आप देखंगे कि ब्रॉडी का छ्न्द विधान उमर के छंद की तरह नहीं है.बांकी तीनो ने उमर के छंद को ही रखा है.

4. रुबाइयों के हिन्दी अनुवाद.

अन्य भाषाओं की तरह हिन्दी में भी रुबाइयों के कई अनुवाद हुए. जिनमें कुछ अनुवाद बच्चन जी की मधुशाला के पहले के हैं और कुछ बाद के. बच्चन जी की मधुशाला 1935 में छ्पी थी.उस बारे में चर्चा बाद में.

हिन्दी में सबसे पहला अनुवाद शायद पंडित सूर्यनाथ तकरू द्वारा किया गया था. 1931 में पंडित गिरिधर शर्मा नवरत्न ने भी रुबाइयों का अनुवाद किया जो नवरत्न-सरस्वती भवन, झालरापाटन से छ्पा था. पंडित जी ने रुबाइयों का संस्कृत अनुवाद भी किया जो 1933 में छ्पा था. 

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने सन 1931 में उमरखैयाम की रुबाइयों का अनुवाद किया था. यह पुस्तक रुबाडयात उमर खय्याम के नाम से कानपुर के प्रकाश पुस्तकालय से प्रकाशित हुई थी.इस किताब को भी मैने ढूंढने की कोशिश की लेकिन नहीं मिली. कानपुर में माल रोड में पहले एक दुकान हुआ करती थी जहां हिन्दी की अधिकतर किताबें मिल जाया करती थी. वहां इस किताब के बारे में पता करने पर मालूम हुआ कि ये आउट ऑफ प्रिंट है लेकिन इसको जल्दी ही छपवाया जायेगा. ये बात आज से करीब 12-13 साल पहले की है. पता नहीं कि ये दुबारा छपी या नहीं.

1932 के आसपास पंडित केशव प्रसाद पाठक का हिन्दी अनुवाद आया.ये इंडियन प्रेस लिमिटेड जबलपुर से आया था. 1932 में ही पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र का अनुवाद प्रकाशित हुआ, जो मेहता पब्लिशिंग हाउस, सूत टोला, काशी से छ्पा था. हिन्दी साहित्य भंडार, पटना से 1933 में डॉक्टर गयाप्रसाद गुप्त का अनुवाद भी छ्पा.

इसके अलावा मुंशी इक़बाल वर्मा ‘सेहर’ ने रुबाइयों का अनुवाद किया जो इंडियन प्रेस,प्रयाग से छ्पा. ये अनुवाद मूल फारसी से किया गया था. लखनऊ के पं. ब्रजमोहन तिवारी के अनुवाद भी कुछ पत्रिकाओं में छ्पे थे. 1940 में अल्मोड़ा के तारा दत्त पांडे ने भी रुबाइयों का कुमांउनी में अनुवाद किया.बाद में चारु चन्द्र पांडे ने इस पुस्तक का कुमाउंनी से हिन्दी में अनुवाद किया. ये किताबे इस साल फिर से प्रकाशित की जानी है. प्रकाशित होते ही आपको इनके बारे में भी बताऊंगा.

1938 में श्रीयुत रघुवंश लाल गुप्त का अनुवाद,किताबिस्तान,प्रयाग से प्रकाशित हुआ.1939 में जोधपुर के श्रीयुत किशोरीरमण टंडन ने भी एक अनुवाद किया.पंडित जगदम्बा प्रसाद ‘हितैषी’ ने बहुत दिनों से रुबाइयात उमर खैयाम के ऊपर काम किया और उनकी पुस्तक का नाम शायद ‘मधुमन्दिर’ था.

1948 में भारती भंडार,प्रयाग द्वारा सुमित्रानंदन पंत का अनुवाद प्रकाशित हुआ. जो “मधुज्वाल” के नाम से प्रकाशित हुआ था. इस की विस्तृत चर्चा हम आगे करेंगे.  

क्रमश: ……

 

मधुशाला शब्द सुनते ही मस्तिष्क में एक ही नाम उभरता है और वो नाम है श्री हरिवंश राय बच्चन का. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बच्चन की मधुशाला मूलत: पारसी भाषा की रचना से प्रेरित है और मूल रचना का रचनाकाल बच्चन की मधुशाला से आठ सौ वर्ष पहले का है. जी हाँ! बच्चन की मधुशाला उमर खैयाम की रुबाइयों से प्रेरित है. उमर खैयाम की रुबाइयों के कई अनुवाद विभिन्न भाषाओं में हुए जिसमें हिन्दी में भी कई अनुवाद हुए.

मैं कई दिनों से मधुशाला पर एक विस्तृत लेख लिखने की योजना बना रहा था क्योकि मुझे भी मधुशाला का चस्का काफी पहले लग गया था लेकिन समयाभाव के कारण मामला टलता ही जा रहा था.अब सोचा कि लिख ही डालूँ और बैठ गया लिखने. हम इस लेख में उमर खैयाम के जमाने की बात से आधुनिक रूप में मधुशाला की बात करेंगे.कुछ प्रमुख अनुवादों की चर्चा भी हम इस लेख में करेंगे.

लेख का अनुक्रम कुछ ऎसा होगा.

1. उमर खैयाम का जीवन परिचय
2. उमर खैयाम की रुबाइयां(Rubaiyat of Omar Khayyam)
3. रुबाइयों के अंग्रेजी अनुवाद
4. रुबाइयों के हिन्दी अनुवाद
5. कुछ प्रमुख अनुवादों की चर्चा
6. मधुशाला और मधुज्वाल
7. कुछ अन्य अनुवाद
8. मधुशाला एक गेय रचना
9. मैं और मेरी मधुशाला

तो आज शुरु करते हैं पहला भाग.

1. उमर खैयाम का जीवन परिचय.

Umer1 उमर खैय्याम (कुछ लोग ओमार खैय्याम भी कहते हैं) का जन्म 18 मई 1048 को पर्शिया या फारस (जिसे अब ईरान कहा जाता है) में हुआ था.मूल जन्म स्थान निशापुर था जिसका जिक्र उनकी शायरी में कई बार आया है.उनका पूरा नाम ग़ियाद अल-दिन अबुह फतेह उमर इब्न अब्राहिम अल खय्यामी था.खय्याम का शाब्दिक अर्थ होता है “तंबू बनाने वाला” .

ज्ञान का तंबू सीकर के वो
कहलाया  खैय्याम.
जीवन दुख की भट्ठी में जल,
तप कर निखरा वो,  
पर जीवन रेखा को काट
भाग्य ने बेच दिया
आशा के हाथों उसे
बेदाम.

Khayyam, who stitched the tents of science,
Has fallen in grief’s furnace and been suddenly burned,
The shears of Fate have cut the tent ropes of his life,
And the broker of Hope has sold him for nothing!

खैय्याम केवल शायर ही नहीं थे वरन एक भौतिक विज्ञानी, गणितज्ञ,खगोलशास्त्री और दार्शनिक भी थे. उमर खैय्याम अपने जीवन में अधिकतर निशापुर और समरकंद में ही रहे हाँलाकि उनका बचपन का कुछ हिस्सा बाल्ख (अफगानिस्तान) में भी बीता.तत्कालीन राजनीतिक परिवेश का प्रभाव खैय्याम पर भी पड़ा. उनकी शिक्षा दीक्षा मोवाफ्फ़क निशापुरी के निर्देशन में हुई जो उस समय के जाने माने शिक्षकों में एक थे. 

उमर खैय्याम ने एक गणितज्ञ के रूप में बीजगणित के अनेक नये सिद्धांतों का प्रतिपादन किया.उन्होने कुछ पुस्तकें भी लिखी जिसमें उन्होने पास्कल और युक्लिड के सिद्धांतों को सरलीकृत किया. उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को यूरोप में खूब सराहा गया. बीजगणित के अलावा उन्होने ज्यामिति (geometry) में भी योगदान दिया.

अपने समय के अन्य गणितज्ञों की तरह उमर खैयाम भी खगोलविद्या में पारंगत थे. उन्हें तत्कालीन सम्राट ने अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर एक वेधशाला (Observatory ) बनाने को भी आमंत्रित किया था. उमर और उनके साथियों ने मिलकर उस समय एक सौर वर्ष की अवधि का निर्धारण भी किया था.जो काफी हद तक आज के मानक के करीब था.उन्होने तत्कालीन पारसी कैलेंडर में भी काफी सुधार किये.उनके द्वारा सुधारा गया कैलेंडर उस समय के सुल्तान मलिक शाह ने आधिकारिक कैलेंडर के रूप में स्वीकृत किया था.उमर द्वारा तैयार कैलेंडर ही आज के ईरानी कैलेंडर का आधार रहा है जो अभी भी ईरान और अफगानिस्तान में प्रयोग में लाया जाता है. 

एक शायर के रूप में उमर खैय्याम अपनी रुबाइयों से पहचाने गये. शायर के रूप में उन्हे इतनी पहचान मिली कि लोग भूल गये कि वे शायर के अलावा भी कुछ थे. उनके द्वारा रुबाइयों का अंग्रेजी में अनुवाद जान फिटजराल्ड अपनी बहुचर्चित पुस्तक “द रुबाइयत ऑफ उमर खैय्याम “ (The Rubáiyát of Omar Khayyám) में किया था. इस अनुवाद के अलावा अन्य अनुवादों की चर्चा भी हम इस लेख में करेंगे.

2. उमर खैयाम की रुबाइयां.

उमर खैय्याम ने अपनी रुबाइयां पारसी भाषा में लिखी थीं. अपनी काव्य रचनाऑं में उमर ने एक विशेष छंद का प्रयोग किया जो उमर खैय्याम की रुबाई के नाम से जाना जाता है. रुबाई मूलत: चार लाइन की कविता होती है (‘रुबाइयत’ ,’रुबाई’ का उर्दू में बहुवचन है अर्थात एक से अधिक रुबाई या रुबाइयां) .चार लाइन की कविता अनेक तुकों में हो सकती है पर उमर ने जिस तुकबंदी का प्रयोग किया है वह है सम-सम-विषम-सम. यानि पहली ,दूसरी और चौथी पंक्ति एक ही तुक पर समाप्त होनी चाहिये. इसी छंद का प्रयोग फ़िटजराल्ड ने अपनी अंग्रेजी अनुवाद में किया और बच्चन ने भी मधुशाला में यही छंद प्रयोग किया है.

And, as the Cock crew, those who stood before
The Tavern shouted-”Open then the Door!
“You know how little while we have to stay,
“And, once departed, may return no more.”

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला

उमर खैय्याम की रुबाइयां आपको सूफीज्म,जीवन की नश्वरता,रहस्यवाद की ओर ले जाती हैं.कुछ लोगों का मानना है कि उमर स्वय़ं भी सूफी परंपरा से प्रेरित थे.यह भी बहस का विषय रहा है कि उमर अपनी रुबाइयों के माध्यम से मदिरापान के समर्थन में बोलते हैं या विरोध में.

आगे की चर्चा अगले अंक में करेंगे….

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