May 172008
 

रंजना जी अक्सर मेरे ब्लॉग पर आती रहती हैं और अपनी लंबी टिप्पणीयों का आशीर्वाद हमें प्रदान करती रहती हैं. उनकी टिप्पणी पर बनी मेरी पोस्ट स्त्रियां क्या खुद से सवाल पूछती हैं? अब तक की मेरी सबसे हिट और बहसात्मक पोस्ट रही है. पिछ्ले हफ्ते उन्होने मेरी एक पोस्ट भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी क्यों नहीं है?? पर एक लंबी टिप्पणी की. आप भी पढ़ें.

एक लंबे अरसे बाद ब्लॉग पर आ पाई हूँ.जो विषय आपने उठाया है,हमेशा ही इस तरह मुझे सालता रहा है कि वर्तमान परिस्थिति देख मन बड़ा ही आहत होता है. आहत अंग्रेजी के दिनो-दिन बढ़ते प्रभाव को देखकर नही, बल्कि अपनी हिन्दी भाषा, जो आज भी अपने देश के एक बहुत बड़े भाग मे आमजनों की भाषा है,गाँवों और कस्बों मे प्रादेशिक भाषा के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है, दिनोदिन आज की पीढ़ी द्वारा उपेक्षित त्याज्य होती जा रही है.यह सही है की अंग्रेजी एक ऐसी भाषा है जो विश्व मे सर्वाधिक प्रचलित भाषा है,पर हमारे मातृभाषा का हमारे अपने देश मे जो निरादर बढ़ता जा रहा है,विश्व के और कोई भी देश अपनी मातृभाषा के प्रति यह रवैया नही रखते. हिन्दीभाषी क्षेत्र मे कुछेक सरकारी विद्यालयों को छोड़ हिन्दी माध्यम के स्कूल लुप्तप्राय होते जा रहे हैं.करें भी तो क्या आज गावों कस्बों मे भी गरीबी से मुहाल वो अभिभावक जो अपने बच्चों के शिक्षा के प्रति जागरूक है हिन्दी माध्यम से अपने बच्चों को पढ़वा पाने की हिम्मत नही जुटा पता. कारण सबको पता है जीविकोपार्जन का कोई माध्यम नही जहाँ की अनिवार्यता यह भाषा न हो गई हो.

किंतु समस्या भाषा मे नही समस्या वह सोच पैदा करती है जो अंग्रेजी भाषा को ही सभ्रान्तता का मानक मानती है.और हिन्दीभाषी को हेय दृष्टि से देखती है. भाषा की परिभाषा जो हमने पढी जानी वह यही थी कि ” भाषा अपने भावों को सामने वाले तक पहुँचाने का,अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है” और यह ऐसी ही होनी चाहिए जिसके माध्यम से हम अधिक से अधिक सुगमता और प्रभावी ढंग से सामने वाले तक अपने उदगार संप्रेषित कर पाएं.भाषा एक ऐसा जरिया है जिसके माधयम से हम सामने वाले के ह्रदय मे अपना स्थान बना सकते हैं.फ़िर यह चाहे अंग्रेजी,फ्रेंच,जर्मन,हिन्दी या और कोई भी भाषा हो.अंग्रेजी ही क्यों, देश विदेश के अधिक से अधिक जितने भाषाओं का ज्ञान हो उतना अच्छा है.इस बात से कोई असहमत नही हो सकता कि जो सम्बन्ध मातृभाषा के जरिये बन सकती है वह अन्य भाषा के जरिये नही.फ़िर बात तो आपसी सम्पर्क को सुदृढ़ बनाने की ही हुई न. इसमे यह उच्च निम्न की बात क्यों.

एक दिन मेरी एक सहेली बड़े ही गर्व से बता रही थी कि उसकी बेटी के अंग्रेजी माध्यम स्कूल मे अंग्रेजी बोलने पर जितना ध्यान दिया जाता है और जिस प्रकार से बच्चों को ट्रेंड किया जाता है,वह लाजवाब है.एक घटना उसने बताई कि,आज सुबह उसकी ६ वर्ष की बेटी की क्लास टीचर ने एक दूसरी छात्र को क्लास मे हिन्दी मे बात करने पर उसकी बेटी से उस छात्र की जमकर पिटाई करवाई.यही नही क्योंकि उसकी बेटी सबसे अच्छे ढंग से अंग्रेजी मे बात कर पाती है इसलिए उसे यह अधिकार दिया गया है कि कभी भी किसी सहपाठी को हिन्दी मे बात करते हुए सुने तो उसे पीट सकती है. घटना सुन मुझे इतना क्षोभ हुआ कि सहेली को लताडे बिना न रह पाई.एक नन्हें से कोमल मन को क्या संस्कार दिए गए?यही न कि पहले तो हिन्दी एक हीन भाषा है और उसके प्रति इस तरह अहिष्णु हुआ जा सकता है कि अपने सहपाठी या आस पास बोलने वाले को प्रताड़ना भी दी जा सकती है.

यह केवल एक घटना नही,एक पूरी कौम तैयार की जा रही है जो -सी ऐ टी कैट से शुरू होकर अंग्रेजी भाषा खान पान संस्कार को ओढ़कर जीना जीवन की अपरिहार्यता और सफलता के लिए आवश्यक सिद्ध करती है. योग्यता का मानक ही एक भाषा की बंधक हो चुकी है. तकलीफ उन बच्चों को देखकर होती है जो हर प्रकार से योग्य होते हुए भी केवल अंग्रेजी न लिख बोल पाने के कारण रोजी रोटी के दौड़ मे पिछड़ जाते हैं. आज की पढी लिखी सभ्रांत मानी जाने वाली युवा पीढ़ी ने केवल भाषा को ही नही बल्कि एक पूरे पश्चिमी सभ्यता,संस्कृति का ही अपने संस्कारों का त्याग कर अंगीकार,अंधानुकरण करने का बीडा उठा रखा है.यह कोई शुभ संकेत नही.बहुत बड़ी बात नही जब हिन्दी भी संस्कृत की तरह केवल एक किताबी भाषा बनकर रह जाए.

इतनी लंबी टिप्प्णी करने के लिये उनका धन्य्वाद. रंजना जी से मेरा अनुरोध है कि वह जल्दी ही अपना ब्लॉग बनायें और हमें नियमित अपने विचारों से परिचित करवाते रहें.

Jan 282008
 

नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ कवि/पत्रकार श्री मंगलेश डबराल जी ने हिन्दी ब्लॉग पर एक लेख लिखा. वो धन्यवाद के पात्र तो हैं ही कि उनकी नजरें इस नये बने अराजनैतिक, व्यक्तिगत, रूमानी, भावुक और अगंभीर माध्यम पर इनायत हुई लेकिन इन सबके ऊपर उन्होने हिन्दी ब्लॉगजगत पर जो आरोप लगाये हैं वो शायद इस हँसी-ठिठोली और खुशफहमी में कहीं दब ना जायें कि हिन्दी ब्लॉग के ऊपर नवभारत टाइम्स जैसे मुख्यधारा के अखवार ने संडे स्पेशल फोकस कर लिया इसलिये हम हाजिर हैं उस पर अपने विचार रखने के लिये.

उन्होने हिन्दी ब्लॉग बिरादरी के बारे में कहा कि इसमें “एक आपसी लगाव इसलिए भी दिखता है कि उनके आयोजक स्वाभाविक रूप से मिलते जुलते हैं”. इस बात से मैं इत्तेफाक नहीं रखता कि कि आपसी लगाव सिर्फ इसलिये है कि ब्लॉगर्स आपस में मिलते जुलते हैं. मेरे विचार से अभी तक सिर्फ दस – पन्द्रह प्रतिशत ब्लॉगर्स ही आपस में मिले होंगे. यह आपसी लगाव इसलिये कि हम एक दूसरे के लेखन में खुद को महसूस कर पाते हैं. हमारे दर्द,खुशी,प्यार,रिश्ते,सामाजिक सरोकार किन्ही दूसरों के लेखन में दिखायी पड़ते हैं.उन्हे हम अपने दिल के करीब मानते है.हम सहज भाव से ही बिना मिले ही वो रिश्ते जोड़ लेते हैं जो लोग बरसों साथ रहने से भी नहीं जोड़ पाते. इसीलिये इस ब्लॉग मे हमें कोई बड़ा भाई मिल जाता है,कोई अच्छा मित्र मिल जाता है तो कोई दीदी ,भाभी या बहन भी और कहीं हम सह-ब्लॉगर के सह अस्तित्व के साथ ही एक दूसरे से जुड़ जाते हैं.

मंगलेश जी को अमेरिकी इंडियन मूल के कवि एमानुएल ओर्तीज की एक अद्भुत कविता हिन्दी ब्लॉग जगत में नहीं मिली लेकिन यह मिल भी जाती तो भी ब्लॉग जगत कोई तीर ना मार चुका होता.ब्लॉग एक अभिव्यक्ति का माध्यम है.हिन्दी की भाषाई शुद्धताओं, नुक्ताचीनियों और सामाजिक क्रातियों के उलट इसमें एक सहज अभिव्यक्ति है जो सीधे दिल को छूती है.यह ब्लॉगर्स भाषा व जबान के मामले में शायद इतने माहिर ना हो जितने हिन्दी भाषा जगत के महोपाध्याय लेकिन इनके दर्द और ग़म भी वैसे ही हैं जितने अमेरिकी इंडियन मूल के कवि एमानुएल ओर्तीज के.ये और बात है कि ओर्तीज का नाम कुछ चंद पढ़े लिखे, भाषाई महापंडित, बुद्धिजीवी वर्ग के ब्लॉगर्स के अलावा शायद ही किसी ने सुना हो. हमारी भाषा इतनी अच्छी होती तो हम यह बिना पैसे का ब्लॉग खोल के लिखने क्यों बैठते किसी पत्रिका या समाचार पत्र में छ्प छ्पाकर कुछ पत्र-पुष्प ही बना रहे होते.

हिन्दी साहित्य का नुकसान उन्ही लोगों ने किया है जिन्होने अभिव्यक्ति को भाषाई व्याकरण के इतने कड़े नियमों में बांध कर रख दिया कि वो आम आदमी से दूर होती चली गयी.प्रेमचन्द अभी भी अपने से इसलिये लगते हैं क्योकि वो समझ में आते हैं. हम रोना रोते हैं हिन्दी का पाठक कहाँ है?, हिन्दी में किताबें बिकती क्यों नहीं?, लोगों की रुचि साहित्य में कम क्यों हो रही है?.यह दोष पाठकों का नहीं वरन उन चंद साहित्यकारों का है जिन्होने भाषा के ऎसे किले बनाये जिनके भीतर पहुंचकर वो खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें और नये आने वाले व्यक्तियों को उन किलों को फतह करने के लिये ऎसी कड़ी परीक्षाओं से गुजरना पड़े कि वो पहुंचने से पहले ही टें बोल जाये.इसी लिये हिन्दी साहित्य गुटबाजियों, पुरुस्कार राजनीतियों और चारण-भाटों का अड्डा बन गयी है. हम चितित है हिन्दी के लिये लेकिन नियमों में ढील नहीं देंगे.

[यहाँ पर इतना और बता दूँ कि मैने स्वयं देखा है किस तरह बंगाल में लोग किताबों को खरीदते हैं.वहाँ कई छोटी पत्रिकाऎं छ्पती है जो नये नये कवियों को अवसर देती हैं. बंगला में, हिन्दी की तरह बोलने व लिखने की भाषा में अंतर नहीं है.बंगला या मराठी के लोग किताबों के ना बिकने का रोना नहीं रोते.]  

हिन्दी ब्लॉग इन्ही सब नियमालियों से निज़ात दिलाकर एक सहज,सरल,मोहक,ग्राह्य अभिव्यक्ति को सामने लाता है. वह अभिव्यक्ति जिसको किसी संपादक की कैंची से बचकर नहीं गुजरना पड़ता. जिसके लिये आपको किसी की चरण वन्दना नहीं करनी पड़ती किसी गुट का सदस्य नहीं होना होता.यह रामचन्द्र शुक्लों,द्विवेदियों की किसी युग परिभाषाओं से दूर है.यहाँ मन की बात है, खुद के अनुभव और आम बोलचाल की भाषा है. शेरदा ‘अनपढ़” , बाबा नागार्जुन या भिखारी ठाकुर इन्ही जैसों के बीच ही तो हैं.

एक ब्लॉगर क्यों लिखता हैं?आज हर ब्लॉगर एक साहित्यकार, मँजा हुआ लेखक या पत्रकार नहीं है.बहुतों के पास लिखने की कोई मजबूरी भी नहीं है.वो अच्छी तरह से कमा खा रहे हैं. लेकिन अन्दर ही अन्दर एक बेचेनी है.. खुद को अभिव्यक्त करने की…. अपने उमड़ते,घुमड़ते विचारों को भाषा का -फटा-पुराना ही सही- जामा पहनाकर ब्लॉग रूपी उपवन में सजाने की. इस सार्थक (?) प्रयास को सिरे से नकार देना शायद सही नहीं. यदि एक ब्लॉगर तरह तरह की तकनीकी, भाषाई व साहित्यिक अज्ञान की तमाम अड़चनों के बाद भी अपने व अपने आसपास के अनुभवों के बारे में लिख रहा है तो हमें इसका स्वागत करना चाहिये.

मुझे लगता है अंतर्जाल पर हिन्दी को अपना वर्चस्व स्थापित करने से पूर्व कई पड़ावों से गुजरना है. कई तरह की तकनीकी दिक्कतें हैं जो धीरे धीरे दूर हो रही हैं. जैसे जैसे कंप्यूटरों का उपयोग आम प्रचलन में आने लगेगा अपनी बात को दूसरों तक पहुचाने की ललक कई लोगों को ब्लॉगजगत से जोड़ेगी.वह अभिव्यक्ति के विस्फोट का दिन होगा. हिन्दी के वर्चस्व का दिन होगा. हमें उस दिन की प्रतीक्षा करनी होगी. हम मुख्य मीडिया से ज्यादा जिम्मेदार भी बनेंगे लेकिन अभी तो हमारा शैशव काल है अभी तो हमें ‘ब्लॉग-ब्लॉग’ खेलने तक ही सीमित रहने दें मंगलेश जी.

एक कविता मंगलेश जी के लिये.

‘काफल’ जब पकेंगे
तो लूण-तेल में मिला के खा लेंगे
और जोका ना लग जाये इसलिये
‘पानी’ भी ना पियेंगे
तब तक ‘हम जो देखते हैं’
हमें देखने दें
और ‘पहाड़ पर टंगी लालटेन
दिखाती रहे ‘घर का रास्ता’

Jan 262008
 

वैसे तो टिप्पणीकार टिप्पणीचर्चा करते ही हैं लेकिन अपने ब्लॉग के लिये यह काम हमने ही शुरु कर दिया है.कई बार किसी भी ब्लॉग पर बहुत अच्छी टिप्पणीयाँ आती हैं… कभी कभी कई अच्छी टिप्पणीयाँ दब जाती हैं उनको भी लोगों तक पहुचाना मुझे जरूरी लगता है. इसलिये सोचा कि अब अपने ब्लॉग पर आयी कुछ सार्वजनिक महत्व की टिप्पणीयों की चर्चा यहीं शुरु कर दूँ..वैसे पहले भी करता रहा हूँ

आलोक जी ने मेरी एक पोस्ट पर कहा

” लेखकीय पहचान एक्सचेंज आफर से मिलती है। जो आपको अच्छा लेखक ना माने, उसे लेखक तक मानने से इनकार दीजिये।”

आजकल ब्लॉग में स्त्री-विमर्श खूब चल रहा है. मेरी एक पोस्ट में तो सारे रिकॉर्ड ही टूट गये. यह अभी भी जारी है.

मैने एक टिप्पणी पोस्ट बनायी थी जिस पर विस्तृत टिप्पणीयाँ आयीं. उसी से संबंधित एक पोस्ट में स्वप्नदर्शी जी ने कहा

“बहस का कोइ अंत नही है, और ये समस्या बहस से सुलझने वाली भी नही है. [ये समस्या] सिर्फ और सिर्फ व्यवहार और अनुभूतियों से ही सुलझेंगी. खासकर किसी भी समाज की असभ्यता का सबसे ज्यादा शिकार इसके सबसे कमज़ोर वर्ग ही होते है, जैसे औरते, बच्चे, बूढे. जिस तरह का विमर्श यहां देखने को मिला, मुझे बहुत शर्म है अपने भारत पर, इसके बाशिन्दो पर. और अगर वाकई सभ्य समाज बनाना है तो सभ्यता इसी में है कि सबको समान अवसर दिया जाय, एक इंसान के बतौर. स्त्री विमर्श को छोड भी दिया जाय, तो बूढो कि स्थिति, अपाहिज लोगों के लिये सार्वजनिक जीवन में इससे भी कम जगह है. किस शहर की बसें, यायायात के साधन,ऑफिस, और तमाम दूसरी सार्वजनिक जगह हैं, जहां, स्वभिमान के साथ ये लोग जा सकते है? शिरकत कर सकते है?

य़े टकराव का ज़माना है, समस्या का सीधा समाधान और नैतिक और राजनैतिक दृष्टि के अभाव में, सवर्ण-दलित, अगडे-पिछड़े, औरत-मर्द, जवान-बूढे, क्षेत्रियता, धर्म, सभी की वाट लगने वाली है.

ये मन की ग़ांठें है, इतनी आसानी से नही खुलेंगी……….

एक मरतबा, एक जमीन्दार रशूख वाले साहब, होस्टल में पढने गये, और टोयलेट का फ्लश चलाना उन्हे अपनी शान के खिलाफ लगा. इस काम को उन्होने, भंगी का काम माना. पर होस्टल मे कौन था जो उनका भंगी बनता? अंत मे उनकी पेशी हुयी, और फिर उन्होने अपनी गन्द साफ करनी सीखी.

इसीलिये, जिनके दिमाग मे गन्द भरी है, फ्लश उन्ही को चलाना पड़ेगा. नही तो उसकी गन्द से सबसे पहले उनके आसपास वाले, परिवार वाले बीमार होंगे, उनके अपनो को सबसे ज्यादा तकलीफ होगी. बाकी छ अरब लोगों के साथ किसी भी औरत का सिर्फ, माँ, बहन, प्रेमिका या पत्नी का समबन्ध नही हो सकता और इस परिधी मे दुनिया के अधिकांश लोगो को क्या उसके अपमान का लायसेंस मिला हुआ है?

लेकिन कुछ लोग इससे सहमत नहीं भी हैं. डॉक्टर अमर कुमार ने कहा

बहुत खूब,
ऎसा कतई नहीं है कि मैं प्रभुसत्तावादी हूं, या कि पुरातन विचारों का हूं किंतु हम
क्यों नहीं स्वीकार कर पाते कि पुरुष और नारी का संबन्ध अधुनातन काल से ही
वृक्ष और लता का सा रहा है । बराबरी का अधिकार ? यह किंन्ही निहितार्थ के
चलते कुछ पुरुषों द्वारा ही गढ़ा गया है , और अबला अब बला की बला बन बैठी है।
चित्त और पट्ट दोंनों ही हथियाने की जुगत है, यह स्वांग

इसी विषय पर प्रत्यक्षा जी की गुस्से वाली यह पोस्ट पढ़ना ना भूलें.

चलिये अब विषयांतर….

मेरे संकल्पों को लेकर आलोक जी ने एक अच्छी बात कही कि “अनुशासित सिर्फ कंप्यूटर होते हैं या कुत्ते। हम रचनाधर्मी लोग हैं। अनंत के साधक हैं, यूं तुच्छ संकल्पों की सीमाओं में अपने पुरुषार्थ को ना बांधिये।”. उनसे पूरी सहमति और इतना अनुशासन है भी नहीं अपन में…….लेकिन फिर भी इस ब्लॉग के पाठको के लिये राह आसान हो इसका प्रबन्ध कर रहा हूँ.

शास्त्री जी समय समय पर विषय आधारित चिट्ठों की वकालत करते रहते हैं. अब अपने से कोई दस ब्लॉग तो मैंटेन हो नहीं पायेंगे इसलिये फिलहाल के लिये दिनों के हिसाब से इस ब्लॉग को विभिन्न भागों में बांटने का प्रयास कर रहा हूँ.

सोमवार : समसामयिक/व्यंग्य/पॉडकास्ट

मंगलवार: समसामयिक/व्य़ंग्य/मौज

बुधवार : पहाड़ी नराई

गुरुवार : मधुशाला या उस जैसी ही कोई श्रंखला

शुक्रवार : खोया पानी

शनिवार : टिप्पणी चर्चा/ पाठकों के जबाब/ब्लॉग संबंधी

रविवार : खोया पानी

ये सभी पोस्ट सुबह आठ बजे से पहले प्रकाशित कर दी जायेंगी. इसके अतिरिक्त यदि कभी कोई अन्य विषय हुआ तो उसे अलग से दिन के किसी भी समय प्रकाशित कर दिया जायेगा. आशा करता हूँ कि इससे पाठको को सुविधा होगी और वो अपने हिसाब से इस ब्लॉग को पढ़ सकेंगे.

आपके कोई सुझाव हों तो जरूर बताइयेगा…..

Jan 202008
 

हिन्दी चिट्ठाजगत चोरी की घटनाऎं बीच बीच में सामने आती रहती हैं. कॉपीराइट का प्रश्न भी यदा-कदा उठता ही रहता है. अभी कुछ दिनों पहले टिप्पणीकार की किसी पोस्ट पर भी टिप्पणीयों पर कॉपीराइट की चर्चा हुई थी. इसलिये हमने सोचा कि इस यक्ष प्रश्न को फिर से उठाया जाय.

मेरी एक पोस्ट पर किसी बहन जी ने एक लंबी टिप्पणी की थी.जिसे मैने एक पोस्ट के रूप में आपके सामने रखा. हाँलाकि मुझे शक था कि यह कहीं ना कहीं से कॉपी की गयी है और इसका जिक्र भी मैने अपनी पोस्ट में किया था. इसी पोस्ट के बारे में रचना जी ने बताया कि यह यहाँ से कॉपी की गयी है. अब मानिये कि उस समीक्षा की मूल लेखिका या लेखक कल को मेरे को कॉपीराइट के अंतर्गत चार्ज करे कि मैने उसके कंटेंट की चोरी की है तो मैं क्या जबाब दूँ??

इस तरह से तो कोई भी छ्द्म नाम से कुछ भी कॉपीराइट कंटेंट किसी टिप्पणी में डाल सकता है. इस प्रकार की घटना में कॉपीराइट की चोरी का इल्जाम किस पर लगना चाहिये..क्या चिट्ठाकार पर जिसके चिट्ठे पर वह टिप्पणी है या उस अनाम पर जिसका कोई पता ही नहीं है..सिवाय आई.पी. ऎड्रेस के.

क्या मेरे को वह पोस्ट और वह टिप्पणी हटा देनी चाहिये? कृपया सुझायें.

Jan 192008
 

मेरी टिप्पणी वाली पोस्ट पर विस्तृत टिप्पणीयाँ थमने का नाम ही नहीं ले रही. कल जब सोच रहा था कि शायद अब यह सिलसिला थम गया होगा तो आज सुबह देखा एक और बड़ी टिप्पणी आयी. यह टिप्पणी क्या ..यह तो किसी पोस्ट से भी बड़ी है. यह भी छ्द्म नाम से की गयी है ….किन्ही बहन जी द्वारा.यहाँ पर यह बता दूँ कि यह बहन जी एक टिप्पणी पहले भी कर चुकी हैं… जिसमें इन्होने रंजना जी के लिये अपशब्द कहे थे. इसलिये वो टिप्पणी मैने सार्वजनिक नहीं की. वैसे आज की टिप्पणी कहीं से कॉपी की हुई लगती है… लेकिन है अच्छी इसलिये आप भी पढिये.

[ बाद में जोड़ा गया: रचना जी ने बताया कि यह टिप्पणी यहाँ से चुरायी गयी है. इस लेख पर अधिकार मूल लेखक/लेखिका के हैं. पूरी समीक्षा आप यहाँ क्लिक कर पढ़ें ]

मिथिलेश वामनकर अपनी समीक्षा में क्या कहते हैं. यह आपको पढ़ना चाहिए.

यह रेखांकित करने लायक बात है कि अब स्त्री अपने जीवन के असंख्य क्लेशों का इतिहास अपनी ही जुबानी बताने को तत्पर है। एक जद के साथ उसे यह घोषित करना पड रहा है कि इतनी बडी दुनिया में उसकी अनुभूतियों को कोई स्थान नहीं मिल पा रहा है। महादेवी वर्मा ने लिखा है –

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
मैं नीर भरी दुःख की बदली –

दूसरी ओर प्रसिद्ध नारीवादी लेखिका वर्जीनिया वुल्फ को जब इंग्लैण्ड के विश्वविद्यालय में उद्बोधन के लिये आमंत्रित किया गया तो उन्होंने कहा ‘मैं पहले अपने कमरे के विषय में बोलना चाहती हूँ।’ श्रोताओं की शंका का समाधान करते हुए फिर उन्होंने बताया कि इसका महिला लेखन से गहरा सम्बन्ध है क्योंकि कोई जगह होनी चाहिए जहाँ वे बैठ कर अपनी मानसिक दुनिया के सुख-दुःख और संघर्षों पर अपने आपसे विमर्श कर सके।’ दो बडी लेखिकाओं की यह पीडा दर्शाती है कि स्त्री होने के कारण ही उनकी कुछ अनसुलझी गुत्थियाँ थीं जो सभ्य समाज पर सबसे बडा प्रश्नचिह्न लगाती हैं। किसी सभ्य समाज के विकास की प्रक्रिया में स्त्री को अलग-थलग ही नहीं बल्कि ‘हेय’ माने जाने के कुछ और भी उदाहरण मिलते हैं जैसे क्यूसीडायडीज की सम्मति थी कि ‘जिस प्रकार किसी सभ्य स्त्री का शरीर उसके मकान के अन्दर बन्द रहता है वैसे ही उसका नाम भी बंद रहना चाहिए।’ सुकरात यह मानते थे कि नारी सभी बुराइयों का मूल है, उसका प्यार पुरुषों की घृणा से अधिक भयावह है। अरस्तु के अनुसार ‘नारी की तुलना में पुरुष स्वभावतः श्रेष्ठ होता है क्योंकि नारी इच्छा शक्ति में निर्बल, नैतिकता में शिथिल और विचार-विमर्श में अपरिपक्व होती है।’

‘मनु’ के अनुसार तो स्त्री के लिये पति सेवा ही गुरुकुल में वास और गृहकार्य अग्नि होम है -

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरै पुत्रा न स्त्री स्वतन्भ्यमर्हति ।

इस तरह सारे विधि, शास्त्र और व्यवस्था में स्त्री अपनी देह की ही ‘अनधिकारिणी’ होती है जैसे वह देह उसकी नहीं किसी एक व्यवस्था की है, जिसका संचालन पुरुष प्रधान समाज के हाथों में है। स्त्रियाँ स्वयं भी यह अनुभव करती हैं और स्त्री विमर्श में भी यह चिन्ताएँ सामने आई हैं कि स्त्रियाँ दुनिया को अपनी नहीं पुरुष की आँखों से समझना और भोगना चाहती हैं। वे स्त्रियाँ जो पुरुष की ‘अनुकम्पा’ पर जीवन बसर करना अपनी ‘नियति’ मानकर स्वीकार कर चुकी हैं, उनकी ‘गिरवी’ रखी हुई आत्माओं पर किसी प्रकार का बोझ नहीं है। संकट उन प्रश्नाकुल स्त्रियों का है जो अपनी तयशुदा भूमिका और निर्धारित प्रायोजित और आदेशात्मक शब्दावली से आहत और अघायी हुई हैं। उनकी दिक्कत यह है कि वे अपने आपसे प्रश्न पूछने लगी हैं ‘ जैसे कि स्त्री के जन्म से मृत्यु तक के मसले ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच क्यों तैरते हैं ‘ क्यों लडका ‘चिरंजीवी’ और लडकी ‘सौभाग्यकांक्षिणी’ कहलाती हैं। सौभाग्यवती होकर जीना यदि स्त्री की पहली खुशी है तो वह सौभाग्य भी उसे सही अर्थों में प्राप्त क्यों नहीं है ‘ ऐसी ‘सौभाग्यशाली’ को दहेज के कारण जला देना ‘गलत’ नहीं है ‘ क्या यह ‘सही’ है कि स्त्री को बुद्धिमान न माना जाए ‘ ‘देह’ से शुरू होकर ‘देह’ पर ही उसकी इति मान ली जाए ‘ यह सारा झगडा अन्तहीन भी इन्हीं कारणों से बना हुआ है कि कुछ तो स्त्री जीवन का इतिहास और वर्तमान विडम्बनाओं और अन्तर्विरोधों से भरा है, दूसरा पुरुष प्रधान समाज का सोच भी संकीर्णताओं से घिरा हुआ है। पता ही नहीं चला कि कब स्त्री को व्रत, अनुष्ठान,श्रंगार-सिन्दूर, पायल, बिछिया, बिन्दी, चूडी और मेहन्दी रंगे हाथों में बाँधकर उसकी देह पर कब्जा कर लिया गया। फिर मोहाविष्ट होकर स्त्री ने इसी खेल को अपना ‘सौभाग्य’ मान लिया। भोग्या बनकर वह स्वयं से प्रश्न पूछने से भी डरने लगी। कभी यह पूछने का साहस ही नहीं जुटा पायी कि ‘क्या मेरी संवेदनाओं, मेरी इच्छाओं, मेरी बुद्धि का किसी को पता चला ‘ क्या मैं भी अपने मन में बसी हजारों हजार इच्छाओं में किसी एक ‘इच्छा’ को व्यक्त करूँ ‘ क्या ‘मैं’ अपनी ‘सरीखी’ संरचना को जन्म दूँ ‘

सारे विमर्श के केन्द्र में मुख्य चिन्ता यही है कि ‘आखर स्त्री का वजूद, उसका अस्तित्व क्या है ‘ क्या कोई रास्ता है जिस पर वह आजादी से चल सके ‘

स्त्रियों के संघर्ष, उनके उत्पीडन, उनकी छटपटाहट से साहित्य जगत् में भी हलचल होती रही है। इसकी पहली अनुगूँज (कहानी में) बंग महिला (राजेन्द्र बालाघोष) की ‘कुम्भ में छोटी बहू’ और ‘दुलाईवाली’ कहानी में सुनाई देती है। इस प्रकार के लेखन की सबसे बडी विशेषता तो यही थी कि लेखिकाओं ने समाज के शक्ति केन्द्रों पर निशाना साधा था। यह सच उतना ही पारदर्शी है जितने में स्त्री अपनी भाषा और अपने भोगे हुए यथार्थ को अपनी रचनाओं में व्यक्त करे, गोया रचना को ही ‘आइना’ बना ले। लेखिकाओं ने अपनी रचनाओं में जिस स्वानुभूत सच्चाइयों को उजागर किया वे कुछ ज्वलन्त प्रश्नों को जन्म देती हैं। इस संदर्भ में महिला लेखन की परख करना जरूरी है क्योंकि इनके लेखन में स्त्री जीवन की चिन्ताएँ सामाजिक, आर्थिक, कानूनी और पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के मुद्दों के रूप में विश्लेषित हुई हैं। यह सच ही है कि महिला लेखन में लगातार कुछ नया और उद्वेलित करता हुआ सच उद्घाटित हो रहा है। सबसे बडी चिन्ता तो यही है कि सम्पूर्ण सामाजिक और पारिवारिक ढाँचे में स्त्री को जगह तलाश करना। एक बडी साजिश यह हुई है कि स्त्री के मन को उसकी देह से पृथक कर दिया गया है। एकबारगी देखने से ऐसा लगता है कि उसकी आत्मा को मारकर, सोच की शक्ति को कुचलकर केवल देह को ही केन्द्र में रखा गया है। स्त्री-देह के प्रति पुरुष वर्ग का यह षड्यन्त्र वोल्गा की ‘राजनैतिक कहानियाँ’ नाम के संग्रह में खुलकर सामने आया है। स्वयं लेखिका की स्वीकारोक्ति है कि ‘शरीर के शोषण से स्त्री को मानसिक रूप से दमित रखना, उसके व्यक्तित्व के विकास को रोककर उसके शरीर को नियंत्रित रखना एक गहरी राजनीति है जो पुरुष प्रधान समाजों के मूल्यों के साथ गुँथी हुई है। अपना निजी काम समझकर जिसमें स्त्रियाँ अपनी पूरी ऊर्जा उण्डेल देती हैं वे काम दरअसल उनके लिये नहीं होते।

समाज की धारणा है कि शरीर तथा मन दो अलग-अलग ईकाइयाँ हैं और वह अवसर के अनुसार कभी मन तो कभी शरीर को अहमियत देने लगता है। लेखिका का मानना है कि हम अपने शरीर से अलग नहीं हैं, अब इस बात को स्पष्ट रूप से कहना अनिवार्य है। वोल्गा ने पूरी संवेदनशीलता के साथ आँख, कान, नाक, बाल आदि यानी स्त्री को पूरी देह की क्षमताओं को पुरुष और स्त्री तथा स्त्री और परिवार के सम्बन्धों की कसौटी पर परखा है। वोल्गा ने अपनी सभी कहानियों में उन अनुभवों की हिस्सेदारी की है जो कटु और यथार्थ है। इस रूप में कि स्त्री शोषण का मुख्य आधार शारीरिक दृष्टि से ही अधिक है। संग्रह की पहली कहानी ‘सीता की चोटी’ पढकर ऐसा लगता है कि स्त्री को सभी काम सामाजिक दिखावे, रीति-रिवाजों के निर्वहन पति, बच्चों आदि के लिये करने पडते हैं। बालों की देखभाल, उनका लम्बा और सुन्दर होना, उनमें फूल लगाना, चोटी बनाना कब उचित और कब अनुचित हो जाता है, इसका निर्णय सीता के हाथ में कभी रहा ही नहीं। पति गुजरा नहीं कि सिर मुण्डवाने का दबाव पडता है। अगर बाल सँवारने का काम सीता स्वयं के आनन्द के लिये करती है तो पति की मृत्यु के बाद क्यों नहीं कर सकती ‘ जीवन के उत्तरकाल में जबकि बाल सफेद हो गए, झडने लगे तब उसे समझ में आने लगा कि अपने बालों पर ही उसका हक नहीं है तो फिर औरत की पूरी देह पर कितनी क्रूरता से औरों का हक जम जाता होगा ‘

‘आँखें’ कहानी में स्त्री स्वाधीनता के प्रश्न को उठाया गया है। लडकियाँ बचपन से ही समाज द्वारा बनाए गए साँचे में ढाल दी जाती हैं। लडकियों पर बहुत से निषेध थोप दिये जाते हैं। लडकी और लडके के भेद को इस कहानी में बडी सूक्ष्मता से दर्शाया गया है। किसी भी लडकी की आँखें कितनी भी सुन्दर और बडी क्यों न हो वह दुनिया नहीं देख सकती, उस पर पुरुष प्रधान परिवार के लाख पहरे हैं। जबकि राम अपनी छोटी-छोटी आँखों से दुनिया देख सकता है, खा सकता है, घूम सकता है, खेल सकता है। ‘लडकी’, ‘लडकी’ ही बनी रहे इसमें स्त्रियों की दासता जनित सोच भी जम्मेदार है। उसे माँ ने डाँटा ‘क्या इधर- उधर देखती रहती है। सर नीचा करके चलो। लडकी की निगाहें हमेशा नीची ही रहनी चाहिए।’ कथ्य में जो उद्वेलन है वह प्रश्नों के रूप में बार-बार कौंधता है जैसे ‘देखने के बाद कुछ तो करना चाहिये नहीं तो देखने का क्या फायदा’ देखने के पहले, देखने के बाद भी एक जैसा रहेंगे तो देखना ही क्यों ‘

महिलाएँ अपने दैहिक सौन्दर्य के प्रति कितनी सचेत हैं इससे भी अधिक चिन्ता उन लोगों को है जो स्त्री को केवल दैहिक आधारों पर परखते हैं। रमा की नाक ‘बेसरी’ कहानी में चर्चा का विषय है और प्रकारान्तर से लेखिका ने यह चिन्ता व्यक्त की है कि रमा के साथ जो हो रहा है वह गलत है। रमा की नाक का छेद और दाग सबको दिखाई देता है किन्तु कोई यह समझने को तैयार नहीं है कि वह कितनी शिक्षित है, उसके मन में इस बात की कितनी नाराजगी है कि ‘अब वैसा जमाना हो गया कि विवाह के लिये वर पक्ष वालों की इच्छानुसार वधुओं को अवयव बदलने पडेंगे। अब तक हर लडके वालों ने रमा की नाक के छेद पर टिप्पणी की तो पिता ने उसकी नाक की सर्जरी करवायी। फिर एक रिश्ता आया है। दहेज तय हो गया। वर पक्ष वाले खुश हैं। बस सत्यनारायण की एक ही इच्छा है कि लडकी की नाक में बेसरी हो। बेसरी पहनने के लिये फिर नाक में छेद करवाना। किन्तु रमा ने तय किया – ‘अब बिलकुल नाक में छेद नहीं करवाऊँगी। यह शादी रुक जाएगी तो रुकने दो।’ विडम्बना यह है कि पहले लडके वालों की आपत्ति हुई तो नाक का छेद बंद करवाया। अब फैशन है और लडका चाहता है लडकी नाक में बेसरी तो फिर से ……. ।

जानकी के दिमाग की सबसे बडी उलझन यही है कि क्यों उसे मुँह बन्द करने के लिये कहा जाता है जबकि उसके भाई जोर-जोर से चिल्लाते हैं। ‘मुँह बन्द करो’ कहानी स्त्री के दिमाग पर चोट करती है क्योंकि ‘शब्द मुँह से निकलते हैं पर उनका जन्म तो दिमाग से होता है।’

स्त्रियों में अपने शरीर और शरीर धर्मों के प्रति हीन भावना पैदा करने की जम्मेदारी पितृसत्तात्मक समाज की है। शिक्षक, नजदीक के रिश्तेदार, पति, पिता, भाई इन सभी के दुर्भावनापूर्ण व्यवहार से क्षुब्ध स्त्री को अपना जन्मना ही ‘पाप’ लगने लगता है। इस संकलन की ‘दीवारें’, ‘रक्षक’ ‘क्या करना चाहिए’ आदि कहानियों में महिलाओं की अवास्तविक जंदगी का दारुण दुःख व्यक्त हुआ है। पुरुष प्रधान समाज की इस राजनीति को समझना होगा कि परिवार में उनको विभाजित करके रखा जाता है। सास, ननद, बहू, जेठनी, देवरानी के झगडे करवाये जाते हैं। घर में वे मित्र नहीं शत्रु की तरह रहती हैं। लेखिका का इशारा इस ओर भी है कि स्त्रियों को इन कहानियों को पढकर अपने ‘भ्रम’ दूर कर लेने चाहिये। प्रेम, वात्सल्य, कर्त्तव्य और जम्मेदारी के नाम पर उसे ‘घर’ देकर पुरुष अपने राजनैतिक खेल खेलता है। यह राजनीति ‘घर’ और ‘सुरक्षा’ के नाम पर खेली जाती है जहाँ निरन्तर स्त्री के आत्मगौरव को ठेस पहुँचाती रहती है। ‘पत्थर के स्तन’ कहानी का टीचर और मामा, ‘एक राजनीतिक कहानी’ का पति, ‘आर्ति’ कहानी के माँ और पिता, ‘विवाह’ कहानी की सामाजिक परम्परा की अनिवार्यता आदि में स्त्री के विचार, भाषा, अनुभूति सब कुछ कुचलकर उसे स्त्री-गरिमा की कई सीढयों से नीचे धकेल दिया गया है। एक तथ्य इसमें अन्तर्निहित है और वह यह कि देह के भीतर बसे मन और बुद्धि में जो स्वतंत्रता और आत्मबोध का ज्ञान है वह पितृसत्ता को चुनौती देता है। देह के प्रति अनाधिकृत आकर्षण और फिर उस पर मनचाहा नियंत्रण, यही लोगों का मुख्य ध्येय है।

स्त्री और स्त्री समुदाय की दासता के कितने रूप समाज में बिखरे पडे हैं, उन पर भी ध्यान देने की जरूरत है। हम जब भी अपनी सुप्त चेतना को झकझोरते हैं तो इस सत्य को जान पाते हैं कि स्त्रियों से सम्बन्धित कई धार्मिक और सामाजिक विषय ऐसे हैं जिन्हें हम ‘प्रथा’ कहकर महत्त्व ही नहीं देते हैं। स्त्री समुदाय पर पूरा कब्जा बना रहे इसलिये उन्हें कई प्रकार की अतिवादी भावाकुलताओं से जोडे रखा जाता है। भारतीय समाज का अस्तित्व शायद ऐसी ही प्रथाओं के बलबूते पर बना रहता है। जया जादवानी की कहानी ‘जो भी यह कथा पढेगा’ भारतीय सांस्कृतिक जीवन के परम्परागत ढाँचे में हस्तक्षेप करती प्रतीत होती है। यह कहानी उन तमाम स्त्रियों के जीवन के उस पाखण्ड का पर्दाफाश करती है जो धर्म के नाम पर सदियों से चलता आ रहा है। व्रत, अनुष्ठान, पूजापाठ के कर्म विधानों से स्त्रियाँ वैसे ही जकडी हुई हैं फिर अब उनके व्यस्त कार्यक्रमों में सीरियल भी आ जुडे हैं। अब उन्हें दुनिया देखने की फुर्सत ही कहाँ है ‘ गहने, कपडे, सौन्दर्य प्रसाधनों से दबी ढँकी इन स्त्रियों को अपनी मुख्य समस्या का बोध ही नहीं है। औरतों और लडकियों ने ‘तीज’ का व्रत किया, अपने घर की उकताहट, झल्लाहट और रूटीन से हटने के लिये सामूहिक रूप से मंदिर गयीं। पूजा, कथा श्रवण सब कुछ की व्यवस्था है किन्तु वहाँ उन्होंने सुनने के सिवा मनचाहा सब कुछ किया। सुष्मिता सेन की बातें, फिर मन का कुछ न कर पाने की हताशा, चाँद निकलने का इन्तजार और इन सबके बीच यह अनुभूति कि व्रत की इन कहानियों में लहुलुहान औरतों की आत्माएँ हैं। सभी स्त्रियाँ धार्मिक पर्वों पर निरपेक्ष रहती हैं। उनकी आस्थाएँ ‘छूट’ लेना चाहती हैं, पानी न पीना हो तो दूध पीने का मन बनाना, खीर की जगह चाप्सी और चाउमीन खाना और घर में पति यानी शासक नहीं बल्कि पुरुष, ‘मानवीयता’ की तलाश करना, एक तरह से रूढयों के प्रति विद्रोह है। वे स्त्रियाँ जो व्रत करती हैं और वे जो बिना आस्था के व्रत करने को मजबूर हैं, उन्हें अब यह महसूस होने लगा है कि व्रतों की कहानियों में स्त्री की कमजोरियाँ दर्शायी जाती हैं। ‘सुहागन’ बने रहने में ही वे सुरक्षित अनुभव करती हैं। व्रतों की अतिवादी भंगिमा को तोडती यह कहानी जो भी पढेगा, जैसा कि शीर्षक भी है, वह इस सत्य से साक्षात्कार करेगा कि बहुत ही खूबसूरती से स्त्रियों के लिये ऐसी मर्यादाओं का घेरा बना दिया गया है जिसमें रहते-रहते स्त्री की क्षमताएँ चुकती जा रही हैं। हजारों वर्षों से स्त्रियों के आदर्श सीता और सावित्री ही रहे हैं। इन ‘मिथकों’ के सहारे ही शेष जीवन बिताने की चाह रखना कितना खतरनाक है। एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह भी है कि जिनके लिये स्त्री व्रत करती है, भूखी-प्यासी, थकी-क्लांत रहती है, क्या वह उससे प्रेम करता है और क्या यही पति उसे जन्म-जन्मान्तर चाहिये’

इस सन्दर्भ में शती के पूर्वार्द्ध में लिखी हुई यशपाल की कहानी ‘करवा का चौथ’ का उल्लेख करना प्रासंगिक ही होगा जिसमें स्त्री जीवन के अन्तर्विरोध अधिक व्यंग्यात्मक होकर व्यंजित हुए हैं। पति की प्रताडनाओं से तंग और क्षुब्ध पत्नी करवा चौथ के व्रत पर भूखे रहने की तुलना में रोटी खा लेती है और पति के पीटने पर चिल्लाते हुए कहती है – मार ले जितना मारना हो, मैंने कौन-सा तेरे लिये व्रत किया है।’ यह संवाद स्त्री के चेतना सम्पन्न होने का बहुत ही सार्थक उदाहरण है जिसमें सम्बन्धों की कसौटी व्रत करने या न करने में नहीं बल्कि ‘प्रेम’ में अन्तर्निहित है। अत्याचारी पति के प्रति यह विद्रोह नारीवाद का पहला उदाहरण माना जा सकता है।

कहानी में और स्त्री-विषयक चर्चित मुद्दों में एक और समस्या स्त्री के मन को कचोटती रहती है और वह है उसके ‘होने के अहसास की।’ उसकी ‘आइडेंटिटी अस्मिता या पहचान का सवाल’। वह अब सामाजिक काल्पनिकताओं से बाहर आने के लिये छटपटा रही है। अलका सरावगी की कहानी ‘मिसेज डिसूजा के नाम’ में लेखिका की आकांक्षा यही है कि वह घर-परिवार, पति-बच्चे के अलावा अपना भी जीवन जी सके। उसकी यही ‘चाहत’ उसकी सबसे बडी पीडा और असफलता का कारण बन जाती है। बच्ची के स्कूल से उपालम्भ, पति का आदेशात्मक स्वर सभी इस ओर इशारा करते हैं कि दुनिया में जितने अनुशासन हैं, उनकी कैद में अधिकतर बच्चे और महिलाएँ दण्डित हैं। खोजने पर पता चलता है कि अभी तक हमें जीने का सही ढंग आया ही नहीं है। जहाँ जिज्ञासाएँ, प्रश्न, प्रफुल्लता और संवेदनाएँ नहीं होंगी वहाँ मुर्दादिली पसरी दिखाई देगी। वर्तमान समय में कहानियों के कलेवर ने जो परिदृश्य हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है उसमें नौकरी पेशा महिलाओं के जीवन की चिन्ताएँ शीर्ष पर हैं। पितृसत्तात्मक समाज, बाजारवाद, पूँजीवादी संस्कृति और बढती हुई असीमित लालसाओं ने स्त्री के सम्मुख बहुत से संकट खडे कर दिए हैं।

अचला नागर की कहानी ‘सिफारिश’ की गुड्डी दैहिक शोषण से बचने के लिए चार नौकरियाँ छोड चुकी है किन्तु पाँचवीं नौकरी के लिये सिफारिश चाहिये और उसके लिये गुड्डी को समर्पण करना पडता है। माँ की शिक्षा, अपना आत्म सम्मान, सब कुछ गिरवी रख देती है, ‘गाडी सूनी सडक पर चलती है। सामने लगे शीशे पर एक बार यूँ ही मेरी दृष्टि चली जाती है ……. एक जोडी सुर्ख आँखें मेरी आँखों से मिलती हैं और फिर से एक हौल-सा मन में गडबडाने लगता है ….. तभी उनकी बाईं बाँह मेरे कन्धे पर टिक जाती हैं, उँगलियाँ इधर-उधर रेंगने लगती हैं, और कुछ देर बाद माँ के पहनाए गए जिरह-बख्तर में आजाद होने के बाद मैं सामने झूलते हुए सफलता के उस रेशमी परिधान को देखती हूँ।’
‘जाँच अभी जारी है’ कहानी में ममता कालिया ने स्त्री- उत्पीडन की व्यथा को बहुत ही मार्मिकता के साथ व्यक्त किया है। अपर्णा मेहनती, कुशाग्र और ईमानदार स्त्री है। सम्भवतः यही गुण उसके अवगुण बन जाते हैं। वह बैंक के अपने सहकर्मियों के साथ शामें नहीं गुजारती है। नैतिकता और सच्चाई का दामन पकडे वह जिस रास्ते पर चलना चाहती है उसमें बहुत से व्यवधान आते हैं। उस पर झू�� ा मुकदमा भी चलता है। वह हर जगह अपनी नेक-नियति की सफाई देती है किन्तु निराशा ही हाथ लगती है। इस सारे संघर्ष में से बदली हुई स्त्री की जो चौंकाने वाली छवि सामने आयी उसने स्त्री के आदर्शवादी नकाब को उतारकर फैंक दिया। कमल कुमार की कहानी ‘सीढयाँ’ में नीरू सफलता के लिये पुरुष मित्रों को सीढी की तरह काम में लेती है। उसे लगता है अजय में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रही है। अजय से मित्रता रखना मतलब कि घर के बोझ से दबी घरेलू औरत। विजय की मित्रता, उसका कलात्मक व्यक्तित्व भी नीरू को रास नहीं आता, क्योंकि वह आदर्शवादी है। नीरू की दिलचस्पी अब अनिल में है। किन्तु देह और दुनिया के सारे खेल देखकर उसे इस सच्चाई का भान होता है कि रिश्तों को साधन नहीं साध्य मानना चाहिये। वह पुनः लौटती है पुराने सम्बन्धों के पास। विजय को फोन करती है।

नौकरीपेशा स्त्री की छटपटाहट, अपने ही निर्णयों के प्रति असमंजस की स्थिति, संवेदनाओं के उतार-चढाव की अत्यन्त ही मर्मस्पर्शी कहानी है। चित्रा मुद्गल की ‘दरमियान’। एक नौकरी में उलझी स्त्री के पास सबसे अधिक समस्या है समय की। उसकी चिंता कभी ‘स्व’ के प्रति, कभी बच्ची के प्रति, कभी पति के प्रति सन्नद्ध होती है। ऐसी ऊहापोह और उलझन भरी मनःस्थितियों का पुनः पुनः दोहराया जाना यह सिद्ध करता है कि महानगरीय जीवन के बीच नौकरी और परिवार के बीच सामंजस्य स्थापित करना कितना मुश्किल है। समकालीन समय में जीवन मूल्यों में जो परिवर्तन आया उसने स्त्री जीवन को भी प्रभावित किया है। मधु कांकरिया उन लेखिकाओं में है जिन्होंने स्त्री के मन को बहुत ही गहराई से टटोला है। मधु कांकरिया की कहानियों की स्त्रियाँ कहीं बेबाक, कहीं कोमल और कहीं अपनी अस्मिता की तलाश करती हुई दिखाई देती है। यह कम महत्त्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि मधु ने जब भी अपनी स्त्री पात्रों के प्रति न्याय किया वे अपने आप से, एक विशेष प्रकार के काल्पनिक रिश्तों से मुक्त होती हुई प्रतीत होती हैं। मधु का ‘बीतते हुए’ में इन्द्रजीत और मणि दीपा के प्रेम-प्रसंग को, प्रेम के उठते-गिरते ग्राफ को और फिर इस रिश्ते से उठती भाप को बादल बनते हुए दिखाया है। पन्द्रह वर्षों के सुदीर्घ अन्तराल के बाद, जीवन में बहुत कुछ खोकर, मणिदीपा इन्द्रजीत अपने पुराने प्रेमी को आमंत्रित करती है। इन्तजार लम्बा होता जाता है, और पुरानी स्मृतियाँ पुनर्जीवन पाती हैं। इस उद्वेलन को सहते-सहते मणिदीपा ‘प्रेम’ की परिभाषा कुछ यूँ करती है – ‘मुझे तो आत्मबोध हो चुका इन्द्र का प्रेम न उद्दाम वेग है, न आत्मविस्मृति या तल्लीनता के चरम क्षण। थककर चूर निःस्पन्द पडी काया के सिरहाने तकिया बढाते हाथ प्रेम है। श्रम और परेशानी से माथे पर उभरी स्वेद बूँदों पर शीतल उँगलियों की छुअन है प्रेम। ठिठुरती ठंड में गर्म खाने के लिये ठिठुरती प्रतीक्षारत निगाहें हैं प्रेम।

हिन्दी कहानियों में महत्त्वपूर्ण बदलाव उषा प्रियम्वदा की उन कहानियों से आया जिनमें एक तरफ अर्थ के प्रभाव है तो दूसरी ओर स्त्री के अकेलेपन का विस्तार वर्णित है। ‘जन्दगी और गुलाब के फूल’ उषा जी की ‘नई कहानी’ के दौर की किन्तु इस समय की पुरानी कही जाने वाली कहानी है किन्तु अर्थ के केन्द्र में यदि स्त्री है तो पुरुष का अहं कैसे आहत होता है’ यह मुहावरा आज भी अपना असर बनाए हुए हैं। पिछले दिनों उषा प्रियम्वदा का ‘मेरी कहानियाँ’ नाम से संग्रह पढने को मिला। उनकी ‘कितना बडा झूठ ’ और ‘मोहबंध’ कहानियों में आधुनिक भारतीय समाज में वैवाहिक जीवन की असंगतता और दिखावे की स्थितियों को प्रस्तुत किया गया है। प्रेमविहीन जीवन स्त्रियों को कितना थका देता है इसका यथार्थ वर्णन किया गया है। विवाह सम्बन्ध कम समझौता अधिक है। ‘कितना बडा झूठ ’ कहानी की किरण नौकरीपेशा आधुनिक स्त्री है। उसके मन में पति और बच्चों से मिलने की इच्छा नहीं है। वह चाहती है मैक्स का स्पर्श। दैहिक सुख। विवाहेतर सम्बन्धों का यह सहज स्वीकार स्त्री को नये सोच की तरफ धकेलता है। किरण को मैक्स का शादी कर लेना इसलिये स्वीकार्य नहीं है। किन्तु विवश और लाचार वह झूठ से सही पति और बच्चों को अपनाने के लिये स्वयं को तैयार कर लेती है।

[ बाद में जोड़ा गया: रचना जी ने बताया कि यह टिप्पणी यहाँ से चुरायी गयी है. इस लेख पर अधिकार मूल लेखक/लेखिका के हैं. पूरी समीक्षा आप यहाँ क्लिक कर पढ़ें ]

क्या यह बहनजी सामने आंयेगी.

रंजना जी ने कहा.

बहन जी,आपकी साहित्यिक चेतना वन्दनीय है,अद्भुत है.आपसा कहानियो का मिमान्सक जगत मे मिलना दुर्लभ है.
साधुवाद.

इस मुद्दे पर अन्य पोस्ट

मुँह ना खुलवाइये-वरना जितना आरोप एक स्त्री लगा सकती है उससे कहीं ज्यादा एक पुरुष

आज सुबह लिखी पोस्ट : दौड़ता हुआ पेड़

Jan 172008
 

मेरी पोस्ट स्त्रियां क्या खुद से सवाल पूछती हैं?, जिसमे‌ पूरी पोस्ट मात्र टिप्पणीयों से ही बनी थी,उस पर् टिप्पणीयों के नये रिकॉर्ड बन रहे हैं.उसमे‌ कोइ आदम जी तो जैसे स्त्रियो‌ के पीछे ही पड गये हैं.आप भी देखें.

मेरी माँ बहन बेटी सभी स्त्रियाँ है लेकिन मैं जब बेटी का रिश्ता करने जाऊगा तो बेटी चाहती है लडका कम से कम 4 इंच लम्बा हो तथा उससे ज्यदा कमाता हो। क्यो बराबारी चाहती है ये समाज वादी औरतें ? सामाज में सभी को बराबरी नहीं वरन सम्मान मिलना जरूरी है बराबरी की मागॅ इस भेद को केवल अधिक बडा कर रही है। इन बैवकुफ समाज वादी औरतो को भी नहीं पता ये समाज का कितना अहित कर रही है।

एक औरत अपने स्त्री होने का फायदा उठा कर पुरूष से ज्यदा माल बेचती है तब उसे याद नही आती बराबर
कई बस में सफर कर रहे हो या ट्रैन के टिकट की लाईन हो क्यों इन्हें बराबर नही रखा जाता वास्तव में प्रकृति ने हम सभी को अलग अलग रोल दिये हैं और हमें ये करने होंगे। क्यों बराबर धरती नहीं है कही पहाड तो कही तलाब, क्यों बराबर ऋतु नही हैं। आखिर पुरूष तो बराबरी कर 9 मास तक बच्चे को पेट में नहीं रख सकता।

अगर स्त्रियाँ सम्मान चाहती है तो मेरी राय में रात को 2 बजे शराब पीकर समुद्र पर धुमना सम्मान नहीं दिला सकता इस दौड में कई आज कल धुम्रपान मदिरा पान कर रही है कल क्या वो बराबर होकर पुरूष की तरह बलात्कार करना पसंद करेंगी

Adam on January 17th, 2008 at 10:44 am

 

स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है कि उनमें जलन का भाव है. वो किसी की भी तरक्की नहीं देख सकती.अपने पति की भी नहीं दूसरी स्त्री की तो बिलकुल भी नहीं.पुरुष व स्त्री के कुछ काम बंटे हुए हैं.ये एक सामाजिक व्यवस्था है.जो स्त्रियाँ घर के काम करना नहीं जानती या चाहती या जिनको घर के काम नहीं करने पड़ते वो ही स्त्रियाँ इस प्रकार के स्त्री विमर्श के मुद्दे उठाती है. समस्या स्त्रियों की ही नहीं पुरुषों की भी है. जिस प्रकार स्त्री घर चलाती है पुरुष भी कमाता है यह एक सामाजिक व्यवस्था. यदि स्त्री कमाये और पुरुष घर चलाये तो भी इसमें कुछ हानि नहीं. लेकिन यदि पुरुष घर चलाने लगेगा तो स्त्रियों को उससे भी इन-सिक्योरिटी होने लगेगी. इन-सिक्योरिटी स्त्री के गुण में है और पुरुषों से बराबरी करना भी उसी इंसिक्योरिटी का लक्षण है.जबकि देखा जाये तो कुछ मामलों में स्त्री आगे है तो कुछ में पुरुष. यह प्रतियोगिता का विष्य नहीं वरन सहभागिता का विष्य है. लेकिन कुछ स्त्रियाँ सहभागिता नहीं चाहती.लिखा तो बहुत कुछ जा सकता है पर हम पुरुषों का यह स्वभाव नहीं कि स्त्रियों की तरह हर चीज में खोट निकालें.

रचना जी ने जबाब देने की कोशिश की

rachna singh on January 17th, 2008 at 11:10 am

 

ऐडम जी आप विषय का परिवर्तन क्यो करना चाहेते है , यहाँ बात केवल मुम्बई मे हुए हादसे की हो रही है . स्त्रियोचित गुण अवगुण कि नहीं . जरुरी नहीं है की आप अपनी स्त्रियों के प्रती अपनी भडास को इस ब्लोग के मंच पर निकले । स्त्रियों के लिये क्या उचित है क्या अनुचित इसका फैसला उन्हे ही करने दे ।” पुरुष व स्त्री के कुछ काम बंटे हुए हैं।ये एक सामाजिक व्यवस्था है.जो स्त्रियाँ घर के काम करना नहीं जानती या चाहती या जिनको घर के काम नहीं करने पड़ते वो ही स्त्रियाँ इस प्रकार के स्त्री विमर्श के मुद्दे उठाती है.” वैस आप का ये सेंटेंस बहुत पसंद आया क्योंकी मे तो उम्मीद कर रही थी आप ही ऐसा लिखेगे । आप तो आज भी adam – eve के ज़माने मे रह रहे हैं जबकी एव ने काफी तरकी कर ली है , मानसिक रूप से । आप का नाम कोई है नहीं , आदम और हव्वा के ज़माने के आप है , यहाँ ब्लोग पर क्यो अपना समय बर्बाद कर रहे हैं । और विषय प्रवर्तन करके आपने कुछ पुरुषो कि ” विचरते {घुमते } रहने की आदत को सही साबित किया है ।

Adam on January 17th, 2008 at 12:25 pm

रचना जी ऎसा इसलिये क्योंकि यहाँ पर जो भी स्त्रीयों के महत्व के मुद्दे उठाये उन्होने अपने गुणों या अवगुणों से ही उठाये हैं.आप लोग फालतू में पुरुषों का विरोध करती हैं क्योंकि वही मिला है ना सीधा-साधा -और बेचारे पुरुष स्त्री-विरोधी ना कह दिये जायें इसलिये चुप भैठे हैं. दिल में उनके भी वही बातें हैं लेकिन सब डरते हैं. आपको स्त्री अधिकारों की इतनी ही चिंता है तो सामाजिक व्यवस्था का विरोध कीजिये ना.सामाजिक व्यवस्था पुरुष नहीं बनाता वरन स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर बनाते हैं.आज क्यों लोग भ्रूण हत्या करने पर विवश हैं-क्योंकि दहेज एक बुराई है .तो क्या केवल पुरुष दहेज लेता है.सबसे ज्यादा दहेज की लालची तो महिलाऎं होती है. नये नये जेवर,साडियाँ, कोस्मेटिक दहेज में किसे चाहिये महिलाओं को ही ना.लेकिन पुरुष की कमजोरी यही कि वो इसका विरोध नहीं करता. सास के अत्याचार को ससुर मौन सहमति दे देता है.क्यों? यह गलत है. लेकिन इससे सास का दोष कम नहीं हो जाता. असली दोषी तो वही सास है ना.

लेकिन सामाजिक व्यवस्था का विरोध करेंगी तो कई स्त्रीयां भी विरोध में आ जायेंगी इसलिये सही है पुरुषों का विरोध करो. बेचारे पुरुष भी आड़े ना आयेंगे. जहाँ तक 31 दिसंबर की घटना का स्वाल है उसमें भीड़ की गलती है. लेकिन यही भीड़ पुरुषों का भी अहित कर सकती है स्त्री का भी. तो भीड़ का विरोध कीजिये ,भीड़ की मानसिकता का विरोध कीजिये. यदि वहाँ पर लड़्कियों की ही भीड़ होती तो वो भी एक पुरुष का बलात्कार कर देती.कई ऎसी घ्टनाओं का साक्षी रहा हूँ जहाँ मदमस्त लड़्कियों ने एक बेचारे पुरुष को कामवासना के वशीभूत हो मार दिया. उन लड़कियों के बारे में क्या कहेंगी जो एक शादी-शुदा मर्द से प्यार कर दूसरी स्त्री का दिल तोड़ती हैं.

कहता हूँ ना मुँह ना खुलवाइये-वरना जितना आरोप एक स्त्री लगा सकती है उससे कहीं ज्यादा एक पुरुष.

Nov 232007
 

आज सुबह जब पोस्ट लिखी (सुबह सुबह चार बजे उठ कर) तो यह अन्दाजा नहीं था कि यह एक बहस का रूप ले लेगी.हाँलाकि मंशा तो थी ही कि एक बहस हो. लेकिन आशा के विपरीत लोग आये और उन्होने बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने विचार लिखे. कुछ लोगों ने जहाँ मेरी सोच से सहमति दिखायी वहीं अनुनाद जी ने और कुछ अन्य ने खुल कर असहमति दिखायी. मैं इस असहमति का स्वागत करता हूँ. मैं मानता हूँ कि हमारे लक्ष्य एक ही हैं …हाँ मार्ग अलग अलग. मैं भी यही चाहता हूँ कि हमारे देश का सारा तंत्र हिन्दी में चले लेकिन मेरे चाहने से कुछ नहीं होने वाला इसलिये जो परेशानी मैने झेली है कम से कम आने वाली पीढियां वह परेशानियाँ ना झेलें. इसलिये मेरा मानना अभी भी यही है कि वर्तमान परिस्थितियों में बिना अंग्रेजी सीखे अंग्रेजी का खात्मा नहीं किया जा सकता.

अनुनाद जी के विचारों से भी आप परिचित हों.जो उन्होने पिछ्ली पोस्ट पर दिये थे.

आपकी ये दोनो सोच

१) कि बारहवीं के बाद विज्ञान की पढ़ाई अंग्रेजी में इसलिये होती है कि हिन्दी में किताबें नहीं हैं;

२) कि हिन्दी में किताबें उपलब्ध कराने में पचास वर्ष और लग जायेंगे

दोनो से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता। लगता है कि आप क्रमश:-विकास-प्रक्रिया (इवोलूशन) के मूल कांसेप्ट को ही नहीं समझते हैं।

अंग्रेजी में किताबें नहीं हैं क्योंकि उनकी मांग नहीं है (अर्थशास्त्र का सरल सिद्धान्त यहाँ काम कर रहा है) ; मांग इसलिये नहीं है कि हिन्दी के बजाय अंग्रेजी में पढ़ना अनिवार्य कर रखा गया है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि हिन्दी में विषयों का पढ़ना अनिवार्य कर दिया जाय तो एक महीने के भीतर किसी भी विषय की पुस्तकें बाजार में होंगी।

आपका यह भी मानना कि हिन्दी के वजह से बच्चे पिछड़ जाते हैं, तथ्यों से दूर है। मैने भी बारहवीं तक पूर्णत: हिन्दी में पढ़ाई की। मुझे कभी भी नही लगा कि मै हिन्दी के कारण कभी पिछड़ गया।

[ मुझे बार बार यह लगता रहा है कि मैं हिन्दी के कारण पिछ्ड़ गया ]

कोई भी हिन्दी के कारण पिछड़ता नहीं है, अंग्रेजी के कारण पिछड़ता है। और इसी दुराचार का विरोध होना चाहिये। इस देश को आगे बढ़ाना है तो व्यक्ति के विषय के ज्ञान की परीक्षा ली जाय, न कि अंग्रेजी के ज्ञान की परीक्षा, जो कि आज हो रही है।

अंग्रेजी की पढ़ाई एक भाषा के रूप में करायी जाय ; जिसको जरूरी हो उसी को पढ़ायी जाय (किसी को राजदूत के रूप में रूस या चीन जाना है तो उसके लिये रूसी या चीनी महत्वपूर्ण है, न कि अंग्रेजी); चापरासी पद के लिये अंग्रेजी, क्लर्क के लिये अंग्रेजी, सैनिक के लिये अंग्रेजी… क्यों जरूरी है? क्या आपने सोचा है कि पूरा देश ज्ञान अर्जन के बजाय डिक्शनरी का रट्टा क्यों लगा रहा है? इसमें कितना करोड़ मानव-घंटा बर्बाद हो रहा है? कुछ शब्द आ गये तो ग्रामर का चक्कर, ग्रामर आ गया तो ‘फर्राटे अंग्रेजी बोलने’ का चक्कर, फर्राटे अंग्रेजी भी बोलना आ गया तो अमेरिकन या ब्रिटिश एक्सेंट में बोलने का चक्कर.. ये दुष्चक्र है जिसमें पूरे देश को झोंक दिया गया है।

और हाँ, यदि किसी ने अंग्रेजी के बल पर नौकरी हासिल कर ली (जैसा कि पूरे देश में हो रहा है) तो इसको देश का विकास के रूप में समझने की भूल मत कीजिये। इसका केवल इतना अर्थ है कि किसी ने किसी दूसरे का हक गलत बहाने (अंग्रेजी के ज्ञान) के कारण छीन लिया। विकास तब होता है जब इन्नोवेशन होता है; नागरिक विभिन्न छेत्रों में रचनात्मकता से भरपूर होते हैं। दूसरे देश के लोगों से पहले कुछ नया कर लिया जाता है आदि। और ये सब तभी सम्भव है जब लोग अपनी भाषा में सोचें, पढ़े, विचार-विमर्श करें। विदेशी भाषा (अंग्रेजी) में होते हुए हजारों सेमिनार मैने देखे हैं; लोग विचार-विनिमय के बजाय प्रश्न पूछने और उत्तर देने से भागते हुए नजर आते हैं। ऐसे सेमिनारों से खाक फायदा होगा?

इस देश को अंग्रेजी की गुलामी करते करीब दो सौ साल हो गये। किसी दूसरे देश से तुलना करते हुए विकास के आंकड़े तो बताइये। केवल रटे-रटाये मुहावरे दोहराने से काम न चलाइये।

आशा है आप लोग इस बहस को जारी रखेगें.

Nov 232007
 

पिछली पोस्ट से शायद यह लगा कि मैं कोई हिन्दी-अंग्रेजी विवाद उत्पन्न करना चाहता हूँ जो कि बकौल ज्ञान जी हिन्दी वालों का प्रिय शगल रहा है. लेकिन मेरा लक्ष्य यह नहीं था.मैं तो अपने अनुभव आपसे बांटना चाहता था.मैं अग्रेजी का विरोध नहीं करता बल्कि मैं तो अंग्रेजी की वकालत करता हूँ और कहता हूँ कि आज कि वर्तमान परिस्थितियों में बिन अंग्रेजी सब सून.

अधिकतर हम लोग केवल समस्या की बात करते हैं समाधान की नहीं. समस्या तो हम सब जानते ही हैं लेकिन आज की परिस्थिति में इसका समाधान क्या है. मेरे विचार से हमें दो मुँही रणनीति ( Two Pronged Strategy) से काम करना चाहिये. 1. अंग्रेजी को अनिवार्य करें और 2. हिन्दी को बढ़ावा दें. आपको मेरी बात में विरोधाभास लग रहा होगा. आइये समझते हैं इसे.

अंग्रेजी को अनिवार्य करें : आज के युग में अंग्रेजी के बिना काम नहीं किया जा सकता. यदि आप उच्च शिक्षा की बात करें तो वहाँ अधिकतर किताबें हिन्दी में उपलब्ध नहीं है. इसलिये वर्तमान परिस्थितियों में अंग्रेजी के बिना काम किया जाना मुश्किल है. तो अंग्रेजी तो अनिवार्य है ही. और यह बात हम सभी जानते हैं इसीलिये जिसके पास पैसा है वो अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलवाता है. जो गरीब है वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजता है. ऎसे में अंग्रेजी अमीर की है हिन्दी गरीब की. इसलिये गरीब गरीब ही बना रहता है और अमीर और अमीर होता जाता है.यदि हम सरकारी स्कूलों में भी अग्रेजी अनिवार्य कर दें तो हम काफी हद तक यह खाई पाट सकते हैं. यही भाषा का साम्यवाद है.

हिन्दी को बढ़ावा दें: आज हिन्दी में समस्या यह है हम हिन्दी हिन्दी का नारा तो लगाते हैं लेकिन हमारा सारा काम होता है अग्रेजी में. उच्च शिक्षा के लिये आज हिन्दी में किताबें उपलब्ध नहीं हैं और हम इसे सरकार की गलती मान कर चुप बैठ जाते हैं.यदि हम अंग्रेजी को अनिवार्य कर दें तो हमारे पास ऎसे लोग बहुतायत में होंगे जो दोनों भाषाऎं जानते होंगे तब बहुत सारा अनुवाद हिन्दी में किया जा सकेगा.विश्व में भारत आज एक बहुत बड़ा बाजार है. हिन्दी को बाजार की भाषा बनायें. जब हिन्दी समाचार बिकते हैं, हिन्दी सीरियल बिकते हैं, हिन्दी फिल्मे बिकती है तो हिन्दी भी बिकाउ भाषा होगी. तब लोगों की रुचि भी हिन्दी में बढेगी.

कुछ और बिन्दु हैं जिन पर हमें विचार करना होगा.

1. अंग्रेजी बोलना ना ही गुलामी का परिचायक है ना ही अंग्रेजी बोलने वाला श्रेष्ठ है.

2. हिन्दी बोलने वाला ना तो किसी मायने में हीन है ना ही हिन्दी में काम करना देशभक्ति ही है.

3. हिन्दी का समर्थन अंग्रेजी का विरोध नहीं और ना ही अंग्रेजी का समर्थन हिन्दी का विरोध है.

4. आप ना तो हिन्दी बोलने में संकोच करें ना ही अंग्रेजी बोलकर अपने को श्रेष्ठ माने.

5. अंग्रेजी बोलने में शंर्म ना करें.यह ना सोचें कि आप कुछ गलत बोल देंगे.

6. सब कुछ सरकार पर ना छोड़े. अपने स्तर पर प्रयास करें.अनुवाद ज्यादा से ज्यादा हों. उसके लिये जरूरत है कि दोनों भाषाओं के जानकार बढ़ें.

7. ग्राही बने. दूसरी भाषा के शब्दों को अपनायें.हर शब्द का हिन्दी अनुवाद ढूंढने की कोशिश ना करें. 

8. हिन्दी का बाजार बनायें.

9. व्याकरण पर ज्यादा ध्यान ना देकर संप्रेषण पर ध्यान दें.

10. शब्दों को मरने से बचायें. जितना हो सके अपनी भाषा के पुराने शब्द ढूंढें और उनको प्रयोग करें.

11. यह समझ लें कि आप हिन्दी में काम कर रहे हैं तो हिन्दी की सेवा नहीं कर रहे हैं ना ही आप अतिरिक्त रूप से देश भक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं.

12. अपनी हीन भावना से लड़ें.

13. भाषा को विवाद का विषय ना मान कर संप्रेषण का माध्यम मानें और जितनी अधिक भाषाऎं सीख सकें सीखें.

और अंत में आलोक जी ने जो कहा.

14. सही गलत अंगरेजी की चिंता ना करें, जैसी अंगरेजी अधिकांश भारतवासी बोलेंगे, वही सही मानी जायेगी। अंगरेजी अब एक भारतीय भाषा है, जो ब्रिटेन वाले भी बोल लेते हैं। पचास करोड़ भारतवासी जैसी अंगरेजी बोलेंगे, वही मानक हो जायेगी।

तो ये तो थे मेरे कुछ बिन्दु जो हमें समाधान की ओर ले जा सकते हैं.

अंत में क्या आप बता सकते है “घी (ghee)” की अंग्रेजी क्या है? Confused

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अंग्रेजी व हीन भावना

Nov 222007
 

जब मैने पिछ्ला लेख लिखा था तब कोई इरादा नहीं था कि मैं कोई विवाद खड़ा करूं लेकिन ना जाने कुछ लोगों को वो पोस्ट विवादगर्भा लगी. खैर जाने दीजिये आप तो मेरी कहानी सुनिये जिसका वादा मैने अपनी पोस्ट में किया था. बचपन से अंग्रेजी ना जानना आपको कदम कदम पर परेशान करता है. जब मैं निचली कक्षाओं में था यानि कक्षा सात-आठ में तब कई मित्र ऎसे थे जो कक्षा पांच तक अंग्रेजी माध्यम से पढकर आये थे. उनके घर में अंग्रेजी माहौल भी था. यानि उनके माता पिता भी अंग्रेजी जानते थे.घर में अंग्रेजी अखबार आता ..अंग्रेजी पत्रिकाऎं आती.वो लोग अंग्रेजी गाने भी सुनते. तो कई बार बातों बातों में वो अंग्रेजी से संबंधित किसी बात की चर्चा करते तो मुझे कुछ भी समझ नहीं आता. वो लोग “हम्पटी डम्पटी सैट ऑन ऎ वॉल” या “बाबा बाबा ब्लैक शीप” जैसी पोयम की चर्चा करते तो वो सारी बातें अपने सर के ऊपर से निकल जाती. हम तो “चंदा मामा दूर के” या “ढोल बजाता भालू आया ढम ढम ढम” जैसी बाल कविताऎं जानते थे लेकिन उनकी चर्चा ही नहीं होती. उस समय मन को चोट लगती और एक हीन भावना का अहसास होता.

बचपन से ही लगा कि अपनी अंग्रेजी सुधारनी चाहिये.लेकिन सुधारें तो कैसे? घर में तो कोई खास अंग्रेजी जानता नहीं था. अंग्रेजी को सुधारने के लिये लोगों ने सलाह दी कि अंग्रेजी न्यूजपेपर पढ़ो. उसके ऎडिटोरियल पढो. लोगों की सलाह पर सप्ताह में एक बार अंग्रेजी समाचार पत्र भी लेना प्रारम्भ किया. लेकिन पूरे सप्ताह समाचार या ऎडिटोरियल पढ़ना या समझना तो दूर किसी एक लेख को लेकर ही लगे रहते. उसके कठिन शब्दों का डिक्सनरी से अर्थ निकाल कर एक कॉपी में नोट करते रहते.आधे अर्थ मिलते आधे नहीं.जो शब्द मिलते भी उसके भी तीन-चार अर्थ होते.तो यह समझ में नहीं आता कि कौन सा अर्थ कहाँ फिट बैठेगा. इसलिये आधी बातें समझ में आती आधी नहीं. हुआ यह कि इन शब्दों से तीन चार कॉपियाँ तो भर गयीं लेकिन अंग्रेजी ना सुधरनी थी ना सुधरी. 

फिर किसी ने सलाह दी कि “रेन एंड मार्टिन” की ग्रामर पढो. वह किताब भी उस छोटे शहर में नहीं मिली. किसी तरह उसे अन्य शहर से मंगवाया गया. मुझे अभी भी याद है लाल रंग के कवर में वह चमकीले कवर वाली किताब. वह मिली तो लगा अब तो सारी मुरादें पूरी हो जायेंगी और हम भी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगेंगें. लेकिन उसे पढने से भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ. ग्रामर के तो कई सारे नियम पता चल गये लेकिन अंग्रेजी बोलने समझने में कोई फरक नहीं पढ़ा उलटा हुआ यह कि अब अंग्रेजी में कुछ भी लिखने या बोलने से पहले यह सोचना पड़ता कि यह किस टैंस में हैं. यहाँ पर कौन सा वर्व है …कौन सा नाउन. तब लगा कि अंग्रेजी सचमुच बहुत कठिन है. अंग्रेजी बोलने वाले सारे लोग मुझे महान व भाग्यवान नजर आने लगे. मुझे लगने लगा कि शायद मैं कभी भी अंग्रेजी  लिख या बोल नहीं पाउंगा.

उन दिनों इंजीनियरिंग के लिये प्रवेश परीक्षाऎं अंग्रेजी में ही होती थीं.तब आज की तरह गली गली में इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं थे. आई.आई.टी, रुड़की और एम.एन.आर. इन तीन परीक्षाओं में से किसी को पास करना इंजीनियरिंग में जाने वालों के लिये स्वप्न हुआ करता था. हमने भी यह तीनों परीक्षाऎं दी बारहवीं के बाद. उस समय तीनों अंग्रेजी में ही थी. और हुआ यह कि मैं इन तीनों में से किसी में भी पास नहीं हो पाया. इधर उसी साल बी.एस.सी में भी ऎडमीशन लिया था. लेकिन ध्यान तो सारा इंजीनियरिंग में था और फिर बी.एस.सी में भी अंग्रेजी में ही सब कुछ होना था. नतीजा यह हुआ कि जीवन में पहली बार फेल हो गया बी.एस.सी में .अगले साल सौभाग्य से एम.एन.आर की परीक्षा हिन्दी व अंग्रेजी दोनों में हुई. मैने हिन्दी माध्यम चुना और उसी वर्ष मैने उसे पास कर लिया और मेरा सलेक्सन इंजीनियरिंग में हो गया था.   

चलिये एक किस्सा और. इंजीनियरिंग में काफी हद तक अंग्रेजी ठीक ठाक हो गयी. अब अंग्रेजी समझ आने लगी. लिखना भी ठीक ठाक सा हो गया.( हालांकि इसके लिये काफी मेहनत करनी पड़ी पर वह कभी और….). लेकिन बोलने में अभी भी कई बार सोचना पड़ता. फायनल ईयर में कैम्पस के लिये कई कंपनियाँ आई. उस समय वोल्टाज कंपनी में नौकरी मिलना सौभाग्य माना जाता था. क्योकि उनकी चयन प्रक्रिया काफी लंबी होती थी. वो लोग दो बार पहले लिखित परीक्षा लेते उसके बाद साक्षात्कार होते. दोनों लिखित परीक्षाओं को मैने पास कर लिया. अब बारी साक्षात्कार की थी. मैं टाई वाई लगा के तैयार था. साक्षात्कार में पहुंचा तो अंग्रेजी में साक्षात्कार शुरु हुआ. शुरु की कई चीजें तो कई बार शीशे के सामने खड़े होकर रटी हुई थी तो वो तो फटाफट बता दीं. लेकिन जब बात आगे बढ़ीं तो मैने अटकना चालू कर दिया. उसी अटकन भटकन में सारी बातें भूलता गया. मैने उनसे हिन्दी में बोलने की इजाजत भी मांगी जिसे उन्होने मना कर दिया. किसी तरह से साक्षात्कार समाप्त हुआ. मैने परिणाम की प्रतीक्षा भी नहीं की. मैं सीधा हॉस्टल आ गया और अपने कमरे को बंद कर रोने लगा. उस दिन फिर मुझे अहसास हुआ कि अंग्रेजी ना जानने की कितनी बड़ी सजा मैं भुगत रहा हूँ.

आज मैं आराम से अंग्रेजी लिख,बोल सकता हूँ लेकिन इस अंग्रेजी की वजह से सब कुछ जानते हुए भी कितनी बार मुझे नीचा देखना पड़ा यह मैं ही जानता हूँ. मैने तो उन सब परिस्थितियों का मुकाबला कर लिया लेकिन कितने ही ऎसे लोग होंगे जो अंग्रेजी ना जानने की हीन भावना के कारण आगे ही नहीं बढ़ पाते होंगे.

अगले लेख में मैं अपने विचार रखुंगा मेरे विचार में इसका समाधान क्या. अभी तो बहुत पका दिया ना. खैर कोई नहीं लिखते लिखते बहुत कुछ लिख गया.  

Nov 212007
 

मेरी पिछ्ली पोस्ट पर काफी अच्छे कॉमेंट आये.सागर जी और रचना जी के कॉमेंट प्रस्तुत हैं.

english-cocacolaसागर भाईसा बोले काकेश जी , इस लेख में तो विषयांतर हुआ कोई बात नहीं पर इस लेख की अगली कड़ी में उसे भी पूरा करें। क्यों कि मुझे यह लग रहा है कि आप मेरी कहानी लिख रहे हैं।
मैने हिन्दी माध्यम से ११वीं तक पढ़ाई की। बच्चों का भी यही हाल है। वे पहले राजस्थान में हिन्दी माध्यम से पढ़े।अब हम हैदराबाद में हैं, हिन्दी माध्यम की स्कूल पास ना होने की वजह से अंग्रेजी स्कूल में बच्चों को दाखिला दिलवाया। अब उनकी वह हालत है कि ना तो वे सही अंग्रेजी जानते हैं ना ही हिन्दी! रोज हम सब इस वजह से तनाव में जीते हैं क्यों कि मैं भी व्यवसाय में अंग्रेजी ना जानने की वजह से सफल नहीं हो पा रहा ना बच्चे अध्ययन में। बहुत कुछ कहना है पर और कभी,…

सागर भाई आपके अनुरोध पर इस लेख की अगली कड़ी में अपनी पूरी कहानी लिखुंगा. आप भी वादा करें उसके बाद अपनी कहानी लिखेंगे.  

रचना जी ने कहा

सबसे पहले मैं इस कमेन्ट में श्री सागर चंद नाहर जी से क्षमा मांगना चाहती हूँ क्योकि एक बार ईमेल पर उन्होने मुझसे कहा था की उन्हे इंग्लिश नहीं आती और मै हिन्दी में मेल दूं। मैने इस बात को सच नहीं माना क्योकि मुझे लगा की वह मुझे हिन्दी में लिखने को मजबूर करना चाहते है । तब मैं इस हिन्दी ब्लॉगिंग में नयी थी, और कई बार उसके बाद सागर जी के ब्लॉग पर गयी पर क्षमा मांगने का कोई अवसर नहीं मिला। आज मिला है तो सागर भाई क्षमा कर दे।english-of-india

अब बात इंग्लिश और हिन्दीकी , मैने इस विषय को कई बार उठाया है की सबको इंग्लिश कि जानकारी होनी चाहिये पर हर बार मुझे कमेंट्स मे गालियां तक मिली है । आज मैं इस ब्लोग पर ये कहना चाहती हूँ की अगर किसी को भी इंग्लिश मैं कोई भी सहायता चाहिये , जैसे कहीं अप्लिकेशन देनी हो , या किसी के भी बच्चे को इंग्लिश में फॉर्म इत्यादि भरना हो तो मुझ से निःसंकोच ईमेल पर सम्पर्क कर सकते है। कोई भी बात जो आप दूसरो से पूछने में हिचकते हो कि कोई क्या कहेगा उसे मुझे ईमेल कर दें, यथा संभव मैं आप को उसकी हिन्दी बता दूंगी । अगर रोमन मैं आप समझ लेंगे तो मेरा वक्त कम लगेगा पर अगर आवश्यक है तो मैं हिन्दी में भी लिख दूंगी । इंग्लिश मुश्किल नहीं है , आपकी हिचक इस को मुश्किल बनाती है । अगर आप को नहीं भी आती है तो भी अपने बच्चो को अवश्य इंग्लिश माध्यम से ही पढाएं । हिन्दी हमारा दिल है और इंग्लिश हमारा दिमाग और तरक्की के लिये दिमाग की जरुरत ज्यादा होती है । मातृ भाषा या राष्ट्र भाषा बदने की जरुरत नहीं है , जरुरत हैं अपनी सोच बदलने की , देश का विकास बिना इग्लिश के हो सकता है पर व्यक्ति के विकास में इंग्लिश का योगदान लेना कुछ बुरा नहीं है । और वह जितने लोग इंग्लिश कि बुराई करते हैं , यहाँ हिन्दी ब्लोगिंग समुदाय में भी उन सब के इंग्लिश में भी ब्लोग है !!! उनसब के घर मै इंग्लिश के अखबार भी आते हैं और उनमे बहुत से केवल टाइम पास के लिये भाषा पर वाद विवाद करते हैं ।

रचना जी आपका धन्यवाद. अगली पोस्ट में इस विषय पर फिर अपने विचार रखुंगा.