आप को लग रहा होगा कि मैं क्या बकवास कर रहा हूँ…. हिन्दी चिट्ठा लिखता हूँ लेकिन अंग्रेजी की वकालत कर रहा हूँ. लेकिन नहीं जी … मैं ऎसा सोच समझ कर कह रहा हूँ. कारण है कि हमारे महान देश भारत में कोई भी काम अंग्रेजी के बिना नहीं होता. किसी भी प्राइवेट कंपनी के कार्यालय में जायें आपको सारे लोग अंग्रेजी में ही काम करते मिल जायेंगें.

कल एक सज्जन से इसी विषय पर बातचीत हो रही थी. उनका कहना था कि सॉफ्टवेयर और काल सैंटर के क्षेत्र में हम इतने आगे इसलिये है क्योकि हम अच्छी अंग्रेजी जानते हैं. उनका यह भी कहना था कि अंग्रेजी के बिना कोई भी तकनीकी पढ़ाई पूरी नहीं हो सकती. इसलिये अंग्रेजी को तो बचपन से ही अनिवार्य कर देना चाहिये. वर्तमान स्थितियों में उन सज्जन की बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता.

क्या अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए?

मुझे अपनी कहानी याद आ गयी. मेरी पढ़ाई हिन्दी माध्यम से हुई है. तो बचपन मेंमेरी अंग्रेजी भी वैसे ही थी जैसे एक आम हिन्दी माध्यम से पढे हुए विधार्थी की होती है यानि वो अंग्रेजी व्याकरण के तो बहुत से नियम जानता है लेकिन फिर भी ना सही सही अंग्रेजी लिख पाता ना बोल पाता है.मुझे लगता है कि हम लोग बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर जो व्याकरण पढ़ाते हैं वो फायदे की जगह नुकसान ही करती है. कुछ भी लिखने व बोलने से पहले व्यक्ति उस वाक्य को व्याकरण की कसौटी पर तोलता है कि यह सही है या नहीं.खैर यह तो विषयातंर हो रहा है…. मैं जब आई.आई.टी. की तैयारी कर रहा था तो लोगों ने कुछ विशेष किताबों को पढने की सलाह दी. जैसे भौतिकी के लिये रैशनिक हैलीडे ( जो कि एक रशियन किताब का अंग्रेजी अनुवाद था) या गणित के लिये एम.एल.खन्ना. उस छोटे शहर में यह किताबें भला कहाँ मिलती…. तो किसी तरह यह किताबें दिल्ली से मंगवायी गयी. किताबें तो आगयीं लेकिन किताबें थीं तो अंग्रेजी में. भौतिकी का “जड़त्व आघूर्ण” किताब में ‘Moment of Inertia’ हो गया और समबाहू त्रिभुज ‘Equilateral Triangle’ बन गया.तो मुझे दो-तीन महीने तो यही सब समझने में लग गये कि किस तकनीकी शब्द को अंग्रेजी में क्या कहते हैं ….पढ़ाई क्या खाक करते. इस वजह से या किसी और वजह से आई.आई.टी. में सलैक्सन तो नहीं हुआ. लेकिन इस बात की कोफ्त हमेशा रही कि अगर आगे चलकर हमें यही सब अंग्रेजी में ही पढ़ना था तो हमें बचपन से ही अंग्रेजी में यह सब क्यों नहीं पढ़ाया गया. इसलिये हम जैसे चोट खाये और समझदार माँ बाप अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम से नहीं पढ़ाना चाहते.

http://kakesh.comवैसे मुझे यह तर्क बेमानी लगता है कि अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है.क्या अंग्रेजी के बिना विकास सचमुच संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए? जरूरत है तो इस दिशा में सही सोच की. आज हम गलत सलत ही सही लेकिन अग्रेजी लिखने बोलने को ही अपनी शान समझते हैं. यदि ऎसा ही है तो क्यों ना अंग्रेजी को ही राष्ट्रभाषा बना दिया जाये. कम से कम मेरे जैसे हिन्दी माध्यम से पढ़े बच्चों का तो भला हो ही जायेगा और वो मेरी तरह हीन भावना का शिकार तो नहीं होंगे कि वो आई.आई.टी. वालो से कमतर हैं इसलिये क्योकि वो अंग्रेजी नहीं जानते थे.

[ ऊपर का चित्र आई.आई.एम. की मेलिंग लिस्ट में आया था जिसे मेरे एक मित्र ने मेरे को मेल पर भेजा था. इसमें ठंडी बियर यानि "CHILLED BEER" को "CHILD BEAR" यानि भालू का बच्चा लिखा गया है.साइड में अखबारी जुगाड़ सागर चंद नाहर जी के सौजन्य से है.]

अभी अभी चिट्ठाजगत डॉट इन की आचार संहिता पढ़ी. मेरे विचार से हर संस्था को ये हक है कि वो अपनी आचार संहिता बनाये. ये उस संस्था से जुड़े लोगों को सोचना है कि वो उस आचार संहिता को माने या ना मानें. चिट्ठाकारी या ब्लॉगिंग एक अलग तरह का माध्यम है जिसका चरित्र ही है कि आप अपने नाम से लिखने या ना लिखने के लिये स्वतंत्र हैं.यह परंपरा अग्रेजी जगत में तो है ही हिन्दी जगत में भी है.इससे पहले भी इस विषय पर मेरे द्वारा और अन्य लोगों द्वारा लिखा गया है.

आचार संहिता कहती है कि वह फर्जी नाम से चितित है.मैं चिंतित हूँ कि नाम फर्जी है या नहीं ये कौन कैसे तय करेगा क्या हमें अपना पैन कार्ड या राशन कार्ड भी देना होगा :-) तो क्या फर्जी नाम वाले चिट्ठे चिट्ठाजगत.इन से हट जायेंगे.कुछ तो ये होंगे ही.

1. मसिजीवी

2. फुरसतिया

3. उड़नतस्तरी

4. ई-स्वामी

5. घुघूती-वासूती

5. बोधिसत्व

6. आलोचक

7. चौपटस्वामी

8. काकेश

9. सृजन शिल्पी

10. अजदक

11. अनामदास

और भी ना जाने कितने होंगे.

कल मैने एक टिप्पणी की थी लगता है वो सही ही है.

हम हैं तो लफड़े हैं
लफड़े हैं तो बातें हैं
बातें हैं तो तर्क है
तर्क है तो वितर्क है
वितर्क है तो गाली है
गाली है तो कड़वाहट है
कड़वाहट है तो मध्यस्थ है
मध्यस्थ है तो मलहम है
मलहम है तो समाधान है
समाधान है तो दोस्ती है
दोस्ती है तो हम है
हम हैं तो लफड़े हैं

चलिये देखते हैं कि ये लफड़ा कब तक चलता है..

मैं एक महीने से भी ज्यादा सक्रिय ब्लॉगिंग से दूर रहा. उसके बाद आया तो सोचा कि हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में ना सोच/लिख कर केवल अपनी बात ही लिखुंगा.लेकिन कुछ बातें हैं जो दिमाग में उमड़ घुमड़ रही हैं. सोचा लिख ही डालूं.

पिछ्ले आठ नौ महीने में हिन्दी चिट्ठाजगत में कई परिवर्तन हुए हैं.मेरे विचार से इन परिवर्तनों की रफ्तार उन सभी परिवर्तनों से कहीं ज्यादा है जो हिन्दी चिट्ठाकारी में पिछ्ले तीन चार सालों से हो रहे है. आज हमारे पास नये ऎग्रीगेटर हैं, पोस्ट भी चटपट ऎग्रीगेटरों पर आ जाती हैं,किसी को गरियाना नहीं पड़ता :-) . एक हजार से ज्यादा चिट्ठाकार हैं जिनमें सक्रिय चिट्ठाकारों की संख्या भी पहले से ज्यादा हुई. आपकी पोस्ट  थोड़ी देर में ऎग्रीगेटरों के पहले पन्ने से गायब हो जाती है.चिट्ठाकार मिलन भी पिछ्ले कुछ समय से ज्यादा ही हो रहे हैं.हर कोई अपना अलग मीट पका रहा है. लेकिन एक आम चिट्ठाकार को इससे क्या फायदा हुआ? क्या उसके पाठक बढ़े हैं?क्या उसके चिट्ठे पर टिप्पणीयां बढ़ी हैं?क्या टिप्पणीयों के माध्यम से आपस में विमर्श बढ़ा है?

मैं खुद के चिट्ठे पर जितना देख रहा हूँ या दूसरों के चिट्ठों पर टिप्पणीयों की संख्या देख कर अनुमान लगा रहा हूँ..मुझे तो हिट और टिप्पणीयों की संख्या में कमी होती ही जान पड़ती है.कुछ धुरंधरों जैसे फुरसतिया जी या समीर जी को टिप्पणीयों के मामले में अपवाद मान लें और सारथी जी को हिट्स के मामले में तो कमोबेश यही कहानी है. ऎसा नहीं है कि हिन्दी में स्तरीय नहीं लिखा जा रहा लेकिन हम सब (मैं भी) पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. हम अक्सर उन्ही चिट्ठों पर जाना पसंद करते हैं जिन्हे हम जानते हैं..भले ही केवल ब्लॉग से ही जानते हों. ऎसे में जो नये चिट्ठाकार अच्छा लिख रहे हैं क्या उनको पढना और प्रोत्साहित करना जरूरी नहीं हैं. 

मुझे लगता है कि हिन्दी चिट्ठाकारी में भी परोक्ष गुट हैं या बनते जा रहे हैं.ऎसे में सब अपने अपने गुट के चिट्ठाकारों को ही पढ़ना और वहीं टिपियाना पसंद करते हैं. चिट्ठाकारी मुद्दों और मन की भावना को उठाने का मंच नहीं,सलेक्टेड टार्गेट ऑडियंस तक अपनी बात पहुंचाने का माध्यम रह गया है. सबकी अपनी अपनी दुकान है और अपने अपने ग़्राहक. मैं यह नहीं कह रहा कि ये गलत है या सही है..लेकिन ऎसा होता जा रहा है. ऎसे में क्या हिन्दी चिट्ठाकारी सच में कुछ कर पायेगी? क्या जो लोग चिट्ठाकारी को वैब पत्रकारिता, वैकल्पिक पत्रकारिता या फिर नये मुद्दों पर विमर्श का माध्यम मानते हैं  उनके सपने पूरे हो पायेंगे.

क्या ये सही है? मैं नहीं जानता..पर जानना जरूर चाहता हूँ…आप कुछ सहायता करेंगे?

पिछले दिनों नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जाना हुआ.टिकट काउंटर के पास ही एक विश्रामालय है. उसके पास खड़े रह कर प्रतीक्षा कर रहा था कि सामने एक बोर्ड लगा हुआ देखा. पहले हिन्दी में पढ़ा फिर सोचा शायद मैं गलत समझ रहा हूँ.फिर अंग्रेजी में पढ़ा. मतलब तो वही निकलता था हिन्दी वाला :-)

क्या मैं सही समझ रहा हूँ कि रेलवे एक्ट के हिसाब से रेल यात्री टैक्सी या ऑटो के लिये मोलभाव नहीं कर सकते यानि वो जिस भी भाव में ले जायेगा जाना पड़ेगा या फिर आप दंड के भागी होंगे.आप भी देखिये. ज्ञान जी इस पर थोड़ा प्रकाश डालें तो बेहतर है.

railway_notice

समीर भाई ने लिखा

” अगर मैं कहूँ कि ९८ प्रतिशत भारत की आबादी को, जिसमें मैं भी शामिल हूँ, को न तो धन्यवाद देना आता है और न ही स्वीकारना आता है और न ही किसी का अभिनन्दन या प्रशंसा करना या फिर अपना अभिनन्दन या प्रशंसा स्वीकार करना, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. “ 

उनका कहना ठीक तो लगता है.लेकिन ये सोचनीय है कि ऎसा आखिर है क्यों और फिर भारत में ही क्यों? हालाँकि उन्होने धन्यवाद देने को टिप्पणीयों से जोड़ा जिससे मैं सहमत नहीं क्योकि ऎसा होता तो अंग्रेजी चिट्ठों में, जिसे तथाकथित वो लोग पढते हैं जो धन्यवाद संस्कृति में विश्वास करते हैं तो उनमें टिप्पणीयां ज्यादा होतीं. लेकिन सच तो यह हैं कि अंग्रेजी चिट्ठों मे हिट्स के मुकाबले टिप्पणीयां बहुत कम होती हैं. यानि हिट्स और टिप्पणीयों का अनुपात हिन्दी चिट्ठों में अंग्रेजी चिट्ठों के मुकाबले कहीं ज्यादा है.

अब आते हैं मूल प्रश्न पर क्यों आम भारतीय धन्यवाद देने या स्वीकारने में हिचकते हैं.मेरा मानना है कि हर देश और समाज के अपने अपने संस्कार होते हैं.भारत के मूल संस्कार भी आत्मसात के हैं ना कि प्रदर्शन के. किसी फिल्म में सुना था ‘इन फ्रैडशिप ..नो सॉरी ..नो थैंक्यू “. मुझे यह सही लगता है. जब हम किसी के अच्छे काम के लिये धन्यवाद या थैंक्यू बोल देते हैं तब हम उसके अच्छे कार्य का मोल चुकता सा कर देते हैं.आपने हमारे लिये ये किया हमने धन्यवाद बोल दिया. हिसाब बराबर. यदि हम धन्यवाद ना देकर उसे आत्मसात कर लें कि आपने हमारे लिये यह अच्छा किया हम भी मौका पड़ने पर आपके लिये अच्छा करेंगे तो आप उस संबंध को और मजबूत करते हैं.यहाँ हम प्रकट में भले ही धन्यवाद ना कहें लेकिन दिल में आभार का भाव जरूर रखते हैं. ठीक यही बात सॉरी के लिये भी लागू होती है.आपने कुछ गलत किया (जानबूझ कर या अनजाने में) और सॉरी बोल दिया. हो गया हिसाब बराबर.जब आप गलत काम कर सॉरी बोल देते हैं तो आप अपनी गलती पर विचार नहीं करते और फिर से उसी तरह की गलती करने के लिये खुद को स्वतंत्र पाते हैं. इसके बजाय यदि आप अपनी गलती पर विचारें और मन ही मन लज्जा का अनुभव करें तो बहुत संभव है कि आप उस गलती को दोहरायेंगे नहीं. 

जैसे हमारी पुरानी पीढियों में प्रदर्शन का उतना चलन नहीं था. तब पति पत्नी भी शायद जीवन भर एक दूसरे को “आइ लव यू” ना बोलते हों. लेकिन तब का प्रेम सही मायनों मे प्रेम था. जैसे जिम और डेला का प्रेम. जहां प्रेम आपकी जुबान पर नहीं होता वरन आपके एक्शन में,आपकी सोच में, आपके दिल में होता है. आज की पीढ़ी के लोग दिन में ना जाने कितनी बार आप “आइ लव यू” बोलते होंगे लेकिन फिर भी प्रेम की कमी है.किसी ने कहा भी है “सच्चा प्रेम वह है जब आप एक दूसरे को ये भी ना बता सकें कि आप एक दूसरे को कितबा प्रेम करते हैं “. प्रेम बताने का नहीं अनुभव करने की चीज है.पश्चिम में जहां लोग ना जाने कितने बार और कितने तरीको से “आइ लव यू” बोलते हैं फिर भी वहाँ का प्रेम कुछ कम ही लगता है.ये वहाँ होने वाले तलाकों से जाहिर होता है. इसीलिये शायद उन्हे वैलंटाइंस डे, फादर्स डे और मदर्स डे मनाने की जरूरत है. वो थैंक्स गिविंग डे भी मनाते है जहां वो ऑपचारिक रूप से लोगों को कार्ड्स वगैरह भेज के धन्यवाद ज्ञापित करते हैं.भारत में यह सब नहीं मनाये जाते…शायद इन चीजों की आवश्यकता ही नहीं है हमें.  

प्रश्न उठता है.क्या सदैव धन्यवाद या “आइ लव यू” कहने वाले पश्चिम के लोग भी आपस में उतना ही प्रेम करते हैं जितना भारत के धन्यवाद या “आइ लव यू” ना कहने वाले लोग?क्या वहाँ भी रिश्तों की गरमाहट उतनी ही है जितनी भारत में ? क्या धन्यवाद कहने वाले वो लोग एक दूसरे के प्रति उतने ही संवेदनशील है जितने भारत के लोग? दोनों समाजों के अध्ययन से ये बात साफ हो सकती है. लेकिन मेरा मानना है मुँह मे दिखावटी धन्यवाद की बजाय दिल मे धन्यवाद होना ज्यादा जरूरी है. हाँ दिल के साथ साथ ये मुँह पर भी आ जाये तो अच्छा है.लेकिन हम तो यही कहेंगे. “नो सॉरी ..नो थैक्यू ”

[मेरा यह मत चिट्ठों में टिप्पणी को लेकर नहीं है क्योकि में टिप्पणी को धन्यवाद का पर्याय नहीं मानता]

समीर जी के चिट्ठे पर राजीव जी की टिप्पणी भी विचारणीय है.

कहीँ पर मुझे विरोध लगता है

अमरीकी / भारतीय शिष्टाचार की तुलना बहुत जायज़ नहीं। भिन्न संस्कृति, भिन्न परिस्थितियाँ (सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक) तो उस पर यह तुलना और मापदण्ड भी उन्हीं के – फिर भी कम से कम सिद्धांत रूप में, कहीँ हम आगे तो कहीँ वे। हम किन्हीँ कार्यों में कर्तव्य और अधिकार समझते और देते भी हैं – वे किन्हीँ और कार्यों में । हम आज के आधा तीतर आधा बटेर भारतीय+पाश्चात्य समाज में ज़रूर दोहरी मानसिकता अपनाते हैं, तो गड़बड़ होती है, कौन से मानक लगायें? याद करें पिछले वर्ष 2006 जुन-जुलाई का रीडर्स डाइजेस्ट का शिष्टाचार सम्बन्धी सर्वेक्षण और उसमें प्रयोग किये गये बेतुके और पाश्चात्य मानक! जिनमें मुंबई को निम्न दर्ज़े का माना गया.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: बहस, धन्यवाद संस्कृति, काकेश, मेरी बात

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सबको लिंकित करने वाली नीलिमा जी,हम को न लिंकित करने की चूक कर, बता रही हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग में  विमर्श की नयी परंपराऎं बन रही हैं. अब कोई शोधार्थी यह कहे तो अपन की क्या विसात कि उससे सहमत ना हो. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हमने सोचा कि इस विमर्श के नये मंच पर हम भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा दें वरना क्या पता हमारा नाम इतिहास में आते आते रह जाये.[ बात दरअसल यह है कि पिछ्ली पोस्ट में हमने गणेश जी को एक ऎप्लीकेशन भेजा था जो अभी तक अप्रूव नही हुआ तो सोचा क्यों ना नयी पोस्ट लिख डालें ]

वैरागी जी ने प्रश्न उठाया कि हमारी युवा पीढ़ी की ‘कैरीयरिस्‍ट’ सोच के कारण हम मानवीय मूल्यों को खोते जा रहे हैं. दूसरी ओर बोधिस्तव जी कह रहे हैं कि हर कोई चल रहा है भाग रहा है ..इसलिये चलो !!.. चलो तो सही पर कहाँ? कहाँ हैं मंजिल? वो पूछ्ते हैं “क्यों लिखते हो। इतना जो लिख रहे हो उसके पीछे कोई उद्देश्य है या ऐसे ही लिख रहे हो। मेरा सिर्फ इतना ही कहना है कि लिखो खूब लिखो पर तय कर तो कि क्यों लिख रहे हो और अगर तय कर लिया है तो मेरे इस उपदेश पर कान मत दो।”दोनों प्रश्न एक जैसे ही हैं पर समाधान क्या है?

एक ओर हम निजी बैकों की तारीफ करते है और दूसरी ओर उनकी आक्रामक विपणन शैली को कोसते हैं.एक ओर हम सरकारी कामकाज को देखते हैं तो कहते हैं कि सारा सिस्टम धीमा है..काम ही नहीं करता दूसरी ओर यदि कोई तेज काम कर अच्छे परिणाम देता है और कैरियर में आगे बढ़ता है तो कहते हैं कि मानवीय संवेदना खो गयी है. आगे बढ़ना जरूरी है.मानव जीवन की कहानी आगे बढ़ने की कहानी है.’आक्रामक’ होना जरूरी है ..नहीं तो मिटने के लिये तैयार होना पड़ेगा. ‘सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट’ का सिद्धांत मानव पर भी उतना ही लागू होता है जितना जानवरों पर.ये सच है कि इस समस्त प्रक्रिया में हम कुछ संवेदनाऎं खो देंगे लेकिन ये नियति की सतत प्रक्रिया है.आप इससे बच नहीं सकते. आपको चलना ही होगा.

जीवन एक अबूझ पहेली है. हर चीज जो हो रही है या घट रही है ना वो हमारे हाथ है ना उसका परिणाम ही हमारे हाथ है.हम चल रहे हैं या लिख रहे हैं क्यों? ये वैसा ही प्रश्न है जैसे कि कोई कहे कि मैं कौन हूँ.हम कोई भी काम करते हैं जो हमारी नजर में हमें लगता है कि हमारे लिये करना ठीक होता है. सिगरेट पीने वाला जानता है कि ये सिगरेट हमको नुकसान पहुंचा रही है फिर भी पीता है. लेकिन वो सिगरेट तब भी पीता है क्योकिं उसे सिगरेट पीना अच्छा लगता है.हमारी जीवन शैली हमारे मस्तिष्क के किसी भाग से निर्धारित होती है.जिसे ही शायद ‘मन’ कहते हैं.जिसे ही नियंत्रित करने को ही हमारे ऋषि मुनि तपस्या किया करते थे.क्योंकि सब कुछ जो भी है वो मन ही निर्धारित करता है. आप दु:ख से भरे क्षण में भी सहज हो सकते हैं और खुशी के क्षण में भी असहज हो सकते हैं.

किसी ने सही कहा है..मन के हारे हार है और मन के जीते जीत. जीत-हार,जय-पराजय, खुशी-ग़म,लाभ-हानि,अच्छा-बुरा,मेरा-तेरा,अपना-पराया,धरम-अधरम सब कुछ मन ही तो निर्धारित करता है. तो इसे साधने से क्या सब कुछ ठीक हो जायेगा?इस प्रश्न का उत्तर तो वही दे पायेगा जिसने इसे साधा हो. आप बतायें क्या करें ? मन को साधें कि बढ़े चले जायें.

हिन्दी चिट्ठाजगत की दुनिया आजकल शोधमय भी है और हिटास के प्रति जागरूक भी.कोई हिट होना सिखा रहा है तो कोई हिट करना.हिट पर आधारित सभी चीजें हिट हैं.हिट की हीट का ये असर है कि लोग हिट की चाह में लेखन कर रहे हैं.भले ही आप कहें कि हिट के लिये न लिखो खुद के लिये लिखो लेकिन इसका परोक्ष लाभ भी है कि हिन्दी में ‘कुछ’ लिखा जा रहा है. सारा लिखा स्तरीय ना भी हो तो कूड़ा भी नहीं है.

विषयों की विविधता भी बढ़ी है. विविधता चुनाव का अवसर देती है और बने बनाये परिवार या गुट से अलग होने का अवसर भी. वो दिन धीरे धीरे खतम हो रहे हैं जब आपको किसी भी लेख को पढ़कर ना चाहते हुए भी “अच्छा है अच्छा है” कहना पड़ता था. अभी आप “पीठ खुजाने” के बोरिंग काम से ऊपर उठकर विमर्श के लिये तैयार हो पाते है या हो पायेंगे. टिप्पणीयों में विमर्श हो या लेखों में विमर्श किसी भी तरह का काम हिन्दी के लिये अच्छा ही है. हाल में हुए विवादों ने भले ही किसी के लिये व्यक्तिगत रूप से भला किया हो या ना हो हिन्दी और हिन्दी चिट्ठाजगत का जरूर भला किया है.लोग अपने विचार खुलकर रखने लगे है. चाहे उसकी परिणति भड़ास के रूप में हो या परिवर्तित पंगेबाज के रूप में.

ये परिवर्तन मैने भी खुद में भी महसूस किया है.मेरा भी हिन्दा चिट्ठाजगत से पारिवारिक मोह भंग हुआ है और मेरी अन्य विषयों के प्रति सोच विस्तृत हुई है. पहले मैं सोचा करता था कि शायद में किसी चिट्ठाकार से ना मिलूं या उससे बातें ना करूँ ..गुमनाम रहकर ही लिखते रहूँ ऎसी सोच थी..यह मेरे अन्दर के भय के कारण था या मेरे अंतर्मुखी व्यक्तित्व के कारण ..नहीं मालूम ..पर अब वो सोच नहीं रही.. प्रमोद जी ने मेरे किसी लेख पर अपनी टिप्पणी में कहा था कि “डरो मत अब बड़े हो गये हो”…मुझे लगता है कि मैं सचमुच बड़ा हो गया हूँ..ये अहसास मुझे दूसरों को समझने के लिये उकसाता है.. फालतू की बातों में उलझ कर समय व्यर्थ ना करूं ऎसी सोच देता है.. इसलिये मैं इसे चिट्ठाजगत की उपलब्धि मानता हूँ …कम से कम अपने लिये…

नये फीड संयोजको का आना शुभ संकेत है आने वाले समय इनकी जरूरत और भी महसूस की जायेगी..इनका स्वरूप भी बदलेगा और इनसे होने वाली अपेक्षाऎं भी ..

आशा करें हम हिन्दी का रोना रोने वाले लोग हिन्दी के नाम पर खुश भी हो सकेंगे..

कल के टाइम्स ऑफ इंडिया में पूजा की तसवीर पहले पन्ने पर थी.चित्र नीचे देंखें ..खबर पढ़ी तो दिल दहल गया और साथ ही मन ही मन पूजा के साहस की प्रसंशा भी की.आज मसिजीवी ने जब इस पर लिखा और फिर सुजाता जी ने भी इसे छुआ तो रहा ना गया..और कुछ शब्दों की आड़ी तिरछी रेखाऎं पूजा के रूप में बोलने लगीं…

(1)
तुम्हें याद है
अपना वो समय
जब किसी को
निकाल दिया जाता था
सिर्फ बेटी पैदा करने के जुर्म में.
मार दिया जाता था
भविष्य की जननियों को.
सिर्फ इसलिए कि वो आपकी
मर्दानगी का विरोध नहीं कर सकती,
लेकिन क्या मार पाओगे तुम,
एक मां की ममता को
सुखा पाओगे क्या
उसके आंचल का दूध
कल वही  भय तुम्हे घेरेगा
जब तुम्हारा पुरुषवादी व्यक्तित्व
तुम्हारा बेटा
ढूंढने निकलेगा
एक अदद लड़की।

(2)
ना करती प्रतिरोध तो क्या करती?
सहती …???
और रहती उन भेडिय़ों के साथ.
आप की सभ्य दुनिया,
जो नंगेपन की आदी है
क्या देखती है नंगई सिर्फ मेरी
दुनिया को क्यों नहीं दिखायी देता
इन मर्द रूपी नामर्दों का नंगा नाच. 

(3)

हा हा हा …
अब मेरे प्रतिरोध को हवा देने
तुम भी आ गये
कहां थे तुम ??
जब जल रहीं थी बहू बेटिंयां
दहेज के नाम पर,
सताया जा रहा था उन्हें,
खून किया जा रहा था
उनके मासूम सपनों का.
तब तुम भी शायद
किसी राशन की दुकान में लगे
कैरोसीन ले रहे थे.

(4)
सुखी हैं सब परदे के पीछे
ढंक गये हैं घाव पट्टियों से.
अब उन पर मक्खियां नहीं भिनभिनाती
वो गन्दा सा घाव ढंक दिया गया है.
लेकिन दर्द !!
वो तो अभी भी है …
बल्कि गहरा गया है
उसके साथ
अब मन का दर्द जो जुड़ गया है.

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(5)

कितना घिनौना है ये सच!!
निकलना पड़ता है जब
एक मजबूर लड़की को
घर से …
इस तरह की हालत में
और तुम आतो हो साथ साथ
स्कूटर से,साइकिल से
साथ देने नहीं
मजे लेने के लिये…

कल योगेश जी ने बताया कि पूजा की अर्ध-नग्नता के पीछे किसी मीडिया वाले का हाल था.यदि ये सच है तो निन्दनीय है. सच जो भी हो मुझे आश्चर्य इस बात का है कि कैसे मीडिया इस बात को इतना बढ़ा चढा कर पेश कर सकता है.टाइम्स ऑफ इंडिया ने पूजा की अनसैंसर्ड चित्र को अपने मुख पृष्ठ पर छापा. क्या ये सही है??

image आप गूगल पर पूजा चौहान के बारे में खोजें आपको ना जाने कितनी साइट उसके चित्रों से भरी मिलेंगी…मुझे एक झटका सा लगा जब कुछ पॉर्न ब्लौग और साइट पर पूजा के चित्रों को चट्खारे ले के पेश किया गया. कुछ लोगों ने इसे भारत  से भी जोड़ा ..उनका कहना है कि भारत में ऎसी घटनाऎं बढ़नी चाहिये ताकि वो कुछ और ऎसी तसवीरें देख सकें…

इंटरनैट के लिखे को आप मिटा नहीं सकते.कुछ दिनों बाद जब पूजा के परिवार वाले या उसकी खुद की बेटी जब इंटरनैट पर ये सब देखेगी तो उस पर क्या बीतेगी? कैसे जियेगी वो इस तथाकथित सभ्य समाज में? क्या विरोध का ये तरीका ठीक है?? क्या पूजा की नग्नता में मुख्य सवाल कहीं छुप गया है? क्या हम ऎसे ही चटखारे लेकर इस समाचार को छापते रहेंगे और पढ़ते रहेंगें…??

कल अपनी कुछ कविताओं में भी कुछ ऎसे ही प्रश्न उठाने की कोशिश की थी मैने …पर बहुत से लोगों की नजर वहां पर शायद नहीं पड़ी…

मेरी कल की पोस्ट यहां पढें…

पूजा का वीडियो यहां देखें ..

क्या जबाब है आपके पास इन सवालों का !!

पिछ्ले लेख पर ज्यादा प्रतिक्रियाऎं तो नहीं आयी लेकिन जो  भी आयीं उन्होने कुछ नये प्रश्न खड़े कर दिये.प्रमोद जी बोले

यह दिल्‍ली ही नहीं, मुंबई- कमोबेश किसी भी बड़े भारतीय शहर की अंदरूनी डायरी है. इस अनुभव से नतीजा क्‍या निकलता है? एक तो वह जिसे आप समूहबद्धता की सहूलियत का सीधा, आसान-सा नाम देकर छुट्टी पा सकते हैं. और देखना चाहें तो (मुझे हर जगह वही प्रभावी दीखता है)- कि ऊपरी तौर पर आधुनिकता के दिखावटी हो-हल्‍ले के बावजूद किस तरह यह हमारी एंटी-शहरी, घेटोआइज़्ड और अपनी पहचानी सामूहिकता से बाहर किसी भी अजनबीयत से भारी भय की मानसिकता है! आपको-हमको उतना न दिखे, मगर किसी भी अनजानी व नयी जगह में अल्‍पसंख्‍यक जिसकी सबसे ज्‍यादा तक़लीफ़ें व अलगावपन झेलते व जीते हैं.

 

यानि वो मानते है कि मेरे अनुभव मात्र मेरे अनुभव ही नहीं हैं उनका एक सार्वजनिक सरोकार है.लेकिन वो उन अनुभवों के नतीजे से खुश नहीं उनका कहना है ये नतीजा उतना सहज नहीं जितना मानने की भूल मैं कर रहा हूँ. वरन ये काफी ज़टिल है और इसके मूल में कहीं ना कहीं हमारे अल्पसंख्यक होने पर भय की मानसिकता भी है….मैं उनसे पूरी तरह से सहमत हूँ कि जब हम अल्पसंख्यक होते हैं तो अजनबीयत हमें एक मानसिक भय का अहसास करा देती है… ठीक इसी तरह का भय घुघूती जी की नायिका भी महसूस करती है किन्ही और अर्थों और संदर्भों में…यही भय हमें समूहबद्ध होने के लिये बाध्य करता है…

मसिजीवी जी बोले

काकेश थोड़ा सरलीकरण किए जा रहे हैं, जरा थमिए:
आप दिल्‍ली के बारे में जो कह रहे हैं वह पूरी तरह निराधार नहीं है पर आप बसावट के अधिकांश उदाहरण पेशेगत व क्षेत्र के देकर इसे स्‍वाभाविक कहे दे रहे हैं- जाति की भी भूमिका है उसे नजरअंदाज न करें और धर्म की भी- पर विशेष बात यह कि ये दिल्‍ली की प्रकृति उस रूप में नहीं है जैसी रवीश बता रहे हैं (अगर सच है तो)और फिर ‘अपने जैसे’ लोगों के इकट्ठे होने में जो सेल्‍फ व अदर की गहरी निर्मिति है वही तो ‘दंगे’ की शुरूआत है।
एक नजर ताज एपार्टमेंट (गीता कालोनी) पर भी डाल आएं और स्‍पष्ट हो जाएगा। ये जो अल्‍पसंख्‍यकों में भय-मनोवृत्ति होती है, महानगर उसका निषेध करता है या कहें आदर्श रूप में उसे करना चाहिए पर यदि वह उसका पोषण करने लगे तो ये महानगर का ग्रामीकरण है जो ‘गुजरातों’ को जन्‍म दे सकता है- देता है।

यानि वो भी मान रहे हैं जो मैने कहा वो निराधार नहीं है.वो इस बात से सहमत नहीं हैं कि समूह से जुड़ने में केवल पेशा या क्षेत्र ही महत्वपूर्ण नही होते वरन जाति की भी एक अहम भूमिका होती है.

अभय जी ने चिप्पी लगायी.

मियाँ काकेश, आप की पोस्ट से ज़्यादा आप की पोस्ट पर टिप्पणीकारों से सहमत हुआ जाता हूँ.. आशा है आप बुरा न मानेंगे..प्रमोद जी और मसिजीवी ने पते की बात कही है..

तो वो भी इस बात से सहमत है कि ये चीजे तो हैं ही.तो इस बात पर तो सहमति बनती है कि हम समूहबद्ध होते हैं और इसमें कहीं ना कहीं हमारे मानसिक भय का भी हाथ होता है, हमारे समूहबद्ध होने के कई कारण हो सकते हैं.उन्ही कारणों पर प्रकाश डालने के लिये आपको कुछ अनुभव और सुनाता हूँ.

[ पिछ्ली बार जब अभय जी से मिला था तो अभय जी ने कई अच्छी अच्छी बातें बतायीं थी,जिसे प्रमोद जी ने कहा कि काकेश शिष्यत्व भाव से सुनते रहे.उन्ही बातों में एक थी कि आपको अपने अनुभवों को अपने लेख में लिखना चाहिये. उसी का अनुकरण कर कुछ अनुभव आप से बांटे थे और आज भी बांट रहा हूँ ]

मेरा बचपन एक छोटे शहर में गुजरा.वैसा ही जैसा की भारत एक छोटे कस्बे का जीवन होता है ठीक वैसा ही जीवन था वहां.शहर जो कई मुहल्लों से मिलकर बना था.वहां एक क्रिकेट टूर्नामेंट होता था.जिसमें सभी मुहल्लों की टीमें रहती थी. लोग अपने अपने मुहल्ले की टीमों का समर्थन करते.हम भी अपने मुहल्ले की टीम के समर्थन में रहते.बड़ा ही जबर्दस्त माहौल होता जब अपनी अपनी टीमों के लिये लोग नारे लगाते.  ज़ीतने पर बड़ी ही शान से जुलुस निकालते.लोग समूहबद्ध होते थे और उस समूह का केन्द्र होता था मोहल्ला.

इसी तरह एक और ट्रॉफी वहां होती थी “हिल टॉप ट्रॉफी” वहां आसपास के शहरों की टीमें रहती थी ठीक वैसा ही माहौल होता जैसा पहले वाले टूर्नामेंट में था बस समूहबद्ध होने का कारण बदल जाता हम मुहल्ले की बजाय अपने शहर को समर्थन देने लगते.

जब इंजीनियरिंग के लिये दूर दूसरे शहर में गया तो लगता कि कितने दूर आ गये हैं.. अपना पहाड़ लगता कि छूट गया है.. मैदान का जीवन पहाड़ से बहुत से क्षेत्रों में अलग होता है.. उस समय यदि कोई भी पहाड़ का व्यक्ति मिल जाता तो लगता कि हाँ ये अपना ही तो है.. बड़े ही अपनेपन की फीलिंग होती एक ऎसा व्यक्ति जो अपने ही जैसे माहौल से आया..तो हॉस्टल में सारे पहाडियों का एक ग्रुप होता..इसी तरह से कुछ लोग नॉर्थ ईस्ट (असम,मेघालय) से आये हुए होते थे ..उनका अपना एक ग्रुप था..इस तरह के बहुत से ग्रुप थे..ऎसा नहीं था कि इन ग्रुपों में आपस में कोई वैर भाव हो या किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता या जलन.. पर  फिर भी ग्रुप थे..मतलब यहाँ भी हम समूह बद्ध हुए ..समूह का कारण था हमारा क्षेत्र यानि पहाड़ …

फिर नौकरी के लिये बंगाल जाना पड़ा.. पहली बार आप बंगाल जाओ जब आप बंगाली संस्कृति और भाषा को ठीक से नहीं जानते तो आपको सब कुछ अजनबी सा लगता है…सारे बंगाली लोग मिलते ..वहां उस समय यदि कोई हिन्दी भाषी मिलता तो लगता कि अपना ही है…वहां अक्सर जब लोग मिलते तो पूछ्ते “तुमि बंगाली ना हिन्दुस्तानी ?” ..”तुम बंगाली हो या हिन्दुस्तानी? ” पहले पहले तो समझ में नहीं आया..कि क्या पूछा जा रहा है..क्या बंगाल हिन्दुस्तान में नहीं है ? फिर ऎसा प्रश्न क्यो कि मैं बंगाली हूँ या हिन्दुस्तानी.. लेकिन फिर लगा कि लोग हिन्दी भाषियों को हिन्दुस्तानी कहके बुलाते हैं… तो एक सहज जुड़ाव उन लोगों से हो गया जो हिन्दी भाषी थे…  कोई यदि कहता मॆं यू पी का हूँ या फिर बिहार का हूँ तो लगता हाँ ये अपना ही तो है… समूहबद्ध होने का कारण हमारी मातृ भाषा बन गयी थी….

एक बार ऑफिस के काम से लंदन जाना पड़ा .. वहाँ पहुंच कर भी एक अजनबियत की फीलिंग हुई ..लगा कि कहां आ गये ..कोई अपना जैसा नहीं …सब के सब अंग्रेज .. भाषा भी सामान्य अंग्रेजी नहीं ..बहुत ध्यान से सुनना पड़ता.. भोजन भी अलग… तौर तरीके भी अलग और संस्कृति भी अलग … वहां लगता कि काश कोई भारतीय मिल जाये..और यदि कोई मिल जाता तो बहुत ही अपना सा लगता ..चाहे फिर वह दक्षिण भारतीय हो या फिर उत्तर भारतीय..कोई गुजराती हो या फिर कोई बंगाली… कोई  यूपी का हो या कश्मीर का ..सब अपने लगते.. ऎसे ही एक बार एयरपोर्ट पर एक अंग्रेज से दिखने वाले एक व्यक्ति ने पूछा ..”आर यू इंडियन ? ” तो मैने जबाब दिया “यस” ..फिर तो वो बहुत ही प्यारी उर्दू मिश्रित हिन्दी में शुरु हो गये ..अपने बारे में बताने लगे..पता लगा कि वो कश्मीरी हैं.. तो यहां हमारी समूहबद्धता का कारण था भारत…

इसी तरह से यदि एक से ज्यादा ग्रह होते जहां जीवन होता तो दूसरे ग्रह में जाके हम किसी पृथ्वी वासी को सहजता से अपना लेते…

तो मेरी समूहबद्धता की शुरुआत मोहल्ले से शुरु हुई और देश तक गयी.. ऎसी ही हम सबकी होती है..हां इसमें धर्म भी रहता है जाति भी…कभी हम धर्म के नाम पर एकत्रित होते हैं तो कभी जाति के नाम पर ..कभी क्षेत्र के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर .. कभी पेशे के नाम पर तो कभी रुचियों के नाम पर .. ये एक प्राकृतिक स्वाभाविक प्रक्रिया है ..जो दिल्ली में भी उतनी ही है जितनी अहमदाबाद में ..बंगाल में भी उतनी ही है जितनी लंदन में….इसके लिये किसी एक शहर को ये कहके अलग कर देना कि नहीं इस शहर में ही इस तरह की बातें हैं तो ये मेरे हिसाब से गलत है..हाँ हर एक शहर अपनेआप अलग है..हर शहर की अपनी मानसिकता है..कहीं ..कोई चीज प्रधान है कहीं कोई और… जैसा मसिजीवी ने कहा कि ये दंगो का आमंत्रण है तो ये भी पूरी तरह से ठीक नहीं लगता.. कि जाति या धर्म के आधार पर समूह हैं तो वो आपस में लड़ेगे ही.. लड़ने के लिये केवल समूह ही जिम्मेवार नहीं अन्य कई कारण भी जिम्मेवार होते हैं…

अंत में घुघुती जी की प्रतिक्रिया जो मेरे को मेरे विचारों के करीब लगती है.

बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो हमें स्वाभाविक व व्यवहारिक लगती हैं किन्तु जो पोलिटिकली करेक्ट नहीं होतीं। मान लीजिये मैं शाकाहारी हूँ और मेरा पूरा परिवार शाकाहारी है तो यदि मैं शाकाहारी लोगों के बीच रहूँगी तो मेरा जीवन सरल हो जाएगा। मैं रात दिन पड़ोसियों के घर से आती माँस पकने की गन्ध से बच जाऊँगी। मैं स्वयं माँस पकाती हूँ पर मुझे भी वह गन्ध असह्य लगती है।

इसी तरह यदि किसी सोसायटी में केवल वृद्ध रहते हों तो वे पार्टियों व संगीत की ऊँची आवाज से भी बच जाएँगे और युवाओं को टोकने से भी। पर यही सब बात जब धार्मिक या जातीय स्तर पर कही जाती है तो स्वाभाविक रूप से बुरी लगती है। यदि मैं किसी माँसाहारी ब्राह्मण को घर किराये पर देने से मना करती हूँ तो उसे बुरा नहीं लगेगा, पर यदि किसी अन्य धर्म वाले , या जाति वाले को माँसाहार के आधार पर मना करूँगी तो उन्हें निश्चय ही लगेगा कि मैं धार्मिक या जातीय भेदभाव कर रही हूँ। यह साधारण सा मनोविज्ञान है।

हाँ, यह भी सही है कि जितनी अधिक विविधता किसी मौहल्ले में होगी उतना ही वह हमें सहनशील व औरों के अधिकारों व भावनाओं के प्रति जागरुक बनायेगी।

 तो मैने तो अपने अनुभव आप से बांट दिये ..अब आप भी अपनी प्रतिक्रियाऎं दे ही दें….