आज सुबह जब पोस्ट लिखी (सुबह सुबह चार बजे उठ कर) तो यह अन्दाजा नहीं था कि यह एक बहस का रूप ले लेगी.हाँलाकि मंशा तो थी ही कि एक बहस हो. लेकिन आशा के विपरीत लोग आये और उन्होने बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने विचार लिखे. कुछ लोगों ने जहाँ मेरी सोच से सहमति दिखायी वहीं अनुनाद जी ने और कुछ अन्य ने खुल कर असहमति दिखायी. मैं इस असहमति का स्वागत करता हूँ. मैं मानता हूँ कि हमारे लक्ष्य एक ही हैं …हाँ मार्ग अलग अलग. मैं भी यही चाहता हूँ कि हमारे देश का सारा तंत्र हिन्दी में चले लेकिन मेरे चाहने से कुछ नहीं होने वाला इसलिये जो परेशानी मैने झेली है कम से कम आने वाली पीढियां वह परेशानियाँ ना झेलें. इसलिये मेरा मानना अभी भी यही है कि वर्तमान परिस्थितियों में बिना अंग्रेजी सीखे अंग्रेजी का खात्मा नहीं किया जा सकता.

अनुनाद जी के विचारों से भी आप परिचित हों.जो उन्होने पिछ्ली पोस्ट पर दिये थे.

आपकी ये दोनो सोच

१) कि बारहवीं के बाद विज्ञान की पढ़ाई अंग्रेजी में इसलिये होती है कि हिन्दी में किताबें नहीं हैं;

२) कि हिन्दी में किताबें उपलब्ध कराने में पचास वर्ष और लग जायेंगे

दोनो से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता। लगता है कि आप क्रमश:-विकास-प्रक्रिया (इवोलूशन) के मूल कांसेप्ट को ही नहीं समझते हैं।

अंग्रेजी में किताबें नहीं हैं क्योंकि उनकी मांग नहीं है (अर्थशास्त्र का सरल सिद्धान्त यहाँ काम कर रहा है) ; मांग इसलिये नहीं है कि हिन्दी के बजाय अंग्रेजी में पढ़ना अनिवार्य कर रखा गया है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि हिन्दी में विषयों का पढ़ना अनिवार्य कर दिया जाय तो एक महीने के भीतर किसी भी विषय की पुस्तकें बाजार में होंगी।

आपका यह भी मानना कि हिन्दी के वजह से बच्चे पिछड़ जाते हैं, तथ्यों से दूर है। मैने भी बारहवीं तक पूर्णत: हिन्दी में पढ़ाई की। मुझे कभी भी नही लगा कि मै हिन्दी के कारण कभी पिछड़ गया।

[ मुझे बार बार यह लगता रहा है कि मैं हिन्दी के कारण पिछ्ड़ गया ]

कोई भी हिन्दी के कारण पिछड़ता नहीं है, अंग्रेजी के कारण पिछड़ता है। और इसी दुराचार का विरोध होना चाहिये। इस देश को आगे बढ़ाना है तो व्यक्ति के विषय के ज्ञान की परीक्षा ली जाय, न कि अंग्रेजी के ज्ञान की परीक्षा, जो कि आज हो रही है।

अंग्रेजी की पढ़ाई एक भाषा के रूप में करायी जाय ; जिसको जरूरी हो उसी को पढ़ायी जाय (किसी को राजदूत के रूप में रूस या चीन जाना है तो उसके लिये रूसी या चीनी महत्वपूर्ण है, न कि अंग्रेजी); चापरासी पद के लिये अंग्रेजी, क्लर्क के लिये अंग्रेजी, सैनिक के लिये अंग्रेजी… क्यों जरूरी है? क्या आपने सोचा है कि पूरा देश ज्ञान अर्जन के बजाय डिक्शनरी का रट्टा क्यों लगा रहा है? इसमें कितना करोड़ मानव-घंटा बर्बाद हो रहा है? कुछ शब्द आ गये तो ग्रामर का चक्कर, ग्रामर आ गया तो ‘फर्राटे अंग्रेजी बोलने’ का चक्कर, फर्राटे अंग्रेजी भी बोलना आ गया तो अमेरिकन या ब्रिटिश एक्सेंट में बोलने का चक्कर.. ये दुष्चक्र है जिसमें पूरे देश को झोंक दिया गया है।

और हाँ, यदि किसी ने अंग्रेजी के बल पर नौकरी हासिल कर ली (जैसा कि पूरे देश में हो रहा है) तो इसको देश का विकास के रूप में समझने की भूल मत कीजिये। इसका केवल इतना अर्थ है कि किसी ने किसी दूसरे का हक गलत बहाने (अंग्रेजी के ज्ञान) के कारण छीन लिया। विकास तब होता है जब इन्नोवेशन होता है; नागरिक विभिन्न छेत्रों में रचनात्मकता से भरपूर होते हैं। दूसरे देश के लोगों से पहले कुछ नया कर लिया जाता है आदि। और ये सब तभी सम्भव है जब लोग अपनी भाषा में सोचें, पढ़े, विचार-विमर्श करें। विदेशी भाषा (अंग्रेजी) में होते हुए हजारों सेमिनार मैने देखे हैं; लोग विचार-विनिमय के बजाय प्रश्न पूछने और उत्तर देने से भागते हुए नजर आते हैं। ऐसे सेमिनारों से खाक फायदा होगा?

इस देश को अंग्रेजी की गुलामी करते करीब दो सौ साल हो गये। किसी दूसरे देश से तुलना करते हुए विकास के आंकड़े तो बताइये। केवल रटे-रटाये मुहावरे दोहराने से काम न चलाइये।

आशा है आप लोग इस बहस को जारी रखेगें.

पिछली पोस्ट से शायद यह लगा कि मैं कोई हिन्दी-अंग्रेजी विवाद उत्पन्न करना चाहता हूँ जो कि बकौल ज्ञान जी हिन्दी वालों का प्रिय शगल रहा है. लेकिन मेरा लक्ष्य यह नहीं था.मैं तो अपने अनुभव आपसे बांटना चाहता था.मैं अग्रेजी का विरोध नहीं करता बल्कि मैं तो अंग्रेजी की वकालत करता हूँ और कहता हूँ कि आज कि वर्तमान परिस्थितियों में बिन अंग्रेजी सब सून.

अधिकतर हम लोग केवल समस्या की बात करते हैं समाधान की नहीं. समस्या तो हम सब जानते ही हैं लेकिन आज की परिस्थिति में इसका समाधान क्या है. मेरे विचार से हमें दो मुँही रणनीति ( Two Pronged Strategy) से काम करना चाहिये. 1. अंग्रेजी को अनिवार्य करें और 2. हिन्दी को बढ़ावा दें. आपको मेरी बात में विरोधाभास लग रहा होगा. आइये समझते हैं इसे.

अंग्रेजी को अनिवार्य करें : आज के युग में अंग्रेजी के बिना काम नहीं किया जा सकता. यदि आप उच्च शिक्षा की बात करें तो वहाँ अधिकतर किताबें हिन्दी में उपलब्ध नहीं है. इसलिये वर्तमान परिस्थितियों में अंग्रेजी के बिना काम किया जाना मुश्किल है. तो अंग्रेजी तो अनिवार्य है ही. और यह बात हम सभी जानते हैं इसीलिये जिसके पास पैसा है वो अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलवाता है. जो गरीब है वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजता है. ऎसे में अंग्रेजी अमीर की है हिन्दी गरीब की. इसलिये गरीब गरीब ही बना रहता है और अमीर और अमीर होता जाता है.यदि हम सरकारी स्कूलों में भी अग्रेजी अनिवार्य कर दें तो हम काफी हद तक यह खाई पाट सकते हैं. यही भाषा का साम्यवाद है.

हिन्दी को बढ़ावा दें: आज हिन्दी में समस्या यह है हम हिन्दी हिन्दी का नारा तो लगाते हैं लेकिन हमारा सारा काम होता है अग्रेजी में. उच्च शिक्षा के लिये आज हिन्दी में किताबें उपलब्ध नहीं हैं और हम इसे सरकार की गलती मान कर चुप बैठ जाते हैं.यदि हम अंग्रेजी को अनिवार्य कर दें तो हमारे पास ऎसे लोग बहुतायत में होंगे जो दोनों भाषाऎं जानते होंगे तब बहुत सारा अनुवाद हिन्दी में किया जा सकेगा.विश्व में भारत आज एक बहुत बड़ा बाजार है. हिन्दी को बाजार की भाषा बनायें. जब हिन्दी समाचार बिकते हैं, हिन्दी सीरियल बिकते हैं, हिन्दी फिल्मे बिकती है तो हिन्दी भी बिकाउ भाषा होगी. तब लोगों की रुचि भी हिन्दी में बढेगी.

कुछ और बिन्दु हैं जिन पर हमें विचार करना होगा.

1. अंग्रेजी बोलना ना ही गुलामी का परिचायक है ना ही अंग्रेजी बोलने वाला श्रेष्ठ है.

2. हिन्दी बोलने वाला ना तो किसी मायने में हीन है ना ही हिन्दी में काम करना देशभक्ति ही है.

3. हिन्दी का समर्थन अंग्रेजी का विरोध नहीं और ना ही अंग्रेजी का समर्थन हिन्दी का विरोध है.

4. आप ना तो हिन्दी बोलने में संकोच करें ना ही अंग्रेजी बोलकर अपने को श्रेष्ठ माने.

5. अंग्रेजी बोलने में शंर्म ना करें.यह ना सोचें कि आप कुछ गलत बोल देंगे.

6. सब कुछ सरकार पर ना छोड़े. अपने स्तर पर प्रयास करें.अनुवाद ज्यादा से ज्यादा हों. उसके लिये जरूरत है कि दोनों भाषाओं के जानकार बढ़ें.

7. ग्राही बने. दूसरी भाषा के शब्दों को अपनायें.हर शब्द का हिन्दी अनुवाद ढूंढने की कोशिश ना करें. 

8. हिन्दी का बाजार बनायें.

9. व्याकरण पर ज्यादा ध्यान ना देकर संप्रेषण पर ध्यान दें.

10. शब्दों को मरने से बचायें. जितना हो सके अपनी भाषा के पुराने शब्द ढूंढें और उनको प्रयोग करें.

11. यह समझ लें कि आप हिन्दी में काम कर रहे हैं तो हिन्दी की सेवा नहीं कर रहे हैं ना ही आप अतिरिक्त रूप से देश भक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं.

12. अपनी हीन भावना से लड़ें.

13. भाषा को विवाद का विषय ना मान कर संप्रेषण का माध्यम मानें और जितनी अधिक भाषाऎं सीख सकें सीखें.

और अंत में आलोक जी ने जो कहा.

14. सही गलत अंगरेजी की चिंता ना करें, जैसी अंगरेजी अधिकांश भारतवासी बोलेंगे, वही सही मानी जायेगी। अंगरेजी अब एक भारतीय भाषा है, जो ब्रिटेन वाले भी बोल लेते हैं। पचास करोड़ भारतवासी जैसी अंगरेजी बोलेंगे, वही मानक हो जायेगी।

तो ये तो थे मेरे कुछ बिन्दु जो हमें समाधान की ओर ले जा सकते हैं.

अंत में क्या आप बता सकते है “घी (ghee)” की अंग्रेजी क्या है? Confused

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अंग्रेजी व हीन भावना

जब मैने पिछ्ला लेख लिखा था तब कोई इरादा नहीं था कि मैं कोई विवाद खड़ा करूं लेकिन ना जाने कुछ लोगों को वो पोस्ट विवादगर्भा लगी. खैर जाने दीजिये आप तो मेरी कहानी सुनिये जिसका वादा मैने अपनी पोस्ट में किया था. बचपन से अंग्रेजी ना जानना आपको कदम कदम पर परेशान करता है. जब मैं निचली कक्षाओं में था यानि कक्षा सात-आठ में तब कई मित्र ऎसे थे जो कक्षा पांच तक अंग्रेजी माध्यम से पढकर आये थे. उनके घर में अंग्रेजी माहौल भी था. यानि उनके माता पिता भी अंग्रेजी जानते थे.घर में अंग्रेजी अखबार आता ..अंग्रेजी पत्रिकाऎं आती.वो लोग अंग्रेजी गाने भी सुनते. तो कई बार बातों बातों में वो अंग्रेजी से संबंधित किसी बात की चर्चा करते तो मुझे कुछ भी समझ नहीं आता. वो लोग “हम्पटी डम्पटी सैट ऑन ऎ वॉल” या “बाबा बाबा ब्लैक शीप” जैसी पोयम की चर्चा करते तो वो सारी बातें अपने सर के ऊपर से निकल जाती. हम तो “चंदा मामा दूर के” या “ढोल बजाता भालू आया ढम ढम ढम” जैसी बाल कविताऎं जानते थे लेकिन उनकी चर्चा ही नहीं होती. उस समय मन को चोट लगती और एक हीन भावना का अहसास होता.

बचपन से ही लगा कि अपनी अंग्रेजी सुधारनी चाहिये.लेकिन सुधारें तो कैसे? घर में तो कोई खास अंग्रेजी जानता नहीं था. अंग्रेजी को सुधारने के लिये लोगों ने सलाह दी कि अंग्रेजी न्यूजपेपर पढ़ो. उसके ऎडिटोरियल पढो. लोगों की सलाह पर सप्ताह में एक बार अंग्रेजी समाचार पत्र भी लेना प्रारम्भ किया. लेकिन पूरे सप्ताह समाचार या ऎडिटोरियल पढ़ना या समझना तो दूर किसी एक लेख को लेकर ही लगे रहते. उसके कठिन शब्दों का डिक्सनरी से अर्थ निकाल कर एक कॉपी में नोट करते रहते.आधे अर्थ मिलते आधे नहीं.जो शब्द मिलते भी उसके भी तीन-चार अर्थ होते.तो यह समझ में नहीं आता कि कौन सा अर्थ कहाँ फिट बैठेगा. इसलिये आधी बातें समझ में आती आधी नहीं. हुआ यह कि इन शब्दों से तीन चार कॉपियाँ तो भर गयीं लेकिन अंग्रेजी ना सुधरनी थी ना सुधरी. 

फिर किसी ने सलाह दी कि “रेन एंड मार्टिन” की ग्रामर पढो. वह किताब भी उस छोटे शहर में नहीं मिली. किसी तरह उसे अन्य शहर से मंगवाया गया. मुझे अभी भी याद है लाल रंग के कवर में वह चमकीले कवर वाली किताब. वह मिली तो लगा अब तो सारी मुरादें पूरी हो जायेंगी और हम भी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगेंगें. लेकिन उसे पढने से भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ. ग्रामर के तो कई सारे नियम पता चल गये लेकिन अंग्रेजी बोलने समझने में कोई फरक नहीं पढ़ा उलटा हुआ यह कि अब अंग्रेजी में कुछ भी लिखने या बोलने से पहले यह सोचना पड़ता कि यह किस टैंस में हैं. यहाँ पर कौन सा वर्व है …कौन सा नाउन. तब लगा कि अंग्रेजी सचमुच बहुत कठिन है. अंग्रेजी बोलने वाले सारे लोग मुझे महान व भाग्यवान नजर आने लगे. मुझे लगने लगा कि शायद मैं कभी भी अंग्रेजी  लिख या बोल नहीं पाउंगा.

उन दिनों इंजीनियरिंग के लिये प्रवेश परीक्षाऎं अंग्रेजी में ही होती थीं.तब आज की तरह गली गली में इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं थे. आई.आई.टी, रुड़की और एम.एन.आर. इन तीन परीक्षाओं में से किसी को पास करना इंजीनियरिंग में जाने वालों के लिये स्वप्न हुआ करता था. हमने भी यह तीनों परीक्षाऎं दी बारहवीं के बाद. उस समय तीनों अंग्रेजी में ही थी. और हुआ यह कि मैं इन तीनों में से किसी में भी पास नहीं हो पाया. इधर उसी साल बी.एस.सी में भी ऎडमीशन लिया था. लेकिन ध्यान तो सारा इंजीनियरिंग में था और फिर बी.एस.सी में भी अंग्रेजी में ही सब कुछ होना था. नतीजा यह हुआ कि जीवन में पहली बार फेल हो गया बी.एस.सी में .अगले साल सौभाग्य से एम.एन.आर की परीक्षा हिन्दी व अंग्रेजी दोनों में हुई. मैने हिन्दी माध्यम चुना और उसी वर्ष मैने उसे पास कर लिया और मेरा सलेक्सन इंजीनियरिंग में हो गया था.   

चलिये एक किस्सा और. इंजीनियरिंग में काफी हद तक अंग्रेजी ठीक ठाक हो गयी. अब अंग्रेजी समझ आने लगी. लिखना भी ठीक ठाक सा हो गया.( हालांकि इसके लिये काफी मेहनत करनी पड़ी पर वह कभी और….). लेकिन बोलने में अभी भी कई बार सोचना पड़ता. फायनल ईयर में कैम्पस के लिये कई कंपनियाँ आई. उस समय वोल्टाज कंपनी में नौकरी मिलना सौभाग्य माना जाता था. क्योकि उनकी चयन प्रक्रिया काफी लंबी होती थी. वो लोग दो बार पहले लिखित परीक्षा लेते उसके बाद साक्षात्कार होते. दोनों लिखित परीक्षाओं को मैने पास कर लिया. अब बारी साक्षात्कार की थी. मैं टाई वाई लगा के तैयार था. साक्षात्कार में पहुंचा तो अंग्रेजी में साक्षात्कार शुरु हुआ. शुरु की कई चीजें तो कई बार शीशे के सामने खड़े होकर रटी हुई थी तो वो तो फटाफट बता दीं. लेकिन जब बात आगे बढ़ीं तो मैने अटकना चालू कर दिया. उसी अटकन भटकन में सारी बातें भूलता गया. मैने उनसे हिन्दी में बोलने की इजाजत भी मांगी जिसे उन्होने मना कर दिया. किसी तरह से साक्षात्कार समाप्त हुआ. मैने परिणाम की प्रतीक्षा भी नहीं की. मैं सीधा हॉस्टल आ गया और अपने कमरे को बंद कर रोने लगा. उस दिन फिर मुझे अहसास हुआ कि अंग्रेजी ना जानने की कितनी बड़ी सजा मैं भुगत रहा हूँ.

आज मैं आराम से अंग्रेजी लिख,बोल सकता हूँ लेकिन इस अंग्रेजी की वजह से सब कुछ जानते हुए भी कितनी बार मुझे नीचा देखना पड़ा यह मैं ही जानता हूँ. मैने तो उन सब परिस्थितियों का मुकाबला कर लिया लेकिन कितने ही ऎसे लोग होंगे जो अंग्रेजी ना जानने की हीन भावना के कारण आगे ही नहीं बढ़ पाते होंगे.

अगले लेख में मैं अपने विचार रखुंगा मेरे विचार में इसका समाधान क्या. अभी तो बहुत पका दिया ना. खैर कोई नहीं लिखते लिखते बहुत कुछ लिख गया.  

मेरी पिछ्ली पोस्ट पर काफी अच्छे कॉमेंट आये.सागर जी और रचना जी के कॉमेंट प्रस्तुत हैं.

english-cocacolaसागर भाईसा बोले काकेश जी , इस लेख में तो विषयांतर हुआ कोई बात नहीं पर इस लेख की अगली कड़ी में उसे भी पूरा करें। क्यों कि मुझे यह लग रहा है कि आप मेरी कहानी लिख रहे हैं।
मैने हिन्दी माध्यम से ११वीं तक पढ़ाई की। बच्चों का भी यही हाल है। वे पहले राजस्थान में हिन्दी माध्यम से पढ़े।अब हम हैदराबाद में हैं, हिन्दी माध्यम की स्कूल पास ना होने की वजह से अंग्रेजी स्कूल में बच्चों को दाखिला दिलवाया। अब उनकी वह हालत है कि ना तो वे सही अंग्रेजी जानते हैं ना ही हिन्दी! रोज हम सब इस वजह से तनाव में जीते हैं क्यों कि मैं भी व्यवसाय में अंग्रेजी ना जानने की वजह से सफल नहीं हो पा रहा ना बच्चे अध्ययन में। बहुत कुछ कहना है पर और कभी,…

सागर भाई आपके अनुरोध पर इस लेख की अगली कड़ी में अपनी पूरी कहानी लिखुंगा. आप भी वादा करें उसके बाद अपनी कहानी लिखेंगे.  

रचना जी ने कहा

सबसे पहले मैं इस कमेन्ट में श्री सागर चंद नाहर जी से क्षमा मांगना चाहती हूँ क्योकि एक बार ईमेल पर उन्होने मुझसे कहा था की उन्हे इंग्लिश नहीं आती और मै हिन्दी में मेल दूं। मैने इस बात को सच नहीं माना क्योकि मुझे लगा की वह मुझे हिन्दी में लिखने को मजबूर करना चाहते है । तब मैं इस हिन्दी ब्लॉगिंग में नयी थी, और कई बार उसके बाद सागर जी के ब्लॉग पर गयी पर क्षमा मांगने का कोई अवसर नहीं मिला। आज मिला है तो सागर भाई क्षमा कर दे।english-of-india

अब बात इंग्लिश और हिन्दीकी , मैने इस विषय को कई बार उठाया है की सबको इंग्लिश कि जानकारी होनी चाहिये पर हर बार मुझे कमेंट्स मे गालियां तक मिली है । आज मैं इस ब्लोग पर ये कहना चाहती हूँ की अगर किसी को भी इंग्लिश मैं कोई भी सहायता चाहिये , जैसे कहीं अप्लिकेशन देनी हो , या किसी के भी बच्चे को इंग्लिश में फॉर्म इत्यादि भरना हो तो मुझ से निःसंकोच ईमेल पर सम्पर्क कर सकते है। कोई भी बात जो आप दूसरो से पूछने में हिचकते हो कि कोई क्या कहेगा उसे मुझे ईमेल कर दें, यथा संभव मैं आप को उसकी हिन्दी बता दूंगी । अगर रोमन मैं आप समझ लेंगे तो मेरा वक्त कम लगेगा पर अगर आवश्यक है तो मैं हिन्दी में भी लिख दूंगी । इंग्लिश मुश्किल नहीं है , आपकी हिचक इस को मुश्किल बनाती है । अगर आप को नहीं भी आती है तो भी अपने बच्चो को अवश्य इंग्लिश माध्यम से ही पढाएं । हिन्दी हमारा दिल है और इंग्लिश हमारा दिमाग और तरक्की के लिये दिमाग की जरुरत ज्यादा होती है । मातृ भाषा या राष्ट्र भाषा बदने की जरुरत नहीं है , जरुरत हैं अपनी सोच बदलने की , देश का विकास बिना इग्लिश के हो सकता है पर व्यक्ति के विकास में इंग्लिश का योगदान लेना कुछ बुरा नहीं है । और वह जितने लोग इंग्लिश कि बुराई करते हैं , यहाँ हिन्दी ब्लोगिंग समुदाय में भी उन सब के इंग्लिश में भी ब्लोग है !!! उनसब के घर मै इंग्लिश के अखबार भी आते हैं और उनमे बहुत से केवल टाइम पास के लिये भाषा पर वाद विवाद करते हैं ।

रचना जी आपका धन्यवाद. अगली पोस्ट में इस विषय पर फिर अपने विचार रखुंगा.

आप को लग रहा होगा कि मैं क्या बकवास कर रहा हूँ…. हिन्दी चिट्ठा लिखता हूँ लेकिन अंग्रेजी की वकालत कर रहा हूँ. लेकिन नहीं जी … मैं ऎसा सोच समझ कर कह रहा हूँ. कारण है कि हमारे महान देश भारत में कोई भी काम अंग्रेजी के बिना नहीं होता. किसी भी प्राइवेट कंपनी के कार्यालय में जायें आपको सारे लोग अंग्रेजी में ही काम करते मिल जायेंगें.

कल एक सज्जन से इसी विषय पर बातचीत हो रही थी. उनका कहना था कि सॉफ्टवेयर और काल सैंटर के क्षेत्र में हम इतने आगे इसलिये है क्योकि हम अच्छी अंग्रेजी जानते हैं. उनका यह भी कहना था कि अंग्रेजी के बिना कोई भी तकनीकी पढ़ाई पूरी नहीं हो सकती. इसलिये अंग्रेजी को तो बचपन से ही अनिवार्य कर देना चाहिये. वर्तमान स्थितियों में उन सज्जन की बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता.

क्या अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए?

मुझे अपनी कहानी याद आ गयी. मेरी पढ़ाई हिन्दी माध्यम से हुई है. तो बचपन मेंमेरी अंग्रेजी भी वैसे ही थी जैसे एक आम हिन्दी माध्यम से पढे हुए विधार्थी की होती है यानि वो अंग्रेजी व्याकरण के तो बहुत से नियम जानता है लेकिन फिर भी ना सही सही अंग्रेजी लिख पाता ना बोल पाता है.मुझे लगता है कि हम लोग बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर जो व्याकरण पढ़ाते हैं वो फायदे की जगह नुकसान ही करती है. कुछ भी लिखने व बोलने से पहले व्यक्ति उस वाक्य को व्याकरण की कसौटी पर तोलता है कि यह सही है या नहीं.खैर यह तो विषयातंर हो रहा है…. मैं जब आई.आई.टी. की तैयारी कर रहा था तो लोगों ने कुछ विशेष किताबों को पढने की सलाह दी. जैसे भौतिकी के लिये रैशनिक हैलीडे ( जो कि एक रशियन किताब का अंग्रेजी अनुवाद था) या गणित के लिये एम.एल.खन्ना. उस छोटे शहर में यह किताबें भला कहाँ मिलती…. तो किसी तरह यह किताबें दिल्ली से मंगवायी गयी. किताबें तो आगयीं लेकिन किताबें थीं तो अंग्रेजी में. भौतिकी का “जड़त्व आघूर्ण” किताब में ‘Moment of Inertia’ हो गया और समबाहू त्रिभुज ‘Equilateral Triangle’ बन गया.तो मुझे दो-तीन महीने तो यही सब समझने में लग गये कि किस तकनीकी शब्द को अंग्रेजी में क्या कहते हैं ….पढ़ाई क्या खाक करते. इस वजह से या किसी और वजह से आई.आई.टी. में सलैक्सन तो नहीं हुआ. लेकिन इस बात की कोफ्त हमेशा रही कि अगर आगे चलकर हमें यही सब अंग्रेजी में ही पढ़ना था तो हमें बचपन से ही अंग्रेजी में यह सब क्यों नहीं पढ़ाया गया. इसलिये हम जैसे चोट खाये और समझदार माँ बाप अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम से नहीं पढ़ाना चाहते.

http://kakesh.comवैसे मुझे यह तर्क बेमानी लगता है कि अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है.क्या अंग्रेजी के बिना विकास सचमुच संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए? जरूरत है तो इस दिशा में सही सोच की. आज हम गलत सलत ही सही लेकिन अग्रेजी लिखने बोलने को ही अपनी शान समझते हैं. यदि ऎसा ही है तो क्यों ना अंग्रेजी को ही राष्ट्रभाषा बना दिया जाये. कम से कम मेरे जैसे हिन्दी माध्यम से पढ़े बच्चों का तो भला हो ही जायेगा और वो मेरी तरह हीन भावना का शिकार तो नहीं होंगे कि वो आई.आई.टी. वालो से कमतर हैं इसलिये क्योकि वो अंग्रेजी नहीं जानते थे.

[ ऊपर का चित्र आई.आई.एम. की मेलिंग लिस्ट में आया था जिसे मेरे एक मित्र ने मेरे को मेल पर भेजा था. इसमें ठंडी बियर यानि "CHILLED BEER" को "CHILD BEAR" यानि भालू का बच्चा लिखा गया है.साइड में अखबारी जुगाड़ सागर चंद नाहर जी के सौजन्य से है.]

कानपुर हॉस्टल में मेरे एक कवि मित्र हुआ करते थे.मित्र तो अभी भी हैं लेकिन उनसे मेरी मुलाकात पिछ्ले 12-13 सालों से नहीं हुई है.एक दिन अचानक उनका फोन आया और फोन करते ही बोले “काकेश भाई”. हम सोचे कि कोई ब्लॉगर मित्र ही होगा. वरना खाकसार को कौन याद करता है इस नाम से.पता चला कि हमारे पुराने मित्र हैं और यहीं इसी शहर में रह रहे हैं.कहीं से उनको हमारा नम्बर मिला और उन्होने हमें फोन कर लिया.

अब इन मित्र की क्या तारीफ करूँ. हॉस्टल के जमाने से मैं इनकी कविताओं का मुरीद रहा हूँ.कई दिनों से मैं इन्हें ढूंढ भी रहा था. इसी लिये एक बार फुरसतिया जी को ई-पत्र भी लिखा था.लेकिन इनका पता नहीं लग पाया.अब पता चला कि ये यहीं दिल्ली में हैं तो तुरत अपने ब्लॉग का पता दिया. ताकि एक पाठक तो और बढ़े वरना अपन को तो गिने चुने लोग ही पढ़ते हैं. इन्होने पढ़ा और तुरंत अपनी छाप छोड़ी कविता के माध्यम से. इनके बारे में एक बात और बता दूँ कि इनके पास तब ( अब पता नहीं) कविताओं का भरपूर स्टॉक रहता था. हर अवसर पर एक कविता तैयार रहती थी. मैं यदि कभी मंच संचालन कर रहा होता तो इनकी एक आध कविता जरूर सुनाता.किसी एक फेयरवेल में इनकी कविता जो लाइने मैने सुनायी थी वो मुझे अभी भी याद हैं.

आदमी की ज़िन्दगी है, ज़ुगनुओं की रोशनी
कौन जाने कब यह नूर गुल हो जायेगा
हम नहीं होंगे ना होंगे आप लेकिन
याद में अपनी यह वक्त फिर फिर आयेगा.

खैर ये हमारे ब्लॉग पर आये और रोमन में अपनी कविताई छाप छोड़ गये. जो इस प्रकार थी.

नराई के बहाने सिर्फ नराई वाले लेख पर यह बोले.

पत्र तुम्हारा नेह संस्करण लगता है…
पंक्ति पंक्ति पीयुष प्रेम का बहता है
शब्द शब्द संबोधित करता प्रानों को
अक्षर अक्षर हाल तुम्हारा कहता है.

और हमारे एक व्य़ंग्य पर इनका कहना था.

भाई वाह! आप तो सचमुच कमाल करते हो
लफ़्जों को छूरी जैसे इस्तेमाल करते हो
हास्य के हाथों व्यवस्था के रुग्ण चेहरे पर
अश्क अर्थों के, व्यंग्य के रुमाल रखते हो.

अब हम इनके पीछे पड़ गये कि भाई अपना ब्लॉग बनाओ. ताकि फिर से इनकी कविताओं का स्वाद चख सकें.इनकी ना नुकुर चलती रही. इनको कंप्यूटर में हिन्दी लिखने की समस्या थी. उसके लिये इन्हे पूरा प्रोसीजर भी भेजा. फोन पे भी तकादा चलता रहा. फिर थक हार के इन्होने एक और कविता हमें भेजी इस आशय की कि ये ब्लॉग नहीं लिख पायेंगे.

नशे मे प्यार के रहने की है आदत तुमको,
बहक तो हमको ही जाना है ,तुम ना साथ चलो.

मैं तो अनजान था दुनियाँ की नज़र में अब तक,
जानता तुमको ज़माना है, तुम ना साथ चलो.

दिल में आबाद था जो दर्द-ए-गुलिश्तां कब से,
नज़र आ जाएगा सबको कि, तुम ना साथ चलो.

इतनी सुन्दर कविता पढ़ने के बाद तो लगा कि ये सारी कविताओं से हम वंचित क्यों रहें. और तुक्का देखिये एक तो कनपुरिया ऊपर से पांडे.लेकिन हम भी कहाँ मानने वाले थे. पीछे पड़े रहे. हारकर उन्हें ब्लॉग बनाना ही पड़ा. तो आप भी उन्हें पढिये और उनसे गुजारिश करिये कि वो नियमित लिखते रहें ताकि हम सभी उनकी कविताओं का आनन्द ले सकें.

उनका ब्लॉग है “मेरा निर्झर”. अभी तो मात्र दो कविताऎं चिपकायी हैं लेकिन शीघ्र ही और भी लिखेंगे ऎसा कहना है उनका.

अभी अभी चिट्ठाजगत डॉट इन की आचार संहिता पढ़ी. मेरे विचार से हर संस्था को ये हक है कि वो अपनी आचार संहिता बनाये. ये उस संस्था से जुड़े लोगों को सोचना है कि वो उस आचार संहिता को माने या ना मानें. चिट्ठाकारी या ब्लॉगिंग एक अलग तरह का माध्यम है जिसका चरित्र ही है कि आप अपने नाम से लिखने या ना लिखने के लिये स्वतंत्र हैं.यह परंपरा अग्रेजी जगत में तो है ही हिन्दी जगत में भी है.इससे पहले भी इस विषय पर मेरे द्वारा और अन्य लोगों द्वारा लिखा गया है.

आचार संहिता कहती है कि वह फर्जी नाम से चितित है.मैं चिंतित हूँ कि नाम फर्जी है या नहीं ये कौन कैसे तय करेगा क्या हमें अपना पैन कार्ड या राशन कार्ड भी देना होगा :-) तो क्या फर्जी नाम वाले चिट्ठे चिट्ठाजगत.इन से हट जायेंगे.कुछ तो ये होंगे ही.

1. मसिजीवी

2. फुरसतिया

3. उड़नतस्तरी

4. ई-स्वामी

5. घुघूती-वासूती

5. बोधिसत्व

6. आलोचक

7. चौपटस्वामी

8. काकेश

9. सृजन शिल्पी

10. अजदक

11. अनामदास

और भी ना जाने कितने होंगे.

कल मैने एक टिप्पणी की थी लगता है वो सही ही है.

हम हैं तो लफड़े हैं
लफड़े हैं तो बातें हैं
बातें हैं तो तर्क है
तर्क है तो वितर्क है
वितर्क है तो गाली है
गाली है तो कड़वाहट है
कड़वाहट है तो मध्यस्थ है
मध्यस्थ है तो मलहम है
मलहम है तो समाधान है
समाधान है तो दोस्ती है
दोस्ती है तो हम है
हम हैं तो लफड़े हैं

चलिये देखते हैं कि ये लफड़ा कब तक चलता है..

मैं एक महीने से भी ज्यादा सक्रिय ब्लॉगिंग से दूर रहा. उसके बाद आया तो सोचा कि हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में ना सोच/लिख कर केवल अपनी बात ही लिखुंगा.लेकिन कुछ बातें हैं जो दिमाग में उमड़ घुमड़ रही हैं. सोचा लिख ही डालूं.

पिछ्ले आठ नौ महीने में हिन्दी चिट्ठाजगत में कई परिवर्तन हुए हैं.मेरे विचार से इन परिवर्तनों की रफ्तार उन सभी परिवर्तनों से कहीं ज्यादा है जो हिन्दी चिट्ठाकारी में पिछ्ले तीन चार सालों से हो रहे है. आज हमारे पास नये ऎग्रीगेटर हैं, पोस्ट भी चटपट ऎग्रीगेटरों पर आ जाती हैं,किसी को गरियाना नहीं पड़ता :-) . एक हजार से ज्यादा चिट्ठाकार हैं जिनमें सक्रिय चिट्ठाकारों की संख्या भी पहले से ज्यादा हुई. आपकी पोस्ट  थोड़ी देर में ऎग्रीगेटरों के पहले पन्ने से गायब हो जाती है.चिट्ठाकार मिलन भी पिछ्ले कुछ समय से ज्यादा ही हो रहे हैं.हर कोई अपना अलग मीट पका रहा है. लेकिन एक आम चिट्ठाकार को इससे क्या फायदा हुआ? क्या उसके पाठक बढ़े हैं?क्या उसके चिट्ठे पर टिप्पणीयां बढ़ी हैं?क्या टिप्पणीयों के माध्यम से आपस में विमर्श बढ़ा है?

मैं खुद के चिट्ठे पर जितना देख रहा हूँ या दूसरों के चिट्ठों पर टिप्पणीयों की संख्या देख कर अनुमान लगा रहा हूँ..मुझे तो हिट और टिप्पणीयों की संख्या में कमी होती ही जान पड़ती है.कुछ धुरंधरों जैसे फुरसतिया जी या समीर जी को टिप्पणीयों के मामले में अपवाद मान लें और सारथी जी को हिट्स के मामले में तो कमोबेश यही कहानी है. ऎसा नहीं है कि हिन्दी में स्तरीय नहीं लिखा जा रहा लेकिन हम सब (मैं भी) पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. हम अक्सर उन्ही चिट्ठों पर जाना पसंद करते हैं जिन्हे हम जानते हैं..भले ही केवल ब्लॉग से ही जानते हों. ऎसे में जो नये चिट्ठाकार अच्छा लिख रहे हैं क्या उनको पढना और प्रोत्साहित करना जरूरी नहीं हैं. 

मुझे लगता है कि हिन्दी चिट्ठाकारी में भी परोक्ष गुट हैं या बनते जा रहे हैं.ऎसे में सब अपने अपने गुट के चिट्ठाकारों को ही पढ़ना और वहीं टिपियाना पसंद करते हैं. चिट्ठाकारी मुद्दों और मन की भावना को उठाने का मंच नहीं,सलेक्टेड टार्गेट ऑडियंस तक अपनी बात पहुंचाने का माध्यम रह गया है. सबकी अपनी अपनी दुकान है और अपने अपने ग़्राहक. मैं यह नहीं कह रहा कि ये गलत है या सही है..लेकिन ऎसा होता जा रहा है. ऎसे में क्या हिन्दी चिट्ठाकारी सच में कुछ कर पायेगी? क्या जो लोग चिट्ठाकारी को वैब पत्रकारिता, वैकल्पिक पत्रकारिता या फिर नये मुद्दों पर विमर्श का माध्यम मानते हैं  उनके सपने पूरे हो पायेंगे.

क्या ये सही है? मैं नहीं जानता..पर जानना जरूर चाहता हूँ…आप कुछ सहायता करेंगे?

पिछले दिनों नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जाना हुआ.टिकट काउंटर के पास ही एक विश्रामालय है. उसके पास खड़े रह कर प्रतीक्षा कर रहा था कि सामने एक बोर्ड लगा हुआ देखा. पहले हिन्दी में पढ़ा फिर सोचा शायद मैं गलत समझ रहा हूँ.फिर अंग्रेजी में पढ़ा. मतलब तो वही निकलता था हिन्दी वाला :-)

क्या मैं सही समझ रहा हूँ कि रेलवे एक्ट के हिसाब से रेल यात्री टैक्सी या ऑटो के लिये मोलभाव नहीं कर सकते यानि वो जिस भी भाव में ले जायेगा जाना पड़ेगा या फिर आप दंड के भागी होंगे.आप भी देखिये. ज्ञान जी इस पर थोड़ा प्रकाश डालें तो बेहतर है.

railway_notice

समीर भाई ने लिखा

” अगर मैं कहूँ कि ९८ प्रतिशत भारत की आबादी को, जिसमें मैं भी शामिल हूँ, को न तो धन्यवाद देना आता है और न ही स्वीकारना आता है और न ही किसी का अभिनन्दन या प्रशंसा करना या फिर अपना अभिनन्दन या प्रशंसा स्वीकार करना, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. “ 

उनका कहना ठीक तो लगता है.लेकिन ये सोचनीय है कि ऎसा आखिर है क्यों और फिर भारत में ही क्यों? हालाँकि उन्होने धन्यवाद देने को टिप्पणीयों से जोड़ा जिससे मैं सहमत नहीं क्योकि ऎसा होता तो अंग्रेजी चिट्ठों में, जिसे तथाकथित वो लोग पढते हैं जो धन्यवाद संस्कृति में विश्वास करते हैं तो उनमें टिप्पणीयां ज्यादा होतीं. लेकिन सच तो यह हैं कि अंग्रेजी चिट्ठों मे हिट्स के मुकाबले टिप्पणीयां बहुत कम होती हैं. यानि हिट्स और टिप्पणीयों का अनुपात हिन्दी चिट्ठों में अंग्रेजी चिट्ठों के मुकाबले कहीं ज्यादा है.

अब आते हैं मूल प्रश्न पर क्यों आम भारतीय धन्यवाद देने या स्वीकारने में हिचकते हैं.मेरा मानना है कि हर देश और समाज के अपने अपने संस्कार होते हैं.भारत के मूल संस्कार भी आत्मसात के हैं ना कि प्रदर्शन के. किसी फिल्म में सुना था ‘इन फ्रैडशिप ..नो सॉरी ..नो थैंक्यू “. मुझे यह सही लगता है. जब हम किसी के अच्छे काम के लिये धन्यवाद या थैंक्यू बोल देते हैं तब हम उसके अच्छे कार्य का मोल चुकता सा कर देते हैं.आपने हमारे लिये ये किया हमने धन्यवाद बोल दिया. हिसाब बराबर. यदि हम धन्यवाद ना देकर उसे आत्मसात कर लें कि आपने हमारे लिये यह अच्छा किया हम भी मौका पड़ने पर आपके लिये अच्छा करेंगे तो आप उस संबंध को और मजबूत करते हैं.यहाँ हम प्रकट में भले ही धन्यवाद ना कहें लेकिन दिल में आभार का भाव जरूर रखते हैं. ठीक यही बात सॉरी के लिये भी लागू होती है.आपने कुछ गलत किया (जानबूझ कर या अनजाने में) और सॉरी बोल दिया. हो गया हिसाब बराबर.जब आप गलत काम कर सॉरी बोल देते हैं तो आप अपनी गलती पर विचार नहीं करते और फिर से उसी तरह की गलती करने के लिये खुद को स्वतंत्र पाते हैं. इसके बजाय यदि आप अपनी गलती पर विचारें और मन ही मन लज्जा का अनुभव करें तो बहुत संभव है कि आप उस गलती को दोहरायेंगे नहीं. 

जैसे हमारी पुरानी पीढियों में प्रदर्शन का उतना चलन नहीं था. तब पति पत्नी भी शायद जीवन भर एक दूसरे को “आइ लव यू” ना बोलते हों. लेकिन तब का प्रेम सही मायनों मे प्रेम था. जैसे जिम और डेला का प्रेम. जहां प्रेम आपकी जुबान पर नहीं होता वरन आपके एक्शन में,आपकी सोच में, आपके दिल में होता है. आज की पीढ़ी के लोग दिन में ना जाने कितनी बार आप “आइ लव यू” बोलते होंगे लेकिन फिर भी प्रेम की कमी है.किसी ने कहा भी है “सच्चा प्रेम वह है जब आप एक दूसरे को ये भी ना बता सकें कि आप एक दूसरे को कितबा प्रेम करते हैं “. प्रेम बताने का नहीं अनुभव करने की चीज है.पश्चिम में जहां लोग ना जाने कितने बार और कितने तरीको से “आइ लव यू” बोलते हैं फिर भी वहाँ का प्रेम कुछ कम ही लगता है.ये वहाँ होने वाले तलाकों से जाहिर होता है. इसीलिये शायद उन्हे वैलंटाइंस डे, फादर्स डे और मदर्स डे मनाने की जरूरत है. वो थैंक्स गिविंग डे भी मनाते है जहां वो ऑपचारिक रूप से लोगों को कार्ड्स वगैरह भेज के धन्यवाद ज्ञापित करते हैं.भारत में यह सब नहीं मनाये जाते…शायद इन चीजों की आवश्यकता ही नहीं है हमें.  

प्रश्न उठता है.क्या सदैव धन्यवाद या “आइ लव यू” कहने वाले पश्चिम के लोग भी आपस में उतना ही प्रेम करते हैं जितना भारत के धन्यवाद या “आइ लव यू” ना कहने वाले लोग?क्या वहाँ भी रिश्तों की गरमाहट उतनी ही है जितनी भारत में ? क्या धन्यवाद कहने वाले वो लोग एक दूसरे के प्रति उतने ही संवेदनशील है जितने भारत के लोग? दोनों समाजों के अध्ययन से ये बात साफ हो सकती है. लेकिन मेरा मानना है मुँह मे दिखावटी धन्यवाद की बजाय दिल मे धन्यवाद होना ज्यादा जरूरी है. हाँ दिल के साथ साथ ये मुँह पर भी आ जाये तो अच्छा है.लेकिन हम तो यही कहेंगे. “नो सॉरी ..नो थैक्यू ”

[मेरा यह मत चिट्ठों में टिप्पणी को लेकर नहीं है क्योकि में टिप्पणी को धन्यवाद का पर्याय नहीं मानता]

समीर जी के चिट्ठे पर राजीव जी की टिप्पणी भी विचारणीय है.

कहीँ पर मुझे विरोध लगता है

अमरीकी / भारतीय शिष्टाचार की तुलना बहुत जायज़ नहीं। भिन्न संस्कृति, भिन्न परिस्थितियाँ (सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक) तो उस पर यह तुलना और मापदण्ड भी उन्हीं के – फिर भी कम से कम सिद्धांत रूप में, कहीँ हम आगे तो कहीँ वे। हम किन्हीँ कार्यों में कर्तव्य और अधिकार समझते और देते भी हैं – वे किन्हीँ और कार्यों में । हम आज के आधा तीतर आधा बटेर भारतीय+पाश्चात्य समाज में ज़रूर दोहरी मानसिकता अपनाते हैं, तो गड़बड़ होती है, कौन से मानक लगायें? याद करें पिछले वर्ष 2006 जुन-जुलाई का रीडर्स डाइजेस्ट का शिष्टाचार सम्बन्धी सर्वेक्षण और उसमें प्रयोग किये गये बेतुके और पाश्चात्य मानक! जिनमें मुंबई को निम्न दर्ज़े का माना गया.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: बहस, धन्यवाद संस्कृति, काकेश, मेरी बात

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