चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सबको लिंकित करने वाली नीलिमा जी,हम को न लिंकित करने की चूक कर, बता रही हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग में  विमर्श की नयी परंपराऎं बन रही हैं. अब कोई शोधार्थी यह कहे तो अपन की क्या विसात कि उससे सहमत ना हो. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हमने सोचा कि इस विमर्श के नये मंच पर हम भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा दें वरना क्या पता हमारा नाम इतिहास में आते आते रह जाये.[ बात दरअसल यह है कि पिछ्ली पोस्ट में हमने गणेश जी को एक ऎप्लीकेशन भेजा था जो अभी तक अप्रूव नही हुआ तो सोचा क्यों ना नयी पोस्ट लिख डालें ]

वैरागी जी ने प्रश्न उठाया कि हमारी युवा पीढ़ी की ‘कैरीयरिस्‍ट’ सोच के कारण हम मानवीय मूल्यों को खोते जा रहे हैं. दूसरी ओर बोधिस्तव जी कह रहे हैं कि हर कोई चल रहा है भाग रहा है ..इसलिये चलो !!.. चलो तो सही पर कहाँ? कहाँ हैं मंजिल? वो पूछ्ते हैं “क्यों लिखते हो। इतना जो लिख रहे हो उसके पीछे कोई उद्देश्य है या ऐसे ही लिख रहे हो। मेरा सिर्फ इतना ही कहना है कि लिखो खूब लिखो पर तय कर तो कि क्यों लिख रहे हो और अगर तय कर लिया है तो मेरे इस उपदेश पर कान मत दो।”दोनों प्रश्न एक जैसे ही हैं पर समाधान क्या है?

एक ओर हम निजी बैकों की तारीफ करते है और दूसरी ओर उनकी आक्रामक विपणन शैली को कोसते हैं.एक ओर हम सरकारी कामकाज को देखते हैं तो कहते हैं कि सारा सिस्टम धीमा है..काम ही नहीं करता दूसरी ओर यदि कोई तेज काम कर अच्छे परिणाम देता है और कैरियर में आगे बढ़ता है तो कहते हैं कि मानवीय संवेदना खो गयी है. आगे बढ़ना जरूरी है.मानव जीवन की कहानी आगे बढ़ने की कहानी है.’आक्रामक’ होना जरूरी है ..नहीं तो मिटने के लिये तैयार होना पड़ेगा. ‘सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट’ का सिद्धांत मानव पर भी उतना ही लागू होता है जितना जानवरों पर.ये सच है कि इस समस्त प्रक्रिया में हम कुछ संवेदनाऎं खो देंगे लेकिन ये नियति की सतत प्रक्रिया है.आप इससे बच नहीं सकते. आपको चलना ही होगा.

जीवन एक अबूझ पहेली है. हर चीज जो हो रही है या घट रही है ना वो हमारे हाथ है ना उसका परिणाम ही हमारे हाथ है.हम चल रहे हैं या लिख रहे हैं क्यों? ये वैसा ही प्रश्न है जैसे कि कोई कहे कि मैं कौन हूँ.हम कोई भी काम करते हैं जो हमारी नजर में हमें लगता है कि हमारे लिये करना ठीक होता है. सिगरेट पीने वाला जानता है कि ये सिगरेट हमको नुकसान पहुंचा रही है फिर भी पीता है. लेकिन वो सिगरेट तब भी पीता है क्योकिं उसे सिगरेट पीना अच्छा लगता है.हमारी जीवन शैली हमारे मस्तिष्क के किसी भाग से निर्धारित होती है.जिसे ही शायद ‘मन’ कहते हैं.जिसे ही नियंत्रित करने को ही हमारे ऋषि मुनि तपस्या किया करते थे.क्योंकि सब कुछ जो भी है वो मन ही निर्धारित करता है. आप दु:ख से भरे क्षण में भी सहज हो सकते हैं और खुशी के क्षण में भी असहज हो सकते हैं.

किसी ने सही कहा है..मन के हारे हार है और मन के जीते जीत. जीत-हार,जय-पराजय, खुशी-ग़म,लाभ-हानि,अच्छा-बुरा,मेरा-तेरा,अपना-पराया,धरम-अधरम सब कुछ मन ही तो निर्धारित करता है. तो इसे साधने से क्या सब कुछ ठीक हो जायेगा?इस प्रश्न का उत्तर तो वही दे पायेगा जिसने इसे साधा हो. आप बतायें क्या करें ? मन को साधें कि बढ़े चले जायें.

Akshargram Anugunjनौ-दो-ग्यारह रहने वाले यदि सुबह के भूले की तरह शाम को घर आकर “अनुगूंज बाइस” करें तो क्या हो ? किसी नये ब्लॉगर ने चुपके से मेरे कान में सवाल पूछा. अब हम भी कोई पुराने ब्लॉगर तो थे नहीं कि अपनी फुरसत का उपयोग,कुछ नया ना लिख पाने की हताशा में, अपने पुराने संस्मरणों को लिखने के लिये करने लगते :-) और ना ही इतने नये कि आज से 90 साल बाद के हिन्दुस्तान की झलक ही दिखला देते. तो पहले तो हम चुप ही रहे लेकिन जब एक नयी नयी ब्लॉगरनि (महिला ब्लॉगर) ने यही सवाल किया तो हमें भी अपना ब्लॉगज्ञान बधारने कि खुजली सी महसूस हुई. हमने उन दोनों को समझाया और कहा देखिये जब वन डे के खिलाड़ी को टैस्ट में खिलाया जाय तो उसे थोड़ी याद रहेगा कि वो किस इनिंग्स में खेल रहा है ..वो तो केवल ओवरों के आंकड़े रखता है या रन रेट के;वो भी पूरे डीटेल में…. उसी तरह जब टेलीग्राम लिखने वाला चिट्ठी लिखने लगे वो भी ई-मेल के जमाने में तो ऎसी गलतियां होना लाजमी है ना..

दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट के सवाल थे और जानने की जिज्ञासा..पर हम चालू थे सत्यनाराय़ण कथा बाचने वाले पंडित जी की तरह.. अब हिन्दुस्तान अमरीका बने इसमें किस को क्या एतराज हो सकता है आज नहीं तो कल बन ही जायेगा शायद 90 साल का इंतजार भी ना करना पड़े पर तब अमरीका क्या होगा ?..इस पर तो कोई चर्चा ही नहीं है… अब हम हिन्दुस्तानी बड़े आशावादी हैं जब कोई कहता है “हिन्दुस्तान अमरीका बन जाये” तो यह मान ही लेते हैं कि इसका मतलब “अमरीका हिन्दुस्तान हो जायेगा”.. हो सकता है जब तक हिन्दुस्तान अमरीका बने तक अमरीका “सुपर-अमरीका” बन जाये… 40 रुपये का डालर 400 रुपये का हो जाये .. लेकिन ऎसा मानना हमारे देश के प्रति अन्याय होगा वो भी साठोत्तर स्वातंत्र्य वाले वर्ष में.. इसलिये हम अपनी पसंद के हिसाब से जो भी हो माने जाते हैं….माने भी क्यों ना जब अनुगुंज 22 दूसरी बार होगी तो ऎसा ही तो होगा ना … संजय भाई भी चुप हैं जो पहले भी अनुगूंज 22 करवा चुके हैं…तरुण जी भी अमरीका में अपने कंट्रोल पैनल के पेंच खुलवा रहे;होंगे समीर जी के स्क्रूड्राइवर से कि ये क्या हो गया 23 के बाद 22 कैसे आ गया..खैर ये तो अक्षरग्राम चौपाल के पंच जाने ..हम तो अभी पांच जबर्दस्त पंच तलाश रहे है कि इस बार कि अनुगूंज (नम्बर में क्या जी..) में क्या लिखें… 

गहन विचार करते करते;हम गहन निद्रा में विलीन हो गये,जैसे संसद में संसद सदस्य हो जाते हैं…और देखते क्या हैं कि हिन्दुस्तान सचमुच अमरीका हो गया… आपको ये शायद बहुत खुशी की बात लग रही हो लेकिन हम बहुत दुखी हैं… आई. टी. के आदमी हैं ना..लास्ट फ्राइडे को ही हमको पिंक स्लिप पकड़ा दी गयी… यानि हम को नौकरी से निकाल दिया गया..क्योकि जो काम हम करते थे वो सारा काम अब एक छोटे से अफ्रीकन देश जिंगाड़ा मे आउटसोर्स कर दिया गया है… जिस काम के हम को महीने में 20 हजार मिलते थे उसी काम को जिंगाडू 500 रुपये महीने में करने के लिये तैयार है ..क्योकि वहां की मुद्रा जुगाड़ी एक रुपये में 40 के आसपास मिलती है …

बहुत से जिंगाड़ू आजकल भारत में भी आ रहे हैं… सुना गया है कि जिंगाड़ा में भारत का वीजा लेने के लिये लाइने लगती हैं…भारत का बिहार राज्य भी आजकल तरक्की पर है क्योंकि अधिकतर जिंगाड़ू बिहार में बस रहे हैं… उन्हे बिहार में अपने देश की जैसी अनुभुति होती है…जिंगाड़ूओं को आकर्षित करने के लिये भारत सरकार ने भी कई नयी नयी योजनाऎं बनायी हैं..वीजा की संख्या भी इस साल बढ़ायी जा रही है…

भारत की युनिवर्सिटियों मे भी जिंगाड़ू उच्च शिक्षा ग्रहण करने आ रहे हैं ..पिछ्ले “पूस सैसन” में 2 लाख जिंगाड़ूओं के भारत आने का समाचार है ..ज्ञात रहे भारत मे अभी युनिवर्सिटी मे चार सैसन होते है .. जेठ सैसन,सावन सैसन,पूस सैसन और बसंत सैसन ..सरकार एक नया सैसन भादो सैसन चालू करवाने पर भी विचार कर रही है…

पिछले दिनों जब हमारा  कंपूटरवा खराब हुआ और हमने “सहायता सेवा” में फोन किया तो एक महिला ने कहा “कहिये श्रीमान जी मैं रजनी आप की किया सहायिता कर सकती हूँ… “..और भी बहुत कुछ वो बोलीं….उनकी हिन्दी समझने के लिये मुझे शब्दकोष का सहारा लेना पड़ा…. मैं उसे अपने कंपूटर की समस्या बता रहा था वो शायद कहीं से देख के मेरे ब्लड प्रेसर के आंकड़े बता रही थी…. किसी ने बताया कि आजकल सारी सहायता सेवा जिंग़ाड़ा से संचालित होती हैं… जिंगाड़ा गये कुछ लोगों ने बताया कि वहां गली गली में हिन्दी सिखाने वाले इंस्टीट्यूट खुल गये हैं… जहां अलग अलग ऎक्सैंट में हिन्दी सिखायी जाते है ..जैसे भोजपुरी हिन्दी , मराठी हिन्दी , बंगाली हिन्दी, पंजाबी हिन्दी आदि…

भारत के प्रमुख पेय चाय ,लस्सी और सत्तू आजकल जिंगाड़ा में बहुत प्रसिद्ध हैं …वहां हर पार्टी में लोग कत्थक और भरतनाट्यम की धुन पर नाचते हैं और इन पेयों का आनंद लेते हैं… इन पेयों की रेसिपी भी वहां के लोग अपने अपने ब्लॉग मे बता रहे हैं… भारत में आने वाले जिंगाड़ू भी अब भारत की फ्लाइट में बैठते ही चाय या सत्तू की मांग करने लगते हैं.. हाँलाकि उनकी पत्नियों थोड़ी चितित भी रहती हैं और उन्हे मना भी करती हैं पर जिंगाड़ी पुरुष मानते थोड़े हैं… उसी तरह से बीड़ी भी जिंगाड़ा में बहुत फेमस है ..भारत से भी कई चीजों का निर्यात पिछ्ले कुछ सालों में बढ़ा है ..इनमे ‘बिपाशा छाप बीड़ी’ और ‘राखी सावंत छाप यूज मी डस्टबिन’ प्रमुख हैं…. 

भारत के कई त्यौहार भी भारत से ज्यादा जिंगाड़ा में मनाये जाते हैं… दिवाली , होली , ईद सभी जिंगाड़ा में लोकप्रिय हुए हैं..यहां तक कि वहां के लोग जिंगाड़ियन त्योहार भले ही भूल गये हों लेकिन भारतीय त्योहारों को पूरे उत्साह से मनाते हैं… जनम दिन पर दिया जलाके मिठाई भी बांटते हैं… ये और बात है कि भारत में अधिकतर लोग अभी भी मोमबत्ती बुझा के केक काट रहे हैं…

उधर जिंगाड़ा प्रगति पर है इधर हम अपनी नौकरी को रो रहे हैं..पहले ही आरक्षण की मार से नौकरियों का अकाल था अब जिंगाडूओं के आने से कंपटीशन और बढ़ गया है…. ये लोग इतने सस्ते में सारे काम कर डालते हैं कि भारतीयों को कोई पूछ्ता ही नहीं है… हम भी परेशान हैं सोचते हैं जितने रुपये हैं उनसे जिंगाड़ा में कोई बढिया सा फार्म हाउस खरीदें और वहीं बस जायें…. काश हिन्दुस्तान अमरीका ना होकर हिन्दुस्तान ही रहता….

यही सोचते सोचते आंख खुल गयी…उफ नींद भी ना …!! तब ही आती है जब इतनी महत्वपूर्ण चीज सोच रहे होते हैं….अब क्या करें??? कब सोचें पंच लाइन अनूगूंज के लिये और आज तो पंच अगस्त भी हो गया जी..यानि लास्ट डेट..चलो छोड़ो अब अगली अनूगूंज में ही लिखेंगे…. उसका जो भी नम्बर हो ..हम अपना नम्बर तो लगा ही देंगे….

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: अनुगूंज, हास्य व्यंग्य

हिन्दी चिट्ठाजगत की दुनिया आजकल शोधमय भी है और हिटास के प्रति जागरूक भी.कोई हिट होना सिखा रहा है तो कोई हिट करना.हिट पर आधारित सभी चीजें हिट हैं.हिट की हीट का ये असर है कि लोग हिट की चाह में लेखन कर रहे हैं.भले ही आप कहें कि हिट के लिये न लिखो खुद के लिये लिखो लेकिन इसका परोक्ष लाभ भी है कि हिन्दी में ‘कुछ’ लिखा जा रहा है. सारा लिखा स्तरीय ना भी हो तो कूड़ा भी नहीं है.

विषयों की विविधता भी बढ़ी है. विविधता चुनाव का अवसर देती है और बने बनाये परिवार या गुट से अलग होने का अवसर भी. वो दिन धीरे धीरे खतम हो रहे हैं जब आपको किसी भी लेख को पढ़कर ना चाहते हुए भी “अच्छा है अच्छा है” कहना पड़ता था. अभी आप “पीठ खुजाने” के बोरिंग काम से ऊपर उठकर विमर्श के लिये तैयार हो पाते है या हो पायेंगे. टिप्पणीयों में विमर्श हो या लेखों में विमर्श किसी भी तरह का काम हिन्दी के लिये अच्छा ही है. हाल में हुए विवादों ने भले ही किसी के लिये व्यक्तिगत रूप से भला किया हो या ना हो हिन्दी और हिन्दी चिट्ठाजगत का जरूर भला किया है.लोग अपने विचार खुलकर रखने लगे है. चाहे उसकी परिणति भड़ास के रूप में हो या परिवर्तित पंगेबाज के रूप में.

ये परिवर्तन मैने भी खुद में भी महसूस किया है.मेरा भी हिन्दा चिट्ठाजगत से पारिवारिक मोह भंग हुआ है और मेरी अन्य विषयों के प्रति सोच विस्तृत हुई है. पहले मैं सोचा करता था कि शायद में किसी चिट्ठाकार से ना मिलूं या उससे बातें ना करूँ ..गुमनाम रहकर ही लिखते रहूँ ऎसी सोच थी..यह मेरे अन्दर के भय के कारण था या मेरे अंतर्मुखी व्यक्तित्व के कारण ..नहीं मालूम ..पर अब वो सोच नहीं रही.. प्रमोद जी ने मेरे किसी लेख पर अपनी टिप्पणी में कहा था कि “डरो मत अब बड़े हो गये हो”…मुझे लगता है कि मैं सचमुच बड़ा हो गया हूँ..ये अहसास मुझे दूसरों को समझने के लिये उकसाता है.. फालतू की बातों में उलझ कर समय व्यर्थ ना करूं ऎसी सोच देता है.. इसलिये मैं इसे चिट्ठाजगत की उपलब्धि मानता हूँ …कम से कम अपने लिये…

नये फीड संयोजको का आना शुभ संकेत है आने वाले समय इनकी जरूरत और भी महसूस की जायेगी..इनका स्वरूप भी बदलेगा और इनसे होने वाली अपेक्षाऎं भी ..

आशा करें हम हिन्दी का रोना रोने वाले लोग हिन्दी के नाम पर खुश भी हो सकेंगे..

रविवार 8 जुलाई को  अंग्रेजी के प्रमुख समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख छ्पा था ” Blogging straight from the heartland” . हाँलाकि मैं इस समाचार पत्र को पढ़ता हूँ पर मेरी नजर इस लेख पर नहीं पड़ी.शाम को श्रीश जी ने बातचीत के दौरान इस लेख के बारे में बताया. तुरंत खोज कर पढ़ा ..लेख पढ़ कर लगा कहीं कुछ अधूरा सा है .. हिन्दी चिट्ठाकारी [पल्लवी जी,जिन्होने ये लेख लिखा था, ने कहा है कि ये लेख हिन्दी चिट्ठाकारी पर नहीं वरन हिन्दी और अंग्रेजी चिट्ठाकारी दोनों पर था] पर लेख और उल्लेख केवल कुछ ही चिट्ठों का!! बात कुछ हजम नहीं हुई ..श्रीश जी से इस बाबत बात हुई हाँलाकि नाम छपने से श्रीश जी खुश तो थे  पर थोड़ा निराश लगे कि इसमें नारद, सर्वज्ञ आदि का नाम नहीं आया. उनका कहना था कि उन्होने इस का उल्लेख तो लेखिका से किया था पर ना जाने छ्पा क्यों नहीं. 

नारद,हिन्दी ब्लॉग्स डॉट कॉम और सर्वज्ञ का हिन्दी चिट्ठाजगत में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है…. और हिन्दी चिट्ठाजगत पर  लेख बिना इनके अधूरा सा लगता है.. इसके अलावा और भी कई महत्वपूर्ण स्तंभ (चिट्ठाकार) हैं हिन्दी चिट्ठाजगत में जिनके बारे में इस लेख में कोई जिक्र नहीं था.

वैसे बता दूँ कि इस लेख में किस किस का उल्लेख है.इसमें उल्लेख है यमुनानगर के श्रीश जी का, रतलाम के रवि जी का, जालन्धर के गोपाल अग्रवाल का, नागपुर के संतोष मिश्रा का, कोल्हापुर के नवीन तिवारी का. [मैने रवि जी और श्रीश जी के अलावा बांकी महानुभावों का चिट्ठा नहीं देखा है.यदि आपको मालूम हो तो टिप्पणी द्वारा बतायें ताकि लिंक दिया जा सके..पल्लवी जी ने अपने ई-पत्र में बताया है कि बांकी के चिट्ठाकार हिन्दी के नहीं वरन अंग्रेजी के हैं]. लेख में छ्पी रवि जी की फोटो बहुत अच्छी थी वो क्या कहते ना झक्कास. वैसे रवि जी ने इसका श्रेय अपनी पत्नी रेखा जी को दिया है. अब उनकी अच्छी फोटो में रेखा जी का हाथ कैसे है ये तो नहीं मालूम पर हाँ यदि कभी हमारी कोई खराब फोटो (जाहिर है खराब ही होगी) छपे तो (वैसे संभावना कम ही है) हम भी कहेंगे कि इसमें हमारी पत्नी का ना सिर्फ हाथ है वरन और भी बहुत कुछ है..आखिर उन्होने ही तो खिला पिला के इतना मोटा किया है कि अब तो आइने में भी पूरा मुँह नहीं समाता :-) खैर ये तो विषयातंर हो रहा है. लेख पर आते हैं.

पूरे लेख का चित्र देवाशीष जी के सौजन्य से यहां मौजूद है.

ToI_article_on_small_city_bloggers

लेख पढ़ने के बाद मैने उसी समय लेख की लेखिका पल्लवी जी को ई-पत्र लिखा और धन्यवाद सहित उन्हे सुझाया कि कुछ और प्रमुख हिन्दी चिट्ठाकारों के नामों को लेख में शामिल किया जा सकता था.मैने प्रमुख चिट्ठों के पते जानने के लिये उन्हे चिट्ठा जगत डॉट कॉम की सकियता सूची को देखने की भी सलाह दी. ताकि वो अपने अगले लेख में अधिकाधिक हिन्दी चिट्ठाकारों को सम्मिलित कर सकें.

पल्लवी जी ,जो टाइम्स ऑफ इंडिया की विशेष संवाददाता है,से मुझे किसी उत्तर की अपेक्षा नहीं थी लेकिन कल  मेरे पास जब उनका जबाब आया तो सुखद आश्चर्य हुआ. उन्होने अपने ई-पत्र में जो कहा उससे में सहमत होता दिखा.इसलिये आपकी जानकारी के लिये उसका सार आप तक पहुंचा रहा हूँ.

उनका कहना था कि उनका ये लेख हिन्दी चिट्ठाकारी पर नहीं वरन छोटे शहरों में रहने वाले हिन्दी चिट्ठाकारों पर केन्द्रित था जो तकनीक की बहुत अच्छी सुविधाऎं ना होने के बाबजूद चिट्ठाकारी कर रहे हैं. इसीलिये रतलाम के चिट्ठाकार रवि जी और यमुनानगर के चिट्ठाकार श्रीश जी और अन्य को चुना गया. (गौरतलब है कि तकनीक की अच्छी सुविधाऎं ना होने के बाबजूद दोनों चिट्ठाकारों का चिट्ठा तकनीकी विषयों पर ही आधारित है)

पल्लवी जी ने वादा किया है कहा है कि शीघ्र यदि वो एक लेख हिन्दी चिट्ठाजगत पर भी लिखेंगी तो मुझसे भी संपर्क करेंगी..जिसमें अधिकाधिक चिट्ठाकारों को शामिल किया जा सकेगा. आप लोग अभी से मुझे अपने बधाई संदेश भेज सकते हैं..हो सकता है फोटो देखने के बाद ना भेजें… :-)

तो प्रतीक्षा कीजिये पल्लवी जी के अगले लेख की और इस लेख के लिये उन्हे पुन: धन्यवाद.

कल के टाइम्स ऑफ इंडिया में पूजा की तसवीर पहले पन्ने पर थी.चित्र नीचे देंखें ..खबर पढ़ी तो दिल दहल गया और साथ ही मन ही मन पूजा के साहस की प्रसंशा भी की.आज मसिजीवी ने जब इस पर लिखा और फिर सुजाता जी ने भी इसे छुआ तो रहा ना गया..और कुछ शब्दों की आड़ी तिरछी रेखाऎं पूजा के रूप में बोलने लगीं…

(1)
तुम्हें याद है
अपना वो समय
जब किसी को
निकाल दिया जाता था
सिर्फ बेटी पैदा करने के जुर्म में.
मार दिया जाता था
भविष्य की जननियों को.
सिर्फ इसलिए कि वो आपकी
मर्दानगी का विरोध नहीं कर सकती,
लेकिन क्या मार पाओगे तुम,
एक मां की ममता को
सुखा पाओगे क्या
उसके आंचल का दूध
कल वही  भय तुम्हे घेरेगा
जब तुम्हारा पुरुषवादी व्यक्तित्व
तुम्हारा बेटा
ढूंढने निकलेगा
एक अदद लड़की।

(2)
ना करती प्रतिरोध तो क्या करती?
सहती …???
और रहती उन भेडिय़ों के साथ.
आप की सभ्य दुनिया,
जो नंगेपन की आदी है
क्या देखती है नंगई सिर्फ मेरी
दुनिया को क्यों नहीं दिखायी देता
इन मर्द रूपी नामर्दों का नंगा नाच. 

(3)

हा हा हा …
अब मेरे प्रतिरोध को हवा देने
तुम भी आ गये
कहां थे तुम ??
जब जल रहीं थी बहू बेटिंयां
दहेज के नाम पर,
सताया जा रहा था उन्हें,
खून किया जा रहा था
उनके मासूम सपनों का.
तब तुम भी शायद
किसी राशन की दुकान में लगे
कैरोसीन ले रहे थे.

(4)
सुखी हैं सब परदे के पीछे
ढंक गये हैं घाव पट्टियों से.
अब उन पर मक्खियां नहीं भिनभिनाती
वो गन्दा सा घाव ढंक दिया गया है.
लेकिन दर्द !!
वो तो अभी भी है …
बल्कि गहरा गया है
उसके साथ
अब मन का दर्द जो जुड़ गया है.

/photo.cms?msid=2176974
(5)

कितना घिनौना है ये सच!!
निकलना पड़ता है जब
एक मजबूर लड़की को
घर से …
इस तरह की हालत में
और तुम आतो हो साथ साथ
स्कूटर से,साइकिल से
साथ देने नहीं
मजे लेने के लिये…

कल योगेश जी ने बताया कि पूजा की अर्ध-नग्नता के पीछे किसी मीडिया वाले का हाल था.यदि ये सच है तो निन्दनीय है. सच जो भी हो मुझे आश्चर्य इस बात का है कि कैसे मीडिया इस बात को इतना बढ़ा चढा कर पेश कर सकता है.टाइम्स ऑफ इंडिया ने पूजा की अनसैंसर्ड चित्र को अपने मुख पृष्ठ पर छापा. क्या ये सही है??

image आप गूगल पर पूजा चौहान के बारे में खोजें आपको ना जाने कितनी साइट उसके चित्रों से भरी मिलेंगी…मुझे एक झटका सा लगा जब कुछ पॉर्न ब्लौग और साइट पर पूजा के चित्रों को चट्खारे ले के पेश किया गया. कुछ लोगों ने इसे भारत  से भी जोड़ा ..उनका कहना है कि भारत में ऎसी घटनाऎं बढ़नी चाहिये ताकि वो कुछ और ऎसी तसवीरें देख सकें…

इंटरनैट के लिखे को आप मिटा नहीं सकते.कुछ दिनों बाद जब पूजा के परिवार वाले या उसकी खुद की बेटी जब इंटरनैट पर ये सब देखेगी तो उस पर क्या बीतेगी? कैसे जियेगी वो इस तथाकथित सभ्य समाज में? क्या विरोध का ये तरीका ठीक है?? क्या पूजा की नग्नता में मुख्य सवाल कहीं छुप गया है? क्या हम ऎसे ही चटखारे लेकर इस समाचार को छापते रहेंगे और पढ़ते रहेंगें…??

कल अपनी कुछ कविताओं में भी कुछ ऎसे ही प्रश्न उठाने की कोशिश की थी मैने …पर बहुत से लोगों की नजर वहां पर शायद नहीं पड़ी…

मेरी कल की पोस्ट यहां पढें…

पूजा का वीडियो यहां देखें ..

क्या जबाब है आपके पास इन सवालों का !!

पिछ्ले लेख पर ज्यादा प्रतिक्रियाऎं तो नहीं आयी लेकिन जो  भी आयीं उन्होने कुछ नये प्रश्न खड़े कर दिये.प्रमोद जी बोले

यह दिल्‍ली ही नहीं, मुंबई- कमोबेश किसी भी बड़े भारतीय शहर की अंदरूनी डायरी है. इस अनुभव से नतीजा क्‍या निकलता है? एक तो वह जिसे आप समूहबद्धता की सहूलियत का सीधा, आसान-सा नाम देकर छुट्टी पा सकते हैं. और देखना चाहें तो (मुझे हर जगह वही प्रभावी दीखता है)- कि ऊपरी तौर पर आधुनिकता के दिखावटी हो-हल्‍ले के बावजूद किस तरह यह हमारी एंटी-शहरी, घेटोआइज़्ड और अपनी पहचानी सामूहिकता से बाहर किसी भी अजनबीयत से भारी भय की मानसिकता है! आपको-हमको उतना न दिखे, मगर किसी भी अनजानी व नयी जगह में अल्‍पसंख्‍यक जिसकी सबसे ज्‍यादा तक़लीफ़ें व अलगावपन झेलते व जीते हैं.

 

यानि वो मानते है कि मेरे अनुभव मात्र मेरे अनुभव ही नहीं हैं उनका एक सार्वजनिक सरोकार है.लेकिन वो उन अनुभवों के नतीजे से खुश नहीं उनका कहना है ये नतीजा उतना सहज नहीं जितना मानने की भूल मैं कर रहा हूँ. वरन ये काफी ज़टिल है और इसके मूल में कहीं ना कहीं हमारे अल्पसंख्यक होने पर भय की मानसिकता भी है….मैं उनसे पूरी तरह से सहमत हूँ कि जब हम अल्पसंख्यक होते हैं तो अजनबीयत हमें एक मानसिक भय का अहसास करा देती है… ठीक इसी तरह का भय घुघूती जी की नायिका भी महसूस करती है किन्ही और अर्थों और संदर्भों में…यही भय हमें समूहबद्ध होने के लिये बाध्य करता है…

मसिजीवी जी बोले

काकेश थोड़ा सरलीकरण किए जा रहे हैं, जरा थमिए:
आप दिल्‍ली के बारे में जो कह रहे हैं वह पूरी तरह निराधार नहीं है पर आप बसावट के अधिकांश उदाहरण पेशेगत व क्षेत्र के देकर इसे स्‍वाभाविक कहे दे रहे हैं- जाति की भी भूमिका है उसे नजरअंदाज न करें और धर्म की भी- पर विशेष बात यह कि ये दिल्‍ली की प्रकृति उस रूप में नहीं है जैसी रवीश बता रहे हैं (अगर सच है तो)और फिर ‘अपने जैसे’ लोगों के इकट्ठे होने में जो सेल्‍फ व अदर की गहरी निर्मिति है वही तो ‘दंगे’ की शुरूआत है।
एक नजर ताज एपार्टमेंट (गीता कालोनी) पर भी डाल आएं और स्‍पष्ट हो जाएगा। ये जो अल्‍पसंख्‍यकों में भय-मनोवृत्ति होती है, महानगर उसका निषेध करता है या कहें आदर्श रूप में उसे करना चाहिए पर यदि वह उसका पोषण करने लगे तो ये महानगर का ग्रामीकरण है जो ‘गुजरातों’ को जन्‍म दे सकता है- देता है।

यानि वो भी मान रहे हैं जो मैने कहा वो निराधार नहीं है.वो इस बात से सहमत नहीं हैं कि समूह से जुड़ने में केवल पेशा या क्षेत्र ही महत्वपूर्ण नही होते वरन जाति की भी एक अहम भूमिका होती है.

अभय जी ने चिप्पी लगायी.

मियाँ काकेश, आप की पोस्ट से ज़्यादा आप की पोस्ट पर टिप्पणीकारों से सहमत हुआ जाता हूँ.. आशा है आप बुरा न मानेंगे..प्रमोद जी और मसिजीवी ने पते की बात कही है..

तो वो भी इस बात से सहमत है कि ये चीजे तो हैं ही.तो इस बात पर तो सहमति बनती है कि हम समूहबद्ध होते हैं और इसमें कहीं ना कहीं हमारे मानसिक भय का भी हाथ होता है, हमारे समूहबद्ध होने के कई कारण हो सकते हैं.उन्ही कारणों पर प्रकाश डालने के लिये आपको कुछ अनुभव और सुनाता हूँ.

[ पिछ्ली बार जब अभय जी से मिला था तो अभय जी ने कई अच्छी अच्छी बातें बतायीं थी,जिसे प्रमोद जी ने कहा कि काकेश शिष्यत्व भाव से सुनते रहे.उन्ही बातों में एक थी कि आपको अपने अनुभवों को अपने लेख में लिखना चाहिये. उसी का अनुकरण कर कुछ अनुभव आप से बांटे थे और आज भी बांट रहा हूँ ]

मेरा बचपन एक छोटे शहर में गुजरा.वैसा ही जैसा की भारत एक छोटे कस्बे का जीवन होता है ठीक वैसा ही जीवन था वहां.शहर जो कई मुहल्लों से मिलकर बना था.वहां एक क्रिकेट टूर्नामेंट होता था.जिसमें सभी मुहल्लों की टीमें रहती थी. लोग अपने अपने मुहल्ले की टीमों का समर्थन करते.हम भी अपने मुहल्ले की टीम के समर्थन में रहते.बड़ा ही जबर्दस्त माहौल होता जब अपनी अपनी टीमों के लिये लोग नारे लगाते.  ज़ीतने पर बड़ी ही शान से जुलुस निकालते.लोग समूहबद्ध होते थे और उस समूह का केन्द्र होता था मोहल्ला.

इसी तरह एक और ट्रॉफी वहां होती थी “हिल टॉप ट्रॉफी” वहां आसपास के शहरों की टीमें रहती थी ठीक वैसा ही माहौल होता जैसा पहले वाले टूर्नामेंट में था बस समूहबद्ध होने का कारण बदल जाता हम मुहल्ले की बजाय अपने शहर को समर्थन देने लगते.

जब इंजीनियरिंग के लिये दूर दूसरे शहर में गया तो लगता कि कितने दूर आ गये हैं.. अपना पहाड़ लगता कि छूट गया है.. मैदान का जीवन पहाड़ से बहुत से क्षेत्रों में अलग होता है.. उस समय यदि कोई भी पहाड़ का व्यक्ति मिल जाता तो लगता कि हाँ ये अपना ही तो है.. बड़े ही अपनेपन की फीलिंग होती एक ऎसा व्यक्ति जो अपने ही जैसे माहौल से आया..तो हॉस्टल में सारे पहाडियों का एक ग्रुप होता..इसी तरह से कुछ लोग नॉर्थ ईस्ट (असम,मेघालय) से आये हुए होते थे ..उनका अपना एक ग्रुप था..इस तरह के बहुत से ग्रुप थे..ऎसा नहीं था कि इन ग्रुपों में आपस में कोई वैर भाव हो या किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता या जलन.. पर  फिर भी ग्रुप थे..मतलब यहाँ भी हम समूह बद्ध हुए ..समूह का कारण था हमारा क्षेत्र यानि पहाड़ …

फिर नौकरी के लिये बंगाल जाना पड़ा.. पहली बार आप बंगाल जाओ जब आप बंगाली संस्कृति और भाषा को ठीक से नहीं जानते तो आपको सब कुछ अजनबी सा लगता है…सारे बंगाली लोग मिलते ..वहां उस समय यदि कोई हिन्दी भाषी मिलता तो लगता कि अपना ही है…वहां अक्सर जब लोग मिलते तो पूछ्ते “तुमि बंगाली ना हिन्दुस्तानी ?” ..”तुम बंगाली हो या हिन्दुस्तानी? ” पहले पहले तो समझ में नहीं आया..कि क्या पूछा जा रहा है..क्या बंगाल हिन्दुस्तान में नहीं है ? फिर ऎसा प्रश्न क्यो कि मैं बंगाली हूँ या हिन्दुस्तानी.. लेकिन फिर लगा कि लोग हिन्दी भाषियों को हिन्दुस्तानी कहके बुलाते हैं… तो एक सहज जुड़ाव उन लोगों से हो गया जो हिन्दी भाषी थे…  कोई यदि कहता मॆं यू पी का हूँ या फिर बिहार का हूँ तो लगता हाँ ये अपना ही तो है… समूहबद्ध होने का कारण हमारी मातृ भाषा बन गयी थी….

एक बार ऑफिस के काम से लंदन जाना पड़ा .. वहाँ पहुंच कर भी एक अजनबियत की फीलिंग हुई ..लगा कि कहां आ गये ..कोई अपना जैसा नहीं …सब के सब अंग्रेज .. भाषा भी सामान्य अंग्रेजी नहीं ..बहुत ध्यान से सुनना पड़ता.. भोजन भी अलग… तौर तरीके भी अलग और संस्कृति भी अलग … वहां लगता कि काश कोई भारतीय मिल जाये..और यदि कोई मिल जाता तो बहुत ही अपना सा लगता ..चाहे फिर वह दक्षिण भारतीय हो या फिर उत्तर भारतीय..कोई गुजराती हो या फिर कोई बंगाली… कोई  यूपी का हो या कश्मीर का ..सब अपने लगते.. ऎसे ही एक बार एयरपोर्ट पर एक अंग्रेज से दिखने वाले एक व्यक्ति ने पूछा ..”आर यू इंडियन ? ” तो मैने जबाब दिया “यस” ..फिर तो वो बहुत ही प्यारी उर्दू मिश्रित हिन्दी में शुरु हो गये ..अपने बारे में बताने लगे..पता लगा कि वो कश्मीरी हैं.. तो यहां हमारी समूहबद्धता का कारण था भारत…

इसी तरह से यदि एक से ज्यादा ग्रह होते जहां जीवन होता तो दूसरे ग्रह में जाके हम किसी पृथ्वी वासी को सहजता से अपना लेते…

तो मेरी समूहबद्धता की शुरुआत मोहल्ले से शुरु हुई और देश तक गयी.. ऎसी ही हम सबकी होती है..हां इसमें धर्म भी रहता है जाति भी…कभी हम धर्म के नाम पर एकत्रित होते हैं तो कभी जाति के नाम पर ..कभी क्षेत्र के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर .. कभी पेशे के नाम पर तो कभी रुचियों के नाम पर .. ये एक प्राकृतिक स्वाभाविक प्रक्रिया है ..जो दिल्ली में भी उतनी ही है जितनी अहमदाबाद में ..बंगाल में भी उतनी ही है जितनी लंदन में….इसके लिये किसी एक शहर को ये कहके अलग कर देना कि नहीं इस शहर में ही इस तरह की बातें हैं तो ये मेरे हिसाब से गलत है..हाँ हर एक शहर अपनेआप अलग है..हर शहर की अपनी मानसिकता है..कहीं ..कोई चीज प्रधान है कहीं कोई और… जैसा मसिजीवी ने कहा कि ये दंगो का आमंत्रण है तो ये भी पूरी तरह से ठीक नहीं लगता.. कि जाति या धर्म के आधार पर समूह हैं तो वो आपस में लड़ेगे ही.. लड़ने के लिये केवल समूह ही जिम्मेवार नहीं अन्य कई कारण भी जिम्मेवार होते हैं…

अंत में घुघुती जी की प्रतिक्रिया जो मेरे को मेरे विचारों के करीब लगती है.

बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो हमें स्वाभाविक व व्यवहारिक लगती हैं किन्तु जो पोलिटिकली करेक्ट नहीं होतीं। मान लीजिये मैं शाकाहारी हूँ और मेरा पूरा परिवार शाकाहारी है तो यदि मैं शाकाहारी लोगों के बीच रहूँगी तो मेरा जीवन सरल हो जाएगा। मैं रात दिन पड़ोसियों के घर से आती माँस पकने की गन्ध से बच जाऊँगी। मैं स्वयं माँस पकाती हूँ पर मुझे भी वह गन्ध असह्य लगती है।

इसी तरह यदि किसी सोसायटी में केवल वृद्ध रहते हों तो वे पार्टियों व संगीत की ऊँची आवाज से भी बच जाएँगे और युवाओं को टोकने से भी। पर यही सब बात जब धार्मिक या जातीय स्तर पर कही जाती है तो स्वाभाविक रूप से बुरी लगती है। यदि मैं किसी माँसाहारी ब्राह्मण को घर किराये पर देने से मना करती हूँ तो उसे बुरा नहीं लगेगा, पर यदि किसी अन्य धर्म वाले , या जाति वाले को माँसाहार के आधार पर मना करूँगी तो उन्हें निश्चय ही लगेगा कि मैं धार्मिक या जातीय भेदभाव कर रही हूँ। यह साधारण सा मनोविज्ञान है।

हाँ, यह भी सही है कि जितनी अधिक विविधता किसी मौहल्ले में होगी उतना ही वह हमें सहनशील व औरों के अधिकारों व भावनाओं के प्रति जागरुक बनायेगी।

 तो मैने तो अपने अनुभव आप से बांट दिये ..अब आप भी अपनी प्रतिक्रियाऎं दे ही दें….

पहले रवीश जी की पोस्ट आयी अहमदाबाद के जातिवाद के बारे में.पढ़कर बहुत आश्चर्य हुआ. अब रवीश जी जैसा सम्मानित पत्रकार जब स्पेशल रिपोर्ट कर रहा है तो फिर शक की गुंजाइस तो थी नहीं फिर भी मन नहीं माना.अपने एक मित्र से संपर्क किया जो अहमदाबाद में रहे हैं तो उन्होने  भी इस तरह की किसी जातिवाद की समस्या से इनकार किया.लेकिन वो मित्र तीन वर्ष पहले ही अहमदाबाद छोड़ चुके थे इसलिये उनकी बात पर पूरी तरह से यकीन ना किया गया.एक तरफ रवीश जी थे..एन डी टी वी था दूसरे ओर हमारे नॉन गुजराती मित्र ..अंतत: एडवांटेज रवीश जी को ही दिया गया और हम बेसब्री से उस स्पेशल रिपोर्ट की प्रतीक्षा करने लगे.पता चला कि अभी फिलहाल वह रपट स्थगित कर दी गयी है. फिर योगेश शर्मा जी का लेख आया उससे स्थिति थोड़ी साफ सी हुई.उस लेख को पढ़कर मेरी भी हिम्मत हुई कि मैं भी अपने इसी तरह के अनुभव आप सब के सामने रखूँ. क्योकि जो बात योगेश जी के हिसाब से अहमदाबाद में सच है वही बात कमोबेश दिल्ली के लिये भी सच है कम से कम मेरे अनुभव तो यही कहते है.

तकरीबन ड़ेढ़ बरस दिल्ली आया तो मकान की समस्या से दो चार होना पड़ा. लोगों ने सुझाया की सस्ता मकान किराये पर चाहिये तो या तो नौएडा में लो या फिर गुड़गांव में. तो हमने खोज प्रारम्भ की. नोएडा में एक मकान पसन्द आया जिसमें नीचे के हिस्से में मकान मालिक का परिवार रहता था और उपर का हिस्सा किराये के लिये था.यह मकान हमें एक प्रोपर्टी डीलर ने दिखाया.मकान मुझे पसन्द आ गया तो डीलर बोला चलिये फिर मकान मालिक से मिल लेते हैं.मकान मालकिन से मिले पहले तो उसने इधर उधर की बहुत सी बातें पूछी मसलन घर में कौन कौन है.क्या क्या शौक है वगैरह बगैरह ..हमने सारे सवालों के सही सही जबाब दिये और सोचने लगे कि अब ये मकान किराये के लिये मिल ही जायेगा..इसी सोच में डूबे थी कि मकान मालकिन ने पूछा … कि पंजाब में किधर घर पड़ता है आपका.. उनकी बात मेरे समझ में नहीं आयी.मैने कहा जी मेरा घर पंजाब में नहीं है..तो वो चौंक सी गयी..तो फिर आप पंजाबी नहीं है..मैने कहा नहीं तो.. तो वो सीधे बोली तब तो आपको हम ये किराये पर नहीं दे सकते क्योंकि हम केवल पंजाबियों को ही किराये पर मकान देते हैं..

इसी तरह की बहुत सी अन्य बातें भी पता चलीं.. इसी मकान खोज के दौरान. जैसे एक प्रोपर्टी डीलर ने एक विशेष सोसायटी के बारे में बताया जिसमें अन्य सोसाइटियों के मुकाबले किराया काफी कम था.पूछ्ने पर उसने कहा कि उस सोसायटी में केवल नीची जाति के लोग रहते हैं इसलिये किराया कम है.इसी तरह कि कई अन्य बातें भी ज्ञात हुईं….वो बातें भी सोसायटियों से संबंधित थी ठीक उसी तरह जिस तरह योगेश जी ने अहमदाबाद के बारे में बताया. दिल्ली में भी आपको बहुत सी सोसायटीज ऎसी मिलेंगी जहां आपको एक ही तरह के लोग मिल जायेंगे. 

यदि आप दिल्ली में आइ पी एक्सटेंशन या मयूर विहार की ओर जायें, जहां हमने सर्वाधिक खोज की थी किराये के एक अदद फ्लैट की, तो इस तरह के बहुत से सच सामने आयेंगे..जैसे आपको मिलेगा “काकातिया अपार्टमेंट” जहां आप आप को सिर्फ दक्षिण भारतीय लोग ही मिलेंगे और यदि आप दक्षिण भारतीय नहीं हैं तो आप वहां किराये पर मकान नहीं ले सकते. इसी तरह “हिमालय अपार्टमेंट” में ग़ढवाली और “हिम विहार” में आपको केवल कुमाउंनी लोग मिलेंगें. “तरंग” अपार्टमेंट में केवल एन आई सी में काम करने वाले लोग हैं तो “कानूनगो अपार्टमेंट” में केवल कानून विद . इसी तरह से आपको “प्रेस अपार्टमेंट” और “इंजीनियर्स स्टेट” भी मिल जायेंगे.

कहने का मकसद है कि एक तरह के लोगों का समूहबद्ध होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है ना कि केवल जातिवादी प्रक्रिया.हम सभी अपने अपने पसंद व रुचि के हिसाब से समूहबद्ध होते हैं…और ये एक स्वाभाविक प्रकिया सी लगती है. मेरे हिसाब से इसमें ज्यादा चिंतित होने वाली बात नहीं लगती.. वैसे भी धीरे धीरे बाजार इन सभी आभासी ढांचों को तोड़ रहा है. जैसा कि परसाई जी ने कहा है ” अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़ बैठता है तब गोरक्षा आन्दोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.” …ठीक वैसी ही स्थिति है. आप मकान उसे देंगे जो आपको ज्यादा पैसे देगा बिना इस बात कि चिंता किये कि वो किस जाति का है.

ये लेख अहमदाबाद की तथाकथित समस्या पर मेरे विचार नहीं है वरन दिल्ली में मुझे हुए अनुभवों का वर्णन है.रवीश जी की स्पेशल रिपोर्ट की अभी भी प्रतीक्षा है.

ज़िस्म

अपनी पिछ्ली पोस्ट में मैं कुछ उधेड़बुन में था कि ब्लौग क्या बिना उद्देश्य के भी लिखा जा सकता है … आप लोगों की टिप्पणीयों से साहस बंधा कि मुझे इस प्रश्न पर सर खपाने की बजाय लिखते रहना चाहिये …. इसलिये अब अपने सारे पूर्वाग्रह और दुराग्रह छोड़ के फिर से उपस्थित हुआ हूँ .

अभी कुछ दिनों से टीवी पर ऎसे विज्ञापनो की संख्या बढ़ गयी है जिसे आप अपने पूरे परिवार के बीच नहीं देख सकते…या देखकर शर्म महसूस कर सकते हैं… पहले ऎसे विज्ञापन केवल कॉंडोम या अन्य गर्भनिरोधकों के ही होते थे. मुझे याद है ..बचपन में जब केवल दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था तब रात के हिन्दी समाचारों के बाद गर्भनिरोधकों जैसे “निरोध” या “माला-डी” का विज्ञापन आता था और जब भी हिन्दी समाचार समाप्त होने को होते और मुख्य समाचारों की बारी आती तो हमारे घर में टी वी की आवाज कम कर दी जाती. हाँलाकि उस समय इन विज्ञापनों में अश्लील कुछ भी नहीं होता था फिर भी इन्हें परिवार के बीच देखना गवारा नहीं समझा जाता था. और आजकल तो विज्ञापन ही ऎसे आ गये हैं जो द्र्श्य और श्रव्य दोनों ही रूपों में अश्लीलता की श्रेणी में आते हैं… और ये विज्ञापन खुले आम हमारे घरों में प्रवेश भी कर गये हैं… अभय जी अपनी पोस्ट में यौन कुंठा की बात कही उनका इशारा आजकल बन रही फिल्मों के बारे में था.. फिल्म देखने के लिये तो तब भी आपके पास एक विकल्प (ऑप्सन )होता है कि आप फिल्म देखें या नहीं लेकिन विज्ञापन तो कोई विकल्प भी नहीं देते… ये तो बस आपके टी.वी. पर आ जाते हैं जब तक आप इसकी शीलता या अश्लीलता समझे तब तक ये समाप्त हो चुके होते हैं और आप सोफे में बैठ नजरें कहीं और ग़ड़ाये चुप रहते हैं ये साबित करने के लिये कि आपका ध्यान तो कहीं और था.

Amul Macho2

अब “अमूल माचो” नामक अंडरवियर के विज्ञापन को ही लें.. ये किस तरह की फंतासी का निर्माण आपके अन्दर करता है .. जब नयी नवेली दुल्हन तालाब के किनारे अपनी पति के अंतर्वस्त्र को धो रही होती है तब वो और वहां पर जलती भुनती अन्य औरतें क्या सोच रही होती हैं… और वो नयी नवेली दुलहन सारी लोकलाज त्याग कर घुटनों तक अपनी साड़ी उठा कर, अजीब अजीब से मुँह बनाकर अंतर्वस्त्र धोने लगती है .. आप भी देखना चाहते हैं तो देखिये क्या है यह ?.. एक फंतासी के जरिये उत्पाद बेचने की कोशिश .. और ये ही बिक भी रहा है.. समाचारों के मुताबिक इस ब्रांड की बिक्री में इस विज्ञापन के बाद 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.. अंडरवियर के ऎसे बहुत से विज्ञापन आजकल दिखाये जा रहें हैं.. कुछ लोगों के मुताबिक ये सृजनात्मकता (क्रियेटिविटी) है .. लेकिन यदि क्रियेटिविटी क्या केवल अश्लील ही होती है…

इसी तरह के एक अन्य विज्ञापन में एक अर्धनग्न बाला बड़े ही सिड्यूसिंग तरीके से कहती है … “निकालिये ना ……. कपड़े “. ये क्यों?? इस तरह द्विअर्थी वाक्य तो पहले दादा कोंडके की फिल्मों में होते थे .. आपको “ अन्धेरी रात में दिया तेरे हाथ में” या “खोल दे मेरी…… जबान “ तो याद ही होंगे ना..तब लोग इन फिल्मों को कोसते थे और ये फिल्में “ए” सार्टिफिकेट के साथ हॉल में आती थीं .. लेकिन आजकल के विज्ञापन बिना किसी सेंसर के हमारे ड्राइंग रूम में आ रहे हैं… इसी तरह का एक द्विअर्थी विज्ञापन था रीडिफमेल का ..जिसमें लड़कियां एक छोटे राजू के बड़े साइज के बारे में बात कर रही होती हैं.. यहाँ तक की राजू का बॉस भी शौचालय में अपनी दृष्टि राजू के शरीर पर ही गड़ाये रखता है … और अंत में एक बेशरम मित्र पूछ ही लेता है क्या ये सचमुच बहुत बड़ा है .. तो राजू कहता है कि ये बड़ा ही नहीं वरन अनलिमिटेड है .. तब पता चलता है कि वो लोग राजू के मेल बॉक्स के साईज के बारे में बात कर रहे होते हैं…

अब कॉडोम के “बिन्दास बोल” या फिर दिल्ली सरकार के “कॉडोम हमेशा साथ रखिये” से तो बच्चे बहुत कुछ सीख ही रहे थे… अब आने वाले समय में और भी ना जाने क्या क्या सीखेंगे …


आज कई दिन बाद फिर से अवतरित हुआ हूँ इस ब्लौग में… इस बीच ना जाने कितने नये ब्लौग आ चुके होंगे और नयी पोस्ट तो और भी ज्यादा होंगी ..लेकिन मैं कुछ भी पोस्ट करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था ..एक तो समय की कमी और दूसरी मन में ब्लौग को लेकर चलती उधेड़बुन.. पिछ्ली पोस्ट लिखी तो ज्ञानदत्त जी ने उसे ऑर्गेनिक कैमस्ट्री का नाम दिया था ..तब बात समझ नहीं आयी लेकिन उन्होने अपनी पोस्ट में उसे स्पष्ट करने का प्रयास भी किया . उन्होने कहा कि “काकेश; लगता हैं बड़े मंजे ब्लॉगर हैं। ” [इससे हमें आपत्ति है ..क्योकि पहले तो हम खुद को खिलाड़ी कहकर खिलाड़ियों का अपमान नहीं करना चाहते ... हाँ भारतीय टीम के क्रिकेट खिलाड़ी कहते तब भी ठीक था और फिर मँजे हुए ... मँजने के बाद ही धुलने का नम्बर आता है ..तो अब हमारी धुलाई होने वाली है उस बात से थोड़ा घबरा भी गये :-) ] …फिर जब उन्होने अपने जुनून की बात की तब टिप्पणीयों के द्वारा पता चला कि चिट्ठाकारी का कोई उद्देश्य भी होना चाहिये … हम तो यूँ ही चिट्ठाकारी करने में लगे थे कि मन हुआ तो कुछ लिख दिया नहीं तो पढ़ते रहो… टिपियाते रहो…लेकिन अब कोई कह रहा है कि कोई उद्देश्य भी होना चाहिये .. तो हम जैसे उद्देश्यहीन व्यक्ति क्या करें … ब्लौग लिखें या नहीं….??

फिर कुछ दिन पहले एक चिट्ठाकार से बात हुई तो यूँ ही जब उन्हे हमारी उम्र पता लगी तो कहने लगे ..अरे आप इतने बड़े हैं आपके लेखन से तो लगता था कि आप कोई 20-25 साल के ही होंगे… अब इसमें वैसे खुश होने की बात तो थी नहीं कि मेरे चेहरे से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता टाइप … क्योंकि उनसे तो सिर्फ वर्चुअल मुलाकात हुई थी … हम सोचे कि हम इतना घटिया लिखते हैं इसीलिए इन महाशय को लगा होगा कि कोई पढ़ा-लिखा समझदार परिपक्व आदमी तो ऎसा लिख ही नहीं सकता ..वैसे यहां ये भी बता दें कि हम पढ़े,लिखे,समझदार,परिपक्व हैं भी नहीं … इसलिये कोई विशेष अनुभूति नहीं हुई..उलटे अच्छा ही लगा …

फिर जब निर्मलानंद जी से मिले तो वो बोले अरे आप तो इतनी कम उम्र के हैं ..हम तो आपको ..खैर उन्होने जो भी कहा वो उसका बिल्कुल उलटा था जो पहले चिट्ठाकार ने कहा था… मेरी उधेड़बुन और बढ़ गयी .. आजकल प्रमोद भाई अपने को पहचानने की बात करने लगे हैं… और आज ज्ञानदत्त जी ने भी एक तरह की पहचान की बात छेड़ दी …मेरा तो कनफ्यूजन बढता ही जा रहा है … मैं अनेक सवालों से दो चार हो रहा हूँ ..क्या मेरा लेखन (ही) मेरी पहचान नहीं है ? क्या किसी के लेखन से उसकी उम्र और उसके व्यक्तित्व का पता चलता है ..या फिर चलना भी चाहिये क्या ?? क्या एक ही तरह का लेखन दो अलग अलग व्यक्तियों को दो अलग अलग अर्थ दे सकता है ? यदि हाँ तो क्या इसमें लेखक का दोष है या फिर पढने वाले का या कि किसी का नहीं… क्या व्यक्ति के विचार समझने के लिये व्यक्ति को जानना आवश्यक है .. ?? ज्ञानदत्त जी ने कहा ” लोग ब्लॉग पर अपने प्रोफाइल में आत्मकथ्य के रूप में हाइपरबोल में लपेट-लपेट कर न लिखें. अपने बारे में तथ्यात्मक विवरण दें. अपने को न तो महिमामण्डित करें और न डीरेट ” वो लोग जिंन्होने अपने प्रोफाइल में कुछ नहीं लिखा या बढ़ा चढ़ा कर लिखा है तो उससे उनका लेखन अच्छा या बुरा हो सकता है ..??

मैं इन्ही प्रश्नों से दो चार होता हूं ..आप कुछ सुझायें ताकि हम कुछ नया लेकर आपके सामने आयें…