क्या आपको मालूम है आप अपने घर में अब योगाभ्यास नहीं कर सकते ? क्योंकि यदि आप योगाभ्यास करेंगे तो आपको श्री विक्रम चौधरी जी को पैसे देने पड़ेंगे…..क़्योकि योग का आविष्कार भले ही उन्होने न किया हो योग का पेटेंट उनके नाम जरूर है.

आज सुबह जब उठा तो सोचा बहुत मोटे हो रहे हैं थोड़ा योगाभ्यास कर लें.हम बचपन से ही योग (योगा नहीं) करते रहे हैं-ये रामदेव जी के आस्था में आने से बहुत पहले की बात है-पर पिछ्ले 6-7 सालों में धीरे धीरे योग और व्यायाम घटते गया और वजन बढ़ता गया.आज जब पार्क में योग करने गये तो एक मित्र मिल गये और उन्होने बताया कि अब भविष्य में इस तरह से योगाभ्यास करना या किसी को सिखाना मँहगा पड़ सकता है.

समाचार ये है कि ..कलकत्ता में जन्मे ,अमरीका के वेवरले हिल्स में रहने वाले, जाने माने योग विशेषज्ञ
श्री विक्रम चौधरी ने योग का पेटेंट अपने नाम करने का आवेदन दिया है. शायद आपको पता हो कुछ समय पहले हल्दी और बासमती के पेटेंट के लिये भी आवेदन दिये गये थे.

कौन हैं ये विक्रम चौधरी …और क्या है उनका पेटेंट …?

विक्रम चौधरी ने अपना पहला योग स्कूल 1973 में सैन फ्रेंसिस्को में खोला था और आज उनके पूरी विश्व भर में 900 से ज्यादा ऎसे स्कूल चल रहे हैं .उनके शिष्यों में मैडोना और सेरेना विलियम्स भी शामिल हैं. अमरीका में योग व्यवसाय खूब फल फूल रहा है और इस व्यवसाय में विक्रम योग स्कूल का अग्रणी नाम है . एक अनुमान के अनुसार अमरीका में योग सालाना 25 अरब डॉलर का व्यापार करता है.

अमरीकी पेटेंट और ट्रेडमार्क कार्यालय ने 150 योग संबंधित कॉपीराइट और 2315 योग ट्रेडमार्क आबंटित किये है. इसका मतलब उन योग क्रियाओं का प्रयोग,बिना किसी को पैसा दिये करना अवैध माना जायेगा.

विक्रम चौधरी का कहना है कि उन्होने सिर्फ 26 ऎसे योगक्रियाओं को पेटेंट करवाया है जो यदि उसी क्रम में की जायें तो व्यक्ति को बहुत लाभ पहुंचाती हैं. उनका कहना है कि इन क्रियाओं को कोई भी, इसी क्रम में या किसी और क्रम में भी,किसी को नहीं सिखा सकता.यदि कोई सिखाना ही चाहे तो उसे 1500 डॉलर दे के चौधरी जी के इंस्टीट्यूट से इसकी ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी. इतना ही नहीं इसके बाद उसे चौधरी जी का फ्रेंचाइजी बनना पड़ेगा और नियमित पैसा देना पड़ेगा.

भारत की बौद्धिक संपत्ति का दूसरे देशों,विशेषकर अमरीका में, इस तरह का उपयोग कहाँ तक उचित है ??

Anaam

वैसे तो मुझे खुशी होनी चाहिये थी कि कल ढेर सारी हिट्स भी मिले और टिप्पणीयां भी ….पर ना जाने क्यों उतनी खुशी नहीं हुई .क्योंकि जिस सवाल को लेकर प्रतिकार प्रारम्भ हुआ था वो सवाल तो बना ही रहा बल्कि उस सवाल के जबाब तलाशने की जद्दोजहद में कुछ नये सवाल बनते चले गये . हाँलाकि य़ोगेश जी ने कहा “ बहुत खूब अंदाज में आपने विषय को समाप्त करने के लिये अंतिम भाषण जैसा दे डाला है. मैं समझता हूं कि आपकी इस पोस्ट में इतना दम है कि अब इसे पढने के बाद बेनामी विषय पर कोई पोस्ट नहीं लिखी जानी चाहिये. ” . ये तो मैं नही जानता कि पोस्ट में कितना दम था या है पर कुछ नये और पुराने सवालों पर मेरा स्पष्टीकरण मुझे आवश्यक जान पड़ता है . पहले तो मैं चाहता था कि एक टिप्पणी कर दूं पर जब देखा कि कल टिप्पणीयां भी पोस्ट जितनी बड़ी हो गयी तो दिमाग में आया कि चलो एक पोस्ट ही लिखी जाय . वैसे मेरा मानना है कि अनाम,बेनाम पर बहस काफी लंबी हो गयी है और इसको आगे नहीं खींचना चाहिये पर यह बहस केवल एक अनाम व्यक्ति पर नहीं बल्कि उसके बहाने चिट्ठाजगत के मुद्दों पर भी है .

यहां मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरी कल वाली पोस्ट किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं थी. मैं तो किसी ‘असभ्यता’ का सभ्य तरीके से प्रतिकार कर रहा था.

जब इतनी अच्छी अच्छी टिप्पणीयां आई हैं तो उन्हें बरबाद क्यों जाने दें .थोड़ा सा विश्लेषण कर लिया जाय वैसे भी ‘ई-स्वामी जी’ ने ‘चने की झाड़’ पर चढ़ा ही दिया है यह कहके कि आपके “लेखन में निरपेक्ष विश्लेषण और वैचारिक स्पष्टता” है और कुछ सुधी जनों ने उसका समर्थन भी कर दिया है “मैं भी स्वामीजी की बात से सहमत हूँ।“ कह के :-) . ये शब्द आपको ‘व्यर्थ के गुमान में रह कर अपने आपको बड़ा समझना’ नहीं सिखाते वरन आपके ऊपर एक अतिरिक्त जिम्मेवारी डाल देते हैं …. अपेक्षाओं पर खरे उतरने की. धन्यवाद आप सभी का.

चलें टिप्पणीयों के माध्यम से मूल समस्या को समझें और एक आम सहमति सी बनाने का प्रयास करें . सही समस्या की पहचान सही समाधान की पहली सीढ़ी है . यदि हम सही समस्या को पहचान पाएंगे तो समस्या का समाधान भी सहज ही हो जायेगा. अभी जो बात सामने आ रही है कि ये मुद्दा अनाम या बेनाम का नहीं बल्कि टिप्पणीयों में असभ्य भाषा के इस्तेमाल का है .

देखिये कुछ उदाहरण …

“बात गंदी भाषा के असभ्यता पूर्वक इस्तेमाल को लेकर ज्यादा है.”
“बेनामी टिप्पणीयो से कोई परेशानी तब तक नही है जब तक वह सभ्य भाषा मे हो !”
“यदि टिप्पणी की भाषा ठीक है तो भी बेनाम को क्यों कोसे जा रहे हैं।“
“एक इंसान को किसी दूसरे इंसान से जिस न्यूनतम तमीज की अपेक्षा होती है, कम से कम उतनी तमीज तो हम आपस में संवाद करते समय अपनी भाषा में दिखा ही सकते हैं। “
“ग़ुमनामी की आड़ से गाली गलौज.. अति-स्वतंत्र समाज में भी मर्यादायें तो होंगी..मामला उसी सीमा का है..
“मैंने सेठ होशंगाबादी के ब्लॉयग पर देखा था कि एक बेनाम ने जमकर xxxx गालियां दे मारी…… मेरे खिलाफ सही बात बोलिए जिसे बोलना है . मैं नहीं परेशान होता अपनी निंदा से .
“ परेशानी बेनाम से नहीं उसकी आजादी से है।अनजान की आलोचना, बुराई या गाली कोई बर्दाश्त कैसे करेगा?”

तो इतना तो जाहिर ही है कि अनाम की आड़ में हम जूझ रहे हैं किसी दूसरी समस्या से, किसी दूसरे प्रश्न से. यदि हम सही प्रश्न पर विचार करेंगे तो शायद सही हल ढूंढ भी पायेंगे. ये सभी बाते सही हैं और चिंता का विषय भी.

किसी ने कहा है कि अंधेरे को कोसने से बेहतर है एक दीप जलाना . ‘अनाम’ को गरियाना अंधेरे को कोसने जैसा है .’अनाम’ अजेय है. हम ‘अनाम’ से नहीं जीत सकते . ‘अनाम’ तो रक्तबीज है . ‘अनाम’ अमर है . ‘अनाम’ एक साश्वत सत्य है . ‘अनाम’ सर्वव्यापी है .’अनाम’ बहुरूपिया है . इससे पहले भी ‘अनाम’ था ….कई रूपों में ….अभी भी है और आगे भी रहेगा . रूप बदल सकते हैं सन्दर्भ बदल सकते है पर ‘अनाम’ नहीं बदलेगा . वो तो हमारी पहचान का एक हिस्सा है . हम सब किसी ना किसी रूप में ‘अनाम’ हैं . और यही हमारा उदगम (स्टार्टिंग पौइंट ) है. हमारी यात्रा ‘अनाम’ से नामवर बनने की यात्रा है . ‘अनाम’ को कोसना कीचड़ में पत्थर मारने जैसा है . ‘अनाम’ को लतियाना , गरियाना हवा में डंडा चलाने जैसा है . आओ ‘अनाम’ के अस्तित्व को स्वीकारें.

तो हमारी लड़ाई उस ‘अनाम’ से नहीं वरन उस असभ्य भाषा से है जो हमें परेशान करती है . य़े सही बात है .पिछ्ली पोस्ट में मेरा भी यही कहना था कि हमें कॉंनटेन्ट के बारे में सोचना है ना कि कॉंनटेन्ट राइटर के. हमें अपना मोर्चा असभ्यता के विरुद्ध खोलना होगा ना कि गुमनामियत के विरुद्ध . असभ्यता का दायरा विस्तीर्ण है ये केवल टिप्पणीयों तक ही सीमित नहीं है . ये आपके चिट्ठे पर भी उतना ही लागू होता है जितना मेरी टिप्पणी पर. लेकिन हम क्या कर रहे हैं .. टिप्पणीयों से गंद हटाने के लिये अपने चिट्ठे पर गंद भर रहे हैं. असभ्यता के विरोध मे बोलने की बजाय हम खुद असभ्यता का परिचय दे रहे हैं . मेरा प्रतिकार इसी बात पर था और है. किसी ने कल लिखा था

“कल को कोई अपनी एक पहचान लेकर गाली गलौज करने लगे तो भी आप प्रकाशित तो नहीं कर देंगे..” सही बात है …यही तो कर रहे है हम ‘अपनी एक पहचान लेकर गाली गलौज “ . ये बात महत्वपूर्ण नहीं कि ‘किसने लिखा’ बल्कि ये कि ‘क्या लिखा’…..

कैसे हम इस कथित असभ्यता को निकाल बाहर करें ये एक बहुत बड़ा सवाल है . असभ्यता का कोई मानक , युनिवर्सल स्टैंडर्ड नहीं है . जो बात मुझे असभ्य सी लगती है वो आपको सभ्य लग सकती है. और इसका विपरीत भी सही है . अब चूंकि समस्या युनिवर्सल नहीं है तो एक युनिवर्सल समाधान भी मुश्किल है . तो इसमें हमें अपने विवेक से काम लेना होगा. हमारी असभ्यता का निर्धारण हम करेंगे . टिप्पणी-मॉडरेशन असभ्यता-निर्धारण में सहायता करने वाला औजार है . इस औजार का प्रयोग करें और अपने विवेक से निर्धारित करें कि आप क्या रखना चाहते हैं क्या हटाना . जहाँ तक बात चिट्ठों में असभ्यता निर्धारण की है तो उसमे भी हम बहुत कुछ कर सकते है प्रत्यक्ष रूप से नहीं पर परोक्ष रूप से . हम पाठक हैं… हम चुन सकते हैं कि क्या पढ़ें क्या नही .ये अधिकार हमारा है और यदि कोई असभ्य बात आपको लगी किसी चिट्ठे पर तो उसका सभ्य भाषा में प्रतिकार भी कर सकते हैं….


आपको ऎसा नहीं लगता कि ज्ञान कुछ ज्यादा ही हो गया .. मुझे तो ऎसे ही लगता है ..अब सुबह सुबह 4 बजे उठकर मुँह हाथ धोकर , चाय पीने की बजाय कोई चिट्ठा लिखने बैठ जाये तो उससे क्या उम्मीद करें … और फिर चने की झाड़ पर चढ़ाया है तो इतना तो झेलना ही पड़ेगा ना… पर योगेश जी अब निश्चिंत रहें अब ‘बेनामी’ पर नहीं लिखुंगा ….हाँ ‘सूनामी’ पर लिख सकता हूं :-)

आज मैं बैचेन हूँ.. इसलिये नहीं की मेरी पिछली पोस्ट “निश:ब्द” की तरह पिट गयी.. इसलिये भी नहीं कि मुझे फिर से “नराई” लगने लगी … इसलिये भी नहीं कि मुझे किसी ‘कस्बे’ या ‘मौहल्ले’ में किसी ने हड़का दिया हो .. इसलिये भी नहीं कि मेरा किसी ‘पंगेबाज’ से पंगा हो गया हो .बल्कि इसलिये कि मुझे ‘नाम’ की चाह ना रखने वाले अनामों ,बेनामों का गालियां सुनना अच्छा नहीं लग रहा .

मैं एक चिट्ठाकार हूँ …क्या मुझे चिंतित होना चाहिये कि मेरा अस्तित्व खतरे में है . क्या मेरा लेखन किसी की टिप्पणी के कारण ही अच्छा या बुरा हो सकता है. मुझे ‘आत्मावलोकन’ करना चाहिये (!! ?? ) …क्योकि ‘मैं’ ये निर्धारित करना चाहता हूं कि किसी और के चिट्ठे पर बेनामी टिप्पणी ना हो …. आप अपने चिट्ठे पर बेनामी चिप्पी नहीं चाहते तो उस के लिये आपके पास तकनीकी समाधान है …बन्द कर दीजिये ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ …पर हम यह नहीं चाहते क्योकि इस से तो मेरी चिप्पियां कम हो जायेंगी और मैं , टी आर पी की दौड़ में नही आ पाऊंगा या फिसड्डी रह जाऊंगा … टी आर पी रेटिंग लोकप्रियता से निर्धारित होती है और लोकप्रियता टिप्पणीयों से . मैं ‘अप्रगतिशील’ साहित्यकार बन सकता हूँ.. ‘अलोकप्रिय’ नहीं .

हम क्यों चाहते हैं ‘नाम युक्त टिप्पणी’.. क्योंकि हम नाम देखकर निर्धारित करेंगे कि उस टिप्पणी को किस खाँचे में फिट करना है … कैसा बरताव करना है उसके साथ… मैने पिछ्ली पोस्ट में भी कहा था हमारे यहाँ खाँचा बनाने कि प्रक्रिया नाम से शुरु हो जाती .य़े एक बुनियादी सवाल है …हमें इस पर चिट्ठाकारिता के इतर भी विचार करना है . क्यों हम कही हुई ‘बात पर ना जाकर जात पर’ ( नाम पर ) जाते हैं . क्यों मेरी कही हुई ठीक वही बात अलग अलग नामों से अलग अलग अर्थ दे जाती है .

हम अनाम-बेनाम-गुमनाम के चंगुल में क्यों फ़ँस जाते है . यदि में अपना नाम अनाम की जगह अनामदास रख लूं तो ठीक है लेकिन मैं अनाम नहीं रह सकता..ऎसा क्यों …??

किसी ने कहा कि ‘बेनाम लिखने वाला कायर है’ . मैं कहता हूं ‘बेनाम लिखने वाला सभ्य है’ . वो आपकी इज्जत कर रहा है . वो आपके खिलाफ बुरे विचार ,आपकी बात की खिलाफत सीधे मुंह पर नहीं कर रहा . वो आपसे वार्तालाप का एक नया माध्यम तलाश रहा है . इसमें तकनीक भी उसका साथ दे रही है फिर आपको क्या समस्या है ?…. आपके लिये क्या महत्वपूर्ण है वार्तालाप या व्यक्ति .यदि आप कहें ‘वार्तालाप’ .. तो नाम पर क्यों जाते है वो अनाम हो या अनामदास क्या अंतर पड़ता है और यदि आप कहें नहीं ‘नाम’ ज्यादा महत्वपूर्ण है तो बन्द कर दो ना ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ .क्यों बेचारों को गरियाकर अपनी सभ्यता का परिचय दे रहे हो .

बेनाम लिखने वाला कायर नहीं है वो आप जैसे छद्मनामधारी लोगों से ज्यादा साहसी है . कितने ऎसे लोग होंगे जो किसी चिट्ठे को पढ़कर मन ही मन कुलबुलाते रहते होंगे … बहुत कुछ कहने को ….पर सामने वाले को नाराज न कर बैठें इस आशंका से मन मसोसकर रह जाते होंगे. जैसे कभी कभी आपको अपने पिताजी या बड़े भाई की बात अच्छी नहीं लगती तो आप सामने कुछ नहीं कहते पर मन ही मन कहीं कोई दरार पाल लेते हैं. बेनाम व्यक्ति साहस तो करता है अपनी बात को रखने का . मुझे लगता है हमारी पीड़ा का कारण बेनाम व्यक्ति नहीं वरन उसकी कही हुई कड़वी ( सच्ची ) बातों को हजम नहीं कर पाना है . आप मेरे को ईमानदारी से जबाब दीजिये यदि यही बेनाम व्यक्ति आप की ढेर सारी (झूठी) तारीफें करता , जैसा कि कई नामधारी व्यक्ति करते हैं , तो भी क्या उसे मारने दौड़े चले आते . तब तो आप इंटरनैट के अनाम चरित्र को सादर प्रणाम करते . उसकी प्रसंशा में कसीदे गढ़ते .

पिछली पोस्ट में भी मैने इसी प्रश्न को रखने का प्रयास किया था कि हम लोगों को किसी भी खांचे में फिट करने की बजाय उसके लेखन को खाँचों में फिट कीजिए . तकनीक आप को सहायता देती है .आप अपने लेखों को श्रेणीबद्ध करते है .ठीक इसी प्रकार आप दूसरे चिट्ठों को भी श्रेणी बद्ध करें और अपनी रुचि के अनुसार पढ़ें . हमारा ध्यान विषयवस्तु पर ज्यादा हो सन्दर्भ पर कम . कॉंनटेन्ट कॉनटैक्सट से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

मैं क्यों लिखता हूँ… टिप्पणी के लिये या स्वात: सुखाय के लिये … यदि मैं कहूं कि मैं केवल स्वात: सुखाय के लिये लिखता हूँ तो ये तत्वविहीन कोरा आदर्श होगा. मेरे लिये टिप्पणी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि एक फिल्म के लिये दर्शक . सिनेमाहॉल मालिक के लिये भी दर्शक ही महत्वपूर्ण है तो फिर यदि दर्शक ही महत्वपूर्ण है तो हम दर्शक के पहनावे पर क्यों ध्यान दें … .आप कहेंगे मेरा हॉल है मैं निर्धारित करुंगा कि कौन मेरे हॉल में फिल्म देखे कौन नहीं …मैं किसी भी तरह का ड्रेस कोड बना सकता हूं …. बनाईये ना आप …. दरवाजे पर सिक्यूरिटी गार्ड लगाइये . बड़े बड़े अक्षरों में लिख दीजिये कि कौन सा ड्रेस कोड अलाऊड है लेकिन ये मत कीजिये कि आप दर्शक को अंदर आने का टिकट भी दे दें और वो जब फिल्म देख रहा हो तो आप उसे गरियाने लगें … खुद ‘लुंगी’ पहनें.. ड्रेस कोड ‘सूट विद बूट’ का निर्धारित करें और बेचारे ‘कुर्ता पायजामा पहने’ दर्शक को ..जो टिकट ले के अंदर घुसा है उसे बाहर निकालने की पहल करें.

चलो बहुत निकाल ली अपनी भड़ास अब आपको काम की बात बताता हूँ.

अब आप भी इस ‘बेनामी सूनामी’ से बचना चाहते हो तकनीकी रास्ता मैं बता सकता हूं . माफ कीजिये मैं तकनीकी व्यक्ति हूं इसलिये तकनीकी सुझाव ही दे सकता हूं गरियाने की कला में ,मैं माहिर नहीं.

1.आप अपने चिट्ठे पर ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ बन्द कर दें .
2.यदि आप चाहते हैं ..कि नहीं आप सब को आने देना चाहते लेकिन चन्द लोगों की ( इसमें अनाम-बेनाम-गुमनाम-नामवर-छ्द्मनामधारी सभी हो सकते हैं ) बातों को सार्वजनिक नहीं करना चाहते तो अपने चिट्ठे पर टिप्पणीयों पर मॉडरेशन लगा दें

बेनामों के लिये सुझाव

1.भाई मेरे… क्यों गाली खा रहे हो वो भी बिना मतलब की. अरे एक आई-डी की छतरी ले ही लो ना . फ्री में मिलती है यार… और नाम चाहे कुछ भी रख लो … कोई फोटो प्रूफ थोड़े मांग रहा है . आपको नाम नहीं सूझ रहा तो मैं कुछ सहायता कर सकता हूं.

आप अनाम-बेनाम-गुमनाम नहीं हो सकते लेकिन आप चाहें तो अनामचंद , बेनामदास या गुमनाम कुमार रख सकते हो . आजकल बाजों का भी बहुत महत्व है ( बहुत दूर दूर की देख लेते हैं ) तो आप चालबाज , तिकड़मबाज , दंगेबाज रख सकते हैं . यदि कोई नया सा नाम रखना हो तो फिर फंटूस , कवि कानपुरी , निंदक , चिंतक जैसे नाम रख लें . वैसे एक राज की बात बताऊं आप अपना नाम कोई स्त्रीलिंग में रख सकें तो बहुत अच्छा . इससे एक तो आपको पप्पी चिप्पी लगाने वाले ज्यादा मिलेंगे और फिर कोई आपको इस तरह से गरियाएगा भी नहीं . जी हां सही बात है . कल के गाली समारोह में सुना नही .. .. हमारे ‘बेनाम साहब’ , ‘हलवाई की लौंडिया’ से नयन-मटक्का करते पकड़े गये थे तो वो पुरुष ही थे ना .. ओ क्या कहा ..नहीं भी हो सकते ..लगता है आपने भी ‘फायर’ फिल्म देख रखी है ..लेकिन जनाब दिवाल गीली करने वाले तो पुरुष ही होंगे ना . जमीन गीली होती तो हम कुछ और सोचते … . हाँ तो मैं आपको नाम बता रहा था.
आप ‘भैनजी’ रख सकते हैं … इससे एक तो आपको य़ू.पी. के चुनावों में कुछ माइलेज मिल जायेगा और फिर आप मासूम से सवाल भी उठा सकती है …“ नेता क्यूं बने अभिनेता “ टाइप …. आप वर्ड्पैड भी रख सकती है इससे आपकी छवि महिलाधिकारों के लिये जागरूक स्वयं सुखी पर दूसरों को दुखी करने देखने वाली महिला की बन जायेगी. यदि आप कोई शोध छात्रा की छवि चाहें तो आप ‘चित्रित मन’ रख लें …. किसने बोला है आपको सही नाम बताने को … बस ‘नामवर’ चाहिये ‘बेनाम’ नहीं चलेगा.

कल स्वामी जी से मुलाकात हुई तो उन्होने ब्लौग लिखने के कई तरीके बताए. कई नयी बातें सीखने को मिली. य़े सत्य है कि आज भी हिन्दी चिट्ठाकरिता में उस विविधता की कमी है जो अन्य भाषाओं के ( विशेषकर अंग्रेजी ) के चिट्ठों में मिलती है लेकिन विकसित और विकाशसील का अंतर समाप्त होने पर ये विविधता अपनी हिंदी में भी आ जायेगी. स्वामी जी के लेख से प्रेरित हो आज कुछ नया (और मौलिक ) लिखने का प्रयास कर रहा हूं.

कुछ बातें यादों के रूप में आपसे चिपक जाती हैं . उनको आप अपने आप से बाहर नहीं निकाल सकते . उन्हीं यादों को जब आप मुड़कर देखते हैं तो “नराई” ( नॉस्टालजिया ) जैसा भाव पैदा होता है. ऎसे ही किसी “नराई” के बारे में लिखने बैठा हूं पर पहले कुछ और…..

हम , लोगों को जज करके एक खांचे में फिट कर देते हैं और फिर उन्हें उस खांचे से बाहर नहीं देख पाते . बहुत से सृजनात्मक माध्यम जैसे लेखन और फिल्म में यह बात अधिकांशत: लागू होती है . हम भारतीयों में यह खांचा बनना शुरु होता है किसी व्यक्ति के नाम से जिसमें उसका सर-नेम (जाति) भी आ जाती है .यदि मैं अपने ‘काकेश’ नाम से मुसलमान या हिन्दू विरोधी बात करूं तो पाठक उसे किसी और नजर से देखेंगे और यदि ठीक वही लेखन मैं किसी और नाम जैसे ‘क़माल अशरफ़’ से करूं तो उसी बात को पाठक किसी और नजरिये से देखेंगे .और फिर दूसरा खांचा बनता है व्यक्ति के व्यवसाय (प्रोफेशन) से .यदि मैं बोलूं कि मैं डाक्टर हूं तो मेरे स्वास्थ्य संबंधित लेखों की उपयोगिता लोगों की नजर में बढ़ जाएगी. आप कहेगें कि ये बात तो ठीक ही है कि एक डाक्टर की बात ज्यादा प्रमाणिक लगेगी ही .हाँ यह ठीक है पर आप तो लेखक की कही बात का ही भरोसा कर रहे हैं ना .कोई उसका प्रमाणपत्र तो सत्यापित नही कर रहे. ऎसे बहुत से खांचे हैं .एक ऎसा ही खांचा है अपने जन्मस्थान का . बहुत से हिन्दी चिट्ठों में भी ये खांचा प्रयोग होते दिखा. मैं यदि कानपुर की ठग्गू के लड्डू और बदनाम कुल्फी की दुकान या परेड के बाहर बिकती हुई सस्ती किताबों या फिर आर्यनगर की बिरयानी का जिक्र करने लगूं तो लोग समझेंगे कि मैं कान्हेपुर का हूं और फिर मेरे लेखन को भी स्तरीय समझने लगेगें :-) . हाँलाकि देर सबेर अच्छा लेखन ही सराहा जाता है लेकिन चिट्ठाकारिता जगत में जहां एक रचना की उम्र बहुत ही छोटी होती है वहां ये खांचे लोगों की पठनीयता निर्धारित करते हैं और ब्लौगजगत में सफलता का पैमाना अच्छा लेखन नहीं अच्छी हिट्स होती हैं . अच्छी हिट्स ही अधिक टिप्पणीयों की जननी है और अधिक टिप्पणीयां ही आपकी लोकप्रियता और कमोबेश आपके अच्छे लेखन का मानक. यानि परोक्ष रूप से हम भी ये मानने लगे हैं अच्छा लेखन वही है जो ज्यादा पढ़ा जा रहा है बिल्कुल फिल्मी दुनिया की तरह .जहां बाक्स ऑफिस की सफलता ही एक अच्छी फिल्म की पहचान है ( जहां दादा कोंडके की “अंधेरी रात में….” गुरुदत्त की “कागज के फूल” से ज्यादा अच्छी फिल्म है ) . ये व्यवसायीकरण है..तो क्या हम हिन्दी चिट्ठाजगत को भी व्यवसायीकरण की ओर ले जा रहे हैं.

अभी हिंदी चिट्ठा जगत में लिखने वाले कम हैं किंतु हमारे आज के छोटे-छोटे कुछ कदम हमारे चिट्ठा जगत के भविष्य को निर्धारित करेंगे. जैसा कि कयास लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में हिन्दी माध्यम से लिखने वालों की संख्या बहुत अधिक हो जायेगी तो नये चिट्ठाकारों के लिये हमारे ये मानक उनके लिखने के तौर तरीके निर्धारित करेंगे. यदि हम अंग्रेजी भाषा के ब्लौग्स को ही फॉलो करेंगे तो फिर यहां भी लोग उन विषयों को ज्यादा लिखेंगे जिनसे पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जा सके ( अभी भी भड़काऊ शीर्षक लगाकर अपने चिट्ठों में खीचने वाले चिट्ठाकारों की कमी हिन्दी चिट्ठाजगत में नहीं है ) . तब फिर लोग हिट्स के लिये ही लिखेंगे फिर स्वांत: सुखाय वाली भावना गौण हो जायेगी …तो क्या ऎसे में स्तरीय लेखन संभव होगा.

बहुत से लोग ये तर्क देंगे कि ये सब तो अंग्रेजी चिट्ठा जगत में ऎसे ही चल रहा है .य़े सच है इसीलिये वहां पौर्न लिखने वाले चिट्ठाकार ज्यादा चर्चा में रहते हैं और उनमें से कई व्यवसायिक रूप से ये लेखन कर रहे हैं और फिर ये आवश्यक तो नहीं कि जो अंग्रेजी चिट्ठा जगत में हो रहा है हम भी उसी का पालन करें हमारा देश भारत तो विश्व-गुरु रहा है कई मायनों में..तो क्यों ना यहां भी हम कुछ नया और मौलिक इस चिट्ठा-विश्व को दें.

य़े कुछ मुद्दे हैं जिनपर विचार करने की आवश्यकता है. हम मात्र मूक-दर्शक (फेंससिटर) बन कर नहीं रह सकते…

शेष फिर …… अगली पोस्ट में ..अभी तो चलें ऑफिस …

बहस का प्रारम्भ तो हुआ था एक बहुत ही मासूम से सवाल से कि “पत्रकार क्यूं बने ब्लौगर” पर बहस बढ़ती गयी “दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की” की तर्ज पर .इसी विषय पर बहुत लोगों के विचार आये . मैने भी एक ‘मौजिया’ (बकौल फुरसतिया जी ) चिट्ठा लिख डाला. वो बात तो मजाक की थी लेकिन आज पत्रकारिता का भविष्य क्या है .. आज के नये चिट्ठाकारिता के युग मे यह सवाल अब प्रासंगिक हो चला है. फुरसतिया जी ने अपने लेख में कहा कि पत्रकारों को ब्लौगिंग जम के करनी चाहिये लेकिन यदि हम इस पर गहराई से विचार करें तो प्रश्न उठेगा कि कितने पत्रकार आज ब्लौगिंग से परिचित भी हैं ?

आज जब हमारे पास लगभग हर तरह की जानकारी इंटरनैट के माध्यम से उपलब्ध है जहां जानकारी को प्राप्त करना ज्यादा आसान है तो इस युग में पुराने समाचार माध्यम जैसे समाचार पत्र और पत्रिकाओं का क्या होगा. अभी कुछ दिनों पहले रिपोर्ट आयी कि सैन फ्रेंसिस्को क्रोनिकल बंद होने की कगार पर है और फिर ये समाचार . हाँलाकि ये दोनो उदाहरण हिन्दुस्तान के बाहर के हैं ,जहां इंटरनैट का प्रचार प्रसार भारत से कहीं ज्यादा है लेकिन आज नहीं तो कल ये स्थिति यहाँ भी आ सकती है . ऎसे में हम सब को एक नये माध्यम के लिये तैयार होना होगा. विशेषकर पत्रकारों को .

आइये एक बार समाचार पत्रों के व्यवसाय पर नजर डालें . आपको शायद ध्यान हो पहले समाचार पत्र केवल श्वेत श्याम (black and white) ही होते थे फिर रंगीन समाचार पत्र आये. समाचार पत्रों के रंगीन होने में तकनीकी विकास से अधिक हाथ था विज्ञापन जगत का . विज्ञापनों का सुन्दर दिखना समाचारों के सुन्दर दिखने से ज्यादा आवश्यक था .भारत में मुद्रास्फिति की दर के बढ़ने के बाबजूद समाचार पत्रों की कीमत या तो उस दर से नहीं बढ़ी या फिर कम हुई . और यहां यदि हम अंग्रेजी और हिन्दी के समाचार पत्रों की तुलना करें तो अंग्रेजी की समाचार पत्रों का मूल्य हिन्दी के समाचार पत्रों के मूल्य की तुलना में हमेशा कम रहा है . उस पर भी तुर्रा ये कि अंग्रेजी के समाचार पत्रों में ज्यादा पृष्ठ होते हैं . तो फिर हिन्दी भाषी राष्ट्र के हिन्दी समाचार पत्रों का मूल्य ज्यादा क्यों ? इस सवाल का जबाब सरकार के पास शायद ना हो पर हम सब जानते हैं कि ये संभव होता है विज्ञापन जगत की कृपा से. क़ुछ लोगों को तो ये तक कहते सुना जाता था कि यदि अंग्रेजी समाचार पत्र मुफ्त भी दिये जाँये तो कंपनियों को कोई घाटा न होगा. आज तो ये बात सत्य सी प्रतीत होती है . दिल्ली में सुबह सुबह किसी रैड लाइट पर या रेलवे स्टेशन पर मुफ्त में मिलता “हिन्दुस्तान टाईम्स” इसका परिचायक है . आजकल एक नया समाचार पत्र “ मिन्ट “ चालू हुआ है जो कि मुफ्त में दिया जा रहा है .य़े विज्ञापन बाजार को स्थापित करने का प्रयास है . अब आप इंटरनैट को ही लें यहां भी जब सारे समाचार मुफ्त में उपलब्ध हैं तो फिर भविष्य में कौन खरीदेगा समाचार पत्र ?

जहां तक जानकारियों या सूचनाओं की उपलब्धता का सवाल है यहाँ भी इंटरनैट अन्य माध्यमों की तुलना में ज्यादा सहज है .हाँ यहां जानकारियों की प्रमाणिकता की बात को लेकर कुछ लोग नाक भों सिकोड़ सकते हैं पर ये बात कुछ लोगों के लिये महत्वपूर्ण हो सकती है सबके लिए नहीं. अब आप ब्रिटेनिका इनसाईक्लोपीडिया की तुलना विकीपीडिया से करें तो नि:संदेह ब्रिटेनिका ज्यादा प्रमाणिक है पर कितने लोग आज के युग में ब्रिटेनिका खरीदते हैं ! आज इंटरनैट ने उपभोक्ता की समाचार या जानकारी को खरीदने की जरुरत को समाप्त कर दिया है .

आज समाचार या जानकारी के साथ साथ ये भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि वो जानकारी हमारे सामने कैसे प्रस्तुत की जा रही है . समाचार की पैकेजिंग समाचार से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है .यही एक चुनौती पत्रकार के सामने भी है .पत्रकार समाज और समाचार के बीच की कड़ी है .पत्रकार का काम सूचना का आदान प्रदान है लेकिन आज जब कुछ लोग ब्लौगर को भी पत्रकार की श्रेणी मं रखने लगे हैं तो व्यवसायिक पत्रकार और शौकिया पत्रकार (ब्लौगर) के बीच की दूरियां कम होने लगी हैं ऎसे में व्यवसायिक पत्रकार के लिये कुछ नयी चुनौतियां हैं . पत्रकारों को अब तकनीकी ज्ञान का होना भी आवश्यक होता जा रहा है . ये आवश्यक नहीं कि वे लोग प्रोग्रामिंग सीखें पर ये जरूरी होता जा रहा है कि वो सही प्रोग्राम को सही जगह चिपका सकें.

इस बहस को सार्थक बनाने के लिये ये आवश्यक है कि हम सब बिना किसी पूर्वाग्रह से इस प्रश्न पर विचार करें और अपना मत दें . तभी हम जान पाएगें बीस साल बाद के रवीश कुमार जी का भविष्य ..


कल जब अपना चिट्ठा लिख रहा था तब ना तो मन में ये था- जैसा कि हमारे अग्रज (?) ने कहा “वैसे, विवादों से शुरुआत करना अपनी तरफ ध्यान आकर्षित कराने का पुराना फंडा रहा है।“ –कि मैं किसी का ध्यान अपनी और आकर्षित करूं और ना ही ये कि मैं “पिल्लम पिल्ली” कर कोई विवाद को जन्म दूं ..और “पिल्लम पिल्ली” करना मेरी हौबी भी नहीं है ..और “तू कौन खांमखा ?” कोई कहे तो “क्या जबाब दें ?”..हम तो कोई भी नहीं श्रीमान…और फिर केवल चिट्ठा लिख ले लेने से कोई कुछ हो भी नहीं जाता भाया..तो हम तो कोई भी नहीं ..

अब तो लग रहा है कि या तो अपन को भी “ब्लोग की राजनीति “ समझनी पड़ेगी या फिर जल में रह कर “मगर” से बैर करना पड़ेगा (वैसे आपने crocodile tears के बारे में तो सुना ही होगा ना). मेरा सोचना था (!) कि मैं भी चर्चा में चल रहे चिट्ठों पर अपने विचार व्यक्त करता रहूं किंतु बहुत सी विपरीत टिप्पणीयों से अब उसकी हिम्मत नहीं रही .इसलिये नहीं मैं घबरा कर भाग रहा हूं बल्कि इसलिये कि मैं फालतू के वाद-विवाद में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करना चाहता..ज़ब लोग “वाद-विवाद” को सिर्फ “विवाद” की दृष्टि से ही देखें तो फिर तर्क युक्त बातें भी बेमानी हो जाती हैं ..मैं सेठ जी से सहमत होते हुए यह कह सकता था कि मैं आपके लिये नहीं लिखता पर “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं” इसलिये मैं अब “शुरुआती झटकों” को बन्द करता हूं..और अब आइन्दा सिर्फ और सिर्फ अपनी ही बात करुंगा.. कोई “वाद” ना होगा तो “विवाद” भी ना होगा…

अब हर चिट्ठा आपको अच्छा ही लगे ये जरुरी तो नही जैसे डा. प्रभात ने कम्पयूटर को जल्दी खोलने और जल्दी बन्द करने का उपाय बताया अब चुंकि मैं आई.टी. से जुड़ा हूं मेरे लिये ये बचकानी सी बात है पर मैं इस पोस्ट के पीछे मनतव्य को समझता हूं इसलिये इसे अच्छा ही मानता हूं..

एक दोहा आज दिन भर बहुत याद आया …. ना जाने क्यों..??

बड़ा हुआ तो क्या हुआ , जैसे पेड़ खजूर
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर

सभी गुणी जनों को मेरा प्रणाम ..

जुम्मा जुम्मा दो ही दिन तो हुए थे हमें (मुझे) हिन्दी में चिट्ठा शुरु किये कि मसिजीवी का ये चिट्ठा पढ़ा. (जबसे इंटरनैट पर चिट्ठा पना प्रारम्भ किया काफ़ी लोगो को खुद कोहमपुकारते देखा.तब समझ में नहीं आया कि मैं खुद को क्या पुकारूंमैंयाहम”. फ़िर सोचा कि हिन्दी व्याकरण के अनुसार तोमैंही होना चाहिये.). पहले सोचा था कि कल ही एक नया चिट्ठा लिख डालूं फ़िर सोचा कि चलो एक बार पहले के कुछ हिन्दी ब्लॉग्स पढ़े जायें.

इंटरनैट पर हिन्दी की चिट्ठाकारी को कुछ ही दिन हुए हैं पर इतने ही दिनों में इतने सारे वाद विवाद हो गये कि लगता है हम लोग बहुत जल्दी में हैं. वाद विवाद भी किसलिये .. क्योंकि हम चाहते हैं कि हिन्दी का इंटरनैट पर भी बोल बाला हो.. पर यहां हम य़ह भूल जाते हैं कि इंटरनैट भी एक माध्यम ही है बस ..इसमें बाकी वही चीजें रहनी हैं जो कि सामान्यतः हिन्दी लेखन में हैं .वैसे तो कई सारी चीजे अच्छी बुरी लगीं दो प्रमुख चीजों ने बहुत उद्वेलित किया 1.आचार संहिता बनाने का प्रयास 2.मुखोटों की मारामारी

कल ही एक लेख आया जिसमें आचार संहिता को मजाकिया लहजे में दिखाने का प्रयास किया.लेकिन ये तो मजाक था यदि इसे गम्भीरता से सोचें तो ये कोई मजाक नही है ..हिन्दी चिट्ठाकारी को हम क्यों पत्रकारिता की श्रेणी में रखते हैं ..यह भी तो हिन्दी लेखन ही है सिर्फ माध्यम अलग है …तो जब उसमें कोई आचार संहिता नहीं तो यहाँ हम ऎसी बातें क्यों करें…हिन्दी लेखन में ऎसे बहुत उदाहरण मिल जायेंगे जहाँ वो सभी शब्द प्रयोग किये गये हैं जिन्हे हम यहाँ अछूत मान रहे हैं ..क्या आपने “  राही मासूम रज़ा” का “ आधा गाँव “ नही पढ़ा… और फिर किसे यह हक है कि वो आचार संहिता बनाये?.. इंटरनैट एक खुला माध्यम (open platform) है ..इसे खुला ही रहने दें इसकी सुन्दरता  व भलाई भी इसी में है… यहाँ मैं इस चीज की वकालत नही कर रहा कि चिट्ठों में “अछूत भाषा “ का प्रयोग हो बल्कि यह कि इसके निर्धारण का अधिकार लेखक के बजाय पाठक को हो… वैसे भी इंटरनैट हमें मुक्त करता है फिर हम इसे क्यों सीमाओं में बाँधने का प्रयास करें.. कम्प्यूटर की दुनियां में आज एक बहुत बड़ा तबका स्वतंत्रता के अधिकार की बात करते हुए (open source software) माइक्रोसोफ्ट जैसी बड़ी कंपनी से लोहा लेता है वहीं हम इसे…..खैर अभी इतना ही. बाकी अगली पोस्ट में..

एक शिकायत.. “चिट्ठा चर्चा” में दीप्ती पंत के नये चिट्ठे का जिक्र हुआ मेरे चिट्ठे का नहीं… क्या चर्चा के लिये “स्त्रीलिंग” होना आवश्यक है..यदि ऎसा है तो मैं भी फिर जे. ऎल. सोनार की तर्ज पर नया मुखोटा लगाऊं..:-)

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