May 092008
 

खोया पानी में जहां हास्य और व्यंग्य के नायाम ज़ुमले हैं वहीं उसमें जीवन का फलसफा भी बिखरा पड़ा है. आइये तीसरे भाग की शुरुआत ज़िन्दगी के इसी फ़लसफे से करें.आप पायेंगे कि यूसूफ़ी साहब ने कितनी सच्ची बात इन शब्दों में उतार दी है.

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हर व्यक्ति के मन में ऐश्वर्य और भोग-विलास का एक नक़्शा होता है। ये नक़्शा दरअस्ल उस ठाट-बाट की नक़्ल होता है जो दूसरों के हिस्से में आया है, परन्तु जो दुख आदमी सहता है वो अकेला उसका अपना होता है, बिना किसी साझेदारी के, एकदम निजी, एकदम अनोखा। हड्डियों को पिघला देने वाली जिस आग से वो गुजरता है, उसका अनुमान कौन लगा सकता है। नर्क की आग में यह गर्मी कहां। जैसा दाढ़ का दर्द मुझे हुआ है, वैसा किसी और को न कभी हुआ, न होगा। इसके विपरीत ठाट-बाट का ब्लू-प्रिंट हमेशा दूसरों से चुराया हुआ होता है। बिशारत के दिमाग़ में ऐश्वर्य और विलास का जो सौ-रंगा और हजार पैवंद लगा चित्र था, वो बड़ी-बूढ़ियों की उस रंगारंग रल्ली की भांति था जो वो भिन्न-भिन्न रंगों की कतरनों को जोड़-जोड़ कर बनाती हैं। उसमें, उस समय का जागीरदाराना दबदबा और ठाट, बिगड़े रईसों का जोश और ठस्सा, मिडिल-क्लास दिखावा, क़स्बाती-उतरौनापन, नौकरी- पेशा हुस्न, सादा-दिली और नदीदापन सब बुरी तरह गडमड हो गये। उन्हीं का कहना है कि बचपन में मेरी सबसे बड़ी इच्छा थी कि तख़्ती फेंक-फांक, किताब फाड़-फूड़ मदारी बन जाऊं, शहर-शहर डुगडुगी बजाता, बंदर, भालू, जमूरा नचाता और “बच्चा लोग” से ताली बजवाता फिरूं। जब जरा अक़्ल आई अर्थात बुरे और बहुत बुरे की समझ पैदा हुई तो मदारी की जगह स्कूल मास्टर ने ले ली और जब धीरजगंज में सच में मास्टर बन गया तो मेरी राय में अय्याशी की चरम-सीमा ये थी कि मक्खन जीन की पतलून, दो-घोड़ा बोस्की की क़मीज, डबल कफ़ों में सोने के छटांक-छटांक भर के बटन, नया सोला हैट और पेटेंट लैदर के पम्प-शूज पहनकर स्कूल जाऊं और लड़कों को केवल अपनी ग़जलें पढ़ाऊं। सफ़ेद सिल्क की अचकन जिसमें बिदरी के काम वाले बटन गले तक लगे हों, जेब में गंगा-जमनी काम की पानों की डिबिया, सर पर सफ़ेद किमख़्वाब की रामपुरी टोपी, तिरछी मगर जरा शरीफ़ना ढंग से, लेकिन ऐसा भी नहीं कि निरे शरीफ़ ही हो के रह जायें। छोटी बूटी की चिकन का सफ़ेद कुर्ता जो मौसम के लिहाज से हिना या खस की ख़ुशबू में बसा हो। चूड़ीदार पाजामे में सुंदर लड़की के हाथ का बुना हुआ रेशमी कमरबंद। सफ़ेद सलीमशाही जूता। पैरों पर डालने के लिये इटालियन कम्बल, जो फ़िटन में जुते हुए सफ़ेद घोड़े की दुम और उससे दूर तक उड़ने वाले पेशाब-पाखाने के छींटों से पाजामे को सुरक्षित रखे। फ़िटन के पिछले पायदान पर ‘‘हटो! बचो!’’ करते और उस पर लटकने का प्रयास करने वाले बच्चों को चाबुक़ मारता हुआ साईस। जिसकी कमर पर जरदोजी के काम की पेटी और टखने से घुटने तक खाकी नम्दे की पट्टियां बंधी हों। बच्चा अब सयाना हो गया था। बचपन विदा हो गया था, पर बचपना नहीं गया था।

बच्चा अपने खेल में जिस उत्साह और सच्ची लगन के साथ तल्लीन होता है कि अपने-आप को भूल जाता है, बड़ों के किसी मिशन और मुहिम में इसका दसवें का दसवां भाग भी दिखाई नहीं पड़ता। इसमें शक नहीं कि संसार का बड़े-से-बड़ा दार्शनिक भी किसी खेल में मग्न बच्चे से अधिक गंभीर नहीं हो सकता। खिलौना टूटने पर बच्चे ने रोते-रोते अचानक रौशनी की ओर देखा तो आंसू में इंद्रधनुष झिलमिल-झिलमिल करने लगा। फिर वो सुबकियां लेते-लेते सो गया। वही खिलौना बुढ़ापे में किसी जादू के जोर से उसके सामने लाकर रख दिया जाये तो वो भौंचक्का रह जायेगा कि इसके टूटने पर भला कोई इस तरह जी-जान से रोता है। यही हाल उन खिलौनों का होता है, जिनसे आदमी जीवन भर खेलता रहता है। हां, उम्र के साथ-साथ यह भी बदलते और बड़े होते रहते हैं। कुछ खिलौने  अपने-आप टूट जाते हैं, कुछ को दूसरे तोड़ देते हैं। कुछ खिलौने प्रमोट होकर देवता बन जाते हैं और कुछ देवियां दिल से उतरने के बाद गूदड़ भरी गुड़ियां निकलती हैं। फिर एक अभागिन घड़ी ऐसी आती है, जब वो इन सबको तोड़ देता है। उस घड़ी वो खुद भी टूट जाता है।

‘‘तराशीदम, परस्तीदम, शिकस्तम’’

(मैने तराशा, मैने पूजा मैने तोड़ दिया )

आज इन बचकानी इच्छाओं पर स्वयं उनको हँसी आती है। मगर यह उस समय की हक़ीक़त थीं। बच्चे के लिये उसके खिलौने से अधिक ठोस और अस्ल हक़ीक़त पूरे ब्रह्मांड में कुछ और नहीं हो सकती। सपना, चाहे वह आधी रात का सपना हो या जागते में देखा जाने वाला सपना हो, देखा जा रहा होता है तो वही और केवल वही उस क्षण की एकमात्र वास्तविकता होती है। यह टूटा खिलौना, यह आंसुओं में भीगी पतंग और उलझी डोर, जिस पर अभी इतनी मार-कुटाई हुई, यह जलता-बुझता जुगनू, यह तना हुआ ग़ुब्बारा जो अगले पल रबड़ के लिजलिजे टुकड़ों में बदल जायेगा, मेरी हथेली पर सरसराती यह मखमली बीरबहूटी, आवाज की रफ़्तार से भी तेज चलने वाली यह माचिस की डिब्बियों की रेलगाड़ी, यह साबुन का बुलबुला-जिसमें मेरा सांस थर्रा रहा है, इंद्रधनुष पर यह परियों का रथ-जिसे तितलियां खींच रही हैं इस पल, इस क्षण बस यही और केवल यही हक़ीक़त है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

पहला और दूसरा भाग

May 042008
 

ये कौन हज़रते-‘आतिश’ का हम जबां निकला

इसमें कोई शक नहीं कि सागर जालौनवी के कई शेर बड़े दमपुख्त निकलते थे. कुछ शेर तो वाकई ऐसे थे कि “मीर” और “आतिश” भी उन पर गर्व करते,जिसका एक कारण यह भी था कि ये खुद उन्ही के थे. खुद को एक विद्यार्थी और अपनी शायरी को वो देवीय अवतरण बताता था. चुनांचे एक अरसे तक तो उसके भक्त और शिष्यगण इसी खुशगमानी में रहे कि चोरी नहीं अवतरण में साम्य हो गया. रुदौली में अपनी ग़ज़ल पढ़ रहा था कि किसी गुस्ताख़ ने भरे मुशायरे में टोक दिया कि ये तो नासिख़ का है.चोरी हओ चोरी! ज़रा जो घबराया हो. उलटा मुस्कुराया , बिल्कुल ग़लत! आतिश का है.

फिर अपनी डायरी मुशायरे के अध्यक्ष की नाक के नीचे बढ़ाते हुए बोला “हुज़ूर देख लें, ये शेर डायरी में Inverted Commas में लिखा है और आगे आतिश का नाम भी लिख दिया है.” मुशायरे के अध्यक्ष ने इसकी पुष्टि की और एतराज़ करने वाला अपना-सा मुँह ले के रह गया.

सागर अपने छोड़े हुए वतन जालौन के कारण प्यार से छोटा सागर (जाम) कहलाता था,मगर वो खुद अपना रिश्ता शायरी के लखनऊ स्कूल से जोड़ता था और ज़बान के मामले में दिल्ली वालों और पंजाब वालों से पक्षपात करता था ,चुनांचे केवल लखनऊ के शायरों के कलाम चोरी करता था.

माई डियर मौलवी मज्जन : दिन तो जैसे तैसे काटा लेकिन शाम पड़ते ही बिशारत एक क़रीबी गांव सटक गये। वहां अपने एक परिचित के यहां (जिसने कुछ महीने पहले एक यतीम तलाश करने में मदद दी थी) अंडरग्राउंड हो गये। अभी जूतों के फ़ीते ठीक से खोले भी नहीं थे कि हर जानने वाले को अलग-अलग लोगों के जरिये, अपने गोपनीय भूमिगत स्थान की जानकारी भिजवाई। उन्होंने धीरजगंज में सवा साल रो-रो कर गुजारा था। देहात में वक़्त भी बैलगाड़ी में बैठ जाता है। उन्हें अपनी सहनशक्ति पर आश्चर्य हुआ। नौकरी के सब रास्ते बंद नजर आयें तो असहनीय भी सहन हो जाता है। उत्तरी भारत में कोई स्कूल ऐसा नहीं बचा जिसका नाम उन्हें पता हो और उन्होंने वहां दरख़्वास्त न भेजी हो। आसाम के एक मुस्लिम स्कूल में उन्हें जिम्नास्टिक मास्टर तक की नौकरी न मिली। चार-पांच जगह अपने ख़र्च पर जा कर इंटरव्यू में नाकाम हो चुके थे। हर असफलता के बाद उन्हें समाज में एक नयी ख़राबी नजर आती थी, जिसे सिर्फ़ रक्त-क्रांति से ही दूर किया जा सकता था। लेकिन जब कुछ दिन एक दोस्त की मेहरबानी से सन्डीला के हाईस्कूल में एप्वाइंटमेंट लेटर मिला तो अनायास मुस्कुराने लगे। दस-बारह बार ख़त पढ़ने और हर बार नई ख़ुशी अनुभव करने के बाद उन्होंने चार लाइन वाले काग़ज पर इस्तीफ़ा लिख कर मौली मज्जन को भिजवा दिया। एक ही झटके में बेड़ी उतार फैंकी। इस्तीफ़ा लिखते हुए वो आजादी के भक-से उड़ा देने वाले नशे में डूब गये अतः इस्तीफ़े की इ की टांग त के पेट में घुस गई। लिफ़ाफ़े को थूक कर ऐसे चिपकाया जैसे मौली मज्जन के मुंह पर थूक रहे हों। लिफ़ाफ़ा मौलवी मज्जन को थमाया तो जो कांटा सवा साल से उनके तलवे को छेदता हुआ तालू तक पहुंच चुका था एक झटके से निकल गया। उन्हें इस बात पर हैरत थी कि वो सवा साल ऐसे फटीचर आदमी से इस तरह अपनी औक़ात ख़राब क्यों करवा रहे थे।

मौलवी मज्जन को भी शायद इसका अहसास था उन्होंने विदा के समय हाथ तो मिलाया आंखें न मिला सके।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

[दूसरा भाग यहीं पर समाप्त होता है. अगले शुक्रवार से तीसरा भाग प्रस्तुत किया जायेगा.दूसरे भाग में बीच बीच बीच में कुछ छोटे छोटे अंश काट दिये गये हैं.]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया 20. अजब-गजब मुशायरा 21. तिरे कूचे से हम निकले 22. कई पुश्तों की नालायकी का निचोड़

पहला भाग

May 022008
 

कई पुश्तों की नालायकी का निचोड़

ये शायर जो भूचाल लाया बल्कि जिसने मुशायरा अपनी मूंछों पर उठा लिया, बिशारत का ख़ानसामा निकला. पुरानी टोपी और उतरन की अचकन का तोहफ़ा उसे पिछ्ली ईद पर मिला था. राह चलतों को पकड़-पकड़ के अपना कलाम फ़रमाता. सुनने वाला दाद देता तो उसे खींच कर लिपटा लेता, और दाद ना देता तो खुद आगे बढ़कर उससे लिपट जाता. अपने कलाम के दैवीय होने में उसे कोई शक ना था.शक औरों को भी नहीं था क्योंकि केवल अक़्ल या खाली-ख़ूली इल्म के ज़ोर से कोई शख़्स ऐसे ख़राब शेर नहीं कह सकता. दो पंक्तियों में इतनी सारी गलतियां और झोल आसानी से सुमो देना दैवीय मदद के बग़ैर मुमकिन ना था. काव्य चिंतन में अक्सर यह भी हुआ कि अभी पंक्ति पे ठीक से दूसरी पंक्ति भी नहीं लगी थी कि हंडिया धुंआ देने लगी. सालन के भुट्टे लग गये. पांचवी क्लास तक पढ़ाई की थी, जो उसकी निजी जुरुरत और बर्दाश्त से कहीं जियादा थी.वो अपनी संक्षिप्त सी अंग्रेजी और ताजा शेर को रोक नहीं सकता था. अगर आप उससे दस मिनट भी बात करें तो उसे अंग्रेजी के जितने भी लफ्ज आते थे वो सब आप पर दाग देता. अपने को सागर साहब कहलवाता लेकिन घर में जब ख़ानसमा का काम अंज़ाम दे रहा होता तो अपने नाम अब्दुल क़य्यूम से पुकारा जाना पसंद करता. सागर कहके बुलायें तो बहुत बुरा मानता.कहता था, नौकरी में हाथ बेचा है, उपनाम नहीं बेचा. ख़ानसामागिरी में भी शायराना तूल ना देने से बाज ना आता. ख़ुद को वाजिद अली शाह, अवध के नबाब का ख़ानदानी ख़ानसामा बताता था. कहता था, कि मैं फ़ारसी में लिखी डेढ़ सौ साल पुरानी डायरी देख-देख कर खाना पकाता हूँ. उसके हाथ का अस्वादिष्ट खाना दरअस्ल कई पुस्तों की जमा की गयी नालायक़ी का निचोड़ होता था.

मगर इसमें पड़ती है मेहनत ज़ियादा

उसका दावा था कि मैं एक सौ एक क़िस्म के पुलाव पका सकता हूँ और ऐसा ग़लत भी न था.बिशारत हर इतवार को पुलाव पकवाते थे. साल भर में करीब बावन बार जुरुर पकवाया होगा. हर बार हर अलग तरीके से ख़राब करता था. सिर्फ वो खाने ठीक पकाता था जिनको और ख़राब करना मामूली क़ाबिलियत रखने वाले आदमी के बस का काम नहीं.उदाहरण के तौर पर खिचड़ा,आलू का भुरता,लगी हुई खीर, रात भर की पकी देग,खिचड़ा,अरहर की दाल और मुतनजन जिसमें मीठे चावलों के साथ गोस्त और नींबू की खटायी डाली जाती थी. फूहड़ औरतों की तरह खाने की तमाम ख़राबियों को मिर्च से और शायरी की ख़राबियों को तरन्नुम से दूर कर देता था. मीठा बिल्कुल नहीं पका सकता था, इसलिये कि इसमें मिर्च डालने का रिवाज नहीं.अक्सर चांदनी रातों में जियोग्राफी टीचर को उसी बैजो पर अपनी ग़जलें गा के सुनाता,जिन्हें सुनकर वो अपनी महबूबा को ,जिसकी शादी मुरादाबाद में एक पीतल के पीकदान बनाने वाले से हो गयी थी, याद कर-कर षणज में रोता था.

बिशारत ने एक दिन छेड़ा कि भई, तुम ऐसी मुश्किल जमीनों में ऐसे अच्छे शेर निकालते हो , फिर ख़ानसामागिरी क्यों करते हो? कहने लगा आपने मेरे दिल की बात पूछ ली. अच्छा खाना पकाने के बाद जो रूह को खुशी मिलती है वो शेर के बाद नहीं मिलती. किस वास्ते कि खाना पकाने में वज्न का कहीं ज़ियादा ख़याल रखना पड़ता है. खाने वाले जिसे बुरा कह दे उसे बुरा मानना पड़ता है. खाना पकाने में मेहनत भी ज़ियादा पड़ती है. इसीलिये तो आज तक किसी शायर ने बावर्ची का पेशा नहीं पकड़ा.

शायरी को सागर जालौनवी ने कभी ज़रिया-ए-इज़्ज़त नहीं समझा, जिसका एक कारण ये था कि शायरी के कारण अक्सर उसकी बेइज़्ज़ती होती रहती थी.खाना पकाने में जितना दिमागदार था,शेर कहने में उतनी ही उदारता से काम लेता था. अक्सर बड़ खुले दिल से स्वीकार करता था कि ग़ालिब उर्दू में मुझसे बेहतर कह लेता था.”मीर” को मुझसे कहीं जियादा तनख्वाह और दाद मिली. उदारता से इतना मानने के बाद ये जुरुर कहता, हुजुर वो जमाने और थे,उस्ताद सिर्फ शेर कहते और शागिर्दों की ग़ज़ले बनाते थे, कोई उनसे चपाती नहीं बनवाता था.

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
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सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया 20. अजब-गजब मुशायरा 21. तिरे कूचे से हम निकले

पहला भाग

Apr 202008
 

तो ख़ुदा आपका भला करे और मुझे माफ करे… मूलगंज रंडियों का चकला था।उस जमाने में भी लोगों का चाल-चलन इतना ही ख़राब था,जितना अब है। मगर निगाह अभी उतनी ख़राब नहीं हुई थी कि तवायफ़ों को बस्ती को आजकल की तरह ‘बाजारे हुस्न’ कहने लगें। चकले को चकला ही कहते थे।

दुनिया में कहीं और बदसूरत रंडियों के कोठों और बेडौल , विहंगम जिस्म के साथ यौन रोग बेचने वालियों की चीकट कोठरियों को इस तरह ग्लैमराइज़ नहीं किया गया।‘ बाजारे हुस्न’ की रोमांटिक उपमा आगे चलकर उन साहित्यकारों ने प्रचलित की जो कभी तुरंत उपलब्ध होने वाली औरतों की बकरमंडी के पास भी नहीं गुजरे थे , लेकिन निजी तजरुबा इतना आवश्यक भी नहीं। ‘रियाज खैराबादी’ सारी उम्र शराब की तारीफ़ में शेर कहते रहे , जब कि उनकी तरल पदार्थों की बदपरहेज़ी कभी शरबत और सिकंजी से आगे नहीं बढ़ी। दूर क्यों जायें , खुद हमारे शायर मक़तल , फांसी घाट,ज़ल्लाद और रस्सी के बारे में ललचाने वाली बातें करते रहे हैं। इसके लिये फांसी पे झुला होना जुरुरी नहीं।

ऐश की दाद देने और रात की गलियों में चक्कर लगाने की हिम्मत या ताकत न हो तो “हवस सीनों में छुप-छुप कर बना लेती है तस्वीरें” और सच तो ये है कि ऐसी ही तसवीरों के रंग जियादा चोखे और लकीरें जियादा दिलकश होती हैं। क्यों? केवल इसलिये कि ख़याली होती हैं। अजंता और ऐलोरा की गुफाओं के Frescos ( भित्ति-चित्र) और मूर्तियां इसके क्लासिक उदाहरण हैं। कैसे भरे पूरे बदन बनायें हैं बनाने वालों ने,और बनाने पर आये तो बनाते ही चले गये। मांसल मुर्ति बनाने चले तो हर Sensuous लकीर बल खाती,गदराती चली गयी। सीधी सादी लकीरें आपको मुश्किल से दिखायी पड़ेंगी। हद ये कि नाक तक सीधी नहीं। भारी बदन की इन औरतों और अप्सराओं की मूर्तियां अपने मूर्तिकार के विचारों की चुगली खाती हैं। नारंगी के फांक जैसे होंठ। बर्दाश्त से ज़ियादा भरी भरी छातियां जो खुद मूर्तिकार से भी संभाले नहीं संभलती।बाहर को निकलते हुए भारी कूल्हे, जिन पर गागर रख दें तो हर कदम पर पानी, देखने वालों के दिल की तरह उछ्लता चला जाये। उन गोलाइयों के खमों के बीच बलखाती कमर और जैसे ज्वारा भाटे के पीछे हटती लहर, फिर वो टांगे जिनकी उपमा के लिये संस्कृत शायर को केले के तने का सहारा लेना पड़ा। इस मिलन से अपरिचित और अनुपलब्ध बदन को और उसकी इच्छा की सीमा तक Exaggerated लकीरों और खुल-खेलते उभारों को उन तरसे हुए ब्रह्मचारियों और भिक्षुओं ने बनाया और बनवाया है जिन पर भोग-विलास वर्जित था और जिन्होने औरतों को सिर्फ फ़ैंटेसी और सपने में देखा था और जब कभी सपने में वो इतने करीब आ जाती कि उसके बदन की आंच से अपने लहू में अलाव भड़क उठता तो फौरन आंख खुल जाती और वो हथेली से आंखें मलते हुए पथरीली चट्टानों पर अपने सपने लिखने शुरु कर देते।

मुशायरा किसने लूटा : जौहर इलाहाबादी, काशिफ़ कानपुरी और नुशुर वाहिदी को छोड़कर बाक़ी स्थानीय और बाहरी शायरों को काव्य पाठ में आगे-पीछे पढ़वाने का मसअला बड़ा टेढ़ा निकला, क्योंकि सभी एक-दूसरे के बराबर थे और ऐसी बराबर की टक्कर थी कि यह कहना मुश्किल था कि उनमें कम बुरे शेर कौन कहता है ताकि उसको बाद में पढ़वाया जाये। इस समस्या का हल यह निकाला गया कि शायरों को अक्षरक्रम के उल्टी तरफ़ से पढ़वाया गया यानी पहले यावर नगीनवी को अपनी हूटिंग करवाने की दावत दी गई। अक्षरक्रम के सीधी तरफ़ से पढ़वाने में ये मुश्किल थी उनके उस्ताद जौहर इलाहाबादी को उनसे भी पहले पढ़ना पड़ता।

मुशायरा स्थल पर एक अजब हड़बोंग मची थी। उम्मीद के विपरीत आस-पास के देहात से लोग झुण्डों में आये। दरियां और पानी कम पड़ गया। सुनने में आया कि मौली मज्जन के दुश्मनों ने ये अफ़वाह फैलायी कि मुशायरा खत्म होने के बाद लड्डुओं, खजूर का प्रसाद और मलेरिया तथा रानीखेत (मुर्गियों की बीमारी) की दवा की पुड़ियां बटेंगी। एक देहाती अपनी दस बारह मुर्गियां झाबे में डाल के लेकर आया था कि सुब्ह तक बचने की उम्मीद नहीं थी। इसी तरह एक किसान अपनी जवान भैंस को नहला धुला कर बड़ी उम्मीदों से साथ लाया था, उसके कट्टे ही कट्टे होते थे, मादा बच्चा नहीं होता था। उसे किसी ने ख़बर दी थी कि शायरों के मेले में तवायफ़ों वाले हकीम अहसानुल्लाह ‘तस्लीम’ आने वाले हैं। श्रोताओं की बहुसंख्या ऐसी थी जिन्होंने इससे पहले मुशायरा और शायर नहीं देखे थे।

मुशायरा ख़ासी देर से यानी दस बजे शुरू हुआ, जो देहात में दो बजे रात के बराबर होते हैं। जो नौजवान वॉलंटियर रौशनी के इंतिजाम के इंचार्ज थे, उन्होंने मारे जोश के छह बजे ही गैस की लालटेनें जला दीं जो नौ बजे तक अपनी बहारें दिखा कर बुझ गयीं। उनमें दोबारा तेल और हवा भरने और काम के दौरान आवारा लौंडों को उनकी शरारत और जुरूरत के मुताबिक़ बड़ी, और बड़ी गावदुम गाली देकर परे हटाने में एक घंटा लग गया। तहसीलदार को उसी दिन कलैक्टर ने बुला लिया था। उसकी अनुपस्थिति से लौंडों-लहाड़ियों को और शह मिली। रात के बारह बजे तक कुल सत्ताईस शायरों का भुगतान हुआ। मुशायरे के अध्यक्ष मौली मज्जन को किसी जालिम ने दाद का अनोखा तरीक़ा सिखाया था। वो वाह वाह! कहने के बजाय हर शेर पर मुकर्रर इरशाद (दुबारा पढ़िये) कहते थे, नतीजा सत्ताईस शायर चव्वन के बराबर हो गये। हूटिंग भी दो से गुणा हो गई। क़ादिर बाराबंकवी के तो पहले शेर पर ही श्रोताओं ने तम्बू सर पर उठा लिया। वो परेशान हो कर कहने लगा, “हजरात! सुनिये तो! शेर पढ़ा है, गाली तो नहीं दी।’’ इस पर श्रोता और बेक़ाबू हो गये, मगर उसने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि एक शख़्स से बीड़ी मांग कर बड़े इत्मीनान से सुलगा ली और ऊंची आवाज में बोला, ‘‘आप हजरात को जरा चैन आये तो अगला शेर पढूं।” मिर्जा के अनुसार मुशायरों के इतिहास में यह पहला मुशायरा था जो श्रोताओं ने लूट लिया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
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मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र

पहला भाग

Apr 182008
 

हकीम अहसानुल्लाह ‘तस्लीम’ का दावा था कि उन्होंने इमामत, हकीमी और शायरी बुजुर्गों से पाई है। गर्व से कहते थे कि उनके दादा हकीम अहतिशाम हुसैन राना की क़न्नौज में इतनी बड़ी जमींदारी थी कि एक नक़्शे में नहीं आती थी। अब नक़्शे उनके क़ब्जे में और जमींदारी महाजन के क़ब्जे में थी।हकीम साहब के पास एक ऐसा ख़ानदानी नुस्ख़ा था कि शर्तिया लड़की पैदा होती। यह एक भस्म थी जो तवायफ़ उस रात के राजा या विशेष अतिथि को चुपके से पान में डाल कर खिला देती। इस नुस्ख़े के ठीक होने की प्रसिद्धि इस क़दर थी कि कानपुर में किसी गृहस्थ के भी लड़की पैदा होती तो वो मियां के सर हो जाती हो न हो तुम वहीं से पान खा कर आये थे। तवायफ़ कितनी भी हसीन हो उनकी नीयत सिर्फ़ उसके पैसे पर बिगड़ती थी। तवायफ़ें उनसे बड़ी आस्था और श्रद्धा रखती थीं। कहने वाले तो यहां तक कहते थे कि उनके मरने का बड़ी बेचैनी से इंतजार कर रही हैं ताकि संगे-मरमर का मजार बनवायें और हर साल धूमधाम से उर्स मनायें।

मूलगंज का जिक्र ऊपर की पंक्तियों और कानपुर से संबंधित दूसरे चित्रों में जगह-जगह बल्कि जगह-बेजगह आया है। इस मुहल्ले में तवायफें रहती थी। ये विशारत का पसंदीदा विषय है,जिससे हमारे पाठक पूरी तरह से परिचित हो चुके होंगे।हांलाकि बिना संदेह के वे दूसरे ग्रुप के आदमी हैं।

बाजार से गुजरा हूँ खरीददार नहीं हूँ

जैसे कई एलर्जिक कारणों से लोगों की पित्ती उछ्ल जाती है. उसी तरह उनकी बातचीत में तवायफ …अवसर देखे न जगह …छ्न से आन खड़ी होती थी।संयमी हैं, कभी के नाना-दादा बन गये , मगर तवायफ़ है कि किसी तरह से उनके सिस्टम से निकलने के लिये राज़ी ही नहीं होती। एक बार हमने आड़े हाथों लिया। हमने कहा , हज़रत! पुरानी कहानियों में हीरो की और राक्षस की जान किसी तोते में अटकी होती है। कहने लगे, मेरी कहानी में मिट्टी डालिये। ये देखिये कि आजकल की फ़िक्शन और फ़िल्मों में हीरो और हीरोईन से कौन से धर्मग्रंथ पढ़्वाये जा रहे हैं।जिस सोच के मुताबिक पहले तवायफ़ कहानी में डाली जाती थी, अब इस काम के लिये शरीफ़ घराने की बहू-बेटियों को तकलीफ़ दी जाती है। पढ़ने वाले और फ़िल्म देखने वाले आह भी तवायफ़ को उस तरह उचक लेते हैं जैसे मरीज हकीमों के नुस्ख़े में से मुनक्क़ा।

और विशारत कुछ ग़लत नहीं कहते थे। शायद आज उस मनस्थिति का अन्दाजा करना मुश्किल हो लेकिन तवायफ़ उस डगमग़ाते हुए समाज के सम्पन्न वर्ग की इन्द्रियों पर वर्जित सुख की तरह छायी हुई थी, और ये कुछ उस दौर से ही संबंधित नहीं।औरंगजेब के बारे में मशहूर है कि उसने दुनिया के सबसे पुराने पेशे को समाप्त करने के लिये एक फ़रमान जारी किया था कि एक निश्चित तारीख़ तक सारी तवायफ़ें शादी कर लें , वरना उन सबको नाव में भरकर यमुना में डुबो दिया जायेगा। अधिकतर तवायफ़ें डूबने को हांडी-चूल्हे पर और मगरमच्छ के जबड़े को ऐसे लफंगों पर प्रमुखता देती थीं जो प्यार भी करते थे तो इबादत की तरह , यानी बड़ी पाबंदी के साथ और पूरी बेदिली के साथ। बहुत से तवायफ़ों ने इस धन्धे से तौबा कर ली और निकाह कर लिये।

हो चुकीं ग़ालिब बलायें सब तमाम

एक  अक़्दे-नागहानी      और      है

अब ज़रा इसके दौ सौ बरस बाद की एक झलक ‘तज़किरा-ए-ग़ौसिया’ में मुलाहिज़ा फ़रमायें। इसके लेखक मौलवी महम्मद एस्माईल मेरठी अपने श्रद्धास्पद पीरो-मुर्शिद (गुरु) के बारे में एक घटना लिखते हैं “ एक रोज आदेश हुआ , कि जब हम दिल्ली की मस्जिद में ठहरे हुए थे, हमारे दोस्त कम्बलपोश ने हमारी दावत की। शाम की नमाज़ के बाद हमको लेकर चले। चांदनी चौक में पहुंच एक तवायफ़ के कोठे पएअ हमको बैठा दिया और आप चंपत हो गये। पहले तो हमने सोचा कि खाना इसी जगह पकवाया होगा, मगर मालूम हुआ कि यूं ही बिठा कर चल दिया है। हम बहुत घबराये भला ऐसी जगह कमबख़्त क्यों लाया। दो घड़ी बाद हँसता हुआ आया और कहने लगा मियां साहब! मैं आपकी भड़क मिटाने यहां बैठा गया था।बाद में अपने घर ले गया और खाना खिलाया।

यद रहे कि कम्बलपोश एक आजाद और मनमौजी आदमी था, ये घटना उस समय की है जब गुरु की सोहबत में उनका दिल बदल चुका था। सोचिये , जिसकी पतझड़ का ये रंग हो उसकी बहार कैसी रही होगी।

जोश जैसा शब्दों का जादूगर , ख़ानदानी , सुरुचि सम्पन्न और नफ़ासत पसंद शायर जब जीवन के स्वर्ग और असीमित सुख की तसवीर खींचता है तो देखिये इसका क़लम क्या गुल खिलाता है

“ कूल्हे पे हाथ रखकर थिरकने लगी हयात “

कूल्हे पे हाथ रखकर थिरकने में कोई हरज नहीं , बशर्ते कूल्हा अपना ही हो। दूसरे, थिरकना पेशेवर काम हो शौक़िया ना हो। मतलब ये कि कोई कूल्हे पे हाथ रख के थिरकने लगे तो किसी को क्या एतराज हो सकता है , मगर इससे जात पहचानी जाती है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से

पहला भाग

Apr 132008
 

देखा गया है कि जिस शायर को दूसरे नालायक़ शायरों से दाद लेने की उम्मीद हो वो उन्हें हूट नहीं करता। चोरियां बंद करने का आजमाया हुआ तरीक़ा यह बताया गया है कि चोर को थानेदार बना दो। हमें इसमें इस फ़ायदे के अलावा कि वो दूसरों को चोरी नहीं करने देगा एक फ़र्क़ और नजर आता है। वो ये कि पहले जो माल वो अंधेरी रातों में सेंध लगाकर बड़ी मुसीबतों से हासिल करता था, अब दिन-दहाड़े रिश्वत की शक्ल में थाने में धरवा लेगा। इसी प्रोग्राम के तहत पांच ताजा ग़जलें हकीम अहसानुल्लाह ‘तस्लीम’ से इस वादे पर लिखवा कर लाये कि जाड़े में उनके कुश्तों के लिये पचास तिलेर, बीस तीतर, पांच हरियल और बक़रईद पर पांच ख़स्सी बकरे आधे दामों धीरजगंज से ख़रीदकर भिजवायेंगे।

हकीम अहसानुल्लाह ‘तस्लीम’ मूलगंज की तवायफ़ों के ख़ास हकीम तो थे ही, गाने के लिये उन्हें फ़रमाइशी ग़जल भी लिखकर देते थे। किसी तवायफ़ के पैर भारी होते तो उसके लिये ख़ास तौर से छोटी बहर (छंद) में ग़जल कहते ताकि ठेका और ठुमका न लगाना पड़े। हकीम ‘तस्लीम’ तवायफ़ों के उच्चारण के दोष भी ठीक करते, बाक़ी चीजें ठीक होने से परे थीं। मतलब ये कि वैसे दोष सुधार चाहती थीं लेकिन सुधार से परे थी। उस जमाने में तवायफ़ों और उनके श्रद्धालुओं के दोष सुधारना अदबी फ़ैशन में शामिल था।वास्तव में ये समाजी से जियादा खुद सुधारक का ऐन्द्रिय विषय होता था, जिसका catharsis संभव ना हो, उसका बयान लज़्जत भरा था। गुनाह का जिक्र गुनाह से कहीं जियादा लज़ीज हो सकता है बशर्ते की विस्तृत हो और बयान करने वाला मानसिक और शारिरिक दोनों प्रकार से बूढ़ा हो।एमली जोला की Nana , रुसवा की उमराव जान अदा, टोलार्ज ट्रेक और देगा (Degas) की तवायफ़ों और चकलों की तस्वीरें शारिरिक वास्तविकता के सिलसिले की पहली कड़ी हैं, जबकि क़ारी सरफ़राज़ हुसैन की “शाहिदे-राअना” से रंगीनी के एक दूसरे लज़ीज़ सिलसिले की शुरुआत होती है, जिसकी कड़ियां क़ाजी अब्दुल ग़फ़्फ़ार के लैला के ख़त , गुलाम अब्बास की आनंदी की भरपूर सादगी और मंटो की प्रकट रूप में खुरदरी वास्तविकता लेकिन Inverted Romanticism से जा मिलती है|हमारे यहां तवायफ़ों से संबंधित तमाम बचकाना आश्चर्यों,खुमगुमानियों, सुनी सुनायी बातों और रोमांटिक सोचों …जिससे मिले , जहां से मिले , जिस कदर मिले ….. सबका बोझल अम्बार इस तरह लगाया जाता है कि हर तरफ़ लफ़्जों के तोता मैना फुदकते-चहकते दिखायी देते हैं। जिन्दा तवायफ़ कहीं नजर नहीं आती। रोमेंटिक मलबे तले उसके घुंघरू की आवाज़ तक सुनायी नहीं देती, इस तवाय़फ की निर्माण सामग्री उठती जवानी के मुंहासों भरे अधकचरे ज़जबात से ली गयी है, जिसकी महक रिसर्च स्कॉलरों के रगों में दौड़ती फिरती रौशनाई को मुद्दतों गरमाती रहेगी। इस इच्छा भरे शहर की तवायफ़ ने अपनी Chastity Belt की चाबी दरिया में फेंक दी है और अब उसे किसी से…हद है कि खुद लेखक और अपने आप से भी कोई खतरा नहीं है।

वो सर से है ता नाखूने-पा , नामे-खुदा , बर्फ

बात साठ-सत्तर साल पुरानी लगती है , मगर आज भी उतनी ही सच है। अलग-अलग तबक़ों के लोग तवायफ़ को ज़लील औए नफ़रत के क़ाबिल समझते थे, मगर साथ ही साथ उसकी चर्चा और चिंतन में एक लज़्ज़त महसूस किये बिना नहीं रहते थे। समाज और तवायफ़ में सुधार के बहाने उसकी ज़िन्दगी की तस्वीर बनाने में उनकी प्यास की संतुष्टि हो जाती थी। इस शताब्दी के पहले आधे भाग का साहित्य , विशेष रूप से फ़िक्शन , तवायफ़ के साथ इसी Love-hate यानि दुलार-दुत्कार के ओलते-बदलते संबंध का परिचायक है। उसने एक द्विअर्थी बयान-शैली को जन्म दिया। जिसमें बुरा भला कहना भी मजे लेने का माध्यम बन जाता है। भोगे हुए यथार्थ के पर्दे में जितनी दाद तवायफ़ को उर्दू फ़िक्शन लिखने वालों से मिली उतनी अपने रात के ग्राहको से भी न मिली होगी।

क़िबला चूं पीर शुद्ध

मूलगंज मे वहीदन बाई के कोठे पर एक बुजुर्ग जो हिल-हिल कर सिल पर मसाला पीसते हुए देखे जाते थे , उनके बारे में यार लोगों ने मशहूर कर रखा था कि तीस बरस पहले जुमे की नमाज़ के बाद वहीदन बाई के चाल-चलन के सुधार के नीयत से कोठे के जीने पर चढ़े थे, मगर उस वक़्त इस छ्प्पन छूरी की भरी जवानी थी। लिहाजा इनका मिशन बहुत तूल खींच गया।

कारे-ज़वां दराज़ है , अब मेरा इंतज़ार कर

वहीदन बाई जब फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट से रिटायर हुई और गुनाहों से तौबा करने का तक़्ल्लुफ़ किया, जिसके लायक अब वह वैसे भी नहीं रही थी तो क़िबला आलम की दाढ़ी पेट तक आ गयी थी। अब वो उसकी बेटियों कि बावर्ची-खाने के इंतजाम तथा ग़ज़लों और ग्राहकों के चयन मे मदद करते थे।1931 में वो हज को गयी तो ये नौ सौ चूहों के अकेले प्रतिनिधि की हैसियत से उसके साथ थे.

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16, मुशायरे की तैयारी

पहला भाग

Apr 112008
 

इन्हीं पत्थरों पे चल कर….

अट्ठारह शायरों का जुलुस स्कूल के सामने से गुजरा तो एक रहकले से 18 तोपों की सलामी उतारी गई। ये एक छोटी सी पंचायती तोप थी जो नार्मल हालात में पैदाइश और ख़त्नों के मौके पर चलाई जाती थी। चलते ही सारे क़स्बे के कुत्ते, बच्चे, कव्वे, मुर्ग़ियां और मोर कोरस में चिंघाड़ने लगे। बड़ी बूढ़ियों ने घबरा कर ‘दीन जागे, कुफ़्र भागे’ कहा। ख़ुद वो मिनी तोप भी अपने चलने पर इतनी आश्चर्यचकित और घबरायी हुई थी कि देर तक नाची-नाची फिरी। शायरों को खाते-पीते किसानों के घर ठहराया गया, जो अपने-अपने मेहमान को स्कूल से घर ले गये। एक किसान तो अपने हिस्से केमेहमान की सवारी के लिये टट्टू और रास्ते के लिये नारियल की गुड़गुड़ी भी लाया था। क़स्बे में जो गिने-चुने सम्पन्न घराने थे, उनसे मौली मज्जन की नहीं बनती थी, इसलिये शायरों के ठहरने और खाने का बन्दोबस्त किसानों और चौधरियों के यहां किया गया, जिसकी कल्पना ही शायरों की नींद उड़ाने के लिये काफ़ी थी। शेरो-शायरी या नॉविलों में देहाती जिन्दगी को रोमेंटिसाइज करके उसकी निश्छलता,सादगी, सब्र और प्राकृतिक सौन्दर्य पर सर धुनना और धुनवाना और बात है लेकिन सचमुच किसी किसान के आधे पक्के या मिट्टी गारे के घर में ठहरना किसी शहरी इन्टेलेक्चुअल के बस का रोग नहीं। किसान से मिलने से पहले उसके ढोर-डंगर, घी के फिंगर प्रिन्ट वाले धातु के गिलास, जिन हाथों से उपले पाथे उन्हीं हाथों से पकाई हुई रोटी, हल, दरांती, मिट्टी से खुरदुराये हुए हाथ, बातों में प्यार और प्याज की महक, मक्खन पिलायी हुई मूंछ….इस सबसे एक ही वक़्त में गले मिलना पड़ता है।

इस क़स्बे के मुशायरे में, जो धीरजगंज का अंतिम यादगार मुशायरा साबित हुआ, बाहर के 18 शायरों के अलावा 33 स्थानीय तथा सम्बन्धित शायर भी सम्मिलित होने के लिये बुलाये गये, या बिन बुलाये आये। बाहर से आने वालों में कुछ ऐसे भी थे जो इस लालच में आये थे कि नक़द न सही, गांव है, कुछ नहीं तो सब्जियां, फ़स्ल के मेवे, फल-फलवारी के टोकरे, पांच-छह मुर्ग़ियों का झाबा तो मुशायरा कमेटी वाले जुरूर साथ कर देंगे। धीरजगंज में कुछ शरारती नौजवान ऐसे थे जिनके बारे में मशहूर था कि वो पास-पड़ोस के तीन-चार मुशायरे चौपटकर चुके हैं। उनके एक पुराने लंगोटिये थे जिन्होंने मैट्रिक में चार-पांच बार फ़ेल होने और परीक्षकों की छात्रों के गुणों को पहचानने के अयोग्यता से तंग आकर चुंगी विभाग में नौकरी कर ली थी। इसमें इन्द्रिय-दमन के अलावा इस बदनाम महकमे को सजा देना भी छुपा हुआ था। चुंगी के वातावरण को उन्होंने शायरी के लिये हद से जियादा उपयुक्त पाया। अपनी वर्तमान स्थिति से इतने संतुष्ट और आनंदित थे कि इसी पोस्ट से रिटायर होने के इच्छुक थे। अधिक संतान वाले थे और आशु कविता करते थे। जो शेरों के आने का क्रम था वही औलाद का भी, यानी कि दोनों के अवतरण का आरोप ऊपर वाले पर लगाते थे। आम-सा वाक्य भी उन पर कविता बन कर उतरता था। गद्य बोलने और लिखने में उन्हें उतनी ही उलझन होती थी जितनी एक आम आदमी को कविता लिखने में।

वो शायरी करते थे मगर मुशायरों से विरक्त और उदास थे। फ़रमाते थे, “आज कल जिस तरह शेर कहा जाता है बिल्कुल उसी तरह दाद दी जाती है, यानी मतलब समझे बग़ैर। सही दाद देना तो दूर अब लोगों को ढंग से हूट करना भी नहीं आता। शेर मुशायरे में सुनने-सुनाने की चीज नहीं। एकान्त में पढ़ने, समझने, सुनने और सहने की चीज है। शायरी किताब की शक्ल में हो तो लोग शायर का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। मैं ‘मीर’ की किताब से एक-दो नहीं, सौ-दो सौ शेर ऐसे निकाल कर दिखा सकता हूं जो वो किसी मुशायरे में पढ़ देते तो इज्जत और पगड़ी ही नहीं, सर भी सलामत नहीं रहता। उन्हें ‘मीर’ के सिर्फ़ यही शेर याद थे। दूसरे उस्ताद शायरों के भी उन्होंने सिर्फ़ वही शेर याद कर रखे थे जिनमें कोई कमी या ग़लती थी। उन साहब से बिशारत पांच छह ग़जलें कहलवा कर ले आये और उन मुशायरा बिगाड़ नौजवानों में बांट दीं कि तुम भी पढ़ना। यह तरकीब काम कर गई।

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1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया

पहला भाग

Apr 062008
 

निहारी, रसावल, जली और धुआं लगी खीर, मुहावरे, सावन के पकवान, अमराइयों में झूले, दाल, रेशमी दुलाई, ग़रारे, दोपल्ली टोपी, आल्हा-ऊदल और जबान के शेर की तरह इक्का भी यू. पी. की ख़ास चीजों में गिना जाता है। हमारा ख़याल है कि इक्के का अविष्कार किसी घोड़े ने किया होगा, इसीलिये इसके डिजाइन में इस बात का ध्यान रखा गया है कि घोड़े से अधिक सवारी को परेशानी उठानी पड़े। इक्के की विशेषता यह है कि अधिक सवारियों का बोझ घोड़े पर नहीं पड़ता बल्कि उन सवारियों पर पड़ता है जिनकी गोद में वो आ-आ कर बैठती है। जोश मलीहाबादी साहब ऐसे इक्कों के बारे में लिखते हैं कि, तमाम के तमाम इस क़दर जलील हैं कि उन पर सिकन्दर महान को भी बिठा दिया जाये तो वो भी किसी देहाती रंडी के भड़वे नजर आने लगेंगे

धीरजगंज के प्लेटफ़ार्म को स्कूल के बच्चों ने रंग-बिरंगी झंडियों से इस तरह सजाया था जैसे फूहड़ मां बच्ची का मुंह धुलाये बग़ैर बालों में शोख़ रिबन बांध देती है। ट्रेन से उतरते ही हर शायर को गेंदे का हार पहना कर गुलाब का एक-एक फूल और औटते दूध का कांसे का गिलास पेश किया गया जिसे थामते ही वो बिलबिला कर पूछता था कि इसे कहां रक्खूं? स्वागत करने वालों ने पच्चीस मील और एक घण्टे दूर, कानपुर से आने वालों से पूछा, ‘‘सफ़र कैसा रहा! कानपुर का मौसम कैसा है! हाथ मुंह धो के तीन चार घण्टे सो लें तो सफ़र की थकान उतर जायेगी।’’ प्रत्युत्तर में मेहमानों ने पूछा, ‘‘यहां मग़रिब (शाम की नमाज) किस वक़्त होती है’’ धीरजगंज वाले तो मेहमाननवाजी के लिये मशहूर हैं;यहां की कौन सी चीज मशहूर है;क्या यहां के मुसलमान भी उतने ही बुरे हाल में हैं, जितने बाक़ी हिन्दुस्तान के।’’ अट्ठारह शायर और पांच मिसरा उठाने वाले जो एक शायर अपने साथ लाया था, दो बजे की ट्रेन से धीरजगंज पहुंचे। ट्रेन पहुंचने से तीन घण्टे पहले ही यतीमख़ाना शम्स-उल-इस्लाम का बैंड बजना शुरु हो गया था, लेकिन जैसे ही ट्रेन आ कर रुकी तो कभी ढोल, कभी बांसुरी, कभी हाथी की सूंड जैसा बाजा बंद हो जाता और कभी तीनों ही मौन हो जाते, सिर्फ़ बैंड मास्टर छड़ी हिलाता रह जाता। वो इस कारण कि इन बाजों को बजाने वाले बच्चों ने इससे पहले इंजन को इतने पास से नहीं देखा था। वो उसे देखने में इतने तल्लीन हो जाते कि बजाने की सुध ही न रहती, इंजन उनके इतने पास आ कर रुका था कि उसका एक-एक प्रभावी पुरजा दिखाई दे रहा था……सीटी बजाने वाला उपकरण, कोयला झोंकने वाला बेलचा, बॅायलर दहकते- चटख़ते कोयलों का ताप और अंग्रेजी दवाओं की बू जैसा भभकता झोंका। शोलों की आंच से ऐंग्लो इन्डियन ड्राइवर का तमतमाता लाल चुक़न्दर चेहरा और कलाई पर गुदी नीली मेम, मुसलमान ख़लासी के सर पर बंधा हरा रूमाल और चेहरे पर कोयले की जैबरा धारियां, पहिये से जुड़ी हुई लम्बी सलाख़ जो बिल्कुल उनके हाथ की तरह चलती जिसे वो आगे पीछे करते हुए छुक-छुक रेल चलाते थे, इंजन की टोंटी से उबलती, शोर मचाती स्टीम का चेहरे पर स्प्रे। इन बच्चों ने धुंए के मरग़ोलों को मटियाले से हल्का सुरमई, सुरमई से गाढ़ा-गाढ़ा काला होते देखा। गले में उसकी कड़वाहट उन्हें अच्छी लग रही थी। घुंघराले धुंए का काला अजगर फुफकारें मारता आख़िरी डब्बे से भी आगे निकल कर अब आसमान की तरफ उठ रहा था। बैंड बजाने वाले बच्चे बिल्कुल चुप हो कर पास, बिल्कुल पास से इंजन की सीटी को बजता हुआ देखना चाहते थे। उनका बस चलता तो जाते समय अपनी आंखें वहीं छोड़ जाते। अगर उन बच्चों से बैंड बजवाना ही था तो ट्रेन बग़ैर इंजन के लानी चाहिये थी।

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पहला भाग

Apr 032008
 

आज दिन तो था कुमांऊनी होली श्रंखला के अगले भाग का लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से गाने अपलोड नहीं हो पाये. इसलिये आज खोया-पानी का अगला भाग प्रस्तुत कर रहा हूँ. कुमांऊनी होली का अगला भाग कल प्रस्तुत किया जायेगा.

खोया पानी का आज का अंश बिशारत द्वारा की जा रही मुशायरे की तैयारी से संबंधित है. इसमें हास्य के ऐसे नमूने हैं जो आपको निश्चय ही हँसने पर मजबूर कर देंगे. तो लीजिये प्रस्तुत है अगला भाग.

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धीरजगंज का पहला और आख़िरी मुशायरा : मुशायरे की तारीख तय हो गई। धीरजगंज के आस-पास के लोगों को निमंत्रित करना, तरह की पंक्ति तय करना (किसी उस्ताद शायर की पंक्ति को आधार बनाकर ग़जल कहना) और शायरों का चयन करना, शायरों को कानपुर से आख़िरी ट्रेन से लाना और मुशायरे के बाद पहली ट्रेन से दफ़ा करना। मुशायरे से पहले और ग़जल पढ़ने तक उनकी मुफ़्त ख़ातिर किसी और से करवाना….इसी क़िस्म के कार्य जो सजा का दर्जा रखते थे, बिशारत के सुपुर्द किये गये। शायरों और उनके अपने आने-जाने का रेल और इक्के का किराया, शायरों का धीरजगंज में खाने और रहने का ख़र्च, पान सिगरेट इत्यादि के ख़र्च के लिये मौली मज्जन ने दस रुपये दिये और ताकीद की कि अंत में जो राशि बच जाये वो उनको मय रसीद मुशायरे के अगले दिन वापस कर दी जाये। उन्होंने सख़्ती से यह भी हिदायत की कि शायरों को आठ आने का टिकिट ख़ुद ख़रीद कर देना। नक़द किराया हरगिज न देना। बिशारत यह पूछने ही वाले थे कि शायरों के हाथ-ख़र्च और नजराने का क्या होगा कि मौली मज्जन ने स्वयं ही सवाल हल कर दिया। फ़रमाया कि शायरों से यतीमख़ाने और स्कूल के चंदे के लिये अपील जुरूर कीजियेगा। उन्हें शेर सुनाने में जरा भी शर्म नहीं आती तो आपको इस पुण्यकार्य में काहे की शर्म। अगर आपने फूहड़पन से काम न लिया तो हर शायर से कुछ न कुछ वसूल हो सकता है, मगर जो कुछ वसूल करना है मुशायरे से पहले ही धरवा लेना। ग़जल पढ़ने के बाद हरगिज क़ाबू में नहीं आयेंगे। ‘रात गयी, बात गयी’ वाला मुआमला है और जो शायर ये कहे कि वो अठन्नी भी नहीं दे सकता तो उसे तो हमारे यतीमख़ाने में होना चाहिये। कानपुर में बेकार पड़ा क्या कर रहा है।

पाठक सोच रहे होंगे इन व्यवस्थाओं के संदर्भ में स्कूल के हैडमास्टर का कहीं जिक्र नहीं आया। इसका एक उचित कारण यह था कि हैडमास्टर को नौकरी पर रखते समय उन्होंने केवल एक शर्त लगाई थी-वो यह कि हैडमास्टर स्कूल के मुआमलों में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इस आत्मश्लाघा कहिये या अनुभवहीनता, बिशारत ने मुशायरे के लिये तरह की जो पंक्ति चुनी वो अपनी ही ग़जल से ली। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा तो यह नजर आया कि मुफ़्त में प्रसिद्धि मिल जायेगी। दूसरे उन्हें मुशायरे के लिए अलग ग़जल पर माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी। यह सोच-सोच के उनके दिल में गुदगुदी होती रही कि अच्छे-अच्छे शायर उनकी पंक्ति पर गिरह लगायेंगे। बहुत जोर मारेंगे। घंटों काव्य-चिंतन में कभी पैर पटकेंगे, कभी दिल को, कभी सर को पकड़ेंगे और शेर होते ही एक-दूसरे को पकड़ के बैठ जायेंगे। उन्होंने अट्ठारह शायरों को सम्मिलित होने के लिये तैयार कर लिया, जिनमें जौहर चुग़ताई इलाहाबादी, काशिफ़ कानपुरी और नुशूर वाहिदी भी शामिल थे, जो इसलिये तैयार हो गये थे कि बिशारत की नौकरी का सवाल था। नुशूर वाहिदी और जौहर इलाहाबादी तो उन्हें पढ़ा भी चुके थे। उन दोनों को उन्होंने तरह नहीं दी बल्कि दूसरी ग़जल पढ़ने की प्रार्थना की। ऐसा लगता था कि उन्होंने बाक़ी शायरों के चयन में यह ध्यान रक्खा था कि कोई भी शायर ऐसा न हो जो उनसे बेहतर शेर कह सकता हो। इन सब शायरों को दो इक्कों में बिठा कर वो कानपुर के रेलवे स्टेशन पर लाये। जिन पाठकों को दो इक्कों में अट्ठारह शायरों की बात में अतिशयोक्ति लगे, शायद उन्होंने न तो इक्के देखे हैं न शायर। यह तो कानपुर था वरना अलीगढ़ होता तो एक ही इक्का काफ़ी था। पाठकों की आसानी के लिये हम इस लाजवाब सवारी का सरसरी वर्णन किये देते हैं। पहले ग़ुस्ले-मय्यत के तख़्ते को काट कर चौकोर और चौरस कर लें। फिर उसमें दो अलग साइज के बिल्कुल चौकोर पहिये इस भरोसे के साथ जोत दें कि इनके चलने से अलीगढ़ की सड़कें समतल हो जायेंगी और इस प्रक्रिया में ये ख़ुद भी गोल हो जायेंगे। तख़्ता सड़क के गड्ढ़ों की ऊपरी सत्ह से छह, साढ़े छह फ़िट ऊंचा होना चाहिये ताकि सवारियों के लटके हुए पैरों और पैदल चलने वालों के सरों की सतह एक हो जाये। पहिये में सूरज की किरणों की शक्ल की जो लकड़ियां लगी होती है वो इतनी मजबूत होनी चाहिये कि नई सवारी इन पर पांव रख कर तख़्ते तक हाई जम्प कर सके। पांव के धक्के से पहिये को स्टार्ट मिलेगा। इसके बाद तख़्ते में दो बांसों के बम (इक्के और तांगों के आगे लगाये जाने वाली लकड़ी जिसमें घोड़ा जोता जाता है) लगा कर एक कमजोर घोड़े को लटका दें, जिसकी पसलियां दूर से ही गिनकर सवारियां संतोष कर लें कि पूरी हैं। लीजिये इक्का तैयार है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा

पहला भाग

Mar 302008
 

लार्ड लिजलिजी : बिशारत ने एक बार यह शिकायत की कि मुझे रोजाना धूप में तीन कि. मी. पैदल चल कर आना पड़ता है तो तहसीलदार ने उसी वक़्त एक ख़च्चर उनकी सवारी में लगाने का हुक्म दे दिया। ये अड़ियल ख़च्चर उसने नीलामी में आर्मी टांसपोर्ट से ख़रीदा थी। अब बुढ़ापे में सिर्फ़ इस लायक़ रह गया था कि उद्दण्ड जाटों, बेगार से बचने वाले चमारों तथा लगान और मुफ़्त दूध न देने वाले किसानों का मुंह काला करके इस पर क़स्बे में गश्त लगवाई जाती थी। पीछे ढोल, ताशे और मंजीरे बजवाये जाते ताकि ख़च्चर बिदकता रहे। इस पर से गिर कर एक घसियारे की रीढ़ की हड्डी टूट गई, जिसने मुफ़्त में घास देने से अनाकानी की थी। इससे उसे पूरा फ़ालिज हो गया। सवारी के बजाय बिशारत को पैदल चलना अधिक गौरवशाली और शांतिदायक लगा। यह जुरूर है कि लार्ड लिजलिजी अगर साथ न होता तो तीन मील की दूरी बहुत खलती। वो रास्ते भर उससे बातें करते जाते, उसकी तरफ़ से जवाब और हुंकारा ख़ुद ही भरते फिर जैसे ही नाजो का ध्यान आता सारी थकान दूर हो जाती। डग की लम्बाई आप-ही-आप बढ़ जाती। वो तहसीलदार के नटखट लड़कों को उस समय तक पढ़ाते रहे जब तक वो वाक़या न पेश आया जिसका जिक्र आगे आयेगा। क़स्बे में वो मास्टर साहब कहलाते थे और इस हैसियत से उनकी हर जगह आवभगत होती थी। लोगों को तहसीलदार से सिफ़ारिश करवानी होती तो लार्ड लिजलिजी तक के लाड़ करते। वो रिश्वत की दूध जलेबी खा-खा कर इतना मोटा और काहिल हो गया था कि सिर्फ़ दुम हिलाता था। भोंकने में उसे आलस आने लगा था। उसका कोट ऐसा चमकने लगा था जैसा रेस के घोड़ों का होता है। क़स्बे में वो लाट लिजलिजी कहलाता था। जलने वाले अलबत्ता बिशारत को तहसीलदार का टीपू कहते थे। नाजो ने जाड़े में लिजलिजी को अपनी सदरी काट-पीट के पहना दी तो लोग उतरन पर हाथ फेर-फेर के उसपे प्यार जताने लगे। मौली मज्जन की एक बुरी आदत थी कि मास्टर पढ़ा रहे होते तो दबे पांव, सीना ताने क्लास रूम में घुस जाते, यह देखने के लिये कि वो ठीक पढ़ा रहे हैं या नहीं। लेकिन बिशारत की क्लास में कभी नहीं आते थे इसलिये कि उनके दरवाजे पर लिजलिजी पहरा देता रहता था। परिचय बढ़ा और बिशारत शिकार में तहसीलदार के साथ रहने लगे तो लिजलिजी तैर कर घायल मुर्ग़ाबी पकड़ना सीख गया। तहसीलदार ने कई बार कहा यह कुत्ता मुझे दे दो, बिशारत हर बार अपनी तरफ़ इशारा करके टाल जाते कि यह ग़ुलाम मय अपने कुत्ते के आपका ख़ादिम है। आप कहां इसके हगने, मूतने की खखेड़ में पड़ेंगे। जिस दिन से तहसीलदार ने एक क़ीमती पट्टा लखनऊ से मंगवा कर उसे पहनाया तो उसकी गिनती शहर के मुसाहिबों में होने लगी और बिशारत शहर में इतराते फिरने लगे। उसके ख़ानदानी होने में कोई शक न था। उसका पिता इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज का पाला हुआ प्वांयटर था जब वो इंग्लैंड जाने लगा तो अपने रीडर को बख़्श गया। लिजलिजी उसी की औलाद था, जो धीरजगंज में आकर यूं गली-गली ख़राब हो रहा था।

मौली मज्जन को लिजलिजी जहर लगता था। फ़रमाते थे कि “पहले तो कुत्ते की जात है और फिर इसे तो ऐसी ट्रेनिंग दी गई है कि सिर्फ़ शरीफ़ों को काटता है।“ इसमें शक नहीं कि जब मौली मज्जन पे भौंकता तो बहुत ही प्यारा लगता था। अब वो वाक़ई इतना ट्रेंड हो गया था कि बिशारत हुक्म देते तो स्टाफ़ रूम से उनका रूलर मुंह में दबा कर ले आता। मौली मज्जन का बयान था कि उन्होंने अपनी आंखों से इस पलीद को हाजिरी रजिस्टर ले जाते देखा, लेकिन शायद तहसीलदार और रेबीज के डर से कुछ न बोले। एक चीनी विद्वान का कथन है कि कुत्ते पर खींच कर ढेला मारने पर पहले यह जुरूर पता कर लो कि इसका मालिक कौन है।

टीचर लोग यतीमख़ाने को खा गये : धीरे-धीरे मौली मज्जन ने क़र्ज से भी हाथ खेंच लिया और ख़ुद भी खिंचे-खिंचे रहने लगे। एक दिन बिशारत चाक में लथपथ, डस्टर हाथ में लिये और रजिस्टर बग़ल में दबाये क्लास रूम से निकल रहे थे कि मौली मज्जन उन्हें आस्तीन पकड़कर अपने दफ़्तर में ले गये और उल्टे सर हो गये। शायद “हमला करने में पहल सबसे अच्छा बचाव है” वाली पालिसी पर अमल कर रहे थे। कहने लगे, “बिशारत मियां एक मुद्दत से आपकी तनख़्वाह चढ़ी हुई है और आपके कानों पर जूं नहीं रेंगती। स्कूल इस हालत में पहुंच गया। कुछ उपाय कीजिये। यतीमख़ाने के चन्दे के मद से टीचरों की तनख़्वाह दी जाती है। टीचर तो यतीमख़ाने को खा गये। डरता हूं, कहीं आप लोगों को यतीमों की आह न लग जाये।“ बिशारत यह सुनते ही आपे से बाहर हो गये। कहने लगे, सात-आठ महीने होने को आये, कुल साठ-सत्तर रुपये मिले हैं। दो बार घर से मनीआर्डर मंगवा चुका हूं, अगर इस पर भी यतीमों की आह का अंदेशा है, तो अपनी नौकरी तह कर के रखिये’’ यह कह के उन्होंने वहीं चार्ज दे दिया। मतलब यह कि डस्टर और हाजिरी रजिस्टर मौली मज्जन को पकड़ा दिया। मौली मज्जन ने एकदम पैंतरा बदला और डस्टर उनके चार्ज में वापस दे कर, हाथ झाड़ते हुए बोले, ‘‘आप कैसी बातें कर रहे हैं। बरख़ुरदार! क़सम है अल्लाह की! वो रक़म जिसे आप अपने हिसाब से साठ-सत्तर बता रहे हैं, वो भी यतीमों का पेट काट कर जकात और सदके से निकाल कर पेश की थी। इसका आप यह बदला दे रहे हैं। सर सय्यद को भी आख़िरी उम्र में ऐसे ही सदमे उठाने पड़े थेजिससे वो उठ न पाये थे। मैं सख़्त आदमी हूं। ख़ैर! सब्र से काम लीजिये। अल्लाह ने चाहा तो बक़रा-ईद की खालों से सारा हिसाब बेबाक कर दूंगा। बर्ख़ुरदार! ये आपका स्कूल है, आपका अपना यतीमख़ाना। मैं कोई अंधा नहीं हूं। आप जिस लगन से काम कर रहे हैं, वो अंधे को भी नजर आती है। आप जिन्दगी में बहुत आगे जायेंगे। अगर इसी तरह काम करते रहे, अल्लाह ने चाहा तो बीस-पच्चीस बरस में इस स्कूल के हैड मास्टर हो जायेंगे। मैं ठहरा जाहिल आदमी, मैं तो हैडमास्टर बनने से रहा। स्कूल का हाल आपके सामने है। चंदा देने वालों की तादाद घट कर इतनी हो गई कि सर सय्यद होते तो अपना सर पीट लेते। मगर आप सब अपना ग़ुस्सा मुझी पर उतारते हैं। मैं अकेला क्या कर सकता हूं। अकेला चना भाड़ तो क्या ख़ुद को भी नहीं फोड़ सकता। जुरूरत इस बात की है कि स्कूल और यतीमख़ाने को अमीरों, रईसों,तअल्लुकेदारों और आस-पास के शहरों में परिचित कराया जाये। लोगों को किसी बहाने बुलाया जाये। एक यतीम का चेह्रा दिखाना हजार भाषणों और लाख इश्तहारों से जियादा असर रखता है। यक़ीन जानिये जबसे टीचरों की तनख़्वाह रुकी है, मेरी नींदें उड़ गई हैं। बराबर सलाह मशविरे कर रहा हूं। अल्लाह के लिये अपनी तनख़्वाह की अदायगी की कोई तरकीब निकालिये। बहुत चिन्तन-मनन के बाद अब आप ही के उपाय पर अमल करने का फ़ैसला किया है। स्कूल की प्रसिद्धि के लिये एक शानदार मुशायरा होना बहुत जुरूरी है। लोग आज भी धीरजगंज को गांव समझते हैं। अभी कल ही एक पोस्टकार्ड मिला। पते में गांव धीरजगंज लिखा था। गांव धीरजगंज! ख़ून खौलने लगा। लोग अर्से तक अलीगढ़ को भी गांव समझते रहे, जब तक कि वहां फ़िल्म नहीं आई और कार के एक्सीडेंट में पहला आदमी न मरा।

काम बांटने के सिलसिले में उन्होंने बिशारत के जिम्मे सिर्फ़ शायरों का लाना-ले जाना, ठहरने और खाने के बंदोबस्त, मुशायरे की पब्लिसिटी और मुशायरा-स्थल का इंतजाम दिया। बाक़ी काम वो अकेले कर लेंगे, जिससे अभिप्राय मुशायरे की अध्यक्षता था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड

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