सय्यद सय्यद लोग कहे हैं, सय्यद क्या तुम-सा होगा : अब इस रेखाचित्र में जलील होने के अलग-अलग शेड भरना हम आपकी विचार क्षमता पर छोड़ देते हैं। इन हालात में जैसा वक़्त गुजर सकता था, गुजर रहा था। दिसम्बर में स्कूल का सालाना जलसा होने वाला था जिसकी तैय्यारियां इतनी जोर-शोर से हो रही थीं कि मौली मज्जन को इतनी फ़ुरसत भी न थी कि मास्टरों की तनख़्वाहों की अदायगी तो दूर, इस विषय पर झूठ भी बोल सकें। दिसम्बर का महीना सालाना क़ौमी जलसों, मुर्ग़ाबी के शिकार, बड़े दिन पर साहब लोगों को डालियां भेजने, पतंग उड़ाने, कुश्ते खाने और उनके नतीजों से मायूस होने का जमाना होता था। 30 नवम्बर को मौली मज्जन ने बिशारत को बुलवाया तो वो यह समझे कि शायद निजी रूप से एकान्त में तनख़्वाह देंगे ताकि और टीचरों को कानों-कान ख़बर न हो। मगर वो छूटते ही बोले “आप अपने शेरों में पराई बहू-बेटियों के बारे में अपने मंसूबों का बयान करने के बजाय क़ौमी जज्बा क्यों नहीं उभारते। अपने मौलाना हाली पानीपती ने क्या कहा है ऐसी शायरी के बारे में? (चुटकी बजाते हुए) क्या है वो शेर? अमां! वही सन्डास वाली बात” बिशारत ने मरी-मरी आवाज में शेर पढ़ा

वो शेर और क़साइद का नापाक दफ़्तर

उफ़ूनत  में   संडास  है  जिससे    बेहतर

उनकी बीबी और मौलाना हाली की साझी ग़लतियां : शेर सुनकर फ़मार्या, “आपके हाथों में अल्लाह ने शेर गढ़ने का हुनर दिया है। इसे काम में लाइये, सालाना जलसे में यतीमों पर एक जोरदार नज्म लिखिये। मुस्लिम क़ौम में चेतना के अभाव, साइंस पर मुसलमानों के अहसानात, सर सय्यद की क़ुरबानियां, अंग्रेजी-साम्राज्य में अम्न-चैन का दौर-दौरा, चंदे की अहमीयत, तारिक़ द्वारा स्पेन की विजय और तहसीलदार साहब की क्षमता और अनुभव का जिक्र होना चाहिये। पहले मुझे सुना दीजियेगा। वक़्त बहुत कम है।”

बिशारत ने कहा “मुआफ़ कीजियेगा, मैं ग़जल का शायर हूं। ग़जल में यह विषय नहीं बांधे जा सकते।“

क्रोधित होकर बोले,”मुआफ़ कीजियेगा, क्या ग़जल में सिर्फ़ परायी बहू-बेटियां बांधी जा सकती है? तो फिर सुनिये, पिछले साल जो उर्दू टीचर था वो डिसमिस इसी बात पर हुआ था। वो भी आपकी तरह शायरी करता था। मैंने कहा, इनआम बांटने के जलसे में बड़े-बड़े लोग आयेंगे। हर दानदाता और बड़े आदमी के आने पर पांच मिनट तक यतीमख़ाने का बैंड बजेगा। यतीमों की बुरी हालत और यतीमख़ाने के फ़ायदे और ख़िदमत पर एक फ़ड़कती हुई चीज हो जाये। तुम्हारी आवाज अच्छी है गा कर पढ़ना। ऐन जलसे वाले दिन भिनभिनाता हुआ आया। कहने लगा, बहुत सर मारा, पर बात नहीं बनी। इन दिनों तबियत हाजिर नहीं है। मैंने कहा, अमां हद हो गई। अब क्या हर चपड़क़नात मुलाजिम की तबियत के लिये एक अलग रजिस्टर हाजिरी रखना पड़ेगा। कहने लगा, बहुत शर्मिन्दा हूं। एक दूसरे शायर की नज्म, मौके के हिसाब से तरन्नुम से पढ़ दूंगा। मैंने कहा, चलो कोई बात नहीं, वो भी चलेगी। बाप रे बाप! उसने तो हद ही कर दी। भरे जलसे में मौलाना हाली पानीपती की मुनाजाते-बेवा (विधवा की ईश्वर से प्रार्थना) के बन्द पढ़ डाले। डायस पर मेरे पास ही खड़ा था। मैंने आंख से, कुहनी के टहूके से, खंखार के, बहुतेरे इशारे किये कि अल्लाह के बंदे! अब तो बस कर। हद ये कि मैंने दायें कूल्हे पर चुटकी काटी को बायां भी मेरी तरफ़ करके खड़ा हो गया। स्कूल की बड़ी भद पिटी। सब मुंह पर रूमाल रखे हंसते रहे मगर वो आसमान की तरफ़ मुंह किये रांड-बेवाओं की जान को रोता रहा। एक मीरासी, जिसके जरिये मैंने कार्ड बंटवाये थे, ने मुझे बताया इस बेहया ने दो तीन सुर मालकोंस के भी लगा दिये। लोगों ने दिल-ही-दिल में कहा होगा कि मैं शायद मौलाना हाली की आड़ में विधवा आश्रम खोलने की जमीन तैयार कर रहा हूं। बाद को मैंने आड़े हाथों लिया तो कहने लगा, सब की किताबें खंगाल डालीं। यतीम पर कोई नज्म नहीं मिली। सितम ये है कि मीर तक़ी मीर, जो ख़ुद बचपने में यतीम हो गये थे, ने मोहनी नाम की बिल्ली और कुतिया पर तो प्रशंसा में काव्य लिखे पर मासूम यतीमों पर फ़ूटे मुंह से एक लाइन न कह के दी। इस तरह मिर्जा ग़ालिब ने सेहरे के लिये, प्रशंसा में क़सीदे लिखे। बेसनी रोटी, डोमनी की तारीफ़ में शेर कहे, दो कौड़ी की छाली को सरे-पिस्ताने-परीजाद (परी के स्तन का अगला भाग) से भिड़ा दिया मगर यतीमों के बारे में एक शेर भी नहीं कहा। अब हर किताब से मायूस हो गया तो मुझे एक दम ख़याल आया कि यतीमों और बेवाओं का चोली-दामन का साथ है। विषय एक और दुख साझा, सो ग़ुलाम ने मुनाजाते-बेवा पढ़ दी। महान रचना है। तीन साल से आठवीं के इम्तहान में इस पर बराबर सवाल आ रहे हैं। चुनांचे मैंने भी ग़ुलाम को उसकी महान रचना और चोली-दामन समेत खड़े-खड़े डिसमिस कर दिया। कुछ दिन बाद उस हरामख़ोर ने मेरे ख़िलाफ़ इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल से शिकायत की। उसमें ये भी लिक्खा है कि मैंने अपने नहाने के लिये पांच मर्तबा बाल्टी में पानी मंगवाया। सरासर झूठ बोला। मैंने पन्द्रह-बीस बार मंगवाया था। घड़े में भर के छलकाता लाया था।

मौलवी मुजफ़्फ़र की बुराइयां बिल्कुल स्पष्ट और अच्छाइयां आंखों से छुपी हुई थीं। वो बिशारत के अंदाजे और अंदेशे से जियादा जहीन और काइयां निकले। ऐसे ठूंठ जाहिल नहीं थे, जैसा दुश्मनों ने मशहूर कर रखा था। रहन-सहन में एक सादगी और सादगी में इक टेढ़। कानों और जबान के कच्चे, मगर धुन के पक्के थे। उन्हीं का हौसला था कि बारह साल से बग़ैर साधन के लश्तम-पश्तम स्कूल चला रहे थे। उसे चलाने के लिये उनकी निगाह में हर क़िस्म की धांधली उचित थी। स्कूल की हालत ख़राब बताई जाती थी। आये दिन मास्टरों से दर्द भरी अपील की जाती थी कि आप दिल खोल कर चंदा और दान दें। पांच-छः महीने की नौकरी के दौरान उन्हें कुल साठ रुपये मिले थे, जो स्कूल एकाउंट की किताबों में क़र्ज के तौर पर दिखाये गये थे। अब उन्हें तनख़्वाह का तक़ाजा करते हुए भी डर लगता था कि क़र्ज बढ़ता जा रहा था। इधर न मिली तन्ख़्वाह की राशि बढ़ती जाती, उधर मौली मज्जन का लहजा रेशम और बातें लच्छेदार होती जातीं। बिशारत ने एक दिन दबे शब्दों में तक़ाजा किया तो कहने लगे, “बेटे! मैं तुम्हारे बाप की तरह हूं मेरी समझ में नहीं आता तुम इस अकेली देह में इतने रुपयों का क्या करोगे? छड़े-छटांक आदमी हो। अकेले घर में बेतहाशा नक़दी रखना जोखिम का काम है। रात को तुम्हारी तरफ़ से मुझे डर ही लगा रहता है। सुल्ताना डाकू ने तबाही मचा रखी है।“ बहरहाल इस तक़ाजे का इतना असर जुरूर हुआ कि दूसरे दिन से उन्होंने उनके घर एक मटकी छाछ की भेजनी शुरू कर दी।

तहसीलदार ने कभी रुपये-पैसे से तो कोई बर्ताव नहीं किया, अलबत्ता एक दो गड्डी पालक या चने का साग, कभी हिरन की टांग, कभी एक घड़ा गन्ने का रस या दो-चार भेलियां गुड़ की साथ कर देता। ईद पर एक हांडी सन्डीले के लड्डुओं की और बक़रईद पर एक नर बकरे का सर भी दिया। उतरती गर्मियों में चार तरबूज फटी बोरी में डलवा कर साथ कर दिये। हर क़दम पर निकल-निकल पड़ते थे। एक को पकड़ते तो दूसरा लुढ़क कर किसी और राह पर बदचलन हो जाता। जब बारी-बारी सब तड़ख़ गये तो आधे रास्ते में ही बोरी एक प्याऊ के पास पटक कर चले आये। उनके बहते रस को एक प्यासा सांड, जो पंडित जुगल किशोर ने अपने पिताजी की याद में छोड़ा था, तब तक चाव और तल्लीनता से चाटता रहा जब तक एक अल्हड़ बछिया ने उसका ध्यान उत्तम से सर्वोत्तम की ओर भटका न दिया।

जनवरी की बारिश में उनके ख़स की टट्टियों के मकान का छप्पर टपकने लगा तो तहसीलदार ने दो गाड़ी पूले मुफ़्त डलवा दिये और चार छप्पर बांधने वाले बेगार में पकड़ कर लगवा दिये। क़स्बे के तमाम छप्पर बारिश धूप और धुएं से काले पड़ गये थे, अब सिर्फ़ उनका छप्पर सुनहरा था। बारिश के बाद चमकीली धूप निकलती तो उस पर किरन-किरन अशरफ़ियों की बौछार होने लगती। इसके अलावा तहसीलदार ने लिहाफ़ के लिये बारीक धुनकी हुई रूई की एक बोरी और मुर्ग़ाबी के परों का एक तकिया भी भेजा जिसके ग़िलाफ़ पर नाजो ने एक गुलाब का फूल काढ़ा था। (बिशारत इस तकिये पर उल्टे यानी पेट के बल सोते थे……फूल पर नाक और होंठ रख कर)

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया

पहला भाग

आइडियल यतीम का हुलिया : यतीम जमा करना बिशारत को चंदा जमा करने से भी मुश्किल नजर आया, इसलिये कि मौली मज्जन ने यह पख़ लगा दी कि यतीम तन्दरुस्त और मुस्टण्डे न हों। सूरत से भी दीन, दरिद्र मालूम होने चाहिये। लम्बे-चौड़े न हों, न इतने छोटे टुइयां कि चोंच में चुग्गा देना पड़े। न इतने ढऊ के ढऊ और पेटू कि रोटियों की थई-की-थई थूर जायें और डकार तक न लें, पर ऐसे गुलबदन भी नहीं कि गाल पर एक मच्छर का साया पड़ जाये तो शहजादा गुलफ़ाम को मलेरिया हो जाये। फिर बुख़ार में दूध पिलाओ तो एक ही सांस में बाल्टी की बाल्टी डकोस जायें। बाजा-बाजा लौंडा टख़ने तक पोला होता है। लड़के बाहर से कमजोर मगर अन्दर में बिल्कुल तन्दुरुस्त होने चाहिये। न ऐसे नाजुक कि पानी भरने कुएं पर भेजो तो डोल के साथ ख़ुद भी खिंचे कुएं के अन्दर चले जा रहे हैं। भरा घड़ा सर पे रखते ही कत्थकों-नचनियों की तरह कमर लचका रहे हैं। रोज एक घड़ा तोड़ रहे हैं। जब देखो हराम की औलाद सुबूत में टूटे घड़े का मुंह लिये चले आ रहे हैं। अबे मुझे क्या दिखा रहा है! ये हंसली अपनी मय्या-बहना को पहना। छोटे क़द और बीच की उम्र के हों। इतने बड़े और ढ़ीठ न हों कि थप्पड़ मारो तो घंटे भर तक हाथ झनझनाता रहे और उन हरामियों का बाल भी बांका न हो। जाड़े में जियादा जाड़ा न लगता हो। यह नहीं कि जरा-सी सर्दी बढ़ जाये तो सारे क़स्बे में कांपते, कंपकंपाते, किटकिटाते फिर रहे हैं और यतीमखाने को मुफ़्त में बदनाम कर रहे हैं। यह जुरूर तसदीक़ कर लें कि रात को बिस्तर में पेशाब न करते हों। ख़ानदान में ऐब और सर में लीखें न हों। उठान के बारे में मौली मज्जन ने स्पष्ट किया कि इतनी संतुलित बल्कि हल्की हो कि हर साल जूते और कपड़े तंग न हों। अंधे, काने, लूले, लंगड़े, गूंगे, बहरे न हों मगर लगते हों। लौंडे सुन्दर हरग़िज न हों, मुंह पर मुंहासे और नाक लम्बी न हो। ऐसे लौंडे आगे चलकर लूती (जनख़े) निकलते हैं। वो आइडियल यतीम का हुलिया बयान करने लगे तो बार-बार बिशारत की तरफ़ इस तरह देखते कि जैसे आर्टिस्ट पोट्रेट बनाते वक़्त मॉडल का चेहरा देख-देख कर आउट लाइन उभारता है। वो बोलते रहे मगर बिशारत का ध्यान कहीं और था। उनके जहन में एक-से-एक मनहूस तस्वीरें उभर रहीं थीं, जिसमें वो ख़ुद को किसी तरह फ़िट नहीं कर पा रहे थे।

अच्छा! आप उस लिहाज से कह रहे हैं : बिशारत की नियुक्ति तो उर्दू पढ़ाने के लिये हुई थी, मगर टीचरों की कमी के कारण उन्हें सभी विषय पढ़ाने पड़ते थे, सिवाय धार्मिक विषय के। जामा मस्जिद धीरजगंज के पेश-इमाम ने यह फ़तवा दिया था कि जिस शख़्स के घर में कुत्ता हो वो धर्मशास्त्र पढ़ाये तो पढ़नेवालों को आवश्यक रूप से स्नान करना पड़ेगा। बिशारत का गणित, ज्योमेट्री और अंग्रेजी बहुत कमजोर थी, लेकिन वो इस हैंडीकैप से जरा जो परेशान हुए हों। पढ़ाने के गुर उन्होंने मास्टर फ़ाख़िर हुसैन से सीखे थे। मास्टर फ़ाख़िर हुसैन का विषय तो इतिहास था लेकिन अक्सर उन्हें मास्टर मेंडीलाल की इंग्लिश की क्लास भी लेनी पड़ती थी। मास्टर मेंडीलाल का गुर्दा और ग्रामर दोनों जवाब दे चुके थे। अक्सर देखा गया था कि जिस दिन नवीं-दसवीं की ग्रामर की क्लास होती वो घर बैठ जाता। उसके गुर्दे में ग्रामर का दर्द उठता था। सब टीचर अपने विषय के अतिरिक्त दूसरा विषय पढ़ाने में कचियाते थे। मास्टर फ़ाख़िर हुसैन अकेले शिक्षक थे जो हर विषय पढ़ाने के लिये हर वक़्त तैयार रहते, हालांकि उन्होंने बी.ए., वाया भटिंडा किया था मतलब ये कि पहले मुंशी फ़ाजिल किया था। इंग्लिश ग्रामर उन्हें बिल्कुल नहीं आती थी। वो चाहते तो अंग्रेजी ग्रामर का घंटा हँस बोल कर या नसीहत करने में गुजार सकते थे लेकिन उनकी अन्तरात्मा ऐसे समय नष्ट करने के कामों की अनुमति नहीं देती थी। दूसरे मास्टरों की तरह वो लड़कों को व्यस्त रखने के लिये इमला भी लिखवा सकते थे, मगर वो इस बहाने को अपनी विद्वता का अपमान समझते थे, इसलिये जिस भारी पत्थर को सब चूम कर छोड़ देते वो उसे अपने गले में बांध कर ज्ञान के समुद्र में कूद पड़ते। पहले ग्रामर की अहमियत पर लैक्चर देते हुए यह बुनियादी नुक्ता बयान करते कि जैसे हमारी गायकी की बुनियाद तबले पर है, गुफ़्तगू की बुनियाद गाली पर है, इसी तरह अंग्रेजी की बुनियाद ग्रामर पर है। अगर कमाल हासिल करना है तो बुनियाद मजबूत करो। मास्टर फ़ाख़िर हुसैन की अपनी अंग्रेजी, इमारत निर्माण का अद्भुत नमूना और संसार के सात आश्चर्यों में से एक थी, मतलब यह कि बग़ैर नींव के थी। कई जगह तो छत भी नहीं थी और जहां थी, उसे चमगादड़ की तरह अपने पैरों की अड़वाड़ से थाम रखा था। उस जमाने में अंग्रेजी भी उर्दू में ही पढ़ाई जाती थी, लिहाजा कुछ गिरती हुई दीवारों को उर्दू शेरों के पुश्ते थामे हुए थे। बहुत ही मंझे हुए और घिसे हुए मास्टर थे। कड़े-से-कड़े समय में आसानी से निकल जाते थे। मिसाल के तौर पर Parsing करवा रहे हैं। अपनी जानकारी में निहायत आसान सवाल से शुरूआत करते। ब्लैक बोर्ड पर ‘टू गो’ लिखते और लड़कों से पूछते, अच्छा बताओ यह क्या है? एक लड़का हाथ उठा कर जवाब देता, Simple Infinite! स्वीकार में गर्दन हिलाते हुए फ़र्माते, बिल्कुल ठीक, लेकिन देखते कि दूसरा उठा हुआ हाथ अभी नहीं गिरा। उससे पूछते, आपको क्या तकलीफ़ है? वो कहता, नहीं सर! Noun Infinite है। फ़र्माते अच्छा आप उस लिहाज से कह

रहे हैं। अब क्या देखते हैं कि क्लास का सबसे जहीन लड़का अभी तक हाथ उठाये हुए है। उससे कहते, आपका सिगनल अभी तक डाउन नहीं हुआ। कहिये! कहिये! वो कहता, ये Gerundial Infinite है जो Reflexive Verb से अलग होता है, नेस्फ़ील्ड ग्रामर में लिखा है। इस मौके पर मास्टर फ़ाख़िर हुसैन को पता चल जाता कि गहरे समन्दरों में सफ़र कर रहे हैं हम। लेकिन बहुत सहज और ज्ञानपूर्ण अन्दाज में फ़र्माते अच्छा तो आप गोया इस लिहाज के कह रहे हैं। इतने में नजर उस लड़के के उठे हुए हाथ पर पड़ी जो एक कान्वेन्ट से आया था और फ़र-फ़र अंग्रेजी बोलता था। उससे पूछा, ‘‘वेल! वेल! वेल!’’ उसने जवाब दिया, “Sir I am afraid, this is an Intransitive Verb”अच्छा! तो गोया आप उस लिहाज से कह रहे हैं’’ फिर I am afraid के मुहावरे से अपरिचित होने के कारण बहुत प्यार भरे अंदाज में पूछा, बेटे! इसमें डरने की क्या बात है? अक्सर फ़र्माते कि इंसान को ज्ञान की खोजबीन का दरवाजा हमेशा खुला रखना चाहिये। ख़ुद उन्होंने सारी उम्र बारहदरी में गुजारी। अब ऐसे टीचर कहां जिनके अज्ञान पर भी प्यार आये।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
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यह रुत्ब-ए-बुलंद मिला जिसको मिल गया : तहसीलदार ने जनाने से अपने बेटों को बुलाया और उनसे कहा-चचाजान को आदाब करो। यह कल से तुम्हें पढ़ाने आयेंगे। बड़े और छोटे ने आदाब किया। मंझले ने दायें हाथ से ओक बनाया और झुक-झुक कर दो बार आदाब करने के बाद तीसरी बार झुका तो साथ ही मुंह भी चिढ़ाया।

अब तहसीलदार का मूड बदल चुका था। लड़के लाइन बना कर वापस चले गये तो वो बिशारत से कहने लगा ‘‘परसों ज्योग्राफ़ी की टीचर की जगह के लिये इन्टरव्यू है। मैं आपको सैलेक्शन कमेटी का मैम्बर बना रहा हूं। धार्मिक विषयों का टीचर इस लायक़ नहीं कि कमेटी का मैम्बर रहे। मौली मज्जन को ख़बर कर दी जायेगी। यह सुनते ही बिशारत को गुदगुदियां होने लगीं। उस वक़्त कोई उन्हें वायसराय बना देता तब भी इतनी ख़ुशी न होती। अब वो भी इन्टरव्यू में अच्छे-अच्छों को ख़ूब रगेदेंगे और पूछेंगे कि मियां तुम डिग्रियां बग़ल में दबाये अफ़लातून बने फिरते हो, जरा यह तो बताओ कि दुनिया गोल क्यों बनायी गयी है? बड़ा मजा आयेगा। यह इज्जत किसे नसीब होती है कि अकारण जलील होने के फ़ौरन बाद दूसरों को अकारण जलील करके हिसाब बराबर कर दे। उनके घायल स्वाभिमान के सारे घाव पल भर में भर गये।

मारे ख़ुशी के वो यह भी स्पष्ट करना भूल गये कि बन्दा हर इन्टरव्यू के बाद न आवाज लगायेगा, न घंटा बजायेगा। चलने लगे तो तहसीलदार ने मटमैले क़ानूनगो को आंखों से कुछ इशारा किया और उसने पन्द्रह सेर गेहूं और एक हांडी गन्ने के रस की साथ कर दी। उसे यह भी हिदायत दी कि कल मास्टर साहब के घर जवासे की एक गाड़ी डलवा देना और बेगार में किसी पन्नीगर को भेज देना कि हाथों-हाथ टट्टी बना दे। उस जमाने में जो लोग ख़स की क्षमता नहीं रखते थे वो जवासे के कांटों की टट्टी पर सब्र करते थे और जो इस क़ाबिल भी नहीं होते थे, वो ख़स की पंखिया पर कोरी ठिलिया का पानी छिड़क लेते। उसे झलते-झलते जब नींद का झोंका आता तो ‘‘ख़सख़ाना-ओ-बर्फ़ाब की ख़्वाबनाक ख़ुन्कियों’’ में उतरते चले जाते।

उर्दू टीचर के कर्मक्षेत्र से बाहर के दायित्व : अगले दिन बिल्कलु तडक़े बिशारत अपनी ड्यूटी पर हाजिर हो गये। मौलवी मुजफ़्फ़र ने उनसे ड्यूटी ज्वाइन करने की लिखित रिपोर्ट ली कि आज सुब्ह ग़ुलाम ने नियमानुसार चार्ज संभाल लिया।चार्ज बहुत धोके में डालने वाला शब्द है वरना हक़ीक़त सिर्फ़ इतनी थी कि जो चीजें चार्ज में दी गयी थीं वो बग़ैर चार्ज के भी कुछ ऐसी असुरक्षित न थीं।

खादी का डस्टर-डेढ़ अदद, हाथ का पंखा-एक अदद रजिस्टर हाजरी-एक अदद मिट्टी की दवात-दो अदद। मौलवी मुजफ़्फ़र ने ब्लैक बोर्ड का डस्टर उन्हें सौंपते हुए चेतावनी दी कि देखा गया है मास्टर साहिबान चाक के मुआमले में बहुत फ़ुजूलख़र्ची करते हैं, इसलिये स्कूल की कमेटी ने यह फ़ैसला किया है कि आइन्दा मास्टर साहिबान चाक ख़ुद ख़रीद कर लायेंगे। खजूर के पंखे के बारे में भी उन्होंने सूचना दी कि गर्मियों में एक ही उपलब्ध कराया जायेगा। मास्टर बिल्कुल लापरवाह साबित हुए हैं। दो ही हफ़्तों में सारी बुनाई उधड़ कर झंतूरे निकल आते हैं और अक्सर मास्टर साहिबान छुट्टी के दिन स्कूल का पंखा घर में इस्तेमाल करते हुए देखे गये हैं। कई तो इतने आरामतलब और काहिल हैं कि उसी की डंडी से लौडों को मारते हैं, हालांकि दो क़दम पर नीम का पेड़ बेकार खड़ा है। हां! मौलवी मुजफ़्फ़र ने एक होल्डर (लकड़ी का निब वाला क़लम) भी उनके चार्ज में दिया जो उनके पूर्ववर्तियों ने दातुन की तरह इस्तेमाल किया था। इसका आधे से अधिक हिस्सा चिन्तन-मनन के समय लगातार दांतों में दबे रहने के कारण झड़ गया था। बिशारत को इस ग़लत इस्तेमाल पर बहुत ग़ुस्सा आया कि वो अब इससे नाड़ा नहीं डाल सकते थे।

चार्ज पूरा होने के बाद बिशारत ने कोर्स की किताबें मांगी तो मौलवी मुजफ़्फ़र ने सूचना दी कि स्कूल कमेटी के रिजोल्यूशन नं.-5 तारीख़ 3 फ़रवरी 1935 के अनुसार मास्टर को कोर्स की किताबें अपनी जेब से खरीद कर लानी होगी। बिशारत ने जल कर पूछा “सब’’ यानी कि पहली क्लास से लेकर आठवीं तक? फ़रमाया, “तो क्या आपका ख़याल है आप पहली क्लास के क़ायदे से आठवीं का इन्तहान दिलवा देंगे।“

मौलवी मुजफ़्फ़र ने चलते-चलते यह भी सूचना दी कि स्कूल कमेटी फ़िजूल के ख़र्चे कम करने की ग़रज से ड्रिल मास्टर की पोस्ट ख़त्म कर रही है। ख़ाली घंटों में आप पड़े-पड़े क्या करेंगे? स्टाफ़-रूम ठाली मास्टरों के ऐंडने और लोटें लगाने के लिये नहीं है। खाली घंटों में ड्रिल करा दिया कीजिये, (पेट की तरफ़ इशारा करके) बादी भी छंट जायेगी। जवान आदमी को चाक-चैबंद रहना चाहिये। बिशारत ने विनम्र अस्वीकार से काम लेते हुए कहा ‘‘मुझे ड्रिल नहीं आती।’’ बहुत मीठे और धीमे लहजे में उत्तर मिला, “कोई बात नहीं, कोई भी मां के पेट से ड्रिल करता हुआ तो पैदा नहीं होता, किसी भी लड़के से कहियेगा, सिखा देगा। आप तो माशाअल्लाह से जहीन आदमी हैं। बहुत जल्द सीख जायेंगे। आप तो टीपू सुल्तान और स्पेन के जीतने वाले तारिक़ का नाम लेते हैं।“

बिशारत बड़ी मेहनत और लगन से उर्दू पढ़ा रहे थे कि दो ढाई हफ़्ते बाद मौलवी मुजफ़्फ़र ने अपने दफ़्तर में तलब किया और फ़र्माया कि आप तो मुसलमान के बेटे हैं जैसा कि आपने दरख़्वास्त में लिखा था। अब जल्दी से जनाज़े की नमाज पढ़ाना और नियाज देना सीख लीजिये। वक़्त, बेवक़्त, जुरूरत पड़ती रहती है। नमाज़े-जनाजा तो कोर्स में भी है। हमारे जमाने में तो स्कूल में शवस्नान भी कम्पलसरी था। धार्मिक विषय के टीचर की बीबी पर बाराबंकी में जिन्न दोबारा सवार हो गया है। रातों को चारपाई उलट देता है। उसे उतारने जा रहा है। पिछले साल एक पड़ौसी का जबड़ा और दो दांत तोड़ कर आया था। उसकी जगह आपको काम करना होगा। जाहिर है! उस हरामख़ोर के बदले काम करने के लिये आसमान से फ़रिश्ते तो आने से रहे।

तीन-चार दिन का भुलावा दे कर मौलवी मुजफ़्फ़र ने पूछा, ‘‘बर्ख़ुरदार आप इतवार को क्या करते रहते हैं?’’ बिशारत ने जवाब दिया, ‘‘कुछ नहीं।’’ फ़रमाया, “तो यूं कहिये! केवल सांस लेते रहते हैं। यह तो बड़ी बुरी बात है। सर मुहम्मद इकबाल ने कहा है कभी ऐ नौजवां मुस्लिम तदब्बुर भी किया तूने, जवान आदमी को इस तरह हाथ पर हाथ धरे बेकार नहीं बैठना चाहिये। जुमे को स्कूल की छुट्टी जल्दी हो जाती है। नमाज के बाद यतीमखाने की चिट्ठी-पत्री देख लीजिये। आप तो घर के आदमी हैं आप से क्या परदा, आपकी तनख़्वाहें दरअस्ल यतीमख़ाने के चंदे से ही दी जाती हैं। तीन महीने से रुकी हुई हैं। मेरे पास इलाहदीन का चराग़ तो है नहीं। दरअस्ल यतीमों पर इतना खर्च नहीं आता, जितना आप हजरात पर। इतवार को यतीमख़ाने के चंदे के लिये अपनी साइकिल ले कर निकल जाया कीजिये। पुण्य कार्य भी है और आपको बेकारी की लानत से भी छुटकारा मिल जायेगा, सो अलग। आस-पास के देहात में अल्लाह के करम से मुसलमानों के काफ़ी घर हैं। तलाश करने से ख़ुदा मिल जाता है। चंदा देने वाले किस खेत की मूली हैं।’’

बिशारत अभी सोच ही रहे थे कि चंदा देनेवाले को कैसे पहचानें और ढूंढ़ेंगे कि इतने में सर पर दूसरा बम गिरा। मौलवी मुजफ़्फ़र ने कहा कि चंदे के अलावा आस-पास के देहात से सही यतीम भी तलाश कर लाने होंगे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

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हुजूर फैजगंजूरू तहसीलदार साहब : दूसरे दिन बिशारत अपनी सारी दुनिया टीन के ट्रंक में समेट कर धीरजगंज आ गये। ट्रंक पर उन्होने एक पेंटर को चार आने दे कर अपना नाम, डिग्री, तख़्ल्लुस सफ़ेदे से पेंट करवा लिये। जो बड़ी कठिनाई से दो लाइनों में (बक्से की) समा पाये। यह ट्रंक उनकी पैदाइश से पहले का था, मगर उसमें चार लीवर वाला नया पीतली ताला डाल कर लाये थे। इसमें कपड़े इतने कम थे कि रास्ते भर, अन्दर रखा हुआ मुरादाबादी लोटा ढोलक बजाता आया। इसके शोर मचाने की एक वजह यह भी हो सकती है कि उनके ख़जाने में यह ताजा क़लई किया हुआ लोटा ही सबसे क़ीमती चीज था। अभी उन्होंने मुंह भी नहीं धोया था कि तहसीलदार का चपरासी एक लट्ठ और यह पैग़ाम ले कर आ धमका कि तहसीलदार साहब बहादुर ने याद फ़र्माया है। उन्होंने पूछा, “अभी!” बोला “और क्या! फ़ौरन से पेश्तर! बिलमवाजा, असालतन” चपरासी के मुंह से यह मुंशियाना जबान सुन कर उन्हें हैरत हुई और ख़ुशी भी, जो उस वक़्त ख़त्म हुई जब उसने यह पैग़ाम लाने का इनाम, दोपहर का खाना और सफ़रख़र्च इसी जबान में तलब किया। कहने लगा तहसील में यही दस्तूर है। बन्दा तो चाकर है। जब तक वो इन इच्छाओं पर ग़ौर करें, वो लट्ठ की चांदी की शाम को मुंह की भाप और अंगोछे से रगड़-रगड़ कर चमकाता रहा।

झुलसती, झुलसाती दोपहर में बिशारत डेढ़-दो मील पैदल चलकर हांपते-कांपते तहसीलदार के यहां पहुंचे तो वो दोपहर की नींद ले रहा था। एक-डेढ़ घंटे इंतजार के बाद वो अंदर बुलाये गये तो ख़स की ट्टटी की महकती ठंडक जिस्म में उतरती चली गई। लू से झुलसती हुई आंखों में एक दम ठंडी-ठंडी रौशनी-सी आ गयी। ऊपर छत से लटका हुआ झालरदार पंखा हाथी के कान की तरह हिल रहा था। फ़र्श पर बिछी चांदनी की उजली ठंडक उनकी जलती हुई हथेली को बहुत अच्छी लगी। जब इसकी तपिश से चांदनी गर्म हो जाती तो वो हथेली खिसका कर दूसरी जगह रख देते। तहसीलदार बड़े तपाक और प्यार से पेश आया। बर्फ़ में लगे हुए तरबूज की एक फांक और छिले हुए सिंघाड़े पेश करते हुए बोला, “तो अब अपने कुछ शेर सुनाइये जो बेतुके न हों, छोटी बहर में न हों, वज्न और तहजीब से गिरे हुए न हों।“ बिशारत शेर सुना कर दाद पा चुके तो उसने अपनी एक ताजा नज्म सुनाई।

वो अपनी रान खुजाये चला जा रहा था। टांगों पर मढ़े हुए चूड़ीदार पाजामे में न जाने कैसे एक भुनगा घुस गया था और वो ऊपर ही ऊपर चुटकी से मसलने की बार-बार कोशिश कर रहा था। कुछ देर बाद एक सुन्दर कमसिन नौकरानी नाजो ताजा तोड़े हुए फ़ालसों का शर्बत लायी। तहसीलदार कनखियों से बराबर बिशारत को देखता रहा कि नाजो को देख रहे हैं या नहीं। मोटी मलमल के सफ़ेद कुरते में क़यामत ढा रही थी। वो गिलास देने के लिए झुकी तो उसके बदन से जवान पसीने की महक आई और उनका हाथ उसके चांदी के बटनों के घुंघरूओं को छू गया। उसका आड़ा पाजामा रानों पर से कसा हुआ था और पैवंद के टांके दो-एक जगह इतने बिकसे हुए थे कि नीचे चंमेली बदन खिलखिला रहा था। शरबत पी चुके तो तहसीलदार कहने लगा कि आज तो ख़ैर आप थके हुए होंगे,

कल से मेरे बच्चों को उर्दू पढ़ाने आइये। जरा खिलन्दड़े हैं। तीसरे ने तो अभी क़ायदा शुरू ही किया है। बिशारत ने अनाकानी की तो एकाएक उसके तेवर बदल गये। लहजा कड़ा और कड़वा होने लगा। कहने लगा, जैसा कि आपको बख़ूबी मालूम था, है और हो जायेगा, आपकी अस्ल तनख़्वाह पच्चीस रुपये ही है। मैंने जो स्वयं पन्द्रह रुपये बढ़ाकर चालीस कर दिये तो दरअस्ल पांच रुपये फ़ी बच्चा ट्यूशन थी, वरना मेरा दिमाग़ थोड़े ही ख़राब हुआ था कि कालेज के निकले हुए नये बछड़े को मुसलमानों की गाढ़ी कमाई के चन्दे से पन्द्रह रुपये की नजर पेश करता। आख़िर को ट्रस्टी की कुछ जिम्मेदारी होती है। आपको मालूम होना चाहिए कि ख़ुद स्कूल के हैडमास्टर की तनख़्वाह चालीस रुपये है और वो तो बी.ए., बी. टी. (अलीगढ़) सैकिण्ड डिवीजन है। अमरोहे का है मगर निहायत शरीफ़ सय्यद है। अलावा, आप की तरह “सर मुंडवा के इश्क़िया शेर नहीं कहता।“

अंतिम सात शब्दों में उसने उनके व्यक्तित्व का ख़ुलासा निकाल कर रख दिया और वो ढह गये। उन्होंने बड़ी विनम्रता से गिड़गिड़ा कर पूछा, ‘‘क्या कोई Alternative बन्दोबस्त नहीं हो सकता।’’ तहसीलदार चिढ़ावनी हंसी हंसा। कहने लगा, ‘‘जुरूर हो सकता है। वो ऑल्टरनेटिव बन्दोबस्त ये है कि आपकी तनख़्वाह वही पच्चीस रुपये रहे और आप इसी में मेरे बच्चों को भी पढ़ायेंगे। आया ख़याले-शरीफ़ में? बर्ख़ुरदार, अभी आपने दुनिया नहीं देखी। मैं आपके हाथ में दो कबूतर देता हूं, आप यह तक तो बता नहीं सकते कि इनमें मादा कौन सी है?

उनके जी में तो बहुत आया कि पलट कर जवाब दें कि कोलम्बस साहब, अगर इसी डिस्कवरी का नाम दुनिया देखना है, तो यह काम कबूतर कहीं बेहतर तरीके से अंजाम दे सकते हैं। इतने में तहसीलदार दो-तीन बार जोर-जोर से खांसा तो थोड़ी दूर एक कोने में दुबका धूल में अटा क़ानूनगो लपक कर बिशारत के पास आया और उनकी ठुड्डी में हाथ देते हुए कहने लगा, आप सरकार के सामने कैसी बचकानी बातें कर रहे हैं। यह इज्जत किसे नसीब होती है। सरकार झूठों भी इशारा कर दें तो लखनऊ यूनिवर्सिटी के सारे प्रोफ़ेसर हाथ बांधे सर के बल चल कर आयें। सरकार को तीन बार डिप्टी कलेक्टरी ऑफ़र हो चुकी है मगर सरकार ने हर बार हिक़ारत से ठोकर मार दी कि मैं स्वार्थी हो जाऊं और डिप्टी कलेक्टर बन कर चला जाऊं तो तहसील धीरजगंज का स्टाफ़ और प्रजा कहेगी कि सरकार हमें बीच मंझधार में किस पर छोड़े जाते हो।

बिशारत स्तब्ध रह गये, मर्द ऐसे मौक़ों पर ख़ून कर देते हैं और नामर्द ख़ुदकुशी कर लेते हैं। उन्होंने यह सब कुछ नहीं किया, नौकरी की जो क़त्ल और ख़ुदकुशी दोनों से कहीं जियादा मुश्किल है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

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बिशारत ने दोपहर का खाना यतीमख़ाने के बजाय मौलवी बादल (इबादुल्ला) के यहां खाया जो इसी स्कूल में फ़ारसी पढ़ाते थे। मक्खन में चुपड़ी हुई गरम रोटी के साथ आलू का भुरता और लहसुन की चटनी मजा दे गई। मौलवी बादल ने अपनी आत्मीयता और सहयोग का यक़ीन दिलाते हुए कहा कि बरख़ुरदार! मैं तुम्हें खोंते रफ़ू करना, आटा गूंधना और हर तरह का सालन पकाना सिखा दूंगा। ख़ुदा की क़सम! बीबी की जुरूरत ही महसूस न होगी। लगे हाथ उन्होंने मूली की भुजिया बनाने की जो तरकीब बताई वो ख़ासी पेचीदा और खतरनाक थी। इसलिये कि इसकी शुरूआत मूली के खेत में पौ फटने से पहले जाने से होती थी। उन्होंने हिदायत की कि देहात की तहजीब के ख़िलाफ़ लहलहाते खेत में तड़के मुंह उठाये न घुस जाओ, बल्कि मेंड़ पर पहले इस तरह खांसो-खंखारो जिस तरह बेकिवाड़ या टाट के परदे वाले पाख़ाने में दाख़िल होने से पहले खंखारते हैं। इसके बाद यह हिदायत की कि टख़ने से एक बालिश्त ऊंचा लहंगा और हंसली से दो बालिश्त नीची चोली पहनने वाली खेत की मालकिन से ताजा गदरायी हुई मूली की जगह और उसे तोड़ने की इजाजत कैसे ली जाये कि नजर देखने वाली पर न पड़े। यह भी इरशाद फ़रमाया कि चमगादड़ सब्जियां वायु खोलने वाली होती हैं। इससे उनका तात्पर्य उन पौधों से था जो अपने पैर आसमान की तरफ़ किये रहते हैं। जैसे गाजर, गोभी, शलग़म। फिर उन्होंने पत्ते देख कर यह पहचानना बताया कि कौन-सी मूली तीखी फुफ्फुस निकलेगी और कौन-सी जड़ेली और मछेली। ऐसी तेजाबी कि खाने वाला खाते वक़्त मुंह पीटता फिरे और खाने के बाद पेट पीटता फिरे और कोई ऐसी सुडौल चिकनी और मीठी कि बेतहाशा जी करे कि काश गज भर की होती। उन्होंने यह भी बताया कि कभी ग़लती से तेजाबी मूली उखाड़ लो तो फेंको मत। इसका अर्क़ निकाल कर ऊंट की खाल की कुप्पी में भर लो। चालीस दिन बाद जहां दाद या एक्जीमा हो वहां फुरैरी से लगाओ। अल्लाह ने चाहा तो खाल ऐसी आयेगी जैसी नवजात बच्चे की। कुछ अर्से बाद जैसे ही बिशारत ने अपने मामू की एग्जिमा की फुन्सियों पर इस अर्क़ की फुरेरी लगाई, तो बुर्जुगवार बिल्कुल नवजात बच्चे की तरह चीख़ें मारने लगे।

बिशारत इंटरव्यू से फ़ारिग़ हो कर प्रसन्नचित निकले तो कुत्ता उनके साथ नत्थी था। उन्होंने हलवाई से तीन पूरियां और रबड़ी खरीद कर उसे खिलायी। वो उनके साथ लगा-लगा मौलवी बादल के यहां गया। इंटरव्यू में आज जो चमत्कार उनके साथ हुआ उसे उन्होंने उसी के दम-क़दम का जहूरा समझा। कानपुर वापस जाने के लिये वो बस में सवार होने आये तो वो उनसे पहले छलांग लगा कर बस में घुस गया, जिससे मुसाफ़िरों में पहले खलबली, फिर भगदड़ मच गयी। क्लीनर उसे इंजन स्टार्ट करने वाले हैंडिल से मारने दौड़ा तो उन्होंने लपक कर उसकी कलाई मरोड़ी। कुत्ता लारी की छत पर खड़ा उनके साथ कानपुर आया। ऐसे वफ़ादार कुत्ते को कुत्ता कहते उन्हें शर्म आने लगी। उन्होंने उसी वक़्त उसका नाम बदल कर लार्ड डलहौजी रखा, जो उस जनरल का नाम था जिससे मुक़ाबला करते हुए टीपू की मृत्यु हुई थी। कानपुर पहुंकर उन्होंने पहली बार उस पर हाथ फेरा। उन्हें अंदाजा नहीं था कि कुत्ते का जिस्म इतना गर्म होता है। उस पर जगह-जगह लड़कों के पत्थरों से पड़े हुए जख़्मों के निशान थे। उन्होंने उसके लिये एक ख़ूबसूरत कालर और जंजीर ख़रीदी।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

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इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या?

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

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इंटरव्यू से पहले तहसीलदार ने गला साफ़ करके सबको खामोश किया तो ऐसा सन्नाटा छाया कि दीवार पर लटके हुए क्लाक की टिक-टिक और मौलवी मुजफ़्फ़र के हांफने की आवाज साफ़ सुनाई देने लगी। फिर इंटरव्यू शुरू हुआ और सवालों की बौछार। इतने में क्लाक ने ग्यारह बजाये तो सब दोबारा खामोश हो गये। धीरजगंज में कुछ अर्से रहने के बाद बिशारत को मालूम हुआ कि देहात की तहजीब के मुताबिक़ जब क्लाक कुछ बजाता है तो सब खामोश और बाअदब हो कर सुनते और गिनते हैं कि ग़लत तो नहीं बजा रहा।

इंटरव्यू दोबारा शुरू हुआ तो जिस शख़्स को चपरासी समझे थे, वो खाट की अदवायन पर आ कर बैठ गया। वो धार्मिक विषयों का मास्टर निकला जो उन दिनों उर्दू टीचर की जिम्मेदारी भी निभा रहा था। इन्टरव्यू में सबसे जियादा धर-पटक उसी ने की। मौलवी मुजफ़्फ़र और एक मैम्बर ने भी, जो मुंसिफ़ी अदालत से रिटायर्ड पेशकार थे, ऐंडे-बेंडे सवाल किये। तहसीलदार ने अलबत्ता छिपे-तौर पर मदद और तरफ़दारी की और सिफ़ारिश की लाज रखी। चंद सवालात नक़्ल किये जा रहे हैं। जिससे सवाल करने और जवाब देने वाले दोनों की योग्यता का अंदाजा हो जायेगा।

मौलवी मुजफ़्फ़रः ( कुल्लियाते-मख़मूर’ पर चुमकारने के अंदाज से हाथ फेरते हुए ) शेर कहने के फ़ायदे बयान कीजिये।

बिशारतः (चेहरे पर ऐसा एक्सप्रेशन जैसे आउट आफ़ कोर्स सवाल पूछ लिया हो) शायरी……….मेरा मतलब है, शेर….यानी उसका मक़सद….बात दरअस्ल ये है कि. …शौक़िया…..।

मौलवी मुजफ़्फ़रः अच्छा ख़ालिके-बारी का कोई शेर सुनाइये।

बिशारतः ख़ालिके -बारी सर्जनहार, वाहिद एक बिदा करतार।

पेशकारः आपके बाप, दादा और नाना किस विभाग में नौकर थे?

बिशारतः उन्होंने नौकरी नहीं की।

पेशकारः फिर आप कैसे नौकरी कर सकेंगे। चार पीढ़ियां एक के बाद एक अपना पित्ता मारें तो कहीं जा कर नौकरी की क़ाबिलियत पैदा होती है।

बिशारतः (सीधेपन से) मेरा पित्ता आप्रेशन के जरिये निकाला जा चुका है।

धार्मिक शिक्षकः आप्रेशन का निशान दिखाइये।

तहसीलदारः आपने कभी बेंत का इस्तेमाल किया है?

बिशारतः जी नहीं।

तहसीलदारः कभी आप पर बेंत का इस्तेमाल हुआ है?

बिशारतः अक्सर।

तहसीलदारः तब आप डिसीप्लिन क़ायम कर सकेंगे।

पेशकारः अच्छा यह बताइये दुनिया गोल क्यों बनाई गई है?

बिशारतः (पेशकार को ऐसे देखते हैं जैसे चारों ख़ाने चित्त होने पर पहलवान अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखता है)…

तहसीलदारः पेशकार साहब! इन्होंने उर्दू टीचर की दरख़्वास्त दी है, भूगोल वालों के इंटरव्यू परसों होंगे।

धार्मिक शिक्षकः ब्लैक-बोर्ड पर अपनी राइटिंग का नमूना लिख कर दिखाइये।

पेशकारः दाढ़ी पर आपको क्या ऐतराज है?

बिशारतः कुछ नहीं।

पेशकारः फिर रखते क्यों नहीं?

धार्मिक शिक्षकः आपको चचा से जियादा मुहब्बत है या मामू से।

बिशारतः कभी ग़ौर नहीं किया।

धार्मिक शिक्षकः अब कर लीजिये।

बिशारतः मेरे कोई चचा नहीं हैं।

धार्मिक शिक्षकः आपको नमाज आती है? अपने पिता के जनाजे की नमाज पढ़ कर दिखाइये।

बिशारतः वो जिन्दा हैं।

धार्मिक शिक्षकः लाहौल विला क़ुव्वत, मैंने तो अंदाजा लगाया। तो फिर अपने दादा की पढ़ कर दिखाइये। या आप अभी उनकी कृपा से भी वंचित नहीं हुए हैं।

बिशारतः (भरी आवाज में) उनका इंतक़ाल हो गया है।

मौलवी मुजफ़्फ़रः मुसद्दसे-हाली का कोई बन्द सुनाइये।

बिशारतः मुसद्दस का तो कोई बन्द इस वक़्त याद नहीं आ रहा। हाली की ही मुनाजाते-बेवा के कुछ शेर पेश करता हूं।

तहसीलदारः अच्छा, अब अपना कोई पसन्दीदा शेर सुनाइये जिसका विषय बेवा न हो।

बिशारतः

तोड़ डाले जोड़ सारे बांध कर बन्दे-कफ़न
गोर की बग़ली से चित है पहलवां, कुछ भी नहीं

तहसीलदारः किसका शेर है?

बिशारतः जबान का शेर है।

तहसीलदारः ऐ सुब्हानल्ला! क़ुर्बान जाइये, कैसी-कैसी लफ़्जी रिआयतें और क़यामत के तलामजो बांधे हैं। तोड़ की टक्कर पे जोड़। एक तरफ़ बांधना दूसरी तरफ़ बंद। वाह! वाह! इसके बाद बग़ली क़ब्र और बग़ली दांव की तरफ़ ख़ूबसूरत इशारा, फिर बग़ली दांव से पहलवान का चित होना। आखिर में चित पहलवान और चित मुर्दा और कुछ भी नहीं, कह के दुनिया की नश्वरता को तीन शब्दों में भुगता दिया। ढ़ेर सारे अलंकारों को एक शेर में बंद कर देना चमत्कार नहीं तो और क्या है। ऐसा ठुका हुआ, इतना पुख़्ता और इतना ख़राब शेर कोई उस्ताद ही कह सकता है।

मौलवी मुजफ़्फ़रः आप सादगी पसंद करते हैं या दिखावा।

बिशारतः सादगी।

मौलवी मुजफ़्फ़रः शादीशुदा हैं या छड़े दम।

बिशारतः जी, गैर शादीशुदा।

मौलवी मुजफ़्फ़रः फिर आप इतनी सारी तनख़्वाह का क्या करेंगे? यतीमख़ाने को कितना मासिक चंदा देंगे?

तहसीलदारः आपने शायरी कब शुरू की? अपना पहला शेर सुनाइये।

बिशारतः

है इंतजारे-दीद में लाशा उछल रहा
हालांकि कू-ए-यार अभी कितनी दूरूर है

तहसीलदारः वाह वा! ‘हालांकि’ का जवाब, नहीं वल्लाह ऊसर जमीन में ‘लाशा’ ने जान डाल दी और ‘इतनी दूर’ में कुछ न कह कर कितना कुछ कह दिया।

बिशारतः आदाब बजा लाता हूं।

तहसीलदारः छोटी बहर में क्या क़यामत का शेर निकाला है। शेर में शब्दों की मितव्ययिता के अलावा विचार की भी कृपणता पाई जाती है।

बिशारतः आदाब।

तहसीलदारः (कुत्ता भौंकने लगता है) मुआफ़ कीजिये, मैं आपके कुत्ते के भौंकने में ख़लल डाल रहा हूं। यह बताइये कि जिन्दगी में आपकी क्या Ambition है?

बिशारतः यह नौकरी मिल जाये।

तहसीलदारः तो समझिये मिल गई। कल सुब्ह अपना सामान बर्तन-भाण्डे ले आइयेगा। साढ़े ग्यारह बजे मुझे आपकी Joining Report मिल जानी चाहिये। तन्ख़्वाह आपकी चालीस रुपये माहवार होगी।

मौलवी मुजफ़्फ़र चीख़ते और पैर पटकते रह गये कि सुनिये तो। ग्रेड पच्चीस रुपये का है, तहसीलदार ने उन्हें झिड़क कर ख़ामोश कर दिया और फ़ाइल पर अंग्रेजी में यह नोट लिखा कि इस उम्मीदवार में वो तमाम अच्छे गुण पाये जाते हैं जो किसी भी लायक़ और Ambitious नौजवान को एक कामयाब पटवारी या क्लास का टीचर बना सकते हैं, बशर्ते कि मुनासिब निगरानी और रहनुमाई मिले। मैं अपनी सारी व्यस्तताओं के बावजूद इसे अपना कुछ वक़्त और ध्यान देने के लिये तैय्यार हूं। शुरू में मैंने इसे 100 में से 80 नम्बर दिये थे मगर बाद में पांच नम्बर सुलेख के बढ़ाये लेकिन पांच नम्बर शायरी के काटने पड़े।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

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पहला भाग

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कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

बिशारत इन्टरव्यू के अन्दर दाखिल हुए तो कुछ नजर न आया।इसलिये कि केवल एक गोल मोखे के अतिरिक्त, रौशनी आने के लिए कोई खिड़की या रौशनदान नहीं था। फिर धीरे-धीरे इसी अंधेरे में हर चीज की आउट लाइन उभरती, उजलती चली गई। यहां तक कि दीवारों पर पीली मिट्टी और गोबर की ताजा लिपाई में मजबूती और पकड़ के लिये जो कड़बी की छीलन और भुस के तिनके डाले गये थे, उनका क़ुदरती वार्निश अंधेरे में चमकने लगा। दायीं तरफ़ कम-अंधेरे कोने में दो बटन चमकते नजर आये। वो चलकर उनकी तरफ़ बढ़े तो उन्हें डर महसूस हुआ। ये उस बिल्ली की आंखें थीं जो किसी अनदेखे चूहे की तलाश में थी।

बायीं तरफ़ एक चार फ़ुट ऊंची मकाननुमा खाट पड़ी थी जिसके पाये शायद साबुत पेड़ के तने से बनाये गये थे। बिसौले से छाल उतारने का कष्ट भी नहीं किया गया था। उस पर सलेक्शन कमेटी के तीन मैम्बर टांगें लटकाये बैठे थे। उसके पास ही एक और मेम्बर बिना पीठ के मूढ़े पर बैठे थे। दरवाज़े की तरफ़ पीठ किये मौलवी मुजफ़्फ़र एक टेकीदार मूढ़े पर विराजमान थे। एक बिना हत्थे वाली लोहे की कुर्सी पर एक बहुत हंसमुख व्यक्ति उल्टा बैठा था यानी उसकी पीठ से अपना सीना मिलाये और किनारे पर अपनी ठोढ़ी रखे। उसका रंग इतना सांवला था कि अंधेरे में सिर्फ़ दांत नजर आ रहे थे। यह तहसीलदार था जो इस कमेटी का चेयरमैन था। एक मैम्बर ने अपनी तुर्की टोपी खाट के पाये को पहना रखी थी। कुछ देर बाद जब बिल्ली उसके फ़ुंदने से तमाचे मार-मार कर खेलने लगी तो उसने पाये से उतार कर सर पर रख ली। सबके हाथों में खजूर के पंखे थे। मौली मज्जन पंखे की डंडी गर्दन के रास्ते शेरवानी में उतार कर बार-बार अपनी पीठ खुजाने के बाद डंडी की नोक को सूंघते थे। तहसीलदार के हाथ में जो पंखा था, उसके किनारे पर लाल गोटा और बीच में गुर्दे की शक्ल का छेद था जो उस काल में सब स्टूलों में होता था। इसका उपयोग एक अरसे तक हमारी समझ में न आया। कई लोग गर्मियों में इस पर सुराही या घड़ा रख देते थे ताकि सूराख़ से पानी रिसता रहे और पैंदे को ठंडी हवा लगती रहे। बिशारत अंत तक ये फ़ैसला न कर सके कि वो ख़ुद नर्वस हैं या स्टूल लड़खड़ा रहा है।

तहसीलदार पेड़े की लस्सी पी रहा था और बाक़ी मैम्बर हुक़्क़ा। सबने जूते उतार रखे थे। बिशारत को ये पता होता तो निःसंदेह साफ़ मोज़े पहन कर आते। मूढ़े पर बैठा हुआ मैम्बर अपने बायें पैर को दायें घुटने पर रखे, हाथ की उंगलियों से पांव की उंगलियों के साथ पंजा लड़ा रहा था। एक उधड़ी हुई क़लई का पीकदान घूम रहा था। हवा में हुक़्के, पान के बनारसी तम्बाक़ू, कोरी ठिलिया, कोने में पड़े हुए खरबूज़े के छिलकों, ख़स के इत्र और गोबर की लिपाई की ताजा गंध बसी हुई थी और उन पर हावी भबका था जिसके बारे में विश्वास से नहीं कहा जा सकता था कि यह देसी जूतों की बू है जो पैरों से आ रही है या पैरों की सड़ांध है जो जूतों से आ रही है।

जिस मोखे की चर्चा पहले की जा चुकी है उसके बारे में यह फ़ैसला करना कठिन था कि वो रौशनी के लिये बनाया गया है या अंदर के अंधेरे को कन्ट्रास्ट से और अधिक अंधेरा दिखाने के लिये रखा गया है। अंदर के धुंए को बाहर फेंकने के लिये है या बाहर की धूल को अंदर का रास्ता दिखाने के इरादे से बनाया गया। बाहर के दृश्य देखने के लिये झरोखा है या बाहर वालों को अंदर की ताक-झांक के लिये झांकी उपलब्ध कराई गई है। रौशनदान, हवादान, दर्शनी-झरोखा, धुंए की चिमनी, पोर्ट होल….बिशारत के कथानुसार यह एशिया का सर्वाधिक बहुउद्देशीय छेद था जो बेहद ओवरवर्कड था और चकराया हुआ था। इसलिये इनमें से कोई भी काम ठीक से नहीं कर पा रहा था। इस समय इसमें हर पांच मिनट बाद एक नया चेहरा फ़िट हो जाता था। हो यह रहा था कि बाहर दीवार तले एक लड़का घोड़ा बनता और दूसरा उस पर खड़ा हो कर उस वक़्त तक तमाशा देखता रहता जब तक घोड़े के पैर न लड़खड़ाने लगते और वो कमर को कमानी की तरह लचका-लचका कर यह मांग न करने लगता कि यार! उतर, मुझे भी तो देखने दे।

यदा-कदा यह मोखा ऑक्सीजन और गालियों की निकासी के रास्ते के रूप में भी इस्तेमाल होता था। इस संक्षिप्त विवरण का विस्तार यह है कि मौली मज्जन दमे के मरीज थे। जब खांसी का दौरा पड़ता और ऐसा लगता कि शायद दूसरा सांस नहीं आयेगा तो वो दौड़ कर मोखे में अपना मुंह फ़िट कर देते थे और जब सांस का पूरक रेचक ठीक हो जाता तो सस्वर अल्हम्दुलिल्लाह कह कर लौंडों को सड़ी-सड़ी गालियां देते। थोड़ी देर बाद धूप का कोण बदला तो सूरज का एक चकाचैंध लपका कमरे का अंधेरा चीरता चला गया। इसमें धुंए के बल खाते मरग़ोलों और धूलकणों का नाच देखने लायक़ था। बायीं दीवार पर दीनियात (धार्मिक विषय) के छात्रों के बनाये हुए इस्तंजे (पेशाब के बाद क़तरों को सुखाने के लिये मुसलमान मिट्टी के ढेले इस्तेमाल करते हैं, उन्हें इस्तंजा कहा जाता है) के निहायत सुडौल ढेले क़रीने से तले ऊपर सजे थे जिन पर अगर मक्खियां बैठी होतीं तो बिल्कुल बदायूं के पेड़े मालूम होते।

दायीं दीवार पर जार्ज-पांचवें की फ़ोटो पर गेंदे का सूखा खड़ंक हार लटक रहा था। उसके नीचे मुस्तफ़ा पाशा का फ़ोटो और मौलाना मुहम्मद अली जौहर की तस्वीर जिसमें वो चोग़ा पहने और समूरी टोपी पर चांद-तारा लगाये खड़े हैं। इन दोनों के बीच मौलवी मज्जन का बड़ा-सा फ़ोटो और उसके नीचे फ़्रेम किया हुआ मान-पत्र जो अध्यापकों और चपरासियों ने उनकी सेवा में हैजे से ठीक होने की ख़ुशी में लम्बी उम्र की प्रार्थना के साथ अर्पित किया था। उनकी तनख़्वाह पांच महीने से रुकी हुई थी।

ये बात तो रह ही गई। जब बिशारत इन्टरव्यू के लिये उठ कर जाने लगे तो कुत्ता भी साथ लग गया। उन्होंने रोका मगर वो न माना। चपरासी ने कहा, “आप इस पलीद को अन्दर नहीं ले जा सकते।“ बिशारत ने जवाब दिया, “यह मेरा कुत्ता नहीं है”। चपरासी बोला, “तो आप इसे दो घंटे से बांहों में लिये क्यों बैठे थे?” उसने एक ढेला उठा कर मारना चाहा तो कुत्ते ने झट पिण्डली पकड़ ली। चपरासी चीख़ने लगा। बिशारत के मना करने पर उसने फ़ौरन पिण्डली छोड़ दी। शुक्रिया अदा करने के बजाये चपरासी कहने लगा, “और आप इस पर भी कहते हैं कि कुत्ता मेरा नहीं है।“ जब वो अन्दर दाख़िल हुआ तो कुत्ता भी उनके साथ घुस गया। रोकना तो बड़ी बात, चपरासी में इतना हौसला भी नहीं रहा कि टोक भी सके। उसके अंदर घुसते ही भूचाल आ गया। कमेटी के मेम्बरों ने चीख-चीख़ कर छप्पर सर पर उठा लिया। लेकिन जब वो उनसे भी जियादा जोर से भौंका तो सब सहम कर अपनी-अपनी पिंडलियां गोद में ले कर बैठ गये। बिशारत ने कहा कि अगर आप हजरात बिल्कुल शांत और स्थिर हो जायें तो यह भी चुप हो जायेगा। इस पर एक साहब बोले आप इंटरव्यू में अपना कुत्ता लेकर क्यों आये हैं? बिशारत ने क़सम खा कर कुत्ते से अपनी असम्बद्धता प्रकट कि तो वही साहब बोले “अगर आपका दावा है कि यह कुत्ता आपका नहीं है तो आप इसकी बुरी आदतों से इतने परिचित कैसे हैं?”

बिशारत इंटरव्यू के लिये अपनी जगह बैठ गये तो कुत्ता उनके पैरों से लग कर बैठ गया। उनका जी चाहा कि वो यूं ही बैठा रहे। अब वो नर्वस महसूस नहीं कर रहे थे, इंटरव्यू के दौरान दो बार मौलवी मज्जन ने बिशारत की किसी बात पर बड़ी तुच्छता से जोरदार क़हक़हा लगाया तो कुत्ता उनसे भी जियादा जोर से भौंकने लगा और वो सहम कर क़हक़हा बीच में ही स्विच ऑफ़ करके चुपके बैठ गये। बिशारत को कुत्ते पर बेतहाशा प्यार आया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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इन्टरव्यू की ग़रज से धीरजगंज जाने के लिये बिशारत सुब्ह तीन बजे ही निकल खड़े हुए। सात बजे मौलवी मुजफ़्फ़र के घर पहुंचे तो वो जलेबियों का नाश्ता कर रहे थे। बिशारत ने अपना नाम पता बताया तो कहने लगे, “आइये आइये! आप तो कान ही पुर (कानपुर ही) के रहने वाले हैं। कानपुर को गोया लखनऊ का आंगन कहिये। लखनऊ के लोग तो बड़े घमंडी और नाक वाले होते हैं। लिहाजा मैं नाश्ते के लिये झूठों भी नहीं टोकूंगा।”

“ऐ जौक़ तकल्लुफ़ में हैं तकलीफ़ बराबर (जी हां उन्होंने सरासर को बराबर कर दिया था) जाहिर है नाश्ता तो आप कर आये होंगे। सलेक्शन कमेटी की मीटिंग अंजुमन के दफ़्तर में एक घंटे बाद होगी। वहीं मुलाक़ात होगी, और हां! जिस बेहूदे आदमी से आपने सिफ़ारिश करवाई है, वो निहायत कंजूस और नामाक़ूल है।”

इस सारी बातचीत में अधिक से अधिक दो मिनट लगे होंगे। मौलवी मुजफ़्फ़र ने बैठने को भी नहीं कहा, खड़े-खड़े ही भुगता दिया। घर से मुंह अंधेरे ही चले थे, मौलवी मुजफ़्फ़र को गर्म जलेबियां खाते देखकर उनकी भूख भड़क उठी। मुहम्मद हुसैन आजाद के शब्दों में ‘भूख ने उनकी अपनी ही जबान में जायक़ा पैदा कर दिया।’ घूम फिर के हलवाई की दुकान पता की। डेढ़ पाव जलेबियां घान से उतरती हुई तुलवाईं। दोने से पहली जलेबी उठाई ही थी कि हलवाई का कुत्ता उनके पूरे अरज के ग़रारे नुमा लखनवी पाजामे के पांयचे में मुंह डाल के बड़े आवेग से लपड़-लपड़ पिंडली चाटने लगा। कुछ देर वो चुपचाप, निस्तब्ध और शांत खड़े चटवाते रहे। इसलिये कि उन्होंने किसी से सुना था कि कुत्ता अगर पीछा करे या आपके हाथ-पैर चाटने लगे तो भागना या शोर नहीं मचाना चाहिये वर्ना वो आजिज आकर सचमुच काट खायेगा। जैसे ही उन्होंने उसे एक जलेबी डाली, उसने पिंडली छोड़ दी। इसी बीच उन्होंने ख़ुद भी एक जलेबी खायी। कुत्ता अपनी जलेबी ख़त्म होते ही पांयचे में मुंह डाल के फिर शुरू हो गया। जबान भी ठीक से साफ़ नहीं की।

अब नाश्ते का ये पैटर्न बना कि पहले एक जलेबी कुत्ते को डालते तब एक ख़ुद भी खा पाते। जलेबी देने में जरा देर हो जाती तो वो लपक कर बड़े चाव और दोस्ती से पिंडली चिचोड़ने लगता, शायद इसलिये कि उसके अन्दर एक हड्डी थी। लेकिन अब दिल से कुत्ते का डर इस हद तक निकल चुका था कि उसकी ठंडी नाक से गुदगुदी हो रही थी। उन्होंने खड़े-खड़े दो बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिये, पहला ये कि कभी कानपुर के जाहिलों की तरह सड़क पर खड़े होकर जलेबी नहीं खायेंगे; दूसरा लखनऊ के शरीफ़ों की तरह चौड़े पांयचे का पाजामा हरगिज नहीं पहनेंगे, कम-से-कम जिंदा हालत में।

कुत्ते को नाश्ता करवा चुके तो ख़ाली दोना उसके सामने रख दिया। वो शीरा चाटने में तल्लीन हो गया तो हलवाई के पास दुबारा गये। एक पाव दूध कुल्हड़ में अपने लिये और डेढ़ पाव कुत्ते के लिये ख़रीदा ताकि उसे पीता छोड़ कर सटक जायें। अपने हिस्से का दूध गटागट पी कर क़स्बे की सैर को रवाना होने लगे तो कुत्ता दूध छोड़ कर उनके पीछे-पीछे हो लिया। उन्हें जाता देख कर पहले कुत्ते के कान खड़े हुए थे, अब उनके खड़े हुए कि बदजात अब क्या चाहता है।

तीन-चार जगह जहां उन्होंने जरा दम लेने के लिये रफ़्तार कम करने की कोशिश की या अपनी मर्जी से मुड़ना या लौटना चाहा तो कुत्ता किसी तरह राजी न हुआ। हर मोड़ पर गली के कुत्ते उन्हें और उसे घेर लेते और खदेड़ते हुए दूसरी गली तक ले जाते, जिसकी सीमा पर दूसरे ताजादम कुत्ते चार्ज ले लेते। कुत्ता बड़े अनमनेपन से अकेला लड़ रहा था। जब तक युद्ध निर्णायक ढंग से समाप्त न हो जाता या कम-से-कम अस्थायी युद्ध विराम न हो जाता अथवा दूसरी गली के शेरों से नये सिरे से लड़ाई शुरू न हो जाती, वो U.N.O. की तरह बीच में ख़ामोश खड़े देखते रहते। वो लौंडों को कुत्तों को पत्थर मारने से बड़ी सख़्ती से मना कर रहे थे। इसलिये कि सारे पत्थर उन्हीं के लग रहे थे, वो कुत्ता दूसरे कुत्तों को उनकी तरफ़ बढ़ने नहीं देता था और सच तो ये है उनकी हमदर्दी अब अपने ही कुत्ते के साथ हो गई थी। दो फ़र्लांग पहले जब वो चले थे तो वह महज एक कुत्ता था, मगर अब रिश्ता बदल चुका था। वो उसके लिये कोई अच्छा-सा नाम सोचने लगे।

उन्हें आज पहली बार मालूम हुआ कि गांव में मेहमान के आने का ऐलान कुत्ते, चोर और बच्चे करते हैं उसके बाद वो सारे गांव और हर घर का मेहमान बन जाता है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

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इस अंक में देखिये कि बिशारत, जो मास्टरी की नौकरी के लिये तहसीलदार मौलवी मज्जन के पास जा रहे हैं, उनको मौलवी के बारे में क्या क्या बातें पता चलती हैं.

***

मौलवी मज्जन से तानाशाह तकः तहसीलदार तक सिफ़ारिश पंहुचाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। अलबत्ता मौलवी मुजफ़्फ़र (जो तिरस्कार, संक्षेप और प्यार में मौली मज्जन कहलाते थे) के बारे में जिससे पूछा, उसने नया ऐब निकाला। एक साहब ने कहा, क़ौम का दर्द रखता है हाकिमों से मेलजोल रखता है पर कमीना है, बच के रहना। दूसरे साहब बोले मौलवी मज्जन एक यतीमख़ाना शम्स-उल-इस्लाम भी चलाता है। यतीमों से अपने पैर दबवाता है। स्कूल की झाड़ू दिलवाता है और मास्टरों को यतीमों की टोली के साथ चंदा इकट्ठा करने कानपुर और लखनऊ भेजता है, वो भी बिना टिकिट। मगर इसमें कोई शक नहीं कि धुन का पक्का है। धीरजगंज के मुसलमानों की बड़ी सेवा की है। धीरजगंज के जितने भी मुसलमान आज पढ़े-लिखे और नौकरी करते नजर आते हैं वो सब इसी स्कूल के जीने से ऊपर चढ़े हैं। कभी-कभी लगता था कि लोगों को मौलवी मुजफ़्फ़र से ईश्वरीय बैर हो गया है। बिशारत को उनसे एक तरह की हमदर्दी हो गई। यूं भी मास्टर फ़ाख़िर हुसैन ने एक बार बड़े काम की नसीहत की थी कि कभी अपने बुजुर्ग या बॉस या अपने से अधिक बदमाश आदमी को सही रास्ता बताने की कोशिश न करना। उन्हें ग़लत राह पर देखो तो तीन ज्ञानी बंदरों की तरह अंधे, बहरे और गूंगे बन जाओ! ठाठ से राज करोगे!

एक दिलजले बुजुर्ग, जो ‘जमाना’ पत्रिका में काम करते थे, फ़र्माया, वो छाकटा ही नहीं, चरकटा भी है। पच्चीस रुपये की रसीद लिखवा कर पन्द्रह रुपल्ली हाथ पे टिका देगा। पहले तुम्हें जांचेगा, फिर आंकेगा, इसके बाद तमाम उम्र हांकेगा। उसने दस्तख़त करने उस वक़्त सीखे जब चंदे की जाली रसीदें काटने की जुरूरत पड़ी। अरे साहब! सर सय्यद तो अब जा के बना है मैंने अपनी आंखों से उसे अपने निकाहनामे पे अंगूठा लगाते देखा है। ठूंठ जाहिल है मगर बला का गढ़ा हुआ, घिसा हुआ भी। ऐसा-वैसा चपड़क़नात नहीं है, लुक़्क़ा भी है, लुच्चा भी और टुच्चा भी। बुजुर्गवार ने एक ही सांस में पाजीपन के ऐसे बारीक शेड्स गिनवा दिये कि जब तक आदमी हर गाली के बाद शब्दकोष न देखे या हमारी तरह लम्बे समय तक भाषाविदों की सुहबत के सदमे न उठाये हुए हो वो जबान और नालायक़ी की उन बारीकियों को नहीं समझ सकता।

सय्यद एजाज हुसैन ‘वफ़ा’ कहने लगे ‘‘मौली मज्जन पांचों वक़्त टक्करें मारता है। घुटने, माथे और जमीर पर ये बड़े-बड़े गट्टे पड़ गये हैं। थानेदार और तहसीलदार को अपनी मीठी बातचीत, इस्लाम-दोस्ती, मेहमान-नवाजी और रिश्वत से क़ाबू में कर रखा है। दमे का मरीज है। पांच मिनट में दस बार आस्तीन से नाक पोंछता है।’’ दरअस्ल उन्हें आस्तीन से नाक पोंछने पर इतना एतराज न था जितना इस पर कि आस्तीन को अस्तीन कहता है, यख़नी को अख़नी और हौसला का होंसला। उन्होंने अपने कानों से उसे मिजाज शरीफ़ और शुबरात कहते सुना था। जुहला (गंवारों) किसानों और बकरियों की तरह हर वक़्त मैं! मैं! करता रहता है। लखनऊ के शुरफ़ा (शरीफ़ का बहुवचन-भद्र लोग) अहंकार से बचने की ग़रज से ख़ुद को हमेशा हम कहते हैं। इस पर एक कमजोर और सींक-सलाई बुजुर्ग ने फ़र्माया कि जात का क़साई, कुंजड़ा या दिल्ली वाला मालूम होता है, किस वास्ते कि तीन बार गले मिलता है। अवध में शुरफ़ा केवल एक बार गले मिलते हैं।

ये अवध के साथ सरासर जियादती थी इसलिये कि सिर्फ़ एक बार गले मिलने में शराफ़त का शायद उतना दख़्ल न था जितना नाजुक-मिजाजी का और ये याद रहे कि यह उस जमाने के पारम्परिक चोंचले हैं जब नाजुक-मिजाज बेगमें ख़ुश्के और ओस का आत्महत्या के औजार की तरह प्रयोग करती थीं और यह धमकी देती थीं कि ख़ुश्कख़ार ओस में सो जाऊंगी। वो तो खैर बेगमें थीं, तानाशाह उनसे भी बाजी ले गया। उसके बारे में मशहूर है कि जब वो बंदी बना कर दरबार में बेड़ियां पहना कर लाया गया तो सवाल ये पैदा हुआ कि इसे मरवाया कैसे जाये। दरबारियों ने एक से एक उपाय पेश किये। एक ने तो मशवरा दिया कि ऐसे अय्याश को तो मस्त हाथी के पैर से बांध कर शहर का चक्कर लगवाना चाहिये। दूसरा कोर्निश बजा कर बोला, दुरुस्त, मगर मस्त हाथी को शहर का चक्कर कौन माई का लाल लगवायेगा। हाथी शहर का चक्कर लगाने के लिये थोड़े ही मस्त होता है, अलबत्ता आप तानाशाह की अय्याशियों की सजा हाथी को देना चाहते हैं तो और बात है। इस पर तीसरा दरबारी बोला कि तानाशाह जैसे अय्याश को इससे जियादा तकलीफ़ देने वाली सजा नहीं हो सकती कि इसे हीजड़ा बना कर इसी के हरम में खुला छोड़ दिया जाये। एक और दरबारी ने तजवीज पेश की कि आंखों में नील की सलाई फिरवा कर अंधा कर दो, फिर क़िला ग्वालियर में दो साल तक रोजाना ख़ाली पेट पोस्त का पियाला पिलाओ कि अपने जिस्म को धीरे-धीरे मरता हुआ ख़ुद भी देखे। इस पर किसी इतिहासकार ने विरोध किया कि सुल्तान का तानाशाह से ख़ून का कोई रिश्ता नहीं है, ये बरताव तो सिर्फ़ सगे भाइयों के साथ होता आया है। एक दिलजले ने कहा कि क़िले की दीवार से नीचे फेंक दो, मगर यह तरीक़ा इसलिए रद्द कर दिया गया कि इसका दम तो मारे डर के रस्ते में ही निकल जायेगा, अगर मक़सद तकलीफ़ पहुंचाना है तो वो पूरा नहीं होगा। अंत में वजीर ने, जिसका योग्य होना साबित हो गया, ये मुश्किल हल कर दी। उसने कहा कि मानसिक पीड़ा देकर और तड़पा-तड़पाकर मारना ही लक्ष्य है तो इसके पास से एक ग्वालिन गुजार दो।

जिन पाठकों ने बिगड़े रईस और ग्वालिन नहीं देखी उनकी जानकारी के लिये निवेदन है कि मक्खन और कच्चे दूध की बू, रेवड़ बास में बसे हुए लंहगे और पसीने के नमक से सफ़ेद पड़ी हुई काली क़मीज के एक भबके से अमीरों और रईसों का दिमाग़ फट जाता था। फिर उन्हें हिरन की नाभि से निकली हुई कस्तूरी के लख़लख़े सुंघा कर होश में लाया जाता था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड

पहला भाग

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
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नेकचलनी का साइनबोर्ड : विज्ञापन में मौलवी सय्यद महुम्मद मजुफ्फर ने, कि यही स्कूल के संस्थापक, व्यवस्थापक, संरक्षक, कोषाध्यक्ष और ग़बनकर्ता का नाम था, सूचित किया था कि उम्मीदवार को लिखित आवेदन करने की आवश्यकता नहीं, अपनी डिग्री और नेकचलनी के दस्तावेजी सुबूत के साथ सुब्ह आठ बजे स्वयं पेश हो। बिशारत की समझ में न आया कि नेकचलनी का क्या सुबूत हो सकता है, बदचलनी का अलबत्ता हो सकता है। उदाहरण के लिये चालान,मुचलका, गिरफ़्तारी-वारंट, सजा के आदेश की नक़्ल या थाने में दस-नम्बरी बदमाशों की लिस्ट। पांच मिनट में आदमी बदचलनी तो कर सकता है नेकचलनी का सुबूत नहीं दे सकता। मगर बिशारत की चिंता अकारण थी। इसलिये कि जो हुलिया उन्होंने बना रक्खा था यानी मुंडा हुआ सर, आंखों में सुरमे की लकीर, एड़ी से ऊंचा पाजामा, सर पर मख़मल की काली रामपुरी टोपी, घर, मस्जिद और मुहल्ले में पैर में खड़ाऊं….. इस हुलिये के साथ वो चाहते भी तो नेकचलनी के सिवा और कुछ संभव न था। नेकचलनी उनकी मजबूरी थी, स्वयं अपनायी हुई अच्छाई नहीं और उनका हुलिया इसका सुबूत नहीं साइनबोर्ड था।

यह वही हुलिया था जो इस इलाक़े के निचले मिडिल क्लास ख़ानदानी शरीफ़ घरानों के नौजवानों का हुआ करता था। ख़ानदानी शरीफ़ से अभिप्राय उन लोगों से है जिन्हें शरीफ़ बनने, रहने और कहलाने के लिये व्यक्तिगत कोशिश बिल्कुल नहीं करनी पड़ती थी। शराफ़त, जायदाद और ऊपर वर्णित हुलिया पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस तरह विरसे में मिलते थे जिस तरह आम आदमी को जीन्स और वंशानुगत रोग मिलते हैं। आस्था, प्रचार, ज्ञान और हुलिये के लिहाज से पड़पोता अगर हू-ब-हू अपना पड़दादा मालूम हो तो ये ख़ानदानी कुलीनता, शराफ़त और शुद्धता की दलील समझी जाती थी।

इन्टरव्यू के लिये बिशारत ने उसी हुलिये पर रगड़ घिस करके नोक-पलक संवारी। अचकन धुलवाई, बदरंग हो गई थी इसलिये धोबी से कहा क़लफ़ अधिक लगाना। सर पर अभी शुक्रवार को जीरो नम्बर की मशीन फिरवाई थी, अब उस्तरा और उसके बाद आम की गुठली फिरवा कर आंवले के तेल की मालिश करवाई। देर तक मिर्चें लगती रहीं। टोपी पहन कर आइना देख रहे थे कि अन्दर मुंडे हुए सर से पसीना इस तरह रिसने लगा जिस तरह माथे पर विक्स या बाम लगाने से झरता है। टोपी उतारने के बाद पंखा चला तो ऐसा लगा जैसे किसी ने हवा में पिपरमेन्ट मिला दिया हो। फिर बिशारत ने जूतों पर फ़ौजियों की तरह थूक से पालिश करके अपनी पर्सनेलिटी को फ़िनिशिंग टच दिया।

सलेक्शन कमेटी का चेयरमैन तहसीलदार था। सुनने में आया था कि एपाइन्टमेन्ट के मुआमले में उसी की चलती है। फक्कड़, फ़िक़रेबाज, साहित्यिक, मिलनसार, निडर और रिश्वतख़ोर है। घोड़े पर कचहरी आता है, ‘नादिम’ (शर्मिन्दा) उपनाम रखता है, आदमी बला का जहीन और तबीयतदार है। उसे अपना तरफ़दार बनाने के लिये [बिशारत ने] बादामी काग़ज का एक दस्ता, छह-सात निब वाले क़लम ख़रीदे और रातों-रात अपनी शायरी का चमन यानी सत्ताईस ग़जलों का गुलदस्ता स्वयं तैय्यार किया। [बिशारत] ‘मखमूर’ उपनाम रखते थे जो उनके उस्ताद जौहर इलाहाबादी का दिया हुआ था। इसी लिहाज से अपनी अधूरी आद्योपान्त किताब का नाम ‘ख़ुमख़ाना-ए-मख़मूर कानपुरी सुम लखनवी’ रखा (लखनऊ से केवल इतना सम्बन्ध था कि पांच साल पहले अपना पित्ता निकलवाने के सिलसिले में दो सप्ताह के लिये अस्पताल में लगभग अर्धमूर्छित हालत में रहे थे) फिर उसमें एक विराट संकलन भी मिला दिया।

इस विराट संकलन की कहानी यह है कि अपनी ग़जलों और शेरों का चयन उन्होंने दिल पर पत्थर बल्कि पहाड़ रख कर किया था। शेर कितना ही घटिया और कमजोर क्यों न हो उसे स्वयं काटना और रद्द करना उतना ही मुश्किल है जितना अपनी औलाद को बदसूरत कहना या जंबूर से ख़ुद अपना हिलता हुआ दांत उखाड़ना। ग़ालिब तक से ये पराक्रम न हो सका। कांट-छांट मौलाना फ़ज्ले-हक़ खैराबादी के सुपुर्द करके ख़ुद ऐसे बन के बैठ गये जैसे कुछ लोग इंजेक्शन लगवाते वक़्त दूसरी तरफ़ मुंह करके बैठ जाते हैं।

बिशारत ने शेर छांटने को तो छांट दिये मगर दिल नहीं माना, इसलिये अंत में एक परिशिष्ट अपनी रद्द की हुई शायरी का सम्मिलित कर दिया। यह शायरी उस काल से संबंधित थी जब वो बेउस्ताद थे और ‘फ़रीफ़्ता’ उपनाम रखते थे। इस उपनाम की एक विशेषता यह थी कि जिस पंक्ति में भी डालते वो छंद से बाहर हो जाती। चुनांचे अधिकतर ग़जलें बग़ैर मक़्ते के थीं। चंद मक़्तों में शेर का वज्न पूरा करने के लिये ‘फ़रीफ़्ता’ की जगह उसका समानार्थक ‘शैदा’ और ‘दिलदादा’ प्रयोग किया, उससे शेर में कोई और दोष पैदा हो गया। बात दरअस्ल यह थी कि आकाश से जो विचार उनके दिमाग़ में आते थे उनके दैवीय जोश और तूफ़ानी तीव्रता को छंद की गागर में बंद करना इंसान के बस का काम न था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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