बिशारत और शाहजहां की तमन्नाः

अन्ततोगत्वा दूसरा अंदेशा पूरा हुआ. वो पास हो गये। जिस पर उन्हें ख़ुशी, प्रोफ़ेसरों को आश्चर्य और बुजुर्गों को शॉक हुआ। उस दिन कई बार अपना नाम, उसके आगे बी.ए. लिख-लिख कर, देर तक भिन्न-भिन्न कोणों से देखा किये, जैसे हुसैन अपनी पेन्टिंग को समझने के लिए पीछे हट-हट कर देखते हैं। एक बार तो बी.ए. के बाद ब्रेकिट में (फर्स्ट ऎटेम्प्ट) भी लिखा, मगर इसमें वाचालता और घमण्ड का पहलू दिखाई दिया। थोड़ी देर बाद गत्ते पर अंग्रेजी में नीली रौशनाई से नाम और लाल रौशनाई से बी.ए. लिख कर दरवाजे पर लगा आये। पन्द्रह-बीस दिन बाद उर्दू के एक स्थानीय समाचार-पत्र में विज्ञापन देखा कि धीरजगंज के मुस्लिम स्कूल में, जहां इसी साल नवीं क्लास शुरु होने वाली है, उर्दू टीचर की जगह ख़ाली है। विज्ञापन में यह लालच भी दिया गया था कि नौकरी स्थायी, वातावरण पवित्र और शांत तथा वेतन उचित है। वेतन की उचितता का स्पष्टीकरण ब्रैकिट में कर दिया गया था कि एलाउन्स समेत पच्चीस रुपये मासिक होगा। सवा रुपया वार्षिक उन्नति अलग से। मल्कुश्शोअरा-ख़ाकानी-ए-हिन्द शेख़ मुहम्मद इब्राहीम ‘जौक़’ को बहादुर शाह जफ़र ने अपना उस्ताद बनाया तो पोषण की दृष्टि से चार रुपये मासिक राशि तय की। मौलाना मुहम्मद हुसैन आजाद लिखते हैं कि “वेतन की कमी पर नजर करके बाप ने अपने इकलौते बेटे को इस नौकरी से रोका…..लेकिन क़िस्मत ने आवाज दी कि चार रुपये न समझना। ये ऐवाने-मल्कुशोराई के चार खम्भे हैं, मौके को हाथ से न जाने देना।“ इनकी इच्छा का महल तो पूरे पच्चीस खम्भों पर खड़ा होने वाला था।

लेकिन वो शांत वातावरण पर मर मिटे। धीरजगंज कानपुर और लखनऊ के बीच में एक बस्ती थी जो गांव से बड़ी और क़स्बे से छोटी थी। इतनी छोटी कि हर एक शख़्स एक दूसरे के बाप-दादा तक की करतूतों तक से परिचित था और न सिर्फ़ ये जानता था कि हर घर में जो हांडी चूल्हे पर चढ़ी है उसमें क्या पक रहा है बल्कि ये भी कि किस-किस के यहां तेल में पक रहा है। लोग एक दूसरे की जिन्दगी में इस बुरी तरह घुसे हुए थे कि आप कोई काम छुप कर नहीं कर सकते थे। ऐब करने के लिये भी सारी बस्ती का हुनर और मदद चाहिए थी। बहुत दिनों से उनकी इच्छा थी कि भाग्य ने साथ दिया तो टीचर बनेंगे। लोगों की नजर में शिक्षक का बड़ा सम्मान था। कानपुर में उनके पिता की इमारती लकड़ी की दुकान थी, मगर घरेलू कारोबार के मुक़ाबले उन्हें दुनिया का हर पेशा जियादा दिलचस्प और कम जलील लगता था। बी.ए. का नतीजा निकलते ही पिता ने उनके हृदय की शांति के लिये अपनी दुकान का नाम बदल कर ‘‘एजुकेशनल टिम्बर डिपो’’ रख दिया, मगर तबीयत इधर नहीं आई। मारे-बांधे कुछ दिन दुकान पर बैठे, मगर बड़ी बेदिली के साथ। कहते थे कि भाव-ताव करने में सुब्ह से शाम तक झूठ बोलना पड़ता है। जिस दिन सच बोलता हूं उस दिन कोई बोहनी-बिक्री नहीं होती, दुकान में गर्दा बहुत उड़ता है, ग्राहक चीख-चीख कर बात करते हैं। होश संभालने से पहले वो इंजन-ड्राइवर और होश संभालने के बाद स्कूल टीचर बनना चाहते थे। क्लास रूम भी किसी सल्तनत से कम नहीं। शिक्षक होना भी एक तरह का शासन है, तभी तो औरंगजेब ने शाहजहां को कैद में पढ़ाने की अनुमति नहीं दी। बिशारत स्वयं को शाहजहां से अधिक सौभाग्यशाली समझते थे, विशेष रूप से इसलिये कि इन्हें तो बदले में पच्चीस रुपये भी मिलने वाले थे। इसमें शक नहीं कि उस जमाने में शिक्षण का पेशा बहुत सम्मानित और गरिमामय समझा जाता था। जिन्दगी और कैरियर में दो चीजों की बड़ी अहमियत थी। पहला इज्जत और दूसरे मानसिक शांति। दुनिया के और किसी देश में इज्जत पर कभी इतना जोर नहीं रहा जितना कि इस महाद्वीप में। अंग्रेजी में तो इसका कोई ढंग का समानार्थक शब्द भी नहीं है, इसलिये अंग्रेजी के कई पत्रकारों तथा प्रसिद्ध लिखने वालों ने इस शब्द को अंग्रेजी में ज्यों-का-त्यों इस्तेमाल किया है।

आज भी दुनिया देखे हुए बुजुर्ग किसी को दुआ देते हैं तो चाहे सेहत, सुख-चैन, अधिक संतान, समृद्धि का जिक्र करें या न करें, यह दुआ जुरूर करते हैं कि ख़ुदा तुम्हें और हमें इज्जत-आबरू के साथ रक्खे, उठाये। नौकरी के संदर्भ में भी हम गुणसम्पन्नता, तरक़्क़ी की दुआ नहीं मांगते, अपने लिये हमारी अकेली दुआ होती है कि सम्मान के साथ विदा लें। यह दुआ आपको दुनिया की किसी और जबान या मुल्क में नहीं मिलेगी। कारण ये कि बेइज्जती के जितने प्रचुर अवसर हमारे यहां हैं दुनिया में कहीं और नहीं। नौकरी पेशा आदमी बेइज्जती को प्रोफ़ेशनल हेजर्ड समझ कर स्वीकार करता है। राजसी परम्पराएं और उनकी जलालतें जाते-जाते जायेंगी। उन दिनों नौकरी-पेशा लोग ख़ुद को नमकख़्वार कहते और समझते थे;रोम में तो प्राचीन काल में नौकरों को वेतन के बदले नमक दिया जाता था और दासों की क़ीमत नमक के रूप में दी जाती थीद्ध, वेतन मेहनत के बदले नहीं बल्कि बतौर दान और बख्शीश दिया और लिया जाता था। वेतन बांटने वाले विभाग को बख़्शीख़ाना कहते थे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की पहली कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

बिशारत कहते है कि बी.ए. का इम्तहान देने के बाद यह चिन्ता सर पड़ी कि अगर फ़ेल हो गये तो क्या होगा, वजीफ़ा पढ़ा तो खुदा पर भरोसे से यह चिन्ता तो दूर हो गई लेकिन इससे बड़ी एक और समस्या गले आ पड़ी कि खुदा-न-ख्व़ास्ता पास हो गये तो क्या होगा। नौकरी मिलनी मुहाल, यार दोस्त सब तितर-बितर हो जायेंगे, वालिद हाथ खींच लेंगे। बेकारी, बेरोज़गारी,बेपैशे, बेकाम…..जीवन नर्क हो जायेगा। अंग्रेज़ी अखबार सिर्फ ”वान्टेड” विज्ञापन देखने के लिये खरीदना पड़ेगा। फ़िर हर बौड़म मालिक के सांचे में अपनी क्वालिफ़िकेशन को इस तरह ढाल कर प्रार्थना-पत्र देना पड़ेगा कि हम मृत्युलोक में इसी नौकरी के लिए अवतरित हुए हैं। इक-रंगे विषय को सौ-रंग में बांधना पड़ेगा। रोज़ एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक ज़लील होना पड़ेगा, जब तक कि एक ही दफ्तर में इसकी स्थायी व्यवस्था न हो जाये। हर चंद कि फ़ॆल होने की संभावना थी मगर पास होने का डर भी लगा हुआ था। कई लड़के इस ज़िल्लत को और दो साल स्थगित करने के लिए एम.ए. और एल.एल.बी. में प्रवेश ले लेते थे। बिशारत की जान-पहचान में जिन मुसलमान लड़कों ने तीन साल पहले यानी १९२७ में बी.ए. किया था वो सब जूतियां चटखाते फ़िर रहे थे, सिवाय एक सौभाग्यशाली के, जो मुसलमानों में सर्वप्रथम आया और अब मुस्लिम मिडिल स्कूल में ड्रिल मास्टर हो गया था। १९३० की भयानक विश्व-स्तरीय बेरोज़गारी और मंहगाई की तबाहियां समाप्त नहीं हुई थीं। माना कि एक रुपये का गेहूं १५ सेर और देसी घी एक सेर मिलता था, लेकिन एक रुपया था किसके पास?

कभी-कभी वो डर-डर के, मगर सचमुच की इच्छा करते कि फ़ेल ही हो जायें तो बेहतर है, कम से कम एक साल निश्चिन्तता से कट जायेगा। फ़ेल होने पर बक़ौल मिर्ज़ा सिर्फ एक दिन आदमी की बेइज्जती खराब होती है इसके बाद चैन ही चैन। बस यही होगा ना कि जैसे ईद पर लोग मिलने आते हैं उसी तरह उस दिन खानदान का हर बड़ा बारी-बारी से बरसों की जमा धूल झाड़ने आयेगा और फ़ेल होने तथा खानदान की नाक कटवाने का एक अलग ही कारण बतायेगा। उस ज़माने में नौजवानों का कोई काम, कोई हरकत ऐसी नहीं होती थी जिसकी झपट में आ कर खानदान की नाक न कट जाये। आजकल की-सी स्थिति नहीं थी कि पहले तो खानदानों के मुंह पर नाक नज़र नहीं आती और होती भी है तो ट्यूबलेस टायर की तरह जिसमें आये दिन हर साइज के पंक्चर होते रहते हैं और अन्दर ही अन्दर आप-ही-आप जुड़ते रहते हैं। यह भी देखने में आया है कि कई बार खानदान के दूर-पास के बुज़ुर्ग छठी-सातवीं क्लास तक फ़ेल होने वाले लड़कों की, संबंधों की निकटता व क्षमता के हिसाब से अपने निजी हाथ से पिटाई भी करते थे, लेकिन जब लड़का हाथ-पैर निकालने लगे और इतना सयाना हो जाये कि दो आवाज़ों में रोने लगे यानी तेरह, चौदह साल का हो जाये तो फ़िर उसे थप्पड़ नहीं मारते थे, इसलिये कि अपने ही हाथ में चोट आने और पहुंचा उतरने का अन्देशा रहता था, केवल चीख-पुकार, डांट से काम निकालते थे। हर बुज़ुर्ग उसकी सर्टिफ़ाइड नालायक़ी की अपने झूठे शैक्षिक रिकार्ड से तुलना करता और नई पौध में अपनी दृष्टि की सीमा तक कमी और गिरावट के आसार देख कर इस सुखद निर्णय पर पहुंचता कि अभी दुनिया को उस जैसे बुज़ुर्ग की ज़ुरूरत है। भला वो ऐसी नालायक नस्ल को दुनिया का चार्ज देकर इतनी जल्दी कैसे विदा ले सकता है। मिर्ज़ा कहते हैं कि हर बुज़ुर्ग बड़े सिद्ध पुरुषों के अंदाज़ में भविष्यवाणी करता था कि तुम बड़े होकर बड़े आदमी नहीं बनोगे। साहब यह तो अन्धे को भी …हद तो ये है कि खुद हमें भी….नज़र आ रहा था। भविष्यवाणी करने के लिए सफेद दाढ़ी या भविष्यवक्ता होना आवश्यक नहीं था। बहरहाल यह सारी FARCE एक ही दिन में खत्म हो जाती थी, लेकिन पास होने के बाद तो एक उम्र का रोना था। ज़िल्लत ही ज़िल्लत, परेशानी ही परेशानी।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से”

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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पिछ्ले अंक में अतुल जी ने कहा “ये व्यंग्य तो अंत में बड़ा ही मार्मिक हो गया है। किबला से एक जुड़ाव सा हो गया था अब उनका यूँ टूट जाना दु:खदायी लग रहा है।”. युसुफी साहब की यही खासियत है कि उनके व्यंग्य एक और जहां शुद्ध हास्य हैं वहीं दूसरी ओर मार्मिक भी है और उनमें जिन्दगी का पूरा फ़लसफा भी है. आज पढिये किबला की कहानी का अंतिम भाग. अगले शुक्रवार से दूसरी कहानी प्रस्तुत की जायेगी.

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मैं पापन ऎसी जली कोयला भई न राख

उन्हें उस रात नींद नहीं आयी। फ़ज़्र (सूरज निकलने से पहले की नमाज़) की अज़ान हो रही थी कि टिम्बर मार्किट का एक चौकीदार हांपता-कांपता आया और खब़र दी कि “साहब जी! आपकी दुकान और गोदाम में आग लग गई है। आग बुझाने के इंजन तीन बजे ही आ गये थे। सारा माल कोयला हो गया। साहब जी! आग कोई आप ही आप थोड़ी लगती है।“ वो जिस समय दुकान पर पहुंचे तो सरकारी ज़बान में आग पर काबू पाया जा चुका था। जिसमें फ़ायर बिग्रेड की मुस्तैदी और भरपूर कार्यक्षमता के अलावा इसका भी बड़ा दख्ल़ था कि अब जलने के लिये कुछ रहा नहीं था। शोलों की लपलपाती ज़बानें काली हो चुकी थीं।

अलबत्ता चीड़ के तख्त़े अभी तक धड़-धड़ जल रहे थे, और वातावरण दूर-दूर तक उनकी तेज़ खुशबू में नहाया हुआ था। माल जितना था सब जल कर राख हो चुका था, सिर्फ़ कोने में उनका छोटा सा दफ़्तर बचा था।

अरसा हुआ, कानपुर में जब लाला रमेश चन्द्र ने उनसे कहा कि हालात ठीक नहीं हैं, गोदाम की इंश्योरेंस पालिसी ले लो, तो उन्होंने मलमल के कुर्ते की चुनी हुई आस्तीन उलट कर अपने बाज़ू की फड़कती हुई मछलियां दिखाते हुए कहा था। “ यह रही यारों की इंश्योरेंस पालिसी! “ फिर अपने डंटर फुला कर लाला रमेश चन्द्र से कहा, ”ज़रा छू कर देखो“ लाला जी ने अचम्भे से कहा ”लोहा है लोहा!” बोले ”नहीं फ़ौलाद कहो।“

दुकान के सामने लोगों की भीड़ लगी थी। उनको लोगों ने इस तरह रास्ता दिया जैसे जनाज़े को देते हैं। उनका चेहरा एकदम भावहीन था। उन्होंने अपने दफ्तर का ताला खोला। इनकमटैक्स का हिसाब और रजिस्टर बगल़ में दाबे और गोदाम के पश्चिमी हिस्से में जहां चीड़ से अभी शोले और खुशबू की लपटें उठ रही थीं, तेज़-तेज कदमों से गये। पहले इनकमटैक्स के खाते और उनके बाद चाबियों का गुच्छा आग में डाला। फिर आहिस्ता-आहिस्ता दायें-बायें नज़र उठाये बिना दुबारा अपने दफ्त़र में दाखिल हुए। हवेली का फ़ोटो दीवार से उतारा। रूमाल से पोंछ कर बगल़ में दबाया और दुकान जलती छोड़ कर घर चले आये।

बीबी ने पूछा ”अब क्या होयेगा?“

उन्होंने सर झुका लिया।

अक्सर ख्याल आता है, अगर फ़रिश्ते उन्हें जन्नत की तरफ़ ले गये जहां मोतिया धूप होगी और कासनी बादल, तो वो जन्नत के दरवाज़े पर कुछ सोच कर ठिठक जायेंगे। दरबान जल्दी अंदर दाखिल होने का इशारा करेगा तो वो सीना ताने उसके पास जा कर कुछ दिखाते हुए कहेंगे:

“यह छोड़ कर आये हैं।“

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[अगले शुक्रवार से नयी कहानी प्रस्तुत की जायेगी]

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1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था 17. बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है. 18. खरबूजा खुद को गोल कर ले तब भी तरबूज नहीं बन सकता 19. कौन कैसे टूटता है ?

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किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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जो लोग इस श्रंखला को पढ़ रहे होंगे वो किबला के बारे में जानते हैं कि वह कैसे हैं. उन्होने किबला के अपनी पत्नी के प्रति वफादारी निभाने वाले मानवीय रूप को भी देखा है. आज किबला टूट रहे हैं. यह बहुत ही मार्मिक है और इसमें जीवन का पूरा दर्शन भी है. ऎसी कई अवस्थाऎं कईयों की जीवन में अक्सर आती है. आदमी जब टूटता है तो कैसे बदलता है? कैसे उसका अभिमान नष्ट होता है. आइये पढें….

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कौन कैसे टूटता है

दस पंद्रह मिनट बाद वो दुकान में ताला डाल कर घर चले आये और बीबी से कह दिया, अब हम दुकान नहीं जायेंगे। कुछ देर बाद मोहल्ले की मस्जिद से इशा (रात की नमाज़) की आवाज़ बुलन्द हुई और वो दूसरे ही “अल्ला हो अकबर” पर हाथ-पांव धो कर कोई चालीस साल बाद नमाज़ के लिये खड़े हुए तो, बीबी धक से रह गयीं कि खैर तो है। वो खुद भी धक से रह गये। इसलिये कि उन्हें दो सूरतों के अलावा कुछ याद नहीं रहा था। वितरे भी अधूरे छोड़ कर सलाम फेर लिया कि यह तक याद नहीं आ रहा था कि दुआये-क़ुनूत (नमाज़ में पढ़ी जाने वाली दुआ) के शुरू के शब्द क्या हैं।

वो सोच भी नहीं सकते थे कि आदमी अंदर से टूट भी सकता है और यूं टूटता है। और जब टूटता है तो अपनों, बेगानों से, हद यह कि अपने सबसे बड़े दुश्मन से भी सुल्ह कर लेता है यानी अपने-आप से। इसी मंज़िल पर अंत:दृष्टि खुलती है, बुद्धि और चेतना के दरवाज़े खुलते हैं।

ऐसे भी लोग हैं जो ज़िंदगी की सख्त़ियों, परेशानियों से बचने की खातिर खुद को अकर्मण्यता के घेरे में कैद रखते हैं। ये भारी और क़ीमती पर्दों की तरह लटके-लटके ही लीर-लीर हो जाते हैं। कुछ गुम-सुम गम्भीर लोग उस दीवार की तरह तड़ख़ते हैं जिसकी महीन-सी दरार, जो उम्दा पेंट या किसी सजावटी तस्वीर से आसानी से छुप जाती है, इस बात की चुगल़ी खाती है कि नींव अंदर ही अंदर सदमे से ज़मीन में ध्ंस रही है। कुछ लोग चीनी के बर्तन की तरह टूटते हैं कि मसाले से आसानी से जुड़ तो जाते हैं, मगर बाल और जोड़ पहले नज़र आता है, बर्तन बाद में। कुछ ढीठ और चिपकू लोग ऐसे अटूट पदार्थ के बने होते हैं कि च्विगंम की तरह कितना ही चबाओ टूटने का नाम नहीं लेते। ”खींचने से खिंचते हैं छोड़े से जाते हैं सुकड़” आप उन्हें हिक़ारत से थूक दें तो जूते से इस बुरी तरह चिपकते हैं कि छुटाये नहीं छूटते। रह-रह कर ख्याल आता है कि इससे तो दांतों तले ही भले थे कि पपोल तो लेते थे। ये च्विंगम लोग खुद आदमी नहीं पर आदमी की पहचान रखने वाले लोग हैं। यह कामयाब लोग हैं। इन्होंने इंसान को देखा, परखा और बरता है और उसे खोटा पाया तो खुद भी खोटे हो गये, और कुछ ऐसे भी हैं कि कार के विंड स्क्रीन की तरह होते हैं। साबुत और ठीक हैं तो ऐसे पारदर्शी कि दुनिया का नज़ारा कर लो और एकाएक टूटे तो ऐसे टूटे कि न बाल पड़ा न दरके, न तड़खे ऐसे रेज़ा रेज़ा हुए कि न वो पहचान रही, न दुनिया की जलवागरी रही, न आईने का पता कि कहां था, किधर गया।

और एक अभिमान है कि यूं टूटता है जैसे राजाओं का प्रताप। हज़रत सुलेमान छड़ी की टेक लगाये खड़े थे कि मृत्यु आ गयी लेकिन उनका बेजान शरीर एक मुद्दत तक उसी तरह खड़ा रहा और किसी को शक तक न गुज़रा कि वो इंतक़ाल फ़र्मा चुके हैं। वो उसी तरह बेरूह खड़े रहे और उनके रोब व दबदबे से कारोबारे-सल्तनत नियम के अनुसार चलता रहा। उधर छड़ी को धीरे-धीरे घुन अंदर से खाता रहा। यहां तक कि एक दिन वो चटाख से टूट गई और हज़रत सुलेमान की नश्वर देह ज़मीन पर आ गई। उस समय उनकी प्रजा पर खुला कि वो दुनिया से पर्दा फ़र्मा चुके हैं।

सो वो दीमक लगी गुरूर-गुस्से की छड़ी, जिसके बल क़िबला ने ज़िंदगी गुज़ारी थी, आज शाम टूट गयी और जीने का वो जोश और हंगामा भी खत़्म हो गया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[ रविवार को किबला की कहानी का अंतिम भाग प्रस्तुत किया जायेगा ]

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था 17. बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है. 18. खरबूजा खुद को गोल कर ले तब भी तरबूज नहीं बन सकता

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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किबला वाली कहानी का अंत अब निकट है. इसमें व्यंग्य के साथ साथ करुणा भी है और जीवन की सच्चाई भी. अब आप आगे पढ़िये.

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हम जिधर जायें दहकते जायें

कराची में दुकान तो फिर भी थोड़ी बहुत चली, मगर क़िबला बिल्कुल नहीं चले। ज़माने की गर्दिश पर किसका ज़ोर चला है जो उनका चलता। हादसों को रोका नहीं जा सकता, हां, सोच से हादसों का ज़ोर तोड़ा जा सकता है। व्यक्तित्व में पेच पड़ जायें तो दूसरों के अतिरिक्त खुद अपने-आप को भी तकलीफ़ देते हैं, लेकिन जब वो निकलने लगें तो और अधिक कष्ट होता है। कराची आने के बाद अक्सर कहते कि डेढ़ साल जेल में रह कर जो बदलाव मुझमें न आया, वो यहां एक हफ्ते में आ गया। यहां तो बिज़नेस करना ऐसा है जैसे सिंघाड़े के तालाब में तैरना। कानपुर ही के छुटे हुए छाकटे यहां शेर बने दनदनाते फिरते हैं और अच्छे-अच्छे शरीफ़ हैं कि गीदड़ की तरह दुम कटवा के भट में जा बैठे। ऐसा बिजागे पडा कि ”ख़ुद-ब- ख़ुद बिल में है हर शख्श समाया जाता” जो बुद्धिमान हैं वो अपनी दुमें छुपाये बिलों में घुसे बैठे हैं , बाहर निकलने की हिम्मत नहीं पड़ती। इस पर मिर्ज़ा ने हमारे कान में कहा:

‘अनीस ‘दुम“ का भरोसा नहीं, ठहर जाओ’

एक दोस्त ने अपनी इज़्जत-आबरू जोखिम में डालकर क़िबला से कहा कि गुज़रा हुआ ज़माना लौट कर नहीं आ सकता। हालात बदल गये हैं, आप भी खुद को बदलिये, मुस्कुरा के बोले खरबूजा खुद को गोल कर ले तब भी तरबूज नहीं बन सकता। बात यह थी कि ज़माने का रुख पहचानने की शक्ति, क्षमता, नर्मी और लचक न उनके स्वभाव में थी और न ज़मींदाराना माहौल और समाज में इनकी गिनती गुणों में होती थी। सख्त़ी, अभिमान, गुरूर और गुस्सा अवगुण नहीं बल्कि सामंती चरित्र की मजबूती की दलील समझे जाते थे और जमींदार तो एक तरफ़ रहे, उस जमाने के धर्मिक स्कॉलर तक इन गुणों पर गर्व करते थे।

क़िबला के हालात तेजी से बिगड़ने लगे तो उनके हमदर्द मियां इनआम इलाही ने, जो छोटे होने के बावजूद उनके स्वभाव और मामलात में दख्ल़ रखते थे, कहा कि दुकान खत्म करके एक बस खरीद लीजिये। घर बैठे आमदनी होगी। रूट परमिट मेरा ज़िम्मा। आजकल इस धन्धे में बड़ी चांदी है, एकदम जलाल (तेज गुस्सा) आ गया। फ़र्माया चांदी तो तबला सारंगी बजाने में भी है। एक रख-रखाव की रीत बुजुर्गों से चली आ रही है, जिसका तकाजा है कि बरबाद होना ही मुक़द्दर में लिखा है तो अपने पुराने और आज़माये हुए तरीके से होंगे, बंदा ऐसी चांदी पर लात मारता है।

आख़िरी गाली

कारोबार मन्दा बल्कि बिल्कुल ठंडा, तबीयत में उदासी। दुकानदारी अब उनकी आर्थिक नहीं, मानसिक आवश्यकता थी। समझ में नहीं आता था कि दुकान बंद कर दी तो घर में पड़े क्या करेंगे, फिर एक दिन यह हुआ कि उनका नया पठान मुलाज़िम ज़र्रीन गुल खान कई घंटे देर से आया। वो हर प्रकार से गुस्से को पीने की कोशिश करते थे लेकिन पुरानी आदत कहीं जाती है। चन्द माह पहले उन्होंने एक साठ साला मुंशी आधी तनख्व़ाह पर रखा था, जो गेरुवे रंग का ढीला-ढाला लबादा पहने, नंगे पैर ज़मीन पर आल्थी-पाल्थी मारे हिसाब किताब करता था। कुर्सी या किसी भी ऊंची चीज पर बैठना उसके सम्प्रदाय में मना था।

वारसी सिलसिले के किसी बुजुर्ग से दीक्षा ली थी। मेहनती, ईमानदार, रोजे नमाज का पाबन्द, तुनकमिजाज और काम में चौपट था। क़िबला ने तैश में आकर एक दिन उसे हरामखोर कह दिया। सफ़ेद दाढ़ी का लिहाज़ भी न किया। उसने आराम से कहा ”दुरुस्त! हज़ूर के यहां जो चीज़ मिलती है वही तो फ़कीर खायेगा।सलाम अलैकुम” और ये जा वो जा। दूसरे दिन से मुंशी जी ने नौकरी पर आना और क़िबला ने हरामखोर कहना छोड़ दिया, लेकिन हरामखोर के अलावा और भी तो दिल दुखाने वाले बहुतेरे शब्द हैं। ज़र्रीन गुल खान को सख्त़ सुस्त कहते-कहते उनके मुंह से रवानी और गुस्से में वही गाली निकल गयी जो अच्छे दिनों में उनका तकिया कलाम हुआ करती थी। गाली की भयानक गूंज दर्रा-आदम खो़ल के पहाड़ों तक ठनठनाती पहुंची, जहां ज़र्रीन गुल की विधवा मां रहती थी। वो छ: साल का था जब मां ने वैध्व्य की चादर ओढ़ी थी। बारह साल का हुआ तो उसने वादा किया था कि मां! मैं बड़ा हो जाउंफगा तो नौकरी करके तुझे पहली तनख्व़ाह से बगै़र पैवंद की चादर भेजूंगा। उसे आज तक किसी ने यह गाली नहीं दी थी। जवान खून,गुस्सैल स्वभाव, पठान के स्वाभिमान का सवाल था। ज़र्रीन गुल खान ने उनकी तिरछी टोपी उतार कर फ़ैंक दी और चाक़ू तान कर खड़ा हो गया। कहने लगा ”बुड्ढे! मेरे सामने से हट जा, नहीं तो अभी तेरा पेट फाड़ के कलेजा कच्चा चबा जाऊंगा। तेरा पलीद मुर्दा बल्ली पे लटका दूंगा।“

एक ग्राहक ने बढ़कर चाकू छीना। बुड्ढे ने झुक कर ज़मीन से अपनी मख़मली टोपी उठायी और गर्द झाड़े बगै़र सर पर रख ली।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था 17. बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है.

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किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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व्यंग्य हो और उसमें छिपा हुआ ग़म ना हो तो फिर कैसा व्य़ंग्य. अब कौन कहेगा कि क़िबला जो इतने गुस्सैल हैं वो दिल के कितने पाक-साफ हैं. आप भी देखिये क्या है उनकी ज़िन्दगी का ग़म.

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अपाहिज बीबी और गश्ती चिलम

उनकी जिंद़गी का एक पहलू ऐसा था जिसके बारे में किसी ने उन्हें इशारों में भी बात करते नहीं सुना। हम शुरु में बता चुके हैं कि उनकी शादी बड़े चाव-चोंचले से हुई थी। बीबी बहुत खूबसूरत, नेक और सुघड़ थीं। शादी के कुछ साल बाद एक ऐसी बीमारी हुई कि कलाइयों तक दोनों हाथों से अपंग हो गयीं। क़रीबी रिश्तेदार भी मिलने से बचने लगे। रोज़मर्रा की मुलाक़ातें, शादी-गम़ी में जाना, सभी सिलसिले आहिस्ता-आहिस्ता टूट गये। घर का सारा काम आया और नौकर तो नहीं कर सकते। क़िबला ने जिस मुहब्बत और दर्दमंदी से तमाम उम्र उनकी सेवा और देख-रेख की, इसका उदाहरण मुश्किल से मिलेगा। कभी ऐसा नहीं हुआ कि उनकी चोटी बेगुंथी और दुपट्टा बेचुना हो, या जुमे को कासनी रंग का न हो। साल गुज़रते चले गये, समय ने सर पर कासनी दुपट्टे के नीचे रुई के गाले जमा दिये। मगर उनकी सेवा और प्यार में जरा जो फर्क आया हो। विश्वास नहीं होता था कि दोस्ती और मुहब्बत का यह रूप उसी गुस्सैल आदमी का है जो घर के बाहर एक चलती हुई तलवार है। ज़िंदगी भर का साथ हो तो सब्र और स्वभाव की परीक्षा के हज़ार मोड़ आते हैं, मगर उन्होंने उस बीबी से कभी ऊंची आवाज में भी बात नहीं की। कहने वाले कहते हैं कि उनकी झल्लाहट और गुस्से की शुरुआत इसी बीमारी से हुई। वो बीबी तो मुसल्ले (नमाज़ पढ़ने का कपड़ा) पर ऐसी बैठीं कि दुनिया ही में जन्नत मिल गयी। क़िबला को नमाज़ पढ़ते किसी ने नहीं देखा, लेकिन ज़िन्दगी भर जैसी सच्ची मुहब्बत और रातों को उठ-उठ कर जैसी रियाज़त (तपस्या) उन्होंने की, वही उनका दुरूद वज़ीफ़ा (एक तरह की दुआ) और वही उनकी आधी रात की दुआयें थीं। वह बड़ा बख्श़न-हार है, शायद यही उनकी मुक्ति का वसीला बन जाये। एक दौर ऐसा भी आया कि बीबी से उनकी परेशानी देखी न गयी। खुद कहा, किसी रांड बेवा से शादी कर लो। बोले, हां! भगवान! करेंगे। कहीं दो गज़ ज़मीन का एक टुकड़ा है जो न जाने कब से हमारी बरात की राह देख रहा है। वहीं चार कांधें पर डोला उतरेगा। बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है

सो जायेंगे इक रोज़ ज़मीं ओढ़ के हम भी

बीबी की आंखों में आंसू देखे तो बात का रुख़ फेर दिया। वो अपनी सारी इमेजिरी लकड़ी, हुक्के और तम्बाकू से लिया करते थे। बोले, बीबी! यह रांड बेवा की कैद तुमने क्या सोच के लगायी? तुमने शायद वो पूरबी कहावत नहीं सुनी: “पहले पीवे भकुवा, फिर पीवे तमकुवा, पीछे पीवे चिलम चाट” यानी जो आदमी पहले हुक्का पीता है वो बुद्धू है कि दरअस्ल वो तो चिलम सुलगाने और ताव पर लाने में ही जुटा रहता है। तम्बाकू का अस्ल मजा तो दूसरे आदमी के हिस्से में आता है और जो अन्त में पीता है वो जले हुए तम्बाकू से खाली भक-भक करता है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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पिछ्ली पोस्ट में नीरज जी ने कहा. “किताब हर लिहाज़ से विलक्षण है. शब्द यहाँ जादू से जगाते लगते हैं…हैरानी होती है पढ़ के की इंसान के जेहन में ऐसे जुमले आ कहाँ से जाते हैं…ये किताब हर समझदार इंसान को पढ़नी चाहिए…”

संजीत जी बोले ” वाकई शानदार शब्द चित्र। अभी तक आपने इस किताब के जितने भी अंश उपलब्ध करवाए उन्हे पढ़कर तो यही कहा जा सकता है कि वाकई अद्भुत!!

अब आगे पढिये..

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दरिया के बहाव के विरुद्ध तैरने में तो खैर कोई नुक्स़ान नहीं, हमारा मतलब है दरिया का नुक्स़ान नहीं, लेकिन क़िबला तो सैकड़ों फ़ुट की ऊंचाई से गिरते हुए नियाग्रा फ़ॅाल पर तैर कर चढ़ना चाहते थे या यूं कहिये कि तमाम उम्र नीचे उतरने वाले एस्केलेटर से ऊपर चढ़ने की कोशिश करते रहे और एस्केलेटर बनाने वाले को गालियां देते रहे। एक दिन कहने लगे ”मियां यह तुम्हारा शहर भी अजीब शहर है। न खरीदारी की तमीज़, न छोटों के आदाब, न किसी के बड़प्पन का लिहाज़।मैं जिस ज़माने में बिशारत मियां के साथ बिहार कालोनी में रहता था, उस ज़मानेमें रेडियो में कार की बैटरी लगानी पड़ती थी। बिहार कालोनी में बिजली नहीं थी। उसका रखना और चलाना एक दर्दे-सर था। बिशारत मियां रोज़ाना बैटरी अपने कारखाने ले जाते और चार्ज होने के लिये आरा मशीन में लगा देते। सात आठ घंटे में इतनी चार्ज हो जाती थी कि बस एकाध घंटे बी. बी. सी. सुन लेता था। इसके बाद रेडियो से आरा मशीन की आवाजें आने लगतीं और मैं उठ कर चला आता। घर के पिछवाड़े एक पच्चीस फ़ुट ऊंची, निहायत क़ीमती, बेगांठ बल्ली गाड़ कर एरियल लगा रखा था। इसके बावजूद वो रेडियो ऊंचा सुनता था। आये दिन पतंग उड़ाने वाले लौंडे मेरे एरियल से पेच लड़ाते। मतलब यह कि उसमें पतंग उलझा कर ज़ोर आज़माई करते। डोर टूट जाती, एरियल खऱाब हो जाता। अरे साहब! एरियल क्या था, पतंगों का हवाई क़ब्रिस्तान था। उस पर यह कटी पतंगें चौबीस घंटे इस तरह फड़फड़ाती रहतीं जैसे सड़क के किनारे किसी नये मरे हुए पीर के मज़ार पर झंडियां। पच्चीस फ़ुट की ऊंचाई पर चढ़ कर एरियल दोबारा लगाना, न पूछिये कैसा कष्टदायक था। बस यूं समझिये! सूली पे लटक के बी. बी. सी. सुनता था। बहरहाल, जब बर्नस रोड वाले फ्रल़ैट में जाने लगा तो सोचा वहां तो बिजली है, चलो रेडियो बेचते चलें। बिशारत मियां भी तंग आ गये थे कहते थे, इससे तो पतंगों की पफड़पफड़ाहट ब्रॉडकास्ट होती रहती है। एक दूर के पड़ोसी से २५० रुपये में सौदा पक्का हो गया। सवेरे-सवेरे वो नक़द रक़म ले आया और मैंने रेडियो उसके हवाले कर दिया। रात को ग्यारह बजे फाटक बंद करने बाहर निकला तो क्या देखता हूं कि वो आदमी और उसके बैल जैसी गर्दन वाले दो बेटे कुदाल, फावड़ा लिये मज़े से एरियल की बल्ली उखाड़ रहे हैं। मैंने डपट कर पूछा, ये क्या हो रहा है? सीना ज़ोरी देखिये! कहते हैं बड़े मियां, बल्ली उखाड़ रहे हैं, हमारी है।

”ढाई सौ रुपये में रेडियो बेचा है, बल्ली से क्या मतलब?

मतलब नहीं तो हमारे साथ चलो और ज़रा बल्ली के बिना बजा के दिखा दो। यह तो इसकी Accessory है।“

”न हुआ कानपुर, साले की ज़ुबान गुद्दी से खींच लेता और इन हरामी पिल्लों की बैल जैसी गर्दन एक ही बार में भुट्टा-सी उड़ा देता। मैंने तो ज़िंदगी में ऐसा बेईमान आदमी नहीं देखा। इस दौरान वो कमीन बल्ली उखाड़ के ज़मीन पे लिटा चुका था। एक बार जी में आया कि अंदर जा कर १२ बोर ले आऊं और इसे भी बल्ली के बराबर लम्बा लिटा दूं, फ़िर ख्याल आया कि बंदूक़ का लाइसेंस तो समाप्त हो चुका है और कमीने के मुंह क्या लगना, इसकी बेकुसूर बीबी रांड हो जायेगी। वो ज़ियादा क़ानून छांटने लगा तो मैंने कहा, जा जा, तू क्या समझता है? बल्ली की हक़ीक़त क्या है, ये देख, ये छोड़ के आये हैं।“

क़िबला हवेली की तस्वीर दिखाते ही रह गये और वो तीनों बल्ली उठा कर ले गये।

जारी………………   [अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]    

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. खोया पानी: ओलती की टपाटप

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किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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यूसूफी साहब शब्द चित्र खीचने में माहिर हैं. एक छोटा सा उदाहरण देखिये जहाँ सत्तर साल के किबला अपने गांव की पुराने दिनों की याद में खो जाते हैं.

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सत्तर साल के बच्चे की सोच में तस्वीरें गडमड होने लगतीं। खुशबुऐं, नरमाहटें और आवाजें भी तस्वीरें बन-बन कर उभरतीं। उसे अपने गांव में मेंह बरसने की एक-एक आवाज अलग सुनाई देती। टीन की छत पर तड़-तड़ बजते हुए ताजे, सूखे पत्तों पर करारी बूंदों का शोर, पक्के फ़र्श पर जहां उंगल भर पानी खड़ा हो जाता, वहां मोटी बूंद गिरती तो मोतियों का एक ताज-सा हवा में उछल पड़ता, तपती खपरैलों पर उड़ती बदली के झाले की सनसनाहट, गर्मी के दानों से उपेड़ बालक-बदन पर बरखा की पहली फुहार, जैसे किसी ने मेंथोल में नहला दिया हो, जवान बेटे की कब्र पर पहली बारिश और मां का नंगे सर आंगन में आ-आ कर आसमान की तरपफ़ देखना, फबक उठने के लिये तैयार मिट्टी पर टूट के बरसने वाले बादल की हरावल गरम लपट, ढोलक पर सावन के गीत की ताल पर बजती चूड़ियां और बेताल ठहाके, सूखे तालाब के पेंदे की चिकनी मिट्टी में पड़ी हुई दराड़ों के जाल में तरसा-तरसा कर बरसने वाली बारिश के सरसराते रेले। खम्बे से लटकी हुई लालटेन के सामने जहां तक रोशनी थी, मोतियों की रिमझिम झालर, हुमक-हुमक कर पराये आंगन में गिरते परनाले। आमों के पत्तों पर मंजीरे बजाती नर्सल बौछार और झूलों पर पींगे लेती लड़कियां और फिर रात के सन्नाटे में, पानी थमने के बाद, सोते जागते ओलती की टपाटप। ओलती की टपाटप तक पहुंचते-पहुंचते

क़िबला की आंखें जल-थल हो जातीं। बारिश तो हम उन्हें लाहौर और नथैया गली की ऐसी दिखा सकते थे कि बीती उम्र की सारी टपाटप भूल जाते। पर ओलती कहां से लाते? इसी तरह आम तो हम मुलतान का एक से एक पेश कर सकते थे। दसहरी, लंगड़ा, समर बहिश्त, अनवर रटौल, लेकिन हमारे पंजाब में तो ऐसे पेड़ हैं ही नहीं जिनमें आमों की जगह लड़कियां लटकी हुई हों।

इसलिये ऐसे अवसर पर हम खामोश, हमातन-गोश (पूरा शरीर कान बन जाता) बल्कि खरगोश बने ओलती की टपाटप सुनते रहते।

जारी………………       

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उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
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एक अच्छे व्यंगकार की खासियत है कि हास्य के रंगो के साथ साथ यथार्थ के ऎसे रंग मिलाये जायें कि पाठक को पता भी ना चले और गहरी से गहरी बात उसके दिमाग में सीधे उतर जाये.अंतिम पैरे में किबला के गांव का वर्णन तो देखिये. लगता है पूरा का पूरा चित्र आंखों के सामने उतर आया है.

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कराची शहर उन्हें किसी तरह और किसी तरफ़ से अच्छा नहीं लगा। झुंझला कर बार-बार कहते “अमां! यह शहर है या जहन्नुम ?“ मिर्जा किसी ज्ञानी के शब्दों में तब्दीली करके कहते हैं, क़िबला इस दुनिया से कूच करने के बाद अगर खुदा करे, वहीं पहुंच गये जिससे कराची की मिसाल दिया करते हैं तो चारों तरफ़ नज़र दौड़ाने के बाद यह कहेंगे कि हमने तो सोचा था कराची छोटा-सा जहन्नुम है। जहन्नुम तो बड़ा-सा कराची निकला।

एक बार उनके एक क़रीबी दोस्त ने उनसे कहा कि तुम्हें समाज में खराबियां ही खराबियां नज़र आती है तो बैठे-बैठे इन पर कुढ़ने की जगह सुधार की सोचो। बोले, “सुनो! मैंने एक जमाने में पी. डब्ल्यू. डी. के काम भी किये हैं, मगर नर्क की एयर-कंडीशनिंग का ठेका नहीं ले सकता।

बात सिर्फ इतनी थी कि अपनी छाप, तिलक और छब छिनवाने से पहले वो जिस आईने में खुद को देख-देख कर सारी उम्र इतराया किये, उसमें जब नई दुनिया और नये वतन को देखा तो वह ज़माने की गर्दिशों से Distorting Mirror बन चुका था। जिसमें हर शक्ल अपना ही मुंह चिढ़ाती नज़र आती थी। उनके कारोबारी हालात तेजी से बिगड़ रहे थे। बिजनेस, न होने के बराबर था। उनकी दुकान पर एक तख़्ती लटके देख कर हमें दु:ख हुआ।

न पूछ हाल मिरा, चोबे-ख़ुश्के-सहरा हूं

लगा के आग जिसे कारवां रवाना हुआ

(मेरा हाल न पूछ मैं रेगिस्तान की सूखी लकड़ी हूं, जिसे आग लगा कर कारवां चला गया हमने उनका दिल बढ़ाने के लिये कहा, आपको चोबे-खुश्क (सूखी लकड़ी कौन कह सकता है? आपकी जवां हिम्मती और मुस्तैदी पर तो हमें ईर्ष्या ही होती है। अकस्मात मुस्कुराये, जबसे डेन्चर्ज़ टूटे, मुंह पर रूमाल रख कर हंसने लगे थे। कहने लगे, आप जवान आदमी हैं। अपना तो यह हाल हुआ कि

मुन्फइल हो गये क़वा ग़ालिब

अब अनासिर में एतदाल कहां

(सारे अंग प्रत्यंग कमज़ोर हो गये। अब तत्वों में सामंजस्य कहाँ) मैं वो पेड़ हूं जो ट्रेन में जाते हुए मुसाफिर को दौड़ता हुआ नज़र आता है।)

मेरे ही मन का मुझ पर धावा

यूं वो जहां तक मुमकिन हो अपने गुस्से को कम नहीं होने देते थे, कहते थे मैं ऐसी जगह एक मिनट भी नहीं रहना चाहता, जहां आदमी, किसी पर गुस्सा ही न हो सके और जब उन्हें ऐसी ही जगह रहना पड़ा तो वो ज़िन्दगी में पहली बार अपने आपसे रूठे। अब वो आप ही आप कुढ़ते, अंदर ही अंदर खौलते, जलते, सुलगते रहते:

मेरे ही मन का मुझ पर धावा

मैं ही आग  हूं,  मैं  ही    ईधन

उन्हीं का कहना है कि याद रखो, गुस्सा जितना कम होगा, उसकी जगह उदासी लेती जायेगी, और यह बड़ी बुज़दिली की बात है। बुज़दिली के ऐसे ही उदास लम्हों में अब उन्हें अपना गांव जहां बचपन गुजरा था, बेतहाशा याद आने लगता। बिखरी-बिखरी ज़िंदगी ने अतीत में शरण तलाश कर ली। जैसे अलबम खुल गया।

धुन्धली, पीले से रंग की तस्वीरें विचार-दर्पण में बिखरती चली जातीं। हर तस्वीर के साथ ज़माने का पृष्ठ उलटता चला गया। हर स्नेप शॉट की अपनी एक कहानी थी। धूप में अबरक के जरों से चिलकती कच्ची सड़क पर घोड़ों के पसीने की नर महकार, भेड़ के बच्चे को गले में मफ़लर की तरह डाले शाम को खुश-खुश लौटते किसान। पर्दों के पीछे हरसिंगार के फूलों से रंगे हुए दुपट्टे, अरहर के हरे-भरे खेत में पगडंडी की मांग, सूखे में सावन के थोथे बादलों को रह-रह कर ताकती निराश आंखें, जाड़े की उजाड़ रातों में ठिठुरते गीदड़ों की आवाजें, चिराग़ जले बाड़े में लौटती गायों के गले में बजती हुई घंटियां। काली भंवर रात में चौपाल की जलती बुझती गश्ती चिलम पर लम्बे होते हुए कश, मोतिया के गजरों की लपट के साथ कुंवारे बदन की महक, डूबते सूरज की पीली रोशनी में ताशा क़ब्र पर जलती हुई अगरबत्ती का बल खाता धुंआ, दहकती बालू में तड़कते चनों की सोंधी लपट से फड़कते हुए नथुने, म्यूनिसपिल्टी की मिट्टी के तेल की लालटेन का भभका। यह थी उनके गांव की सत सुगंध। यह उनकी अपनी नाभि की महक थी, जो यादों के जंगल में बावली फिरती थी।

जारी………………        ===========================================

पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

 

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

[ व्यंग्य की दुनिया का अद्भुत नमूना है “खोया पानी”. यदि किसी को व्य़ंगकार की ओबजर्वेशन की ताकत का पता करना हो तो इस उपन्यास को पढ़े.यह पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ जी.  इस उपन्यास की टैग लाइन है “एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास” जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.इसी उपन्यास को छोटे छोटे भागों में यहां पेश किया जा रहा है. यदि आपने पहले की कडियाँ ना पढ़ी हों तो आपने बहुत कुछ मिस कर दिया. अब आगे पढिये.]

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पहली नज़र में उन्होंने कराची को और कराची ने उनको रद्द कर दिया। उठते बैठते कराची में कीड़े डालते। शिकायत का अंदाज़ कुछ ऐसा होता था। हज़रत! यह मच्छर हैं या मगरमच्छ? कराची का मच्छर डीडीटी से भी नहीं मरता, सिर्फ कव्वालों की तालियों से मरता है या ग़लती से किसी शायर को काट ले तो बावला होकर बेऔलाद मरता है। नमरूद (वह व्यक्ति जिसने पैग़म्बर इब्राहीम को जलाने की कोशिश की थी ) की मौत नाक में मच्छर घुसने से हुई थी। कराची के मच्छरों की वंशावली कई नमरूदों से होती हुई उसी मच्छर की वंशावली से जा मिलती है और जरा ज़बान तो देखिये। मैंने पहली बार एक साहब को पट्टे वाला पुकारते सुना तो मैं समझा अपने कुत्ते को बुला रहे हैं। मालूम हुआ कि यहां चपरासी को पट्टे वाला कहते हैं। हर समय कुछ न कुछ फ़ड्डा और लफ़ड़ा होता रहता है, टोको तो कहते हैं उर्दू में इस स्थिति के लिये कोई शब्द नहीं है। भाई मेरे! उर्दू में यह स्थिति भी तो नहीं है। बम्बई वाले शब्द और स्थितियां दोनों अपने साथ लाये हैं। मीर तकी मीर ऊंट गाड़ी में मुंह बांधे बैठे रहे, अपने हमसफ़र से इसलिये बात न की कि “ज़बाने-गै़र से अपनी ज़बां बिगड़ती है “ मीर साहब कराची में होते तो बखुदा मुंह पर सारी उम्र ढाटा बांधे फिरते। यहां तक कि डाकुओं का सा भेस बनाये फिरने पर किसी डकैती में धर लिये जाते। अमां ! टोंक वालों को अमरुद को सफ़री (पित्त बनाने वाला ) कहते तो हमने भी सुना था। यहां अमरूद को जाम कहते हैं और उस पर नमक मिर्च की जगह साहब लगा दें तो अभिप्राय नवाब साहब लासबेला होते हैं। अपनी तरफ़ विक्टोरिया का मतलब मल्का टूरिया होता था। यहां किसी तरकीब से दस-बारह जने एक घोड़े पर सवारी गांठ लें तो उसे विक्टोरिया कहते हैं। मैं दो दिन लाहौर रुका था। वहां देखा कि जिस बाज़ार में कोयलों से मुंह काला किया जाता है वह हीरा मंडी कहलाती है। अब यहां नया फैशन चल पड़ा है। गाने वालों को गुलूकार और लिखने वाले को क़लमकार कहने लगे हैं। मियां ! हमारे समय में तो सिर्फ नेककार (अच्छे लोग) और बदकार (बुरे लोग ) हुआ करते थे। कलम और गले से ये काम नहीं लिया जाता था। मैंने लालू खेत,बिहार-कालोनी, चाकीवाड़ा और गोलीमार का चप्पा-चप्पा देखा है। चौदह-पन्द्रह लाख आदमी ज़ुरूर रहते होंगे, लेकिन कहीं किताब और इत्र की दुकान न देखी। काग़ज़ तक के फूल नज़र न आये। कानपुर में हम जैसे शरीफों के घराने में कहीं न कहीं मोतिया की बेल जुरूर चढ़ी होती थी। जनाब! यहां मोतिया सिर्फ आंखों में उतरता है। हद हो गई, कराची में लखपति, करोड़पति सेठ लकड़ी इस तरह नपवाता है जैसे किमख़्वाब का टुकड़ा ख़रीद रहा हो। लकड़ी दिन में दो फुट बिकती है और बुरादा खरीदने वाले पचास! मैंने बरसों उपलों पर पकाया हुआ खाना भी खाया है लेकिन बुरादे की अंगीठी पर जो खाना पकेगा वो सिर्फ नर्क में जाने वाले मुर्दों के चालीसवें के लिये मुनासिब है।

भर पाये ऐसे बिजनेस से! माना कि रुपया बहुत कुछ होता है, मगर सभी कुछ तो नहीं। पैसे को जुरूरत पूरी करने वाला कहा गया है। बिल्कुल ठीक। मगर जब ये खुद सबसे बड़ी आवश्यकता बन जाये तो वो सिर्फ मौत से दूर होगी। मैंने तो जिदंगी में ऐसी कानी-खुतरी लकड़ी नहीं बेची। बढ़ई का ये साहस कि छाती पे चढ़ के कमीशन मांगे। न दो तो माल को सड़े अंडे की तरह कयामत तक सेते रहो। हाय! न हुआ कानपुर। बिसौले से साले की नाक उतार कर हथेली पर रख देता कि जा! अपनी जुरवा (पत्नी) को महर में दे देना। वल्लाह! यहां का तो बाबा आदम ही निराला है। सुनता हूं, यहां के रेड लाइट एरिया नैपियर रोड और जापानी रोड पर तवायफें अपने-अपने दर्शनी झरोखों में लाल बत्तियां जलते ही कंटीली छातियों के पैड लगा कर बैठ जाती हैं। फिल्मों में भी इसी का प्रदर्शन होता है। यह तो वही बात हुई कि ओछे के घर तीतर, बाहर बांधूं कि भीतर। इस्लामी गणतंत्र की सरकार-बेसरोकार कुछ नहीं कहती, लेकिन किसी तवायफ़ को शादी ब्याह में मुजरे के लिये बुलाना हो तो पहले इसकी सूचना थाने को देनी पड़ती है। रंडी को परमिट राशनकार्ड पे मिलते हमने यहीं देखा। ऐश का सामान मांगने के वक़्त न मिला तो किस काम का। दर्शनी मंडियों में दर्शनी हुंडियों का क्या काम।

मिर्जा अब्दुल बेग इस स्थिति की कुछ और ही व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि तवायफ़ को थाने से N.O.C. इसलिये लेना पड़ता है कि पुलिस पूरी तरह इत्मीनान कर ले कि वो अपने धन्धे पर ही जा रही है। धार्मिक प्रवचन सुनने या राजनीति में हिस्सा लेने नहीं जा रही।

एक दिन क़िबला कहने लगे “अभी कुछ दिन हुए कराची की एक नामी गिरामी तवायफ़ का गाना सुनने का मौका मिला। अमां। उसका उच्चारण तो चाल चलन से भी ज़ियादा खराब निकला। हाय! एक ज़माना था कि शरीफ़ लोग अपने बच्चों को शालीनता सीखने के लिये चौक की तवायफों के कोठों पर भेजते थे। “ इस बारे में भी मिर्जा कहते हैं कि तवायफों के कोठों पर तो इसलिये भेजते थे कि बुजुर्गों के साथ रहने और घर के माहौल से बचे रहें।

जारी………………

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