परुली की शादी के बारे में कोई धारणा नहीं थी. वह तो यह भी नहीं जानती थी कि शादी का मतलब क्या होता है. उसके लिये तो शादी का मतलब सिर्फ इतना था कि शादी के बाद लड़की को घर छोड़ के जाना होता है,पढ़ाई बन्द हो जाती है,साड़ी पहननी पड़ती है और दूसरे घर में जाके घूंघट के अन्दर ही रहना पड़ता है.एक डेढ़ साल बाद एक बच्चा भी हो जाता है. यह कैसे होता है इसके बारे में भी उसे कोई विशेष जानकारी नहीं थी. स्कूल में बड़ी लड़कियां शादी और बच्चे की बातें रस ले लेकर करती. मुँह नीचे कर हँसती पर परुली को कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता.  

उसके बाबू आज मलगाड़ गांव गये थे पांडे जी से बात पक्की करने. परुली के दिल में जाने कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे. वह मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि किसी तरह बात टल जाये और वह अभी शादी करने से बच जाये.लेकिन ऐसा कैसे होगा यह उसे मालूम नहीं था. स्कूल में भी आज वह खोयी खोयी से रही.शाम को बाबू आये तो बहुत खुश थे.चाख (पहला कमरा) में बैठ कर घर वालों को पूरी बात रहे थे.हर बात में पांडे ज्यू की तारीफ..

“पांडे ज्यू भल मैस (अच्छे आदमी) ठहरे. भौत बढिया घर हुआ हो वह. घर में गोरु,बल्द सब ही हुए. जमीन भी भौत ठहरी. कित्ते नाली तो बता रहे थे. पांडे ज्यू आदमी भी अच्छे हुए.गोपाल भी अच्छा ही हुआ. कोई ऐब नहीं ठहरा उसे. दिल्ली जैसी जगह में ठहरा फिर भी कितना सौम्य. शिबौ-शिब भौत काम करना पड़ने वाला हुआ बल उसे. पांडे ज्यू कह रहे थे कि परुली को थोड़ी ‘सार-पतार’ ( तमीज, मैनर्स) आ जाये तो इसे भी कुछ दिनों के लिये दिल्ली भेज देंगे.मैने कहा आप जैसा भी करेंगे आप की ही हुई अब परुली……

आगे नहीं सुन पायी परुली. मलखंड (ऊपर वाला कमरा) में जाके रजाईयों के बीच मुँह छिपा कर रोने लगी. उसका डाक्टर बनने का सपना आंसूओं के साथ बहने लगा. आज पहली बार उसे अपनी लड़की होने का अहसास हुआ. एक लड़की किस हद तक मजबूर हो सकती है इस बात से मन ही मन उसे खुद से घृणा होने लगी. सब कितने खुश थे. वो उनकी खुशी नहीं छीनना चाहती थी लेकिन जो हो रहा था उसके लिये वह खुद को तैयार भी नहीं कर पा रही थी. मन में आता कि वह कह दे कि नहीं करनी उसे शादी. लेकिन क्या कह पायेगी वह यह सब और फिर लोग क्या कहेंगे..”जोस्ज्यू की लड़की ने शादी के लिये मना कर दिया” …कितनी तो बातें बनेंगी.. उसकी खुद की सहेलियाँ उससे बातें नहीं करेंगी…आंसूओं का सैलाब लगता था कि उसे बहा ले जायेगा… 

उधर घर में खुशी का माहौल था. परुली की ईजा भी बहुत खुश थी. बगल की काखी (चाची), कैंजा (मौसी), जेठज्या (ताई) और अन्य औरतें भी घर में बधाईयां देने आयीं

“भल भौ हो (अच्छा हुआ).. बड़ा अच्छा संबंध मिला बल.. ” .

हाँ हो सब गोल्ज्यू की किरपा हुई हो..” ..

“तो कब कर रहे हो ब्या ….मंगसीर (नवंबर-दिसंबर) में करोगे कि जेठ (मई-जून) में   

“इस साल तो परुली का बोर्ड हुआ .. इम्तयान (परीक्षा) हो जाये तो जेठ में ही करेंगे. पिठ्या (टीका,सगाई) कोई भल दिन देख के लगा देंगे”

यह बात परुली ने भी सुनी.रो रो कर उसकी आंखे लाल हो गयी थी पर उसे सुखद आश्चर्य हुआ कि शादी के लिये भी उसके बोर्ड की परीक्षाओं को को ध्यान में रखा जा रहा है. वह सोचने लगी कि यदि वह ईजा से डाक्टर बनने वाली बात करे तो शायद ईजा की समझ में बात आ जाये और अभी शादी ना करने के लिये मान जाये…लेकिन उसके बाबू और घर के अन्य लोग ईजा की बात मानेंगे यह अपने आप में एक बड़ा प्रश्न था. फिर भी उसे लगा कि उसे कम-से-कम अपनी ईजा से तो बात करनी ही चाहिये… उसे आशा की एक धुधली किरण दिखायी देने लगी…लेकिन फिर उसे चमुली की बात याद आयी…. “डॉक्टर बनना इतना आसान नही है परुली. ढेर सारे डबल (पैसे) लगते है बल. इत्ते सारे डबल तेरे बौज्यू कहाँ से लायेंगे.तेरे को तो हाईस्कूल ही करा रहे हैं वही बहुत है.”.यदि ईजा सब लोगों को मना भी ले तो उसे पढ़ायेंगे कैसे.

यह सब सोचते सोचते परुली के सर में दर्द होने लगा और वह ईजा का इंतजार करते करते सो गयी… 

जारी…..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ??

परुली सो तो गयी. दिन भर की थकी थी नींद भी आ गयी. लेकिन ना जाने कितने देर तक सपनों से लड़ती रही. कभी लगता कि वह एक भ्योल (ऊंची पहाड़ी) से नीचे गिरती जा रही है.चारों और कंटीली झाडियां हैं जिनको वह पकड़ने की कोशिश कर रही है पर वह हाथ नहीं आ रहीं.कभी लगता कि वह नौले से पानी ला रही है और उसकी तांबे की गगरी उसके सर से छिटक कर गिर गयी है और वह उसे पकड़ने दौड़ रही है या उसकी ईजा गाय को बांधने गोठ गयी तो गाय ने उसे ही सींग से मार दिया वह गिरी तो गाय उसे अपने पैरों के तले रौदते हुए चली गयी. रात भर इस तरह के सपनों से लड़ती रही. एक दो बार आंख भी खुली तो घुप्प अंधेरा था कुछ दिखायी नहीं दिया. सिर्फ बीतती हुई रात थी.सुबह अभी भी कहीं दूर थी.

रात की बात आयी गयी हो गयी. सुबह से परुली फिर अपने काम में जुट गयी.रोज की तरह छिलुके से चूल्हा जलाया. ईजा के साथ घर का काम किया.स्कूल की ड्रेस के कपड़े बिस्तर के नीचे से निकाल कर पहने और बाकी लड़कियों के साथ स्कूल के लिये चल दी.रास्ते में उसने लड़कियों को कल रात की ईजा-बाबू की बातचीत के बारे में बताया. तो चमुली बोली

“यह तो बहुत बढिया हुआ. तेरा चिंन्ह साम्य हो जायेगा तो तू तो ब्योली (दुल्हन) बन के चले जायेगी. तेरा तो नाक नक्स इतना अच्छा है तभी तो तेरा चिन्ह मांगा है.हम लोगों का तो कोई भी नहीं मांगता. हम भी ब्योली बने तो इस पढ़ाई से तो छुटकारा मिले”.

बाकी लड़कियां उसके साथ हँसी ठिठोली करने लगीं. लेकिन परुली को यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था.

“लेकिन मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ.” परुली की आवाज में एक दृढ़ता थी.

अरे पढ़ लिख के क्या बैरिस्टर बनेगी. ब्या तो तब भी होगा ना और फिर तो वही भनपान, गोरु-बाछों का मोव निकलना, गुपटाले पाथना, पानी सारना और घरपन के सारे काम, इन सब में तेरी पढ़ाई क्या काम आयेगी रे परुली..और अच्छे रिश्तो के लिये मना नहीं करना चाहिये. वो पारघर की बिन्दी बुआ को नहीं देखा. पढ़ाई के चक्कर में उनके बौज्यू (पिताजी) ने पहले उनका ब्या नहीं किया. अब कब के एम.ए. तो कर लिया लेकिन अब घर में बैठी हैं. कहीं बात ही नहीं बन रही. अब इस उमर में कहाँ होता है ब्या उनका.

उसने भी बिन्दी बुआ के बारे में अपनी ईजा से सुना था कि वह पहले सारे रिश्तों के लिये मना कर देती थी. लेकिन अब तो किसी उमरदार या दूसरे ब्या वाले से भी शादी करने को भी तैयार है लेकिन कोई मिलता ही नहीं. फिर भी परुली को लगा कि वह यदि डॉक्टर बन गयी तो शायद फिर तो रिश्तों की कमी नहीं होगी. यह सोच कर वह बोली.

“लेकिन मैं डॉक्टर बन गयी तो !”

सुनके सभी लड़कियां जैसे एक साथ हँसी. “डॉक्टर बनना इतना आसान नही है परुली. ढेर सारे डबल (पैसे) लगते है बल. इत्ते सारे डबल तेरे बौज्यू कहाँ से लायेंगे.तेरे को तो हाईस्कूल ही करा रहे हैं वही बहुत है.”

यह तो परुली भी जानती थी कि बाबू की जजमानी से घर का खर्च भी मुश्किल से निकल पाता था. आये दिन पैसों को लेकर घर में खिच खिच होती थी.

परुली सोच में पड़ गयी. आज उसका स्कूल की पढ़ाई में भी मन नहीं लगा. उसके डॉक्टर बनने के सपने जैसे हवा में उड़ गये थे.वो तो सोच रही थी कि वह सवा रुपये का उचैण (मन्नत) गोल ज्यू के नाम का रखेगी कि उसका चिन्ह साम्य ना हो और वो ब्या करने से बच जाये.लेकिन अब तो उसको लगने लगा कि यदि उसका ब्या नहीं हुआ तो उसके बोज्यू पर वह एक भार की तरह पड़ी रहेगी. वह अपने बौज्यू पर भार भी नहीं बनना चाहती थी. उसकी ईजा भी कहती थी कि “परुली तेरा ब्या हो जाये तो एक बहुत बड़ा भार सर से निकल जायेगा.” तो क्या वह घर वालों पर एक भार थी? ऎसी ही बातें उसने अपने पड़ोस की माया दीदी से भी बहुत पहले सुनी थी.तब उसे इन सब बातों का मतलब समझ नहीं आया था.कुछ महीने पहले माया दीदी ने जब एक गाड़ में छ्लांग लगा कर अपनी जान दे दी तो उसे बहुत बुरा लगा था और गुस्सा भी आया था. लेकिन अब उसे लग रहा था शायद माया दीदी भी ऎसी ही किसी परिस्थिति से गुजरी होगी.तो क्या उसे भी ……

“प्रिया! आज तुम्हारा ध्यान किधर है !!” मैडम की आवाज आयी.

“मै…म …”

“पढ़ाई में ध्यान लगाओ..”

परुली ने फिर पढ़ाई में ध्यान लगा लिया.दिन बीतते गये. बोर्ड की परीक्षाऎं करीब आ रही थीं. परुली सब कुछ भूल कर बोर्ड की तैयारियों में जुट गयी.एक दिन उसके बाबू आये. आज वह बड़े खुश थे. थोड़ा सा गुड़ और बताशे लाये थे.आमतौर यह वह तब लाते जब कोई खुशी का मौका होता. ईजा तो तब घर पर थी नहीं उन्होने परुली से कहा “परु बेटा जरा चहा तो बना दे”. उनके बातों से अतिरिक्त प्यार झलक रहा था.वह बड़बाज्यू से बात करने लगे, जो पटांगण में बैठ कर अपना हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे.

“बाबू आज पांडे ज्यू मिले थे. कह रहे थे कि गोपाल और परुली का चिन्ह साम्य हो गया.इस मंगशीर में जल्दी से कोई लगन निकाल कर ब्या कर लेंगें”

यह बात चाय बनाती परुली ने भी सुनी. वह पानी में चाय की पत्ती डाल चुकी थी और अब वह पत्ती साफ पानी में अपना मटमैला रंग छोड़ रही थी.

जारी….

पिछला भाग : परुली….

परुली ही कहते थे सब उसे. लेकिन उसका स्कूल का नाम प्रिया था. प्रिया जोशी.गरीब घर था और फिर लड़कियों को ज्यादा क्यों पढ़ाना… शादी करके घर का काम ही तो करना है.फिर भी परुली उर्फ प्रिया स्कूल जाती थी.उसके बाबू (पिताजी) जिनको सब जोस्ज्यू (जोशी जी) के नाम से ज्यादा जानते थे जजमानी (पंडिताई) करते थे. वो तो तब भी परुली को पढ़ाना चाहते थे लेकिन उसकी ईजा (मां) का मानना था कि ज्यादा से ज्यादा हाईस्कूल कर लेगी तो कोई अच्छा सा लड़का ढूंढ के इसकी शादी कर देंगे.

परुली को खुद का परुली कहा जाना खराब लगता था. स्कूल में सब उसे प्रिया कहते तो उसे बहुत अच्छा लगता था. स्कूल जाने की उसकी इच्छा के पीछे पढ़ने से ज्यादा खुद को प्रिया कहलाये जाने का लालच था.मैडम कुछ भी पूछ्ती तो वह हाथ खड़ा करती और जब मैडम कहती कि “हाँ प्रिया तुम बताओ” तो उसके कानों में जैसे घुंघरू बजते और पूरे जोश के साथ पूछे गये प्रश्न का गलत-सही उत्तर देती.हाँलाकि उत्तर अधिकतर सही ज्यादा होते गलत कम. इसलिये स्कूल में उसकी गिनती होशियारों में होने लगी.

परूली को घर में पढ़ने का बिल्कुल भी समय नहीं मिलता था. उसका स्कूल पांच-छ्ह किलोमीटर दूर था. अब पहाड़ में कोई साधन तो थे नहीं तो पैदल ही आना जाना होता. स्कूल से आते आते उसको भूख लग जाती. आते ही वह बस्ता एक ओर रख देती और घर में ढूंढती कि कहीं कुछ खाने को है क्या. उसका छोटा भाई उससे पहले घर आ जाता था. तो अक्सर यह होता था कि सुबह की बची हुई रोटियां वह खा चुका होता…और परुली के लिये कुछ भी ना बचता.

जब वह आती तो ईजा जंगल गयी होती.कभी घास लाने तो कभी लकड़ी लाने.बाबू जजमानी में गये होते.घर में बड़बाज्यू (दादा) और आमा (दादी) होती और अक्सर बड़बाज्यू के कुछ दोस्त भी साथ होते.उसके एक कका जो बी.ए. कर रहे थे वो भी तब तक कॉलेज से आ जाते थे.परूली के स्कूल से आते ही चाय की फरमाईश होने लगती. “परूली तू आ गयी है….चहा पिला हो सबको”. वो अनमने मन से चहा बनाने जाती. घर में एक बत्ती वाला स्टोव था …”नूतन” स्टोव. उसी को किसी तरह से जलाती और चाय के लिये केतली में पानी रख देती.खाने को कुछ ना होता तो चहा बनाने के बाद अपने लिये थोड़े भट भूट लेती.

स्कूल से आने के बाद कित्ते सारे काम करने होते परुली को.पाखे (छ्त) से कपड़े उठा के लाना.उनको तह करके रखना. गोरु बल्दों के वण (जंगल) से आने के बाद उनको गोठ में बांधना.उनको घास डालना. नौले से पानी लाकर रखना.रात की सब्जी का इनजाम (इंतजाम) करना.कभी कभी ईजा के आने में देर होने पर सब्जी भी छोंक के रखना.आटा ओल के रखना. ईजा वण से आ जाती तो दोनों मिलके खाना बनाते और फिर साथ ही भानकुन (बर्तन) मांजते. तब तक परुली इतनी थक जाती कि उसे नींद आने लगती और वह दिसाण (बिस्तर) में सर रखते ही सो जाती. सुबह उसके बाबू जल्दी जजमानी में जाते तो उसे उठा देते. वह बाबू को चहा बना के देती.बाबू चले जाते तो वह बांकी सबके उठने से पहले कुछ पढ़ पाती और फिर काम में लग जाती.

स्कूल में प्रिया जोशी काफी लोकप्रिय होती जा रही थी. पढ़ाई के साथ साथ वह खेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी आगे रहती. इसीलिये वह अपनी सारी मैडमों की लाड़ली थी.इस साल उसका हाईस्कूल का बोर्ड था.जितना भी समय उसे मिलता वह मन लगा कर पढ़ती. आज उसकी मैडम ने उससे कहा. प्रिया तुम अपनी बायलॉजी और स्ट्रॉंग करो.आगे भी बायलॉजी ही लेना और कोशिश करना पी.एम.टी. क्लियर करने की ताकि तुम डॉक्टर बन सको. यह सुन कर प्रिया को बहुत अच्छा लगा.उसको लगा कि जल्दी ही वह प्रिया से डा. प्रिया जोशी बन जायेगी. वह जल्दी से जल्दी यह बात अपनी ईजा को बताना चाहती थी.

घर आके परुली फिर उसी तरह काम में जुट गयी.डाक्टर वाली बात अभी भी उसके मन में थी. लेकिन ईजा के वण से आने के बाद उसे एकांत मिला ही नहीं कि वह अपनी बात ईजा को बता पाती.भनपान करने (बर्तन मांजने) के बाद वह अभी दिसाण लगा ही रही थी और सोच रही थी कि अभी ईजा आयेगी तो उसको अपनी दिल की बात कहेगी उसको अपनी बाबू की आवाज सुनायी दी. ईजा-बाबू आपस में बात कर रहे थे. उनकी बातों में अपना नाम सुनकर वह बाबू की बात ध्यान से सुनने लगी.

“आज मलगाड़ के पांडे ज्यू मिले थे. कह रहे थे कि परुली का चिन्ह (कुंडली) दे देना गोपाल के लिये.” गोपाल पांडे ज्यू का लड़का था.

“हाँ हो तो भोल (कल) ले जाना. पांडे ज्यू का संबंध तो अच्छा ठहरा. साम्य (कुंडली मिल गयी तो) हो गया तो भल हो जायेगा….”

“हाँ ये लोग तो बैरती के पांडे हुए..संबंध तो अच्छा ही हुआ..लेकिन अभी परूली तो नान नानि (छोटी) ही हुई.”

“तुम्हें तो नान नानि ही लगेगी..ढांट सी तो बड़ी हो गयी है.. इस साल बोर्ड भी हो जायेगा…फिर मंगसीर तक ब्या कर देंगे.तुम तो ले जाओ हो भोल चिन्ह”

“लेकिन गोपाल की कुछ खास नौकरी चाकरी तो है नहीं…”

“क्या करता है…?”

” पांडे ज्यू बता रहे थे कि दिल्ली में किसी ठुल (बड़े) अफसर के बंगले में नौकर है. क्वाटर भी मिला है.”

” अरे तो ठीक ही तो हुआ… इतना अच्छा संबंध मिल रहा है.. नौकरी का क्या है..यह नहीं तो कोई और मिल जायेगी…”

“तुम तो चिन्ह ले जाओ..और साम्य हो जाये तो बात पक्की कर दो हो”

इससे आगे क्या बातें हो रही थी वह परुली ने नहीं सुनी. वह चुपचाप तकिये पर सर रखकर सो गयी.

मैने उमर के रुबाइयों के बहुतेरे अनुवाद पढ़े..हिन्दी में भी अंग्रेजी में भी. हिन्दी में मुझे ‘मधुशाला’ (जो कि अनुवाद नहीं है पर इसकी चर्चा बाद में) और ‘मधुज्वाल‘ ने बहुत प्रभावित किया.हाँलाकि रघुवंश गुप्त जी का अनुवाद भी काफी अच्छा है….पर ‘मधुज्वाल’ मुझे उसके नये प्रतिमानों और छंद के नये नये प्रयोगो की वजह से ज्यादा सुन्दर प्रतीत होता है. बांकी अनुवाद एक ही शैली में बँध गये से लगते हैं. हाँलाकि बच्चन की ‘मधुशाला’ जितनी लोकप्रिय हुई उतना लोकप्रिय इसके समवर्ती रुबाइयों का कोई भी अनुवाद हिन्दी में नहीं हुआ.. लेकिन मुझे लगता है इसका मूल कारण यह रहा कि मधुशाला एक गेय रचना है.जो लोगों की जबान पर तुरंत चढ़ जाती है इस कारण इसको याद रखना ज्यादा आसान होता है.

आइये आज आपको मधुज्वाल से मेरे पसंद के कुछ छंदो से परिचित करवाता हूँ.

यह जग मेघों की चल माया
भावी, स्वप्नों की छ्ल छाया !
तू बहती सरिता के जल पर
देख रहा अपनी प्रतिछवि नर !

उठ रे , कल के दुख से व्याकुल,
जीवन सतरँग वाष्पों का पुल !
कल का दुख केवल पागलपन,
पल पल बहता स्वप्निल जीवन !
ले, उर में हाला ज्वाला भर ,
सुरा पान कर , सुधा पान कर !

स्वर्गिक अप्सरि सी प्रिय सहचरि
हो हँसमुख संग ,
मधुर गान हो ,सुरा पान हो
लज्जारुण रंग !
कल कल छ्ल छ्ल बहता हो जल
तट हो कुसुमित
कोमल शाद्वल चूमे पद तल
साकी हो स्मित !
इससे अतिशय स्वर्ग न सुखमय
यही सुर सदन ,
छोड़ मोह भय , मदिरा में लय
हो विमूढ़ मन!

वह ह्रदय नहीं
जिसमें प्रियतम की चाह नहीं!
वह प्रणय नहीं
जिसमें विरहानल दाह नहीं !
वह दिवस नहीं
यदि अविरत सुरा प्रवाह नहीं !
वह वयस नहीं
जो बाला के गल बाँह नहीं !

वह मनुष्य जिसके रहने को
हो छोटा आंगन , गृह द्वार ,
खाने को रोटी का टुकड़ा ,
पीने को मदिरा की धार !
जो न किसी का सेवक शासक ,
हँसमुख हों जिसके सहचर ,
कहता उमर सुखी है वह नर ,
स्वर्ग उसे है यह संसार !

मदिर नयन की , फूल बदन की
प्रेमी को ही चिर पहचान ,
मधुर गान का , सुरा पान का
मौजी ही करता सम्मान !
स्वर्गोत्सुक जो , सुरा विमुख जो
क्षमा करें उनको भगवान ,
प्रेयसि का मुख , मदिरा का सुख
प्रणयी के , मद्यप के प्राण !

उमर न कभी हरित होगा फिर
पलित बयस का गलित लिबास,
मेरे मन अनुकूल फिरेगा
भाग्य चक्र ,यह व्यर्थ प्रयास !
पान पात्र भर ले मदिरा से
शोक न कर , मदिरा कर पान ,
कभी सुराही टूट , सुरा ही
रह जायेगी , कर विश्वास! 

धर्म चक्रों को यदि मुझसे
कभी मित्रता हो स्वीकार
वो मेरे दुखों के बदले
इतना मात्र करें उपकार-
मेरे मरने बाद देह की
रज से ईंटे कर तैयार
चुनवा दें वे मदिरालय के
खँडहर की टूटी दीवार !

surahi-toot

 

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

madhujwal_cover उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद सुमित्रानंदन पंत ने 1929 में उर्दु के प्रसिद्ध शायर असगर साहब गोडवी की सहायता और इंडियन प्रेस के आग्रह पर किया था. यह अनुवाद “मधुज्वाल” नाम से 1948 में प्रकाशित हुआ था. अन्य हिन्दी अनुवादकों की तरह उनका यह अनुवाद फिट्जराल्ड की की पुस्तक पर आधारित नहीं था बल्कि उन्होने मूल फारसी से हिन्दी अनुवाद किया था. मूल फारसी को समझने में उनकी सहायता असगर साहब ने की थी. इसीलिये इस पुस्तक में पाठक को कल्पनाशीलता के कुछ नये रंग मिलते हैं. इसी कल्पनाशीलता की वजह से यह अनुवाद स्वयं के ज्यादा करीब लगता है. नये प्रतिमानों में कोयल है, बुलबुल है,गुलाब और आम्र मंजरी की गंध भी है.”मधुज्वाल” में नये छंद विधान हैं जो कहीं कहीं रुबाई वाले छंद में परिणित हो जाते हैं और कहीं एक्दम दूसरा ही रूप ले लेते हैं.इस पुस्तक में पदों की संख्या भी अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले कहीं ज्यादा है. “मधुज्वाल” के द्वितीय संस्करण में कुल 151 पद हैं.

आइये कुछ पदों पर नजर डालें.

खोलकर मदिरालय का द्वार
प्रात: ही कोई  उठा पुकार
मुग्ध श्रवणों में मधु रव घोल,
जाग उन्मद मदिरा के छात्र!
 
  ढुलक कर यौवन मधु अनमोल
शेष रह जाय नहीं मृदु मात्र,
ढाल जीवन मदिरा जी खोल
लबालब भर ले उर का पात्र! [2]
सुरालय हो मेरा संसार,
सुरा-सुरभित उर के उदगार!
सुरा ही प्रिय सहचरि सुकुमार,
सुरा,लज्जारुण मुख साकार!
 
  उमर को नहीं स्वर्ग की चाह,
सुरा में भरा स्वर्ग का सार!
सुरालय राह स्वर्ग की राह,
सुरालय द्वार स्वर्ग का द्वार्!  [11]
अधर मधु किसने किया सृजन ?
तरल गरल !
रची क्यों नारी चिर निरुपम ?
रूप अनल !
अगर इनसे रहना वंचित
यही विधान ,
दिये विधि ने तप संयम हित
न क्यों दृढ़ प्राण ? [16]

छूट जायें जब तन से प्राण
सुरा में मुझे कराना स्नान !
सुरा,साकी,प्याले का नाम
सुनाना मुझे उमर अविराम!

खोजना चाहे कोई भूल
मुझे मेरे मरने के बाद ,
पांथशाल की सूंघे धूल,
दिलायेगी वो मेरी याद! [18]

madhujwaal_2
इस जीवन का भेद
जिसे मिल गया गभीर अपार,
रहा ना उसको क्लेद
मरण भी बना स्वर्ग का द्वार !
 
  करले आत्म विकास ,
खोज पथ, जब तक दीपक हाथ,
मरने बाद , निराश ,
छोड़ देगा प्रकाश भी साथ! [23]
रम्य मधुवन हो स्वर्ग समान,
सुरा हो सुरबाला का ज्ञान !
तरुण बुलबुल की विह्वल तान
प्रणय ज्वाला से भर दे प्राण !
 
  न विधि का भय , न जगत का ज्ञान,
स्वर्ग की स्पृहा , नरक का ध्यान ,-
मदिर चितवन पर दूँ जय बार
चूम अधरों की मदिरा-धार ! [28]
उमर दो दिन का यह संसार
लबालब भर ले उर भ्रंगार
क्षणिक जीवन यौवन का मेल,
सुरा प्याली का फेनिल खेल !
 
  देख , वन के फूलों की डाल
ललक खिलती , झरती तत्काल !
व्यर्थ मत चिंता कर , नादान ,
पान कर मदिराधर कर पान ! [30]
लज्जारुण मुख , बैठी सम्मुख ,
प्रेयसि कंपित कर से उत्सुक
भर ज्वाला रस , हाला हँस हँस
उमर पिलाए , ह्र्दय हो अक्श !
 
  ह्रदय हीन कह लें मलीन,
मैं मधु वारिधि का मुग्ध मीन !
अपवर्ग व्यर्थ , केवल निसर्ग
संगीत, सुरा , सुन्दरी , – स्वर्ग ! [33]
पंचम पिकरव , विकल मनोभव ,
        यौवन उत्सव !
मधुवन गुंजित , नीर तंरंगित
        तीर कल ध्वनित !
हँसमुख सुन्दर प्रिय सुख सहचर ,
        प्रिया मनोहर ,
पी मदिराधर सखे , निरंतर ,
       जीवन क्षण भर ! [35]
 
अपना   आना   किसने    जाना ?
जग में आ फिर क्या पछताना ?
जो   आते   वो   निश्चय    जाते,
तुझको   मुझको  भी    है  जाना !
 
 
  बाँध  कमर , ओ साकी सुन्दर ,
उठ कंपित कर में प्याली धर ,
प्रीति सुधा भर,भीति द्विधा हर,
चिर विस्मृति में डूबे अंतर ! [49]

मधुज्वाल के पद हिन्दी के बांकी अनुवादों से थोड़े अलग हैं. इसलिये इनको पढ़ने में एक नयी ताजगी का अहसास होता है. अगले अंक में इसी किताब के कुछ और पदों की चर्चा करेंगे और कुछ चर्चा होगी बच्चन और सुमित्रानंदन पंत के बीच हुए पत्र व्यवहार के बारे में भी.

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों के माध्यम से बतायें…

क्रमश:…………………………

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

समीर जी का उत्साह बढ़ाने में कोई सानी नहीं. कल की पोस्ट पर उन्होने एक अच्छी सी टिप्पणी की जिससे फिर से ऊर्जा मिली कि बांकी भाग को भी टाइप कर आप तक पहुंचाऊं.

थक गये हैं, थोड़ा विश्राम प्राप्त करें मित्र.

कार्य इतना उत्तम हैं कि यह कह पाना संभव नहीं कि थक गये हैं तो जाने दिजिये.

बहुत आभार इस पेशकश का. हमारे पास ताप के ताये हुए दिन होती तो जरुर मदद कर देते आपकी, यह तो आप जानते ही हैं. :)

धन्यवाद समीर जी.

लीजिये प्रस्तुत है अंतिम भाग. पहले दो भाग आपने ना पढ़े हों तो वो यहाँ और यहाँ हैं. निवेदन यही कि पहले उन दोनों भागों को पढ़ लें.

मँड़हे से निकला मैं, वह भी साथ था
पूछ पड़ा, किसके लड़के हो
मैंने शिक्षा जैसी थी अलक्ष को प्रणाम किया
कहा, जगरदेवसिंह मेरे पिता थे
बैरागी बाबू, पूछा उसने
मैंने कहा, उनका यह भी नाम है
उसने कहा, अब ऐसे आदमी दिखाई नहीं पड़ते
धरम जानकर रहे धरम किया

मैं बाहर निकला तो सोचता हुआ निकला
आज जो हुआ वह केवल आज ही हुआ है
और मैंने आज के उड़ंछू शब्दों को
पकड़ पाने के लिए अपने मन को
उद्यत कर दिया
ऐसा कम होता है बहुत कम
जब शब्द किसी समय जी से बतियाने लगें
बुआ से मैंने सबकुछ कहा फिर पुछा
उसका नाम क्या है
बुआ ने कहा नगई
महरिन के माथे से उबहनी लटकाए
मैंने घर जाते देखा था
उधर वही घर था
मुड़ते भी देख लिया उनको
उसी ओर
कई दिनों बाद
गया नगई की मँड़ई पर

नगई खाँची फाँदे बैठा था
हाथों में वही काम
आँखें उन हाथों का
हथवट चिताती हुई
खाँची में लगी एक आँख मुझे भी देखा
और कहा बैठो उस पीढे पर
साफ है मैंनें कुछ पहले ही धोया है
बैठने पर मुझसे कहा
अच्छा बाँच लेते है रमायन
तुम्हारे बाबू कहते थे जैसे
अब कोई क्या कहेगा
उनकी भीतर की आँख खुली थी
सुर भी क्या कण्ठ से निकलता था
जैसे आषाढ़ के मेघ की गरज
मैने कहाँ महरा
मैं तो अभी सीख रहा हूँ
नगई ने कहाँ कितने होंगे
जो जानते हैं वही कुछ सीखना है
बाबू की तपस्या का फल
तुम्हें मिला है मिलेगा
मैं इस सनेहिल असीस से
चुपाया रहा
नगई ने हाथ चलाते चलाते फिर कहा
दुनियां है दुनियां का ज्ञान है आदमी है
आदमी को क्या क्या नहीं जानना है
देखते-सुनते और करते ज्ञान होता है
अपनी जब होती है समझ नयी होती है
मेरे लिए समझ पाना कठिन था
पर रुक रुककर निकले बोल ये
कहीं ठहर गये थे मेरे मन में
अर्थ बहुत बाद में कुछ कुछ पाया
धारणा बेकार में बोझ ढोना ही नहीं है
आदमी बात से व्यवहार से
पहचाना जाता है
समझ ही
आदमी को आदमी से जोड़ती है

वर्ष बीत जाने के बाद, शायद
एक दिन नगई की ओर जा निकला
इतने जन वहाँ मैंने नहीं देखे थे
अपना कुछ काम था फिर भी में रुक गया
नगई की दृष्टि मुझ पर पड़ी
काम रोककर मेरे पास आ गया
और कहा, भात है बिरादरी को न्योता है
दिन परसों निश्चित है
आप कहाँ जाते हो
मैंने कहा काम से
उसने कहा मुझे भी बुझाव है
परसों आना
इज्ज्त मैं क्या दुंगा
फिर भी दसों नँह जोड़े
खड़ा ही मिलूँगा
सेवक हूँ और सेवा करना मेरा काम है

मैं आगे बढ़ गया
उस दिन बडी भीड़ थी
बड़े-बड़े चूल्हे जगाये गये
जिन पर हण्डे कड़ाह चढ़े थे
कहीं भात कहीं दाल और कहीं
तरकारी पकती थी
लकड़ियों की कोई कमी नहीं थी
जंगल के बीच थे चिरानीपट्टी की बस्ती
दोने पत्तल पहले से बनाकर
ठिकाने से रखे थे
ढखुलाही कोई छोटी नहीं थी
ढाक के पेड़ ही पेड़ थे
बड़े और अच्छे पत्ते जिन पर छाये थे
जंगल में क्या कमी
जंगल जिसका हो
उससे कह कर ले लेना था
रोक टोक कोई खास नहीं थी
कई बार आ जाकर
रंग वहाँ का देखा
जो भी मिला काम से लगा मिला
ऐसे लोग भी मिले
जो करते थे कम और बोलते बहुत रहते हैं
आवाज ऊँची से ऊँची हो आती है।
ध्यान इधर उधर जाता है आसपासवालों का
कुछ लोग फिरकी से फिरते हुए
इनके पास उनके पास जाते थे
काम को देखकर बताते थे
ऐसे करो वैसे करो
मैंने सुना, एक कहाँ रहा था, कैसे भला
लेकिन सचेत पाँव कान से कुछ दूर थे
मुँह किसी और हाथ से कुछ कह रहा था

कोई दस बार पाँत बैठी थी
हर बार पत्तलें पचास ऊपर लगती थी
नगई ने तीन बीस का हिसाब रखा था
भोजन करने वाले तुष्ट थे
गाँजा, तमाखू, सुरती, बीड़ी, और पान का
प्रबन्ध था
जब जो जिसे चाहिए
जाकर ले लेता था
कुछ बूढ़े और आदर मान पाने वाले ही
अपनी जगह जमे थे
उनकी सेवा नौजवान करते थे
बार-बार यहाँ या वह पूछकर
सराहना हो रही थी
नगई के यहाँ वहाँ
बड़े लोग भी प्रबन्ध ऐसा
नहीं कर पाते
नगई पर कृपा है भगवान की
इस तरह मान दिया
भार हल्का कर दिया

पंचायत बैठी थी जाजिम पर
पीपल के नीचे
दिन दो घड़ी शेष था
कोतवाल, सिपाही और गोड़इत
जाति के ही लोग थे
बरौछीदार-चँवरदार मक्खियाँ उड़ाते थे
बैठे हुए लोगों को बचाते
हवा पट पड़ी थी इसी कारण
पंखे का प्रबन्ध था पसीना चल रहा था
और बड़े-बड़े पंखे तीन चार हाथों से
हवा को लहराते थे
मैं उभरी पीपल की सोर पर जरा हटकर
बैठा था, मेरी आँखों के लिए
पहली पंचायत थी
चौकीदार ने पुकारा
नगई और लखमनी
दोनों हाथ जोड़े सिर झुकाए हाज़िर हुए
फिर उनका दोस बतलाकर पूछा गया
अपने दोस मानते हो
मानते हैं—दोनों ने साथ कहा
पूछा गया, डाँड़-बाँध तुमको मंजूर है
सिर माथे हमको मंजूर है—दोनों बोले
पंचों ने कहा, दस रुपये की डाँड़ है, भात देना होगा
यह भी मंजूर है
फिर महरिन जल लायी, सबको दिया पीने को
नगई ने हुक्का पिया और बारी-बारी सबको दिया
पंचों ने हुक्म दिया अब तुम दोनों साथ रहो
पंचायत तो मानो पंचपरमेसर है
नगई हाथ जोड़े अब खड़ा हुआ
बोला, जाति गंगा ने मुझे पावन कर दिया
धन्य हुआ
और फिर भोज हुआ
नाच और नाटक हुए.

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

4. नगई महरा: त्रिलोचन

5. नगई महरा- 2 : त्रिलोचन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: कविता, काकेश, त्रिलोचन, गांव, नगई महरा, नगई, ताप के ताये हुए दिन

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कल नगई महरा का पहला भाग प्रस्तुत किया था. आज पेश है उसी का दूसरा भाग.कृपया पूरी कविता पढ़ें आप निश्चित ही कविता के मर्म में उतर पायेंगे.य़ह एक कविता है जिसके अन्दर समाज की एक कहानी भी साथ साथ चल रही है और दिख रहा है समूचा गाँव.आइये आनन्द लें.

तब मेरी उमर जैसी छोटी थी
समझ भी छोटी थी
शब्द याद रह गये
अर्थ वर्षों बाद खुला जब
समाज के पर्दे खुलने लगे

चार भाई थे—नगई, बैरागी, बित्तू
और कोई और
बैरागी को मैने देखा था जब तब
चिरानीपट्टी कभी-कभी आता था
बैरागी का बियाह महजी से हुआ था
महजी इस महरिन की कोख से जनमी थी
बैरागी-महजी के नाते से
कभी कदा नगई की चर्चा चल जाती थी

चर्चा कमजोर थी
कहारों में
किसी को छोड़कर दूसरे को कर लेना
चलता था
और अब भी चलता है
नर या नारी का बिसेख कोई नहीं था
जोड़े में जब कोई नहीं रहा
दूसरे को लाने में बाधा कुछ नहीं थी
जरा ऊँच-नीच का विचार तो यहाँ भी था
जातियों के आपसी भेद थे
कोई जाति कुछ ऊँची
कोई जाति कुछ नीची
स्त्री-पुरुष भिन्न-भिन्न शाखा के हुए
तो मुश्किल पड़ जाती थी
लेकिन पंचायत थी
डाँड़-बाँध करती थी
जिसे मानना ही था
और फिर भोज भात चलता था
भोज भात खाया भागे नहीं
आपसी बतियाव, खेला, गाना, नाच-रंग
नाटक, तमाशा, सभी होता था
इसी समय सबके गुन खुलते थे

नगई ने अपने सगे भाई की सास को
घर में बैठाया था
उसी घर में माँ-बेटी
जेठानी-देवरानी थीं
सम्बन्धों की छीछालेदार
घर में ना हो गाँव-भर में होती थी
बाप दादों का कुटका
बछैया छोड़कर नगई ने छोड़ दिया
मँडई डाल ली चिरानीपट्टी में आकर

मैने एक दिन उधर
पेड़ों के सहारे एक मड़ई खड़ी देखी
पास ही बँसवट थी
जिसमें बहुत साँप सुने जाते थे
और कुछ कदम पर डँड़ियबा का मसान था
गाँव में गाँव से अलग छनिहर
कौन यहाँ रहता है
देखने के लिए गया
आँखें जो देखती थीं मेनेजर को बताती थीं
मुँह मेरा बन्द था

नगई ने जेंवरी बरते पूछा, पढ़ते हो
हाँ कहने को खुला
फिर नगई ने पूछा
रमायन बाँच लेते हो
हाँ अटक अटककर
सुन कर हँसा नगई खुलकर बोला
बाँचना अटक अटक कर
और इसे बूझना बूझने की बात है
मेरे कान नगई के कहन-रस में पगे
अब उसने फिर कहा
लाऊँ मैं, बाँचोगे,
ले आओ मैंने कहा
मन में गुना अब तक तो
अपने आप बाँचता था
आज किसी और के लिए मुझे बाँचना है
यहाँ नयी बात थी
और नयी बात में अनकुस होता ही है
मन हाल रहा था
बात को फैलाव से बचाने के लिए मै
नगई का नाम बार-बार दे रहा हूँ
लेकिन मुझे उस दिन
उसका नाम मालूम नहीं था
बातों से बात चली
अलगाव दूर था लगाव पास पास था
और लगाव को कोई नाम देने से
काम बहुत नहीं बनता
नाम एक निश्चित निश्चय उगाता है
अर्थ सम्बन्धों के सहारे चला करते हैं
यानि अर्थ का उदगम छिपा रह जाता है
नगई ने बेठन को खोलकर पोथी को
माथे से लगा लिया
फिर उसे खाट कि सिरहाने रखा
लोटे में पानी लेकर मुझसे कहा
चरण मुझे धोने दो
और उसने मेरे दोनें पैरों को
घुटनों तक धो दिया अच्छी तरह
फिर लोटे को माँजा धोकर पानी लिया
और कहा, चलो हाथ मुँह भी धुला दूं

मैं उठा पानी वह ढालता रहा
मैने हाथ-मुँह फरचाए
पास के मँड़हे में कुशासन एक अलग था
उसकी गर्द झाड़कर मुझे बैठने को कहा
मेरे बैठ जाने पर पोथी मुझे सौंप दी
फिर मुझे बड़े भक्ति-भाव से प्रणाम किया
कुछ हटकर हाथ जोड़कर सामने ही
भूमि पर बैठ गया

मैने पोथी खोल ली
पूछा, कहाँ पढूं
उसने कहा सुन्दरकाण्ड
मैंने साँस चैन की ली
सुन्दरकाण्ड कई बार पढ़ा था
पढने को,अर्थ कौन ढुँढता
ध्वनी अपनी मुझे अच्छी लगती थी
जहाँ-जहाँ अर्थ झलक जाता था
वहाँ आनन्द मुझे मिलता था
जनक सुता के आगे ठाढ़ भएउ कर जोरि
पढकर मैं रुका प्रति दोहे पर जैसे
वैसे ही उसने इस दोहे पर
भक्ति भाव से कहा
सियाबर रामचन्द्र की जय
फिर मुझ से कहा अब विश्राम
कुशा खण्ड पतला सा मेरी ओर करके कहा
चिह्न रख दो पोथी में
मैंने चिह्न लगाकर पोथी को बन्द किया
उसने अब पूछा था कल भी आओगे इस ओर
मैने कहा, आऊँगा
जब मैं खड़ा हुआ चलने को
उसने भक्ति भाव से मुझे फिर प्रणाम किया

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

क्रमश:……………….

कविता अभी समाप्त नहीं हुई. लेकिन मेरी उंगलिया अब टाइप कर पाने मे असमर्थ पा रही हैं खुद को. चलिये तो शीघ्र ही आता हूँ एक और भाग के साथ जो इस कविता का अंतिम भाग होगा.

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

4. नगई महरा: त्रिलोचन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: कविता, काकेश, त्रिलोचन, गांव, नगई महरा, नगई, ताप के ताये हुए दिन

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‘नगई महरा’ त्रिलोचन की एक सशक्त रचना है.पहलू में त्रिलोचन की कविताओं में भी इस कविता का जिक्र हुआ था. यह एक लंबी कविता है जिसे दो भागों में पेश कर रहा हूँ. इस कविता में ग्रामीण जीवन अपने पूरे यौवन के साथ उतर गया है. गांव के आम शब्द इस कविता में इतने सहज भाव से आ जाते हैं कि समझने के लिये अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता.गांव के जीवन का एक शब्द चित्र सी खींचती है यह कविता. जाति-पाति,पंचायत, और समाज सभी कुछ तो है इसमें.आप भी आनंद लीजिये.

नगई महरा

गाँव वाले इधर उधर कहते थे
नगई भगताया है
सामना हो जाने पर कहते थे
नगई भगत

नगई कहार था
अपना गाँव छोड़कर
चिरानीपट्टी आ बसा
पूरब की ओर
जहाँ बाग या जंगल था
बाग में
पेड़ आम,जामुन या चिलबिल के
जंगल में मकोय, हैंस, रिसबिल की बँवरें
झाड़ियां झरबेरी की
और कई जाति की
ढ़ेरे, कटार,ढ़ाक, आछी,
बबूल और रेवाँ के
पेड़ भी जहाँ तहाँ खड़े थे

सूखे पत्ते वहाँ बहुत सारे थे
नगई ने भाड़ बैठा दिया
दिन में साँस मिलने पर
भाड़ को जगाता था
दूर दूर से भुँजानेवाले आ जाते थे
संझा के पहले ही
भाड़ बन्द होता था
नगई का परिवार
छोटा था
घरनी और एक बच्ची
बच्ची गोहनलगुई थी
घरनी सेंदुर से मिली नहीं थी
धरौवा कर लिया था

घरनी फुर्तीली थी
चुस्त काम काज में
बोल बात में हँसमुख
कभी उसका चेहरा मुरझाया हो
याद नहीं आता मुझे
बात पर बात ऐसे जड़ती थी
जहाँ समझ लड़ती थी
और ये दुर्लभ है
नगई ने गाँव के
तीन-चार घरों का
पानी थाम लिया था
कभी वह भरता था
कभी घरनी भरती थी
कुछ खेत मिले थे इसके लिए
और घर घर से
कलेवा मिल जाता था
नगई नहीं खाता था
माँ-बेटी खाकर कुछ करती थी

पूरा परिवार मैंने देखा
पैरों पैरों है
हाथों ने काम कोई लिया, किया
हो जाने का ही काम
हाथों में आता था
रस्सियाँ भी नगई बरा करता था
सुतली को कातकर बांध भी बनाता था
कहता था, दैव ने मुँह चीर दिया है
उसमें कुछ देने को हाथ तो चलाना है
मैने इस घर में
टुन्न पुन्न नहीं देखी
घरनी को महरिन मैं कहता था
मैं ही नहीं कोई मुँह-मुँह देखे
क्योंकि नगई महरा थे
सबके लिए
केवल बड़े-बूढ़े बखरीवाले
नगई बुलाते थे
कभी नगई कभी महरा
जो भी जबान पर चढ़ गया
कहने की झोंक में

नगई को बैठने और उठने का
बोलने-बतियाने का सहूर है
यह अनमोल बाबा कहते थे
अनमोल बाबा की आँख
इन्ही बातों पर पड़ती थी
अच्छी तरह जानता हूँ
मुझ पर जब चिढ़ते थे
कहते थे तू कैसे
बेटा बैरागी का हो गया
भलमनई की कोई चाल नहीं
नगई की चर्चा
निन्दकों को प्रिय नहीं थी
गाँव में निन्दक कम नहीं थे
कहाँ नहीं होते वे
जहाँ वृद्दि पाते हैं
खुचड़ खोज-खोजकर दिखाते हैं

बहुतों के पाँव अपनी डगर पर
निन्दा की कहीं छिपी कहीं उभरी
अढ़ुकन से ठोकर खा जाते हैं
उबेने पाँव चलना कठिन होता है
हर डग का ऊँच खाल
देखे और तोले बिना
काम नहीं चलता
अपना शरीर बेसम्हार होता है
एक दिन अपने द्वारे
इमली के पेड़ तले मैं था
घेउरा बुआ था महरिन पानी भरने आ गयी
बुआ ने बुलाया महरिन
महरिन आ गई पास
बुआ ने, अब मैं समझता हूँ,
कुछ प्यार से कुछ तिरस्कार से
कहा होगा— महरिनिया
तू दमाद के घर
क्यों बैठ गयी
महरिन का जवाब पहले का तैयार लगा
बूआ, अपनी ओर ही निगाह करो
दूसरों की बूझने से पहले अपना ही बूझना
कहीं अच्छा होता है
और वह इज्जत बचाती हुई
घर में चली गयी
छूछा जोर लेकर बाहर निकली
बिल्कुल चुप
बुआ भी चुप ही रहीं
उसके इनारे की ओर चले जाने पर
आप ही आप कहा
कौन नीच जाति के मुँह लगे.

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

क्रमश:……………………………………..

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

हिन्दी के कई चिट्ठाकार अब तकनीकी रूप से कुशल हो गये हैं. अपने चिट्ठों में तरह तरह के विजेट और चित्र लगाने लगे हैं. यह एक सुखद परिवर्तन है. इधर कुछ चिट्ठाकारों ने अपने चिट्ठों में मधुर संगीत प्रदान करने वाला कोई विजेट भी लगाया है. जो चिट्ठा खुलते ही मधुर संगीत से आपका स्वागत करता है. स्वागत करना अच्छी बात है लेकिन मुझ जैसे कई लोगों को इससे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

मैं कई चिट्ठे ऑफिस में पढ़ता हूँ. और जब कभी इस तरह के चिट्ठे पर जाता हूँ तो जो संगीत बजता है वो मेरे अलावा भी कई लोगों को सुनायी पड़ जाता है.तो तुर्ंत वह चिट्ठा बन्द कर देना पड़ता है. हर बार अपने स्पीकर को म्यूट करना संभव नहीं हो पाता. इससे कई बार अटपटा भी लगता है. इसलिये मेरा ऎसे संगीतप्रेमी चिट्ठाकारों से निवेदन है कि वो अपने स्वागतगीत को स्वत:चालित ना रखें. हमारे पास विकल्प हो कि यदि हम चाहें तो आपके स्वागत गीत का आनंद ले सकें.

आशा है आप लोग ध्यान देंगे.

चलिये अब आपने इतना पढ़ ही लिया है तो एक मुक्तिबोध की कविता भी पढ़ लें.ताकि आपको ये ना लगे की बेकार ही यहाँ आये.

नाश देवता

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,
तेरी    प्रत्यंचा  का  कंपन  सूनेपन  का  भार   हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाणों की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे,
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपुत तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।

सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी,
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।

हे रहस्यमय, ध्वंस-महाप्रभु, जो जीवन के तेज सनातन,
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सृजन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वंदन
मेरे सर पर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।

— गजानन माधव मुक्तिबोध

बिस्तरा    है   न   चारपाई    है,
जिन्दगी   खूब  हमने  पायी   है।

कल अंधेरे में जिसने सर काटा,
नाम  मत  लो  हमारा   भाई है।

ठोकरें  दर-ब-दर  की थी हम थे,
कम नहीं हमने मुँह की खाई है।

कब  तलक  तीर  वे  नहीं   छूते,
अब  इसी  बात  पर   लड़ाई   है।

आदमी    जी  रहा  है  मरने को
सबसे    ऊपर    यही  सचाई है।

कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहाँ वह सँभल के आई है।

– त्रिलोचन ( “गुलाब और बुलबुल” से )

कुछ सॉनेट ‘दिगंत’ से

सिपाही और तमाशबीन

घायल हो कर गिरा सिपाही और कराहा।
         एक तमाशबीन दौड़ा आया। फिर बोला,
        ‘‘योद्धा होकर तुम कराहते हो, यह चोला
एक सिपाही का है जिस को सभी सराहा

करते हैं, जिस की अभिलाषा करते हैं, जो
         दुर्लभ है, तुम आज निराशावादी-जैसा
        निन्द्य आचरण करते हो।’’ कहना सुन ऐसा
उधर सिपाही ने देखा जिस ओर खड़ा हो

उपदेशक बोला था। उन ओठों को चाटा
सूख गए थे जो, स्वर निकला, ‘‘प्यास !’’ खड़ा ही
    सुनने वाला रहा। सिपाही पड़ा पड़ा ही
करवट हुआ, रक्त अपना पी कुछ दुख काटा—
        ‘‘जाओ चले, मूर्ख दुनिया में बहुत पड़े हैं।
         उन्हें सिखाओ हम तो अपनी जगह अड़े हैं।’’

सॉनेट का पथ

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा;
        सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट; क्या कर डाला
        यह उस ने भी अजब तमाशा। मन की माला
गले डाल ली। इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा

अधिक नहीं है, कसे कसाए भाव अनूठे
        ऐसे आएँ जैसे क़िला आगरा में जो
        नग है, दिखलाता है पूरे ताजमहल को;
गेय रहे, एकान्विति हो। उस ने तो झूठे
ठाटबाट बाँधे हैं। चीज़ किराए की है।
    स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन की वाणी
    वर्ड्सवर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी
स्वर-धारा है, उस ने नई चीज़ क्या दी है।

    सॉनेट से मजाक़ भी उसने खूब किया है,
    जहाँ तहाँ कुछ रंग व्यंग्य का छिड़क दिया है।
 

प्यार

जब भौंरे ने आकर पहले पहले गाया
        कली मौन थी। नहीं जानती थी वह भाषा
        इस दुनिया की, कैसी होती है अभिलाषा
इस से भी अनजान पड़ी थी। तो भी आया

जीवन का यह अतिथि, ज्ञान का सहज सलोना
        शिशु, जिस को दुनिया में प्यार कहा जाता है,
        स्वाभिमान-मानवता का पाया जाता है
जिस से नाता। उस में कुछ ऐसा है टोना

जिस से यह सारी दुनिया फिर राई रत्ती
        और दिखाई देने लगती है। क्या जाने
        कौन राग छाती से लगता है अकुलाने,
इंद्रधनुष सी लहराती है पत्ती पत्ती।

        बिना बुलाए जो आता है प्यार वही है।
        प्राणों की धारा उस में चुपचाप बही है।

 

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

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