May 262008
 

1.
रेबीज के नये इंजेक्शन की कसम,
किसी कुत्ते में कहां है वह दम,
जो भोंकता भी हो, चाटता भी हो,
गरियाता भी हो, काटता भी हो,
हम तो ऐसे ही थे,
और
ऐसे ही रहेंगे सनम.

2.

तेरे बिना जिन्दगी का नूर चला जायेगा,
बिन काटे किसी को क्या मजा आयेगा,
गाली खाने से नहीं डरते हैं हम,मेरे दोस्त
खायी गाली तो ब्लॉग हिट हो जायेगा.

3.

हिट हो ना सके अच्छा लिख के तो क्या,
चलो किसी ब्लॉगर को हड़काया जाये.

4.

हमारे सामने टिक नहीं सकती शराफत,
ग़ुंडागर्दी में अपना नाम बहुत चलता है.

5.

ज़ज़बात सीने में हैं तो छुपा के रख,
यहां कौन तेरे ज़ज़बात के लिये सैंटी है.

6.

प्यार आता है उस भोली सूरत पर,
जिसने मुझको सिर्फ ब्लॉगर समझा.

7.

तेरे बस में कुछ नहीं है,उजबक
तू क्या समझा था,भले हैं हम?

अब दोहा भी झेलिये

शूल,फूल,पत्थर सहित,चलें पवन सी चाल
जो ब्लॉग़िंग से भागते, कैसे बनायें माल

फोटो साभार : पंगेबाज

संदर्भ : सैटीयापा

कविकार : केडीके

May 252008
 

केडीके महोदय बालकिशन जी की इस पोस्ट पर अपना कुदरती कवितायी हुनर दिखाना चाहते थे लेकिन सफल नहीं हुए तो हमको बोले कि इस “कवि की कल्पना” को किसी तरह ठेल दो. हमको भला क्या तकलीफ.हम ठेल रहे हैं. गाली.प्रसंशा सब केडीके साहब की.  

बालकिशन जी आप किस शोध के चक्कर में पढ़ गये. हमें मालूम है कि यह शोध आपने हम जैसे सफल साहित्यकारों को ठेस पहुचाने के लिये ही किया है.

अब हमारी कवितायें भी झेलिये.

1. सर्द-दर्द और गर्द
जब मर्द के पास
आकर जम जाते है
तो हिमालय की बर्फ
पिघलने लगती है,
लालिमा,कालिख के
साथ मिल कर
देने लगती है हुंकार
कि बता तो दो कि
तुम आखिर हो कौन?

2. अहसान
जिन पैरों तले कुचला गया
वह पैर अब कांटो पर चल रहे हैं
और अहसास मिट्टी में पड़े हैं.

3. उस दाढ़ी में
दिखे कितने तिनके
जिस पर चिड़िया ने
घौसला बना लिया.

4. नम जमीन पर
अकुंरित होने के लिये
मचल रहे हैं
कितने बीज
लेकिन जमीन को
कर्ज की तलाश है.

5. आपस की समझदारी में
इतना तो करना ही था
मेरे पीठ के दाग को
दूसरों को दिखाने से पहले
मुझे ही दिखा दिया होता

6. तड़पते जमाने में
उफनती नदियां
किनारों को बहाती है
और किनारे
अपना दायरा बड़ा लेते हैं.

और अब कुछ कज़ल भी देखिये

दिखा नहीं

देकर हम ने खुद को, देखा
क्या देखा? यह दिखा नहीं

पानी निकला नाली से जब
कैसे बिखरा दिखा नहीं

बरबादी की  नादानी में
हमने पूरा गांव जलाया
लेकिन उसमें जलता सा
अपना घर तो दिखा नहीं.

पता नहीं

देखो हमने तीर चलाया
तुमको लगा क्या? पता नहीं

हम घी बनकर आहुति देते थे
आग लगी क्या? पता नहीं.

देखो हमसे बचकर रहना
कब सनकेंगे? पता नहीं

लाख टके की एक बात थी
पल्ले पड़ी क्या? पता नहीं

वो मुझको अब उल्लू कहता
खुद पट्ठा है पता नहीं

मैं सबको रोटी देता हूँ,
खुद के घर का पता नहीं.

अब आगे से साहित्यकारों से पंगा लेने की जुर्रत ना करें.

गरिष्ठ कवि केडीके (एक्स साहित्यकार करंट ब्लॉगर)

Jan 242008
 

मैने उमर के रुबाइयों के बहुतेरे अनुवाद पढ़े..हिन्दी में भी अंग्रेजी में भी. हिन्दी में मुझे ‘मधुशाला’ (जो कि अनुवाद नहीं है पर इसकी चर्चा बाद में) और ‘मधुज्वाल‘ ने बहुत प्रभावित किया.हाँलाकि रघुवंश गुप्त जी का अनुवाद भी काफी अच्छा है….पर ‘मधुज्वाल’ मुझे उसके नये प्रतिमानों और छंद के नये नये प्रयोगो की वजह से ज्यादा सुन्दर प्रतीत होता है. बांकी अनुवाद एक ही शैली में बँध गये से लगते हैं. हाँलाकि बच्चन की ‘मधुशाला’ जितनी लोकप्रिय हुई उतना लोकप्रिय इसके समवर्ती रुबाइयों का कोई भी अनुवाद हिन्दी में नहीं हुआ.. लेकिन मुझे लगता है इसका मूल कारण यह रहा कि मधुशाला एक गेय रचना है.जो लोगों की जबान पर तुरंत चढ़ जाती है इस कारण इसको याद रखना ज्यादा आसान होता है.

आइये आज आपको मधुज्वाल से मेरे पसंद के कुछ छंदो से परिचित करवाता हूँ.

यह जग मेघों की चल माया
भावी, स्वप्नों की छ्ल छाया !
तू बहती सरिता के जल पर
देख रहा अपनी प्रतिछवि नर !

उठ रे , कल के दुख से व्याकुल,
जीवन सतरँग वाष्पों का पुल !
कल का दुख केवल पागलपन,
पल पल बहता स्वप्निल जीवन !
ले, उर में हाला ज्वाला भर ,
सुरा पान कर , सुधा पान कर !

स्वर्गिक अप्सरि सी प्रिय सहचरि
हो हँसमुख संग ,
मधुर गान हो ,सुरा पान हो
लज्जारुण रंग !
कल कल छ्ल छ्ल बहता हो जल
तट हो कुसुमित
कोमल शाद्वल चूमे पद तल
साकी हो स्मित !
इससे अतिशय स्वर्ग न सुखमय
यही सुर सदन ,
छोड़ मोह भय , मदिरा में लय
हो विमूढ़ मन!

वह ह्रदय नहीं
जिसमें प्रियतम की चाह नहीं!
वह प्रणय नहीं
जिसमें विरहानल दाह नहीं !
वह दिवस नहीं
यदि अविरत सुरा प्रवाह नहीं !
वह वयस नहीं
जो बाला के गल बाँह नहीं !

वह मनुष्य जिसके रहने को
हो छोटा आंगन , गृह द्वार ,
खाने को रोटी का टुकड़ा ,
पीने को मदिरा की धार !
जो न किसी का सेवक शासक ,
हँसमुख हों जिसके सहचर ,
कहता उमर सुखी है वह नर ,
स्वर्ग उसे है यह संसार !

मदिर नयन की , फूल बदन की
प्रेमी को ही चिर पहचान ,
मधुर गान का , सुरा पान का
मौजी ही करता सम्मान !
स्वर्गोत्सुक जो , सुरा विमुख जो
क्षमा करें उनको भगवान ,
प्रेयसि का मुख , मदिरा का सुख
प्रणयी के , मद्यप के प्राण !

उमर न कभी हरित होगा फिर
पलित बयस का गलित लिबास,
मेरे मन अनुकूल फिरेगा
भाग्य चक्र ,यह व्यर्थ प्रयास !
पान पात्र भर ले मदिरा से
शोक न कर , मदिरा कर पान ,
कभी सुराही टूट , सुरा ही
रह जायेगी , कर विश्वास! 

धर्म चक्रों को यदि मुझसे
कभी मित्रता हो स्वीकार
वो मेरे दुखों के बदले
इतना मात्र करें उपकार-
मेरे मरने बाद देह की
रज से ईंटे कर तैयार
चुनवा दें वे मदिरालय के
खँडहर की टूटी दीवार !

surahi-toot

 

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

Jan 172008
 

madhujwal_cover उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद सुमित्रानंदन पंत ने 1929 में उर्दु के प्रसिद्ध शायर असगर साहब गोडवी की सहायता और इंडियन प्रेस के आग्रह पर किया था. यह अनुवाद “मधुज्वाल” नाम से 1948 में प्रकाशित हुआ था. अन्य हिन्दी अनुवादकों की तरह उनका यह अनुवाद फिट्जराल्ड की की पुस्तक पर आधारित नहीं था बल्कि उन्होने मूल फारसी से हिन्दी अनुवाद किया था. मूल फारसी को समझने में उनकी सहायता असगर साहब ने की थी. इसीलिये इस पुस्तक में पाठक को कल्पनाशीलता के कुछ नये रंग मिलते हैं. इसी कल्पनाशीलता की वजह से यह अनुवाद स्वयं के ज्यादा करीब लगता है. नये प्रतिमानों में कोयल है, बुलबुल है,गुलाब और आम्र मंजरी की गंध भी है.”मधुज्वाल” में नये छंद विधान हैं जो कहीं कहीं रुबाई वाले छंद में परिणित हो जाते हैं और कहीं एक्दम दूसरा ही रूप ले लेते हैं.इस पुस्तक में पदों की संख्या भी अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले कहीं ज्यादा है. “मधुज्वाल” के द्वितीय संस्करण में कुल 151 पद हैं.

आइये कुछ पदों पर नजर डालें.

खोलकर मदिरालय का द्वार
प्रात: ही कोई  उठा पुकार
मुग्ध श्रवणों में मधु रव घोल,
जाग उन्मद मदिरा के छात्र!
 
  ढुलक कर यौवन मधु अनमोल
शेष रह जाय नहीं मृदु मात्र,
ढाल जीवन मदिरा जी खोल
लबालब भर ले उर का पात्र! [2]
सुरालय हो मेरा संसार,
सुरा-सुरभित उर के उदगार!
सुरा ही प्रिय सहचरि सुकुमार,
सुरा,लज्जारुण मुख साकार!
 
  उमर को नहीं स्वर्ग की चाह,
सुरा में भरा स्वर्ग का सार!
सुरालय राह स्वर्ग की राह,
सुरालय द्वार स्वर्ग का द्वार्!  [11]
अधर मधु किसने किया सृजन ?
तरल गरल !
रची क्यों नारी चिर निरुपम ?
रूप अनल !
अगर इनसे रहना वंचित
यही विधान ,
दिये विधि ने तप संयम हित
न क्यों दृढ़ प्राण ? [16]

छूट जायें जब तन से प्राण
सुरा में मुझे कराना स्नान !
सुरा,साकी,प्याले का नाम
सुनाना मुझे उमर अविराम!

खोजना चाहे कोई भूल
मुझे मेरे मरने के बाद ,
पांथशाल की सूंघे धूल,
दिलायेगी वो मेरी याद! [18]

madhujwaal_2
इस जीवन का भेद
जिसे मिल गया गभीर अपार,
रहा ना उसको क्लेद
मरण भी बना स्वर्ग का द्वार !
 
  करले आत्म विकास ,
खोज पथ, जब तक दीपक हाथ,
मरने बाद , निराश ,
छोड़ देगा प्रकाश भी साथ! [23]
रम्य मधुवन हो स्वर्ग समान,
सुरा हो सुरबाला का ज्ञान !
तरुण बुलबुल की विह्वल तान
प्रणय ज्वाला से भर दे प्राण !
 
  न विधि का भय , न जगत का ज्ञान,
स्वर्ग की स्पृहा , नरक का ध्यान ,-
मदिर चितवन पर दूँ जय बार
चूम अधरों की मदिरा-धार ! [28]
उमर दो दिन का यह संसार
लबालब भर ले उर भ्रंगार
क्षणिक जीवन यौवन का मेल,
सुरा प्याली का फेनिल खेल !
 
  देख , वन के फूलों की डाल
ललक खिलती , झरती तत्काल !
व्यर्थ मत चिंता कर , नादान ,
पान कर मदिराधर कर पान ! [30]
लज्जारुण मुख , बैठी सम्मुख ,
प्रेयसि कंपित कर से उत्सुक
भर ज्वाला रस , हाला हँस हँस
उमर पिलाए , ह्र्दय हो अक्श !
 
  ह्रदय हीन कह लें मलीन,
मैं मधु वारिधि का मुग्ध मीन !
अपवर्ग व्यर्थ , केवल निसर्ग
संगीत, सुरा , सुन्दरी , – स्वर्ग ! [33]
पंचम पिकरव , विकल मनोभव ,
        यौवन उत्सव !
मधुवन गुंजित , नीर तंरंगित
        तीर कल ध्वनित !
हँसमुख सुन्दर प्रिय सुख सहचर ,
        प्रिया मनोहर ,
पी मदिराधर सखे , निरंतर ,
       जीवन क्षण भर ! [35]
 
अपना   आना   किसने    जाना ?
जग में आ फिर क्या पछताना ?
जो   आते   वो   निश्चय    जाते,
तुझको   मुझको  भी    है  जाना !
 
 
  बाँध  कमर , ओ साकी सुन्दर ,
उठ कंपित कर में प्याली धर ,
प्रीति सुधा भर,भीति द्विधा हर,
चिर विस्मृति में डूबे अंतर ! [49]

मधुज्वाल के पद हिन्दी के बांकी अनुवादों से थोड़े अलग हैं. इसलिये इनको पढ़ने में एक नयी ताजगी का अहसास होता है. अगले अंक में इसी किताब के कुछ और पदों की चर्चा करेंगे और कुछ चर्चा होगी बच्चन और सुमित्रानंदन पंत के बीच हुए पत्र व्यवहार के बारे में भी.

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों के माध्यम से बतायें…

क्रमश:…………………………

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

Oct 252007
 

समीर जी का उत्साह बढ़ाने में कोई सानी नहीं. कल की पोस्ट पर उन्होने एक अच्छी सी टिप्पणी की जिससे फिर से ऊर्जा मिली कि बांकी भाग को भी टाइप कर आप तक पहुंचाऊं.

थक गये हैं, थोड़ा विश्राम प्राप्त करें मित्र.

कार्य इतना उत्तम हैं कि यह कह पाना संभव नहीं कि थक गये हैं तो जाने दिजिये.

बहुत आभार इस पेशकश का. हमारे पास ताप के ताये हुए दिन होती तो जरुर मदद कर देते आपकी, यह तो आप जानते ही हैं. :)

धन्यवाद समीर जी.

लीजिये प्रस्तुत है अंतिम भाग. पहले दो भाग आपने ना पढ़े हों तो वो यहाँ और यहाँ हैं. निवेदन यही कि पहले उन दोनों भागों को पढ़ लें.

मँड़हे से निकला मैं, वह भी साथ था
पूछ पड़ा, किसके लड़के हो
मैंने शिक्षा जैसी थी अलक्ष को प्रणाम किया
कहा, जगरदेवसिंह मेरे पिता थे
बैरागी बाबू, पूछा उसने
मैंने कहा, उनका यह भी नाम है
उसने कहा, अब ऐसे आदमी दिखाई नहीं पड़ते
धरम जानकर रहे धरम किया

मैं बाहर निकला तो सोचता हुआ निकला
आज जो हुआ वह केवल आज ही हुआ है
और मैंने आज के उड़ंछू शब्दों को
पकड़ पाने के लिए अपने मन को
उद्यत कर दिया
ऐसा कम होता है बहुत कम
जब शब्द किसी समय जी से बतियाने लगें
बुआ से मैंने सबकुछ कहा फिर पुछा
उसका नाम क्या है
बुआ ने कहा नगई
महरिन के माथे से उबहनी लटकाए
मैंने घर जाते देखा था
उधर वही घर था
मुड़ते भी देख लिया उनको
उसी ओर
कई दिनों बाद
गया नगई की मँड़ई पर

नगई खाँची फाँदे बैठा था
हाथों में वही काम
आँखें उन हाथों का
हथवट चिताती हुई
खाँची में लगी एक आँख मुझे भी देखा
और कहा बैठो उस पीढे पर
साफ है मैंनें कुछ पहले ही धोया है
बैठने पर मुझसे कहा
अच्छा बाँच लेते है रमायन
तुम्हारे बाबू कहते थे जैसे
अब कोई क्या कहेगा
उनकी भीतर की आँख खुली थी
सुर भी क्या कण्ठ से निकलता था
जैसे आषाढ़ के मेघ की गरज
मैने कहाँ महरा
मैं तो अभी सीख रहा हूँ
नगई ने कहाँ कितने होंगे
जो जानते हैं वही कुछ सीखना है
बाबू की तपस्या का फल
तुम्हें मिला है मिलेगा
मैं इस सनेहिल असीस से
चुपाया रहा
नगई ने हाथ चलाते चलाते फिर कहा
दुनियां है दुनियां का ज्ञान है आदमी है
आदमी को क्या क्या नहीं जानना है
देखते-सुनते और करते ज्ञान होता है
अपनी जब होती है समझ नयी होती है
मेरे लिए समझ पाना कठिन था
पर रुक रुककर निकले बोल ये
कहीं ठहर गये थे मेरे मन में
अर्थ बहुत बाद में कुछ कुछ पाया
धारणा बेकार में बोझ ढोना ही नहीं है
आदमी बात से व्यवहार से
पहचाना जाता है
समझ ही
आदमी को आदमी से जोड़ती है

वर्ष बीत जाने के बाद, शायद
एक दिन नगई की ओर जा निकला
इतने जन वहाँ मैंने नहीं देखे थे
अपना कुछ काम था फिर भी में रुक गया
नगई की दृष्टि मुझ पर पड़ी
काम रोककर मेरे पास आ गया
और कहा, भात है बिरादरी को न्योता है
दिन परसों निश्चित है
आप कहाँ जाते हो
मैंने कहा काम से
उसने कहा मुझे भी बुझाव है
परसों आना
इज्ज्त मैं क्या दुंगा
फिर भी दसों नँह जोड़े
खड़ा ही मिलूँगा
सेवक हूँ और सेवा करना मेरा काम है

मैं आगे बढ़ गया
उस दिन बडी भीड़ थी
बड़े-बड़े चूल्हे जगाये गये
जिन पर हण्डे कड़ाह चढ़े थे
कहीं भात कहीं दाल और कहीं
तरकारी पकती थी
लकड़ियों की कोई कमी नहीं थी
जंगल के बीच थे चिरानीपट्टी की बस्ती
दोने पत्तल पहले से बनाकर
ठिकाने से रखे थे
ढखुलाही कोई छोटी नहीं थी
ढाक के पेड़ ही पेड़ थे
बड़े और अच्छे पत्ते जिन पर छाये थे
जंगल में क्या कमी
जंगल जिसका हो
उससे कह कर ले लेना था
रोक टोक कोई खास नहीं थी
कई बार आ जाकर
रंग वहाँ का देखा
जो भी मिला काम से लगा मिला
ऐसे लोग भी मिले
जो करते थे कम और बोलते बहुत रहते हैं
आवाज ऊँची से ऊँची हो आती है।
ध्यान इधर उधर जाता है आसपासवालों का
कुछ लोग फिरकी से फिरते हुए
इनके पास उनके पास जाते थे
काम को देखकर बताते थे
ऐसे करो वैसे करो
मैंने सुना, एक कहाँ रहा था, कैसे भला
लेकिन सचेत पाँव कान से कुछ दूर थे
मुँह किसी और हाथ से कुछ कह रहा था

कोई दस बार पाँत बैठी थी
हर बार पत्तलें पचास ऊपर लगती थी
नगई ने तीन बीस का हिसाब रखा था
भोजन करने वाले तुष्ट थे
गाँजा, तमाखू, सुरती, बीड़ी, और पान का
प्रबन्ध था
जब जो जिसे चाहिए
जाकर ले लेता था
कुछ बूढ़े और आदर मान पाने वाले ही
अपनी जगह जमे थे
उनकी सेवा नौजवान करते थे
बार-बार यहाँ या वह पूछकर
सराहना हो रही थी
नगई के यहाँ वहाँ
बड़े लोग भी प्रबन्ध ऐसा
नहीं कर पाते
नगई पर कृपा है भगवान की
इस तरह मान दिया
भार हल्का कर दिया

पंचायत बैठी थी जाजिम पर
पीपल के नीचे
दिन दो घड़ी शेष था
कोतवाल, सिपाही और गोड़इत
जाति के ही लोग थे
बरौछीदार-चँवरदार मक्खियाँ उड़ाते थे
बैठे हुए लोगों को बचाते
हवा पट पड़ी थी इसी कारण
पंखे का प्रबन्ध था पसीना चल रहा था
और बड़े-बड़े पंखे तीन चार हाथों से
हवा को लहराते थे
मैं उभरी पीपल की सोर पर जरा हटकर
बैठा था, मेरी आँखों के लिए
पहली पंचायत थी
चौकीदार ने पुकारा
नगई और लखमनी
दोनों हाथ जोड़े सिर झुकाए हाज़िर हुए
फिर उनका दोस बतलाकर पूछा गया
अपने दोस मानते हो
मानते हैं—दोनों ने साथ कहा
पूछा गया, डाँड़-बाँध तुमको मंजूर है
सिर माथे हमको मंजूर है—दोनों बोले
पंचों ने कहा, दस रुपये की डाँड़ है, भात देना होगा
यह भी मंजूर है
फिर महरिन जल लायी, सबको दिया पीने को
नगई ने हुक्का पिया और बारी-बारी सबको दिया
पंचों ने हुक्म दिया अब तुम दोनों साथ रहो
पंचायत तो मानो पंचपरमेसर है
नगई हाथ जोड़े अब खड़ा हुआ
बोला, जाति गंगा ने मुझे पावन कर दिया
धन्य हुआ
और फिर भोज हुआ
नाच और नाटक हुए.

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

4. नगई महरा: त्रिलोचन

5. नगई महरा- 2 : त्रिलोचन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: कविता, काकेश, त्रिलोचन, गांव, नगई महरा, नगई, ताप के ताये हुए दिन

Technorati Tags: कविता, काकेश, त्रिलोचन, गांव, नगई महरा, नगई, ताप के ताये हुए दिन, poem, hindi blogging, hindi poem, trilochan, village, nagai mahara, kakesh

Oct 242007
 

कल नगई महरा का पहला भाग प्रस्तुत किया था. आज पेश है उसी का दूसरा भाग.कृपया पूरी कविता पढ़ें आप निश्चित ही कविता के मर्म में उतर पायेंगे.य़ह एक कविता है जिसके अन्दर समाज की एक कहानी भी साथ साथ चल रही है और दिख रहा है समूचा गाँव.आइये आनन्द लें.

तब मेरी उमर जैसी छोटी थी
समझ भी छोटी थी
शब्द याद रह गये
अर्थ वर्षों बाद खुला जब
समाज के पर्दे खुलने लगे

चार भाई थे—नगई, बैरागी, बित्तू
और कोई और
बैरागी को मैने देखा था जब तब
चिरानीपट्टी कभी-कभी आता था
बैरागी का बियाह महजी से हुआ था
महजी इस महरिन की कोख से जनमी थी
बैरागी-महजी के नाते से
कभी कदा नगई की चर्चा चल जाती थी

चर्चा कमजोर थी
कहारों में
किसी को छोड़कर दूसरे को कर लेना
चलता था
और अब भी चलता है
नर या नारी का बिसेख कोई नहीं था
जोड़े में जब कोई नहीं रहा
दूसरे को लाने में बाधा कुछ नहीं थी
जरा ऊँच-नीच का विचार तो यहाँ भी था
जातियों के आपसी भेद थे
कोई जाति कुछ ऊँची
कोई जाति कुछ नीची
स्त्री-पुरुष भिन्न-भिन्न शाखा के हुए
तो मुश्किल पड़ जाती थी
लेकिन पंचायत थी
डाँड़-बाँध करती थी
जिसे मानना ही था
और फिर भोज भात चलता था
भोज भात खाया भागे नहीं
आपसी बतियाव, खेला, गाना, नाच-रंग
नाटक, तमाशा, सभी होता था
इसी समय सबके गुन खुलते थे

नगई ने अपने सगे भाई की सास को
घर में बैठाया था
उसी घर में माँ-बेटी
जेठानी-देवरानी थीं
सम्बन्धों की छीछालेदार
घर में ना हो गाँव-भर में होती थी
बाप दादों का कुटका
बछैया छोड़कर नगई ने छोड़ दिया
मँडई डाल ली चिरानीपट्टी में आकर

मैने एक दिन उधर
पेड़ों के सहारे एक मड़ई खड़ी देखी
पास ही बँसवट थी
जिसमें बहुत साँप सुने जाते थे
और कुछ कदम पर डँड़ियबा का मसान था
गाँव में गाँव से अलग छनिहर
कौन यहाँ रहता है
देखने के लिए गया
आँखें जो देखती थीं मेनेजर को बताती थीं
मुँह मेरा बन्द था

नगई ने जेंवरी बरते पूछा, पढ़ते हो
हाँ कहने को खुला
फिर नगई ने पूछा
रमायन बाँच लेते हो
हाँ अटक अटककर
सुन कर हँसा नगई खुलकर बोला
बाँचना अटक अटक कर
और इसे बूझना बूझने की बात है
मेरे कान नगई के कहन-रस में पगे
अब उसने फिर कहा
लाऊँ मैं, बाँचोगे,
ले आओ मैंने कहा
मन में गुना अब तक तो
अपने आप बाँचता था
आज किसी और के लिए मुझे बाँचना है
यहाँ नयी बात थी
और नयी बात में अनकुस होता ही है
मन हाल रहा था
बात को फैलाव से बचाने के लिए मै
नगई का नाम बार-बार दे रहा हूँ
लेकिन मुझे उस दिन
उसका नाम मालूम नहीं था
बातों से बात चली
अलगाव दूर था लगाव पास पास था
और लगाव को कोई नाम देने से
काम बहुत नहीं बनता
नाम एक निश्चित निश्चय उगाता है
अर्थ सम्बन्धों के सहारे चला करते हैं
यानि अर्थ का उदगम छिपा रह जाता है
नगई ने बेठन को खोलकर पोथी को
माथे से लगा लिया
फिर उसे खाट कि सिरहाने रखा
लोटे में पानी लेकर मुझसे कहा
चरण मुझे धोने दो
और उसने मेरे दोनें पैरों को
घुटनों तक धो दिया अच्छी तरह
फिर लोटे को माँजा धोकर पानी लिया
और कहा, चलो हाथ मुँह भी धुला दूं

मैं उठा पानी वह ढालता रहा
मैने हाथ-मुँह फरचाए
पास के मँड़हे में कुशासन एक अलग था
उसकी गर्द झाड़कर मुझे बैठने को कहा
मेरे बैठ जाने पर पोथी मुझे सौंप दी
फिर मुझे बड़े भक्ति-भाव से प्रणाम किया
कुछ हटकर हाथ जोड़कर सामने ही
भूमि पर बैठ गया

मैने पोथी खोल ली
पूछा, कहाँ पढूं
उसने कहा सुन्दरकाण्ड
मैंने साँस चैन की ली
सुन्दरकाण्ड कई बार पढ़ा था
पढने को,अर्थ कौन ढुँढता
ध्वनी अपनी मुझे अच्छी लगती थी
जहाँ-जहाँ अर्थ झलक जाता था
वहाँ आनन्द मुझे मिलता था
जनक सुता के आगे ठाढ़ भएउ कर जोरि
पढकर मैं रुका प्रति दोहे पर जैसे
वैसे ही उसने इस दोहे पर
भक्ति भाव से कहा
सियाबर रामचन्द्र की जय
फिर मुझ से कहा अब विश्राम
कुशा खण्ड पतला सा मेरी ओर करके कहा
चिह्न रख दो पोथी में
मैंने चिह्न लगाकर पोथी को बन्द किया
उसने अब पूछा था कल भी आओगे इस ओर
मैने कहा, आऊँगा
जब मैं खड़ा हुआ चलने को
उसने भक्ति भाव से मुझे फिर प्रणाम किया

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

क्रमश:……………….

कविता अभी समाप्त नहीं हुई. लेकिन मेरी उंगलिया अब टाइप कर पाने मे असमर्थ पा रही हैं खुद को. चलिये तो शीघ्र ही आता हूँ एक और भाग के साथ जो इस कविता का अंतिम भाग होगा.

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

4. नगई महरा: त्रिलोचन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: कविता, काकेश, त्रिलोचन, गांव, नगई महरा, नगई, ताप के ताये हुए दिन

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Oct 232007
 

‘नगई महरा’ त्रिलोचन की एक सशक्त रचना है.पहलू में त्रिलोचन की कविताओं में भी इस कविता का जिक्र हुआ था. यह एक लंबी कविता है जिसे दो भागों में पेश कर रहा हूँ. इस कविता में ग्रामीण जीवन अपने पूरे यौवन के साथ उतर गया है. गांव के आम शब्द इस कविता में इतने सहज भाव से आ जाते हैं कि समझने के लिये अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता.गांव के जीवन का एक शब्द चित्र सी खींचती है यह कविता. जाति-पाति,पंचायत, और समाज सभी कुछ तो है इसमें.आप भी आनंद लीजिये.

नगई महरा

गाँव वाले इधर उधर कहते थे
नगई भगताया है
सामना हो जाने पर कहते थे
नगई भगत

नगई कहार था
अपना गाँव छोड़कर
चिरानीपट्टी आ बसा
पूरब की ओर
जहाँ बाग या जंगल था
बाग में
पेड़ आम,जामुन या चिलबिल के
जंगल में मकोय, हैंस, रिसबिल की बँवरें
झाड़ियां झरबेरी की
और कई जाति की
ढ़ेरे, कटार,ढ़ाक, आछी,
बबूल और रेवाँ के
पेड़ भी जहाँ तहाँ खड़े थे

सूखे पत्ते वहाँ बहुत सारे थे
नगई ने भाड़ बैठा दिया
दिन में साँस मिलने पर
भाड़ को जगाता था
दूर दूर से भुँजानेवाले आ जाते थे
संझा के पहले ही
भाड़ बन्द होता था
नगई का परिवार
छोटा था
घरनी और एक बच्ची
बच्ची गोहनलगुई थी
घरनी सेंदुर से मिली नहीं थी
धरौवा कर लिया था

घरनी फुर्तीली थी
चुस्त काम काज में
बोल बात में हँसमुख
कभी उसका चेहरा मुरझाया हो
याद नहीं आता मुझे
बात पर बात ऐसे जड़ती थी
जहाँ समझ लड़ती थी
और ये दुर्लभ है
नगई ने गाँव के
तीन-चार घरों का
पानी थाम लिया था
कभी वह भरता था
कभी घरनी भरती थी
कुछ खेत मिले थे इसके लिए
और घर घर से
कलेवा मिल जाता था
नगई नहीं खाता था
माँ-बेटी खाकर कुछ करती थी

पूरा परिवार मैंने देखा
पैरों पैरों है
हाथों ने काम कोई लिया, किया
हो जाने का ही काम
हाथों में आता था
रस्सियाँ भी नगई बरा करता था
सुतली को कातकर बांध भी बनाता था
कहता था, दैव ने मुँह चीर दिया है
उसमें कुछ देने को हाथ तो चलाना है
मैने इस घर में
टुन्न पुन्न नहीं देखी
घरनी को महरिन मैं कहता था
मैं ही नहीं कोई मुँह-मुँह देखे
क्योंकि नगई महरा थे
सबके लिए
केवल बड़े-बूढ़े बखरीवाले
नगई बुलाते थे
कभी नगई कभी महरा
जो भी जबान पर चढ़ गया
कहने की झोंक में

नगई को बैठने और उठने का
बोलने-बतियाने का सहूर है
यह अनमोल बाबा कहते थे
अनमोल बाबा की आँख
इन्ही बातों पर पड़ती थी
अच्छी तरह जानता हूँ
मुझ पर जब चिढ़ते थे
कहते थे तू कैसे
बेटा बैरागी का हो गया
भलमनई की कोई चाल नहीं
नगई की चर्चा
निन्दकों को प्रिय नहीं थी
गाँव में निन्दक कम नहीं थे
कहाँ नहीं होते वे
जहाँ वृद्दि पाते हैं
खुचड़ खोज-खोजकर दिखाते हैं

बहुतों के पाँव अपनी डगर पर
निन्दा की कहीं छिपी कहीं उभरी
अढ़ुकन से ठोकर खा जाते हैं
उबेने पाँव चलना कठिन होता है
हर डग का ऊँच खाल
देखे और तोले बिना
काम नहीं चलता
अपना शरीर बेसम्हार होता है
एक दिन अपने द्वारे
इमली के पेड़ तले मैं था
घेउरा बुआ था महरिन पानी भरने आ गयी
बुआ ने बुलाया महरिन
महरिन आ गई पास
बुआ ने, अब मैं समझता हूँ,
कुछ प्यार से कुछ तिरस्कार से
कहा होगा— महरिनिया
तू दमाद के घर
क्यों बैठ गयी
महरिन का जवाब पहले का तैयार लगा
बूआ, अपनी ओर ही निगाह करो
दूसरों की बूझने से पहले अपना ही बूझना
कहीं अच्छा होता है
और वह इज्जत बचाती हुई
घर में चली गयी
छूछा जोर लेकर बाहर निकली
बिल्कुल चुप
बुआ भी चुप ही रहीं
उसके इनारे की ओर चले जाने पर
आप ही आप कहा
कौन नीच जाति के मुँह लगे.

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

क्रमश:……………………………………..

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

Oct 182007
 

हिन्दी के कई चिट्ठाकार अब तकनीकी रूप से कुशल हो गये हैं. अपने चिट्ठों में तरह तरह के विजेट और चित्र लगाने लगे हैं. यह एक सुखद परिवर्तन है. इधर कुछ चिट्ठाकारों ने अपने चिट्ठों में मधुर संगीत प्रदान करने वाला कोई विजेट भी लगाया है. जो चिट्ठा खुलते ही मधुर संगीत से आपका स्वागत करता है. स्वागत करना अच्छी बात है लेकिन मुझ जैसे कई लोगों को इससे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

मैं कई चिट्ठे ऑफिस में पढ़ता हूँ. और जब कभी इस तरह के चिट्ठे पर जाता हूँ तो जो संगीत बजता है वो मेरे अलावा भी कई लोगों को सुनायी पड़ जाता है.तो तुर्ंत वह चिट्ठा बन्द कर देना पड़ता है. हर बार अपने स्पीकर को म्यूट करना संभव नहीं हो पाता. इससे कई बार अटपटा भी लगता है. इसलिये मेरा ऎसे संगीतप्रेमी चिट्ठाकारों से निवेदन है कि वो अपने स्वागतगीत को स्वत:चालित ना रखें. हमारे पास विकल्प हो कि यदि हम चाहें तो आपके स्वागत गीत का आनंद ले सकें.

आशा है आप लोग ध्यान देंगे.

चलिये अब आपने इतना पढ़ ही लिया है तो एक मुक्तिबोध की कविता भी पढ़ लें.ताकि आपको ये ना लगे की बेकार ही यहाँ आये.

नाश देवता

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,
तेरी    प्रत्यंचा  का  कंपन  सूनेपन  का  भार   हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाणों की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे,
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपुत तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।

सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी,
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।

हे रहस्यमय, ध्वंस-महाप्रभु, जो जीवन के तेज सनातन,
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सृजन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वंदन
मेरे सर पर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।

— गजानन माधव मुक्तिबोध

Oct 152007
 

बिस्तरा    है   न   चारपाई    है,
जिन्दगी   खूब  हमने  पायी   है।

कल अंधेरे में जिसने सर काटा,
नाम  मत  लो  हमारा   भाई है।

ठोकरें  दर-ब-दर  की थी हम थे,
कम नहीं हमने मुँह की खाई है।

कब  तलक  तीर  वे  नहीं   छूते,
अब  इसी  बात  पर   लड़ाई   है।

आदमी    जी  रहा  है  मरने को
सबसे    ऊपर    यही  सचाई है।

कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहाँ वह सँभल के आई है।

– त्रिलोचन ( “गुलाब और बुलबुल” से )

कुछ सॉनेट ‘दिगंत’ से

सिपाही और तमाशबीन

घायल हो कर गिरा सिपाही और कराहा।
         एक तमाशबीन दौड़ा आया। फिर बोला,
        ‘‘योद्धा होकर तुम कराहते हो, यह चोला
एक सिपाही का है जिस को सभी सराहा

करते हैं, जिस की अभिलाषा करते हैं, जो
         दुर्लभ है, तुम आज निराशावादी-जैसा
        निन्द्य आचरण करते हो।’’ कहना सुन ऐसा
उधर सिपाही ने देखा जिस ओर खड़ा हो

उपदेशक बोला था। उन ओठों को चाटा
सूख गए थे जो, स्वर निकला, ‘‘प्यास !’’ खड़ा ही
    सुनने वाला रहा। सिपाही पड़ा पड़ा ही
करवट हुआ, रक्त अपना पी कुछ दुख काटा—
        ‘‘जाओ चले, मूर्ख दुनिया में बहुत पड़े हैं।
         उन्हें सिखाओ हम तो अपनी जगह अड़े हैं।’’

सॉनेट का पथ

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा;
        सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट; क्या कर डाला
        यह उस ने भी अजब तमाशा। मन की माला
गले डाल ली। इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा

अधिक नहीं है, कसे कसाए भाव अनूठे
        ऐसे आएँ जैसे क़िला आगरा में जो
        नग है, दिखलाता है पूरे ताजमहल को;
गेय रहे, एकान्विति हो। उस ने तो झूठे
ठाटबाट बाँधे हैं। चीज़ किराए की है।
    स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन की वाणी
    वर्ड्सवर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी
स्वर-धारा है, उस ने नई चीज़ क्या दी है।

    सॉनेट से मजाक़ भी उसने खूब किया है,
    जहाँ तहाँ कुछ रंग व्यंग्य का छिड़क दिया है।
 

प्यार

जब भौंरे ने आकर पहले पहले गाया
        कली मौन थी। नहीं जानती थी वह भाषा
        इस दुनिया की, कैसी होती है अभिलाषा
इस से भी अनजान पड़ी थी। तो भी आया

जीवन का यह अतिथि, ज्ञान का सहज सलोना
        शिशु, जिस को दुनिया में प्यार कहा जाता है,
        स्वाभिमान-मानवता का पाया जाता है
जिस से नाता। उस में कुछ ऐसा है टोना

जिस से यह सारी दुनिया फिर राई रत्ती
        और दिखाई देने लगती है। क्या जाने
        कौन राग छाती से लगता है अकुलाने,
इंद्रधनुष सी लहराती है पत्ती पत्ती।

        बिना बुलाए जो आता है प्यार वही है।
        प्राणों की धारा उस में चुपचाप बही है।

 

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

Oct 152007
 

कवि त्रिलोचन बीमार हैं. उनके बारे में ब्लॉग जगत में लिखा भी जा रहा हैं. कुछ दिनों पहले मैने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें त्रिलोचन की कुछ कविताऎं प्रस्तुत की थी. कल अतुल ने उसी पोस्ट पर टिप्पणी कर त्रिलोचन के बारे में फणीश्वर नाथ रेणु के संस्मरण के बारे में बताया.उसे पढ़ा और फिर त्रिलोचन की कविताऎं जैसे नजर के सामने घूम गयीं.

जब से पहलू में त्रिलोचन की कविताओं के बारे में पढ़ा था तब से ही ‘नगई महरा ‘ और ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’ कविताऎं दिमाग में थी.फिर चन्द्रभूषण जी ने  इन कविताओं का अनुरोध भी कर दिया था.

अब अगर मौका मिले तो ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’ और ‘नगई महरा’ की मुंहदिखाई भी करा दो…

बोधी भाई का अनुरोध था

हो सके तो “बिस्तरा है न चारपाई है” भी छापें ।

तो कल शाम को जब मन त्रिलोचन-मय था तो ये तीनों कविताऎं ढूंढने का खयाल आया…और घर में ही तीनों कविताऎं मिल गयी.. तो लीजिये आज प्रस्तुत है ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’ बांकी दो कविताऎं भी जल्दी ही लाता हूँ.

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं.

चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गाय भैसे रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है

चम्पा अच्छी है
         चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी कभी ऊधम करेती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ – अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ

चम्पा कहती है:
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है

उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ुंगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ुंगी

मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!

चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो , देखा ,
हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता में कभी न जाने दुंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे।

– त्रिलोचन ( उनकी पुस्तक धरती से जो 1945 में प्रकाशित हुई थी)