मैने सुना था कि कभी कभी लेखक द्वारा रचा गया कोई काल्पनिक चरित्र लेखक से भी आगे निकल जाता है और लेखक को पाठकों के हिसाब से फिर उस चरित्र को ढालना पड़ता है. जैसे जब हैरी पॉटर की लेखिका ने अपनी किताब में हैरी पॉटर को मारने की बात की तो कई पाठकों ने उसका विरोध किया. कई जगह प्रदर्शन भी हुए और अंतत: लेखिका को झुकना पड़ा. वैसे मुझे खुशफहमी नहीं है कि मैने हैरी पॉटर जैसा कोई चरित्र निर्मित किया है लेकिन फिर भी मैं अपने उन पाठको के प्रति नतमस्तक हूँ जिन्होने मेरे एक चरित्र को इस तरह से अपनाया कि उसे वह मुझसे ज्यादा पहचानने लगे.

जब मैने परुली कहानी का पहला भाग लिखा था तो मैं उसे एक लघु कथा के रूप में पहले ही भाग में समाप्त मान रहा था. लेकिन पाठकों की उत्सुकता “आगे क्या होगा?से लगा कि पाठक इसके आगे की कहानी जानना चाहते हैं. तो मैं हर बुधवार की सुबह परुली का भाग्यविधाता बनता रहा. जिसे लोगों ने काफी पसंद भी किया.कई पाठक बुधवार को कहानी डालने में देरी होने पर मेल करने लगे कि परुली का क्या हुआ. मुझे भी इसमें आनंद आ रहा था. लेकिन फिर ऑफिस में व्यस्तता बड़ी तो मुझे बुधवार की सुबह इस कहानी को लिखना भारी पड़ने लगा. इसलिये पिछ्ले बुधवार मुझे लगा कि इस कहानी को फास्ट ट्रैक में रखकर समाप्त कर दूँ. ताकि हर बुधवार को लिखने का झंझट ना रहे. लेकिन मुझे क्या मालूम था कि परुली के दीवाने इस कदर नाराज हो जायेंगे.

देखिये क्या कहते हैं पाठक

सुजाता जी ने April 16th, 2008 ,11:34 am पर टिपियाया

अरे ! आज तो आपने बड़ी जल्दी में निबटा दिया कहानी को । हम तो हाथ मलते रह गये !अभी तो स्वाद आना शुरु हुआ था । क्या सचमुच कहानी खत्म ? जाएँ ?

संजीत जी और अरुण जी का ऑबजेक्शन

Sanjeet Tripathi जी ने April 16th, 2008 ,11:54 am पर टिपियाया

वाकई यार, ये तो बड़ी जल्दी ही समेट दिया आपने, कुछ ऐसे जैसे त्रस्त से हो गए हों आप इस सीरिज़ के लेखन से और सब कुछ बस निपटाना चाहते हों
आई ऑब्जेक्ट ;)

अरूण् जी ने April 16th, 2008 ,12:25 pm पर टिपियाया

हम इसे नही पढते ये तो हमारे साथ धोखा है ,पहले रायता मन मर्जी का फ़ैलाया और फ़िर फ़टाफ़ट निपटा दिया क्या आप फ़िल्म लेखन ट्राई कर रहे थे क्या जी ? जो पहले फ़ैलाते चले गये और जब पता चला कि फ़िल्म दो घंटे की बन गई है तो बस पन्द्रह मिनट मे निपटाने मे लग गये ,दुबारा लिखा /(मिटा कर) जाये इसे :)

इस कहानी के बहुत से पाठक ऐसे भी थे जो ब्लॉगर नहीं थे. सबसे तीखी प्रतिक्रिया उन्ही पाठकों की थी.माला जी ने कहा

mala telang जी ने April 17th, 2008 ,5:31 pm पर टिपियाया

काकेश भाई, ये आपने हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है । माना कि समयाभाव है , आप हमसे समय और मांग लेते .. हम खुशी खुशी दे देते ,लेकिन आपने तो हमसे ऐसा पीछा छुड़ाया जैसे सारे गाँव के कुत्ते आपके पीछे पड़ गये हों… जाइये ,इस तरह परुली का डॉक्टर बनना हमें जरा भी रास नहीं आया ,आप हमें बताएं ,कौन इलाज करवायेगा परुली से ? माफ करें मैं तो नहीं ।

नवीन पाठक जी बोले.

नवीन पाठक जी ने April 17th, 2008 ,8:32 pm पर टिपियाया

काकेश दा,
ये जो आज आपने अपने सारे दोस्तो के साथ धोखा किया है, आपको कुछ लगा कि नही…
पर आपने कहानी का अन्त तो सुखद कर दिया, लेकिन अन्त ऐसा होता नही है..कि डा. प्रिया का डा. अतुल के साथ दिल मिल गया और शादी हो गयी…
पहाड के इस माहौल मे लड्किया डाक्टर नही बन सकती है, ,,,

संजय पुजारी जी सबसे ज्यादा नाराज दिखे.

Sanjay Pujari जी ने April 19th, 2008 ,2:32 pm पर टिपियाया

नहीं काकेश जी … दिल तोड़ दिया. मैने तो आपको अच्छा लेखक समझा था लेकिन आप लेखक हो ही नहीं सकते. सिर्फ अपने लिखने का शौक पूरा कर रहे हो और नैट पर लोगों को बेवकूफ बना रहे हो. [अपने मन के मुताबिक कुछ भी लिखा और जब इस बारे में ज्यादा सोचा नहीं गया तो कहानी को 15 लाइनों में खतम कर दिया. भाई साहब ये कहानी अगर ऐसी ही खतम करनी थी तो जिस दिन शुरु हुई उसी दिन खतम क्लर देते..खाली इतने दिनों तक अपना टाइम लगाया और बांकी लोगों को बेवकूफ बनाया.]

और हेम पांडे जी ने तो अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिये कहानी का अंतिम भाग ही लिख भेजा.

hem pandey जी ने April 22nd, 2008 ,7:13 pm पर टिपियाया

‘परुली’ की अन्तिम कड़ी ने मुझे भी अन्य की तरह निराश किया. अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए मैंने अन्तिम कड़ी को इस प्रकार लिख डाला है:-

परुली की दशा देख कर उसकी ईज़ा ने निश्चय कर लिया कि वह फूल जैसी अपनी बेटी की भावनाओं का खून नहीं होने देगी.उसे लगने लगा था कि इस ब्या से परुली सुखी तो नहीं ही होगी. परुली के बाबू से फुरसत में बात करने पर जोस्ज्यु को भी यही ठीक लगा कि यह रिश्ता टूट जाए.
अब इसे पूरे परिवार कि प्रबल सामूहिक इच्छा का प्रभाव समझिए या संजोग कि घटनाक्रम भी कुछ अनुकूल रहे.खान्तोली के गणेश दत्त जी, जो ‘ब्याकर’ (शादियाँ तै कराने वाला) कहलाते थे, ने अपनी भतीजी की जुगाड़ गोपाल के लिए लगा ली और पांडे ज्यू के दिमाग में यह बात भी बिठा दी कि परुली तो ज्यादा ही बीमार ठैरी, ज्यादा दिन बचने वाली भी नहीं हुई.जोस्ज्यु की भी हालत ऐसी नहीं हुई कि वे गोपाल को कुछ ज्यादा दे सकें.पिठ्याँ अभी लगा नहीं है.इस लिए ये रिश्ता ख़तम करने में कोई हर्ज़ भी नहीं हुआ.

इसी बीच जोस्ज्यु के क़का का लड़का महेश, जो चालीस साल से हैदराबाद में था,इष्टदेव की पूजा के लिए पहली बार गाँव आया. उसके दोनों बेटे विदेश में थे और दोनों ने ही अंतर्जातीय विवाह कर रखे थे .महेश रिटायर हो गया था और उसने अपने मौसेरे भाई हरीश के मार्फ़त लखनऊ कुर्मांचल नगर में मकान खरीद लिया था.अब वह लखनऊ में ही रहने वाला था.वह हफ्ते भर जोस्ज्यु के घर में रहा. उसने भी जोस्ज्यु को प्रेरित किया कि वे परुली को आगे पढाएँ और यथासंभव आर्थिक सहायता का भी भरोसा दिलाया.वापस जाते समय वह पाँच सौ रुपये परु के और पाँच सौ रुपये बोजी के हाथ में रख गया.जीवन में पहली बार जोस्ज्यु ने इतनी बड़ी रकम किसी मेहमान या यजमान से एक बार में प्राप्त की थी.

महेश के जाने के बाद परुली भी तेजी से स्वास्थ्य लाभ करने लगी.डॉक्टर पुनेठा की दवा के साथ-साथ महेशकका की आशाजनक बातों से भी वह जल्दी ही बीमारी से उबर गयी.परीक्षा आते आते वह पूर्ण स्वस्थ हो चुकी थी.संभवतः गोल्ज्यु ने महेश कका को परुली के जीवन में एक नया मोड़ लाने के लिए भेजा था.ये महेश कका की बातों का ही असर था कि परुली का आत्मविश्वास बढ़ रहा था.इसी आत्मविश्वास के चलते उसने परीक्षा दी और ५७% अंकों से उत्तीर्ण की.

अब तो जोस्ज्यु भी परुली की पढ़ाई को ले कर उत्साहित थे. परुली गाँव की लड़कियों में ही नहीं, लड़कों में भी सबसे प्रतिभावान सिद्ध हो रही थी.परुली ने इंटर में बायोलोजी ले ली थी.उसकी ड्राइंग अच्छी थी.इसलिए उसे चित्र बनाने में परेशानी नहीं होती थी.प्रायः चित्रों में उसे गुड भी मिलता था,जिसे वह जोस्ज्यु को दिखाती थी और जोस्ज्यु मन ही मन खुश होते थे.हाँ शुरू शुरू में मेढक का डायसेक्शन करते समय उसे घिन जरूर आई थी.
परुली ,जिसे अब ईजा-बाबू परु ही कहते थे,न केवल पढ़ाई में ज्यादा मन लगा रही थी वरन् घर के काम में भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी और इस बात का विशेष ध्यान रखती थी कि ईजा के काम का बोझ कम हो जाए. यद्यपि ईजा-बाबू छोटे भाई चंदू से काम नहीं कराते थे,किंतु परु उसे काम के लिए उत्साहित करती थी.वह सोचती थी कि वह स्वयं पढ़ने के लिए बाहर चली जायेगी तो ईजा के लिए अत्ती काम हो जायेगा.
जोस्ज्यु और जोस्याणी कभी बैठे बातें करते तो उनकी बातों में परु की चिंता जरूर झलकती.
जोस्ज्यु कहते :- हँ वे, हमने कहीं परु का ब्या टाल कर ग़लत तो नहीं किया.
जोस्याणी कहती – नैं हो, चुप रौ.अब मन कैं झन गजबजाओ. गोल्ज्यु ने जो किया भल ही किया होगा. देखते नहीं पढ़ने में हमेशा फस्ट ठैरी.घर का काम भी भली कै संभालने वाली ठैरी.
फ़िर कुछ शरमा कर बोलती – आज कल देखण-चाण भी खूब हो गयी है.

इसे परुली का भाग्य कहो या गोल्ज्यु की कृपा कि केमिस्ट्री के टीचर तारा दत्त जी अल्मोड़ा से ट्रांसफर होकर परु के इंटर कालेज में आ गए.केमिस्ट्री पढाने के लिए अल्मोड़ा में तारा दत्त जी का बहुत नाम था.तारा दत्त जी की ही कृपा से परु केमिस्ट्री का कीडा बन गयी.उसे अधिकांश फार्मूले और एक्वेशन कंठस्थ थे.केमिस्ट्री ही वह विषय था जिसके बूते परु ने इंटर भी ५८% नंबरों से पास कर लिया.

परु पिछले दो सालों से पत्रों द्वारा महेश कका के सम्पर्क में थी.महेश कका अब लखनऊ में निवास कर रहे थे.उन्हें भी परु से लगाव हो आया था.तीज त्यौहार परु को कुछ रुपये भे भेज दिया करते थे.

डाक्टरी के लिए परु ने पी.एम.टी. की तैयारी महेश कका के निर्देशन में ही की थी.उसका सेंटर भी लखनऊ था.अब जा के लगा कि स्कूल की पढाई में अच्छे नंबर लाना और बात है,लेकिन पी.एम.टी. क्लीअर करना उतना आसान नहीं.पी. एम.टी.देने के बाद परु को डर लगने लगा.उसे लगा कि वह शायद पी.एम.टी.में न निकल पाये.वो अब ज्यादा ही भक्त हो गयी थी.देवी के थान नित्य दिया लगाना उसका नियम हो गया था और उसकी एक ही मन्नत होती- देवी माता! मेंके डाक्टर बणे दिए.
रिजल्ट आ गया.परु को काउन्सेलिंग के लिए बुलाया गया.परु की खुशी का पारावार न था.उसने सोचा वह अब डाक्टर बन ही जायेगी.परू के पूरे परिवार में जश्न था.इजा बाबू ने उसे खुशी-खुशी लखनऊ के लिए विदा किया.पडोस के जमुना दत्त जी का लड़का कैलाश छुट्टी बिता कर फौज की ड्यूटी में वापस जा रहा था,उसका साथ भी मिल गया.महेश कका के लिए गडेरी,भांगा,भट,घौत और दो दाने निमु के भेंट में भेजे.जोस्ज्यु खत्याड़ी वाले खेत को बेचने की तैयारी कराने लगे ताकि परु की पढाई का खर्च निकल सके.

लखनऊ में फाइनल काउन्सेलिंग के बाद पता चला की परु का एडमिशन नहीं होगा.वह कट ऑफ़ को छूने से रह गयी थी. परु के कल्पनाओं का महल भरभरा कर गिर पड़ा.उसे जबरदस्त सदमा लगा.वह गाँव वालों को क्या मुंह दिखायेगी?सभी कहेंगे -बहुत फलफला रही थी.सुद्दै जो क्या ठहरा डाक्टर बनना!एक बार उसे लगा की उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए,लेकिन यह विचार ज्यादा देर तक हावी न हो सका.ईजा- बाबू और चंदू के ख्याल ने उसे सकारात्मक विचारों की ओर मोड़ दिया.

काउन्सेलिंग के कुछ दिन बाद ही महेश कका ख़बर लाये कि आरक्षित कोटे की सीटें पूरी नहीं भर पायीं हैं और शासन इस बार ये सीटें सामान्य सीटों से भरने पर विचार कर रहा है.शायद परु का नंबर भी आ जाए क्योंकि परु ज्यादा पीछे नहीं थी.हुआ भी वही.नई सूची मैं परु का नाम आ गया.
परु के जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण दिन था.बचपन से पाले सपने को साकार करने के लिए यह पहला पक्का कदम था.परु की खुशी देख कर महेश कका के भी आंसू निकल आए.

गाँव में जोस्ज्यु अब तक के घटनाक्रम से अवगत न थे.वे तो परु को डाक्टर मान चुके थे.परु की चिट्ठी आयी- मेरा एडमिशन हो गया है.गोल्ज्यु के थान प्रसाद चढ़ा देना. जोस्ज्यु उपाध्यायजी के यहाँ से मिसिरी ले आए. परु की ईजा ने गोल्ज्यु के थान परसाद चढा कर पूरे गाँव मे बांटा.ज्यादातर लोगों का एक ही जवाब था -भल भै हो तुमेरी परुलि डाक्धर बण गे.लेकिन कुछ ज्यादा समझदार लोग यह भी कह रहे थे-अल्ले काँ(अभी कहाँ) आई त पाँच साल तक पढाई करनी पड़ने वाली ठैरी.तब जो बनेगी डाकटर.

पढाई का कुछ खर्च खत्याड़ी वाला खेत बेचने से चल गया था.महेश कका ने भी काफी मदद की. उन्होंने परु को होस्टल न भेजकर अपने घर पर रख लिया जिससे रहने खाने का खर्च बच जाए.

एडमिशन होने तक परु को उतनी मुश्किल नहीं हुई जितनी एडमिशन के बाद. मेडिकल कालेज की जबरदस्त रैगिंग से परु विचलित हो गयी. उसने रैगिंग का नाम तो सुना था लेकिन इस प्रकार की रैगिंग होगी,उसे अनुमान नहीं था.उसे कालेज जाना किसी यातना झेलने जैसा लगने लगा.महेश कका उसकी परेशानी को भाँप गए.उन्होंने परु की चाची से बात की. परु की चाची ने उसे रैगिंग के आतंक से उबरने में मदद की.
परु जब पी.एम.टी. देने पहली बार लखनऊ आयी थी तो इतनी बड़ी ट्रेन देखकर,इतना बड़ा शहर देख कर,इतनी चहल पहल,इतनी भागमभाग देख कर जहाँ चमत्कृत हुई थी वहीं घबराई भी.उसे लगा था कि इतने बड़े शहर में रहकर पढाई करना कितना मुश्किल होगा.लेकिन अब इस चकाचौंध से उसकी घबराहट दूर होने लगी और उसे इसमें रस आने लगा.कालेज में भी उसका ग्रुप बन गया था.वहाँ भी उसे अच्छा लगता था.

यह परु का फर्स्ट इअर था.कालेज में एनुअल फंक्शन चल रहे थे.उसके ग्रुप की रीमा भाटिया बोली-
‘प्रिया तुम इतनी क्यूट हो. ब्यूटी कम्पीटिशन में पार्टिसिपेट क्यों नहीं करतीं?’
अमित और दूसरे साथियों ने भी इस बात पर जोर दिया.प्रिया ने कुछ शर्माते हुए कहा-
‘ठीक है,मैं आज अंकल से परमिशन लूंगी.’
‘परमिशन!’नेहा बोली’भला इसमें उन्हें क्या ऐतराज़ हो सकता है?तुम्हें एक चांस मिल रहा है.हो सकता है आज मिस मेडिकल कालेज,कल मिस लखनऊ फ़िर मिस इंडिया और मिस वर्ल्ड भी तुम बनो.एक्सपोजर ऐसे ही तो होता है.’
परु चुप रही.नेहा की बातों से परु को लगने लगा था कि महेश कका उसे अनुमति दे देंगे क्योंकि वे उसे हमेशा प्रोत्साहित करते थे.

लेकिन जब महेश कका से इस बारे में बात हुई तो उन्होंने परु को प्यार से समझाते हुए मना कर दिया.हालांकि उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि डिबेट या स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करने की अनुमति दे देते.महेश कका की इस बात पर परु को बुरा लगा और वह अनमनी हो गयी.

उसके दोस्तों ने इस बात पर उसके अंकल-आंटी का मजाक भी बनाया.मारिया तो यहाँ तक कहने लगी-
‘ये तुम्हारे पेरेंट्स होते तो मना नहीं करते.तुम्हें तो होस्टल ज्वाइन कर लेना चाहिए.वहाँ कम से कम फ्रीली रह तो सकोगी.’

निपट गाँव से एक अत्यन्त सरल प्रतिभावान लडकी शहरी चकाचौंध भरे बनावटी माहौल में ठीक से तारतम्य नहीं बिठा पा रही थी.इसी लिए जब महेश कका ने उसे न्यू इअर पार्टी में होटल में रात भर जश्न मनाने के लिए मना कर दिया तो वह भड़क उठी और बोली-
‘कका क्या आप समझते हैं कि मैं वहाँ जा कर कोई ग़लत काम करूंगी या शराब पियूंगी?क्या सभी लडकियां जो वहाँ जा रही हैं इसी लिए जा रहे हैं?उनके पेरेंट्स उनको क्यों नहीं रोक रहे?’
इसी रौ में उसने होस्टल ज्वाइन करने की इच्छा भी जाहिर कर दी.वह यह भी भूल गयी कि महेश कका उसका आधा खर्च वहन कर रहे हैं.होस्टल का खर्च वह कहाँ से लाएगी?
उसके तेवर देख कर चाची तो तमक उठी और बोल दिया-
‘जाने दीजिये इसको होस्टल.जब उसे आपकी इज्ज़त नहीं करनी तो आप क्यों इसकी फिक्र करते हैं?हम इसके लिए कितना कर रहे हैं इसे उसकी भी परवाह नहीं.बेशर्म हो गयी है.पर निकल गए हैं इसके.’
महेश कका को भी काफी सदमा लगा.दुखी हो कर बोले-
‘बेटा मैंने तो तुझे अपनी बेटी मान लिया था.तेरा भला बुरा सोचना मेरा फ़र्ज़ था. लेकिन तुझे मेरी बातें बुरी लग रही हैं तो अपने मन की कर ले .हाँ,इतना जरूर कहूंगा कि तेरे बाबू की स्थिति ऐसी नहीं कि होस्टल का खर्च उठा सकें.अभी तो तेरा फर्स्ट इअर ही है.’
लेकिन प्रिया पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ.वह गुस्से में थी और उसने होस्टल जाने का निश्चय कर लिया था.दूसरे दिन वह इस बारे में दोस्तों से बात करने वाली थी.आज की पार्टी में शामिल न हो पाने का भी उसे बहुत मलाल था.
कालेज पहुँचने पर कुछ और ही चर्चा थी.रात की पार्टी में स्टूडेंट्स के दो गुटों में जम कर हाथापाई हुई थी.बोतलें और कुर्सियाँ चली थीं.पुलिस आ गयी थी.अमित, नेहा और सुष्मिता को रात भर थाने में रहना पड़ा था.सुबह पेरेंट्स को बुला कर उन्हें चेतावनी दी गयी थी.
प्रिया के लिए ऐसी घटना अकल्पनीय थी वह महेश कका से कुतर्क करने के लिए शर्मिन्दा थी.दूसरे दिन के न्यूज़ पेपर में घटना की ख़बर फोटो सहित थी.उसके ग्रुप के कुछ स्टूडेंट्स के फोटो और नाम भी थे..
इस घटना के बाद प्रिया को अहसास हो गया कि महेश कका सदा उसके भले की ही बातें करते हैं.उसे आश्चर्य भी हुआ कि उसने किस दम पर होस्टल ज्वाइन करने का विचार बना लिया था.महेश कका से मुंह्जोरी करने का भी उसे बहुत दुःख था. उनसे आँखें मिलाने में भी उसको शर्म आ रही थी.हाँ एक फायदा जरूर हुआ,इसके बाद कभी परु महेश कका से पूछे बिना एक कदम भी नहीं चली.इसी का परिणाम था कि प्रिया ने अपनी मेडिकल के पढाई सफलता पूर्वक पूरी की.
आज परु को इस बात का अहसास है कि महेश कका ने ही उसके जीवन की दिशा बदली है.उनका बहुत बड़ा अहसान है जिसे जिंदगी भर नहीं भूल सकती-डाक्टर प्रिया जोशी

कहानी यहीं समाप्त होती है.इससे आगे जहाँ तक मुझे मालूम है बता दूँ-प्रिया,उसकी माँ और जोस्ज्यु ने कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया जिससे गाँव वाले यह कह सकें कि ये लोग ओच्छि गए हैं.हाँ चंदू को अपनी दीदी के डाक्टर होने पर जरूर गर्व है और इसे वह अपने दोस्तों पर प्रकट भी कर देता है.
डाक्टर प्रिया की नौकरी भी पहाड़ के एक प्राईमरी अस्पताल मे लग गई.सुना है उसका चिह्न किसी डाक्टर अतुल पन्त के लिए गया है.चिह्न साम्य हो गया तो ब्याह पक्का ही समझो क्योंकि दोनों ही समकक्ष संबंधों वाले ठहरे और डाक्टर अतुल के पिताजी केमिस्ट्री के मास्टर तारा दत्त जी हुए जिन्होंने पारु को पढाया था और उसे पसंद भी करते थे.

आप सभी का हार्दिक धन्यवाद. मैं आप लोगों की सोच को नमन करता हूँ. मैं आपका गुनहगार हूँ. इसलिये क्षमा प्रार्थी भी हूँ. मैं समय मिलते ही कहानी के अंतिम भाग को लंबा करके लिखने की कोशिश करुंगा. ब्लॉग पर छापूं ना छापूं लेकिन इससे कमसे कम मेरा अपराधबोध तो कम होगा ही. आप आते रहें और मेरा मार्ग दर्शन करते रहें यही कामना है.

 

आज परुली बहुत खुश थी.आज उसकी बारात जो आने वाली थी. उसकी सखियाँ उसे तैयार करते करते बार बार उसे चिढ़ाती और परु इस बात का बुरा भी नहीं मानती.सर में माँगटीका, नाक में नथ, हाथों में पहुंची और पिछोड़ा ओढ़ी हुई परु बहुत सुन्दर लग रही थी. बारात आने में अभी देर थी. परुली सोच में डूब गयी.

जब वह बीमार हुई थी तब उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी खुशियाँ उसे एक साथ मिल जायेंगी. वह समय दुख, क्षोभ और किस्मत को कोसने वाला समय था. उस समय तो उसकी बीमारी की बात सब जगह फैल गयी थी. पहाड़ों में बातें छिपती कहाँ है.बिना टेलीफोन, मोबाइल जैसे संचार के साधनो के बिना भी सभी बातें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाती. यह बात और थी कि मूल बात में नमक मिर्च की मात्रा बताने वाले की योग्यता और सुनने वाले की क्षमता के आधार पर घटती बढ़ती जाती. परुली की बीमारी की चर्चा मलगाड़ भी पहुंच गयी. पांडे जी को जब पता चला तो वह बेचैन हो गये. अभी तक वह मंगसीर में शादी करने के लिये जोस्ज्यू को तैयार कर रहे थे.लेकिन अब उन्होने सोच लिया कि वह इस बारे में और जोर नहीं देंगे बल्कि वह तो ऐसे मौके की तलाश में थे जिससे की वह किसी तरह इस ब्या के लिये मना कर सकें.

इधर जोस्ज्यू को जब परुली की ईजा ने परुली की सारी बात बतायी तो वह और चिंतित हो गये.उन्होने निश्चय किया कि वह पांडे ज्यू से सीधे सीधे कहेंगे कि वह परुली की शादी अभी नहीं करना चाहते.साथ ही वह परुली को दिखाने के लिये शहर भी ले गये जहाँ कोई डाक्टर पुनेठा थे. वह सप्ताह में दो दिन नंदादेवी मंदिर के पास बैठते थे.पहाड़ की चढ़ाई को चढ़ना कमजोर परुली के लिये काफी मुश्किल था फिर भी किसी तरह उसने उसे पार किया. रास्ते में बाबू ने उसे बताया कि उन्होने अभी उसका ब्या ना करने का फैसला लिया है.

पुनेठा डाक्टर की दवाई से परुली को काफी फायदा हुआ. एक महीने के अन्दर परुली स्कूल जाने लायक और घर के छोटे छोटे काम करने लायक हो गयी. वह मन लगाकर पढ़ाई भी करती.ब्या टूटने के कारण उन लोगों की कुछ बदनामी तो हो ही चुकी थी.गांव में उसके बारे में भी लोग तरह तरह की बाते करते लेकिन परुली इन बातों को अनसुना कर देती. बोर्ड का रिज़ल्ट आया तो परुली अच्छे नम्बरों से सैकेंड डिवीजन में पास हो गयी.आगे की पढ़ाई के लिये उसने बायलॉजी ले ली. उसका एक ही लक्ष्य था कि उसे डॉक्टर बनना है. जो विश्वास उस पर उसके ईजा बोज्यू ने दिखाया था उसे वह तोड़ना नहीं चाहती थी.

आखिर वह दिन आ ही गया जब मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में उसका नाम आ ही गया.पहली बार वह शहर से बहुत दूर लखनऊ गयी, बाबू के साथ. कितना बड़ा शहर. इतना बड़ा शहर देखकर ही उसे घबराहट सी होने लगी लेकिन उसने अपनी घबराहट को किसी तरह काबू किया और वह बाबू को विश्वास दिलवाते रही कि वह हॉस्टल में आराम से रहेगी. जोस्ज्यू ने भी अपनी खत्याड़ी वाली जमीन बेच दी थी ताकि परुली की पढ़ाई के लिये पैसे का इंतजाम हो सके.

परुली की पढ़ाई पूरी हो गयी. वह अपरेंटिस के लिये अपने गांव के पास वाले शहर के बेस अस्पताल में आ गयी. यहीं उसकी मुलाकात डाक्टर अतुल से हुई. डाक्टर प्रिया जोशी और डाक्टर अतुल पंत की आपस में बहुत अच्छी बनती थी. इसके पीछे एक कारण यह भी था कि दोनों ही बहुत गरीब परिवार से आये थे और दोनों के दिल में काम करने और अपने पहाड़ के लिये बहुत कुछ करने के सपने बसे थे. विधाता को भी उनका मेल शायद मंजूर था इसलिये जब प्रिया का चिन्ह ,अतुल के चिन्ह के साथ मिलाया गया तो वह मिल गया और दोनों का शादी पक्की हो गयी.

“बारात बस पहुचने वाली ही है दुल्यर्घ की तैयारी करो हो.” किसी ने कहा तो जैसे उसकी तंद्रा टूटी.वहा भाग कर अन्दर वाले कमरे में जाकर अपनी नथ ठीक करने लगी. इधर पटांगण में ऐपण से दुल्यर्घ चौकी बनायी गयी थी. वहाँ पर सारी तैयारी पूरी थी. परु का छोटा भाई भी बारात का स्वागत करने के लिये रंग बिरंगी छाता लेकर तैयार खड़ा था.बाहर की लाइट में चमक रहा था. प्रिया वैड्स अतुल…….

समाप्त……

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा 7. परुली:ब्या टालने की उहापोह 8. परुली : अभी नानतिन ही हुई हो 9. परुली : यह कैसी बीमारी?

 

“परु तो जर से हणक रही है हो.” (परु को तेज बुखार है). परुली की ईजा ने जजमानी के लिये निकलते हुए जोस्ज्यू से कहा.

“ठीक है मैं गड़वा बॉज्यू के वहां से ब्याव को (शाम को) मिक्सचर लेते आउंगा.”

परुली स्कूल भी नहीं गयी. दिन भर बुखार से तपती रही. उसकी ईजा ने ही घर के अधिकतर काम किये. फिर उसे बुखार में तड़पता छोड़कर ही वण (जंगल) चले गयी. परुली सोचती रही अपने संभावित भविष्य के बारे में.ब्या होने पर उसे हमेशा धोती पहनकर ही रहना होगा. सास-ससुर के आगे बड़ा सा घूंघट निकाल कर रखना होगा.पांच पांच गोरुओं का सारा काम करना होगा.उनका दूध लगाना होगा.उन्हें वण हंकाने जाना होगा. लकड़ियाँ,पिरूल,घास,पानी सब ही कुछ तो लाना होंगा, गुपटाले बनाने होंगे. कई सारे काम. इन कामों के बीच वह पढ़ तो नहीं ही पायेगी. यानि यदि ब्या हुआ तो उसे डॉक्टर तो क्या पढ़ाई के बारे में भी भूलना ही पड़ेगा.सोचते सोचते उसकी तबियत और खराब हो गयी.  

शाम को बाबू आये तो मिक्सचर लेते आये. उससे परुली को कुछ आराम तो मिला लेकिन पूरी तरह बुखार नहीं उतरा.लेकिन फिर भी उसने ईजा के साथ घर का काम कराया. ईजा के मना करने के बाबजूद भी वह गोरु-बाछों को घास डाल आयी. आटा ओल दिया और फिर चूल्हे में रोटी सैंकती रही. खाना खा चुकने के बाद बुखार फिर बढ़ गया लेकिन वह ईजा को कुछ बताये बिना वह सो गयी.

आज परु की बीमारी का सातवां दिन था. इस दौरान वह स्कूल भी नहीं गयी थी. हाँ जब भी बीच बीच मे आराम मिलता वह अपनी किताबों से कुछ कुछ पढ़ती रहती.मिक्सचर से फायदा ना होते देख बाबू प्रकाश मेडिकल से दूसरी दवाई भी लाये. दवाई खाने से बुखार कम होता लेकिन फिर आ जाता.जोस्ज्यू भी उसे मोरपंख से एक दो बार झाड़ चुके थे. कुछ लोगों ने कहा परु को नजर लग गयी है,पूछ कराओ. ईजा घर से थोड़े चावल लेकर पंडित जी से पूछ भी करवा आयी. पंडित जी ने भोलनाथज्यू थान की धूणी से कुछ भभूत भी दी. लेकिन उससे भी कुछ फायदा नहीं हुआ.

परु की आंखें एक्दम गड्ढे में चलीं गयी थी. फूल सा सुन्दर चेहरा एक्दम मुरझा गया था. बालों में इतने दिन ना नहाने की वजह से गांठे पड़ गयी थी.वह कुछ भी खाती तो उलटी हो जाती. शरीर भी धीरे धीरे सूख जैसा रहा था. किसी ने कहा कि इससे छॉ (भूत) लग गया है.किसी ने कहा कि किसी ने जादू कर दिया है परु पर, किसी ने कहा कि जागर लगाओ. किसी ने कहा वो शिब्बन पानवाला है वह कुछ दवाई देता है. परु के बाबू वह दवाई भी लाये लेकिन नतीजा वही रहा. पूरे गांव में तरह तरह की बातें होने लगी. कोई कहता कि परु को टी.बी. हो गयी है.ज्यादा थोड़े बचेगी अब यह. इसे भवाली सैनिटोरियम में भरती करो. उन दिनों टीबी से कई मौतें होती भी थीं. कोई कहता कि परुली तो हमेशा से ही बीमार रहती थी. इसीलिये तो ये लोग इसकी शादी जल्दी जल्दी करना चाहते थे. सामने अच्छी अच्छी बातें करने वाले भी पीठ पीछे तरह तरह की बातें बनाते.

परुली जब तेज बुखार में होती तो नीम-बेहोशी की जैसी हालत में कुछ बड़बड़ाती रहती.उसकी यह हालत देख उसकी ईजा भी बहुत दुखी थी.घर भी बिखरा ही रहता क्योंकि पहले घर की साफ सफाई का जिम्मा परू के ऊपर था.वह सुबह सुबह ही चीड़ की पत्तियों के बने झाडू से पूरे घर की सफाई करती. सारा सामान सही जगह पर रखती. अब वही बीमार थी तो घर को साफ करने की किसे सुध.ईजा परु के सिराने पर बैठी थी…और परु के सिर पर हाथ फेरे रही थी. परुली बेहोसी की जैसी हालत में पड़ी थी.वह कुछ बड़बड़ा रही थी. परु की ईजा ने ध्यान से सुनना चाहा. परु बड़बड़ा रही थी. मेरा ब्या मत करो ईजा….. बाबू मुझे डाक्टर बनने दो बाबू….. ईजा ..मैं ब्या नहीं करुंगी ईजा…मैं मर जाउंगी ईजा….ब्या नहीं करुंगी…..

ईजा ने सब कुछ साफ साफ सुना तो उसकी आंखों से आँसुओं की धारा बह निकली. वह फिर परु के सिर पर हाथ फेरने लगी. हाथ फेरते फेरते उसने मन ही मन कुछ निश्चय किया.   

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा 7. परुली:ब्या टालने की उहापोह 8. परुली : अभी नानतिन ही हुई हो

 

मलगाड़ से लौटते समय जोसज्यू सोच रहे थे कि पांडे ज्यू का कहना भी सही ही ठहरा. परुली तो अभी नानतिन ही हुई. उसे अभी अकल जो क्या हुई अरे हम लोगो को ही उतनी अकल जो क्या ठहरी. पांडे ज्यू की रिश्तेदारी तो लखनऊ, दिल्ली सभी जगह ठहरी. वह बराबर दिल्ली, लखनऊ जाते रहने वाले ठहरे. उनकी बहन दसोली के पाठकों के वहाँ हुई.बहन का पूरा परिवार दिल्ली में ही ठहरा. गोपाल को भी उन्होने ही दिल्ली में नौकरी में लगाया ठहरा बल.वह ठीक ही कह रहे ठहरे. घर जाके परु की ईजा को भी समझाता हूँ.

रात को परुली की ईजा आई तो उसे जोसज्यू पूरी घटना बताने लगे और साथ समझाने भी लगे. 

पांडे ज्यू कह रहे थे. ‘परुली को कुछ मालूम जो क्या हुआ. डॉक्टरी करना इतना सित्तिल (सरल) नहीं हुआ जोसज्यू. उसका कोई ट्रेंस (इंट्रैंस) एग्जाम होता है बल. उसमें तो बाजे बाजे लोग ही निकलने वाले हुए. परु थोड़े निकलेगी.” वो कह रहे थे “अरे बोर्ड का इंत्यान भी बहुत टफ ठहरा. उसमें ही परु का पास होना मुश्किल हुआ.”

“ठीक ही कह रहे होंगे फिर.” …ईजा कुछ समझी कुछ नहीं.

वो कह रहे थे कि उनके घर का कारबार ही इतना बढ़ा हुआ. परुली को और कुछ करने जी क्या जरूरत ठहरी. वो तो गोपाल यहाँ रहकर बिगड़ जायेगा करके उसे उन्होने दिल्ली भेजा ठहरा. नहीं तो वो तो यहीं उसके लिये दुकान खोलने की सोच रहे थे बल.

जोस्ज्यू आगे बोले “फिर मैन कौ (मैने कहा) कि यदि परू की इंटर तक पढ़ाई पूरी करवा दें तो जैसा उसकी किस्मत होगी वैसा कर लेगी. तो वो कहने लगे.”

“घरपन के काम से फुरसत कहाँ मिलेगी परु को जोसज्यू. पांच पांच गोरु हैं. उनका घास-पात, मोव निकालना, गुपटाले पाथना,दूध निकालना, ठेकी में दही जमाना कितने तो काम हुए घर में.”

“तो घर के सारे काम क्या हमारी परु करेगी??” …ईजा की आवाज में थोड़ी चिंता थी.

“अब पांडे ज्यू की सैणी तो बीमार रहने वाली हुई. पिछ्ले बार तो दिल्ली तक दिखाया था बल.कुछ दिन वहाँ भरती भी रही ठहरी लेकिन वहाँ की दवाई से भी कोई खास फरक नहीं पड़ा बल. इसीलिये तो पांडे ज्यू जल्दी जलदी ब्वारी लाना चाह रहे हैं.”

“पर परु तो अभी नानि ही हुई हो इत्ती बड़ी घर गृस्थी संभाल पायेगी वो.”

“अरे संभाल लेगी. यहाँ भी तो सारा काम करने वाली हुई. तू उसे दूध लगाना और सिखा देना.”

उसकी ईजा का मन थोड़ा भारी हो गया. “उ तो सिखे द्यून (वो तो सिखा दुंगी) लेकिन परु अभी भौ (बच्ची) ही हुई. इतना बोझ उसके सर पर देना ठीक होगा क्या हो.”

“अरे परु सब कर लेगी. फिर संबंध भी तो देखो. इनके संबंध अल्मोड़ा गल्ली के दीवानों से भी हुए बल.”

परुली लेटे लेटे सब सुन रही थी.आमतौर पर यह सब सुनकर उसकी रुलाई फूट पड़ती थी. लेकिन आज ना जाने क्यों वो नहीं रोई बल्कि वह जितना सुनती जाती उतनी उसकी हिम्मत बढ़ते जाती. इस अवस्था में वह क्या करे वह यही सोच रही थी.

वह उठी और बिचाखंड से चाख में आ गयी जहाँ उसके ईजा बाबू बात कर रहे थे और ईजा के पास जाकर उससे बोली.

“ईजा मुझे मारना है तो वैसे ही गला घोट के मार दे ईजा. ब्या करके क्यों मारना चाहती है.” उसके आवाज में गुस्सा भी था , निरीहता भी और हल्की सी रुलाई भी.

“यो के कुणेछी ? (ये क्या कह रही है)”.ईजा ने पूछा

” क्या हुआ परू  ??” अंगीठी में  हाथ सेकते हुए बाबू बोले.उन्होने पूरी बात ठीक से नहीं सुनी थी.

” सही कह रही हूँ ईजा. मैं भार हूँ ना तुम लोगों …  ” . वह बात पूरी भी नहीं कर पायी और ईजा के गोद में सर रख कर रोने लगी.

“नहीं परु. “उसके सर पर हाथ फेरते हुए ईजा बोली.तू पड़ जा (सो जा) . मैं आती हूँ अभी.

परुली चले गयी. बाबू को पूरी तरह से बात समझ में नहीं आयी. क्योकि यह बात इतने धीरे धीरे बोली गयी कि उनके कान में पूरी बात नहीं पड़ी.

” के भौ…(क्या हुआ) “. परुली के जाने के बाद बाबू ने पूछा.

” के नै (कुछ नहीं) ..तुम ले पड़ जाओ (तुम भी सो जाओ)…भोल बतून (कल बताऊंगी).”

परुली की ईजा भी उठकर बिचाखंड में आकर परुली के पास लेट गयी जहाँ परुली अभी भी सिसकियाँ भर रही थी. 

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा 7. परुली:ब्या टालने की उहापोह

 

परुली के बाबू रात को ठीक से सो भी नहीं पाये. रात भर सोचते रहे कि क्या किया जाये. एक ओर वह चाहते थे कि परुली डॉक्टर बन जाये और दूसरी ओर वह परुली के लिये इतने अच्छे संबंध को छोड़ना भी नहीं चाहते थे. यदि वह किसी तरह अपने मन को इस बात के लिये तैयार भी कर लेते कि वह परुली का ब्या अभी ना करें तो वह किस तरह से इस संबंध के लिये मना करेंगे. एक बार बिरादरी में बदनामी हो गयी तो लोग तरह तरह की बातें बनायेंगे. फिर आगे भी रिश्ते नहीं आयेंगे.इसी तरह सोचते सोचते सुबह हो गयी. घर में घड़ी तो थी नहीं. पास के शहर में एक जेल था उसमें हर घंटे घंटी बजायी जाती जिससे समय का पता चलता. अभी अभी पांच घंटे बजे तो जोसज्यू उठ गये. आज उन्हें बगल के गांव में एक जजमान के वहाँ नामकन्द (नामकरण) करवाने जाना था.

आते समय जाखनदेवी में उपाध्याय ज्यू की दुकान में बैठना जोसज्यू का लगभग रोज का ही नियम था. कभी कभी वह पास की ही भोलदा की दुकान से एक पान भी खा लेते. लेकिन उपाध्याय ज्यू की दुकान से उधार में सामान लेने के अलावा वह उन्हें अपने घर की बातें भी बता आते.उपाध्याय ज्यू जानते थे कि परुली का ब्या ठीक हो गया है. इसलिये आज जोस्ज्यू ने सोचा कि इस बारे में एक बार उपाध्याय ज्यू से भी सलाह कर ली जाये.

“आओ हो जोस्ज्यू ..आज कांबटी (आज कहाँ से) “

“बगल के गांव में खीमदत्त ज्यू के वहाँ नामकन्द था हो.”

“खूब माल-टाल मिला होगा तब तो. खीमद्त्त ज्यू का तो पांच नातनियों के बाद नाती हुआ ठहरा. खूब झर-फर कर रखी है बल.”

“हाँ पूरे गांव को खाने का न्यूता था. हमारे तो पुराने जजमान हुए क्या माल-टाल देंगे. हाँ इस बार सवा रुपये की जगह सवा पांच रुपये की दक्षिणा दी हो.”

“भल हुआ यह तो.तब तो चहा बढ़ूं पे मैं.”

“हाँ बढ़ांओ……कुछ रुककर ….उपाध्याय ज्यू..एक बात में आपकी राय लेनी थी हो.”

“क्या…चाय की केतली में पत्ती डालते हुए उपाध्याय ज्यू बोले. “

“परुली के बारे में….”

“अरे उसके ब्या में कुछ रुपये पैसे की मदद चाहिये क्या. “

“नहीं ..वो तो नहीं …पर परुली कह रही है वह यह ब्या नहीं करेगी. वह पहले डॉक्टर बनना चाहती है. “

“अरे वह तो नानतिन ठहरी.उसका क्या. आप तो ब्या कर दो जी. बनना होगा तो बन जायेगी.”

“लेकिन यार …चाहता तो मैं भी हूँ कि वह डॉक़्टर बन जाये.इसलिये सोच रहा हूँ कि इस ब्या को अभी रुकवा दूँ.”

“जोस्ज्यू तुम्हारी तो मति मारी गयी है.इतना अच्छा घर कहाँ मिलेगा परुली को. चिंन्ह भी कैसा बढिय़ा साम्य हुआ ठहरा. शादी ब्या तो अंजल (संजोग) की बात होने वाली हुई. पहले तो डॉक्टर बनना ही कितना मुश्किल हुआ फिर परुली को डॉक्टर बना भी लिया तो कौन सा उसको जनम भर अपने घर में रख लोगे. ब्या तो तब भी करना ही पड़ेगा ना.फिर अभी बिना किसी कारण के ब्या रोक दिया तो तुम्हारे जजमान ही क्या कहेंगे. कस बामण छा हो तुम ?(कैसे ब्राह्मण हो हो तुम?) …. लो चहा पियो.”

चहा पीते पीते जोसज्यू ने भविष्य की सभी संभावनाओं पर विचार किया. उनको सचमुच अपने जजमानों और बिरादरों की बातें सुनायी देने लगी.बदनामी के डर से वह थोड़े घबरा गये.लेकिन साथ साथ ही जब वह परुली के बारे में सोचते कि जब उसने कहा था ” बाबू मैं यह ब्या नहीं करुंगी” तो कितनी इच्छाऐं उसके एक वाक्य में छिपीं थी.वह कुछ भी निर्णय ले पाने में असमर्थ थे. 

घर जाके भी वह परेशान ही थे. परुली उनके सामने से गुजरी तो उसकी आंखें लाल थी.लगता था वह खूब रोयी है. अब तक उन्होने ध्यान नहीं दिया था. लेकिन अब वह सोच रहे थे कि जब से परुली के ब्या की बात शुरु हुई तब से वह उदास ही रहती थी. इसका कारण अब उनकी समझ में आ रहा था.वह परुली का बुरा थोड़े चाहते थे लेकिन वह क्या कर सकते थे.जिससे भी वह बात करते वह यही सलाह देता कि परुली का ब्या कर दो.

उन्होने निर्णय लिया कि कल वह मलगाड़ जा के एक बार पांडे ज्यू से बात करेंगे. वह भले आदमी हैं हो सकता वही कोई सलाह दें. यदि वह खुद ही परुली को डॉक्टरी पढ़ाने के लिये राजी हो जायें तो फिर परुली का ब्या भी हो जायेगा और वह डॉक्टर भी बन जायेगी. अपनी इस सोच से वह खुद भी हैरान थे कि पहले यह विचार क्यों उनके दिमाग में नहीं आया.आज वह जल्दी जल्दी खाना खा के सो गये ताकि वह कल रत्तब्याण ही मलगाड़ के लिये रवाना हो जायें.

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा

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पिछ्ले अंक में मैने बताया था कि आज वाले भाग में कहानी का अंत कर दुंगा. एक अंत सोचा भी था.लेकिन मुझे खुद भी लग रहा था वह कुछ कुछ फिल्मी अंत हो रहा है  और फिर  पिछ्ले भाग में आयी टिप्पणीयों से हौसला मिला कि मुझे कहानी का अंत फिल्मी करने की कोई आवश्यकता नहीं है. आज सुबह लिखने बैठा तो इसी उहापोह में रहा कि कहानी का अंत करूं या फिर इसे इसी रफ्तार से आगे बढ़ने दूँ. कही ऐसा ना हो कि लगे कि कहानी जबरदस्ती खींची जा रही है. फिर लिखते लिखते लिख ही गया. अभी लगता है कि कहानी जारी रहेगी. तो अगले हफ्ते भी आइयेगा पढ़ने.

कल कुमांऊनी होली का अगला अंक प्रस्तुत किया जायेगा कृपया जरूर पधारें.

1. कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग 2. कुमांउनी होली: भक्ति भी,अश्लीलता भी

 

बाबू से बात करने के बाद परुली सोच में पड़ गयी.वह ऐसा क्या करे कि उसका ब्या रुक जाये. उसके सामने बहुत से विकल्प नहीं थे. वह एक दो बार मना जरूर कर सकती थी कि वह ब्या नहीं करेगी.लेकिन फिर भी उसके ईजा बाबू ना माने तो उसके हाथ में कुछ नहीं था और यदि उसका स्कूल जाना बंद हो गया तब…तब तो जैसे सारे रास्ते ही बंद हो जायेंगे. परुली का मन हुआ कि वह कहीं भाग जाये लेकिन कहाँ जायेगी वह उसे तो कुछ भी नहीं मालूम. वह तो अपने गांव और पास के शहर के रास्ते के अलावा कुछ भी नहीं जानती.

सामने के पहाड़ों के ऊपर से शाम धीरे धीरे उतर रही थी. घर के बहुत से काम पड़े थे. लेकिन परुली चाख के छाजे में बैठ कर सामने के पहाडों को ताक रही थी. उसके अन्दर एक तूफान उठ रहा था. वह सोच रही थी कि कितनी विवश है वह. वह जो चाहती है उसे पूरा भी नहीं कर सकती.सामने के पहाड़ों पर कुछ बत्तियां अब जलने लगीं थी लेकिन अभी परुली के घर में अंधेरा ही था. शाम को चिमनी वाला लैम्प और लम्फू जलाने की जिम्मेवारी परुली की ही थी.लेकिन आज उसे कुछ भी याद ना था. 

इधर उसके बाबू गुस्से में थे.बीढ़ी पीते हुए वह सोच रहे थे कि किसी तरह से यह ब्या हो जाये तो उनकी सांस में सांस आये.मन ही मन वह यह भी सोच रहे थे कि यदि परुली डॉक्टर बन जाये तो पूरे गांव में उनका नाम तो हो ही जायेगा. लेकिन डॉक्टर बनना कोई आसान काम तो है नहीं. छ्ह सात साल तो लगेंगे ही. फिर डाक्टर बनने के बाद बिरादरी में लड़का कहाँ मिलेगा. कोई भी लड़का यहाँ इतना पढ़ा लिखा होता ही नहीं है. बहुत से बहुत  इंटर कर लिया और लग गये कहीं नौकरी में या चले गये लखनऊ, दिल्ली. कोई ज्यादा ही अच्छा हुआ पढ़ने में तो बी.ए. कर लिया, बी.टी.सी. कर लिया और बन गये किसी स्कूल के मास्टर.परुली डाक्टर बन भी गयी तो सारी उमर कुंवारा बैठना पड़ेगा.बदनामी होगी सो अलग.लोग तरह तरह की बातें बनायेगें कि लड़की में पक्का कोई खोट होगा तभी तो इसका ब्या नहीं हो रहा.ना हो ना … इससे तो अच्छा है कि किसी तरह से ब्या हो जाये तो पिंड छूटे. 

ईजा ने अपने सर के ऊपर से हरी घास का गट्ठा भीणे (चबूतरा) में रखा तो उसकी आवाज से परुली और उसके बाबू दोनों की सोच टूटी. शाम अब पहाड़ों से उतरकर पेड़ों के रास्ते होते हुए आंगन में आ चुकी. पर्याप्त अन्धेरा हो चुका था. गोठ में गोरु-बाछ भी भूख के मारे अड़ाट कर रहे थे. उनको भी अभी तक घास नहीं डाली थी. ईजा के आते ही परुली हाथ के झूठे गिलास को लेकर उठी.

“परुली …के हगो रे तुकु (क्या हो गया रे तुझे) ..अभी तक घर में उजेला नहीं किया.”

“हाँ ..ईजा ..कर रही हूँ …”.परुली उठते हुई बोली और जल्दी जल्दी घर के सारे काम निपटाने लगी .परुली को खुद अपनी सोच पर गुस्सा आया कि घर के इतने सारे काम पड़े थे और वह ना जाने क्या सोच रही थी.

“जा ..भ्योल घुरी जा … (गुस्से में एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है) .. अभी तक गोर-बाछों को घास भी नहीं डाली.अब मैं दूध क्या तेरे कपाव से निकालूं. तेरी पढाई के चक्कर में घर का सत्यानाश हो रहा है. रुक… कहती हूँ तेरे बाबू से कि इसका स्कूल बन्द करवा दो”

जिसको देखो उसके स्कूल के पीछे पड़ा है. छारे (राख) से चाय के बर्तन मांजते हुए वह सोच रही थी कि उसका ब्या हो जायेगा तो फिर ये सब काम कौन करेगा. तब तो ईजा को ही यह सब करना पड़ेगा तो फिर अभी क्यों उसकी ईजा उस पर इतना चिल्लाती है. ठीक है …हो जाने दो मेरा ब्या …फिर पता चलेगा कि मैं कितना काम करती हूँ.वह बड़बड़ाई. 

उसके बाबू शाम से ही ईजा से एकांत में बात करने का मौका ढूंढ रहे थे.लेकिन ईजा आते ही सारे कामों व्यस्त हो गयी.रात का खान भी हो गया लेकिन बात करने का मौका ही नहीं मिला.बाबू चाख में बड़बाज्यू के साथ सोते थे. बड़बाज्यू जल्दी सो जाते थे और उनको कान भी कम ही सुनाई पड़ता था. तो आमतौर पर सोने से पहले ईजा-बाबू थोड़ी देर बात करते. तब तक बच्चे बिचाखंड (बीच वाला कमरा) में सो जाते. आज भी वही हुआ.

“हवे… सुणो त्वील (सुना तुमने) ..कि परुली क्या कह रही थी आज “

गरम दूध को ठंडा करने के लिये गिलास से लोटे में डाल कर गिलास में फूँक मारते हुए ईजा बोली…” ना हो …के कुणेछि ? ( क्या कह रही थी)”

” कह रही थी कि मैं ब्या नहीं करुंगी ..”

“किलै (क्यों) ?? ” दूध से ध्यान हटा कर बाबू की ओर हल्की से नजर उठा कर देखते हुए ईजा चौंकते हुए बोली.

” कुणै (कह रही है) कि मैं डाक्टर बनुंगी”

ईजा की जान में जान आयी.वह तो सोच रही थी कि कोई गंभीर बात है. वह फिर से दूध के काम में व्यस्त हो गयी.

“हाँ वो तो मेरे को भी कह रही थी…कहने दो हो उसे …अभी नानतिन ठहरी ..किसी टीचर ने कुछ बोल दिया तो उसके दिमाग में बात बैठ गयी….ब्या हो जायेगा तो धीरे धीरे सब भूल जायेगी….” 

” लेकिन …उसने सब पता कर रखा है कि डॉक्टरी कैसे होती है …कौन सा इम्तान देना पड़ता है…”

“अच्छा”

” और आज बता रही थी कि कोई बैक से पैसा भी मिल जाता है बल डॉक्टरी पढ़ने के लिये.”

” होश्यार तो परु हुई ही .. शिबौ-शिब ..कितनी हौस (शौक) हो रही ठहरी उसे डॉक्टर बनने की. बन जाती तो पूरे गौं (गांव) में अपना नाम तो हो ही जाता…”. दूध का गिलास और मिसरी बाबू को पकड़ाते हुए ईजा बोली.

” वो तो ठीक ही ठहरा…मन तो मेरा भी यही कह रहा है.. लेकिन डॉक्टरी करने में छ: सात साल लगने वाले हुए ..फिर कौन करेगा इससे शादी… ” . मिसरी का टपुका लगाते हुए बाबू ने कहा.

“अरे हमारी परु इतनी देखण-चाण है ..इससे तो कोई भी ब्या कर लेगा हो …”

“तू भी पगली है… अरे डॉक्टरी करने के बाद कोई इंटर पास लड़के से जो क्या कर देंगे शादी. पढ़ा लिखा लड़का भी तो चाहियेगा ना ….वह कां (कहाँ) मिलेगा.. ”

” तो फिर ….यदि पांडे ज्यू से बात करें कि वो ब्या के बाद इसे पढ़ायें तो ब्या के बाद भी तो डॉक्टर बन सकती है …परु….”

” अरे पांडे ज्यू की इतनी खेतीबाड़ी है …चार चार गोरु हैं.. उनको कौन संभालेगा. उनकी घरवाली से अब नहीं संभलता इसीलिये तो वो काम करने वाली ब्वारी (बहू) लाना चाह रहे ठहरे…ब्या हो गया तो फिर थोड़ी होने वाली हुई पढ़ाई …घर के कामों में लगी रहेगी ये तो ..और फिर ब्या के बाद तो उनकी अमानत हुई ना ….हम जोर जो क्या डाल सकने वाले हुए…जैसा वो ठीक समझेंगे करेंगे…”    

” तब तो परु को डॉक्टर बनाने के लिये उसके ब्या को रोकना ही होगा…”

“तू भी ना क्या भ्यास (मूर्खों) जैसे बात करती है…सारे बिरादरी में सबको मालूम है परु के ब्या के बारे में ..यदि अब हम मना करेंगे तो  बिरादरी में नाक कट जायेगी.. सब लोग थू थू करेंगे..परु का जीना भी मुश्किल कर देंगे… ”

“तो के करी जौ (तो क्या किया जाय ) …”

“करना क्या है … जैसे गोल्ज्यू की दया से ब्या ठीक हुआ है …ब्या कर देते हैं…उसकी किस्मत में होगा तो बन जायेगी डॉक्टर… ”

” लेकिन किसी वजह से पांडे ज्यू राठ ही ब्या के लिये मना कर दें तो बात आयी गयी हो जायेगी. ”

” लेकिन वह मना क्यों करने वाले हुए अब तो चिन्ह भी साम्य हो गया ठहरा…बस लगन निकलना बांकी है ..वह भी कुछ दिनों में निकल जायेगा”

” के तो करौ हो (कुछ तो करो जी) “

” तू पड़ जा …मैं कुछ सोचुं.. ( तू सो जा मैं सोचता हूँ )

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..

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पिछ्ले अंक में नवीन पाठक जी ने कहा कि ” काकेश दा इसको लम्बा खीच रहे है…काकेश दा…… एक दिन पुरा बुद्दवार बैठ के कहानी को अन्जाम दे दो…” तो उनसे मैने कहा था कि इस इतवार इसको पूरा लिखने की कोशिश करुंगा लेकिन इतवार को समय ही नहीं मिल पाया. इसलिये आज सुबह चार बजे उठकर लिखने बैठा. काफी हद तक कहानी लाइन पर आ रही है. सोचता हूँ कि अगले अंक में इसे खतम कर ही  दूँ. जो भी होगा परुली का देखा जायेगा. हाँलाकि पाठकों का दबाब है कि परुली डाक्टर बन जाये लेकिन जैसा पिछ्ले अंक में मनीष सिंह बिष्ट ने कहा कि वह देखना चाहते हैं कि कैसे एक पहाड़ी लड़की संघर्ष करते हुए आगे बढ़ती है. तो सच कहूँ तो मुझे इस बात की बहुत कम संभावना लगती है कि परुली डॉक्टर बन पायेगी. लेकिन कहानी में एक लेखक के पास यह शक्ति होती है कि वह परिस्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन कर पाये. तो देखें अगले बुधवार क्या होता है.

कल कुमांऊनी होली का अगला अंक प्रस्तुत किया जायेगा कृपया जरूर पधारें.

 

परुली मन में सोच चुकी थी कि अब उसे हिम्मत से काम लेना है.मन ही मन उसने कुछ सोचा और अपने अन्दर बैठे हुए डर से लड़ने की कोशिश करने लगी.आज पहली बार उसे गोल्ज्यू का ध्यान आया. उसने सुना था गोल्ज्यू से कुछ भी मांगो वह मिल जाता है. उसने सवा रुपये का उचैण (करार) अलग रखा और मन ही मन गोल्ज्यू से कहा कि गोल्ज्यू मुझे डॉक्टर बना देना.आपके थान आके एक घंटी जरूर चढ़ाउंगी. स्कूल जाते समय भी वह चुप ही थी. उसकी सहेलियां उसे छेड़ रहीं थी.

“क्यों परु भिंन्ज्यू के साथ दिल्ली कब जा रही है रे…” …परुली चुप

“अरे ये तो इंतजार ही कर रही है कब इसका ब्या हो और यह यहाँ से भागे.”

“परु तेरी किस्मत बहुत अच्छी है रे. बहुत पुन्न किये होंगे तूने.कौन कौन से बर्त (व्रत) रखे रे तू ने हमको भी बता ना”

“दिल्ली जा के हमें भूल मत जान रे…” उसकी सहेलिया उसे अंगाव लगाती और हँसती लेकिन परुली चुपचाप अपनी सोच में चली जा रही थी.

स्कूल में भी हाफ-टाइम (इंटरवल) में परुली सीधे अपनी मैम के पास पहुंची.उसने विस्तार से अपनी मैम से पूछा कि डॉक्टर बनने के लिये क्या क्या करना पड़ता है. यह पढ़ाई कहाँ कहाँ से होती है और इसमें लगभग कितना खर्चा आता है. मैम ने भी उसे पूरी बात बतायी.

शाम को बाबू घर आये तो उनको चाय बनाके देते हुए वह बोली.

“बाबू आज मैने अपनी एक मैडम से बात की थी.”

“क्या बात की थी परु…”..बड़े प्यार से जोस्ज्यू ने पूछा. जब से उसका ब्या ठीक हुआ है तब से वह उससे ऐसे ही प्यार से बात करने लगे थे.

“यही कि डॉक्टर बनने के लिये क्या क्या करना पड़ता है.”

“डॉक्टर….?? “. जोसज्यू भी मुस्कुराये बिना न रह सके. “कौन डॉक्टर बन रहा है …तू… तू डॉक्टर बनेगी ?” उपहासात्मक लहजे में जोस्ज्यू ने कहा….

“हाँ बाबू ” उसकी आवाज में दृढ़ता थी.

“तो बन जाना बेटा पहले तेरा ब्या हो जाये फिर जो चाहे बन जाना.” जोस्ज्यू ने बबाल टालने के लहजे में कहा.

“नहीं बाबू मैं यह ब्या नहीं करुंगी …” उसी दृढ़ता से परुली ने जबाब दिया.

अब जोस्ज्यू चौंके….”क्या कहा ब्या नहीं करेगी… क्यों नहीं करेगी…”. अपने हाथ की चाय को जमीन में रखते हुए वह बोले.

“मुझे डॉक्टर बनना है बाबू…”

“अरे डॉक़्टर बनना इतना आसान नहीं है बेटा…”

“मुझे मालूम है बाबू उसके लिये पी.एम.टी का इमत्यान देना पड़ता है. मैं वह इम्त्यान पास कर लुंगी बाबू…”

“लेकिन डॉक्टरी में तो ढेर सारे डबल भी लगेंगे ना.”

“मेरी मैम कह रही थी कि मेरे बोर्ड में अच्छे नम्बर आये तो मुझे वजीफ़ा (स्कॉलरशिप) मिल जायेगा. फिर किसी बैंक से बात करने से वहाँ से भी कुछ डबल मिल सकते है. जब मेरी नौकरी लग जायेगी तो बैक का पैसा तार (चुका) देंगे.”

जोस्ज्यू के पास उसकी बातों का कोई जबाब ना था उनको गुस्सा आ गया उनकी समझ में आ गया था कि यह सारा किया धराया उसकी किसी टीचर का ही है.

“तो तू स्कूल में जाके पढ़ने की बजाय यही सब करती है. यही सिखाते हैं तुझे स्कूल में.रुक मैं तेरी टीचर से बात करुंगा. कौन टीचर है उसका नाम बताना तो. “     

परुली तो बाबू के गुस्से को देख के डर गयी.

नहीं बाबू…मैं तो….

” ज्यादा करेगी तो तेरा स्कूल जाना बंद करा दुंगा.वैसे भी अब तेरा ब्या ठीक हो गया है अब तुझे पढ़ने की क्या जरूरत है.  “

“नहीं बाबू ….लेकिन …”

“आने दे तेरी ईजा को आज…उसने ही तुझे कपाव (सर) पर चढ़ा रखा है ”

जोस्ज्यू गुस्से में उठकर चले गयी. परुली बाबू के गुस्से को देख के डर तो गयी लेकिन इस बात से उसकी हिम्मत और बढ़ गयी. उसने सोच लिया कि अब जो भी हो वह साफ साफ कह देगी उसे यह ब्या नहीं करना फिर बदनामी हो तो हो….

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ?

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पिछले भाग को पढ़कर मेरे को एक पाठक ने मेल किया कि मैं उन्हे परुली की पूरी कहानी मेल पर भेज दूँ क्योंकि उनको इतना इंतजार करना अच्छा नहीं लगता.मैं उनकी भावना की कद्र करता हूँ.उनको तो मैने उत्तर दे दिया लेकिन बाँकी पाठको की जानकारी के लिये बता दूँ मैने परुली की कहानी अभी लिखी नहीं है. मैं इसके प्रत्येक भाग को बुधवार की सुबह ही लिखता हूँ. उस समय जैसे भाव मन में आते हैं वैसा ही लिख देता हूँ. कभी कभी सोचता हूँ कि यदि पूरी तरह सोच समझ के इस कहानी को लिखता तो शायद और अच्छा लिख पाता लेकिन फिर यह भी लगता है कि ऐसे लिख भी पाता कि नहीं. तो परुली का क्या होगा यह मेरे को भी नहीं मालूम. कभी कभी लगता है उस परिस्थिति में वह डॉक्टर नहीं बन पायेगी तो शायद वह भी गाढ़ में कूद मार दे या फिर ब्या कर के गोपाल के साथ ही चले जाये…लेकिन फिर लगता है उसने गोल्ज्यू से मन्नत मांगी है तो वह डॉक्टर बन ही जायेगी. …लेकिन क्या होगा यह तो अभी मेरे को भी नहीं मालूम …मेरी तरह आप भी इंतजार कीजिये.

 

आज परुली ने सोच के रखा था कि आज ईजा से वह बात करके रहेगी. उसने जल्दी जल्दी घर के काम करने शुरु किये. लाई की सब्जी काट के छौंक  दी,आटा ओल दिया, नौले से पानी लेकर आयी, गोरु-बल्दों को घास डाल दी,बड़बाज्यू का हुक्का सुलगा दिया. ईजा खेतों से आयी तो परुली घर के आधे काम कर चुकी थी. ईजा को गुड़ की डली के साथ चाय देकर वह पास ही बैठ गयी.

हिम्मत ही नहीं कर पा रही थी परुली कि कैसे अपनी बात शुरु करे.उसे लग रहा था कि ईजा उसकी बात सुनकर क्या सोचेगी. लेकिन परुली ने हिम्मत जुटायी और नजरें नीची करके बोली.

“ईजा…., मेरा ब्या ठीक हो गया ना.”

“हाँ चेली. गोल्ज्यू की आशीरवाद से हो गया चेली. नहीं तो इतना अच्छा संबंध कैसा मिलता. तेरी किसमत अच्छी ठहरी.तू बहुत भागवान हुई..”

“लेकिन ईजा मुझे तो अभी और पढना है.”

“अरे पढ़ना लिखना तो जिनगी भर लगा ही रहने वाला ठहरा.एक बार शादी हो जाय फिर जैसा पांडेज्यू राठ बोलें वैसा करना.मन हो तो पढ़ लेना लेकिन लड़कियों को पढ़ लिख के क्या करना हुआ… ”

“ईजा…. , मेरी मैडम कह रही थी कि मैं डाक्टरी का इन्तेहान दूँ.”

ईजा को परुली के बचपने पर हँसी आ गयी. “चेली डाक्टर बनना हम लोगों के भाग में जो क्या ठहरा. बहुत मुश्किल होने वाला ठहरा बल. और फिर डाक्टरी की पढ़ाई यहाँ जो क्या होने वाली हुई …बाहर होने वाली ठहरी.हमारे गाँव से तो कोई डाक्टर ठहरा भी नहीं.पारगाँव के मुरुलीदत्त जी का लड़का हुआ. कहाँ से तो किया ठहरा वह डाक्टरी की पढ़ाई. नखलऊ …ना …लखनऊ …क्या तो कहने वाले हुए हो मुझे तो बोलना भी नहीं आने वाले हुआ.” ईजा अपनी ही बात पर हँस दी.परुली के अन्दर कोई शीशा सा दरक गया. एक रुलाई फूट पड़ी.वो खुद को संयत करते हुए बोली.

“लेकिन ईजा…. बहुत सी लड़कियां तो करने वाली हुई डाक्टरी की पढ़ाई.मुझे भी भेज देना शहर.मैं कर लुंगी ईजा..”.. परुली ने बोल तो दिया लेकिन अन्दर ही अन्दर वह खुद भी डर रही थी कि कैसे वह अकेले रह पायेगी.  

“अब ज्वान जवान लड़की को कैसे भेज देंगे हो बाहर.कोई जान न पहचान. तेरे को सार भी तो नहीं ठहरी.हम लोग तो भुस्स (गँवार) हुए बेटा. इतना बड़ा शहर हमारे लिये तो क्याप्प हुआ. ना हो ना. तू भी कहाँ के चक्कर में पड़ गयी. अभी तू बोर्ड के इंत्यान दे.ब्या कर ले फिर जैसी गोल्ज्यू की इच्छा होगी.” ईजा की चाय खतम हो गयी थी. वो उठते हुए बोली. “परु ये गिलास भान माँज दे और दूध की बाल्टी ला मैं दूध लगा लेती हूँ.अभी कितने सारे काम पड़े हैं. “

परुली की बात फिर अधूरी रह गयी.उसने ईजा के बताये काम किये और सोच में पड़ गयी.दूर पहाड़ों को देखते देखते ही तो उसने कल्पना की थी कि इन्ही पहाड़ों के उस पार होगा कोई एक शहर. जहाँ यह लाइट टिम टिम करती हैं. उसके घर में तो लम्फू (मिट्टी तेल का लैम्प) का उजाला होता है या छिलुके का. वह सोचती थी कि कभी वह उस पार जायेगी. एक बड़े शहर में कदम रखेगी.बिजली के लैप देखेगी. न जाने कितनी कल्पनाऎं.

वह चाहती तो थी डाक्टर बनना लेकिन उसे इसके बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी. उस दिन चमुली ने कहा था कि ढेर सारे डबल लगते हैं और आज ईजा कहती है कि बाहर जाना पड़ता है बल. इतना तो उसे विश्वास हो गया कि इस घर से अकेले तो उसे कोई भी बाहर नहीं भेजने वाला.और फिर गांव वाले भी तो क्या क्या बातें बनाऐंगे. तलखाऊ की बिट्टू बुआ जो आंगनबाड़ी में काम करती हैं उनके बारे में ही जाने क्या क्या बोलते हैं. और फिर पैसे का सवाल तो है ही…. सचमुच ..कहाँ से लायेंगे उसके बाबू इत्ता पैसा. तो क्या करे परुली. क्या शादी कर ले. वो सोचने लगी…वैसे यदि मैं शादी कर लूँ और इनके साथ दिल्ली चले जाऊँ तो शायद वहाँ से डाक्टरी हो सकती है. लेकिन उसने देखा है शादी के बाद जो ब्योली आती हैं उन्हें घर के कित्ते तो काम करने पड़ते हैं. और जब उसके ईजा बाबू उसे बाहर नहीं भेज रहे तो सास ससुर तो बिल्कुल ही नहीं भेजेंगे.तो क्या करे? शादी करके जुत जाये घर के जुए में कोल्हू के बैल की तरह. या फिर बगल की माया दीदी की तरह गाढ़ में कूद मार दे…. हाँ वह भी कूद मार देगी.खतम कर देगी खुद को. सारा बबाल खतम…

लेकिन फिर उसके अन्दर से जैसे किसी ने पुकारा ..नहीं परु तू इतनी कमजोर नहीं हो सकती.उसकी मैम भी तो उस दिन उसे समझा रही थी. कि इंसान को हर परिस्थिति का हिम्मत से सामना करना चाहिये… और फिर परुली ने सोच लिया कि वह अब हिम्मत के साथ इस परिस्थिति का सामना करेगी.

जारी…..[ अगले अंक में देखिये परुली का बदला हुआ रूप]

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी

 

परुली की शादी के बारे में कोई धारणा नहीं थी. वह तो यह भी नहीं जानती थी कि शादी का मतलब क्या होता है. उसके लिये तो शादी का मतलब सिर्फ इतना था कि शादी के बाद लड़की को घर छोड़ के जाना होता है,पढ़ाई बन्द हो जाती है,साड़ी पहननी पड़ती है और दूसरे घर में जाके घूंघट के अन्दर ही रहना पड़ता है.एक डेढ़ साल बाद एक बच्चा भी हो जाता है. यह कैसे होता है इसके बारे में भी उसे कोई विशेष जानकारी नहीं थी. स्कूल में बड़ी लड़कियां शादी और बच्चे की बातें रस ले लेकर करती. मुँह नीचे कर हँसती पर परुली को कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता.  

उसके बाबू आज मलगाड़ गांव गये थे पांडे जी से बात पक्की करने. परुली के दिल में जाने कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे. वह मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि किसी तरह बात टल जाये और वह अभी शादी करने से बच जाये.लेकिन ऐसा कैसे होगा यह उसे मालूम नहीं था. स्कूल में भी आज वह खोयी खोयी से रही.शाम को बाबू आये तो बहुत खुश थे.चाख (पहला कमरा) में बैठ कर घर वालों को पूरी बात रहे थे.हर बात में पांडे ज्यू की तारीफ..

“पांडे ज्यू भल मैस (अच्छे आदमी) ठहरे. भौत बढिया घर हुआ हो वह. घर में गोरु,बल्द सब ही हुए. जमीन भी भौत ठहरी. कित्ते नाली तो बता रहे थे. पांडे ज्यू आदमी भी अच्छे हुए.गोपाल भी अच्छा ही हुआ. कोई ऐब नहीं ठहरा उसे. दिल्ली जैसी जगह में ठहरा फिर भी कितना सौम्य. शिबौ-शिब भौत काम करना पड़ने वाला हुआ बल उसे. पांडे ज्यू कह रहे थे कि परुली को थोड़ी ‘सार-पतार’ ( तमीज, मैनर्स) आ जाये तो इसे भी कुछ दिनों के लिये दिल्ली भेज देंगे.मैने कहा आप जैसा भी करेंगे आप की ही हुई अब परुली……

आगे नहीं सुन पायी परुली. मलखंड (ऊपर वाला कमरा) में जाके रजाईयों के बीच मुँह छिपा कर रोने लगी. उसका डाक्टर बनने का सपना आंसूओं के साथ बहने लगा. आज पहली बार उसे अपनी लड़की होने का अहसास हुआ. एक लड़की किस हद तक मजबूर हो सकती है इस बात से मन ही मन उसे खुद से घृणा होने लगी. सब कितने खुश थे. वो उनकी खुशी नहीं छीनना चाहती थी लेकिन जो हो रहा था उसके लिये वह खुद को तैयार भी नहीं कर पा रही थी. मन में आता कि वह कह दे कि नहीं करनी उसे शादी. लेकिन क्या कह पायेगी वह यह सब और फिर लोग क्या कहेंगे..”जोस्ज्यू की लड़की ने शादी के लिये मना कर दिया” …कितनी तो बातें बनेंगी.. उसकी खुद की सहेलियाँ उससे बातें नहीं करेंगी…आंसूओं का सैलाब लगता था कि उसे बहा ले जायेगा… 

उधर घर में खुशी का माहौल था. परुली की ईजा भी बहुत खुश थी. बगल की काखी (चाची), कैंजा (मौसी), जेठज्या (ताई) और अन्य औरतें भी घर में बधाईयां देने आयीं

“भल भौ हो (अच्छा हुआ).. बड़ा अच्छा संबंध मिला बल.. ” .

हाँ हो सब गोल्ज्यू की किरपा हुई हो..” ..

“तो कब कर रहे हो ब्या ….मंगसीर (नवंबर-दिसंबर) में करोगे कि जेठ (मई-जून) में   

“इस साल तो परुली का बोर्ड हुआ .. इम्तयान (परीक्षा) हो जाये तो जेठ में ही करेंगे. पिठ्या (टीका,सगाई) कोई भल दिन देख के लगा देंगे”

यह बात परुली ने भी सुनी.रो रो कर उसकी आंखे लाल हो गयी थी पर उसे सुखद आश्चर्य हुआ कि शादी के लिये भी उसके बोर्ड की परीक्षाओं को को ध्यान में रखा जा रहा है. वह सोचने लगी कि यदि वह ईजा से डाक्टर बनने वाली बात करे तो शायद ईजा की समझ में बात आ जाये और अभी शादी ना करने के लिये मान जाये…लेकिन उसके बाबू और घर के अन्य लोग ईजा की बात मानेंगे यह अपने आप में एक बड़ा प्रश्न था. फिर भी उसे लगा कि उसे कम-से-कम अपनी ईजा से तो बात करनी ही चाहिये… उसे आशा की एक धुधली किरण दिखायी देने लगी…लेकिन फिर उसे चमुली की बात याद आयी…. “डॉक्टर बनना इतना आसान नही है परुली. ढेर सारे डबल (पैसे) लगते है बल. इत्ते सारे डबल तेरे बौज्यू कहाँ से लायेंगे.तेरे को तो हाईस्कूल ही करा रहे हैं वही बहुत है.”.यदि ईजा सब लोगों को मना भी ले तो उसे पढ़ायेंगे कैसे.

यह सब सोचते सोचते परुली के सर में दर्द होने लगा और वह ईजा का इंतजार करते करते सो गयी… 

जारी…..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ??

 

परुली सो तो गयी. दिन भर की थकी थी नींद भी आ गयी. लेकिन ना जाने कितने देर तक सपनों से लड़ती रही. कभी लगता कि वह एक भ्योल (ऊंची पहाड़ी) से नीचे गिरती जा रही है.चारों और कंटीली झाडियां हैं जिनको वह पकड़ने की कोशिश कर रही है पर वह हाथ नहीं आ रहीं.कभी लगता कि वह नौले से पानी ला रही है और उसकी तांबे की गगरी उसके सर से छिटक कर गिर गयी है और वह उसे पकड़ने दौड़ रही है या उसकी ईजा गाय को बांधने गोठ गयी तो गाय ने उसे ही सींग से मार दिया वह गिरी तो गाय उसे अपने पैरों के तले रौदते हुए चली गयी. रात भर इस तरह के सपनों से लड़ती रही. एक दो बार आंख भी खुली तो घुप्प अंधेरा था कुछ दिखायी नहीं दिया. सिर्फ बीतती हुई रात थी.सुबह अभी भी कहीं दूर थी.

रात की बात आयी गयी हो गयी. सुबह से परुली फिर अपने काम में जुट गयी.रोज की तरह छिलुके से चूल्हा जलाया. ईजा के साथ घर का काम किया.स्कूल की ड्रेस के कपड़े बिस्तर के नीचे से निकाल कर पहने और बाकी लड़कियों के साथ स्कूल के लिये चल दी.रास्ते में उसने लड़कियों को कल रात की ईजा-बाबू की बातचीत के बारे में बताया. तो चमुली बोली

“यह तो बहुत बढिया हुआ. तेरा चिंन्ह साम्य हो जायेगा तो तू तो ब्योली (दुल्हन) बन के चले जायेगी. तेरा तो नाक नक्स इतना अच्छा है तभी तो तेरा चिन्ह मांगा है.हम लोगों का तो कोई भी नहीं मांगता. हम भी ब्योली बने तो इस पढ़ाई से तो छुटकारा मिले”.

बाकी लड़कियां उसके साथ हँसी ठिठोली करने लगीं. लेकिन परुली को यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था.

“लेकिन मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ.” परुली की आवाज में एक दृढ़ता थी.

अरे पढ़ लिख के क्या बैरिस्टर बनेगी. ब्या तो तब भी होगा ना और फिर तो वही भनपान, गोरु-बाछों का मोव निकलना, गुपटाले पाथना, पानी सारना और घरपन के सारे काम, इन सब में तेरी पढ़ाई क्या काम आयेगी रे परुली..और अच्छे रिश्तो के लिये मना नहीं करना चाहिये. वो पारघर की बिन्दी बुआ को नहीं देखा. पढ़ाई के चक्कर में उनके बौज्यू (पिताजी) ने पहले उनका ब्या नहीं किया. अब कब के एम.ए. तो कर लिया लेकिन अब घर में बैठी हैं. कहीं बात ही नहीं बन रही. अब इस उमर में कहाँ होता है ब्या उनका.

उसने भी बिन्दी बुआ के बारे में अपनी ईजा से सुना था कि वह पहले सारे रिश्तों के लिये मना कर देती थी. लेकिन अब तो किसी उमरदार या दूसरे ब्या वाले से भी शादी करने को भी तैयार है लेकिन कोई मिलता ही नहीं. फिर भी परुली को लगा कि वह यदि डॉक्टर बन गयी तो शायद फिर तो रिश्तों की कमी नहीं होगी. यह सोच कर वह बोली.

“लेकिन मैं डॉक्टर बन गयी तो !”

सुनके सभी लड़कियां जैसे एक साथ हँसी. “डॉक्टर बनना इतना आसान नही है परुली. ढेर सारे डबल (पैसे) लगते है बल. इत्ते सारे डबल तेरे बौज्यू कहाँ से लायेंगे.तेरे को तो हाईस्कूल ही करा रहे हैं वही बहुत है.”

यह तो परुली भी जानती थी कि बाबू की जजमानी से घर का खर्च भी मुश्किल से निकल पाता था. आये दिन पैसों को लेकर घर में खिच खिच होती थी.

परुली सोच में पड़ गयी. आज उसका स्कूल की पढ़ाई में भी मन नहीं लगा. उसके डॉक्टर बनने के सपने जैसे हवा में उड़ गये थे.वो तो सोच रही थी कि वह सवा रुपये का उचैण (मन्नत) गोल ज्यू के नाम का रखेगी कि उसका चिन्ह साम्य ना हो और वो ब्या करने से बच जाये.लेकिन अब तो उसको लगने लगा कि यदि उसका ब्या नहीं हुआ तो उसके बोज्यू पर वह एक भार की तरह पड़ी रहेगी. वह अपने बौज्यू पर भार भी नहीं बनना चाहती थी. उसकी ईजा भी कहती थी कि “परुली तेरा ब्या हो जाये तो एक बहुत बड़ा भार सर से निकल जायेगा.” तो क्या वह घर वालों पर एक भार थी? ऎसी ही बातें उसने अपने पड़ोस की माया दीदी से भी बहुत पहले सुनी थी.तब उसे इन सब बातों का मतलब समझ नहीं आया था.कुछ महीने पहले माया दीदी ने जब एक गाड़ में छ्लांग लगा कर अपनी जान दे दी तो उसे बहुत बुरा लगा था और गुस्सा भी आया था. लेकिन अब उसे लग रहा था शायद माया दीदी भी ऎसी ही किसी परिस्थिति से गुजरी होगी.तो क्या उसे भी ……

“प्रिया! आज तुम्हारा ध्यान किधर है !!” मैडम की आवाज आयी.

“मै…म …”

“पढ़ाई में ध्यान लगाओ..”

परुली ने फिर पढ़ाई में ध्यान लगा लिया.दिन बीतते गये. बोर्ड की परीक्षाऎं करीब आ रही थीं. परुली सब कुछ भूल कर बोर्ड की तैयारियों में जुट गयी.एक दिन उसके बाबू आये. आज वह बड़े खुश थे. थोड़ा सा गुड़ और बताशे लाये थे.आमतौर यह वह तब लाते जब कोई खुशी का मौका होता. ईजा तो तब घर पर थी नहीं उन्होने परुली से कहा “परु बेटा जरा चहा तो बना दे”. उनके बातों से अतिरिक्त प्यार झलक रहा था.वह बड़बाज्यू से बात करने लगे, जो पटांगण में बैठ कर अपना हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे.

“बाबू आज पांडे ज्यू मिले थे. कह रहे थे कि गोपाल और परुली का चिन्ह साम्य हो गया.इस मंगशीर में जल्दी से कोई लगन निकाल कर ब्या कर लेंगें”

यह बात चाय बनाती परुली ने भी सुनी. वह पानी में चाय की पत्ती डाल चुकी थी और अब वह पत्ती साफ पानी में अपना मटमैला रंग छोड़ रही थी.

जारी….

पिछला भाग : परुली….

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