इस ब्लॉग पर कुछ भी लिखे हुए एक साल से ऊपर हो गया है। इस बीच ना जाने कितने नये ब्लॉग आ गये होंगे.. कितने इस ब्लॉगजगत से उकता कर जा चुके हौंगे..लेकिन मैं ना तो उकताया हूँ ना ही ब्लॉग से बोर हुआ हूँ। हाँ… कुछ दिनों के लिये अपने दूसरी जिम्मेवारियों को निभाने में लगा हुआ हूँ। मुझे खुशी है कि इस बीच कई मित्रों ने फोन पर मुझे फिर से ब्लॉग पर लिखने के लिये कहा। कई लोगों ने मेल पर या टिप्पणीयों के माध्यम से यही निवेदन किया। अब चुंकि मंदी की मार भी कम हो रही है और गर्मी की भी- हाँ ब्लॉग-जगत की गर्मी का मुझे कोई अन्दाजा नहीं है- तो मैने सोचा है कि सप्ताह में कम से कम एक बार तो इस ब्लॉग पर दर्शन दे ही दूँ।

इस बीच कुछ ब्लॉगों को अनियमित पढ़ता रहा लेकिन ब्लॉग पर ना लिखने से हिन्दी की किताबें पढ़ने और खरीदने में कमी आयी। पिछ्ली बार जो किताबें खरीदी थी अभी उनमें से कई पढ़नी बाँकी है। सोचता हूँ कि एक बार ब्लॉग पर लिखना प्रारम्भ कर दुंगा तो फिर से यह सिलसिला भी शुरु हो जायेगा।

एक साल ना लिखने के बाबजूद मेरे ब्लॉग पर लोगों की आवजाही चलती रही। आँकड़े बताते है कि दो प्रमुख श्रेणियां जो सबसे ज्यादा पढी गयी वह थी व्यंग्यउत्तराखंड..तो अब अधिकतर इन्ही पर लिखुंगा…लेकिन लिखना क्या पहले से निर्धारित किया जा सकता है..देखिये की-बोर्ड क्या लिखवा दे। 

चलिये अभी इतना ही..जल्दी ही कुछ लिखता हूँ..

 

शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर

उसी समय एक सलोतरी को बुलाकर घोड़े को दिखाया। उसने बायीं नली हाथ से सूंती तो घोड़ा चमका। पता चला कि पुराना लंग है। सारा घपला अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा। संभवतः, नहीं निःसंदेह, घोड़ा इसी कारण रेस में डिसक्वालिफ़ाई हुआ होगा। ऐसे घोड़े को तो उसी समय गोली मार दी जाती है और यह उसके लिये तांगे में जुतकर जलील होने से कई गुना बेहतर सूरत होती है, लेकिन सलोतरी ने उम्मीद दिलाई कि छः महीने तक मुर्ग़ाबी के तेल की मालिश करायें। मालिश का मेहनताना पांच रुपये रोज! यानी डेढ़ सौ रुपया माहवार। छह महीने के नौ सौ रुपये हुए। नौ सौ का घोड़ा, नौ सौ की मालिश अर्थात टाट की गुदड़ी में मखमल का पैवंद! अभी कुछ दिन हुए अपने अब्बा की मालिश और पैर दबाने के लिये एक आदमी को अस्सी रुपये माहवार पर रखा था। इसका मतलब तो यह हुआ कि उनकी कमाई का आधा हिस्सा तो इन्कम टैक्स वाले रखवा लेंगे और एक-तिहाई चम्पी मालिश वाले खा जायेंगे। हलाल की कमाई के बारे में उन्होंने कभी नहीं सुना था कि वो इस अनुपात से ग़ैर हक़दारों में बंटती है। चार बजे तांगा जुतवा कर वो सेठ से निपटने के लिये रवाना हो गये। तांगे में बैठने से पहले उन्होंने गहरे रंग का धूप का चश्मा लगा लिया, ताकि कड़ी, खरी, खोटी सुनाने में झिझकें नहीं और चेहरे पर एक रहस्यमय ख़ूंख़ारी का भाव आ जाये। आधा रास्ता ही तय किया होगा कि एक व्यक्ति ने बम पकड़ कर तांगा रोक लिया। कहने लगा, आपका घोड़ा बुरी तरह लंगड़ा रहा है, चालान होगा। बिशारत भौंचक्के रह गये। पता चला ‘‘अत्याचार’’ वाले आजकल बहुत सख़्ती कर रहे हैं। हर मोड़ पर बात-बेबात चालान हो रहा है। वो किसी प्रकार न माना तो बिशारत ने क़ानूनी पेंच निकाला कि आज सुब्ह ही इसका चालान हो चुका है। सात घंटे में एक ही अपराध में दो चालान नहीं हो सकते। इंस्पेक्टर ने यह बात भी चार्जशीट में टांक ली और कहा कि इससे तो अपराध और संगीन हो गया। बचने का कोई रास्ता न सूझा तो बिशारत ने कहा, ‘‘अच्छा बाबा! तुम्हीं सच्चे सही, दस रुपये पे मामला रफ़ा-दफ़ा करो। ब्रांड न्यू घोड़ा है, खरीदे हुए तीसरा दिन है। ‘‘यह सुनते ही वो व्यक्ति आग बबूला हो गया।’’ कहने लगा ‘‘बड़े साब! गागल्ज के बावजूद आप भले आदमी मालूम होते हैं, मगर आपको पता होना चाहिये कि आप पैसे से लंगड़ा घोड़ा खरीद सकते हैं’’, आदमी नहीं ख़रीद सकते। चालान हो गया।

स्टील री-रोलिंग मिल पहुंचे तो सेठ घर जाने की तैयारी कर रहा था। आज इसके यहां एक पीर की याद में डेढ़-दो सौ फ़क़ीरों को पुलाव खिलाया जा रहा था। उसका मानना था कि इससे महीने-भर की कमाई पाक हो जाती है और यह संनदकमतपदह कोई अनोखी बात नहीं थी। एक बैंक में पंद्रह बीस वर्ष तक यह नियम रहा कि प्रत्येक ब्रांच में जितने नये खाते खुलते, शाम को उतने ही फ़क़ीर खिलाये जाते। यह पता नहीं चल पाया कि यह खाना, खाते खुलने की ख़ुशी में खिलाया जाता था या ब्याज के व्यापार में बढ़ोतरी के प्रायश्चित में। हमारा एक बार मुल्तान जाना हुआ। वहां उस दिन बैंक के मालिकों में से एक बहुत सीनियर सेठ इंस्पेक्शन पर आये हुए थे। शाम को ब्रांच में बराबरी का यह दृश्य देखकर हमारी ख़ुशी की सीमा न रही कि सेठ साहब पंद्रह-बीस फ़क़ीरों के साथ जमीन पर पंजों के बल बैठे पुलाव खा रहे हैं और हर फ़क़ीर और उसके बीबी-बच्चों का अकुशल-अमंगल पूछ रहे हैं। परन्तु मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग को ग़ुब्बारे पंक्चर करने की बड़ी बुरी आदत है। उन्होंने यह कहकर हमारी सारी ख़ुशी किरकिरी कर दी कि जब शेर और बकरी एक ही घाट पानी पीने लगें तो समझ लो कि शेर की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर है। महमूद व अयाज का एक ही पंक्ति में बैठकर खाना भी ‘‘ऑडिट एंड इंस्पेक्शन’’ का हिस्सा है। सेठ साहब वास्तव में यह पता लगाना चाहते हैं कि खाने वाले अस्ली फ़क़ीर हैं या मैनेजर ने अपने यारों-रिश्तेदारों की पंगत बिठा दी है।

हम कहां से कहां आ गये। बात स्टील मिल वाले सेठ की थी, जो सात-आठ वर्ष से काले धन को प्रत्येक महीने नियाज के लोबान की धूनी से पाक और ‘व्हाइट’ करता रहता था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम

पहला और दूसरा भाग

 

अलाहदीन अष्टम

उनके रोग न केवल बहुत से थे, बल्कि बहुत बढ़े हुए भी थे। इनमें सबसे खतरनाक रोग बुढ़ापा था। उनका एक दामाद विलायत से सर्जरी में नया-नया एफ़आर. सी.एस. करके आया था। उसने अपनी ससुराल में किसी का एपेंडिक्स बाक़ी नहीं छोड़ा। किसी की आंख में भी तकलीफ़ होती तो उसका एपेंडिक्स निकाल देता था। आश्चर्य इस पर होता कि आंख की तकलीफ़ जाती रहती। हालांकि वो सारीउम्र पेट के दर्द से परेशान रहे लेकिन अपने पेट पर हाथ रखकर सौगंध उठा कर कहते थे कि मैंने आज तक किसी डॉक्टर को अपने एपेंडिक्स पर हाथ नहीं डालने दिया। लंबे समय से बिस्तर पर पड़े थे लेकिन उनकी लाचारी अभी अपूर्ण थी। मतलब यह कि सहारे से चल-फिर सकते थे।

उन्होंने उद्घाटन इस प्रकार किया कि अपने कमरे के दरवाजे, जिससे निकले उन्हें कई महीने हो गये थे, एक लाल-रिबन बांध कर अपने डांवाडोल हाथ से कैंची से काटा। ताली बजाने वाले बच्चों में लड्डू बांटने के बाद शुक्राने (धन्यवाद) की नमाज अदा की। फिर घोड़े को अपने हाथ से गेंदे का हार पहनाया, उसके माथे पर एक बड़ी-सी भौंरी थी। केसर में उंगली डुबोकर उस पर ‘अल्लाह’ लिखा और कुछ पढ़कर फूंक मारी। चारों सुमों और दोनों पहियों पर शगुन के लिये सिंदूर लगाकर दुआ दी कि जीते रहो, सदा सरपट चलते रहो। रहीमबख़्श कोचवान का मुंह खुलवा कर उसमें पूरा लड्डू फ़िट किया। ख़ुद चांदी के वरक़ में लिपटा हुआ पान कल्ले में दबाया। पुरानी कश्मीरी शाल ओढ़-लपेट कर तांगे की पिछली सीट पर बैठे और अगली सीट पर अपना बीस साल पुराना हार्मोनियम रखवा कर उसकी मरम्मत कराने मास्टर बाक़र अली की दुकान रवाना हो गये।

घोड़े का नाम बदल कर उन्होंने बलबन रखा। कोचवान से कहा, हमें तुम्हारा नाम रहीमबख़्श बिल्कुल पसंद नहीं। तुम्हें अलादीन कह कर पुकारेंगे। जब से उनकी याददाश्त ख़राब हुई थी वो हर नौकर को अलादीन कह कर बुलाते थे। यह अलादीन-अष्टम था। इससे पहले वाला अलादीन सप्तम कई बच्चों का बाप था। हुक़्के के तम्बाक़ू और रोटियों की चोरी में निकाला गया। गरम रोटियां पेट पर बांध कर ले जा रहा था, चाल से पकड़ा गया। मान्यवर इस अलादीन अर्थात रहीमबख़्श को आमतौर से अलादीन ही कहते थे। हां, यदि कोई ख़ास काम जैसे पैर दबवाने हों या बेवक़्त चिलम भरवानी हो या महज प्यार जताना हो तो अलादीन मियां कहकर बुलाते। परन्तु गाली देना हो तो अस्ल नाम लेकर गाली देते थे।

हाफ़ मास्ट चाबुक़

दूसरे दिन से तांगा सुब्ह बच्चों को स्कूल ले जाने लगा। उसके बाद बिशारत को दुकान छोड़ने जाता। तीन दिन यही नियम रहा। चौथे दिन कोचवान बच्चों को स्कूल छोड़कर वापस आया तो बहुत परेशान दिखायी पड़ा। घोड़ा फाटक से बांध कर सीधा बिशारत के पास आया। हाथ में चाबुक़ ऐसे उठा रखा था जैसे पुराने समय में ध्वजवाहक युद्धध्वज लेकर चलता था, बल्कि यूं कहना चाहिये, जिस प्रकार न्यूयार्क की स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी ने अपने हाथ को आखिरी सेंटीमीटर तक ऊंचा करवा कर आजादी की मशाल बुलंद कर रखी है। आगे चलकर मालूम हुआ कि कोई बिजोग पड़ जाये या अशुभ समाचार सुनाना हो तो वो इसी प्रकार चाबुक़ का झंडा ऊंचा किये आता था। चाबुक़ को सीधी हालत में देख बिशारत ऐसे व्याकुल होते, जैसे हेमलेट घोस्ट देखकर होता था।

Here it cometh , my lord

बिशारत के निकट आकर उसने चाबुक़ को हाफ़-मास्ट किया और पंद्रह रुपये मांगे। कहने लगा ‘स्कूल की गली के नुक़्क़ड़ पे अचानक चालान हो गया। घोड़े के बायें पैर में लंगड़ापन है! स्कूल से निकला ही था कि अत्याचार वालों ने धर लिया। बड़ी मिन्नतों से पंद्रह रुपये देकर घोड़ा छुड़ाया है वरना उसके साथ सरकार भी बेफ़िजूल खिंचे-खिंचे फिरते। मेरी आंखों के सामने ‘‘अत्याचार’’ वाले एक गधागाड़ी के मालिक को चाबुक़ से मारते हुए हंकाल के थाने ले गये। उसके गधे का लंग तो अपने घोड़े के मुक़ाबले कुछ भी नहीं ‘‘कोचवान ने गधे के लंग की बात इतने मामूली ढंग से कही और अपने घोड़े का लंग इतना बढ़ा-चढ़ा कर बयान किया कि बिशारत ने क्रोध से कांपते हाथ से पंद्रह रुपये देकर उसे चुप किया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये

पहला और दूसरा भाग

 

तिरे कूचे से हम निकले : हंगामे के बाद किसी को मेहमान शायरों का होश न था। जिसके, जहां सींग समाये वहीं चला गया और जो ख़ुद इस लायक़ न था उसे दूसरे अपने सींगों पर उठा ले गये। कुछ रात की हड़बोंग की शर्मिन्दगी, कुछ रुपया न होने के कारण अव्यवस्था, बिशारत इस लायक़ न रहे कि शायरों को मुंह दिखा सकें। मौली मज्जन के दिये दस रुपये कभी के चटनी हो चुके थे बल्कि वो अपनी जेब के बहत्तर रुपये ख़र्च कर चुके थे और अब इतनी क्षमता न थी कि शायरों को वापसी का टिकिट दिलवा सकें। मुंह पर अंगोछा डाल कर छुपते छुपाते धार्मिक-शिक्षा टीचर के ख़ाली घर में गये। वेलेजली उनके साथ लगा था। ताला तोड़ कर घर में घुसे और दिन भर मुंह छुपाये पड़े रहे। तीसरे पहर वेलेजली को जंजीर उतार कर बाहर कर दिया कि बेटा जा, आज ख़ुद ही घूम आ। बिफरे हुए कानपुर के शायरों का झुण्ड उनकी तलाश में घर-घर झांकता फिरा, आख़िर थक हार-कर पैदल स्टेशन के लिये रवाना हुआ। सौ-दौ सौ क़दम चले होंगे कि लोग साथ आते गये और बाक़ायदा जुलूस बन गया। क़स्बे के तमाम अधनंगे बच्चे, एक पूरा नंगा पागल, म्यूनिस्पिल बोर्ड की हद में काटने वाले तमाम कुत्ते उन्हें स्टेशन छोड़ने गये। जुलूस के आख़िर में एक साधू भभूत रमाये, भंग पिये और तीन कटखनी बत्तख़ें भी अकड़े हुई फ़ौजियों की Ceremonial चाल यानी अपनी ही चाल…Goose Step ……में चलती हुई साथ थीं। रास्ते में घरों में आटा गूंधती, सानी बनाती, रोते हुए बच्चे का मुंह दूध के ग्लैंड से बंद करती और लिपाई-पुताई करती औरतें अपना-अपना काम छोड़कर, सने हुए हाथों के तोते से बनाये जुलूस देखने खड़ी हो गईं। एक बंदर वाला भी अपने बंदर और बंदरिया की रस्सी पकड़े ये तमाशा देखने खड़ा हो गया। बंदर और लड़के बार-बार तरह-तरह के मुंह बनाकर एक दूसरे पर खोंखियाते हुए लपकते थे। ये कहना मुश्किल था कि कौन किसकी नक़ल उतार रहा है।

आते वक़्त जिन शायरों ने इस बात पर नाक-भौं चढ़ाई थी कि बैलगाड़ी में लाद कर लाया गया, अब इस बात से नाराज थे कि पैदल खदेड़े गये। चलती ट्रेन में चढ़ते वक़्त हैरत कानपुरी एक क़ुली से ये कह गये कि उस कमीन (बिशारत) से कह देना, जरा धीरजगंज से बाहर निकले, तुझसे कानपुर में निमट लेंगे। सब शायरों ने अपनी जेब से वापसी के टिकिट ख़रीदे, सिवाय उस शायर के जो अपने साथ पांच मिसरे उठाने वाला लाया था। ये साहब अपने मिसरा उठाने वालों समेत आधे रास्ते में ही बिना टिकिट सफ़र करने के जुर्म में उतार लिये गये। प्लेटफार्म पर कुछ दर्दमंद मुसलमानों ने चंदा करके टिकिटचेकर को रिश्वत दी तब कहीं जा के छुटे। टिकिटचेकर मुसलमान था वरना कोई और होता तो छहों के हथकड़ी डलवा देता।

बात एक रात की : सिर्फ़ बेइज्जत हुए शायर ही नहीं, कानपुर की सारी शायर बिरादरी बिशारत के ख़ून की प्यासी थी। उन शायरों ने बिशारत के ख़िलाफ़ इतना प्रोपेगंडा किया कि कुछ गद्य लेखक भी इनको कच्चा चबा जाने के लिये तैयार बैठे थे। कानपुर में हर जगह इस मुशायरे के चर्चे थे। धीरजगंज जाने वाले शायरों ने अपनी जिल्लत और परेशानी की दास्तानें बढ़ा-चढ़ाकर बयान कीं। वो अगर सच नहीं भी थीं तो सुनने वाले दिल से चाहते थे कि ख़ुदा करे सच हों कि वो इसी लायक़ थे।लोग कुरेद कुरेद के विस्तार से सुनते थे। एक शिकायत हो तो बयान करें अब खाने को ही लीजिये, हर शायर को शिकायत थी कि रात का खाना हमें दिन दहाड़े चार बजे उसी किसान के यहां खिलाया गया जिसके यहां सुलाया गया। ज़ाहिर है किसान ने अलग किस्म का खाना खिलाया, चुनांचे जितनी किस्म के खाने थे उतनी ही किस्म की पेट की बीमारियों में शायरों ने खुद को उलझा पाया।हैरत कानपुरी ने शिकायत की कि मैने नहाने के लिये गर्म पानी मांगा तो चौधराइन बे घूंघट उठा कर मुझे सबसे पास के कुंए का रास्ता बता दिया और ये भरोसा दिलाया कि उसमें से गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म पानी निकलता है।चौधरी ने तो नहाने का कारण भी जानना चाहा और जब मैने नहाये बगैर अचकन पहन ली और मुशायरे में जाने लगा तो चौधरी ने मेरी गोद मे दो महीने का नंग धड़ंग बेटा दे कर जबरदस्ती पुष्टि करनी चाही कि नवजात अपने बाप पर गया है। मेरा क्या जाता था मैने कह दिया हाँ और बड़े प्यार से बच्चे के सर पर हाथ फेरा जिससे बैचेन होके उसने मेरी अचकलन पे पेशाब कर दिया। उसी अचकन को पहने पहने मैने लोकल शायरों को गले लगाया।

फिर कहा कि बन्दा आबरू हथेली पर रखे एक बजे मुशायरे से लौटा। तीन बजे तक चारपायी के ऊपर खटमल और नीचे चूहे कुलेले करते रहे। तीन बजते ही घर में “सुबह हो – सुबह हो गयी “ का शोर मच गया। और ये शिकायत तो सबने की कि चार बजे हमें झिंझोड़-झिंझोड़ कर उठाया और एक एक लोटा हाथ में पकड़ा के झड़बेरी की झाड़ियों के पीछे भेज दिया।

कुछ ने शिकायत की हमें “ठोस” नाश्ता नहीं दिया गया। निहार मुँह फुट भर लम्बे गिलास में छाछ पिलाकर विदा कर दिया। एक साहब कहने लगे कि उनकी खाट के पाये से बंधी हुई एक बकरी सारी रात मींगनी करती रही। मुँह अन्धेरे उसका दूध दूह कर उन्हे पेश कर दिया गया। उनका ख़्याल था कि ये सुलुक तो कोई बकरी भी बर्दास्त नहीं कर सकती। ख़रोश शाहजहांपुरी ने कहा कि उनके सिरहाने रात के ढाई बजे से चक्की चलनी शुरु हो गयी। चक्की पीसने वाली दोनों लड़कियां हँस हँस कर जो गीत गा रही थी वो देवर-भावज और नंदोई-सलहज की छेड़छाड़ से संबंधित था, जिससे उनकी नींद और नीयत दोनों में खलल पड़ा। एज़ाज अमरोही ने कहा कि भांति भांति के परिन्दों ने सुबह चार बजे से ही शोर मचाना शुरु कर दिया। ऐसे में कोई भी शरीफ आदमी सो नहीं सकता। मजज़ूब मथरावी की शिकायत थी कि उन्हे कच्चे सहन में जामुन के पेड़ तले मच्छरों की छांव में सुलाया गया। पुरवा के हर चैन देने वाले झोंके कि साथ रात भर उनके सर जामुनें टपकती रहीं। सुबह उठकर उन्होने शिकायत की तो मकान मालिक के मैट्रिक फेल लौंडे ने कहा, ग़लत ! जामुनें नहीं , फलेंदे थे। मैने खुद लखनऊ वालों को फलेंदे कहते सुना है। मजज़ूब मथरावी के बयान के मुताबिक़ उनकी चारपायी के पास खूंटे से बंधी हुई भैस रात-भर डकराती रही। तडके उसने एक बच्चा दिया जो सीधा उनकी छाती पर आ गिरता , अगर वो कमाल की फुरती से बीच में ही कैच न लेते। शैदा जारचवी ने अपनी बेइज़्ज़ती में भी अनूठेपन और गर्व का पहलू निकाल लिया। उन्होने दावा किया कि जैसी बेमिसाल बेइज़्ज़ती उनकी हुई वैसी तो एशिया भर में कभी भी किसी शायर की नहीं हुई। राअना सीतापुरी ने शगुफ़ा छोड़ा कि जिस घर में मुझे सुलाया गया बल्कि रात-भर जगाया गया, उसमें जिद्दी बच्चा सारी रात मां के दूध और उसका बाप चर्चा के पहले विषय के लिये मचलता रहा। अख़गर कानपुरी बोले कि उनका किसान मेज़वान हर आध घंटे बाद उठ-उठकर उनसे पूछ्ता रहा कि “जनाबे-आली कोई तकलीफ़ तो नहीं, नींद तो ठीक आ रही है ना? “ हर शायर इस तरह शिकायत कर रहा था कि जैसे उसके साथ किसी व्यवस्थित षडयंत्र के तहत निजी ज़ुल्म हुआ है। हांलाकि हुआ-हवाया कुछ नहीं। हुआ सिर्फ ये कि उन शहरी शायरों ने देहात की ज़िन्दगी को पहली बार..और वो भी चंद घंटो के लिये …जरा करीब से देख लिया और बिलबिला उठे। उनपर पहली बार खुला कि शहर से सिर्फ़ चंद मील की ओट में इंसान कैसे जीते हैं और अब उनकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि यही कुछ है तो किसलिये जीते हैं.

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
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इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया 20. अजब-गजब मुशायरा

पहला भाग

 

मैने सुना था कि कभी कभी लेखक द्वारा रचा गया कोई काल्पनिक चरित्र लेखक से भी आगे निकल जाता है और लेखक को पाठकों के हिसाब से फिर उस चरित्र को ढालना पड़ता है. जैसे जब हैरी पॉटर की लेखिका ने अपनी किताब में हैरी पॉटर को मारने की बात की तो कई पाठकों ने उसका विरोध किया. कई जगह प्रदर्शन भी हुए और अंतत: लेखिका को झुकना पड़ा. वैसे मुझे खुशफहमी नहीं है कि मैने हैरी पॉटर जैसा कोई चरित्र निर्मित किया है लेकिन फिर भी मैं अपने उन पाठको के प्रति नतमस्तक हूँ जिन्होने मेरे एक चरित्र को इस तरह से अपनाया कि उसे वह मुझसे ज्यादा पहचानने लगे.

जब मैने परुली कहानी का पहला भाग लिखा था तो मैं उसे एक लघु कथा के रूप में पहले ही भाग में समाप्त मान रहा था. लेकिन पाठकों की उत्सुकता “आगे क्या होगा?से लगा कि पाठक इसके आगे की कहानी जानना चाहते हैं. तो मैं हर बुधवार की सुबह परुली का भाग्यविधाता बनता रहा. जिसे लोगों ने काफी पसंद भी किया.कई पाठक बुधवार को कहानी डालने में देरी होने पर मेल करने लगे कि परुली का क्या हुआ. मुझे भी इसमें आनंद आ रहा था. लेकिन फिर ऑफिस में व्यस्तता बड़ी तो मुझे बुधवार की सुबह इस कहानी को लिखना भारी पड़ने लगा. इसलिये पिछ्ले बुधवार मुझे लगा कि इस कहानी को फास्ट ट्रैक में रखकर समाप्त कर दूँ. ताकि हर बुधवार को लिखने का झंझट ना रहे. लेकिन मुझे क्या मालूम था कि परुली के दीवाने इस कदर नाराज हो जायेंगे.

देखिये क्या कहते हैं पाठक

सुजाता जी ने April 16th, 2008 ,11:34 am पर टिपियाया

अरे ! आज तो आपने बड़ी जल्दी में निबटा दिया कहानी को । हम तो हाथ मलते रह गये !अभी तो स्वाद आना शुरु हुआ था । क्या सचमुच कहानी खत्म ? जाएँ ?

संजीत जी और अरुण जी का ऑबजेक्शन

Sanjeet Tripathi जी ने April 16th, 2008 ,11:54 am पर टिपियाया

वाकई यार, ये तो बड़ी जल्दी ही समेट दिया आपने, कुछ ऐसे जैसे त्रस्त से हो गए हों आप इस सीरिज़ के लेखन से और सब कुछ बस निपटाना चाहते हों
आई ऑब्जेक्ट ;)

अरूण् जी ने April 16th, 2008 ,12:25 pm पर टिपियाया

हम इसे नही पढते ये तो हमारे साथ धोखा है ,पहले रायता मन मर्जी का फ़ैलाया और फ़िर फ़टाफ़ट निपटा दिया क्या आप फ़िल्म लेखन ट्राई कर रहे थे क्या जी ? जो पहले फ़ैलाते चले गये और जब पता चला कि फ़िल्म दो घंटे की बन गई है तो बस पन्द्रह मिनट मे निपटाने मे लग गये ,दुबारा लिखा /(मिटा कर) जाये इसे :)

इस कहानी के बहुत से पाठक ऐसे भी थे जो ब्लॉगर नहीं थे. सबसे तीखी प्रतिक्रिया उन्ही पाठकों की थी.माला जी ने कहा

mala telang जी ने April 17th, 2008 ,5:31 pm पर टिपियाया

काकेश भाई, ये आपने हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है । माना कि समयाभाव है , आप हमसे समय और मांग लेते .. हम खुशी खुशी दे देते ,लेकिन आपने तो हमसे ऐसा पीछा छुड़ाया जैसे सारे गाँव के कुत्ते आपके पीछे पड़ गये हों… जाइये ,इस तरह परुली का डॉक्टर बनना हमें जरा भी रास नहीं आया ,आप हमें बताएं ,कौन इलाज करवायेगा परुली से ? माफ करें मैं तो नहीं ।

नवीन पाठक जी बोले.

नवीन पाठक जी ने April 17th, 2008 ,8:32 pm पर टिपियाया

काकेश दा,
ये जो आज आपने अपने सारे दोस्तो के साथ धोखा किया है, आपको कुछ लगा कि नही…
पर आपने कहानी का अन्त तो सुखद कर दिया, लेकिन अन्त ऐसा होता नही है..कि डा. प्रिया का डा. अतुल के साथ दिल मिल गया और शादी हो गयी…
पहाड के इस माहौल मे लड्किया डाक्टर नही बन सकती है, ,,,

संजय पुजारी जी सबसे ज्यादा नाराज दिखे.

Sanjay Pujari जी ने April 19th, 2008 ,2:32 pm पर टिपियाया

नहीं काकेश जी … दिल तोड़ दिया. मैने तो आपको अच्छा लेखक समझा था लेकिन आप लेखक हो ही नहीं सकते. सिर्फ अपने लिखने का शौक पूरा कर रहे हो और नैट पर लोगों को बेवकूफ बना रहे हो. [अपने मन के मुताबिक कुछ भी लिखा और जब इस बारे में ज्यादा सोचा नहीं गया तो कहानी को 15 लाइनों में खतम कर दिया. भाई साहब ये कहानी अगर ऐसी ही खतम करनी थी तो जिस दिन शुरु हुई उसी दिन खतम क्लर देते..खाली इतने दिनों तक अपना टाइम लगाया और बांकी लोगों को बेवकूफ बनाया.]

और हेम पांडे जी ने तो अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिये कहानी का अंतिम भाग ही लिख भेजा.

hem pandey जी ने April 22nd, 2008 ,7:13 pm पर टिपियाया

‘परुली’ की अन्तिम कड़ी ने मुझे भी अन्य की तरह निराश किया. अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए मैंने अन्तिम कड़ी को इस प्रकार लिख डाला है:-

परुली की दशा देख कर उसकी ईज़ा ने निश्चय कर लिया कि वह फूल जैसी अपनी बेटी की भावनाओं का खून नहीं होने देगी.उसे लगने लगा था कि इस ब्या से परुली सुखी तो नहीं ही होगी. परुली के बाबू से फुरसत में बात करने पर जोस्ज्यु को भी यही ठीक लगा कि यह रिश्ता टूट जाए.
अब इसे पूरे परिवार कि प्रबल सामूहिक इच्छा का प्रभाव समझिए या संजोग कि घटनाक्रम भी कुछ अनुकूल रहे.खान्तोली के गणेश दत्त जी, जो ‘ब्याकर’ (शादियाँ तै कराने वाला) कहलाते थे, ने अपनी भतीजी की जुगाड़ गोपाल के लिए लगा ली और पांडे ज्यू के दिमाग में यह बात भी बिठा दी कि परुली तो ज्यादा ही बीमार ठैरी, ज्यादा दिन बचने वाली भी नहीं हुई.जोस्ज्यु की भी हालत ऐसी नहीं हुई कि वे गोपाल को कुछ ज्यादा दे सकें.पिठ्याँ अभी लगा नहीं है.इस लिए ये रिश्ता ख़तम करने में कोई हर्ज़ भी नहीं हुआ.

इसी बीच जोस्ज्यु के क़का का लड़का महेश, जो चालीस साल से हैदराबाद में था,इष्टदेव की पूजा के लिए पहली बार गाँव आया. उसके दोनों बेटे विदेश में थे और दोनों ने ही अंतर्जातीय विवाह कर रखे थे .महेश रिटायर हो गया था और उसने अपने मौसेरे भाई हरीश के मार्फ़त लखनऊ कुर्मांचल नगर में मकान खरीद लिया था.अब वह लखनऊ में ही रहने वाला था.वह हफ्ते भर जोस्ज्यु के घर में रहा. उसने भी जोस्ज्यु को प्रेरित किया कि वे परुली को आगे पढाएँ और यथासंभव आर्थिक सहायता का भी भरोसा दिलाया.वापस जाते समय वह पाँच सौ रुपये परु के और पाँच सौ रुपये बोजी के हाथ में रख गया.जीवन में पहली बार जोस्ज्यु ने इतनी बड़ी रकम किसी मेहमान या यजमान से एक बार में प्राप्त की थी.

महेश के जाने के बाद परुली भी तेजी से स्वास्थ्य लाभ करने लगी.डॉक्टर पुनेठा की दवा के साथ-साथ महेशकका की आशाजनक बातों से भी वह जल्दी ही बीमारी से उबर गयी.परीक्षा आते आते वह पूर्ण स्वस्थ हो चुकी थी.संभवतः गोल्ज्यु ने महेश कका को परुली के जीवन में एक नया मोड़ लाने के लिए भेजा था.ये महेश कका की बातों का ही असर था कि परुली का आत्मविश्वास बढ़ रहा था.इसी आत्मविश्वास के चलते उसने परीक्षा दी और ५७% अंकों से उत्तीर्ण की.

अब तो जोस्ज्यु भी परुली की पढ़ाई को ले कर उत्साहित थे. परुली गाँव की लड़कियों में ही नहीं, लड़कों में भी सबसे प्रतिभावान सिद्ध हो रही थी.परुली ने इंटर में बायोलोजी ले ली थी.उसकी ड्राइंग अच्छी थी.इसलिए उसे चित्र बनाने में परेशानी नहीं होती थी.प्रायः चित्रों में उसे गुड भी मिलता था,जिसे वह जोस्ज्यु को दिखाती थी और जोस्ज्यु मन ही मन खुश होते थे.हाँ शुरू शुरू में मेढक का डायसेक्शन करते समय उसे घिन जरूर आई थी.
परुली ,जिसे अब ईजा-बाबू परु ही कहते थे,न केवल पढ़ाई में ज्यादा मन लगा रही थी वरन् घर के काम में भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी और इस बात का विशेष ध्यान रखती थी कि ईजा के काम का बोझ कम हो जाए. यद्यपि ईजा-बाबू छोटे भाई चंदू से काम नहीं कराते थे,किंतु परु उसे काम के लिए उत्साहित करती थी.वह सोचती थी कि वह स्वयं पढ़ने के लिए बाहर चली जायेगी तो ईजा के लिए अत्ती काम हो जायेगा.
जोस्ज्यु और जोस्याणी कभी बैठे बातें करते तो उनकी बातों में परु की चिंता जरूर झलकती.
जोस्ज्यु कहते :- हँ वे, हमने कहीं परु का ब्या टाल कर ग़लत तो नहीं किया.
जोस्याणी कहती – नैं हो, चुप रौ.अब मन कैं झन गजबजाओ. गोल्ज्यु ने जो किया भल ही किया होगा. देखते नहीं पढ़ने में हमेशा फस्ट ठैरी.घर का काम भी भली कै संभालने वाली ठैरी.
फ़िर कुछ शरमा कर बोलती – आज कल देखण-चाण भी खूब हो गयी है.

इसे परुली का भाग्य कहो या गोल्ज्यु की कृपा कि केमिस्ट्री के टीचर तारा दत्त जी अल्मोड़ा से ट्रांसफर होकर परु के इंटर कालेज में आ गए.केमिस्ट्री पढाने के लिए अल्मोड़ा में तारा दत्त जी का बहुत नाम था.तारा दत्त जी की ही कृपा से परु केमिस्ट्री का कीडा बन गयी.उसे अधिकांश फार्मूले और एक्वेशन कंठस्थ थे.केमिस्ट्री ही वह विषय था जिसके बूते परु ने इंटर भी ५८% नंबरों से पास कर लिया.

परु पिछले दो सालों से पत्रों द्वारा महेश कका के सम्पर्क में थी.महेश कका अब लखनऊ में निवास कर रहे थे.उन्हें भी परु से लगाव हो आया था.तीज त्यौहार परु को कुछ रुपये भे भेज दिया करते थे.

डाक्टरी के लिए परु ने पी.एम.टी. की तैयारी महेश कका के निर्देशन में ही की थी.उसका सेंटर भी लखनऊ था.अब जा के लगा कि स्कूल की पढाई में अच्छे नंबर लाना और बात है,लेकिन पी.एम.टी. क्लीअर करना उतना आसान नहीं.पी. एम.टी.देने के बाद परु को डर लगने लगा.उसे लगा कि वह शायद पी.एम.टी.में न निकल पाये.वो अब ज्यादा ही भक्त हो गयी थी.देवी के थान नित्य दिया लगाना उसका नियम हो गया था और उसकी एक ही मन्नत होती- देवी माता! मेंके डाक्टर बणे दिए.
रिजल्ट आ गया.परु को काउन्सेलिंग के लिए बुलाया गया.परु की खुशी का पारावार न था.उसने सोचा वह अब डाक्टर बन ही जायेगी.परू के पूरे परिवार में जश्न था.इजा बाबू ने उसे खुशी-खुशी लखनऊ के लिए विदा किया.पडोस के जमुना दत्त जी का लड़का कैलाश छुट्टी बिता कर फौज की ड्यूटी में वापस जा रहा था,उसका साथ भी मिल गया.महेश कका के लिए गडेरी,भांगा,भट,घौत और दो दाने निमु के भेंट में भेजे.जोस्ज्यु खत्याड़ी वाले खेत को बेचने की तैयारी कराने लगे ताकि परु की पढाई का खर्च निकल सके.

लखनऊ में फाइनल काउन्सेलिंग के बाद पता चला की परु का एडमिशन नहीं होगा.वह कट ऑफ़ को छूने से रह गयी थी. परु के कल्पनाओं का महल भरभरा कर गिर पड़ा.उसे जबरदस्त सदमा लगा.वह गाँव वालों को क्या मुंह दिखायेगी?सभी कहेंगे -बहुत फलफला रही थी.सुद्दै जो क्या ठहरा डाक्टर बनना!एक बार उसे लगा की उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए,लेकिन यह विचार ज्यादा देर तक हावी न हो सका.ईजा- बाबू और चंदू के ख्याल ने उसे सकारात्मक विचारों की ओर मोड़ दिया.

काउन्सेलिंग के कुछ दिन बाद ही महेश कका ख़बर लाये कि आरक्षित कोटे की सीटें पूरी नहीं भर पायीं हैं और शासन इस बार ये सीटें सामान्य सीटों से भरने पर विचार कर रहा है.शायद परु का नंबर भी आ जाए क्योंकि परु ज्यादा पीछे नहीं थी.हुआ भी वही.नई सूची मैं परु का नाम आ गया.
परु के जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण दिन था.बचपन से पाले सपने को साकार करने के लिए यह पहला पक्का कदम था.परु की खुशी देख कर महेश कका के भी आंसू निकल आए.

गाँव में जोस्ज्यु अब तक के घटनाक्रम से अवगत न थे.वे तो परु को डाक्टर मान चुके थे.परु की चिट्ठी आयी- मेरा एडमिशन हो गया है.गोल्ज्यु के थान प्रसाद चढ़ा देना. जोस्ज्यु उपाध्यायजी के यहाँ से मिसिरी ले आए. परु की ईजा ने गोल्ज्यु के थान परसाद चढा कर पूरे गाँव मे बांटा.ज्यादातर लोगों का एक ही जवाब था -भल भै हो तुमेरी परुलि डाक्धर बण गे.लेकिन कुछ ज्यादा समझदार लोग यह भी कह रहे थे-अल्ले काँ(अभी कहाँ) आई त पाँच साल तक पढाई करनी पड़ने वाली ठैरी.तब जो बनेगी डाकटर.

पढाई का कुछ खर्च खत्याड़ी वाला खेत बेचने से चल गया था.महेश कका ने भी काफी मदद की. उन्होंने परु को होस्टल न भेजकर अपने घर पर रख लिया जिससे रहने खाने का खर्च बच जाए.

एडमिशन होने तक परु को उतनी मुश्किल नहीं हुई जितनी एडमिशन के बाद. मेडिकल कालेज की जबरदस्त रैगिंग से परु विचलित हो गयी. उसने रैगिंग का नाम तो सुना था लेकिन इस प्रकार की रैगिंग होगी,उसे अनुमान नहीं था.उसे कालेज जाना किसी यातना झेलने जैसा लगने लगा.महेश कका उसकी परेशानी को भाँप गए.उन्होंने परु की चाची से बात की. परु की चाची ने उसे रैगिंग के आतंक से उबरने में मदद की.
परु जब पी.एम.टी. देने पहली बार लखनऊ आयी थी तो इतनी बड़ी ट्रेन देखकर,इतना बड़ा शहर देख कर,इतनी चहल पहल,इतनी भागमभाग देख कर जहाँ चमत्कृत हुई थी वहीं घबराई भी.उसे लगा था कि इतने बड़े शहर में रहकर पढाई करना कितना मुश्किल होगा.लेकिन अब इस चकाचौंध से उसकी घबराहट दूर होने लगी और उसे इसमें रस आने लगा.कालेज में भी उसका ग्रुप बन गया था.वहाँ भी उसे अच्छा लगता था.

यह परु का फर्स्ट इअर था.कालेज में एनुअल फंक्शन चल रहे थे.उसके ग्रुप की रीमा भाटिया बोली-
‘प्रिया तुम इतनी क्यूट हो. ब्यूटी कम्पीटिशन में पार्टिसिपेट क्यों नहीं करतीं?’
अमित और दूसरे साथियों ने भी इस बात पर जोर दिया.प्रिया ने कुछ शर्माते हुए कहा-
‘ठीक है,मैं आज अंकल से परमिशन लूंगी.’
‘परमिशन!’नेहा बोली’भला इसमें उन्हें क्या ऐतराज़ हो सकता है?तुम्हें एक चांस मिल रहा है.हो सकता है आज मिस मेडिकल कालेज,कल मिस लखनऊ फ़िर मिस इंडिया और मिस वर्ल्ड भी तुम बनो.एक्सपोजर ऐसे ही तो होता है.’
परु चुप रही.नेहा की बातों से परु को लगने लगा था कि महेश कका उसे अनुमति दे देंगे क्योंकि वे उसे हमेशा प्रोत्साहित करते थे.

लेकिन जब महेश कका से इस बारे में बात हुई तो उन्होंने परु को प्यार से समझाते हुए मना कर दिया.हालांकि उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि डिबेट या स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करने की अनुमति दे देते.महेश कका की इस बात पर परु को बुरा लगा और वह अनमनी हो गयी.

उसके दोस्तों ने इस बात पर उसके अंकल-आंटी का मजाक भी बनाया.मारिया तो यहाँ तक कहने लगी-
‘ये तुम्हारे पेरेंट्स होते तो मना नहीं करते.तुम्हें तो होस्टल ज्वाइन कर लेना चाहिए.वहाँ कम से कम फ्रीली रह तो सकोगी.’

निपट गाँव से एक अत्यन्त सरल प्रतिभावान लडकी शहरी चकाचौंध भरे बनावटी माहौल में ठीक से तारतम्य नहीं बिठा पा रही थी.इसी लिए जब महेश कका ने उसे न्यू इअर पार्टी में होटल में रात भर जश्न मनाने के लिए मना कर दिया तो वह भड़क उठी और बोली-
‘कका क्या आप समझते हैं कि मैं वहाँ जा कर कोई ग़लत काम करूंगी या शराब पियूंगी?क्या सभी लडकियां जो वहाँ जा रही हैं इसी लिए जा रहे हैं?उनके पेरेंट्स उनको क्यों नहीं रोक रहे?’
इसी रौ में उसने होस्टल ज्वाइन करने की इच्छा भी जाहिर कर दी.वह यह भी भूल गयी कि महेश कका उसका आधा खर्च वहन कर रहे हैं.होस्टल का खर्च वह कहाँ से लाएगी?
उसके तेवर देख कर चाची तो तमक उठी और बोल दिया-
‘जाने दीजिये इसको होस्टल.जब उसे आपकी इज्ज़त नहीं करनी तो आप क्यों इसकी फिक्र करते हैं?हम इसके लिए कितना कर रहे हैं इसे उसकी भी परवाह नहीं.बेशर्म हो गयी है.पर निकल गए हैं इसके.’
महेश कका को भी काफी सदमा लगा.दुखी हो कर बोले-
‘बेटा मैंने तो तुझे अपनी बेटी मान लिया था.तेरा भला बुरा सोचना मेरा फ़र्ज़ था. लेकिन तुझे मेरी बातें बुरी लग रही हैं तो अपने मन की कर ले .हाँ,इतना जरूर कहूंगा कि तेरे बाबू की स्थिति ऐसी नहीं कि होस्टल का खर्च उठा सकें.अभी तो तेरा फर्स्ट इअर ही है.’
लेकिन प्रिया पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ.वह गुस्से में थी और उसने होस्टल जाने का निश्चय कर लिया था.दूसरे दिन वह इस बारे में दोस्तों से बात करने वाली थी.आज की पार्टी में शामिल न हो पाने का भी उसे बहुत मलाल था.
कालेज पहुँचने पर कुछ और ही चर्चा थी.रात की पार्टी में स्टूडेंट्स के दो गुटों में जम कर हाथापाई हुई थी.बोतलें और कुर्सियाँ चली थीं.पुलिस आ गयी थी.अमित, नेहा और सुष्मिता को रात भर थाने में रहना पड़ा था.सुबह पेरेंट्स को बुला कर उन्हें चेतावनी दी गयी थी.
प्रिया के लिए ऐसी घटना अकल्पनीय थी वह महेश कका से कुतर्क करने के लिए शर्मिन्दा थी.दूसरे दिन के न्यूज़ पेपर में घटना की ख़बर फोटो सहित थी.उसके ग्रुप के कुछ स्टूडेंट्स के फोटो और नाम भी थे..
इस घटना के बाद प्रिया को अहसास हो गया कि महेश कका सदा उसके भले की ही बातें करते हैं.उसे आश्चर्य भी हुआ कि उसने किस दम पर होस्टल ज्वाइन करने का विचार बना लिया था.महेश कका से मुंह्जोरी करने का भी उसे बहुत दुःख था. उनसे आँखें मिलाने में भी उसको शर्म आ रही थी.हाँ एक फायदा जरूर हुआ,इसके बाद कभी परु महेश कका से पूछे बिना एक कदम भी नहीं चली.इसी का परिणाम था कि प्रिया ने अपनी मेडिकल के पढाई सफलता पूर्वक पूरी की.
आज परु को इस बात का अहसास है कि महेश कका ने ही उसके जीवन की दिशा बदली है.उनका बहुत बड़ा अहसान है जिसे जिंदगी भर नहीं भूल सकती-डाक्टर प्रिया जोशी

कहानी यहीं समाप्त होती है.इससे आगे जहाँ तक मुझे मालूम है बता दूँ-प्रिया,उसकी माँ और जोस्ज्यु ने कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया जिससे गाँव वाले यह कह सकें कि ये लोग ओच्छि गए हैं.हाँ चंदू को अपनी दीदी के डाक्टर होने पर जरूर गर्व है और इसे वह अपने दोस्तों पर प्रकट भी कर देता है.
डाक्टर प्रिया की नौकरी भी पहाड़ के एक प्राईमरी अस्पताल मे लग गई.सुना है उसका चिह्न किसी डाक्टर अतुल पन्त के लिए गया है.चिह्न साम्य हो गया तो ब्याह पक्का ही समझो क्योंकि दोनों ही समकक्ष संबंधों वाले ठहरे और डाक्टर अतुल के पिताजी केमिस्ट्री के मास्टर तारा दत्त जी हुए जिन्होंने पारु को पढाया था और उसे पसंद भी करते थे.

आप सभी का हार्दिक धन्यवाद. मैं आप लोगों की सोच को नमन करता हूँ. मैं आपका गुनहगार हूँ. इसलिये क्षमा प्रार्थी भी हूँ. मैं समय मिलते ही कहानी के अंतिम भाग को लंबा करके लिखने की कोशिश करुंगा. ब्लॉग पर छापूं ना छापूं लेकिन इससे कमसे कम मेरा अपराधबोध तो कम होगा ही. आप आते रहें और मेरा मार्ग दर्शन करते रहें यही कामना है.

 

अरुण जी इस सिरीज पर नियमित टिपियाकर इसे जारी रखने का हौसला दे रहे हैं. वह पिछ्ले कई अंकों से मुशायरे के इंतजार में हैं.पिछ्ले अंक में उन्होने कहा “शेर के नाम पर गीदड तक के दर्शन नही कराये” . तो ज़नाब आज उनका और आपका भी इंतजार खत्म होता है.पेश है एक रोचक मुशायरा. आनंद लें.आनंद आये तो टिपिया दें बस.

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साग़र जालौनवी : रात के बारह बजे थे चारों ओर श्रोताओं की तूती बोल रही थी।मुशायरे के शोर से सहम कर गांव की सरहद पर गीदड़ों ने बोलना बन्द कर दिया था। एक स्थानीय शायर ख़ुद को हर शेर पर हूट करवा कर सर झुकाये जा रहा था कि एक साहब चांदनी पर चलते हुए मुशायरे के अध्यक्ष तक पहुंचे, दायें हाथ से आदाब किया और बायें हाथ से अपनी मटन-चाप मूंछ जो खिचड़ी हो चली थी, ताव देते रहे। उन्होंने प्रार्थना की कि मैं एक ग़रीब परदेसी हूं, मुझे भी शेर पढ़ने की इजाजत दी जाये। उन्होंने ख़बरदार किया कि अगर पढ़वाने में देर की गई तो उनका दर्जा ख़ुद-ब-ख़ुद ऊंचा होता चला जायेगा और वो उस्तादों से पहलू मारने लगेंगे। उन्हें इजाजत दे दी गयी। उन्होंने खड़े हो कर दर्शकों को दायें, बायें और सामने घूम कर तीन-बार आदाब किया। उनकी क्रीम रंग की अचकन इतनी लम्बी थी कि भरोसे से नहीं कहा जा सकता था कि उन्होंने पाजामा पहन रक्खा है या नहीं। काले मख़मल की टोपी को जो भीड़-भड़क्के में सीधी हो गई थी, उन्होंने उतार कर फूंक मारी और अधिक टेढ़े एंगिल से सर पर जमाया। मुशायरे के दौरान यह साहब छटी लाइन में बैठे अजीब अन्दाज से “ऐ सुब्हानल्ला-सुब्हानअल्ला” कह कर दाद दे रहे थे। जब सब ताली बजाना बन्द कर देते तो यह शुरू हो जाते और इस अन्दाज में बजाते जैसे रोटी पका रहे हैं। फ़र्शी आदाब करने के बाद वो अपनी डायरी लाने के लिये अचकन इस तरह ऊपर उठाये अपनी जगह पर वापस गये जैसे कुछ औरतें भरी बरसात और चुभती नजरों की सहती-सहती बौछारों में, सिर्फ़ इतने गहरे पानी से बचने के लिये जिसमें चींटी भी न डूब सके, अपने पांयचे दो-दो बालिश्त ऊपर उठाये चलती हैं और देखने वाले क़दम-क़दम पे दुआ करते हैं कि “इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे”।

अपनी जगह से उन्होंने अपनी डायरी उठाई, जो दरअस्ल स्कूल का एक पुराना हाजिरी रजिस्टर था जिसमें इम्तिहान की पुरानी कापियों के ख़ाली पन्नों पर लिखी हुई ग़जलें रखी थीं। उसे सीने से लगाये वो साहब वापस मुशायरे के अध्यक्ष के पास पहुंचे। हूटिंग किसी तरह बन्द होने का नाम ही नहीं लेती थी। ऐसी हूटिंग नहीं देखी कि शायर के आने से पहले और शायर के जाने के बाद भी जोरों से जारी रहे। अपनी जेबी घड़ी एक बार बैठने से पहले और बैठने के बाद ध्यान से देखी। फिर उसे डमरू की तरह हिलाया और कान लगा कर देखा कि अब भी बन्द है या धक्कमपेल से चल पड़ी है। जब फ़ुरसत पाई तो श्रोताओं से बोले, ‘‘हजरात! आपके चीख़ने से मेरे तो गले में ख़राश पड़ गई है।’’

इन साहब ने अध्यक्ष और श्रोताओं से कहा कि वे एक ख़ास कारण से ग़ैर-तरही ग़जल पढ़ने की इजाजत चाहते हैं, मगर कारण नहीं बताना चाहते। इस पर श्रोताओं ने शोर मचाया। हल्ला जियादा मचा तो उन साहब ने अपनी अचकन के बटन खोलते हुए ग़ैर-तरही ग़जल पढ़ने का यह कारण बताया कि मिसरा ‘तरह’ दिया गया है उसमें ‘सकता’ (छन्द दोष) पड़ता है, ‘मरज’ शब्द को ‘फ़र्ज’ के ढ़ंग पर बांधा गया है। श्रोताओं की आख़िरी पंक्ति से एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग ने उठ कर न सिर्फ़ सहमति व्यक्त की बल्कि ये चिंगारी भी छोड़ी कि अलिफ़ (आ की ध्वनि को अ बांधना) भी गिरता है।

यह सुनना था कि शायरों पर अलिफ़ ऐसे गिरा जैसे फ़ालिज गिरता है। सकते में आ गये। श्रोताओं ने आसमान, मिसरा-तरह और शायरों को अपने सींगों पर उठा लिया। एक हुल्लड़ मचा हुआ था। जौहर इलाहाबादी कुछ कहना चाहते थे मगर अब शायरों के कहने की बारी ख़त्म हो चुकी थी। फब्तियों, ठठ्ठों और गालियों के सिवा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। ऐसा स्थिति थी कि अगर उस समय जमीन फट जाती तो बिशारत स्वयं को, मय कानपुर के शायरों और मौलवी मज्जन को गावतकिये समेत उसमें समा जाने के लिये ख़ुशी से ऑफ़र कर देते।

उस एतराज करने वाले शायर ने अपना उपनाम साग़र जलौनवी बताया, लोग बड़ी देर से उकताये बैठे थे। साग़र जलौनवी के धमाकेदार एतराज से ऊंघते मुशायरे में जान ही नहीं, तूफ़ान आ गया। दो गैस की लालटेनों का तेल पन्द्रह मिनट पहले खत्म हो चुका था। कुछ में वक़्त पर हवा नहीं भरी गयी। वो फुस्स हो कर बुझ गईं। साग़र जलौनवी के एतराज के बाद किसी शरारती ने बाक़ी लालटेनों को झड़झड़ाया, जिससे उनके मेंटल झड़ गये और अंधेरा हो गया। अब मारपीट शुरू हुई, लेकिन ऐसा घुप्प अंधेरा था कि हाथ को शायर सुझायी नहीं दे रहा था इसलिये बेक़सूर श्रोता पिट रहे थे। इतने में किसी ने आवाज लगाई, भाइयो! हटो! भागो! बचो! रण्डियों वाले हकीम साहब की भैंस रस्सी तुड़ा गई है। यह सुनते ही घमासान की भगदड़ पड़ी। अंधेरी रात में काली भैंस तो किसी को दिखाई नहीं दी लेकिन लाठियों से लैस मगर घबराये हुए देहातियों ने एक दूसरे की, भैंस समझ कर ख़ूब धुनाई की। लेकिन आज तक यह समझ न आया कि चुराने वालों ने ऐसे घुप अंधेरे में नये जूते कैसे पहचान लिये और जूते की क्या, हर चीज जो चुरायी जा सकती थी चुरा ली गयी। पानों की चांदी की थाली, दर्जनों अंगोछे, साग़र जलौनवी की दुगनी साइज की अचकन, जिसके नीचे कुरता या बनियान नहीं था। एक जाजम, तमाम चांदनियां, यतीमख़ाने के चंदे की सन्दूक़ची, उसका फ़ौलादी ताला, यतीमख़ाने का काला बैनर, मुशायरे के अध्यक्ष का गाव-तकिया और आंखों पर लगा चश्मा, एक पटवारी के गले में लटकी हुई दांत कुरेदनी और कान का मैल निकालने की डोई, ख़्वाजा क़मरूद्दीन की जेब में पड़े आठ रुपये, इत्र में बसा रेशमी रूमाल और पड़ौसी की बीबी के नाम महकता ख़त (यही एक चीज थी जो दूसरे दिन बरामद हुई और इसकी नक़्ल घर-घर बंटी), हद ये कि कोई बदतमीज उनकी टांगों में फंसे चूड़ीदार का रेशमी नाड़ा एक ही झटके में खींचकर ले गया। एक शख़्स बुझा हुआ हंडा सर पर उठा के ले गया। माना कि अंधेरे में किसी ने सर पर ले जाते हुए तो नहीं देखा, मगर हंडा ले जाने का सिर्फ़ यही एक तरीक़ा था। बीमार मुर्ग़ियों के केवल कुछ पर पड़े रह गये। साग़र जलौनवी का बयान था कि

एक बदमाश ने उसकी मूंछ तक उखाड़ कर ले जाने की कोशिश की जिसे उसने अपनी चीख से नाकाम कर दिया। यानी इस बात की चिंता किये बिना कि उपयोगी है या नहीं, जिसका जिस चीज पर हाथ पड़ा उसे उठा कर, उतार कर, नोच कर, फाड़ कर, उखाड़ कर ले गया। हद यह कि तहसीलदार के पेशकार मुंशी बनवारी लाल माथुर के इस्तेमाल में आते डेंचर्स भी। केवल एक चीज ऐसी थी जिसे किसी ने हाथ नहीं लगाया। शायर अपनी डायरियां जिस जगह छोड़ कर भागे थे वो दूसरे दिन तक वहीं पड़ी रहीं।

बाहर से आये देहातियों ने यह समझकर कि शायद यह भी मुशायरे का हिस्सा है, मार-पीट और लूट-खसोट में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और बाद को बहुत दिन तक हर आये-गये से बड़े चाव से पूछते रहे कि अगला मुशायरा कब होगा।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया

पहला भाग

 

communication प्रवचन सुनकर लौटते हुए मनोहर और श्याम बातें करते हुए जा रहे थे.वह दोनों स्वामी जी की भक्तिपूर्ण बातों से बहुत प्रभावित थे. तभी मनोहर के मन में एक प्रश्न उठा कि क्या पूजा करते समय सिगरेट पीना उचित है ? उसने श्याम से पूछा. श्याम ने कहा कि तुम यह सवाल स्वामी जी से ही क्यों नहीं पूछ्ते.

मनोहर स्वामी जी के पास गया और उसने पूछा.

“स्वामी जी, क्या मैं पूजा करते समय सिगरेट पी सकता हूँ.”

स्वामी जी ने जबाब दिया. “नहीं बेटा, बिल्कुल नहीं, यह तो ईश्वर के प्रति अप्रेम और अश्रद्धा दिखाना है.”

मनोहर ने आकर श्याम को बताया कि स्वामी जी ने उससे क्या कहा. श्याम ने कहा ठीक ही तो है तुमने सवाल गलत पूछा तो तुम्हें जबाब भी गलत मिला. रुको मैं कोशिश करता हूँ. अब श्याम स्वामी जी के पास गया और उसने पूछा.

“स्वामी जी, क्या मैं सिगरेट पीते समय पूजा कर सकता हूँ.”

स्वामी जी ने जबाब दिया. “क्यों नहीं बेटा, बिल्कुल कर सकते हो. यह तो ईश्वर के प्रति प्रेम और श्रद्धा का सूचक है”

शिक्षा: जैसा जबाब चाहते हो वैसा सवाल पूछो. 

[मुझे यह कहानी अंग्रेजी में एक ई-मेल से मिली जिसे मैने हिन्दी में भावानुवाद कर दिया]

 

हिन्दी ब्लॉगिंग में हम अक्सर चिट्ठों के जरिये कमाई की बात करते हैं. लेकिन अभी  भी हिन्दी कंटेंट के लिये बहुत से माध्यम ऐसे नहीं हैं जिनके जरिये कमाई की जा सके. ले देकर लोग ऐडसैंस की ही बात करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं एडसैंस के अलावा भी कुछ तरीके हैं जिनका इस्तेमाल करके भी कुछ कमाई की जा सकती है.

ऐसी ही एक सेवा के बारे में आज आपको बताने जा रहा हूँ. यह सेवा है कन्ड्यूट डॉट कॉम की. इस साइट में आप खुद को रजिस्टर करवा कर अपना टूल बार बना सकते हैं. रजिस्टर करते ही यह साइट आपके खाते में 100 डॉलर (लगभग चार हजार रुपये) डाल देती है. लेकिन यह 100 डॉलर आपको तब तक  नहीं मिलते जब तक की आप के खाते जी रकम 250 डॉलर यानि (लगभग दस हजार रुपये ) नहीं हो जाती. यह रकम आपके पे-पाल के खाते में हर महीने जमा होती रहेगी.

आपकी यह रकम आपके टूलबार के प्रयोक्ता बढ़ने पर बढ़ती रहेगी. आप कितने पैसे कमा सकते हैं वह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके हर महीने कितने नये प्रयोक्ता बन रहे हैं और पुराने प्रयोक्ता आपके टूलबार को कितना प्रयोग में ला रहे हैं. इस साइट पर जाके आप अपनी कमाई का हिसाब भी लगा सकते हैं.

इसी हिसाब के अनुसार यदि आप हर महीने 14 डॉलर ( लगभग 560 रुपये) से लेकर 1440 डॉलर (लगभग 57,000 रुपये)  तक कमा सकते हैं.तो है ना फायदे का सौदा. ना आपको कंटेंट लिखना ना ही टिप्पणी करनी बस अपने टूलबार का प्रचार कर उसके डाउनलोड बढ़वाइये और घर बैठे पैसा कमाइये.  

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बहुधा पूछे जाने वाले प्रश्न यहाँ हैं.   कुछ और फायदे जानने के लिये यहाँ क्लिक करें.

तो फिर देर कैसी हो जाइये शुरु.बनाइये टूलबार और करिये प्रचार.

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टीपू नाम के कुत्ते : उन्हें यह देख कर दुख़ हुआ कि हलवार्इ और बच्चे उस कुत्ते को टीपू! टीपू! कह कर बुला और दुतकार रहे हैं। श्रीरंगापट्टम के भयानक रक्तपात से भरे संग्राम में टीपू सुल्तान के मरने के बाद अंग्रेजों ने कुत्तों के नाम टीपू रखने शुरू कर दिये और एक जमाने में यह उत्तरी भारत में इतना आम हुआ कि ख़ुद भारतीय भी आवारा और बेनाम कुत्तों को टीपू कह कर ही बुलाते और हुश्कारते थे, ये जाने बग़ैर कि कुत्तों का ये नाम कैसे पड़ा। नेपोलियन और टीपू सुल्तान के अलावा अंग्रेजों ने ऐसा व्यवहार अपने किसी और दुश्मन के साथ नहीं किया, इसलिये कि किसी और दुश्मन की उनके दिल में ऐसी दहशत नहीं बैठी।

तलवा देख कर क़िस्मत का हाल बतानेवाला : हालांकि उनका घर पक्का और स्कूल आधा पक्का था लेकिन मौलवी मुजफ़्फ़र ने अपनी ईमानदारी और इस्लाम के आरम्भिक काल के मुसलमानों की सादगी का नमूना पेश करने की ग़रज से अपना दफ़्तर एक कच्चे टिनपोश मकान में बना रखा था। सैलेक्शन कमेटी का दरबार यहीं लगने वाला था। बिशारत समेत कुल तीन उम्मीदवार थे। बाहर दरवाजों पर बायीं तरफ़ एक ब्लैक बोर्ड पर चाक से यह निर्देश लिखे हुए थे-

1. उम्मीदवार अपनी बारी का इन्तजार धैर्य और विनम्रता से करें।

2. उम्मीदवारों को सफ़र ख़र्च और भत्ता हरगिज नहीं दिया जायेगा। जुहर की नमाज के बाद उनके खाने का इन्तजाम यतीमखाना शम्स-उल-इस्लाम में किया गया है।

3. इन्टरव्यू के वक़्त उम्मीदवार को मुबलिग़ एक रुपये चंदे की यतीमखाने की रसीद पेश करनी होगी।

4.उम्मीदवार कृपया अपनी बीड़ी बुझाकर अन्दर दाख़िल हों।

बिशारत जब प्रतीक्षालय यानी नीम की छांव तले पहुंचे तो कुत्ता उनके साथ था। उन्होंने इशारों में कई बार उससे विदा चाही, मगर वो किसी तरह साथ छोड़ने को तैयार न हुआ। नीम के नीचे वो एक पत्थर पर बैठ गये तो वो भी उनके क़दमों में आ बैठा और अत्यधिक उचित अंतराल से दुम हिला-हिला कर उन्हें कृतज्ञ आंखों से टुकर-टुकर देख रहा था। उसका ये अंदाज उन्हें बहुत अच्छा लगा और उसकी मौजूदगी से उन्हें कुछ चैन-सा महसूस होने लगा। नीम की छांव में एक उम्मीदवार जो ख़ुद को इलाहाबाद का एल.टी. बताता था, उकड़ूं बैठा तिनके से रेत पर 20 का यंत्र बना रहा था। जिसके खानों की संख्यायें किसी तरफ़ से भी गिनी जाये, जोड़ 20 आता था। स्त्री-वशीकरण तथा अफ़सर को प्रभावित करने के लिये यह यंत्र सर्वोत्तम समझा जाता था। कान के सवालिया निशान ‘?’ के अन्दर जो एक और सवालिया निशान होता है, उन दोनों के बीच उसने ख़स के इत्र का फाया उड़स रखा था। जुल्फ़े-बंगाल हेयर ऑयल से की हुई सिंचाई के रेले, जो सर की तात्कालिक आवश्यकता से कहीं जियादा थे, माथे पर बह रहे थे। दूसरा उम्मीदवार जो कालपी से आया था, ख़ुद को अलीगढ़ का बी.ए.-बी.टी. बताता था। धूप का चश्मा तो समझ में आता था, मगर उसने गले में सिल्क का लाल स्कार्फ़ भी बांध रखा था जिसका इस चिलचिलाती धूप में यही उद्देश्य मालूम पड़ता था कि चेहरे से टपका हुआ पसीना सुरक्षित कर ले।

अगर उसका वज्न 100 पौंड कम होता तो वो जो सूट पहन कर आया था, बिल्कुल फ़िट आता। क़मीज के नीचे के दो बटन तथा पैंट के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे सिर्फ़ सोलर हैट सही साइज का था। फ़ीरोजे की अंगूठी भी शायद तंग हो गई थी, इसलिये कि जब इन्टरव्यू के लिये आवाज पड़ी तो उसने जेब से निकाल कर छंगुलिया में पहन ली। जूते के फ़ीते, जिन्हें वो खड़े होने के बाद नहीं देख सकता था, खुले हुए थे। कहता था-गोलकीपर रह चुका हूं। इस मोटे-ताजेपन के बावजूद ख़ुद को नीम के दो शाख़े ‘Y’ में इस तरह फ़िट किया था कि दूर से एक ‘V’’ नजर आता था, जिसकी एक नोक पर जूते और दूसरी पर हैट रखा हो। ये साहब ऊपर टंगे-टंगे ही बातचीत में हिस्सा ले रहे थे और वहीं से पीक की पिचकारियां और सिगरेट की राख चुटकी बजा-बजा कर झाड़ रहे थे।

कुछ देर बाद बिशारत के पास एक जटाधारी साधू आ बैठा। अपना सोंटा उनके माथे पर रखकर कहने लगा, ‘‘क़िस्मत का हाल बताता हूं पांव के तलवे देख कर,अबे जूते उतार नहीं तो साले यहीं भस्म कर दूंगा।’’ उन्होंने उसे पागल समझकर मुंह फेर लिया। लेकिन जब उसने नर्म लहजे में कहा ‘‘बच्चा तेरे पेट पर तिल है और सीधी बग़ल में मस्सा है’’, तो उन्होंने घबरा कर जूते उतार दिये। इसलिये कि उसने बिल्कुल ठीक बताया था। थोड़ी दूरी पर एक बरगद के पेड़ के नीचे तीसरी क्लास के बच्चे ड्रिल कर रहे थे। उस समय उनसे दंड लगवाये जा रहे थे। पहले ही दंड में ‘‘हूं’’ कहते हुए सर ले जाने के बाद केवल दो लड़के हथेलियों के बल उठ पाये। बाक़ी वहीं धूल में छिपकली की तरह पट पड़े रह गये। सब गर्दन मोड़-मोड़ कर बड़ी बेबसी से ड्रिल मास्टर को देख रहे थे जो उन्हें ताना दे रहा था कि तुम्हारी मांओं ने तुम्हें कैसा दूध पिलाया है?

दरवाज़े पर सरकंडों की चिक़ पड़ी थी, जिसका निचला हिस्सा झड़ चुका था। सुतली की लड़ियां रह गई थीं। सबसे पहले अलीगढ़ के उम्मीदवार को इस तरह आवाज पड़ी जैसे अदालत में नाम मय-वल्दियत के पुकारे जाते हैं। पुकारने के अंदाज से पता लगता था कि शायद डेढ़-दो सौ उम्मीदवार हैं जो डेढ़ दो मील दूर कहीं बैठे हैं। उम्मीदवार पहले वर्णित नीम की ग़ुलैल पर से धम्म से कूद कर सोलर हैट समेत दरवाज़े में दाख़िल होने वाला था कि चपरासी ने रास्ता रोक लिया। उसने यतीमख़ाने के चंदे की रसीद मांगी और सिगरेट की डिबिया, जिसमें दो सिगरेट बाक़ी थे, लगान के तौर पर धरवा ली। फिर जूते उतरवा कर लगभग घुटनों के बल चलाता हुआ अन्दर ले गया। पचास मिनट बाद दोनों बाहर निकले। चपरासी ने दरवाज़े के पास रक्खे हुए घड़ियाल को एक बार बजाया, जिसका उद्देश्य गांव वालों और उम्मीदवारों को ख़बर करना था कि पहला इन्टरव्यू समाप्त हुआ। बाहर खड़े हुए लड़कों ने जम कर तालियां बजाईं। उसके बाद इलाहाबादी उम्मीदवार का नाम पुकारा गया जो बीसे का यंत्र मिटा कर लपक-झपक अन्दर चला गया। पचास मिनट बाद फिर चपरासी ने बाहर आ कर घंटे पर दो बार इतनी जोर से चोट लगाई कि क़स्बे के सारे मोर चिंघाड़ने लगे। (हर इन्टरव्यू का समय वही था जो घंटों का) चपरासी ने आंख मार कर बिशारत को अन्दर चलने को कहा।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

आलोक जी की नियमित अगड़म बगड़म को कई लोग पढ़ते हैं पर अक्सर उन पर उतनी टिप्पणीयां नहीं आती लेकिन इस बार तो गज्जब हो गया. उन्होने गब्बर सिंह का जो ख़त लीक किया था उस पर दमदार टिप्पणीयाँ आयी हैं.

ज्ञान दत्त जी काले कारनामों की भूरी भूरी प्रशंसा कर रहे हैं.  

Gyan Dutt Pandey, on February 23rd, 2008 at 6:41 am Said:

कभी कभी आपकी भूरिभूरि प्रशंसा का मन करता है। आज वही करने का मन कर रहा है। डकैती पर सर्विस टेक्स! क्या नायब और सरकार के लिये राजकोश में वृद्धि का विचार है। आप को तो वित्त सलाहकार, भारत सरकार तत्काल प्रभाव से बना देना चाहिये। फिर आप ऐसा सर्विस टेक्स आतन्कवाद, कालाबाजारी, टीटीई बाबू की दिहाडी की कमाई – इन सब पर लगवा दीजियेगा। राजकोश में इजाफा होगा और कई आम कृत्य टेक्स की नेट में आ जायेंगे।
मैं एक बार फिर प्रशंसा करता हूं जी!!! :-)

अनूप जी तो टैक्स का नामकरण भी कर दिये.

अनूप शुक्ल, on February 23rd, 2008 at 7:06 am Said:

शानदार सलाह और अनुरोध। डकैती पर जब भी सर्विस टैक्स लगेगा उसे आलोक पुराणिक टैक्स के नाम से जाना जायेगा। :)

शिव कुमार जी अपनी बिरादरी के लोगों के बारे में कुछ कह रहे हैं.

Shiv Kumar Mishra, on February 23rd, 2008 at 10:31 am Said:

गब्बर सिंह जी ने शेयरों में अपने निवेश के लिए सांभा को जिम्मेवार ठहरा दिया. लेकिन उन्होंने उन एनालिस्ट लोगों को जिम्मेवार नहीं ठहराया जिन्होंने बिजनेस न्यूज़ चैनल पर बैठे-बैठे उन्हें बताया था कि किन-किन शेयर में इन्वेस्ट करना है. कहीं ऐसा तो नहीं कि सिंह जी उन्हें लूट चुके हैं जो बाकी लोगों को टीवी पर बैठे-बैठे लूटते रहते हैं.

गब्बर सिंह जी शायद अपने ऊपर छापा न पड़ने से दुखी हैं. इसीलिए डकैती पर सर्विस टैक्स लगाने की बात कर रहे हैं. एक बार उनकी सर्विस पर टैक्स लगा तो उसकी चोरी भी करनी पड़ेगी. टैब कहीं जाकर छापा पड़ेगा उनके ऊपर. और एक बार छापा पड़ गया तब जाकर लोग डरेंगे उनसे. नहीं तो आजकल जनता ऐसे लोगों को डाकू बदमाश मानने से इनकार कर देती है जिनके ऊपर छापा नहीं पड़ता.

आशा है वित्तमंत्री जी सिंह जी के सुझावों पर जरूर ध्यान देंगे. आख़िर समाज के माईनोरिटी सेक्शन के बारे में सोचने की कसम खाई है उन्होंने.

संजय तिवारी जी थोड़े सैण्टिया गये हैं.

  • संजय तिवारी, on February 23rd, 2008 at 10:37 am Said:

    यह सही है कि आंटा-दाल चावल भी अब निवेश के इश्यू हो रहे हैं. थू है ऐसे विकास और प्लानिंग पर.

    अरुण जी फिर से पंगा लेने की फ़िराक में हैं.

  • अरूण, on February 23rd, 2008 at 10:54 am Said:

    आलोक जी आपने पिछ्ले कई साल से ये जो कंसल्टेंसी का काम किया हुआ है (अगडम बगडम प्राईवेट लिमिटेड का) इस्का सर्विस टैक्स जाम कराईये.. या हम से सैटल मेंट कीजीये सेंट्रल एक्साईज डिपार्टमेंट ,नई दिल्ली

    ई..का …लो जी लो ..ग़ब्बर सिंह भी हाजिर हो गये.

  • गब्बर सिंह, on February 23rd, 2008 at 1:33 pm Said:

    का हो आलोक बबुआ ई सब का अंट-शंट बकवास कर रहे हो.
    हमई पर अगर सर्भिस टैक्सवा लगा दोगे तो बहुत पछ्तावोगे.
    पता है कि नही होली कब है? हाँ कब है होली?
    अबरी बरस होरी मे हम तोका नाही छोडेंगे.
    संभल जइयो.

    और पीछे पीछे सांभा भी…

  • सांभा, on February 23rd, 2008 at 6:07 pm Said:

    सरदार, यहां क्या कर रहे हैं?

    और फिर वालिद साहब भी…

  • हरी सिंह, गब्बर सिंह के वालिद, on February 23rd, 2008 at 6:30 pm Said:

    गब्बर, बेटा इतने गिर गए कि एक लेखक को धमका रहे हो. मुझे कैसे गर्व होगा तुमपर? एक लेखक जिसने तुम्हें रास्ता दिखाया, जिसने तुम्हारी तकलीफों के बारे में लिखा उसे ही धमकी देना कितना जायज है?

    और क्या ये चिल्लाते रहते हो कब है होली, होली कब है. ये होली के बारे में इतने आतुर क्यों रहते हो? कभी दिवाली के बारे में जानने की कोशिश की है. तीन साल हो गए, घर पर एक पैसा नहीं भेजा तुमने. कुछ अपने माँ-बाप के बारे में भी कुछ करो. जितना पैसा कमाते हो (वैसे भी अब कुछ ज्यादा नहीं कमाते), सब उस नाचने-गाने वालों के ऊपर उड़ा देते हो. मेरी हालत का अंदाजा है तुम्हें? लूट-मार से मैंने जो कुछ भी कमाया था, उसमें से आधा तो तुम्हारी ट्रेनिंग और हथियार खरीदने पर लगा दिया. बाकी जो कुछ बचा था उसे गाँव के पोस्ट ऑफिस में एम् आई एस कर रखा था. इन्टरेस्ट रेट की हालत देख रहे हो. दिनों-दिन घटता ही जा रहा है. आजकल तो खाने-पीने की तकलीफ हो रही है.

    बेटा, मेरी बात पर गौर करो और अलोक पुराणिक जी से माफ़ी मांगो. आख़िर कितने लेखक हैं जो एक डाकू को रास्ता दिखाते हैं? और हाँ, तुरंत पन्द्रह हज़ार का मनी आर्डर भेजो, गाँव के बनिया के यहाँ बहुत कर्जा हो गया है. अब तो नमक देने से भी इनकार करने लगा है.

    तुम्हारा पिता
    हरी सिंह

    शिवकुमार जी तो देख के ही ब्लॉग महिमा गाने लगे हैं.  

    Shiv Kumar Mishra, on February 23rd, 2008 at 6:55 pm Said:

    अलोक जी,

    सर ब्लॉग की ताकत का अंदाजा चला आज. आपकी पोस्ट क्या पब्लिश हुई, गब्बर, सांभा, कालिया तक आ पहुंचे टिपण्णी करने. और तो छोड़िये हरी सिंह जी तक आ पहुंचे.

    वाह. ये हुआ न असली ब्लॉग-महिमा.

    आप वहाँ टिप्पणी ना दे पायें हों तो यहाँ दे दें.

    बाल किशन जी की धमकी के बाद उनकी टिप्पणी भी यहाँ दी जा रही है. ;-)

  • balkishan, on February 23rd, 2008 at 1:34 pm Said:

    अरे भाई साब यंहा तो बहुत खतरा है.
    हम बाद मे मतलब होली के बाद कमेन्ट करेंगे.

  • और संजीत जी अभी आने ही वाले होंगे…धमकी देने तो उनको भी शामिल कर लेते हैं जी ;-)

  • Sanjeet Tripathi, on February 23rd, 2008 at 3:39 pm Said:

    धांसू आईडिया

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