स्वामी जी आजकल आमतौर पर नजर तो आते नहीं. वैसे भी जो स्वामी अमरीका में बैठकर पैसे पीटता है वो कम ही नजर आता है. :-) बहुत से स्वामी इसी लिये अमरीका का रुख करते हैं और वहीं के होकर रह जाते हैं तो ई वाली स्वामी कोनो अनौखे थोड़े हैं.

लेकिन अपने हैप्पी बर्थ डे बढ़ा सही वाला चितन किये हैं. पहिले तो हमहूं बोले दे “हैप्पी बर्थ-डे स्वामी जी”

फिर उसी बात को तनि आगे बढ़ायें.जो प्रशन आप उठाये रहिन वैसे तो ऊ बहुतैई बड़ा प्रशन है. ऊ पर तो कभी लिखबो करेंगे. अभी तो तो इतनो ही कहनो है कि इस प्रशन को सुनके तो गोस्वामी तुलसीदास जी भी घबरा गये.

एक बार लिखे हैं.

होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥

सब वही होने वाला है जो राम ने रचा है.

फिर कहते हैं.

करम प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करी, सो तस फल चाखा

अब जब गोस्वामी कनफुजिया गये तो ई-स्वामी तो कनफुजियायेंगे ही.

आप बतायें जी का सही का गलत.

 

ज्ञान जी ने अपनी पोस्ट में राबर्ट फ्रोस्ट की एक कविता का जिक्र किया. रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता मुझे भी बहुत प्रिय है. इसे टिप्पणी में ही चिपकाना चाह रहा था पर वहाँ टिप्पणी नहीं जा रही इसलिये इसे पोस्ट में ही दे रहा हूँ. इसका हिन्दी अनुवाद किसी के पास हो तो बतायें.

ROAD LESS TRAVELED

Two roads diverged in a yellow wood
And sorry I could not travel both
And be one traveler, long I stood
And looked down one as far as I could
To where it bent in the undergrowth

Then took the other as just as fair
And having perhaps the better claim
Because it was grassy and wanted wear
Though as for that, the passing there
Had worn them really about the same

And both that morning equally lay
In leaves no step had trodden black
Oh, I kept the first for another day!
Yet, knowing how way leads onto way
I doubted if I should ever come back

I shall be telling this with a sigh
Somewhere ages and ages hence
Two roads diverged in a wood
And I took the one less traveled by
And that has made all the difference

Robert Frost

मुझे लगता है कि मैं इस कविता से प्रेरणा लेकर अक्सर (हमेशा नहीं)  “रोड लैस ट्रेवल्ड” चुनता रहा हूँ… और मुझे अपेक्षित परिणाम भी मिले हैं.

 

जैसा मैने कहा था कि शनिवार का दिन पाठकों से संवाद और टिप्पणीचर्चा का है.तो मैं उपस्थित हूँ अपनी खिचड़ी पोस्ट लेकर.

सबसे पहले उन सभी सुधी पाठको का धन्यवाद जिन्होनें मुझे तरकश पुरस्कारों के लिये नामांकित किया. हालांकि नामांकन में साथ में अ वर्ग के प्रमुख हस्ताक्षरों अजदक,अभय,अनिल,अनामदास,अविनाश को ना देख यह लगा कि इस पुरस्कार का महत्व वैसे ही कम हो गया है और रही सही कसर फुरसतिया जी ने पूरी कर दी.. ईनाम का फतवा जारी करके. लेकिन मेरे लिये नामांकन भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. यह सही है कि हिन्द युग्म की एक तरफा लहर में मेरी भी जमानत जब्त हो गयी लेकिन फिर भी कुछ पाठक ऎसे हैं जिन्होने मुझे वोट किया. यदि मैं स्वयं का मत हटा दूँ तो 54 लोगों ने मुझे मत दिया.आपके मतों के लिये मैं तहेदिल से आप सभी का आभारी हूँ.

पिछ्ले दो हफ्तों से नियमित लिख पा रहा हूँ. इतनी ठंड में भी सुबह पांच बजे उठकर लिखना तकलीफदेह तो है ही लेकिन इस बात का संतोष है कि हर दिन पोस्ट कर पा रहा हूँ. मेरी मधुशाला वाली श्रंखला अगले सप्ताह समाप्त हो रही है. खोया पानी की पांच कहानियों में पहली कहानी भी इस रविवार समाप्त हो जायेगी.अब कुछ नया करने की इच्छा है. देखिये समय मिलता है तो कोई नयी श्रंखला प्रारम्भ करता हूँ.

इस हफ्ते मेरा मिर्ची शोध काफी हिट रहा. उसी पोस्ट पर विनय जी की टिप्पणी आयी.

आपका मिर्ची शोध अदभुत है
तीनो मिर्चियों पर आपके कुछ नोट्स मेरे पास रह गए हैं
इन्हे छिड़क कर परोसें.

यूस्ड इन : पहली किचन में, दूसरी जेहन में, तीसरी टशन में.
बेस्ट विद : पहली समोसे के साथ, दूसरी भरोसे के साथ, तीसरी पान के खोखे के पास.
सिम्बल : सी सी $$$, आई सी $$$, सी टी $$$
प्री-काशन : पहली लाल न हो, दूसरी से बवाल न हो, तीसरी बेताल न हो.
फिसिकल प्रापर्टी : गर्म साँसे, बेशर्म आँखें, नर्म बातें
रिसल्ट्स इन : (पहली से स्वाद, दूसरी से दिमाग, तीसरी से मिजाज़) गेट्स कम्पलीटली स्प्वाइल्ड.
मिर्ची आइडल : चाट वाला, करिश्मा कपूर, गटर मैन

दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला चल रहा है. पिछ्ले हफ्ते भी वहाँ गया था तो अजदक जी बोले एक बुद्धिमान गधा पुस्तक मेले में टहल रहा है.जब उन्हें पता चला कि हमें पता चल चुका है और हम खुश हो रहे हैं कि चलो इसी बहाने लोगों को यह तो पता चलेगा कि गधे भी किताब पढ़ते हैं तो उन्होने “गधा” हटाकर “पदा” कर दिया. पुस्तक मेले में मेरा आज या कल भी जाने का विचार है. क्या आप सुझा सकते हैं ..उन किताबों का नाम जो मुझे खरीदनी चाहिये…

 
नमस्कार!
मैं Ashley Layla , अन्तर-जाल व्यापार का विशेषज्ञ हूँ| मैं खोज यन्त्र संधान कर्ता भी हूँ | मैं इस क्षेत्र में गत 1 वर्षो से हूँ तथा इसके प्रत्येक गुण एवं दोष से भालीभाती परिचित हूँ| आपके किसी भी जिज्ञाषा को शांत करने में पूर्णतया समर्थ, मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ !
इन सब के अलावे मेरी कुछ रुचियाँ भी हैं जिनमें कविता लेखन तथा चुटकुले सामिल हैं..मेरे साथ आप इनका भी आनंद ले सकते हैं |
मेरा पता यह है
जीमेल :- workwithseo@gmail.com
याहू :- ram_sachin@yahoo.co.in
हाटमेल : – workwithseo@hotmail.com

 

ये परिचय है एक चोर का जिन्होने अभी अभी एक चिट्ठा शुरु किया और इस चिट्ठे पर सारी की सारी रचनाऎं चोरी की हैं. यहाँ तक की इन्होने चित्र का मूल लिंक भी मूल चिट्ठे पर रखा है. इसी का फायदा उठाकर मैने अपनी चिट्ठे पर चित्र बदल दिया तो इनकी पोस्ट भी बदल गयी. आप भी देखिये.

मूल चिट्ठा मूल लेखक-तिथि चोर का नाम -तिथि चोरी का माल
वो कहते नहीं क्यूं मोहब्बत है उनको |

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Wednesday, September 19, 2007

January 23, 2008 — workwithseo वो कहते नहीं क्यूं मोहब्बत है उनको…
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पारसी थियेटर, मुग़ले आज़म और माचिस की तीलियां

 

11Dec07

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December 31, 2007 — workwithseo पारसी थियेटर, मुग़ले आज़म और माचिस की तीलियां
क्रिसमस का इतिहास

 

December 24, 2007 December 30, 2007 — workwithseo क्रिसमस का इतिहास

 

मैं कभी अमरीका नहीं गया …हाँलाकि मेरे कई मित्र अभी अमरीका में हैं. वैसे मेरे पास भी कई ऑफर आये अमरीका जाने के (आई.टी. में यह कोई बड़ी बात नहीं है) लेकिन ना जाने क्यों अभी तक खुद को तैयार नहीं कर पाया इस के लिये.

अभी कुछ दिनों पहले एक मित्र से मुलाकात हुई जो अमरीका में रह चुके थे. उन्होने अमरीका के बारे में एक मजेदार बतायी. जिस प्रकार भारत में लेन ड्राइविंग होती है उसी प्रकार अमेरिका में भी होती है. लेकिन सामान्यत; भारत में यह निर्धारित नहीं है कि किस लेन में कौन चलेगा. लेकिन अमेरिका में एक लेन (शायद सबसे बांये वाली) ऎसी होती है जिसे पूल-कार लेन कहा जाता है. इसमें चलने वाले अपनी गाड़ी की स्पीड सामान्य से ज्यादा रख सकते हैं और आमतौर पर इसमें ट्रैफिक जाम भी नहीं लगता…. लेकिन इसमें वही गाड़ी चल सकती है जिसमें एक से ज्यादा लोग बैठे हों. इसके पीछे तर्क यह होता है कि आप ट्रैफिक को कम करने के लिये कार पूल का उपयोग करें तो जितने लोग आपकी पूल कार में बैठे हैं उतनी गाडियाँ सड़क पर कम चल रही हैं. …तो इस लेन में चलने के लिये जरूरी है कि आपके कार में एक से ज्यादा लोग बैठे हों.

इससे निबटने का तरीका भी अमरीका वालों ने बहुत खूब निकाला. वहाँ दुकानों में इस तरह कि डमी मॉडल (खिलोने) मिलते हैं जो देखने में बिल्कुल जीते जागते इंसान की तरह ही लगते हैं. लोग इनको खरीद के अपनी गाड़ी में बिठा लेते हैं और पूल-कार लेन में आराम से अधिक स्पीड में चलते हैं.  

carpool

यह दाढ़ी और चश्मा लगाये सज्जन सचमुच में नहीं हैं वरन एक खरीदे हुए मॉडल हैं.

(चित्र गूगल इमेज सर्च द्वारा)

इसी से जुड़ा हुआ एक किस्सा और सुनाया उन्होने. एक व्यक्ति हमेशा ट्रैफिक की वजह से ऑफिस में देरी से पहुचता था. पहले उसने सोचा कि वह भी इस तरह की डमी खरीद ले लेकिन फिर उसके दिमाग में एक आइडिया आया. वह अपने घर के पास वाली सड़क में एक बोर्ड लेकर खड़ा हो जाता जिसमें लिखा होता ” Today Traffic is bad. Either spend two hours or pay me $15 and get there in 15 minutes” [आज सड़क पूरी तरह जाम है. या तो इस जाम में दो घंटे फंसे रहो या फिर मुझे 15 डालर दो और 15 मिनट में ऑफिस पहुंचो ] 

कौन कहता है कि केवल भारतीय ही जुगाड़ू होते हैं?

 

हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास में पहले का बहुत महत्व रहा है. इसीलिये कोई ना कोई अपने आप को पहला साबित करने में जुटा है. किसी ने चलती ट्रेन से पहली पोस्ट लिखी तो कोई अस्पताल के वार्ड से पहली पोस्ट लिख रहा है.वैसे हमने भी एक पोस्ट चलती ट्रेन में रात को बारह बजे बाद लिखी थी लेकिन इसे चलती ट्रेन से पोस्ट नहीं कर पाया था और फिर उस समय पहले का महत्व मालूम भी ना था. लेकिन सोचा आज एक मौका है इसलिये इसे हाथ से क्यों जाने दें.

boarding-passतो ये रही फ्लाइट से लिखी हुई पोस्ट (पहली है या नहीं यह फैसला आप करें). यह फ्लाइट है इन्डियन एअरलाइंस की IC -201. कलकत्ता से दिल्ली जाने वाली यह फ्लाइट कलकत्ता से दिल्ली के बीच 1325 किमी की दूरी को तकरीबन 2 घंटा 15 मिनट में पूरी करती है.

ऊपर वाला हिस्सा तब लिखा था जब विमान उड़ा नही था. विमान परिचारिका कह रही थी कि आप लैपटॉप का प्रयोग विमान के उड़ने के बाद ही कर सकते हैं. मैने उससे कहा कि कोई जरुरी काम है तो वो फिर कुछ नहीं बोली. मेरे बगल में दो लोग बैठे हैं वो चाइनीज जैसे लग रहे हैं और शायद चाइनीज में बात कर रहे हैं उनमें से एक मेरे स्क्रीन को ध्यान से देख रहा है. कहीं वह हिन्दी पढ़ना जानता ना हो. :-) लगता तो नहीं क्योकि वो सिर्फ देख रहा है उसके चेहरे के भावों को परिवर्तन नहीं हुआ.अब शायद जलपान सेवा आरंभ होगी.

going-towards-planeसामान्यतया मैं यात्रा के दौरान किसी से बात नहीं करता लेकिन जलपान के दौराम मैने एक चाइनीज से बात करने की कोशिश की (इस पोस्ट के लिये). वे लोग हिन्दी नहीं जानते …ना ही अच्छी अंग्रेजी बोल पा रहे हैं. उनसे बात करने से पता लगा कि वो दिल्ली में ऑटो एक्स्पो देखने जा रहे हैं. वो सीधे कलकत्ता आये थे क्योंकि उनके कुछ मित्र कलकत्ता में रहते हैं. मैने एक चायनीज से पूछा कि उनको भारत कैसा लगा. उसका कहना था “ब्यूतीफूल बत क्राउडेड” . मैने उनसे पूछा कि चीन की जनसंख्या भारत से ज्यादा है तो क्या वहाँ ज्यादा भीड़भाड़ नहीं है. उसका कहना था कि नहीं वहाँ सड़कें ज्यादा चौड़ी हैं और सरकार लोगों का अच्छा ध्यान रखती है. जलपान में उसने शाकाहारी खाना लोया.उसने यह भी बताया कि उसे भारतीय खाना पसंद हैं.

अभी विमान के कप्तान ने घोषणा की है कि हम 36000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे हैं.बाहर का तापमान शून्य से 50 डिग्री कम है. विमान की गति 700 किमी/घंटा है. कुछ दूरी पर विपरीत दिशा से हवायें 200 किमी/घंटा से आ रही हैं इसलिये विमान निर्धारित समय से 15 मिनट की देरी से दिल्ली पहुंचेगा. कलकत्ता का तापमान 27 डिग्री सैंटीग्रेड था. दिल्ली का तापमान 17 डिग्री सैंटीग्रेड होने की संभावना है.

विमान अब दिल्ली पहुंचने वाला है. मेरे सामने की सीट पर एक महिला बैठी है जो शायद बंगाली हैं क्योकि वो “आनन्दलोक” ( एक बंगला पत्रिका”) पढ़ रही थीं. उन्होने अपने बैग से एक छोटा सा शीशा निकाला है और वो अपने चेहरे को देख रही हैं. फिर उंन्होने एक लिपिस्टिक निकाली है और वो होंठों पर लिपिस्टिक लगा रही हैं. एक काली पैंसिल भी निकाली. उससे भी कुछ कर रही है. अब यह पलकों पर लगा रही हैं या आंखों पर समझ नहीं आ रहा. उनके बैग पर कुछ लिखा हुआ है …मैं पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ…. “शाश्वती भट्टाचार्य” ….शायद नाम है उनका.

==============================================

ऊपर वाली पोस्ट कल (14 जनवरी) फ्लाइट में लिखी थी. लेकिन उसे चित्र लगाने के बाद पोस्ट अभी (15 जनवरी) कर रहा हूँ.

प्रत्यक्षा जी ने कहा : चित्र कहाँ है? भारत के विमानों में चित्र लेने की अनुमति नहीं होती. फिर भी चुंकि पोस्ट लिखनी थी तो ….

insiade-ic-201 luggage-cabin waiting-lounge
सीट के आगे लगा चार्ट ऊपर लगे सामान कक्ष प्रतीक्षा स्थल (लाऊंज)

 

चार जनवरी को शिव कुमार जी की एक पोस्ट आयी थी रीढ़हीन समाज निकम्मी सरकार और उससे भी निकम्मी पुलिस डिजर्व करता है जिस पर प्रतिक्रिया देते हुए रंजना जी ने कहा था.

Ranjana said…

शिव जी,आपकी लेख का अन्तिम पारा पढ़ कर लगा जैसे अपने अन्दर खौल रहे भावों को शब्द मिल गया.एक दम सही लिखा.किसी भी एक को पूरा दोष नही दे सकते.वो लड़कियां जो अधनंगी सी इन स्थानों पर इस तरह जाती हैं ,वो पुरूष वर्ग जो इस तरह के मौकों के तलाश मे तरसती भटकती है ,वो पुलिस जो रीढ़ विहीन और वर्दीधारी डाकू हैं और वो मीडिया जो बिकाऊ ख़बरों के दूकान चलने के सिवाय अपना कोई उत्तरदायित्व नही मानती.ऐसे समाज मी किस से क्या अपेक्षा की जा सकती है.बस रेलवे वाली उस चेतावनी ‘यात्री अपने समान की सुरक्षा स्वयं करें’ की तर्ज पर ”व्यक्ति अपने धर्म,कर्म,जान और माल की सुरक्षा स्वयं करें” धरना को मानते हुए भगवान् का नाम लिए जिए जायें,यही कर सकते हैं.

इस पर घुघुती जी व रचना जी ने आपत्ति की थी.

ghughuti said…

वाह रंजना जी ! मुझे आश्चर्य है कि अब तक आप जैसे सोच वालों ने ऐसे कानून क्यों न बनवा डाले कि अमुक वस्त्र पहनने या न पहनने वाली स्त्रियों लड़कियों का बलात्कार करना मैन्डेटरी है । वैसे शायद आप यह नहीं जानती कि जो वस्त्र हम बड़े गर्व से हमारी संस्कृति का हिस्सा मान पहनते हैं , उसमें जो पेट पीठ दिखता है वह बहुत से समाजों में नग्नता ही माना जाता है । क्यों न हमारे साथ भी वही किया जाए जो इन स्त्रियों के साथ किया गया ?
घुघूती बासूती

अगले दिन रंजना जी ने अपनी एक विस्तृत टिप्पणी दी.जो शायद बहुत लोगों की नजर से नहीं गुजरी. मैने भी इसे आज ही पढ़ा. इसलिये उस टिप्पणी को यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

Ranjana said…

क्षमाप्रार्थी हूँ उन समस्त सुधि जानो से जिन्हें भी मेरे वाक्यांश से कष्ट पहुँचा भले प्रतिक्रिया दी हो या न दी हो.मेरा परम कर्तव्य बनता है कि मैं स्पष्टीकरण दूँ.
वर्तमान समय मी अधिकांश खबरी चैनल जिस तरह के और जिस तरह से खबरें परोसते हैं,अक्सर ही हिम्मत नही पड़ती मुख्य समाचार को विस्तार मे देखने की.सो उक्त घटना भी चलते फिरते कानो मे इसी रूप मे आई कि ” ३१ दिसम्बर की रात……….. मनचलों द्वारा सामूहिक छेड़खानी की सनसनी दास्तान……..” इसके आगे न कुछ सुनने जानने की जरुरात समझी न ही इस और कोई उपक्रम किया.प्रतिक्रिया भी किसी घटना या लेख विशेष पर नही किया.नाम से जाहिर है,एक स्त्री हूँ और सचमुच नही मानती कि बलात्कार और दुर्व्यवहार केवल उन्ही स्त्रियों के साथ होता है जो कम वस्त्रों से सुस्सज्जित होने मे विश्वास रखती हैं या इन घटनाओं कि जिम्मेदार स्त्रियाँ होती हैं.यह तो नारी का वह दुर्भाग्य है जो युगों से सीता द्रौपदी से लेकर स्त्री शरीर होने भर से किसी न किसी रूप मे हर स्त्री को ढोनी और भोगनी पड़ती है. किंचित यह पीड़ा,विक्षोभ,असमर्थता ही उस रूप मे फूट पड़ती है जब स्त्री स्वयं को ही कोसने लगती है कि जब तुम्हारे शरीर मे वह बल नही कि अपने बल पर अपनी शील और मर्यादा कि रक्षा करने मे यथेष्ट सक्षम हो सको तो उस पुरूष समाज से क्या अपेक्षा कर सकती हो जो कभी आततायी बनकर तुम्हे अपमानित करता है,कभी दूर खड़ा तमाशबीन बना उसका आनंद लेता है और कभी निर्विकार भाव से यह मानते हुए कि पीड़ित उसका सगा नही और रक्षा करने को उद्धत होना उसका कर्तब्य नही मान लेता है.उनके बारे मे मुझे कुछ नही कहना जो रिश्तेदार होते हुए भी स्वयं को हर प्रकार से मर्यदामुक्त मानता है.इस समाज का ही हिस्सा,उसकी इकाई अपराधी,मूक दर्शक और रक्षक तीनो है.
एक अत्यन्त साधारण साहित्यप्रेमी और पाठक भर हूँ,पर कहना चाहूंगी कि यदि किसी के नाम का परचम ब्लॉग जगत मे ,साहित्य जगत मे या समाज मे रूप ,गुन,धन ,मान,ऐश्वर्यशाली व्यक्ति के रूप मे नही फहरा रहा है तो इसका यह मतलब नही हुआ कि समाज समुदाय मे व्याप्त अव्यवस्था,विसंगति या विभत्सता को देख वह विचलित नही होता होगा,उसका खून नही खौलता होगा.एक साधारण मनुष्य और लंबे अनुभवों को देख भोग चुकी स्त्री हूँ.संवेदनाएं भी रखती हूँ और समझ भी.
भेद तो इश्वर ने संरचना से लेकर सामर्थ्य तक मे कर दिया है.स्त्री को मन धैर्य ममत्व कि असीमित गुणों से सम्रिध्ध कर और पुरुषों को भी अन्य गुणों के साथ शारीरिक बल देकर.मेरे हिसाब से स्त्री इस धरा पर असीमित सामर्थ्य से विभूषित इश्वर कि सर्वश्रेष्ठ रचना है.नादुनियाँ कि समस्त स्त्रियाँ सच्चारित्र होती हैं न सभी पुरूष दुशचरित्र.. पर अन्तर यह है कि कुसंस्कार और अंहकार से ग्रसित पुरूष जब स्त्री को भोग कि वस्तु मान अपमानित करने को उद्धत हो जाता है तो बहुत कम स्त्रियाँ अपने शील और मर्यादा कि रक्षा मे सफल हो पाती हैं.हर व्यक्ति यदि अपनी मर्यादा और कर्तब्य का पालन ही करने लगे तो फ़िर समस्या ही क्या रह जायेगी.पर हम इसकी कामना और प्राथना भर कर सकते हैं.तबतक अपनी रक्षा के लिए यह मानकर चलना पड़ेगा कि सभ्य सुसंस्कृत सक्षम और प्रगतिशील दिखने कि होड़ हम विचार और कर्म क्षेत्र मे आगे बढ़कर तो कर सकती हैं पर जिस किसी भी परिधान और व्यवहार से उनकी पाशविक वृत्ति उभर सकती है,हमे केवल भोग्य रूप मे देखने को उत्सुक हो सकती है ,उस से परहेज करने मे कोई बुराई नही है.
क्या आप नही मानते कि हम मे से ही अधिकांश युवा और आकर्षक दिखने कि होड़ मे फंसी नारी ख़ुद को ” हाट ” और ”सेक्सी” कहलाने मे गर्व का अनुभव करती हैं.आर्थिक स्वतंत्रता,पारिवारिक उत्तरदायित्व से मुक्ति से लेकर पुरूष समाज मे व्याप्त मद्यपान,धूम्रपान या इस तरह के बहुत सारे बुराइयों को अपनाना ही पुरुषों कि बराबरी करने का पर्याय मानती हैं.ये स्त्रियाँ समाज और संस्कृति को किस दिशा मे लिए जा रही हैं??किसी भी जाति,धर्म ,देश,भाषा,काल और संस्कृति की अच्छी बातें अपना कर सम्रिध्ध और प्रगतिशील नही रह सकती हम?? .चाहे पृथ्वी हो प्रकृति हो या नारी हो दोहन सदैव से ही स्त्री का होता आया है और होता रहेगा,क्योंकि देने का जो सामर्थ्य इसके पास है उसका दोहन हर कोई करना चाहता है,मौका गंवाना नही चाहता.पर इसी के मध्य पहले स्वयं को समझना,पहचानना और इसी समाज मे सबके बीच रह, अपनी अस्मिता की रक्षा का मार्ग हमे ख़ुद ही निकालना पड़ेगा.व्यक्ति या व्यवस्था को गलियां दे कोस कर जी हल्का किया जा सकता है पर उन सवालों से नही बचा जा सकता जो स्त्रियों को स्वयं से पूछना है.

 

नये साल में कुछ संकल्प लेने का प्रचलन आजकल जोरों पर है. शास्त्री जी ने जब अपने नव-वर्ष संकल्प ! बताये तो लगा कि ऎसे संकल्पों को सार्वजनिक करने से शायद मानसिक प्रेरणा मिले उन संकल्पों को पूरा करने की इसलिये मैं भी अपने संकल्प आपके साथ बाट रहा हूँ.

व्यक्तिगत/पारिवारिक संकल्प

1. अपने वजन को कम से कम आठ किलो कम करना है : अभी वजन 91 किग्रा है.

2. हिन्दी की कम से कम 30 नयी किताबें पढ़नी हैं.

3. पूरे वर्ष में कम से कम 15 दिन घर का खाना बनाने में पत्नी की सहायता करनी है.

4. कम से कम 100 नये लोगों को जानना है.

चिट्ठाकारी संबंधी संकल्प

1. मधुशाला पर अपनी श्रंखला जनवरी माह में ही पूरी करनी है.ऎसी ही कम से कम एक श्रंखला और शुरु करनी है.

2. खोया पानी उपन्यास अप्रेल तक अपने चिट्ठे पर छापना है.

3. वर्ष में कम से कम 200 नयी पोस्ट डालनी हैं जिसमें 80 पोस्ट व्य़ंग्यात्मक हों.

4. पॉडकास्टिंग करनी है. 5. पढ़ी हुई नयी किताबों में से कम से कम 10 के बारे में पोस्ट लिखनी है.

6. सामुहिक चिट्ठों जैसे कबाड़खाना , रेडियोनामा,हिंदी किताबों का कोना  पर कम से कम एक पोस्ट प्रतिमाह डालनी है.

7. कम से कम पांच टिप्पणी रोज करनी हैं जिनमें एक नये चिट्ठाकार पर हो.

8. किसी भी विवाद से दूर रहना है.

इसके अलावा और भी कई चीजें सोची हैं लेकिन उन्हें संकल्प के तौर पर नहीं ले रहा हूँ. आपकी भी मेरे लेखन से कोई अपेक्षाऎं हों तो टिप्पणीयों में बतायें.

चलिये तो शुरु हो जाते हैं आज से ही.

 

आओ अब इस वर्ष को विदा कर ही दें. हर साल जाते समय कुछ यादें छोड़ जाता है ..कुछ सपने ..जो सपने ही रह जाते हैं.. कुछ सुनहली यादें..कुछ नये रिश्ते ..कुछ नये मित्र ..कुछ पुरानी शत्रुताऎं…सब कुछ पुराना सा लगने लगता है…नया वर्ष ..मन को समझाने के लिये आ जाता है..कल से नया साल है ..कुछ नया करो…नये संकल्प लो.. पुराने जो लिये थे उनका क्या…?? लेकिन मन को समझाते हैं… नहीं अब अगले साल तो ये करेंगे ही …चलिये कुछ नये संकल्प लें नये साल में…. कोशिश करें कि शायद इस बार पूरा कर पायें उन्हें….

आप सभी को नये वर्ष की शुभकामनाऎं….

(1)

नया साल आये…नया ख्याल आये..
मुझे रास्ता दिखाने कितने सवाल आये

मेरे शहर में कितने ,नये फ्लाईओवर बने हैं..
तेरे शहर से अब तो  तेरा हाल चाल आये..

वो रास्ता अब जल्दी कटने लगा तभी तो
मेरे दिमाग में ये  कैसे बबाल आये

मैं टौल टैक्स देकर खुशियां खरीदता हूँ
ट्रैफिक से बचके जल्दी ऑफिस पहुंचता हूँ
चेहरे पे फिर भी मेरे कैसा मलाल आये
मुझे रास्ता दिखाने कितने सवाल आये

फिर से यही कहूँगा शुभ हो ये नूतन वर्ष भी
उस बासी कड़ी में शायद फिर से उबाल आये

(2)

मच्छर …
तुम खून चूसते रहे साल भर
देते रहे नये नये रोग
अब तो साल खतम हो रहा है
और तुम बांकी मच्छरों के साथ
पार्टी मना रहे हो
इस शहर से दूर
तुम आज खूब पियो
खूब नाचो
पर फिर से आ जाओ
इस शहर में
उसी गंदगी में पलो बढ़ो
और नये साल के लिये
संकल्प लो
कि इस बार थोड़ा ज्यादा खून चूसोगे
क्योंकि
देश प्रगति कर रहा है…

 

आज सुबह जब पोस्ट लिखी (सुबह सुबह चार बजे उठ कर) तो यह अन्दाजा नहीं था कि यह एक बहस का रूप ले लेगी.हाँलाकि मंशा तो थी ही कि एक बहस हो. लेकिन आशा के विपरीत लोग आये और उन्होने बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने विचार लिखे. कुछ लोगों ने जहाँ मेरी सोच से सहमति दिखायी वहीं अनुनाद जी ने और कुछ अन्य ने खुल कर असहमति दिखायी. मैं इस असहमति का स्वागत करता हूँ. मैं मानता हूँ कि हमारे लक्ष्य एक ही हैं …हाँ मार्ग अलग अलग. मैं भी यही चाहता हूँ कि हमारे देश का सारा तंत्र हिन्दी में चले लेकिन मेरे चाहने से कुछ नहीं होने वाला इसलिये जो परेशानी मैने झेली है कम से कम आने वाली पीढियां वह परेशानियाँ ना झेलें. इसलिये मेरा मानना अभी भी यही है कि वर्तमान परिस्थितियों में बिना अंग्रेजी सीखे अंग्रेजी का खात्मा नहीं किया जा सकता.

अनुनाद जी के विचारों से भी आप परिचित हों.जो उन्होने पिछ्ली पोस्ट पर दिये थे.

आपकी ये दोनो सोच

१) कि बारहवीं के बाद विज्ञान की पढ़ाई अंग्रेजी में इसलिये होती है कि हिन्दी में किताबें नहीं हैं;

२) कि हिन्दी में किताबें उपलब्ध कराने में पचास वर्ष और लग जायेंगे

दोनो से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता। लगता है कि आप क्रमश:-विकास-प्रक्रिया (इवोलूशन) के मूल कांसेप्ट को ही नहीं समझते हैं।

अंग्रेजी में किताबें नहीं हैं क्योंकि उनकी मांग नहीं है (अर्थशास्त्र का सरल सिद्धान्त यहाँ काम कर रहा है) ; मांग इसलिये नहीं है कि हिन्दी के बजाय अंग्रेजी में पढ़ना अनिवार्य कर रखा गया है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि हिन्दी में विषयों का पढ़ना अनिवार्य कर दिया जाय तो एक महीने के भीतर किसी भी विषय की पुस्तकें बाजार में होंगी।

आपका यह भी मानना कि हिन्दी के वजह से बच्चे पिछड़ जाते हैं, तथ्यों से दूर है। मैने भी बारहवीं तक पूर्णत: हिन्दी में पढ़ाई की। मुझे कभी भी नही लगा कि मै हिन्दी के कारण कभी पिछड़ गया।

[ मुझे बार बार यह लगता रहा है कि मैं हिन्दी के कारण पिछ्ड़ गया ]

कोई भी हिन्दी के कारण पिछड़ता नहीं है, अंग्रेजी के कारण पिछड़ता है। और इसी दुराचार का विरोध होना चाहिये। इस देश को आगे बढ़ाना है तो व्यक्ति के विषय के ज्ञान की परीक्षा ली जाय, न कि अंग्रेजी के ज्ञान की परीक्षा, जो कि आज हो रही है।

अंग्रेजी की पढ़ाई एक भाषा के रूप में करायी जाय ; जिसको जरूरी हो उसी को पढ़ायी जाय (किसी को राजदूत के रूप में रूस या चीन जाना है तो उसके लिये रूसी या चीनी महत्वपूर्ण है, न कि अंग्रेजी); चापरासी पद के लिये अंग्रेजी, क्लर्क के लिये अंग्रेजी, सैनिक के लिये अंग्रेजी… क्यों जरूरी है? क्या आपने सोचा है कि पूरा देश ज्ञान अर्जन के बजाय डिक्शनरी का रट्टा क्यों लगा रहा है? इसमें कितना करोड़ मानव-घंटा बर्बाद हो रहा है? कुछ शब्द आ गये तो ग्रामर का चक्कर, ग्रामर आ गया तो ‘फर्राटे अंग्रेजी बोलने’ का चक्कर, फर्राटे अंग्रेजी भी बोलना आ गया तो अमेरिकन या ब्रिटिश एक्सेंट में बोलने का चक्कर.. ये दुष्चक्र है जिसमें पूरे देश को झोंक दिया गया है।

और हाँ, यदि किसी ने अंग्रेजी के बल पर नौकरी हासिल कर ली (जैसा कि पूरे देश में हो रहा है) तो इसको देश का विकास के रूप में समझने की भूल मत कीजिये। इसका केवल इतना अर्थ है कि किसी ने किसी दूसरे का हक गलत बहाने (अंग्रेजी के ज्ञान) के कारण छीन लिया। विकास तब होता है जब इन्नोवेशन होता है; नागरिक विभिन्न छेत्रों में रचनात्मकता से भरपूर होते हैं। दूसरे देश के लोगों से पहले कुछ नया कर लिया जाता है आदि। और ये सब तभी सम्भव है जब लोग अपनी भाषा में सोचें, पढ़े, विचार-विमर्श करें। विदेशी भाषा (अंग्रेजी) में होते हुए हजारों सेमिनार मैने देखे हैं; लोग विचार-विनिमय के बजाय प्रश्न पूछने और उत्तर देने से भागते हुए नजर आते हैं। ऐसे सेमिनारों से खाक फायदा होगा?

इस देश को अंग्रेजी की गुलामी करते करीब दो सौ साल हो गये। किसी दूसरे देश से तुलना करते हुए विकास के आंकड़े तो बताइये। केवल रटे-रटाये मुहावरे दोहराने से काम न चलाइये।

आशा है आप लोग इस बहस को जारी रखेगें.

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