पिछली पोस्ट से शायद यह लगा कि मैं कोई हिन्दी-अंग्रेजी विवाद उत्पन्न करना चाहता हूँ जो कि बकौल ज्ञान जी हिन्दी वालों का प्रिय शगल रहा है. लेकिन मेरा लक्ष्य यह नहीं था.मैं तो अपने अनुभव आपसे बांटना चाहता था.मैं अग्रेजी का विरोध नहीं करता बल्कि मैं तो अंग्रेजी की वकालत करता हूँ और कहता हूँ कि आज कि वर्तमान परिस्थितियों में बिन अंग्रेजी सब सून.

अधिकतर हम लोग केवल समस्या की बात करते हैं समाधान की नहीं. समस्या तो हम सब जानते ही हैं लेकिन आज की परिस्थिति में इसका समाधान क्या है. मेरे विचार से हमें दो मुँही रणनीति ( Two Pronged Strategy) से काम करना चाहिये. 1. अंग्रेजी को अनिवार्य करें और 2. हिन्दी को बढ़ावा दें. आपको मेरी बात में विरोधाभास लग रहा होगा. आइये समझते हैं इसे.

अंग्रेजी को अनिवार्य करें : आज के युग में अंग्रेजी के बिना काम नहीं किया जा सकता. यदि आप उच्च शिक्षा की बात करें तो वहाँ अधिकतर किताबें हिन्दी में उपलब्ध नहीं है. इसलिये वर्तमान परिस्थितियों में अंग्रेजी के बिना काम किया जाना मुश्किल है. तो अंग्रेजी तो अनिवार्य है ही. और यह बात हम सभी जानते हैं इसीलिये जिसके पास पैसा है वो अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलवाता है. जो गरीब है वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजता है. ऎसे में अंग्रेजी अमीर की है हिन्दी गरीब की. इसलिये गरीब गरीब ही बना रहता है और अमीर और अमीर होता जाता है.यदि हम सरकारी स्कूलों में भी अग्रेजी अनिवार्य कर दें तो हम काफी हद तक यह खाई पाट सकते हैं. यही भाषा का साम्यवाद है.

हिन्दी को बढ़ावा दें: आज हिन्दी में समस्या यह है हम हिन्दी हिन्दी का नारा तो लगाते हैं लेकिन हमारा सारा काम होता है अग्रेजी में. उच्च शिक्षा के लिये आज हिन्दी में किताबें उपलब्ध नहीं हैं और हम इसे सरकार की गलती मान कर चुप बैठ जाते हैं.यदि हम अंग्रेजी को अनिवार्य कर दें तो हमारे पास ऎसे लोग बहुतायत में होंगे जो दोनों भाषाऎं जानते होंगे तब बहुत सारा अनुवाद हिन्दी में किया जा सकेगा.विश्व में भारत आज एक बहुत बड़ा बाजार है. हिन्दी को बाजार की भाषा बनायें. जब हिन्दी समाचार बिकते हैं, हिन्दी सीरियल बिकते हैं, हिन्दी फिल्मे बिकती है तो हिन्दी भी बिकाउ भाषा होगी. तब लोगों की रुचि भी हिन्दी में बढेगी.

कुछ और बिन्दु हैं जिन पर हमें विचार करना होगा.

1. अंग्रेजी बोलना ना ही गुलामी का परिचायक है ना ही अंग्रेजी बोलने वाला श्रेष्ठ है.

2. हिन्दी बोलने वाला ना तो किसी मायने में हीन है ना ही हिन्दी में काम करना देशभक्ति ही है.

3. हिन्दी का समर्थन अंग्रेजी का विरोध नहीं और ना ही अंग्रेजी का समर्थन हिन्दी का विरोध है.

4. आप ना तो हिन्दी बोलने में संकोच करें ना ही अंग्रेजी बोलकर अपने को श्रेष्ठ माने.

5. अंग्रेजी बोलने में शंर्म ना करें.यह ना सोचें कि आप कुछ गलत बोल देंगे.

6. सब कुछ सरकार पर ना छोड़े. अपने स्तर पर प्रयास करें.अनुवाद ज्यादा से ज्यादा हों. उसके लिये जरूरत है कि दोनों भाषाओं के जानकार बढ़ें.

7. ग्राही बने. दूसरी भाषा के शब्दों को अपनायें.हर शब्द का हिन्दी अनुवाद ढूंढने की कोशिश ना करें. 

8. हिन्दी का बाजार बनायें.

9. व्याकरण पर ज्यादा ध्यान ना देकर संप्रेषण पर ध्यान दें.

10. शब्दों को मरने से बचायें. जितना हो सके अपनी भाषा के पुराने शब्द ढूंढें और उनको प्रयोग करें.

11. यह समझ लें कि आप हिन्दी में काम कर रहे हैं तो हिन्दी की सेवा नहीं कर रहे हैं ना ही आप अतिरिक्त रूप से देश भक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं.

12. अपनी हीन भावना से लड़ें.

13. भाषा को विवाद का विषय ना मान कर संप्रेषण का माध्यम मानें और जितनी अधिक भाषाऎं सीख सकें सीखें.

और अंत में आलोक जी ने जो कहा.

14. सही गलत अंगरेजी की चिंता ना करें, जैसी अंगरेजी अधिकांश भारतवासी बोलेंगे, वही सही मानी जायेगी। अंगरेजी अब एक भारतीय भाषा है, जो ब्रिटेन वाले भी बोल लेते हैं। पचास करोड़ भारतवासी जैसी अंगरेजी बोलेंगे, वही मानक हो जायेगी।

तो ये तो थे मेरे कुछ बिन्दु जो हमें समाधान की ओर ले जा सकते हैं.

अंत में क्या आप बता सकते है “घी (ghee)” की अंग्रेजी क्या है? Confused

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अंग्रेजी व हीन भावना

 

जब मैने पिछ्ला लेख लिखा था तब कोई इरादा नहीं था कि मैं कोई विवाद खड़ा करूं लेकिन ना जाने कुछ लोगों को वो पोस्ट विवादगर्भा लगी. खैर जाने दीजिये आप तो मेरी कहानी सुनिये जिसका वादा मैने अपनी पोस्ट में किया था. बचपन से अंग्रेजी ना जानना आपको कदम कदम पर परेशान करता है. जब मैं निचली कक्षाओं में था यानि कक्षा सात-आठ में तब कई मित्र ऎसे थे जो कक्षा पांच तक अंग्रेजी माध्यम से पढकर आये थे. उनके घर में अंग्रेजी माहौल भी था. यानि उनके माता पिता भी अंग्रेजी जानते थे.घर में अंग्रेजी अखबार आता ..अंग्रेजी पत्रिकाऎं आती.वो लोग अंग्रेजी गाने भी सुनते. तो कई बार बातों बातों में वो अंग्रेजी से संबंधित किसी बात की चर्चा करते तो मुझे कुछ भी समझ नहीं आता. वो लोग “हम्पटी डम्पटी सैट ऑन ऎ वॉल” या “बाबा बाबा ब्लैक शीप” जैसी पोयम की चर्चा करते तो वो सारी बातें अपने सर के ऊपर से निकल जाती. हम तो “चंदा मामा दूर के” या “ढोल बजाता भालू आया ढम ढम ढम” जैसी बाल कविताऎं जानते थे लेकिन उनकी चर्चा ही नहीं होती. उस समय मन को चोट लगती और एक हीन भावना का अहसास होता.

बचपन से ही लगा कि अपनी अंग्रेजी सुधारनी चाहिये.लेकिन सुधारें तो कैसे? घर में तो कोई खास अंग्रेजी जानता नहीं था. अंग्रेजी को सुधारने के लिये लोगों ने सलाह दी कि अंग्रेजी न्यूजपेपर पढ़ो. उसके ऎडिटोरियल पढो. लोगों की सलाह पर सप्ताह में एक बार अंग्रेजी समाचार पत्र भी लेना प्रारम्भ किया. लेकिन पूरे सप्ताह समाचार या ऎडिटोरियल पढ़ना या समझना तो दूर किसी एक लेख को लेकर ही लगे रहते. उसके कठिन शब्दों का डिक्सनरी से अर्थ निकाल कर एक कॉपी में नोट करते रहते.आधे अर्थ मिलते आधे नहीं.जो शब्द मिलते भी उसके भी तीन-चार अर्थ होते.तो यह समझ में नहीं आता कि कौन सा अर्थ कहाँ फिट बैठेगा. इसलिये आधी बातें समझ में आती आधी नहीं. हुआ यह कि इन शब्दों से तीन चार कॉपियाँ तो भर गयीं लेकिन अंग्रेजी ना सुधरनी थी ना सुधरी. 

फिर किसी ने सलाह दी कि “रेन एंड मार्टिन” की ग्रामर पढो. वह किताब भी उस छोटे शहर में नहीं मिली. किसी तरह उसे अन्य शहर से मंगवाया गया. मुझे अभी भी याद है लाल रंग के कवर में वह चमकीले कवर वाली किताब. वह मिली तो लगा अब तो सारी मुरादें पूरी हो जायेंगी और हम भी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगेंगें. लेकिन उसे पढने से भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ. ग्रामर के तो कई सारे नियम पता चल गये लेकिन अंग्रेजी बोलने समझने में कोई फरक नहीं पढ़ा उलटा हुआ यह कि अब अंग्रेजी में कुछ भी लिखने या बोलने से पहले यह सोचना पड़ता कि यह किस टैंस में हैं. यहाँ पर कौन सा वर्व है …कौन सा नाउन. तब लगा कि अंग्रेजी सचमुच बहुत कठिन है. अंग्रेजी बोलने वाले सारे लोग मुझे महान व भाग्यवान नजर आने लगे. मुझे लगने लगा कि शायद मैं कभी भी अंग्रेजी  लिख या बोल नहीं पाउंगा.

उन दिनों इंजीनियरिंग के लिये प्रवेश परीक्षाऎं अंग्रेजी में ही होती थीं.तब आज की तरह गली गली में इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं थे. आई.आई.टी, रुड़की और एम.एन.आर. इन तीन परीक्षाओं में से किसी को पास करना इंजीनियरिंग में जाने वालों के लिये स्वप्न हुआ करता था. हमने भी यह तीनों परीक्षाऎं दी बारहवीं के बाद. उस समय तीनों अंग्रेजी में ही थी. और हुआ यह कि मैं इन तीनों में से किसी में भी पास नहीं हो पाया. इधर उसी साल बी.एस.सी में भी ऎडमीशन लिया था. लेकिन ध्यान तो सारा इंजीनियरिंग में था और फिर बी.एस.सी में भी अंग्रेजी में ही सब कुछ होना था. नतीजा यह हुआ कि जीवन में पहली बार फेल हो गया बी.एस.सी में .अगले साल सौभाग्य से एम.एन.आर की परीक्षा हिन्दी व अंग्रेजी दोनों में हुई. मैने हिन्दी माध्यम चुना और उसी वर्ष मैने उसे पास कर लिया और मेरा सलेक्सन इंजीनियरिंग में हो गया था.   

चलिये एक किस्सा और. इंजीनियरिंग में काफी हद तक अंग्रेजी ठीक ठाक हो गयी. अब अंग्रेजी समझ आने लगी. लिखना भी ठीक ठाक सा हो गया.( हालांकि इसके लिये काफी मेहनत करनी पड़ी पर वह कभी और….). लेकिन बोलने में अभी भी कई बार सोचना पड़ता. फायनल ईयर में कैम्पस के लिये कई कंपनियाँ आई. उस समय वोल्टाज कंपनी में नौकरी मिलना सौभाग्य माना जाता था. क्योकि उनकी चयन प्रक्रिया काफी लंबी होती थी. वो लोग दो बार पहले लिखित परीक्षा लेते उसके बाद साक्षात्कार होते. दोनों लिखित परीक्षाओं को मैने पास कर लिया. अब बारी साक्षात्कार की थी. मैं टाई वाई लगा के तैयार था. साक्षात्कार में पहुंचा तो अंग्रेजी में साक्षात्कार शुरु हुआ. शुरु की कई चीजें तो कई बार शीशे के सामने खड़े होकर रटी हुई थी तो वो तो फटाफट बता दीं. लेकिन जब बात आगे बढ़ीं तो मैने अटकना चालू कर दिया. उसी अटकन भटकन में सारी बातें भूलता गया. मैने उनसे हिन्दी में बोलने की इजाजत भी मांगी जिसे उन्होने मना कर दिया. किसी तरह से साक्षात्कार समाप्त हुआ. मैने परिणाम की प्रतीक्षा भी नहीं की. मैं सीधा हॉस्टल आ गया और अपने कमरे को बंद कर रोने लगा. उस दिन फिर मुझे अहसास हुआ कि अंग्रेजी ना जानने की कितनी बड़ी सजा मैं भुगत रहा हूँ.

आज मैं आराम से अंग्रेजी लिख,बोल सकता हूँ लेकिन इस अंग्रेजी की वजह से सब कुछ जानते हुए भी कितनी बार मुझे नीचा देखना पड़ा यह मैं ही जानता हूँ. मैने तो उन सब परिस्थितियों का मुकाबला कर लिया लेकिन कितने ही ऎसे लोग होंगे जो अंग्रेजी ना जानने की हीन भावना के कारण आगे ही नहीं बढ़ पाते होंगे.

अगले लेख में मैं अपने विचार रखुंगा मेरे विचार में इसका समाधान क्या. अभी तो बहुत पका दिया ना. खैर कोई नहीं लिखते लिखते बहुत कुछ लिख गया.  

 

आप को लग रहा होगा कि मैं क्या बकवास कर रहा हूँ…. हिन्दी चिट्ठा लिखता हूँ लेकिन अंग्रेजी की वकालत कर रहा हूँ. लेकिन नहीं जी … मैं ऎसा सोच समझ कर कह रहा हूँ. कारण है कि हमारे महान देश भारत में कोई भी काम अंग्रेजी के बिना नहीं होता. किसी भी प्राइवेट कंपनी के कार्यालय में जायें आपको सारे लोग अंग्रेजी में ही काम करते मिल जायेंगें.

कल एक सज्जन से इसी विषय पर बातचीत हो रही थी. उनका कहना था कि सॉफ्टवेयर और काल सैंटर के क्षेत्र में हम इतने आगे इसलिये है क्योकि हम अच्छी अंग्रेजी जानते हैं. उनका यह भी कहना था कि अंग्रेजी के बिना कोई भी तकनीकी पढ़ाई पूरी नहीं हो सकती. इसलिये अंग्रेजी को तो बचपन से ही अनिवार्य कर देना चाहिये. वर्तमान स्थितियों में उन सज्जन की बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता.

क्या अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए?

मुझे अपनी कहानी याद आ गयी. मेरी पढ़ाई हिन्दी माध्यम से हुई है. तो बचपन मेंमेरी अंग्रेजी भी वैसे ही थी जैसे एक आम हिन्दी माध्यम से पढे हुए विधार्थी की होती है यानि वो अंग्रेजी व्याकरण के तो बहुत से नियम जानता है लेकिन फिर भी ना सही सही अंग्रेजी लिख पाता ना बोल पाता है.मुझे लगता है कि हम लोग बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर जो व्याकरण पढ़ाते हैं वो फायदे की जगह नुकसान ही करती है. कुछ भी लिखने व बोलने से पहले व्यक्ति उस वाक्य को व्याकरण की कसौटी पर तोलता है कि यह सही है या नहीं.खैर यह तो विषयातंर हो रहा है…. मैं जब आई.आई.टी. की तैयारी कर रहा था तो लोगों ने कुछ विशेष किताबों को पढने की सलाह दी. जैसे भौतिकी के लिये रैशनिक हैलीडे ( जो कि एक रशियन किताब का अंग्रेजी अनुवाद था) या गणित के लिये एम.एल.खन्ना. उस छोटे शहर में यह किताबें भला कहाँ मिलती…. तो किसी तरह यह किताबें दिल्ली से मंगवायी गयी. किताबें तो आगयीं लेकिन किताबें थीं तो अंग्रेजी में. भौतिकी का “जड़त्व आघूर्ण” किताब में ‘Moment of Inertia’ हो गया और समबाहू त्रिभुज ‘Equilateral Triangle’ बन गया.तो मुझे दो-तीन महीने तो यही सब समझने में लग गये कि किस तकनीकी शब्द को अंग्रेजी में क्या कहते हैं ….पढ़ाई क्या खाक करते. इस वजह से या किसी और वजह से आई.आई.टी. में सलैक्सन तो नहीं हुआ. लेकिन इस बात की कोफ्त हमेशा रही कि अगर आगे चलकर हमें यही सब अंग्रेजी में ही पढ़ना था तो हमें बचपन से ही अंग्रेजी में यह सब क्यों नहीं पढ़ाया गया. इसलिये हम जैसे चोट खाये और समझदार माँ बाप अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम से नहीं पढ़ाना चाहते.

http://kakesh.comवैसे मुझे यह तर्क बेमानी लगता है कि अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है.क्या अंग्रेजी के बिना विकास सचमुच संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए? जरूरत है तो इस दिशा में सही सोच की. आज हम गलत सलत ही सही लेकिन अग्रेजी लिखने बोलने को ही अपनी शान समझते हैं. यदि ऎसा ही है तो क्यों ना अंग्रेजी को ही राष्ट्रभाषा बना दिया जाये. कम से कम मेरे जैसे हिन्दी माध्यम से पढ़े बच्चों का तो भला हो ही जायेगा और वो मेरी तरह हीन भावना का शिकार तो नहीं होंगे कि वो आई.आई.टी. वालो से कमतर हैं इसलिये क्योकि वो अंग्रेजी नहीं जानते थे.

[ ऊपर का चित्र आई.आई.एम. की मेलिंग लिस्ट में आया था जिसे मेरे एक मित्र ने मेरे को मेल पर भेजा था. इसमें ठंडी बियर यानि "CHILLED BEER" को "CHILD BEAR" यानि भालू का बच्चा लिखा गया है.साइड में अखबारी जुगाड़ सागर चंद नाहर जी के सौजन्य से है.]

 

उपस्थित हूँ फिर से कुछ दिनों की छुट्टियां बिताने के बाद. छुट्टियों में मैने अधिकतर चिट्ठे पढे पर हर जगह टिप्पणी नही दे पाया …कारण इंटरनैट की धीमी गति. पिछ्ले दिनों ट्रेन से अपने होमटाउन (अब होमटाउन की हिन्दी क्या होगी यह कोई सुधी जन बताये) जाना हुआ.शाम 4 बजे की ट्रेन थी लेकिन दीवाली से पहले वाला दिन था तो ट्रैफिक जाम का अन्देशा था. वैसे भी इससे पहले वाले दिन यानि धनतेरस के दिन दिल्ली में भयंकर ट्रैफिक जाम लगा था.इसी लिये ऑफिस से थोड़ी जल्दी रवाना हो गया और 2 बजे के आसपास पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गया.

उस दिन प्लेटफार्म पर काफी भीड़ थी अधिकतर लोग दीपावली के कारण अपने घरों की ओर प्रस्थान कर रहे थे. मैने अभी तक लंच नहीं किया था तो मैं यह समझने का प्रयास कर रहा था कि इतनी भीड़ में कहाँ कैसे अपनी भूख शांत करूँ. तभी एक कोने में कई विदेशी पर्यटक नजर आये.पर्यटकों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा थी. वे लोग प्लेटफॉर्म पर लगी रेलवे समय सारणी को बड़े ध्यान से देख रहे थे. कुछ पर्यटक उड़ते कबूतरों को अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश कर रहे थे. मैं उनके करीब से गुजरा तो कान उनके वार्तालाप पर थे. कुछ ध्यान से सुनने पर लगा कि वो अंग्रेजी में बात नहीं कर रहे बल्कि किसी और भाषा में बात कर रहे हैं. वह भाषा भी कुछ जानी पहचानी सी लगी. और ध्यान से सुनने पर पता चला कि वो स्पैनिश में बात कर रहे हैं. किसी जमाने में मैने यह भाषा सीखी थी. मुझे लगा कि मुझे उनसे बात करनी चाहिये..आखिर बात प्रारम्भ करने का सूत्र तो पकड़ ही सकता हूँ. लेकिन हिम्मत सी नहीं हुई. कुछ देर वहीं खड़े होकर उनकी बातें सुनने लगा. हालांकि यह दर्शाने की पूरी कोशिश की कि मेरा ध्यान कहीँ और है. संयोग से एक पर्यटक ने पूछ ही लिया कि हावड़ा राजधानी एक्सप्रेस का समय क्या है. उसने यह प्रश्न अंग्रेजी में पूछा था जिसका जबाब भी मैने अंग्रेजी में दिया. लेकिन फिर मैने उसे अंग्रेजी में ही बताया कि मैं स्पेनिश समझ सकता हूँ…वह मुस्कुराया..मैने बोलने की कोशिश की.

हाबलो अन पोको एस्पिनिऑल (Hablo un poco español) : मैं थोड़ा थोड़ा स्पैनिश समझ सकता हूँ.

मेरी बात सुनके कुछ पर्यटक वहाँ और आ गये.करीब दस मिनट तक हम अंग्रेजी,स्पैनिश में बात करते रहे.उनसे पता लगा कि वो राजधानी एक्सप्रेस से हावड़ा जा रहे हैं और वहाँ से उनका दार्जिलिंग जाने का प्लान है. खाने के प्रति वो थोड़ा चितित दिखे. उन्हे भारतीय मसाले व मिर्च रास नहीं आ रहे थे. मैने उनके सामने राजधानी एक्सप्रेस की खूब तारीफ की. मैने उन्हे बताया कि राजधानी में कॉटिनेंटल खाना भी मिलता है क्योकि भारतीय रेलवे अपने यात्रियों का बहुत ख्याल रखती है. हाँलाकि मुझे मालूम था कि झूठी  तारीफ कर रहा हूँ लेकिन फिर भी विदेशियों के सामने आप बुराई भी तो नहीं कर सकते ना. उन लोगो ने मेरा कार्ड भी लिया और मेरे कुछ फोटो भी खीचे. मैने भी उनकी मेल आई. डी. ले ली.मुझे उस समय ध्यान नहीं रहा कि मैं भी अपने मोबाइल से उन लोगों की फोटो ले सकता हूँ अन्यथा मैं भी कुछ फोटो लेकर यहाँ चिपकाता.

मैंrailway-food फिर लंच की तलाश में निकला तो देखा कि रेलवे का सैल्फ सर्विस वाला रैस्टोरेंट पास ही है. अन्दर जाकर देखा तो एक बोर्ड में सभी खाद्य सामग्रियों के दाम लिखे थे. मैने उसी में देख कर मसाला डोसा खाने की इच्छा व्यक्त की तो पता चला कि थाली के अलावा वहाँ कुछ भी उपलब्ध नहीं था. थाली के लिये भी चावल अभी पक रहा था और उसके लिये 15-20 मिनट की प्रतीक्षा करनी पड़ती. मैने वहाँ काउंटर वाले सज्जन से कहा कि मेरे को केवल रोटी ही दे दे तो वह गहन सोच में पड़ गया लेकिन फिर वहाँ खड़े दूसरे सज्जन ने कहा कि आप बैठिये. मैं बाइस रुपये देकर एक कुर्सी पर बैठ गया.करीब पांच मिनट बाद मेरा नम्बर आया. थाली में दो तीन चीजें ( वह सब्जी थी कि दाल समझ में ही नहीं आया क्योकि सब में आलू अनिवार्य रूप से थे) और दही था. सब्जियां ठंडी थी.रोटियों में ऊपर की दो रोटी गरम और बाकीं दो एकदम ठंडी थी. सब्जियां और दही एक दूसरे से मिलकर अनन्य प्रेम भाव की सृष्टि कर रहे थे.खैर किसी तरह से दो रोटी खा के मैं उठ गया.

मैं सोच रहा था यदि वो स्पैनिश पर्यटक रेलवे का यह खाना खाते तो उनके मन में भारतीय रेल की क्या छवि बनती.

 

बीच बीच में मुझे ना जाने क्या होने लगता है कि मैं हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में सोचने लगता हूँ.फिर वही उहापोह वाली स्थिति होती है कि लिखें या ना लिखें. अब इस उमर में लेखक या साहित्यकार तो बनने से रहे तो फिर क्या फायदा…अपने काम में मन लगायें और उसी में कुछ करने की कोशिश करें. जब इस तरह की उहापोह वाली स्थिति आती है तो मैं पढ़ने लगता हूँ.कल भी तीन चार घंटे खूब पढ़ा.दिन के बाद के लगभग सभी चिट्ठे पढ़े और अधिकांश में टिप्पणीयां भी की. फिर कुछ पुराने चिट्ठे पढे.ज्ञान जी के पुराने लेख पढ़े और समझने की कोशिश की गैस्ट आर्टिस्ट की तरह पदार्पण करने वाले ज्ञान जी कैसे दैनिक ब्लॉगर बन गये. फिर फुरसतिया जी के कुछ पुराने अच्छे लेख पढे. मजा भी आया. अंतत: सोचा कि चलो जब तक मन हो लिखते रहें.

Abstract आप सोच रहे होंगे कि आज खोया पानी नहीं छ्पा.बस थोड़े देर में उसका तीसरा भाग लेकर हाजिर होता हूँ.

गूगल का नया ट्रांसलिट्रेसन टूल हिन्दी लिखने के लिये काफी अच्छा है. इसकी सहायता से आप रोमन में लिख कर आराम से हिन्दी लिख सकते हो. इसीलिये इसे मैने अपने कॉमेंट बॉक्स के नीचे लगाया था. आजकल कई लोगों ने इसे अपने चिट्ठे पर लगा रखा है.इस औजार को चिट्ठे में लगाने से दिक्कत यह है कि जब भी कोई आपके लेख पर आता है तो उसका कर्सर इस टूल के पहली लाइन पर आ जाता है और आपको लेख को पढने के लिये ऊपर जाना होता है. मुझे इससे कई चिट्ठों में समस्या हुई तो सोचा कि मेरे पाठकों को भी यह समस्या होती होगी इसलिये इस टूल को अपने चिट्ठे से हटा दिया.आपके पास कुछ समाधान हो तो बताइयेगा.

आजकल मुन्नी पोस्ट लिखने का फैशन बन गया है. फुरसतिया जी जो अपनी फुरसतिया लम्बी पोस्ट लिखने के लिये बदनाम हैं वो भी आजकल एक पोस्ट को तीन पोस्टों में ठेलने लगे है. निरमलानंद जब से कानपुर से लौटे है तब से उनकी पोस्ट छोटी होने लगी हैं इसीलिये वो आजकल दिन में चार मुन्नी पोस्ट ठेल देते हैं.आलोक जी एक ही बोतल का पानी दो दिन पिला रहे हैं. ज्ञान जी तो पहले ही प्रोब्लॉगर की टिप पढ़कर छोटा छोटा ही लिखते हैं.

चलिये मैं भी यह मुन्नी पोस्ट समाप्त करता हूँ. थोड़ी देर में लेकर आ रहा हूँ…खोया-पानी का तीसरा भाग.

 

कुछ दिनों पहले मैने आपके सामने “खोया-पानी” नामक व्यंग्य उपन्यास का जिक्र किया था. फुरसतिया जी ने बताया कि यह उपन्यास उन्होने भी मँगवा लिया है. उन्होने इसे नैट पर डालने की इच्छा भी जताई. जब से मैने इस उपन्यास को पढ़ना शुरु किया है तब से मेरी भी यही इच्छा थी.मुझे आप सबको यह बताते हुए खुशी है इस पुस्तक के अनुवादक श्री तुफ़ैल चतुर्वेदी से मेरा पत्राचार हुआ था और उन्होने मुझे इसे नैट पर डालने की अनुमति दे दी है (कुछ शर्तों के साथ).शीघ्र ही मैं इसे आपके सामने पेश करुंगा.ताकि आप सभी इस अदभुत व्यंग्य उपन्यास को पढ़ सकें.

आपको एक जानकारी और देता चलूँ. तुफ़ैल चतुर्वेदी जो विनय कृष्ण चतुर्वेदी के नाम से भी जाने जाते हैं हिन्दी व्यंग्य और ग़ज़लों की एक पत्रिका निकालते हैं जिसका नाम है “लफ़्ज़”.

lafz2 यह पत्रिका हास्य व्यंग्य , ग़ज़लों कविताओं की एक त्रैमासिक पत्रिका है. इसी पत्रिका के अंक एक से बारह में मुस्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब की किताब ‘आबे गुम’ का अनुवाद छ्पा था. मुस्ताक साहब का ही दूसरा उपन्यास “ज़रगुज़िस्त’ , “धनयात्रा” के नाम से लफ्ज़ के अंक तेरह से धारावाहिक रूप से छ्प रहा है.ये दोनों उपन्यास पहली बार लफ़्ज़ के माध्यम से ही हिन्दी पाठकों के बीच अनुदित और चर्चित हुए. इसके अलावा लफ्ज़ में नये और पुराने व्यंग्य नियमित रूप से छ्पते रहते हैं.

लफ्ज़ समकालीन गज़लों की एक प्रतिनिधि पत्रिका है. इसमें आप ताजा तरीन और पूरी तरह ग़ज़ल के पैमाने पर कसी अच्छी अच्छी ग़ज़लों का आनन्द ले पायेंगे. 

तुफैल जी के अनुसार इस पत्रिका का स्थायी कोष बनाया गया है। इसमें आप संरक्षक अथवा आजीवन सदस्य बनकर अपना योगदान दे सकते हैं। आजीवन सदस्यता 1100 रुपये में तथा संरक्षक सदस्यता 5000 रुपये देकर प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार तीन वर्ष का अनुबंध डाक व्यय सहित 300 रुपये में होगा। विदेशों से आजीवन सदस्यता 250 डॉलर तथा संरक्षक सदस्यता 1000 डॉलर देकर प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार 3 वर्ष का अनुबंध डाक व्यय सहित 100 डॉलर में होगा।  अपनी धनराशि आप संपादक के पते पर मनीऑर्डर या ड्राफ्ट द्वारा `लफ़्ज´के नाम जो नोएडा अथवा दिल्ली में देय हो भेजा सकते है।

मुख्य संपादक
विनय कृष्ण चतुर्वेदी
(तुफ़ैल चतुर्वेदी)
फ़ोन : +91-9810387857

निवास व पत्र व्यवहार का पता
पी- 12 नर्मदा मार्ग, सेक्टर- 11,
नोएडा – 201301

मैने तो यह पत्रिका तीन साल के लिये मँगा ली है.आप भी चाहें तो मँगा लें.

 

अशोक पांडे जी कबाड़खाने के कर्ताधर्ता कबाड़ी हैं. जाने कहाँ कहाँ से कबाड़ उठा के ले आते हैं और पटक देते हैं.एक दिन इसी कबाड़खाने में हम पहुंचे तो हम भी इस दुकान के हिस्सेदार बन गये.यहाँ तक तो ठीक था. लेकिन देखते क्या हैं पिछ्ले कुछ दिनों से हमारे ब्लॉग पर जो लोग सर्च इंजन से आ रहे हैं उनमें से कम से कम एक प्रतिदिन “ashok pande” को खोज कर आ रहे हैं. ऎसा पिछ्ले दस दिनों से हो रहा है. मैने भी इसी शब्द से जब गूगल में खोजा तो उसमें मेरा ब्लॉग कहीं नजर भी नहीं आया फिर लोग क्यों मेरे ब्लॉग में पांडे जी को खोजते हुए आ रहे हैं. मेरे तो समझ में नहीं आया आपके आया हो तो बतायें और कबाड़खाने पर जायें कुछ अच्छा कबाड़ बटोरें.

अभी तो कबाड़खाने का एक उम्दा कबाड़ पेश करता हूँ… 

Wednesday, October 24, 2007


`समोसे´ :वीरेन डंगवाल

हलवाई की दुकान में घुसते ही दीखे
कढाई में सननानाते समोसे
बेंच पर सीला हुआ मैल था एक इंच
मेज पर मक्खियाँ
चाय के जूठे गिलास
बड़े झन्ने से लचक के साथ
समोसे समेटता कारीगर था
दो बार निथारे उसने झन्न -फन्न
यह दरअसल उसकी कलाकार इतराहट थी
तमतमाये समोसों के सौन्दर्य पर
दाद पाने की इच्छा से पैदा
मूर्खता से फैलाये मैंने तारीफ में होंट
कानों तलक
कौन होगा अभागा इस क्षण
जिसके मन में नहीं आयेगी एक बार भी
समोसा खाने की इच्छा|

 

आज जब अनिल जी ने अपनी पोस्ट लिखी तो मुझे लता जी का गाया एक बंगाली गाना याद आ गया. ” एक बार बिदाई दे माँ घूरे आशी”. यह गाना जब पहली बार सुना था तो बहुत कुछ समझ में नहीं आया था लेकिन फिर भी आंखों में आंसू थे. उसके बाद तो यह गाना सैकड़ों बार सुना और हर बार यह मन को द्रवित ही कर गया.

यह गाना लता जी का गाया हुआ है और इस गाने में क्रांतिकारी खुदीराम बोस फाँसी से पहले अपनी माँ से अनुमति मांग रहे हैं. बोल कुछ इस तरह से हैं.

एक बार बिदाई दे माँ घूरे आशी
एक बार बिदाई दे माँ घूरे आशी
हाँसी हाँसी पोरबो फांसी देखबे भारतवासी
आमी ई हाँसी हाँसी पोरबो फांसी देखबे भारतवासी
एक बार बिदाई दे माँ घूरे आशी…..

गाने में संगीत के नाम पर पीछे एकतारा बजता है.बाउल संगीत पर आधारित यह गाना दिल को जैसे तोड़ कर रख देता है.
आप भी सुनिये. (प्ले बटन पर क्लिक करें)

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इसका भाव कुछ इस प्रकार है.

माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे …मैं जरा घूम आऊँ.
मैं हँसते हँसते फाँसी के फन्दे को पहन लुंगा
और सारे भारतवासी देखेंगे.
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे ..मैं जरा घूम आऊँ.

माँ मैं बम तैयार कर रास्ते के किनारे खड़ा था
मुझे बड़े लाट साहब को मारना था
मैने मार दिया माँ उस इग्लैंड वासी देशद्रोही को
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे …मैं जरा घूम आऊँ.

शनिवार को दस बजे के बाद जज कोर्ट में जन समूह उमड़ेगा
जब एक ओर अभिराम का दीप जलेगा
तभी खुदीराम को फाँसी हो जायेगी माँ
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे …मैं जरा घूम आऊँ.

माँ!! तेरे तो तैतीस करोड़ बारह लाख बेटा-बेटी अभी जिन्दा हैं
उनके साथ तू आराम से रहना माँ …बस मुझे जाने की अनुमति दे दे
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे ….मैं जरा घूम आऊँ

दस माह दस दिन बाद मैं फिर जन्म लुंगा मौसी के घर में
यदि तू मुझे पहचान ना पाये तो देखना मेरे गले में फाँसी का निशान
और मुझे पहचान लेना माँ!!… पहचान लेना
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे …मैं जरा घूम आऊँ.

कैसा लगा आपको बताइयेगा टिप्पणीयों से.

 

आजकल ब्लॉगजगत में कम्यूनिज्म पर बहस जोरों पर है. कोई इसे बाल विवाह से जोड़ रहा है तो कोई तलाक से.इसी बहाने आज कुत्ताज्ञान ब्रह्मज्ञान भी मिल गया. :-)

मैं जब कम्यूनिज्म पर कुछ पढ़ता हूँ या फिर किसी के मुँह से कुछ सुनता हूँ तो कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं होता. कुछ भी कहने के लिये मेरी अज्ञानता आड़े आ जाती है.मैने लोगों को इस वाद की बड़ाई करते भी सुना है और इस वाद के घोर विरोधी भी देखे हैं. इसलिये अभी तक इस मामले में अज्ञान ही हूँ कि यह असल में है क्या.

बचपन में इतिहास की किताबों में मार्क्स और लेनिन के बारे में पढ़ा था.उसे पढ़ने के बाद उसकी समझ उतनी ही बनी जितनी इतिहास की किताबें पढ़ने के बाद बच्चों की आम तौर पर बनती है ..यानि नासमझ के नासमझ ही रहे.कॉलेज में जब था तब कुछ नेता टाइप के लोग कभी कभी कुछ पर्चे बांटते थे जिनमें एक दाढ़ी वाले इंसान की फोटो के साथ कुछ कविताऎं या लेख रहते थे. लेकिन तब कोर्स की किताबें पढ़ने का इतना जुनून था कि ध्यान ही नहीं दिया कि उन पर्चियों में क्या लिखा रहता है.

409px-Kapital_titel_bd1 बाद में जब नौकरी के सिलसिले में बंगाल में रहा तो फिर कम्यूनिज्म से सामना हुआ.आये दिन बंगाल बंद होते रहते थे इसलिये मुझे यह कुछ दिनों बहुत भाया.मेरे कुछ बंगाली मित्र मुझे कम्यूनिज्म को समझने के लिये उकसाते रहे और मैं हमेशा किसी ना किसी बहाने कन्नी काटता रहा.कुछ लोगों ने मुझे ‘दास कैपिटल’ पढ़ने की सलाह दी. उन दिनों पुस्तक मेलों में रशियन किताबों का बहुत बोलबोला था.इन स्टालों पर भीड़ भी बहुत लगती थी. वो इसलिये कि यहाँ मोटी मोटी हार्डबाउन्ड किताबे बांकी किताबों के मुकाबले काफी सस्ती मिल जाती थी. जहाँ तक याद पढ़ता है दो रशियन प्रकाशक मीर पब्लिशर और प्रोग्रेसिव पब्लिशर की बहुत सी किताबें बहुत सस्ते में मिल जातीं थी. उसी दौरान वही से हार्ड बाउंड अन्ना कैरेनीना, वार एंड पीस,चेखव की कहानिया , चेखव के नाटक इत्यादि खरीदे. ‘दास कैपिटल’ पहली बार में नहीं खरीदी क्योकि लगा कि पढ़ नहीं पाउंगा. लेकिन एक मित्र थे जो इसी बात को लेकर मित्र-मंडली में मुझे मजाक मजाक में मूर्ख साबित करने की कोशिश करने लगे. हाँलाकि और भी कई लोग थे जिन्होने ‘दास-कैपीटल’ नहीं पढ़ी थी लेकिन टार्गेट केवल मैं ही होता था. उनका टार्गेट बनने से बचने के लिये अगले पुस्तक मेले में मैने दास-कैपीटल खरीदने का निर्णय किया. यह किताब तीन मोटे मोटे वोल्यूम में थी मुझे लगा कि काफी मँहगी होगी लेकिन तीनो वॉल्यूम मात्र 120 रुपये के मिल गये. मैने बड़े शान से तीनो वॉल्यूम अपनी मेज पर सजाये. वो मित्र भी आये तो बड़े खुश हुए. मुझसे एक एक कर तीनों वोल्यूम माँग कर भी ले गये. अब मित्र-मंडली में वो मेरी तारीफ भी करने लगे थे.वह मुझे प्रगतिशील समझने लगे थे. यह घटना दस साल पुरानी है. इन दस सालों में मैने अभी तक दास-कैपीटल का एक पन्ना भी नहीं पढ़ा लेकिन ये मेरी अलमारी में अभी भी अलग से शोभायमान है.

मैं बंगाल में जब था तो एक मित्र ने एक बार कम्यूनिज्म पर एक टिप्पणी की थी. उनका कहना था ” यदि कोई पच्चीस साल की उम्र तक कम्यूनिस्ट नहीं बना तो उसके पास दिल नहीं है और यदि कोई पच्चीस साल की उम्र के बाद भी कम्यूनिस्ट बना रहा तो उसके पास दिमाग नहीं है”

आलोक पुराणिक जी ने अपनी टिप्पणी में बताया है कि यह टिप्पणी शायद बर्नार्ड शॉ की है. धन्यवाद आलोक जी. बर्नार्ड शॉ की टिप्पणी कुछ इस तरह है. “Any man who is not a communist at the age of twenty is a fool. Any man who is still a communist at the age of thirty is an even bigger fool.”

  

(चित्र विकीपिडिया से साभार) 

 

आलोक जी-9-2-11 के बारे में दो चीजें सबको मालूम ही होंगी. एक कि वो अक्सर टेलीग्राफिक पोस्ट लिखते हैं और दूसरा वो कहीं भी गलत हिन्दी देखते हैं तो टोक जरूर देते हैं. लेकिन आज सुबह से उनका एक और रूप सामने आ रहा है.आपने भी नोट किया हो. वो रूप है एक सफल टिप्पणीकार का. जिस भी चिट्ठे पर देखो आज आपको आलोक जी की टिप्पणी जरूर मिलेगी.समीर जी को भी शायद अब खतरा नजर आ रहा होगा. आलोक जी के इसी रूप के दर्शन आज हमारे चिट्ठे पर भी हो गये. हम तो धन्य हो गये जी. समीर जी भले ही कहें (और ठीक कहें) कि वो टिप्पणी पढ़ कर देते हैं ( मेरी पिछ्ली पोस्ट पर उनकी टिप्पणी देखें) लेकिन आलोक जी ने बकायदा पोस्ट को पढ़ कर कुछ कठिन शब्दों का अर्थ भी पूछ लिया.

थोड़ा शब्दार्थ बताने का कष्ट करेंगे तो बड़ी अनुकंपा होगी।
मँड़हे
अलक्ष
उबहनी
मँड़ई
खाँची फाँदना
ढखुलाही
डाँड़-बाँध

विनीत,
आलोक

अब आदिपुरुष पूछें और हम जबाब ना दें तो कैसे बात बने. तो लीजिये आलोक जी के लिये शब्दों के अर्थ.आप भी जान लें और कोई शब्द कठिन लगा हो तो पूछ लें कोशिश की जायेगी कि उसका अर्थ बताया जाय.

मड़हा- मिट्टी से बना हुआ छोटा घर, भुना हुआ चना

अलक्ष - अज्ञेय, अदृश्य, जो देख ना पड़ता हो. यहाँ पर मतलब उस स्थान से है जहाँ से उसने रमायण उठाई थी(मंदिर).[ रामायण वाला प्रसंग इस पोस्ट में आया था ]

उबहनी- इसका अर्थ तो होता है रस्सी पर यहाँ पर लट (बाल) से मतलब है.

मँड़ई- पर्णशाला, छोटी कुटी या झोपड़ी

खाँची फाँदना- खाँची (कीचड़), यहाँ पर मिट्टी सानने से मतलब है.

ढखुलाही - त्रिपाल, किसी वस्तू उपर फैलाकर नीचे की वस्तु को छिपाना.

डाँड़-बाँध- अर्थदंड, हरजाना

दुआ करें कि आलोक जी के इसी रूप के दर्शन हर दिन हों.

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