May 012008
 

“गिरीश तिवारी जी” अर्थात गिरदा पर ना जाने कब से लिखना चाहता था.लेकिन समय ही नहीं मिल पा रहा था. शाम को जब युनुस भाई की पोस्ट पर फैज की रचना का जिक्र सुना तो अपना खजाना देखा कि यह रचना तो मेरे पास थी ही और वह भी ‘गिरदा’ की आवाज में. ‘गिरदा’ ने यह रचना पिछ्ले साल दिल्ली में एक कार्यक्रम में गाई थी और सौभाग्य से उस कार्यक्रम में मैं भी शामिल था. मैने तब वह रचना रिकॉर्ड कर ली थी. उसे सहेज कर तो रखा था कि गिरदा पर पूरी एक श्रंखला के लिये लेकिन आज युनुस भाई ने जब अपनी पोस्ट डाली तो मुझे लगा कि मुझे इसे डाल देना चाहिये.

तो लीजिये पेश है गिरदा की आवाज में फैज की रचना जिसे गिरदा ने हिन्दी और कुमांऊनी दोनों में गाया है.

हिन्दी में

हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.
यहां पर्वत पर्वत हीरे हैं, यहां सागर सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे
जो खून बहे, जो बाग उजड़े, जो गीत दिलों में कत्ल हुए,
हर कतरे का,हर गूंचे का,हर ईंट  का  बदला मांगेगे
हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.

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कुमांऊनी में

हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो.
यां डाना काना हीरा हरया छ्न,यां गाढ़ गध्यारा मोत्यूं भरया छ्न,
यो माल खजान सब हमरै तो छू, हम एक एक पाई को हिसाब ल्यूंलो
जो ल्वै को सिखा जो मौकु गुजरी, जौ मन सुकू मन मे कतल भईं
हर ल्वै को तोपक, हर धुरि को ढुंगक, हर एक कतल को जबाब ल्यूंलों
हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो.

कैसी लगी यह रचना मज़दूर दिवस पर टिप्पणी द्वारा बतायें.

Feb 142008
 

यह प्रयास है मेरी आवाज की मधुशाला को कैसेट के संगीत के साथ मिला कर प्रस्तुत करने का. संगीत मन्नाडे वाली कैसेट से लिया है.

 

और जैसा कि मैने पिछ्ली पोस्ट में बताया कि अभी कुछ दिनों पहले मैं मधुशाला का पाठ कर रहा था तो एक मित्र ने उसे रिकॉर्ड कर लिया. प्रस्तुत है वही एक पॉडकास्ट के रूप में. मैं मधुशाला की तरंग में था इसलिये माईक हिल रहा था और उसी कारण आवाज कम ज्यादा हो रही है. झेल लीजिये.

 

 

पूरी श्रंखला

1. खैयाम की मधुशाला..

2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..

3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये

4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में 

5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद

6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से

7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

9. उमर की मधुशाला के निहितार्थ

10. अगर पिलाने का दम है तो जारी रख यह मधुशाला

11. मैं और मेरी मधुशाला..

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

Feb 142008
 

मुझे मधुशाला सदा से ही प्रिय रही है. मेरी मधुशाला की कहानी शुरु हुई सन 1986 में जब मैं पहले पहल दिल्ली आया था. उस समय मैने बच्चन व मन्नाडे की आवाज में मधुशाला वाला कैसेट सुना. सुनकर तो मानिये मैं पागल हो गया. उस कैसेट को ना जाने कितनी बार सुनता रहा. साथ में गाता भी रहा. तब से यह फितूर चालू हुआ.

1989 में पहली बार मधुशाला की किताब को पढ़ा तभी पता चला कि बच्चन की मधुशाला अंग्रेजी के किसी किताब का अनुवाद है.1990 में लाइब्रेरी से जॉन फ़िट्ज़राल्ड की किताब लाकर पढ़ी तब  उमर खैय्याम के बारे में और अधिक जानकारी मिली.उस समय  अंग्रेजी इतनी तो समझ नहीं आती थी लेकिन डिक्सनरी साथ में रख पूरी किताब पढ़ी. फिर इसी झोंक में मैने भी अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में कुछ पदों की रचना की.छंद विधान रुबाई वाला ही रखा.   

Going higher and higher,Getting success Night n Day,
IS NO more MORTAL, must be descended into Clay.
THUS FILL your cup with the wine of Luv and Light,
AND Share it with all people like light Ray .

No need for the Last sleep, to prepare ,
You know not why you go nor where.
Drink! the wine of Joy and Happiness
Make lively today’s silence n future despair

People have tried to Unfold and find
The concealed truth of LIFE , behind
No LAMP they got in midnight dark
BLIND they were and remained blind.

Kakesh : 12.12.90

1993 में सुमित्रानंदन पंत की किताब “मधुज्वाल” हाथ लगी. उसने भी काफी प्रभावित किया और मैने कुछ और पदों की रचना की.

“मधुज्वाल व मधुशाला”

बच्चन जी के छंद में

अद्वितीय साकी वह कैसी, कैसी अद्भुत है हाला?
कर  डाला उमर को पागल ऎसा जादूगर प्याला
पंत,बच्चन को प्रेरित कर,मधुरस से नहलाया उनको
लिख डाली उन दोनों ने यों, ‘मधुज्वाल’ औ ‘मधुशाला’

बच्चन जपते रहे रात दिन, मधुशाला, मदिरा माला
मधुज्वाल की लपटों ने कवि पंत को तपा डाला
पीकर कविता की मधु मदिरा,मदमस्त हुए सब पाठकगण
देती हैं संदेश प्रेम का , ‘मधुज्वाल’ औ ‘मधुशाला’

पंत जी के छंद में

नहीं धरा में कोई साकी ,
नहीं मूर्त है मधुबाला.
ये तो जीवन के प्रतीक है
हाला, प्याला, मधुशाला

ये अपना संदेश कामना
मधु की वर्षा हो नित भू पर
मधु, जीवन कोई ज्योति बने अब
मधु में पगे रहें नारी नर

मधु सी मीठी बोली बोलें सब जन
हर कण मधुकण हो प्यारा
सब भ्राता सम रहें परस्पर
मधुमय हो संसार हमारा

काकेश : 21.02.93

हॉस्टल में जब रहा तो एक पीने पिलाने का दौर चालू हुआ. उस समय हॉस्टल में होने वाली अधिकतर मधु-पार्टियों में मुझे बुलाया जाता और हर पार्टी का अंत मेरे मधुशाला के गायन से ही होता.बहुत दिनों तक यह सिलसिला चला. मुझे उस समय मधुशाला के करीब साठ पद कंठस्थ थे. अब तो शायद दस भी याद नहीं है.

बाद में अंग्रेजी के अनुवाद, मैथिली शरण गुप्त और रघुवंश प्रसाद गुप्त का अनुवाद भी पढ़ा.बांग्ला अनुवाद के कुछ पद भी पढ़े. बीच में फारसी सीखने की भी असफल कोशिश की ताकि उमर खैय्याम की मूल रुबाइयों को पढ़ सकूं.अभी भी मुझे कुमांऊनी में हुए अनुवाद और फिर उसी के हिन्दी अनुवाद की तलाश है. साथ ही मैं पं बलदेव प्रसाद मिश्र द्वारा किये अनुवाद को भी ढूंढ रहा हूँ.  

तो यह श्रंखला मधुशाला के पीछे मेरी दीवानगी का ही परिणाम है.

कुछ दिनों पहले जब मैं मधुशाला गा रहा था तो मेरे एक मित्र ने उसे रिकॉर्ड भी किया. कोशिश करता हूँ शाम तक उसको भी यहाँ चढ़ा पाऊँ.

[इस श्रंखला का यह अंतिम भाग  है ]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !! 9. उमर की मधुशाला के निहितार्थ 10. अगर पिलाने का दम है तो जारी रख यह मधुशाला

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

Apr 092007
 

इस पॉड्कास्ट में मैने थोड़ा सा नया प्रयोग करने का प्रयास किया है.

पॉड्कास्ट यहां पढ़ें .

joota_puran1_5.mp3

इस पॉड्कास्ट में मेरी आवाज के अतिरिक्त मेरी पत्नी और पुत्र की आवाज के साथ एक स्पेशल आवाज भी है .

अपनी टिप्पणीयों से उत्साह वर्धन करें

Apr 092007
 

जब मैने पॉडकास्टिंग शुरु की थी तो उस समय आर.सी.मिश्रा जी ने सुझाया था कि पॉडकास्ट को ब्लौग में ही लगा दें . इसीलिये इस नये ब्लौग में वही करने का प्रयास है.

पहली पॉड्कास्ट पेश है….. इसे यदि पढ़ना चाहें तो यहाँ पढ़ें .

joota_puran1.mp3

आगे से नियमित पॉडकास्ट करने का विचार है. सुनते रहें .

Apr 072007
 


जब पहली पॉड्कास्ट आप सब के सामने प्रस्तुत कर रहा था तो यह नहीं सोचा था कि इतने सारे लोग उस पॉड्कास्ट को सुनेंगे …पर आप द्वारा दी टिप्पणीयों से उत्साह वर्धन हुआ और आज लेकर आया हूं एक और पॉडकास्ट .

इस पॉड्कास्ट में मैने थोड़ा सा नया प्रयोग करने का प्रयास किया है.

पॉड्कास्ट यहां सुनें

इस पॉड्कास्ट में मेरी आवाज के अतिरिक्त मेरी एकमात्र पत्नी (अभी तक :-) ) और 4 माह के पुत्र की आवाज के साथ एक स्पेशल आवाज भी है .

अपनी टिप्पणीयों से उत्साह वर्धन करें.

Apr 052007
 

आज जीतू जी के अतीत की कथा सुनकर ब्लोग-नाद के बारे में पता चलाए .तो मेरी भी इच्छा हुई कि मैं अपनी आवाज रिकार्ड कर पोडकास्टिंग करूं .तो प्रस्तुत करता हूं मेरा पहला पोडकास्ट .

अभी ये केवल .mp3 में ही अपलोड कर पा रहा हूं.

पोडकास्ट यहां सुने .

अपनी टिप्पणी दें और कोई गलती हुई हो तो क़ृपया बताऎं..