Jul 292009
 

यदि इस पोस्ट का टाइटल पढ़कर आपको फिल्म शोले की याद आ जाये तो इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, लेकिन मैं ना तो आज आपको फिल्म शोले का गाना सुना रहा और ना ही अपनी महबूबा के बारे में बता ‘सच का सामना‘ कर अपने एक अदद पत्नी को परेशान ही कर रहा हूँ। मैं तो उस महबूबा की बात कर रहा हूँ जिसने अपने एक कदम से एक ओर यह बतलाया  कि लोकतंत्र की जड़ें कैसे मजबूत की जा सकती हैं और दूसरी ओर नारी की स्थिति को लेकर निंदित चिंतित लोगों को शुकुन की सांस लेने का मौका दिया। मैं बात कर रहा हूँ कश्मीर में विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती सईद की, जिन्होंने विधानसभा में स्पीकर के ऊपर माइक फैंक कर यह बता दिया कि वीरांगनाऐं घर में पति पर ही बेलन नहीं चला सकती वरन अपने इस कौशल का प्रदर्शन विधानसभा में भी कर सकती हैं।

mahbooba-mufti-saeed अपने इस वीरता भरे कृत्य से उन्होंने ना जाने कितनी चीजें स्पष्ट कर दीं। मैं उन्हें तहे दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने ऐसा किया, वरना नेता लोग तो सिर्फ बोलते ही हैं करते कुछ नहीं हैं। अब मेरा विश्वास इस देश पर, इस देश के लोकतंत्र पर, इस देश की महिलाओं पर मजबूत हुआ है। जो लोग बोलते थे कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है उनकी इस बात को लोग अब गंभीरता से लेने लगे हैं।  

एक चीज जो स्प्ष्ट हो गयी कि जम्मू-कश्मीर में भी अब लोकतंत्र आ गया है। हमेशा से हम सुना करते थे कि हमें जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करनी है। यह और बात है कि इस देश में जहां जहां लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुई हैं वहाँ रुपये पैसों के पेड़ भी लहलहाये हैं जो नेताओं को पुष्प-फल देते रहे हैं। आम जनता उन जड़ों को इस उम्मीद में खाद-पानी देती है कि जब नेताओं से सात पीढ़ियों का इन्तजाम हो जायेगा तो जनता को भी फल चखने को मिल सकते हैं। तो अब यह साबित हो गया है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र आ गया है। वरना हम तो यही लोकतंत्र के चैम्पियन के नाम पर तमिलनाडू, महाराष्ट्र या यू.पी. को रखते जहां जूते-चप्पल से लेकर माइक फैक कर लोकतंत्र के मजबूत होने का प्रमाण दिया जाता रहा है।

दूसरी ओर जब तमिलनाडू में इस तरह की घटना हुई थी तो महामहिम (उनके वजन के हिसाब से लिखना पड़ रहा है) जयललिता के साथ अभद्रता की गयी थी और उनकी ओर जूते-चप्पल, माइक फैंके गये थे। मैं तब से हैरान था कि माइक फैकने के वीर कर्म में कोई महिला कैसे पीछे रह सकती है, और वो भी किसी पुरुष पर। महिला की इस जन्मजात प्रतिभा का प्रदर्शन केवल घर तक ही सीमित रह जाय यह तो रीतिकालीन बात हुई। आज जब महिलायें हर मामले में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं….। वैसे जिन्होंने यह मुहावरा गढ़ा होगा मुझे उनके मांनव-ज्ञान पर हमेशा से ही शक रहा है। महिला और पुरुषों की ऊंचाई में हमेशा से ही अंतर रहा है, एक आध अपवाद छोड़ दें तो महिलाओं की ऊंचाई हमेशा ही कम रही है, तो फिर  कंधे से कंधा मिला कर कैसे चला जा सकता है। होना चाहिये था महिलायें हर मामले में पुरुष के साथ कंधे से सर मिलाकर चल रही हैं…खैर…जाने दीजिये…. तो महिला महबूबा ने पुरुष स्पीकर पर माइक फैक कर यह जता दिया कि अब महिलायें केवल घर की चहारदीवारी तक ही सीमित नहीं रही हैं। वह अब बाहर निकल रही हैं। मुझे लगता है कि मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और लालू यादव जैसे लोगों को इस बात का खूब अनुभव रहा होगा। इसीलिये वह राजनीति में महिलाओं के 33% आरक्षण का विरोध करते रहते हैं। शरद यादव ने तो आत्महत्या करने तक की धमकी दे दी थी। घर के अंदर बेलन झेलना और सार्वजनिक रूप से माइक झेलने में अंतर होता है। शरद-यादव ऐसी स्थिति आने से पहले ही दुनिया से कूच करना चाहते हैं तो क्या गलत चाहते हैं।

तीसरी चीज जो लोग जम्मू-कश्मीर का तालिबानीकरण करना चाहते हैं। महिलाओं को केवल बुर्के पहना घर के अंदर बैठा देना चाहते हैं, यह माइक उनके लिये भी एक करारा तमाचा है। हम खुश है कि ऐसी सोच वाले लोगों को महबूबा ने सही सबक सिखाया है।

तो क्या हमें महबूबा को धन्यवाद नहीं देना चाहिये। मैंने तो जब से यह समाचार सुना है तब से ही गा रहा हूँ…महबूबा..महबूबा…और अब तो उमर अब्दुल्ला भी निकल लिये। तो उन पर चर्चा कल करेंगे। आज इतना ही…

May 252008
 

केडीके महोदय बालकिशन जी की इस पोस्ट पर अपना कुदरती कवितायी हुनर दिखाना चाहते थे लेकिन सफल नहीं हुए तो हमको बोले कि इस “कवि की कल्पना” को किसी तरह ठेल दो. हमको भला क्या तकलीफ.हम ठेल रहे हैं. गाली.प्रसंशा सब केडीके साहब की.  

बालकिशन जी आप किस शोध के चक्कर में पढ़ गये. हमें मालूम है कि यह शोध आपने हम जैसे सफल साहित्यकारों को ठेस पहुचाने के लिये ही किया है.

अब हमारी कवितायें भी झेलिये.

1. सर्द-दर्द और गर्द
जब मर्द के पास
आकर जम जाते है
तो हिमालय की बर्फ
पिघलने लगती है,
लालिमा,कालिख के
साथ मिल कर
देने लगती है हुंकार
कि बता तो दो कि
तुम आखिर हो कौन?

2. अहसान
जिन पैरों तले कुचला गया
वह पैर अब कांटो पर चल रहे हैं
और अहसास मिट्टी में पड़े हैं.

3. उस दाढ़ी में
दिखे कितने तिनके
जिस पर चिड़िया ने
घौसला बना लिया.

4. नम जमीन पर
अकुंरित होने के लिये
मचल रहे हैं
कितने बीज
लेकिन जमीन को
कर्ज की तलाश है.

5. आपस की समझदारी में
इतना तो करना ही था
मेरे पीठ के दाग को
दूसरों को दिखाने से पहले
मुझे ही दिखा दिया होता

6. तड़पते जमाने में
उफनती नदियां
किनारों को बहाती है
और किनारे
अपना दायरा बड़ा लेते हैं.

और अब कुछ कज़ल भी देखिये

दिखा नहीं

देकर हम ने खुद को, देखा
क्या देखा? यह दिखा नहीं

पानी निकला नाली से जब
कैसे बिखरा दिखा नहीं

बरबादी की  नादानी में
हमने पूरा गांव जलाया
लेकिन उसमें जलता सा
अपना घर तो दिखा नहीं.

पता नहीं

देखो हमने तीर चलाया
तुमको लगा क्या? पता नहीं

हम घी बनकर आहुति देते थे
आग लगी क्या? पता नहीं.

देखो हमसे बचकर रहना
कब सनकेंगे? पता नहीं

लाख टके की एक बात थी
पल्ले पड़ी क्या? पता नहीं

वो मुझको अब उल्लू कहता
खुद पट्ठा है पता नहीं

मैं सबको रोटी देता हूँ,
खुद के घर का पता नहीं.

अब आगे से साहित्यकारों से पंगा लेने की जुर्रत ना करें.

गरिष्ठ कवि केडीके (एक्स साहित्यकार करंट ब्लॉगर)

May 242008
 

आप बहुत बड़े हो सकते हैं.उच्च पद पर आसीन हो सकते है, बड़े ब्लॉगर हो सकते हैं, बड़े साहित्यकार हो सकते हैं, दार्शनिक भी हो सकते हैं, बड़े और गरिष्ठ वरिष्ठ कवि भी, बड़े कलाकार भी,बड़े व्यवहार कुशल भी,बड़े लेखक भी,बड़े व्यंग्यकार भी.लेकिन इन सबसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप परिणाम कैसे दे रहे हैं. यानि जो आप कर रहे हैं या करना चाह रहे हैं वह हासिल हो भी रहा है या नहीं या फिर आप बिना सूत-कपास के कोरी लट्ठमलट्ठा किये जा रहे हैं. यदि किसी काम का परिणाम अच्छा है तो यह उतना महत्वपूर्ण नहीं कि वह काम किसने किया.इट्स  द रिजल्ट्स दैट मैटर्स.

एक कहानी सुनें. एक बार के बहुत बड़े पुजारी,संत,योगाचार्य की मृत्यु हुई और वह ऊपर पहुंच गये. स्वर्ग के द्वार पर. और वहां खड़े होकर वह अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगे. उनके आगे एक व्यक्ति खड़ा था. उसने अच्छे,चमकदार कपड़े पहने हुए थे, आखों मे ग़ॉगल्स लगाये हुए थे, रंगीली शर्ट,चमड़े की जैकेट और जींस .

धर्मराज ने उस व्यक्ति से पूछा,कृपया मुझे बताएँ कि आप कौन हैं ताकि मैं जान सकूँ कि आपको स्वर्ग के द्वार से अंदर जाने दूँ या नहीं.

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया  मैं बंता सिंह हूं. मैं नई दिल्ली में टैक्सी ड्राइवर था.

धर्मराज ने अपना बही खाता खोला. उसे ध्यान से देखते हुए बंता सिंह से मुस्कराते हुए कहा

कृपया यह रेशमी वस्त्र पहन लें और सोने के द्वार से सोने के सिहांसन की ओर जायें. 

अब संत की बारी थी.धर्मराज ने उनसे भी वही प्रश्न पूछा कि वह कौन हैं. उन्होंने सीधे खड़े होकर और विश्वास भरी तेज आवाज में उत्तर दिया.

मैं हूं संत शिरोमणि बाबा अलां फलां 1008. मैं  अलां फलां मंदिर का प्रमुख पुजारी था. मैं पिछ्ले चालीस साल से लोगों को ईश्वर के बारे में बता रहा हूँ.

धर्मराज ने फिर अपना बही खाता खोला और संत से कहा.

आप कृपया यह सूती वस्त्र पहने और लकड़ी के द्वार से लकड़ी के सिंहासन की ओर प्रस्थान करें.

संत को गुस्सा आ गया. उन्होने धर्मराज से पूछा. यह आपका कैसा न्याय है भगवन. उस सदा गाली देते रहने वाले, ठीक से गाड़ी भी ना चला पाने वाले ड्राइवर को तो आपने रेशमी वस्त्र और सोने का सिंहासन दिया और मुझे, जिसने लोगों को उपदेश देने में अपना सारा जीवन लगा दिया, उसे सूती वस्त्र और लकड़ी का सिंहासन. ऐसा क्यों भगवन.

“परिणाम मेरे पुत्र, केवल परिणाम, “ परिणाम ही है जिसके कारण ऐसा हुआ.

जब तुम लोगों को ईश्वर की प्रार्थना करने का उपदेश देते थे तो लोग सोते थे और जब बंता सिंह टैक्सी चलाता था तो लोग सही सलामत घर पहुंचने के लिये ईश्वर की प्रार्थना करते थे.

तो शिक्षा यह मिली कि आप कौन है कितने बड़े हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह महत्वपूर्ण है आपका जो कर रहे हैं उसका परिणाम क्या हो रहा है. 

Moral of the story: Its PERFORMANCE and not POSITION that ultimately counts.

May 242008
 

शाही सवारी

उन्हें इस घोड़े से पहली नजर में मुहब्बत हो गयी और मुहब्बत अंधी होती है, चाहे घोड़े से ही क्यों न हो। उन्हें यह तक सुझायी न दिया कि घोड़े की प्रशंसा में उस्तादों के जो शेर वो ऊटपटांग पढ़ते फिरते थे, उनका संबंध तांगे के घोड़े से नहीं था। यह मान लेने में कोई हरज नहीं कि घोड़ा शाही सवारी है। शाही रोब और राजसी आन-बान की कल्पना घोड़े के बिना अधूरी, बल्कि आधी रह जाती है।

बादशाह के क़द में घोड़े का क़द भी बढ़ाया जाये, तब कहीं जा के वो क़द्दे-आदम दिखाई पड़ता है। परंतु जरा ध्यान से देखा जाये तो शाही सवारियों में घोड़ा दूसरे नंबर पर आता है। इसलिए कि बादशाहों और तानाशाहों की मनपसंद सवारी दरअस्ल जनता होती है। ये एक बार उस पर सवारी गांठ लें तो फिर उन्हें सामने कोई कुआं, खाई, बाड़ और रुकावट दिखाई नहीं देती। जोश में वो दीवार भी फलांग जाते हैं। ये लेख वो तब तक नहीं पढ़ सकते जब तक वो Braille में न लिखा हो।

जिसे वो अपना दरबार समझते हैं, वो वास्तव में उनका घेराव होता है, जो उन्हें यह समझने नहीं देता कि जिस मुंहजोर, सरकश घोड़े को केवल हिनहिनाने की इजाजत दे कर सरलता के साथ आगे से क़ाबू किया जा सकता है, उसे वो पीछे से क़ाबू करने की चेष्टा करते हैं, अर्थात लगाम की बजाय दुम मरोड़ते हैं। लेकिन इस सीधी-सादी लगने वाली सवारी का भरोसा नहीं, क्योंकि यह अबलक़ा सदा एक चाल नहीं चलती। परन्तु जो शासक होशियार, पारखी, और शासन में भले-बुरे के भेद से परिचित होते हैं वो पहले ही दिन ग़रीबों का सर कुचल कर सभी को पाठ समझा देते हैं।

वैसे बड़े और विशिष्ट व्यक्तियों को किसी और अंकुश की आवश्यकता नहीं होती। जो भी उन पर सोने का हौल, चांदी की घंटियां, जरबफ़्त की झूल और तम्ग़ों की माला डाल दे, उसी के निशान का हाथी बनने के लिये कमर बांधे रहते हैं। चार दिन की जिंदगी मिली थी, सो दो-जीहुजूरी की इच्छा में कट गये, दो जीहुजूरी में।

हमारा क़जावा

हमने एक दिन घोड़ों की शान में कुछ कह दिया तो बिशारत भिन्ना गये। हमने तो ठिठोली के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक हवाला दिया कि जब मंगोल हजारों के झुण्ड बना कर घोड़ों पर निकलते तो बदबू के ऐसे भभके उठते थे कि बीस मील दूर से पता चल जाता था। कहने लगे, क्षमा कीजिये, आपने राजस्थान में, जहां आपने जवानी गंवाई, ऊंट ही ऊंट देखे। जिनकी पीठ पर क़लफ़दार राजपूती साफ़े,चढ़वां दाढ़ियां और दस फ़ुट लम्बी नाल वाली तोड़ेदार बंदूकें सजी होती थीं और नीचे…कंधे पर रखी लाठी के सिरे पर तेल पिलाये हुए कच्चे चमड़े के जूतों को लटकाये अर्दली में नंगे पैर जाट।

कमर बांधे, और हाथ पैर बांधे, फिर मुंह बांधे’’

घोड़ा तो आपने यहां आन के देखा है। मियां अहसान इलाही गवाह हैं, उन्हीं के सामने आपने उन ठाकुर साहब का क़िस्सा सुनाया था जो महाराजा की ऊंटों की पल्टन में रिसालदार थे। जब रिटायर होकर अपने पुरखों के क़स्बे… क्या नाम था उसका-उदयपुर तोरावाटी-पहुंचे तो अपनी गढ़ी में भेंट करने आने वालों के लिए दस-बारह मोढ़े डलवा दिये और अपने लिये अपने सरकारी ऊंट जंग बहादुर का पुराना क़जावा, उसी पर अपनी पल्टन का लाल रंग का साफ़ा बांधे, सीने पर तम्ग़े सजाये, सुब्ह से शाम तक बैठे हिलते रहते। एक दिन हिल-हिल कर जंग बहादुर के कारनामे बयान कर रहे थे और मैडल झन-झन कर रहे थे कि दिल का दौरा पड़ा। क़जावे पर ही आत्मा का पंछी पंचभूत-रूपी पिंजड़े से उड़ कर अपनी यात्रा पर रवाना हो गया। वापसी के क्षणों में होंठों पर मुस्कान और जंग बहादुर का नाम, क्षमा कीजिये, ये सब आप ही के द्वारा लिये गये स्नेप शाट्स हैं, आप भी तो अपने क़जावे से नीचे नहीं उतरते। न उतरें! मगर यह क़जावा इस अधम की पीठ पर रखा हुआ है। साहब! आप घोड़े का मूल्य क्या जानें। आप तो यह भी नहीं जानते कि खच्चर का ‘क्रास’ कैसे होता है? खरेरा किस शक्ल का होता है? कनौतियां कहां होती है? बैल के आर कहां चुभोई जाती हैं? चिल्ग़ोजा किस भाषा का शब्द है? अन्तिम दो प्रश्न आवश्यक और निर्णायक थे क्योंकि इनसे पता चलता था कि बहस किस नाजुक मोड़ पर आ चुकी है।

यह बहस हमें इसलिए और अधिक नागवार गुजरी कि हमें एक भी सवाल का जवाब नहीं आता था। स्वभाव के लिहाज से वो टेढ़े नहीं, बड़े धीमे और मीठे आदमी हैं, लेकिन जब इस प्रकार पटरी से उतर जायें तो हमें दूर तक कच्चे में खदेड़ते, घसीटते ले जाते हैं। कहने लगे जो व्यक्ति घोड़े पर न बैठा हो वो कभी संतुष्ट स्वाभिमानी और शेर, दिलेर नहीं हो सकता। ठीक ही कहते होंगे क्योंकि वो स्वयं भी कभी घोड़े पर नहीं बैठे थे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है

पहला और दूसरा भाग

May 232008
 

कल एक समाचार पढ़ा कि कानपुर के कलक्टरगंज थाने में रखे विस्फोटकों में विस्फोट हो गया.लिखा था कि यह विस्फोटक पुलिस द्वारा बरामद किये गये थे और थाने में ही रखे थे. एक हिन्दी के समाचार पत्र ने इस पर अपना संपादकीय भी बरबाद किया. इस बरबादी के पीछे तो कारण यह भी हो सकता है कि संपादक को बरबाद करने को कुछ और ना मिला हो लेकिन विस्फोटकों की किस्मत पर मुझे रस्क होने लगा. क्या किस्मत पायी उन विस्फोटकों ने. फटे भी तो ऐन थाने में, पुलिस के बीचों बीच.लेकिन मुझे यह समझ नहीं आया कि इस पर संपादकीय लिखने की क्या जरूरत थी. विस्फोटक हैं तो फटेंगे ही. उनका काम ही है फटना,फाड़ना. अब वह कोई पकड़े गये अपराधी तो थे नहीं कि पुलिस के डर से थाने में तब तक चुप बैठे रहते जब तक पुलिस की जेबें गरम ना होती और फिर उसी गरमी में पुलिस उन्ही अपराधियों से साथ चाय-बिस्कुट पी,खा कर  उन्हें छोड़ने के लिये प्रेरित ना हो जाती. या फिर वो ऐसे निरपराध अपराधी भी नहीं थे जो पुलिस के डंडे के डर से अपने सारे अनकिये अपराधों को उगल देते और जेल में सड़े रहने पर मजबूर होते. वो तो विस्फोटक थे. इसलिये भले ही पुलिस थाने में ही हों.वह फटे. शुक्र है पुलिस थाने में इतने दिन रहने के बाद भी उन्होने अपने कर्तव्य को पूरा किया. पुलिस से कोई प्रेरणा नहीं ली. मुझे इस बात की ही खुशी है.

मुझे विस्फोटकों की किस्मत पर इसलिये भी रस्क होता है कि वह विस्फोटक ही थे. इसलिये बरामद होने के बाद भी थाने में लावारिस की तरह पड़े रहे. अच्छा हुआ वह बरामद की हुई ज्वैलरी ना थे वरना अब तक किसी थानेदारिनी की सेवा में लगे होते. वह टीवी भी नहीं थे,फ्रिज भी नहीं, गाड़ी भी नहीं थे, इम्पोर्टेड सैट भी नहीं, वह फर्नीचर भी नहीं थे, इलेक्ट्रिकल अप्लायंस भी नहीं. वरना सोचिये अब तक वह किसी पुलिस वाले के वहाँ ओवर टाइम कर रहे होते. यही नहीं वह अपनी बिरादरी के अन्य हथियारों से भी अलग थे. वरना अब तक जिंनसे बरामद किये उन्हें ही या किसी और को बेच दिये गये होते.केवल विस्फोटक होना उनके काम आया.

संपादकीय में लिखा था कि उन्हे थाने में क्यों रखा गया था. ज़ाहिर सी बात है घर में नहीं रख सकते थे इसलिये.हो सकता है पुलिस वाले देखना चाहते हों कि उन्होने जो बरामद किया वह विस्फोटक ही है या नहीं. कहीं ऐसा तो नहीं अपराधियों ने विस्फोटकों की शक्ल में सोना छिपा रखा हो. हो सकता है पुलिस वाले दीवाली तक इंतजार कर रहे हों. क्योंकि विस्फोटकों की तात्कालिक जरूरत भी नहीं थी.हो सकता है पुलिस वाले किसी विस्फोटक जौहरी की तलाश में हो जो उन हीरों को पहचान कर उनकी कीमत पुलिस की जेब तक पहुंचा सके. हो सकता है पुलिस के यह विश्वास हो कि यह विस्फोटक पाकिस्तान के बने हुए नहीं हैं. खालिस मेड इन इंडिया है. इसलिये उनके फटने में पुलिस को डाउट हो. क्योंकि डाउट करना पुलिस का फ़र्ज़ है और वह सारे फ़र्ज़ तो एकसाथ नहीं भूल सकती.वैसे भी उन फ़र्जों को पुलिस कभी नहीं भूलती जो दूसरों को सताने और खुद को बचाने के काम आते हैं. कुछ नियमों को तो पुलिस भी मानेगी ही. ताकि साख भी बनी रही है और जेबें भी गरम रहे. 

यह भी लिखा गया कि विस्फोटकों को पहले डिफ्यूज कर देना चाहिये था. मुझे इस बात से भी सख्त ऐतराज़ है. इतना दिमाग पुलिस के पास होता तो वह पुलिस ही क्यों होते कोई सरकारी कर्मचारी ना होते. यह पुलिस की सरासर तौहीन है. यह ऐसा ही है जैसे आप गृह मंत्री शिवराज पाटिल से यह अपेक्षा करें कि वह सोच समझकर बयान दें. सोचना ही होता तो वह शरद पवार ना होते जो कृषि मंत्री होकर भी क्रिकेट के बारे में सोचते हैं. और फिर सोचने का काम सचिवों का होता है. पुलिस के पास तो सचिव भी नहीं तो वह इतनी बड़ी बात सोचते भी कैसे. पुलिस का काम माल बरामद करना है. वह उसने किया. आप क्या चाहते हैं कि पुलिस अपना काम छोड़कर दिमाग वाला काम करे.

कानपुर के कलक्टर गंज के बारे में एक कहावत है “झाड़े रहो कलट्टरगंज”. जब कहावत है तो उसका कोई मतलब भी होगा. यह मतलब इतना सरल है कि पुलिस तक की समझ में आ गया. इसी कहावत का पालन करते हुए पुलिस ने उन विस्फोटकों से पल्ला झाड़ लिया. हमारी लोक संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा व सम्मान पुलिस नहीं करेगी तो कौन करेगा. तो कलक्टरगंज की पुलिस ने ऐसा किया तो क्या गलत किया. क्या आप मेरे से सहमत हैं?

May 222008
 

समय बदलता है. बदलना ही उसका काम है. कुछ लोग इस बदलाव का रोना रोते हैं. लेकिन रोने से भी समय रुकता नहीं. चोर,उचक्के,मर्डरर का मंत्री हो जाना समय का बदलना है. आप लाख सर पीटें यह रुकने वाला नहीं.गुडे का मंत्री हो जाना ही उसकी नियति है. पहले धमाका होता था तो केवल दीवाली में या फिर शब्बे-बारात में. साल में एक दो बार चुटपुटे बम का धमाका होने से बारूद बनाने वाली कंपनी प्रॉफिट में कैसे आती. सब जगह विकास हो रहा है. यहाँ भी होना चाहिये. तो फिर शादियों में बम फोड़ने का चलन हुआ. अब तो शादियों में पटाखे ही नहीं फूटते बल्कि गोलियां भी चलती हैं. वैसे यह हवाई फायर होते हैं लेकिन कभी कभी अति उत्साह में कोई आदमी हवा में उड़ने लगता है तो ये हवाई फायर उसे लग जाते हैं. इसमें कोई ग़म नही.सब चलता है. एक आध आदमी मर भी जाये तो क्या. वैसे भी इस देश में इतने लोग एक्सीडेंट और भी ना जाने किस किस तरह से मरते रहते हैं. शादियों में हवाई फायर से मरने का नया चलन है. कुछ दिनों में हमें इसकी आदत हो जायेगी.धमाकों से मरने की आदत धीरे धीरे हो ही रही है ना.

शादियों के बाद नेता लोग चुनाव जीतने पर भी बम फोड़ने लगे.अब चुनाव जीतने पर खुशी जाहिर करने के लिये बम फोड़े जाने लगे या फिर इस के द्वारा यह बताने के लिये कि अब हम जीत गये हैं हम से बचकर रहना वरना बम की तरह उड़ा दिये जाओगे.यह शोध का विषय है. मैं इस तरह के शोध से फिलहाल दूर ही रहता हूँ. आजकल बम फोड़ने का यह पुनीत कार्य कुछ आतंकवदियों ने अपने हाथ में ले लिया है. कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि सरकार ने इस काम को आउटसोर्स कर दिया है.मैं उन लोगों से सहमत हो भी जाता हूँ नहीं भी. क्योकि यदि निहत्थे, निर्दोष लोगों को मारने का काम आउटसोर्स हो गया है तो सरकार क्यों इस काम को कर रही है. किसान लोग आत्महत्या कर ही रहे हैं.हो सकता है सरकार आत्महत्या को दूसरी नजर से देखती हो या फिर किसान लोग जल्दी में हों वह आउटसोर्स एजेंसी से मरना ना चाहते हो या फिर अभी पूरी तरह आउटसोर्सिंग नहीं हुई हो. सरकार केवल ट्रायल ले रही हो. कुछ भी हो सकता है. सरकार की बात वैसे भी हम जैसा आम आदमी कैसे जान सकता है.

कुछ लोग कहते हैं कि सरकार और आतंकवादी आपस में मिले हुए है. मैं इस बात को समझने का प्रयास करता हूँ कि सरकार में आतंकवादी हैं या आतंकवादियों की सरकार है.कुछ भी हो सकता है. यह केवल पाकिस्तान में ही होता होगा जरुरी नहीं यहाँ भी होता है. होता तो जुरुर होगा लेकिन मैं इससे भी पूरी तरह सहमत नहीं हो पाता. मेरी असहमति का एक ही बिन्दु है. आतंकवादी जब निहत्थे,निर्दोष लोगों की बेमतलब हत्या करते हैं तो कुछ समय बाद उसकी जिम्मेवारी भी ले लेते हैं.सरकार कभी यह जिम्मेवारी नहीं लेती. सरकार जिम्मेवारी या तो विपक्ष पर डालती है या फिर विदेशी हाथ पर और फिर धमाकों के बाद पुलिस भी तत्परता दिखाती है और एक दो दिन में एक-दो स्केच जारी कर देती है. यह सरकार के केस में नहीं होता. उनके तो सिर्फ पोस्टर लगते हैं.वह भी अच्छे कामों के.

कहीं स्केच और पोस्टर एक ही चीज को इंगित तो नहीं करते कि हमको चुनो हम खास हैं.चुनो नहीं तो उड़ा दिये जाओगे. अब बतायें स्केच और पोस्टर में क्या अंतर रह गया भला.खैर जाने दीजिये हम तो खुश हैं देश विकास कर रहा है. बारूद बनाने वाली कंपनियां प्रॉफिट में है. कुछ लोग मर रहे हैं तो क्या. कुछ की रोजी रोटी छिन रही है तो क्या. क्या मॉल के बनने से ऐसा नहीं हो रहा या फिर नयी फैक्ट्री लगने से ऐसा नहीं हो रहा. देश के विकास में कुछ को कुरबानी देनी ही पड़ती है. हम भी यह कुरबानी देने को तैयार हैं. आओ बारूद की कंपनियों लाभ कमाओ. हम मरने को तैयार हैं.

May 202008
 

हमारे एक नये नये मित्र बने हैं.नाम है कमलादत्त कांडपाल.नये नये पत्रकार बने हैं. रहने वाले हैं ग्राम कांडा, पट्टी कत्यालू, कफड़खान के. जनेऊ धारी ब्राह्मण है लेकिन खुद को बामण कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं.कान में जनेऊ डालने के बाद ही कोई शंका करते हैं चाहे वह लघु हो या दीर्घ. एक ढाई फुट की चुटिया भी है.जिसे बड़े जतन से संभाल कर रखते हैं.दिल्ली में नये नये आये हैं.करोल बाग में किराये पर कमरा लेकर रह रहे हैं.

अब इनसे हमारी दोस्ती कैसे हो गयी यह भी कमाल की ही बात है. दरअसल हमारे कमलादत्त जी को “क” वर्ण से कुत्ताप्यार है. कुत्ताप्यार यानि जैसे कुत्ते को कुत्ते से होता है मतलब काटना व चाटना दोनों इस प्यार में शामिल है. इनकी जिन्दगी का सबसे बड़ा दुख यह है कि इनका नाम कमलादत्त ना होकर कमलकांत क्यों नहीं है तब इनके नाम में भी तीन “K” या “क” होते. मतलब यह कि ये तीन ‘क’ के पीछे पागल हैं. अर्जुन हिंगोरानी, जो अक्सर तीन “K” वाली फिल्में बनाया करते थे जैसे “कब ? क्यों और कहां ?” (1970), “कहानी किस्मत की” (1973), “खेल खिलाड़ी का” (1977), “कातिलों के कातिल”. इनके आदर्श है.  तो एक दिन यह हमारे  ब्लॉग पर आये और “काकेश की कतरनें” देख ठिठक गये. तीन “क” देख कर इन्होने हमसे संपर्क किया और धीरे धीरे यह संपर्क दोस्ती में बदलने लगा.अब इनके अन्य मित्रों की तरह हम भी इन्हें “केडीके” कहते हैं.

खबरों के बारे में यह आत्मनिर्भर हैं. खबर हो ना हो लेकिन उसको अपने तगड़े विश्लेषण के छोंक के साथ पेश करने में केडीके माहिर हैं.

इधर कई दिनों से व्यस्तता के कारण नियमित लिखना नहीं हो पा रहा तो केडीके ने कहा.

“अमां यार आजकल तुम केवल “खोया पानी” छापते हो, हालांकी इसमें भी एक “k’ है लेकिन फिर भी  कुछ और लिखते क्यों नहीं”

“क्या बताऊँ केडीके, पेपर पढ़ने तक का टाइम नहीं है आजकल कुछ लिखें भी तो कैसे?”

“देख केके दोश्त तुमको हम खबर बतायेगें तुम उसको अपने अंदाज में लीख देना”

हम को और क्या चाहिये था.हम तैयार हो गये.किसी भी खबर के बारे में केडीके के अपने तर्क होते हैं,जिन्हे अक्सर इनका बॉस, संपादक नहीं मानता और उसे अखबार में छापने से इंकार कर देता है. यह उन्ही खबरों को हमें बतायेंगे. तो इन्होने वादा किया है कि यह हमें खबरें बतायेंगे जिन्हे हम अपने अंदाज में आप तक पहुंचाते रहेंगे.

तो कोशिश करते हैं केडीके के विश्लेषण के साथ कुछ खबरें आप तक पहुंचाने का.

Apr 012008
 

अभी ऑफिस के लिये तैयार हो रहा था कि अनूप जी उर्फ फुरसतिया का फोन आया. कहने लगे.. छा गये काकेश..क्या झक्कास ईमानदार चिरकुटई की है. अभी हमारे साथ वाले कानपुर हॉस्टल के किस्से भी लिखोगे. ज्यादा ना लिखें वरना वैसा ही कंटाप पड़ेगा जैसा रैगिंग के समय में पड़ा था.यह तो उन्होने मजाक में ही कहा था. (यहाँ पर मैं यह बताता चलूँ कि कानपुर के हॉस्टल में अनूप जी ,जिन्हे तब हम सभी सीनियरों की तरह “अनूप भाईसाहब” कहते थे, हमारे सीनियर होते थे. जब इन्हें पता चला कि हम भी कुछ कविता वगैरह करते हैं तो इन्होंने रात रात भर बैठाकर अपनी ढेर सारी कविताऐं हमें सुनायी थीं.कई बार हमारी कई कविताओं को इन्होने हम से ले लिया था और कॉलेज की मैगजीन में अपने नाम से छ्पवाया था.) हम सोचे कि अनूप जी सुबह सुबह किस मूड में हैं. हमने पूछा आखिर बात क्या हुई.बोले वो अजीत जी के ब्लॉग पर तुम्हारे बकलमखुद का पहला भाग पढ़ा था.तो अनूप जी का फोन तो रखवाया लेकिन हमारे भेजे में हमेशा की तरह उनकी बात कुछ समझ में ना आयी.

आपकी जानकारी के लिये बता दें कि हम तीन दिन से पंगेबाज पुरस्कारों की तैयारियों में व्यस्त थे. कल रात बारह बजे तक कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग खतम कर वीडियो बनाया. इसमें हमने वॉयस चेंजर सोफ्टवेयर का प्रयोग भी किया.सॉफ्ट्वेयर तो अच्छा है लेकिन हिन्दी में अभी भी इसकी वॉयस क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं है. हो सकता है अगले वर्जनों में इसे सुधारा जाय. खैर हमने कार्यक्रम की सी डी बना के तीन सी डी एक खास चैनल को दी. यदि यह चैनल वालों ने भुगतान समय पर कर दिया तो हिन्दी ब्लॉगरों को यह सी डी मुफ्त प्रदान की जायेगी. अभी तो इस सी डी की पांच मिनट की झलकियां कल मैं पंगेबाज जी के ब्लॉग पर चढ़ाउंगा.

कंप्यूटर ऑन करने की सोच ही रहे थे कि एक टी वी चैनल से फोन आया. बतचीत कुछ ऐसी हुई.

हैलो क्या आप काकेश बोल रहे हैं?

हांज्जी, मैं काकेश

हाय काकेश ,हमें आपका नम्बर अजीत ने दिया है. हम अपने कल एयर होने वाले प्रोग्राम ये जिन्दगी कितनी टेड़ी है के लिये आपसे कुछ बात करना चाहते हैं. क्या आप आज दोपहर तीन बजे से लेकर चार बजे तक फौन पर उपलब्ध है?.

हांज्जी, ..न…नहीं जी ..हम दिलकार नेगी को पढ़ चुके हैं जी.

और तुरंत फोन कट गया.

तब तक हम समझ चुके थे कि आज अप्रेल फूल है और सब मिलकर हमें अप्रेल फूल बना रहे हैं. क्योंकि जब अजीत जी ने बकलमखुद शुरु किया था तो उनकी एक मेल हमारे पास आयी थी. उसके कुछ अंश ऐसे थे.(बिना उनसे अनुमति लिये छाप रहा हूँ)

काकेश जी आपसे साधिकार आग्रह है कि  ******बकलमखुद् की तैयारी कर लीजिए। ************अपने शौक, ब्लागमेनिया, परिजन, यारी-दुश्वारी, मस्ती की पाठशाला,नौकरी, बेकारी-बेज़ारी जैसे नगीने जड़े हो तो बढ़िया न हो तो भी जो लिखेंगे, रंग तो भी जमेगा ही।

आतुरता से प्रतीक्षारत…

अजीत

हम सोच रहे थे कि अपने बारे में क्या लिखें ??…कुछ तो है ही नहीं …या फिर कि लिखें भी कि नहीं लिखें और सोचते सोचते अनामदास जी का यह लेख आ गया. इससे हमें प्रेरणा मिल ही रही थी कि हमको तो सरकलमखुद नहीं ही लिखना है कि दो बातें हो गयीं. एक तो अजदक मियां का लेख आ गया और दूसरे अजीत जी का तकाजा. तो हमने तो अजीत जी को साफ साफ कह दिया कि हम अपनी व्यस्तताओं के चलते अभी सरकलमखुद बकलमखुद नहीं लिख पायेंगे.उनका जबाब तो क्या आता विमल भाई की चिट्ठी आ गयी लेकिन विमल भाई की चिट्ठी भी हमें अपने इरादे से नहीं डिगा पायी.

इसलिये हमें अनूप जी की बात पर भी यकीन नहीं हुआ.लेकिन फिर भी हमने कंप्यूटर ऑन किया और अजीत जी के ब्लॉग पर पहुंचे. वहाँ पहुंचे तो क्या देखते हैं कि हमारे बारे में ना जाने क्या अगड़म बगड़म लिखा है. अगड़म बगड़म लिखने का अधिकार या तो आलोक जी को है या फिर पंगेबाज को. अजीत जी ने आज अप्रेल फूल के दिन हमारे बारे में गलत सलत लिख कर पूरी ब्लॉग-जनता को बेवकूफ बनाया है. इस बात का अन्दाजा इस बात से भी मिलता है कि एक तो उन्होने हमें ईमानदार लिखा है. जो हमें जानते हैं वो तो अब तक हँस हँस कर लोटपोट हो गये होंगे और फिर उन्होने लिखा

हम यह बता देना चाहते हैं कि वे (यानि काकेश) ब्लाग दुनिया के उन लोगों में हैं जिनसे हमारी पिछले जन्म की रिश्तेदारी है।

अजीत जी आप किसे बेवकूफ बना रहे हैं. आज के दिन में जब लोग इस जनम की रिश्तेदारी नहीं निभाते तो पिछ्ले जनम की रिश्तेदारी क्या निभायेंगे. जनता बेवकूफ जरूर है पर इतनी भी नहीं जनाब. तो जनता को पक्का पता चल गया है कि यह आप हमारी मान-हानि करने के लिये हमारे बारे में कुछ भी छाप रहे हैं.

इसलिये सभी लोगों से अपील है वह इस पोस्ट को ना पढ़ें और जिन्होने पढ़ ली हो तो इसे सच ना माने.

सभी लोग जो बेवकूफ नहीं बने या जिन्हें पता है कि वह बेवकूफ नहीं है वह यहाँ जरूर टिप्पणी करें.जो वेवकूफ हैं वो भी यहाँ टिप्पणी करके बेवकूफ ना होने का सार्टिफेकेट ले सकते हैं. जिस हिन्दी ब्लॉगर की टिप्पणी हमारी पोस्ट पर नहीं आयेगी उसे बेवकूफ मान लिया जायेगा और अगले पंगेबाज पुरस्कारों में उसका नाम महामूर्ख पुरस्कार के लिये स्वत: नामांकित हो जायेगा. 

तो फिर देरी कैसी??? और क्यों…???

 

world-record

हम पंगेबाज को गिनीज बुक ऑफ रिकार्डस में जगह बनाने के लिये बधाई देते हैं.

   
Mar 312008
 

अभी प्रशांत ऑफिस पहुंचा था और मेल चैक कर रहा था.साथ साथ यह भी प्लानिंग कर रहा था कि आज किस किस से चैट करनी है और फिर अपनी ऑर्कुट की स्क्रैपबुक चैक कर सब को जबाबी स्क्रैप दागना है कि इंटरनल फोन पर घंटी बजी. उधर से कलीग प्रिया थी.

हाइ… प्रसान्त …(उफ यह लड़की कभी प्रशांत नहीं बोल सकती क्या) ..उसने अपनी मधुर आवाज में कहा.

हाई….प्रिया ..हाउ आर यू….?

आइ एम फाइन …तुम्हे बॉस ढूंढ रहा था ..तुम्हें पता है ??

बॉस !! ….बॉस आज इतना जल्दी ऑफिस कैसे ….??

अरे ऑफिस नहीं आया अभी तक.उसने फोन किया था ..और बोला है जैसे ही प्रसांत आये उसे बताऊँ.

लेकिन क्यों यार..

पता नहीं यार ..लेकिन कह रहा था कि अर्जेंट काम है.

अर्जेंट काम !!

हाँ ….तो मैं उसे बता रही हूँ कि तुम आ गये….हो सकता वो फिर तुम्हे फोन करे.

प्रशांत का दिमाग चकरा गया.वह पिछ्ले कई दिन की बातों को याद करने लगा कि बॉस ने क्या क्या करने को कहा था. कोई ऐसी चीज जो शायद छूट गयी हो उससे.पिछ्ले एक महीने से तो बॉस ने कुछ काम के लिये कहा ही नहीं था. इन-फैक्ट पिछ्ले करीब दो महीनों से अब तक उसके पास कोई काम ही नहीं था.यहाँ तक की बॉस भी अक्सर खाली ही बैठा रहता. उसकी सैकेट्री भी बताती है आजकल बॉस अपने बेटे की प्रोजेक्ट रिपोर्ट उससे टाइप करवा रहा है. कोई मीटिंग वगैरह भी आजकल नहीं हो रही फिर क्या हो सकता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि उसको निकालने का कोई इरादा हो कंपनी का. या फिर…वह सोच ही रहा थी कि फोन की घंटी बजी.  

हैलो …

हैलो सर…

हाँ प्रशांत …मैं अभी ऑफिस पहुंच रहा हूँ . तुम ऑफिस में ही रहना ….अर्जेंट काम है.

यस सर…और फोन कट गया.

अरे इतनी सी बात के लिये फोन क्यों किया बॉस ने, फिर वो कौन सा ऑफिस से बाहर कहीं जाता है. वो तो ऑफिस में बैठ कर ही या तो चैट करता रहता है या मेल.क्या हो सकता है? वह सोच रहा था कि तभी चैट पर उसके दोस्त ने घंटी बजाई.

हाई…..आर यू देयर ?? उसने दोस्त को कहा कि अभी वह बिजी है थोड़े देर में बात करेगा और फिर सोचने लगा. तभी बॉस का बुलावा आया.वह डरते डरते बॉस के केबिन में घुसा.

देखो प्रशांत आज सुबह सुबह हैड ऑफिस से फोन आया है कि कल मंथली रिव्यू होगा. प्रेजेंटेशन भी करना है.

मंथली रिव्यू..इतने दिनों बाद…और वो भी कल ही.

हाँ …ये लोग भी ना ….लास्ट मूमेंट में फोन करते हैं. अब इतनी जल्दी प्रेजेटेशन कैसे बनेगा और फिर डाटा भी तो कलेक्ट करना होगा ना.प्रशांत तुम आई.टी डिपार्टमेंट में फोन करो और उनसे सारे डेटा मांगो.

लेकिन सर आई. टी. वाले इतनी जल्दी डेटा थोड़े दे देंगे. वो तो मिनिमम..

अरे वो तो मालूम है वो लोग मिनिमम 4-5 दिन तो लगायेंगे. पर वो आई.टी. वाला नितिन तुम्हारा फ्रैंड है उससे बात तो करो.

ठीक है सर.   

प्रशांत को मालूम था कि बात करके कुछ नहीं होना लेकिन फिर भी बॉस ने कहा है तो बात तो करनी ही थी. बात की. वही जबाब मिला. कि तीन चार दिन से पहले डेटा नहीं मिल सकता. और फिर अभी तो आई.टी के लोग खाली भी नहीं हैं सब किसी नये प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं.

प्रशांत ने यह बात बॉस को बतायी तो पहले से ही परेशान टकलू बॉस और ज्यादा परेशान हो गया.फिर बोला.

तुम नोट करो प्रशांत. अभी प्रजेंटेशन की प्लानिंग करते हैं. पहले इन्नोवेशन प्रोजेक्ट्स लिखो. यहाँ पर जो नये इन्नोवेटिव काम किये हैं उनकी डिटेल्स देंगे.

सर.

तुम बता रहे थे ना तुमने एक्सल में कुछ नया बनाया है जिसमें एक कॉलम में फीगर चेंज करने से दूसरे में ओटोमेटिक फिगर चेंज हो जाती है.

सर…. लेकिन एक्सल में यह कोई बड़ी बात है नहीं है सर. एक कॉलम में एक फॉर्मूला लगाया और हो गया.

अरे यह तुम्हे मालूम है ना. हैड ऑफिस वालों को थोड़े मालूम है.

जी… लेकिन सर यह काम तो तीन-चार महीने पहले किया था ना.

अरे अभी तक हैड ऑफिस वालों को नहीं दिखाया ना. इसलिये उन्हें क्या मालूम. इसी वाले रिव्यू में डाल दो.

यस सर..और…

और वो स्टेशनरी रिडक्सन वाला प्रोजेक्ट भी डाल दो.

कौन सा सर ??

अरे पहले हम अपनी मेल का प्रिंट आउट लेके. उसके बेसिस पर अपनी सैकेट्री को रिप्लाई डिक्टेट करवाते थे ना. लेकिन अब हम मेल को डायरैक्ट कंप्यूटर में पढ़कर ही डिक्टेट करवा देते हैं. तो हुई ना स्टेशनरी सेव.

यस सर.

तो ये तो हो गये इन्नोवेटिव प्रोजेक्ट्स ….लेकिन अब बांकी की फिगर कहाँ से लायें. ये आई.टी. वाले भी ना. इस बार में चेयरमैन से इनकी कम्प्लेन करने वाला हूँ.

यस सर.

बॉस सोचने लगा. प्रशांत भी सोचने की एक्टिंग करने लगा. हांलाकि उसके दिमाग में चैट की प्लानिंग चल रही थी. तभी बॉस को एक आइडिया आया.

अच्छा तुम्हारे पास लास्ट मंथली रिव्यू का प्रेजेंटेशन होगा ना.

सर है तो ….लेकिन वो तो छ्ह महीने पहले हुआ था सर.

अरे वो छोड़ो … प्रजेंटेशन है ना.

यस सर.

तो बस उसी की फीगर में कुछ ऊपर नीचे करके नया प्रजेंटेशन बना दो.

लेकिन सर.

अरे छ्ह महीने पहले की फीगर थोड़े हैड ऑफिस वालों को याद है.बस थोड़ी लुक चेंज कर देना. कलर कम्बीनेशन बदल देना ताकि प्रेजेंटेशन नया सा लगे.

यस सर.

मानते हो ना मेरा दिमाग.

यस सर.सचमुच सर. सही आइडिया दिया सर.

तो हो गया सारा काम. अब प्रजेंटेशन बनाओ फटाफट.शाम तक मेरे को दे देना.

राइट सर.

प्रशांत की भी जान छूटी. उसने पी.सी. पर नजर डाली. तो कई दोस्त चैट पर ‘आर यू देयर’ कहके या ‘हाई’…कहके उसका इंतजार कर रहे थे.वो फिर से चैट करने में बिजी हो गया.

Mar 212008
 

कल शाम को ऑफिस से निकलने ही वाला था कि मेरी पोस्ट पर कमेंट आया.

गूगल इंडिया के बंगलोर ऑफिस से जारी की गयी न्यूज़ के अनुसार ब्लागवाणी अब गूगल.ब्लागवाणी .कॉम हो गयी हैं ।

पहले तो कुछ समझ में नहीं आया कि यह क्या है.लेकिन फिर केवल सच का पीछा करते हुए यहां पहुंचे तो पूरी खबर के बारे में पता चला.सिरिल को फोन मिलाया तो फोन काफी देर तक बिजी मिला. सोचा अब मैथिली जी और सिरिल तो बड़े लोग हो गये हम जैसे चिरकुट के लिये उनके पास कहाँ समय है. फिर अरुण अरोरा पंगेबाज को फोन मिलाया तो उन्होने खबर की पुष्टि की. यह पुष्टि उन्होने फोन पर की थी. चैट पर की होती तो बिना उनसे पूछे पोस्ट में चिपका देते और वह फिर कितना भी सर फोड़ते तब भी नहीं हटाते. एस.एम.एस. भी किया होता तब भी ऐसे ही चिपकाना था. लेकिन फोन की बात को कैसे पोस्ट मे चिपकाते इसलिये हमने उनसे विनती की (इससे पहले तक निवेदन करते थे लेकिन अब पंगेबाज का रुतबा भी बढ़ चुका है जी) कि भाईसाहब हमारी पोस्ट पर आकर एक टिप्पणी के माध्यम से इसकी पुष्टि कर दो.

उन्होने हमारी विनती सुन ली. आजकल भगवान तो किसी को सुनते नहीं है लेकिन उन्होने सुन ली. सुबह उठकर ब्लॉग देखा तो उनकी टिप्पणी थी.

हम ब्लॉगवाणी के प्रवक्ता के नाते ऊपर वाली खबर की पुष्टि करते हैं और यह विश्वास दिलाते हैं कि गूगल ब्लॉगवाणी से जुड़े हर ब्लॉगर को एक एक लाख रुपया दिया जायेगा.काकेश जी के ब्लॉग के जरिये सभी को इस डील के बारे में पता चला इसलिये उन्हे भी सात % धन दिया जायेगा. वह चाहें तो नयी कंपनी में भी कोई उच्च पद संभाल सकते हैं.

अब अन्धा क्या चाहे दो आंख हम तो सिर्फ काने ही हैं एक से ही काम चलेगा जी. तो हम तो इस चीज की प्रतीक्षा में हैं कि हमें कौन सा उच्च पद प्रदान किया जायेगा. सुबह अरुण जी से फिर बातें हुई तो उन्होने बताया कि ब्लॉगवाणी से जुड़े सारे ब्लॉगर्स को दो दिन,दो रात का गोवा भ्रमण मुफ्त में कराया जायेगा.

यह तो हम सब के लिये बड़े काम की खबर. करना सिर्फ यह है कि जाने के इच्छुक सभी ब्लॉगर्स को इस पोस्ट पर टिप्पणी करनी है. उनके नाम का टिकट बना दिया जायेगा. दिनांक एक अप्रेल 2008 को सुबह नौ बजे की गो-एयर की फ्लाइट से हम सभी गोवा के लिये रवाना होंगे. रास्ते में सभी को भांग की ठंडाई भी सर्व की जायेगी. उम्मीद है कि सिरिल जी (अब तो जी कहना ही पड़ेगा ना) अपने मर्जर अनुभवों से हम सभी को परिचित करवाऐंगे.

इस बढिया काम के लिये ब्लॉगवाणी को बधाई. इच्छुक ब्लॉगर भांग पीने और होली खेलने से पहले अपनी टिप्पणी कर जायें. ताकि हम भांग का नशा उतरने के बाद आपके टिकट बनवा सकें.

ब्लॉगवाणी की ओर से यह अपील मैं उच्च पद प्राप्त करने के नाते आप सभी से कर रहा हूँ.

 

आपके सहयोग का आकांक्षी

काकेश

उच्च पद (गूगल-ब्लॉगवाणी)