मेरी व्यस्तता कम होने का नाम नहीं ले रही है. ज्ञान जी ने तो पहले ही इन कारणों से लिखना कम कर दिया. हमारे रोल मॉडल तो ज्ञान जी ही हैं तो जब उन्होने लिखना कम किया तो लाज़मी है हमको भी करना ही पड़ेगा.तो अभी नियमित लिखना संभव नहीं हो पायेगा. हाँ चिट्ठे पढ़्ना जारी रहेगा लेकिन हर जगह टिपियाना संभव नहीं होगा. मेरे ब्लॉग में आज का दिन व्यंग्य का है. तो चलिये आपको परसाई जी का एक व्यंग्य पढ़वाते हैं.

किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची। हलचल का कारण कोई राजनीतिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था कि एक मंत्री का अचानक मुण्डन हो गया था। कल तक उनके सिर पर लंबे घुंघराले बाल थे, मगर रात में उनका अचानक मुण्डन हो गया था। सदस्यों में कानाफूसी हो रही थी कि इन्हें क्या हो गया है। अटकलें लगने लगीं। किसी ने कहा- शायद सिर में जूं हो गयी हों। दूसरे ने कहा- शायद दिमाग में विचार भरने के लिए बालों का पर्दा अलग कर दिया हो। किसी और ने कहा- शायद इनके परिवार में किसी की मौत हो गयी। पर वे पहले की तरह प्रसन्न लग रहे थे। आखिर एक सदस्य ने पूछा- अध्यक्ष महोदय! क्या मैं जान सकता हूं कि माननीय मंत्री महोदय के परिवार में क्या किसी की मृत्यु हो गयी है?

मंत्री ने जवाब दिया- नहीं। सदस्यों ने अटकल लगायी कि कहीं उन लोगों ने ही तो मंत्री का मुण्डन नहीं कर दिया, जिनके खिलाफ वे बिल पेश करने का इरादा कर रहे थे। एक सदस्य ने पूछा- अध्यक्ष महोदय! क्या माननीय मंत्री को मालूम है कि उनका मुण्डन हो गया है? यदि हां, तो क्या वे बतायेंगे कि उनका मुण्डन किसने कर दिया है?

मंत्री ने संजीदगी से जवाब दिया- मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं!

कई सदस्य चिल्लाये- हुआ है! सबको दिख रहा है। मंत्री ने कहा- सबको दिखने से कुछ नहीं होता। सरकार को दिखना चाहिए। सरकार इस बात की जांच करेगी कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं। एक सदस्य ने कहा- इसकी जांच अभी हो सकती है। मंत्री महोदय अपना हाथ सिर पर फेरकर देख लें। मंत्री ने जवाब दिया- मैं अपना हाथ सिर पर फेरकर हर्गिज नहीं देखूंगा। सरकार इस मामले में जल्दबाजी नहीं करती। मगर मैं वायदा करता हूं कि मेरी सरकार इस बात की विस्तृत जांच करवाकर सारे तथ्य सदन के सामने पेश करेगी। सदस्य चिल्लाये- इसकी जांच की क्या जरूरत है? सिर आपका है और हाथ भी आपके हैं। अपने ही हाथ को सिर पर फेरने में मंत्री महोदय को क्या आपत्ति है?

मंत्री बोले- मैं सदस्यों से सहमत हूं कि सिर मेरा है और हाथ भी मेरे हैं। मगर हमारे हाथ परंपराओं और नीतियों से बंधे हैं। मैं अपने सिर पर हाथ फेरने के लिए स्वतंत्र नहीं हूं। सरकार की एक नियमित कार्यप्रणाली होती है। विरोधी सदस्यों के दबाव में आकर मैं उस प्रणाली को भंग नहीं कर सकता। मैं सदन में इस संबंध में एक वक्तव्य दूंगा।

शाम को मंत्री महोदय ने सदन में वक्तव्य दिया-अध्यक्ष महोदय! सदन में ये प्रश्न उठाया गया कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं? यदि हुआ है तो किसने किया है? ये प्रश्न बहुत जटिल हैं। और इस पर सरकार जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं दे सकती। मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं। जब तक जांच पूरी न हो जाए, सरकार इस संबंध में कुछ नहीं कह सकती। हमारी सरकार तीन व्यक्तियों की एक जांच समिति नियुक्त करती है, जो इस बात की जांच करेगी। जांच समिति की रिपोर्ट मैं सदन में पेश करूंगा। सदस्यों ने कहा- यह मामला कुतुब मीनार का नहीं जो सदियों जांच के लिए खड़ी रहेगी। यह आपके बालों का मामला है, जो बढ़ते और कटने रहते हैं। इसका निर्णय तुरंत होना चाहिए। मंत्री ने जवाब दिया- कुतुब मीनार से हमारे बालों की तुलना करके उनका अपमान करने का अधिकार सदस्यों को नहीं है। जहां तक मूल समस्या का संबंध है, सरकार जांच के पहले कुछ नहीं कह सकती। जांच समिति सालों जांच करती रही। इधर मंत्री के सिर पर बाला बढ़ते रहे। एक दिन मंत्री ने जांच समिति की रिपोर्ट सदन के सामने रख दी। जांच समिति का निर्णय था कि मंत्री का मुण्डन नहीं हुआ था। सत्ताधारी दल के सदस्यों ने इसका स्वागत हर्ष-ध्वनि से किया। सदन के दूसरे भाग से ‘शर्म-शर्म’ की आवाजें उठीं। एतराज उठे- यह एकदम झूठ है। मंत्री का मुण्डन हुआ था। मंत्री मुस्कुराते हुए उठे और बोले- यह आपका ख्याल हो सकता है। मगर प्रमाण तो चाहिए। आज भी अगर आप प्रमाण दे दें तो मैं आपकी बात मान लेता हूं। ऐसा कहकर उन्होंने अपने घुंघराले बालों पर हाथ फेरा और सदन दूसरे मसले सुलझाने में व्यस्त हो गया।

: हरिशंकर परसाई

मैं लड़ाई झगड़े से बचना चाहता हूँ.बचता रहा हूँ.बिना सूत ना कपास कोरी लट्ठम-लट्ठा करने से कुछ नहीं होता.कुछ नहीं होगा.ऐसा नहीं मुझे गालियां देनी नहीं आती या मैं किसी से फोन या चैट पर बात नहीं करता लेकिन फिर भी सार्वजनिक उल्लूपना दिखाने से बचता रहा हूँ. कुछ लोग इसीलिये मुझे नेतागिरी या हिन्दी साहित्य के लिये अनुपयोगी मानते रहे हैं.मैं भी ऐसे लोगों के भ्रम को तोड़ना नहीं चाहता हूँ.

बचपन से ही कई लड़ाकुओं के प्रदर्शन से दो चार होता रहा हूँ.हमारा देश भारत, राजनीति और संसद की लड़ाई देखने अलावा भी कई ऐसे मौके देता रहा है जहाँ आप लोगों को एक दूसरे पर कीचड़ उछालते देख सकते हैं. ऐसा सिर्फ होलियों में ही नहीं होता. आपके गली-मोहल्ले में भी होता है. आपकी सोसायटी में भी होता है. आपके पड़ोसी,सहकर्मी,दोस्त,यार,राजदार,परिचित,अपरिचित,मित्र,शत्रु, ईर्ष्यालू,शंकालू कई ऐसे लोग हैं जो मौके की तलाश में हैं और समय मिलते ही अपना कीचड़ आप पर उछाल कर नाचने लगते हैं. कीचड़ उछालने वाले खुद कीचड़ से सने हुए होते हैं इसलिये उन्हे कीचड़ की कोई परवाह नहीं होती.

जिस देश में लड़ने की परम्परा ना हो वो देश बड़ा बोरिंग सा होगा. सोचिये यदि राम-रावण का युद्ध ना होता तो रामायण को कौन पूछता. महाभारत का तो नाम ही पांडवों और कौरवों की लड़ाई से पड़ा. यदि पांडव कौरवों से नहीं भिड़ते तो द्रौपदी को लेकर आपस में ही भिड़ जाते. लड़ाई है तो हम हैं या हम हैं तो लड़ाई है. लड़ाई वह खाद है जो हमारे खेतों को उपजाऊ बनाकर उसकी फसलों को फटाफट ऊपर उठाती है. लड़ने वाला महानता की ओर अग्रसर होता है. लड़ाई में जीतने वाला विजेता कहलाता और हारने वाला शहीद. दोनों ही महान हैं.

बचपन में देखा था कि जब दो महारथी आपस में टकराते थे तो बड़े-बूढ़े लड़ाई खतम होने के लिये दोनों को आपस में हाथ मिलाने को कहते थे.दोनों महारथी सबके सामने एक दूसरे से हाथ मिला लेते थे और लड़ाई खतम मान ली जाती थी. इस हाथ मिलाने को लेकर अलग अलग लोग अलग अलग बात कहते थे.कुछ लोग यह कहते थे कि हाथ मिलने से दिल थोड़े मिल जाते थे. कोई कहता पर्दे के सामने तो अब हाथ मिले हैं पर्दे के पीछे तो पहले ही मिले हुए थे. कठपुतली का नाच देखा है ना. सामने जो दो पुतले लड़ते हैं वो एक ही व्यक्ति की दो अलग अलग अंगुली से बंधे होते हैं. पब्लिक उन पुतलों की लड़ाई देख देख कर खुश होती है.ताली पीटती है. क्या मारा !! वाह वाह जी !! शो हिट हो जाता है. पब्लिक भी खुश शो भी हिट.

अभी कल ही कोई मित्र पूछ रहे थे. कि हाथ मिल गये क्या? मुझे समझ नहीं आया वो किस की बात कर रहा है. क्योंकि अभी चुनाव बहुत दूर हैं हाथ मिलाने, हाथ छुड़ाने, हाथ छोड़ने, हाथ दिखाने, हाथ हिलाने के कई मौके आयेंगे. हाथ हाथी से मिलेगा या हाथी हाथ से ? अभी से इस पर कयास लगाना ठीक नहीं . अभी तो हम भी आप की तरह मजा ले रहे हैं.महारथियों का कठपुतली वाला शो हिट होगा तो मेरी चाय की दुकान भी चल निकलेगी ना. चलो महारथियो लड़ो… अभी से पर्दे के सामने हाथ मिलाना ठीक नहीं. पर्दे के पीछे क्या है किसने देखा?

सरकार को कोसना हर भारतीय का जन्मसिद्ध अधिकार है.देश की प्रत्येक समस्या का ठीकरा सरकार के ऊपर फोड़ देना हमारी राष्ट्रीय आदतों में शामिल है. इसी तरह सरकार की हर योजना में कुछ ना कुछ खोट निकाल कर भोली भाली भूखी जनता के सामने पकवानों की थाली की तरह प्रस्तुत करना पत्रकारों और बुद्धिजीवीयों का एक अच्छा टाइमपास है.मुझे इसमें कुछ गलत नहीं जान पड़ता. हर एक को अपनी रोजी-रोटी कमाने का हक है.कोई यदि किसी को मूर्ख बनाके यह काम करे तो इसमें क्या गलत ? मूर्ख बनाने का काम केवल सरकार ही करे यह ज़रूरी तो नहीं.लेकिन आज मैं सरकार की सराहना करना चाहता हूँ.

लोग कहते हैं कि सरकार दूरदर्शी नहीं होती.मुझे लगता है जिन लोगों को सरकार के लॉंग टर्म विज़न का पता नहीं होता वही लोग ऎसी अज्ञानता में बात करते हैं. अभी दिल्ली में 2010 में कॉमनवैल्थ गेम होने वाले हैं और सरकार तैयारियों में व्यस्त है. जनसंख्या निय़ंत्रण के लिये ब्लू लाइन बसें चलायी जा रही हैं.डैंगू, मलेरिया के मच्छरों को ओवरटाइम ड्यूटियां दी जा रही हैं.इधर बर्ड-फ्लू युक्त मुर्गियों से भी बातचीत चल रही है.नये नये फ्लाई ओवर बनाये जा रहे हैं.ऎसे ही एक फ्लाईओवर का उपयोग मैं भी हर रोज करता हूँ जो दिल्ली और गुड़गांव को जोड़ता है. इस फ्लाई ओवर से गुजरते हुए मैं सरकार के लॉंग टर्म विजन की सराहना किये बिना नहीं रहता.

सरकार ने जब इस फ्लाईओवर का निर्माण किया तो उसने केवल वाहन वालों का ध्यान ही नहीं रखा बल्कि समाज के कई और वर्गों का भी पूरा पूरा ध्यान रखा गया.उसने रोजगार देने के नये अवसर पैदा किये. टोल टैक्स बूथ बनाये जिसमें यात्रियों को जाम में फँसाये रखा ताकि वो फ्लाईओवर और टॉल टैक्स बूथ का भरपूर निरीक्षण कर सरकार के काम से परिचित हो सकें. इस बहाने कई लोगों को भीख मांगने और चने, मूंगफली बेचने का मौका मिला. कुछ टी वी चैनलों और एफ एम चैनलों को अपनी स्टोरी बनाने का अवसर दिया गया. वाहनों की भीड़ का नियंत्रण करने के लिये विशेष ड्रेस पहने और हाथ में वॉकी-टॉकी पकड़े लोगों की व्यवस्था की गयी. टॉल बूथ में कंप्यूटर के सामने बैठे लोगों के अलावा कुछ लोगों को टॉल टैक्स की पर्चियाँ बेचने के लिये भी रखा गया. ताकि कंप्यूटर का उपयोग भी हो सके और रोजगार के अवसर भी बने रहें.

टॉल टैक्स भी सोच समझ कर निर्धारित किया गया. इसका दाम जान बूझकर सोलह रुपये रखा गया. ताकि टॉल टैक्स लेने वाला बीस का नोट लेके कुछ भी न लौटाने को बाध्य हो. इस तरह वह मासिक वेतन के अलावा कुछ ऊपरी कमाई भी कर सके. सरकार यह नहीं चाहती कि ऊपरी कमाई का लाभ सरकार के चंद बाबू लोगों तक ही सीमित रह जाये. वह इस लाभ को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाना चाहती है.

सरकार ने न केवल इन लोगों के बारे में सोचा वरन फ्लाईओवर पर पैदल चलने वालों का पूरा पूरा ख्याल रखा. उसने फ्लाईओवर को क्रॉस करने के लिये भी कुछ प्रबन्ध नहीं किया.ताकि लोग रोड क्रॉस करने समय एक ओर से आती हुई तेज गाडियों को देखें और फिर थोड़ी सी जगह मिलते ही दौड़ पड़ें. फिर यदि बच गये तो बीच में पहुंच कर यही प्रक्रिया दूसरी और से आती हुई गाडियों को देख कर करें. इस तरह सभी लोगों को दौड़ने की प्रैक्टिस हो जायेगी,स्वास्थ्य बेहतर होगा और पूरा का पूरा रोमांच भी बना रहेगा. अक्सर स्कूली बच्चे भी यहाँ रोड क्रॉस करते हैं क्या पता इसी तरह प्रैक्टिस करते करते हुए वह भविष्य में ऐथलीट बन सकें. तो सरकार फ्लाईओवर के बहाने भविष्य के ऐथेलीट पैदा कर रही है. कभी कभी रोड क्रॉस करते करते यदि कोई किसी गाड़ी से टकरा कर ऊपर पहुंच जाये तो एक तो जनसंख्या नियंत्रण का लक्ष्य पूरा होगा और दूसरे टकराकर ऊपर पहुंचे व्यक्ति के घर वालों को मुआवजा भी दिया जायेगा. जितना व्यक्ति दो तीन साल में कमाता उतना मुआवजा सरकार कुछ दिनों में ही दिलवा देगी. तो है ना फायदे का सौदा.

आइये आप भी मेरे साथ सरकार के लॉंग टर्म विज़न की सराहना करें.

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मेरी कल की टिप्पणी पोस्ट पर कालिया और गब्बर सिंह के पिता जी श्री हरी सिंह की टिप्पणीयाँ मजेदार हैं. आप भी पढ़ें.

मेरी किसी पत्रकार से दोस्ती नहीं है.हाँ जान-पहचान सी है. लेकिन हर मौकों पर केवल जान पहचान से काम नहीं चलता.दोस्ती चाहिये.पत्रकारों से दोस्ती ना होने के बहुत सारे नुकसान हैं और कुछ कुछ फायदे भी हैं. सबसे बड़ा नुकसान तो यह है कि आपका नाम किसी पत्र-पत्रिका में तब तक नहीं छ्पता जब तक कि आपने सही में कोई बहुत अच्छा या बुरा काम ना किया हो. दोस्ती होने से आपके नाम के चर्चे बहुत जल्दी हो जाते हैं. फायदा तो यह है ही कि आपको फालतू की बहस में नहीं खीचा जाता.

ऎसे ही एक जान पहचान के पत्रकार हमारे पास आये.मैने उन्हें दुआ सलाम की.वो एक्दम बौखलाये हुए थे. वो अक्सर इस तरह बौखलाये हुए मेरे पास आते थे.जब जब उनकी कोई रचना किसी संपादक से रिज़ेक्ट होकर आती है वो उसे गरियाते हुए मेरे पास आते हैं.ये बात और है वो उसी रिज़ेक्ट माल को रीसायकल करते रहते थे.कभी इस पत्रिका में कभी उस पत्रिका में. इसलिये गरियाने का अवसर भी उनको मिलता रहता था.कभी इस संपादक को कभी उस संपादक को.

आज वह मेरे साथ दलित विमर्श करना चाहते थे.मैं आमतौर पर उनसे बहस नहीं करता.क्योंकि एक तो उनकी बहस का मतलब होता था कि जो वह बोल रहे हैं उसी की हाँ में हाँ मिलाओ, नहीं तो वह अपने किसी संपादक की तरह आपको गाली देने में भी पीछे नहीं हटते थे…और दूसरे मैं अपने आप को किसी भी बहस के उपयुक्त मानता भी नहीं हूँ क्योंकि बहस के लिये जिस बुद्धि,तर्क,कुतर्क, नीचपने,चाटुकारिता और चंपुओं की फौज की जरूरत होती है वो मेरे पास नहीं है. लेकिन आज वो दलित-विमर्श पर उतारू थे और मैं अपने आपको दलित विरोधी साबित नहीं करना चाहता था. मैं था भी नहीं लेकिन मेरे लिये दलित बहस का मुद्दा ना होकर सामाजिक व्यवस्था का एक अंग था जिसके उत्थान के लिये किसी बहस की जरूरत नहीं वरन सही में कुछ करने की जरुरत थी.

मैं उन्हें टालना चाहता था इसलिये जब उन्होने पत्रकारिता में एक दलित पत्रकार की तलाश या ऎसा ही कुछ कहा था तो मैने उनसे पूछा …दलित मतलब क्या ? उन्होने सोचा ना था कि मैं ऎसा मूर्खतापूर्ण प्रश्न भी कर सकता हूँ. वो थोड़ा सकपका गये लेकिन फिर भी खुद को संयत करके बोले.

“दलित …मतलब जो सरकार की सूची में दलित है. “

“यानि सरकार तय करती है कि कौन दलित है या नहीं..”

“नहीं ..हाँ ..मतलब कुछ जातियाँ है जो दलित जातियां है…”

“जैसे….”

“जैसे…माली,कहार,जुलाहा,मोची,सुनार,कचरा साफ करने वाला,गंदगी उठाने वाला…”

“लेकिन ये सब तो व्यवसाय हैं ना…”

“लेकिन यह दलित व्यवसाय हैं….जैसे मैं जुलाहा जाति का दलित हूँ…”

“मतलब आप कपड़ा बुनते हैं…”

“नहीं मैं तो पत्रकार हूँ…लेकिन…”

“तो आपके पिताजी होंगे…”

“नहीं वो तो किसी राज्य में अंडर सैक्रेटरी हैं….”

“तो फिर आप दलित कैसे हो गये…आप तो दलित नहीं हो सकते..”

“नहीं मेरे पूर्वज कपड़ा बुनते थे…”

“तो आपके पूर्वज दलित हुए …आप तो पत्रकार हुए ना…”

“लेकिन… मेरे पास जाति प्रमाण पत्र भी है…”

“यानि जाति प्रमाण पत्र निर्धारित करता है कि आप दलित हैं कि नहीं और ये प्रमाण पत्र कौन देता है..

“ये सरकार देती है…”

“यनि कोई भी एक प्रमाण पत्र लेकर यह प्रमाणित करदे कि वह मोची है तो वह मोची हो जायेगा…भले ही वह काम कुछ भी करे…”

“लेकिन यह तो सरकार का नियम है…”

“हाँ सरकार का नियम तो है ही कि मलाई खाने वाले को मलाई खाने दो…”

“देखिये आप दलितविरोधी बात कर रहे हैं.”

“लेकिन……”

वो अपनी पर उतर आये थे.

आपको तो बिल्कुल भी समझ नहीं है… मैं पूरे मोहल्ले में प्रचार करुंगा कि आप दलित विरोधी है. अपने चंपुओं की फौज आपके पीछे लगा दुंगा…बचके रहियेगा”

वो बड़बड़ाते हुए निकल गये…मैं खुश था कि चलो पीछा छूटा…

मैं बुद्धिजीवी नहीं हूँ यानि मैं कोई ऎसा काम नहीं करता जिसमें बुद्धि की तनिक भी जरूरत होती है. इससे कहीं आप यह ना समझें कि मैं एक नेता हूँ या हिन्दी का कवि हूँ इसलिये साफ कर दूँ कि मैं यह दोनों भी नहीं हूँ. लेकिन फिर भी मैं हूँ. मेरा अस्तित्व है. इसलिये देखता हूँ.मन हो तो कभी कभी सोचता भी हूँ. सोचने के लिये मुझे बुद्धि की जरूरत नहीं होती. मैं कुछ सोचना ना भी चाहूँ तो भी दिमाग कुछ ना कुछ सोचता ही है.इसलिये मैं सोचने का क्रेडिट नहीं लेना चाहता. कुछ लोग इसी सोच का क्रेडिट ले लेते है.वह इस सोच को अपनी बुद्धि समझते है और खुद को बुद्धिजीवी.

हमारा देश बुद्धिजीवीयों का देश है.लोग हर काम में अपनी बुद्धि लगाते हैं. ऎसा वह खुद के कामों में नहीं दूसरे के कामों में करते हैं. खुद के काम बिना बुद्धि के भी हों तो चलता है बस किसी भी काम में सिर्फ इतना होना चाहिये कि पैसा बराबर आता रहे. बुद्धि लगे ना लगे. पैसा बुद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसे कमाने के लिये बुद्धि लगे यह जरूरी नहीं है. लेकिन दूसरे के हर काम में अपनी बुद्धि लगाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. मुझे लगता है जब इस देश के लोग स्वतंत्रता की मांग कर रहे होंगे तो उनका लक्ष्य यह ही रहा होगा कि हम स्वतंत्र हो जायें  ताकि दूसरे के कामों में अपनी बुद्धि लगा सकें. माफ कीजिये मैं स्वतंत्र भारत में पैदा हुआ इसलिये सिर्फ अनुमान ही लगा सकता हूँ और फिर मैं इतिहासकार भी नहीं हूँ-बुद्धिजीवी तो नहीं ही हूँ, कि अपने अनुमानों को किसी तरह से सिद्ध भी कर सकूँ.

दूसरे के कामों में अपनी बुद्धि लगाना हमारे अस्तित्व का प्रतीक है. यदि हम हैं तो बुद्धि लगायेंगे.दूसरों के चलने से लेकर खाने तक, उठने से लेकर बैठने तक, पत्नी से लेकर लिखने तक (यहाँ आशय पत्नी द्वारा लिखे को छापने से नहीं है) सब जगह अपनी बुद्धि का खटोला बिछाना जरूरी है.इसी खटोले पर जब हमारे तर्कों,वितर्को और कुतर्को के बच्चे अठखेलियां करें तो कलेजे में ठंडक सी होती हैं. वाह बच्चे बड़े हो रहे हैं और हम बूढ़े.

पहले बढ़ी हुई दाढ़ी, कंधे से लटका हुआ झोला-उसमें चंद किताबें और लिफाफे,हाथों में सिगरेट यह एक बुद्धिजीवी की पहचान थी.कालांतर में इस छवि में परिवर्तन हुआ. अब आप क्लीन शेव भी हो सकते हैं, झोला विहीन भी भ्रमण कर सकते हैं,सिगरेट छोड़ भी सकते हैं लेकिन दूसरो के कामों में बुद्धि लगाना नहीं छोड़ सकते. वही आपका असली धंधा है.

भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है. हम बुद्धि की खेती करते हैं. बुद्धिजीवीयों की फसलें लहलहाती है.फसल ज्यादा होने पर हम बुद्धिजीवी एक्स्पोर्ट भी करते हैं.लेकिन ध्येय यही रहता है कि बुद्धिजीवी जहां जाये वहाँ कमाता खाता रहे. बोझा ना बने. दूसरों को बोझा उठाना सिखाये और खुद मजदूरी ले.हमारा यह परम कर्तव्य है कि हम खुशी खुशी यह मजदूरी दे दें.यह एक स्वचालित प्रक्रिया है. हमें इसके लिये सोचना नहीं पड़ता. बचपन से हम देखते आये हैं जो नेता झूठ के ज्यादा पुलिंदे बांध सकता है वही हमारे वोट का अधिकारी होता है.अब नेता बुद्धिजीवी नहीं हो सकता यह सर्वमान्य है लेकिन बुद्धिजीवी तो नेता हो ही सकता है. इसमें कहां कैसा प्रश्न.

आप कहीं यह अनुमान ना लगा लें कि मैं किसी कविता नामक सुकन्या के प्रेमपाश में बंधकर कवि बनना चाहता हूँ इसलिये मैं यह घोषणा करना चाहता हूँ कि मुझ बाल बच्चेदार को किसी से प्यार व्यार नहीं है (अपनी पत्नी से भी नहीं :-) ) बल्कि मैं तो लिखी जाने वाली कविता से प्रेम की पींगे बढ़ाना चाह रहा हूँ और ऎसा मैं इसलिये कर रहा हूँ क्योंकि आज के जमाने में मुझे कविता का महत्व पता चल गया है.

मैं अक्सर कुडकुड़ करता हूँ और दिन में एक बार ही इस कुड़कुड़ को करना मेरे को बड़ा भारी लगता है. मेरे पूरे लेख को पढ़ने के बाद लोगों के समझ में भी नहीं आता कि  आखिर मैं क्या कहना चाह रहा हूँ.इसका एक  फायदा तो यह है ही कि भविष्य में मुझमें नेता बनने के पूरे गुण हैं लेकिन अभी हाल फिलहाल मैं कवि भी बन सकता हूँ. जिस लेख के लिये मैं तीन सौ चार सौ शब्दों का जाल बुनूँ वह बात महज पचास साठ शब्दों में भी कह सकता हूँ. बात वह तब भी समझ में नहीं आयेगी लेकिन मैं तो कवि बन ही जाऊंगा.

कविता भले की किसी भी अर्थ में उपयोगी ना हो पर उस पर वाह वाही मिलने के भरपूर तत्व होने चाहिये. वह भले ही किसी के समझ में ना आये लेकिन आप का लहजा और व्यक्तित्व का प्रभाव ऎसा हो कि सामने वाला चाहे वह आपकी कविता पढ़ रहा हो या सुन रहा हो वो वाह वाह कहने को विवश हो जाये. कविता एक कला है और कला किसी काम की भी हो यह जरूरी नहीं. कला में कोई तथ्य हों या वह हर किसी के पल्ले पड़ जाये यह भी आवश्यक नहीं है. कविता शब्द सम्मोहन की विधा है जो किसी भी कवि सम्मेलन में पहलवान की धोबी पछाड़ सी चलती है और सामने बैठे लोगों को चारों खाने चित्त कर देती है. वाह वाह…क्या बात है .. मजा आ गया .. जैसे प्रोत्साहनी वाक्य हवा में तैरने लगें तो समझिये कविता ने मैदान मार लिया.

उर्दू वालों ने कविता की बहुत सेवा की है. ग़ालिब से लेकर मीर ने ऎसे ऎसे शेर लिखे कि वो आज भी किसी महफिल की जान बने रहते हैं. हर मौके और हर अवसर के लिये एक शेर हाजिर हो जायेगा. लेकिन कौन ऎसा माई का लाल होगा जिसने पूरा उर्दू साहित्य पढ़ा होगा इसलिये आप उर्दू शायरी से कुछ भी लेके (वैसे हिन्दी से भी ले सकते हैं लेकिन थोड़ा रिस्क है) उसमें अपने शब्दों का थोड़ा छोंक लगाकर झोंक दीजिये फिर देखिये….शत प्रतिशत सफलता आपके चरण चूमेगी यदि आप जारी रहे तो यही सफलता चरणों से होंठों तक भी जा सकती है फिर भले ही बांकियों के सर में दर्द हो पर आपके होंठों पर मुस्कान रहेगी.  

कविता सामुहिक चेतना की संस्थापक है. आप अपने जैसे बेकार कवियों को ढूंढने निकलिये… एक को ढूंढेंगे हजार मिलेंगे और फिर आप सामुहिक रूप से कविता कीजिये.वाह वाही बिना ब्याज का कर्ज है. यानि आप कविता करें तो अगला वाह वाह कर आपको कर्ज दे और उसकी कविता में आप वाह वाह कर उस कर्ज को उतार दें. समूह में कविता से कई फायदे हैं आप एक पूरे समूह को मूर्ख बना सकते हैं और बार बार बना सकते हैं. सब घुलमिल कर कविता करें… वाह वाही लूटें.

सामुहिक कविताओं के श्रोता और पाठक बड़े पारखी हैं. भले ही आपकी कविता उनके समझ ना आये. भले ही आप सदियों से कही जा रही बात को बिना किसी आधार के फिर फिर कहें. भले ही आपको ना शब्दों की समझ हो ना उनके अर्थों की. लेकिन यदि आप एक नेता की तरह भीड़ को मूर्ख बनाना जानते हैं तो वह वाह वाह करेंगे ही. आप सफल कवि हैं. आपकी जय जयकार होगी.आप खुश रहिये. आपके स्थायी चमचे आपके साथ हैं. अभी आपको पार्टी बदलने की जरूरत नहीं.

मैं सोच रहा हूँ कि मैं भी कवि बन ही जाऊं और पकड़ूं अपने जैसे कुछ और मूर्खों को….. आप क्या कहते हैं ???..आप साथ आना चाहेंगे… :-)

किसी को मिर्ची लगे तो कैसा लगता होगा मतलब खुशी होती होगी या गुस्सा आता होगा,दुख होता होगा या खीझ होती होगी, यह जीवन मिथ्या लगने लगता होगा या बदले में दूसरों को गाली देने का मन करता होगा, खुद को सयाना मान लेने लगते होंगे या दूसरों को नादान समझने लगते होंगे,खुद को बुद्धीजीवी और दूसरों को बुद्धू मानने लगते होंगे या अपने बचे खुचे सर के बाल नोचने लगते होंगे.अब यह तो वही बता सकता है जिसको मिर्ची लगी हो लेकिन खाकसार ने मिर्ची पर एक शोध किया है जो शीघ्र ही अफ्रीकन देश बुर्गुंडी की प्रतिष्ठित पत्रिका “खामोश लब” में छ्पने वाला है. प्रस्तुत हैं उसी के कुछ संपादित अंश. 

मिर्ची मुख्यत: तीन प्रकार की होती है. एक वह मिर्ची जो आप खाओ तो आपको ही लगती है दूसरी वह जो आपके खाने से नहीं वरन कुछ करने या ना करने से दूसरों को लगती है तीसरी मिर्ची वह होती है जो खायी नहीं जाती वरन सुनी जाती है.आइये इन्ही तीनों प्रकार जी मिर्ची पर एक विस्तृत नजर डालें.

पहली मिर्ची वह होती है जो आमतौर पर हरे या लाल रंग की होती है यह आकार में लंबी होती है.इस प्रकार की मिर्ची खाने के काम आती है लेकिन अधिकांशत: खाते ही यह अपना रंग दिखाना चालू कर देती है.इसके लगने के लक्षणों में मुंह का लाल होना, आंखों या नाक से पानी आना प्रमुख हैं. इस प्रकार की मिर्ची खाते समय तो केवल मुँह में ही लगती है लेकिन खाने के बाद और भी कई जगहों पर लगती है.कई बार इसका असर चौबीस से अड़तालीस घंटो तक रहता है.ज्यादा मिर्ची लगने पर लोग पानी का प्रयोग करते हैं कई बार कुछ लोग बरफ का प्रयोग भी करते पाये जाते हैं.आप अपनी इच्छानुसार मिर्ची का प्रयोग कम या ज्यादा कर सकते हैं.यह मिर्ची आमतौर पर सबको समान रूप से लगती है हालांकि स्त्रियाँ इस प्रकार की मिर्ची का प्रयोग ज्यादा करती है पर उन पर इसका असर कम होता देखा गया है. 

दूसरी प्रकार की मिर्ची सबसे खतरनाक टाइप की होती है.इस मिर्ची का असर सब पर समान रूप से नहीं होता. यह शरीर के किस हिस्से में लगती है इस पर अभी शोध जारी है. इसका असर अलग अलग परिस्थितियों में अलग अलग समय तक रहता है.जैसे कांग्रेस कुछ करती है तो लैफ़्ट को मिर्ची लग जाती है और यह तब तक लगती रहती है जब तक की उनकी धमकियों से कांग्रेस वाले लोग उसी तरह से मिमियाने ना लगें जैसे कुत्तों के भौंकने पर बिलौटे मिमियाने लगते हैं. हमारे देश के एक महान कलाकार गोविंदा जी के जीवन वृतांत का अध्ययन करें तो आप पायेंगे कि अपने जमाने में जब वह रस्ते से जा रहे थे,भेल पूरी खा रहे थे और साथ में लड़की भी घुमा रहे थे तो करिश्मा जी को मिर्ची लगी थी. खाकसार का मानना है कि यह मिर्ची इसलिये लगी होगी क्योंकि गोविंदा जी खुद तो भेल पूरी खा रहे थे लेकिन लड़की को सिर्फ घुमा रहे थे तो यह बात तो किसी भी भिन्नाटी टाइप नारीवादी महिला  को बुरी लगेगी ही ना.एक स्त्री के शोषण का सवाल है यह कोई मजाक या मौज का विषय नहीं.इस मिर्ची के लगने के लक्षण भी अलग अलग व्यक्तियों पर अलग अलग पड़ते हैं.इस मिर्ची का प्रभाव भी परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग समय तक रहता है. यह मिर्ची आमतौर पर सबको समान रूप से नहीं लगती है जैसे स्त्रियों को यह मिर्ची थोड़ी जल्दी लग जाती है. अपने लैफ़्ट वाले भी आये दिन इस मिर्ची का शिकार बनते रहते हैं.

तीसरी प्रकार की मिर्ची सुनने के काम आती है और शास्त्रों के अनुसार इस प्रकार की मिर्ची सुनने वाले आल्वेज खुश रहते हैं यहाँ तक की ये लोग गटर में गिरे होने के बाबजूद सुहाने मौसम के गाने गा सकते हैं. इससे यह सिद्ध होता है कि तीनों प्रकार की मिर्चियों में इस मिर्ची को ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिये लेकिन आंकड़ों के मुताबिक व्यवहार में दूसरे टाइप की मिर्ची ज्यादा प्रयुक्त होती है.

आप भी इस बारे में अपनी राय से अवगत करायें ताकि आपकी राय भी शोध पत्र में शामिल की जा सके.

वो मेरे मित्र थे.पत्रकार तो वो थे ही लेकिन साथ साथ एक कवि भी थे, यानि कि पूरा का पूरा डैडली कंबीनेशन. लिखने बैठते तो किस विषय पर क्या लिख दें इसका उनको ही पता नहीं रहता था. प्रमाद की अवस्था में पहुंच जाते तो क्या क्या बकने लगते.दूसरों के लिखे को अपना बताने लगते. एक न्यूज चैनल में थे.उनका काम था समाचारों की समीक्षा करना. मूड हुआ तो घंटे में चार के हिसाब से समीक्षा लिख डालते नहीं अपनी पैन से कभी सर और कभी कान खुजाते.

उनकी सबसे बड़ी समस्या थी कि वो समझते कि लोग उन्हे पत्ता नहीं देते. शंकर जी के पक्के भक्त थे तो शिकायत भी उन्ही से करते. भगवान देख ना उसे देख कैसे वह बॉस के साथ हँस हँस कर बात कर रहा है. बॉस मेरे साथ ऎसे बात क्यों नहीं करता.जबाब भी वह जानते थे. मैं बॉस के साथ दारू नहीं पीता ना.वो सीधे सादे थे. दारू पीना, देर रात तक प्रेस क्लब में चिकन की टांग तोड़ते हुए अंतर्राष्टीय समस्याओं पर विचार करना ये सब उनकी आदतों में शामिल नहीं था. वे तेल लगाने की सार्वभौमिक कला में माहिर भी ना थे. इसलिये अठारह बीस साल भाड़ झोकने के बाद भी अभी वह वो मुकाम हासिल नहीं कर पाये थे जो यह ‘नये लौंडे” तीन चार सालों में ही कर लेते थे.

एक दिन मेरे पास आये और कहने लगे. “मैं यह नौकरी छोड़ दुंगा, नहीं करनी मुझे यह पत्रकारिता”. उनके दो छोटे छोटे बच्चे थे. जो अभी पढ़ रहे थे. उनका ख्याल करते हुए मैने उन्हें समझाने की कोशिश की और जानना चाहा कि आखिर क्यों वह नौकरी छोड़ना चाहते हैं. “अरे साले एक ही स्टोरी को सुबह से शाम तक चलाते रहते हैं…और मुझे कहते हैं कि इसे कभी इस ऎगिल से चेंज करो …कभी उस ऎगिल से.. वीडियो फुटेज कम होते हैं..तो एक ही विडियो को बार बार प्ले करते हैं और कहते हैं कि आप स्टोरी चालू रखो.. खाक स्टोरी चालू रखो…मैं कोई कहानीकार थोड़े हूँ ..पत्रकार हूँ… बिना कुछ हुए कैसे लिखूँ…मैं बदलाव लाऊंगा“. मैं इससे पहले कि उन्हे कुछ समझाता वो अपनी आवाज को और ऊंची कर बोलने लगे. ” वो साला खुद से एक लाइन नहीं लिख सकता ..खुद का एक भी कॉंसैप्ट नहीं है…मेरे कॉंसैप्ट ले जाता है और उन पर लिखता है… ” जाहिर है वो प्रमाद की अवस्था में जा रहे थे. मैने इस बात पर उन्हे छेड़ना उचित नहीं समझा कि वो नौकरी क्यों छोड़्ना चाहते हैं…निश्चित ही उनके दिल को गहरी चोट लगी थी..मैं जानता हूँ इस तरह के भावनात्मक आदर्शवाद से उनके सहकर्मी भी दो चार होते थे. लेकिन चार घूंट अन्दर जाते ही सारी आदर्शवादिता हवा हो जाती.

मैने प्रश्न बदलते हुए कहा कि “नौकरी छोड़ दोगे तो फिर करोगे क्या? अपना परिवार कैसे चलाओगे?” उनके चेहरे ने कई रंग एकसाथ बदले. लगा जैसे वो आसमान से जमीन पर आ रहे हों. लेकिन ठसक अभी बांकी थी… मैं कविता लिखुंगा. अपना कविता संग्रह छ्पवाऊंगा. वो हिन्दी के कवि थे इसलिये मेरे चेहरे पर मुस्कान तैर गयी…लेकिन साथ साथ मुझे उनके बच्चों का भूखा भविष्य भी नजर आने लगा. मैने उनसे पूछा …आप किस पर कविता लिखेंगे ..वही चांद, वही सूरज, वही तारे, वही प्रकृति, वही प्यार, वही कसमें, वही वादे,वही रूठना, वही मनाना,वही रस,वही छंन्द…बस इन्ही को तो अलग अलग ऎंगल से देखेंगे ना. .. वो फिर भड़क उठे..कहने लगे ..ये सब कविताऎं तो ना जाने कब से लिखी जा रही हैं.तुम्हे तो कविता की समझ ही नहीं ..यह सब कविता तो पुराने जमाने की छायावादी कविता है…मैं तो यथार्थवादी कवि हूँ…. मैं लिखुंगा भूख पर, बेरोजगारी पर,भष्टाचार पर, बाजारवाद पर, पूंजीवाद पर, छ्द्म साम्यवाद पर… वो आगे भी बोलते लेकिन मैने उन्हे रोककर कहा…लेकिन इन सब पर भी तो पिछ्ले ना जाने कितने साल से कविताऎं लिखी जा रही हैं…क्या हुआ..एक ही वीडियो है जिसे बार बार प्ले किया जा रहा है… आप क्या करेंगे एक ही स्टोरी को थोड़ा अलग ऎगल से दिखायेंगे ना..उससॆ क्या होने वाला है..क्या उससे तसवीर कुछ बदल जायेगी…यही करना है तो जहाँ हैं वही क्यों नहीं करते ..कम से कम घर तो चलेगा….

उनके चेहरे की दृढ़ता निरिहता में बदलती गयी.. उनके हाथों की बँधी मुट्ठियाँ ढीली हो गयी….आदर्श के सारे सपने टूटकर चकनाचूर हो गये थे..वो उठे और कहने लगे..नहीं मैं यह नौकरी नहीं छोड़ूंगा.

कहते हैं हम को समय की मांग के हिसाब से काम करना चाहिये.कल अमरीका जाने की बात की तो गुरु अजदक नाराज हो गये. वो खुद पहले इटली और अब चीन की यात्रा कर रहे हैं लेकिन हमको अमरीका नहीं जाने देंगे. इसलिये हमहूँ डिसाइड कर लिये कि हम झुमरी तलैया शिफ्ट हो जाते हैं. इसके जो फायदे हम को नजर आये वो यह हैं.

1. एक तो यह कि लोग कहते हैं कि ब्लॉगिंग में बिहारवाद आ रहा है.इसीलिये सब लोग बिहार छोड़ कर बड़े शहरों में शिफ्ट हो रहे हैं और अपने अनुभव बता रहे हैं. हम बड़ा शहर छोड़ के बिहार शिफ्ट होंगे और वहाँ से अपने अनुभव लिखेंगे और 10-12 पोस्ट इसी पर ठेल देंगे. फिर लोग ब्लॉगिंग में बिहारवाद की नहीं वरन बिहार में ब्लॉगवाद की चर्चा करेंगे. 

2. हमार झुमरी तलैया रेडियो में अपने फरमाइश भेजने के लिये माहिर रहा है. किसी भी फर्माइशी कार्यक्रम यदि झुमरी तलैया की फरमाइश ना हो तो वो कार्यक्रम पूरा नहीं होता. फिर हमहूँ अपनी फरमाइश भेज के अपने पसंद के गाने सुन सकेंगे.

3. आजकल ब्लॉग-सृजन के लिये सम्मान  के लिये दिये जा रहे हैं उसमें भी बड़े शहरों वालों को शामिल नहीं किया गया है. ठीक किया जी …वैसे भी हमें बड़े शहर में कोई सुविधा नहीं है ..और हमने तो सुना है जी कि आजकल लोग रतलाम जैसी छोटी जगह में 2 एम बी पी एस का कनेक्शन इस्तेमाल करते हैं और इलाहाबाद जैसी जगह में जी.पी.आर.एस से ब्लॉग पढ़ लेते हैं …हमें तो यह सब सुविधा बड़े शहर में मिल ही नहीं पाती…बस एक कंपनी से मिले लैपटॉप को कंपनी से मिले डेटाकार्ड के जरिये सिर्फ लैप में ही इस्तेमाल करते हैं जी…..दो तो छोड़ एक टेबल भी नही है लैपटॉप रखने के लिये. इसलिये झुमरी तलैया चले जायेंगे तो यह सब सुविधा भी मिल जायेगी और फिर हमरा नाम भी ऎसे सम्मानों में शामिल हो जायेगा.:-)

4. अक्सर फिल्मों में झुमरी तलैया का जिक्र होता रहता है. जब भी ऎसा जिक्र होगा हमको भी लगेगा कि हमारे शहर का नाम हो गया जी.

इसलिये हम फॉर-द-टाइम-बीइंग झुमरी तलैया शिफ्ट हो रहे हैं जी…..

सम्मान वाले लोग सुन रहे हैं ना…

सुनो-पंगेबाज 2007-2008 के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर पुरुस्कार दे रहे हैं. एक ओर जब भारत रत्न के लिये लाइन लगी है वहीँ दूसरी ओर पंगेबाज जी महोदय की  टिप्पणीयों में लोग दावा कर रहे हैं कि उन्हे पुरुस्कार दिया जाय लेकिन शायद वो अपने पुराने पंगेबाज यानि खाकसार को भूल गये.

देखिये जी आजकल सब खेल पहले होने का है कल हमने अपनी भी अपनी एक पहली पोस्ट डाली थी पूरे प्रूफ के साथ.लेकिन आप लोग उसे देखना भूल गये ….तो पहले तो उसे देखिये फिर हम देते हैं पंगेबाज पुरस्कार के लिये अपना नामांकन.वैसे भी जब मेन पंगेबाज दौड़ से बाहर हैं तो हमारे चांसेज तो पक्के हो ही जाते हैं. [ वैसे भी कल हम एक स्पेशल चांदनी बार में सुनो-पंगेबाज से मिल चुके हैं और उन्हे गिफ्ट भी प्रदान कर चुके हैं.अब देखते हैं कौन रोकता है हमें]

क्या आपने किसी नये ब्लोगर को अपनी दूसरी पोस्ट में ही बड़े बडों से पंगा लेते सुना है. नहीं सुना तो आप खाकसार को नहीं जानते.हमने अपनी दूसरी ही पोस्ट में पंगा ले लिया जी. पढिये आचार संहिता का अनाचार जिसको पढ़कर हमारे एक अग्रज और मित्र हमें धूमकेतु नाम से पुकारने लगे और हम निराश होकर कविता करने लगे.

फिर हमने पंगा लिया अपने पत्रकार भाइयों से जब हमने अपना शोध-पत्र पत्रकार यूँ बने ब्लौगर !!  पेश किया. ये लोग जब ज्यादा नहीं चिढ़े तो हमने पंगे को और आगे बढाया. उनसे सीधा पूछ ही लिया कि क्या होगा आपका पत्रकार महोदय ?? 

फिर हमने जूता- सैंडल पुराण – भाग 1 में उस समय के चिट्ठाजगत के दो महारथियों से  पूरा पंगा लिया.. यह अलग बात है जूते खाने से हम भी परेशान रहे और जूता – सैंडल पुराण -भाग 1.5 में हमें बहुत डांट पड़ी. जिसको हमने रिकॉर्ड कर पॉडकास्ट द्वारा लोगों को भी सुनाया…खैर रोते-धोते जूता-सैंडल पुराण का अंतिम भाग किसी प्रकार पूरा किया गया.

फिर बेनामी की एक सूनामी आयी तो हम बोले बेनामी सूनामी से भी ज्यादा भयंकर !!?? है और फिर ज्ञान देने लगे कि आओ ‘अनाम’ के अस्तित्व को स्वीकारें.

इधर हम अपने सामाजिक दायरे को लेकर भी चिंतित थे. क्योंकि हमारे मोहल्ले का माहौल बड़ा विकट हो रहा था तो हम लिखे आईये ‘मोहल्ला’ बदल डालें…जिसे पाठकों ने ना जाने किस किस से जोड़ने की कोशिश की ..हम तो डिस्क्लेमर लगा ही चुके थे जी इसलिये हम सदी की सबसे बरबाद कविता लिख कर फिर पंगा लेने लगे.

उधर हमें सुनो-पंगेबाज की असलियत पता चली और हम गदर्भ गान गाने लगे गधा मिलन को जाना. लेकिन तभी हमारे पड़ोसी बिरयानी और दाल-भात जैसे विषयों पर लड़ने लगे. उनको समझाया गया और एक और गीत धड़-धड़-धड़-धड़, बम बम बम बम….. गाया गया.

फेहरिस्त तो अभी काफी लंबी है पर हमें लगता है इस छोटे से पुरस्कार के लिये इतना काफी है.

आप क्या बोलते हैं जी ??

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