कोई पुरुस्कार दिया जाय और विवाद ना हो ये तो ऎसा ही हुआ कि एकता कपूर का सीरियल हो और दो तीन लव अफेयर ना हों..या फिर कहीं राखी सावंत हो और ड्रामा ना हो. वैसे राखी सावंत से याद आया ..सुना है ड्रामा आइटम क्वीन आजकल बहुत से पुरुस्कार से वंचित लोगों की आदर्श बन गयी हैं…पुरस्कार ना मिले तो सबको गरियाने की कला की पेंटेंट-धारी राखी..हाय मर जावाँ मेरी रोल मॉडल...खैर उस पर फिर कभी अभी तो हम पुरुस्कार और विवाद की बात कर रहे हैं.
पुरस्कार यदि आप को नहीं मिला है तो समझ लीजिये कि सारे निर्णायक बेकार है ..वे कुछ जानते ही नहीं हैं..आपकी प्रतिभा(?) को पहचानने की शक्ति उनमें है ही नहीं..वो नहीं चाहते कि आपको यह पुरस्कार मिले.. आपकी उच्च कोटि की तेजोमय प्रतिभा को स्वीकारने में निर्णायकों को परेशानी है..आपको चुन लेंगे तो उनको कौन पूछेगा…अजी जो खुद फ्लॉप है वो आपको क्या चुनेगा…यदि आपको कभी कोई पुरस्कार ना मिला हो और इस तरह के खयाल आपके दिमाग में आ रहे हों .. तो निराश ना हों [मिले या लिखें..ऎसा मैं नहीं कह रहा...]..तो दुनिया भले ही आपको एबनॉर्मल मानने लगे पर आप पूरी तरह नॉर्मल है जी.. यकीन मानिये ऎसा हम जैसे चिरकुट ब्लॉगर के साथ भी होता है..लिखते दो टके का भी नहीं हैं और सोचते हैं पुरस्कार भी मिलेगा… जब हम जैसों के साथ हो सकता है तो आप तो निश्चय ही हम से ज्यादा महान हैं ही.
वैसे पुरुस्कारों का अपना महत्व है…पुरुस्कार अलग अलग स्थितियों में दिये जा सकते हैं..जो फिल्म बाक्स ऑफिस पर सफल नहीं होती उसे कला-फिल्मों की श्रेणी में डालकर पुरस्कार दिलवाया जा सकता है…कोई कवि बहुत दिमाग चाटता हो तो उसे तालियों के पुरुस्कार से चुप कराया जा सकता है… कुछ लोगों को पुरुस्कार इसलिये दे दिये जाते हैं कि भइया अब पब्लिक को बहुत बोर कर चुके हो …बहुत झेल लिया हमने ..अब ये पुरुस्कार लो और घर बैठो… अपने से समर्थ उम्मीदवार को मैदान से हटाना हो तो उसके लिये कोई विशेष पुरुस्कार की मांग कर डालो…पब्लिक सहानुभूति आपके साथ होगी..और लोग आपके विशाल हृदय की दाद भी देंगे.. आडवाणी जी इसके प्रमुख उदाहरण हैं,जो वाजपेयी जी के लिये भारत रत्न की मांग कर रहे हैं.. संदेश तो एकदम साफ है..कि जी आप अब रत्न हो गये हैं तो अब आप सिर्फ शोभा बढ़ाइये..सक्रिय ना रहें …अपना मुँह ना खोलें तो अच्छा है वैसे भी आपका मुँह पॉज की मुद्रा में इतनी देर खुला रहता है कि कई कबूतर उतनी देर में वहाँ अपना घोंसला बनाने की सोचने लगते हैं…
खैर हम तो निर्णायको की अकर्मण्यता की बात कर रहे थे.निर्णायक जो भी हो वो पुरुस्कार-वंचित के लिये अकर्मण्य ही होता है.. कांग्रेस के लिये गुजरात की पब्लिक बेकार है जो मोदी को जिता गयी… हमारे लिये बकनर और बेनसन बेकार हैं जो आस्ट्रेलिया को जिता गये…अलाँ प्रोग्राम के फलाँ निर्णायक बेकार हैं जो फलाँ फलाँ को जिता गये…
इसलिये हम अपने पूरे होशो-हवाश में उन सभी निर्णायकों की अकर्मण्यता के खिलाफ अपनी आवाज उठाते हैं जिन्होने हमें आजतक पुरुस्कार से वंचित रखा..यदि निर्णायकों में जरा भी समझ होती तो अब तक हमें नोबल पुरुस्कार और भारत रत्न से नवाज चुके होते…तब हम क्या इन छोटे-मोटे(?) पुरुस्कारों के लिये ब्लॉगिंग करते.. इसलिये हम सारे पुरुस्कारों का बहिष्कार करते हैं…जो हमारी निर्णायको के खिलाफ इस मुहिम में शामिल हों कृपया टिप्पणी करें.. जल्दी ही उन्हें किसी ना किसी पुरुस्कार से नवाजा जायेगा….