कोई पुरुस्कार दिया जाय और विवाद ना हो ये तो ऎसा ही हुआ कि एकता कपूर का सीरियल हो और दो तीन लव अफेयर ना हों..या फिर कहीं राखी सावंत हो और ड्रामा ना हो. वैसे राखी सावंत से याद आया ..सुना है ड्रामा आइटम क्वीन आजकल बहुत से पुरुस्कार से वंचित लोगों की आदर्श बन गयी हैं…पुरस्कार ना मिले तो सबको गरियाने की कला की पेंटेंट-धारी राखी..हाय मर जावाँ मेरी रोल मॉडल...खैर उस पर फिर कभी अभी तो हम पुरुस्कार और विवाद की बात कर रहे हैं.

award पुरस्कार यदि आप को नहीं मिला है तो समझ लीजिये कि सारे निर्णायक बेकार है ..वे कुछ जानते ही नहीं हैं..आपकी प्रतिभा(?) को पहचानने की शक्ति उनमें है ही नहीं..वो नहीं चाहते कि आपको यह पुरस्कार मिले.. आपकी उच्च कोटि की तेजोमय प्रतिभा को स्वीकारने में निर्णायकों को परेशानी है..आपको चुन लेंगे तो उनको कौन पूछेगा…अजी जो खुद फ्लॉप है वो आपको क्या चुनेगा…यदि आपको कभी कोई पुरस्कार ना मिला हो और इस तरह के खयाल आपके दिमाग में आ रहे हों .. तो निराश ना हों [मिले या लिखें..ऎसा मैं नहीं कह रहा...]..तो दुनिया भले ही आपको एबनॉर्मल मानने लगे पर आप पूरी तरह नॉर्मल है जी.. यकीन मानिये ऎसा हम जैसे चिरकुट ब्लॉगर के साथ भी होता है..लिखते दो टके का भी नहीं हैं और सोचते हैं पुरस्कार भी मिलेगा… जब हम जैसों के साथ हो सकता है तो आप तो निश्चय ही हम से ज्यादा महान हैं ही.

वैसे पुरुस्कारों का अपना महत्व है…पुरुस्कार अलग अलग स्थितियों में दिये जा सकते हैं..जो फिल्म बाक्स ऑफिस पर सफल नहीं होती उसे कला-फिल्मों की श्रेणी में डालकर पुरस्कार दिलवाया जा सकता है…कोई कवि बहुत दिमाग चाटता हो तो उसे तालियों के पुरुस्कार से चुप कराया जा सकता है… कुछ लोगों को पुरुस्कार इसलिये दे दिये जाते हैं कि भइया अब पब्लिक को बहुत बोर कर चुके हो …बहुत झेल लिया हमने ..अब ये पुरुस्कार लो और घर बैठो… अपने से समर्थ उम्मीदवार को मैदान से हटाना हो तो उसके लिये कोई विशेष पुरुस्कार की मांग कर डालो…पब्लिक सहानुभूति आपके साथ होगी..और लोग आपके विशाल हृदय की दाद भी देंगे.. आडवाणी जी इसके प्रमुख उदाहरण हैं,जो वाजपेयी जी के लिये भारत रत्न की मांग कर रहे हैं.. संदेश तो एकदम साफ है..कि जी आप अब रत्न हो गये हैं तो अब आप सिर्फ शोभा बढ़ाइये..सक्रिय ना रहें …अपना मुँह ना खोलें तो अच्छा है वैसे भी आपका मुँह पॉज की मुद्रा में इतनी देर खुला रहता है कि कई कबूतर उतनी देर में वहाँ अपना घोंसला बनाने की सोचने लगते हैं…  

खैर हम तो निर्णायको की अकर्मण्यता की बात कर रहे थे.निर्णायक जो भी हो वो पुरुस्कार-वंचित के लिये अकर्मण्य ही होता है.. कांग्रेस के लिये गुजरात की पब्लिक बेकार है जो मोदी को जिता गयी… हमारे लिये बकनर और बेनसन बेकार हैं जो आस्ट्रेलिया को जिता गये…अलाँ प्रोग्राम के फलाँ निर्णायक बेकार हैं जो फलाँ फलाँ को जिता गये…

इसलिये हम अपने पूरे होशो-हवाश में उन सभी निर्णायकों की अकर्मण्यता के खिलाफ अपनी आवाज उठाते हैं जिन्होने हमें आजतक पुरुस्कार से वंचित रखा..यदि निर्णायकों में जरा भी समझ होती तो अब तक हमें नोबल पुरुस्कार और भारत रत्न से नवाज चुके होते…तब हम क्या इन छोटे-मोटे(?) पुरुस्कारों के लिये ब्लॉगिंग करते.. इसलिये हम सारे पुरुस्कारों का बहिष्कार करते हैं…जो हमारी निर्णायको के खिलाफ इस मुहिम में शामिल हों कृपया टिप्पणी करें.. जल्दी ही उन्हें किसी ना किसी पुरुस्कार से नवाजा जायेगा….    

प्रभु कई दिनों से गायब थे. उनके गायब होने से तरह तरह की अटकलों का बाजार गर्म था. कोई कहता प्रभु संजीवनी बूटी खाने लाने गये हैं. कोई कहता कि मंहगाई का जमाना है. प्रभु को भी दुनिया चलानी है शायद अतिरिक्त कमाई का जुगाड़ बैठा रहे होंगे.कोई कहता लॉग ड्राइव पर निकल गये होंगे.जितने मुँह उतनी बातें.

धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया. लोग प्रभु को भूलने लगे.जैसा कि आमतौर पर होता है कि किसी के जाने से दुनिया नहीं रुकती प्रभु के जाने से भी कुछ नहीं रुका. उनके बिना दुनिया चलने लगी. अचानक एक हलचल सी हुई. प्रभु की पार्टी के लोग जो उंघते उंघते सो चुके थे एकाएक जग गये. खबर आयी कि प्रभु आ रहे हैं.

कुछ बचे खुचे समर्थकों ने नारेबाजी शुरु कर दी. “जब तक सूरज चांद रहेगा….”, “हमारा नेता कैसा हो …” , “प्रभु जी तुम संघर्ष करो..” जैसे नारों से आकाश गूजने लगा. जनता टकटकी लगाये देखती रही और सोचती रही कि जिसे हमने चुन कर भेजा था वो हमें मझधार में छोड़ कर कहाँ गायब हो गया था. लेकिन जनता तो जनता थी सोचने के अलावा और कर भी क्या सकती थी.

वो अवतरित हुए. लगा कि जैसे सब कुछ बदल गया. उनके फूले फूले गाल एकदम पिचक से गये जैसे किसी ने पान की गिलोरी को मुँह से निकाल दिया हो.तौंद एकदम गायब. छ्ररहरा बदन.चेहरे का रंग भी बदला बदला नजर आ रहा था. चाल भी हाथी जैसी ना होकर घोड़े जैसी हो गयी थी.यानि कि तेज तर्रार ….लगा जैसे स्लिम एंड ट्रिम होने का पूरा कोर्स करके आ रहे हों.

आते ही इधर उधर देखने लगे. फिर सकपका कर अपने एक सहायक से बोले कि मेरी कुर्सी नहीं दिखायी दे रही.   

कुर्सी !! कौन सी कुर्सी ?

अरे मेरी कुर्सी !! मैं यहाँ का मुख्यमंत्री हूँ ना.

हूँ नहीं थे..

थे मतलब…!! मेरे को तो जनता ने चुन कर भेजा था.

हाँ लेकिन आप कुर्सी छोड़कर चले गये थे ना.

हाँ लेकिन मैं तो..

हाँ.. तो जब तक आप ये रूप बदल रहे थे.जनता ने नया मुख्यमंत्री चुन लिया.

ऎसा कैसे हो सकता है.

हो सकता है नहीं हो गया है. आजकल कुर्सी बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है उसे एक मिनट भी छोड़ना नहीं चाहिये.

लेकिन … मुख्यमंत्री जो कि अब भूतपूर्व हो गया था उसके चेहरे पर परेशानी के भाव बदले हुए मेकअप के बाद भी साफ देखे जा सकते थे.इससे पहले कि वह कुछ सोचता कि क्या करें ,फोन की घंटी बजी. उधर से हाई कमान का फोन था. उसे थोड़ी आस बंधी कि चलो कोई तो उसकी सुनेगा. लेकिन इससे पहले वो अपना पक्ष हाईकमान के सामने रखता. उधर से आवाज आयी.

तो आ गये आप.

जी….

आपको कुर्सी छोड़कर जाने की क्या आवश्यकता थी?

मैने सोचा कि मैं थोड़ा स्लिम…..भूतपूर्व हकलाते हुए बोलना चाह रहा था.

आपको नहीं मालूम ..कंपटीसन का जमाना है. देश में अस्थिरता का माहौल है. ऎसे में एक एक मिनट बहुत कीमती है.

लेकिन स्लिम..

देखिये आपको स्लिम ही होना था तो आप कुर्सी में बैठकर ही कुछ आसन वगैरह करते रहते.वैसे भी कुर्सी में बैठकर भी कौन सा काम ही करते थे.सुनते हैं आजकल आसनों से आसानी से स्लिम हुआ जा सकता है…

लेकिन मैं तेज….

अरे जब कुर्सी ही नहीं रही तो ये तेजी किस काम की…

लेकिन कुर्सी तो मेरी थी ना…

लोकतंत्र में कुर्सी किसी की नहीं होती. अपनी बारी भूल गये जब पिछली बार आपने कुर्सी खाली देखी थी तो सब विधायकों को पटा कर खुद उस कुर्सी पर बैठ गये थे और तब से एकछ्त्र राज भी कर रहे थे. देखो जब तुम अपनी कुर्सी नहीं बचा पाये तो ये देश कैसे बचाओगे.

वो तो ठीक है लेकिन अब करूं तो क्या करूं.

अब बस इंतजार करो. देखो अगला कब कुर्सी छोड़कर जाता है. जैसे ही वो जाये लपक के बैठ लेना यह कहकर हाई कमान ने फोन काट दिया. प्रभु को भी बात समझ आ गयी थी.

[ यह मात्र एक व्यंग्य है इसका हाल फिलहाल की किसी घटना से कोई संबंध नहीं है ]

दुखी होना आपकी सामाजिक चेतना का लक्षण है. अवसरवादी के लिये दुख लाभ प्राप्ति का मार्ग है.आप अपनी सुविधानुसार दुखी हो सकते हैं.यदि आपके पास एक अदद नौकरी है तो इस बात पर दुखी होइये कि आपका बॉस आपको बहुत परेशान करता है.सुबह से शाम तक आपको एक कोल्हू के बैल की तरह काम करना पड़ता है. बदले में आपको वेतन के रूप में जो पैसे मिलते हैं वो आपकी योग्यता व काम के हिसाब से बहुत कम हैं. यदि आप भारत के अधिकांश युवाओं की तरह पढ़े लिखे अयोग्य हैं तो दुखी होने का पहला हक आपका है. आप बेरोजगारी की समस्या का रोना रोते हुए सरकार को जी भर कोस सकते हैं.आप जगह जगह जा कर कह सकते हैं कि इस देश में योग्य व्यक्ति की कोई पूछ नहीं है. ज्यादा दिनों तक नौकरी ना मिले तो कहिये कि अरे नौकरी की क्या है मिलने को तो कितनी ही मिल जायेंगी लेकिन हम अपनी शर्तों पर काम करना चाहते हैं.आजकल हर जगह भ्रष्टाचार है.लोगों का नैतिक पतन हो चुका है.क्या होगा देश का. ऎसा प्रकट करें कि जैसे सारे देश का भार आपके ऊपर ही है.कुछ दिनो में कुछ ले-दे के एक अदद नौकरी का जुगाड़ हो गया तो कहिये कि क्या करें… सोचा है कि सिस्टम को कोसने से बेहतर है कि सिस्टम में रहकर उसके खिलाफ लड़ें.आजकल कोई देश के बारे में सोचता ही नहीं. यकीन मानिये लोगों की सहानुभूति आपके साथ होगी. 

यदि आप कवि हैं तो भगवान ने आपको एक कलम दी है जिसे कुछ बड़े बूढ़ों ने तलवार से भी ज्यादा मारक बताया है. ये बड़े बूढ़े वही रहे होंगे जो किसी राजा के जमाने में युद्ध के लिये मिसफिट घोषित कर दिये गये होंगे. कवि दुखी होकर उस तलवार से जिस पर चाहे उस पर वार कर सकता है.कवि के दुखी होने का अपना ही एक इश्टाइल होता है जिससे दुखी होने का नाटक कर दूसरों लोगों को पर्याप्त दुखी कर सकता है.इस तरह वह माहोल को दुखमय बना देश व समाज की प्रगति में योगदान देता है.कवि की दुखी होने और करने की विभिन्न क्षमताओं के आधार पर ही उसे तरह तरह पुरुस्कार प्रदान किये जाते हैं.साहित्य के क्षेत्र के जितने भी बड़े बड़े पुरुस्कार हैं वह अधिकतर कवियों को ही दिये जाते है. व्यंग्यकारों को अपनी दुखी न कर पाने की असमर्थता के कारण कोई पुरुस्कार नहीं मिलता.यदि किसी एक आध व्य़ंग्यकार को पुरुस्कार मिला भी हो तो मान लीजिये कि उसने अपनी रचनाओं से लोगों को पर्याप्त दुख दिया होगा.

दुखी होने के मामले में नेता लोग आत्मनिर्भर होते हैं. उन्हें दुखी होने के लिये कोई खास मसक्कत नहीं करनी पड़ती. वो किसी भी मुद्दे पर घड़ियाली आंसू बहा सकते हैं.कैमरे के सामने आते ही वो पूरी तरह चेहरे को लटकायमान बनाते हुए किसी भी मुद्दे पर दुख प्रकट कर सकते हैं. यह सार्वभौमिक सत्य है कि किसी भी नेता द्वारा प्रकट दुख का कारण विपक्षी पार्टी ही होती है.

जिस तरह से दुख के संवेदना जुड़ी हुई है उसी तरह सुख के साथ जलन का रिश्ता है. यदि कोई दुखी है तो आप उससे हमदर्दी जतायेंगे जबकी यदि कोई सुखी है तो आपको उससे हमेशा जलन होगी.इसलिये ज्ञानी लोग अपना सुख कभी प्रकट नहीं करते. वे आपको जलने का कोई अवसर नहीं देते. पेट भरा हो तो आप पेट में गैस की शिकायत कीजिये. पेट खाली हो तो देश में भोजन की समस्या पर विस्तार से भाषण दे डालिये जब तक की आपके लिये भोजन की व्यवस्था ना हो जाये.यदि आप सिंगापुर से शौपिंग करके लौटे हैं तो कहिये ‘क्या करें ऑस्ट्रेलिया नहीं जा पाये इस बार’ और यदि लोगों की सहानुभूतियों के बल पर ऑस्ट्रेलिया चले ही गये तो कहिये ‘यू.एस. जाने की इच्छा थी लेकिन क्या करें’…. और यदि यू. एस. भी पहुंच जायें तो अपने गांव को याद कर रोने लगिये. यानि आपको कोई मौका नहीं जाने देना है दुखी होने का.

किसी पुराने कवि ने कहा है.

सुखिया सब संसार है , खाये और सोये
दुखिया दास कबीर है , जागे और रोये

इन पंक्तियों का सार यही है कि जिन्होने दुखी होने का पर्याप्त अभ्यास कर लिया वह अब सुखी हो गये और अब वह चैन से खा-पी कर सो रहे हैं. लेकिन कबीर दास जी जो अभी इस क्षेत्र में नये हैं वो जाग जाग कर दुखी होने का अभ्यास कर रहे हैं ताकि वह भी सुख को प्राप्त कर खा-पी कर आराम से सो सकें.

इसलिये मेरा निवेदन है कि दुनिया के सभी लोग दुखी हों. आमीन.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य, हास्य व्यंग्य, काकेश

कल एक महान विचारक की पुरानी डायरी हाथ लग गयी. यह सोच के डायरी खोली कि शायद उसमें किसी घोटाले की चर्चा होगी लेकिन उसमें तो महान चिंतन के अद्भुत सूत्र थे.प्रस्तुत हैं उसी डायरी के कुछ अंश..

दुखी होना मेरी मजबूरी ही नहीं मेरा पेशा भी है. मैं अक्सर अपनी सुविधानुसार दुखी हो जाता हूँ. दुखी होना मेरे लिये एक अदद सुख का टुकड़ा अपने नाम कर लेने का माध्यम है. आजकल जो ज्यादा दुखी है वो उतने ही अधिक सुख के टुकड़े नये नये फ्लैट्स के माध्यम से अपने नाम बुक करा रहा है. दुखी होना सुख-सुविधा नामक चिड़िया को संवेदना के ढेले से मार अपने बैक बैलेंस जैसे किसी पिजरे में कैद कर लेने में सहायक भी है. आप जितना ज्यादा सुखी हों आपको दुखी होने के उतने ही ज्यादा अवसर भी मिलेंगे और कारण भी. हर नया दुख आपके लिये सुख के नये द्वार खोलेगा.

ये अच्छा समय है जब आप किसी भी स्थिति , परिस्थिति , विषय , घटना पर दुखी हो सकते हैं. आप अच्छी तरह से अंग्रेजी बोल सकते हों तो आप हिन्दी की दशा-दिशा पर आंसू बहा सकते हैं.अंग्रेजी में भाषण देके हिन्दी के प्रति अपने प्रेम का इज़हार कर सकते हैं. अपनी खराब हिन्दी को अपनी व्यवसायिक मजबूरी की आड़ में छिपा सकते हैं. अंग्रेजी के शब्दों को अपनी बोलचाल में शामिल कर आप अपनी विद्वता का ढोल पिटवा कर अपने हिन्दी दुख का प्रदर्शन कर सकते हैं.जितना दुख आप प्रदर्शित करेंगे उतना ही हिन्दी सेवा का मेवा आप प्राप्त कर सकते हैं. पिछले कई सालों से लोग ऎसा कर रहे हैं और आने वाले कई सालों तक लोग ऎसा करते रहेंगे.

दुखी होना और सहानुभूति बटोरना एक ही क्रिया के दो अलग अलग रूप हैं. या यूँ कहें कि एक क्रिया है तो दूसरी प्रतिक्रिया. लेकिन दोनों का अस्तित्व बहुत महत्वपूर्ण है. आप का दुखी होने का अभिनय उतना ही सफल है जितनी सहानुभुति आप अर्जित कर पा रहे हैं. आप के दुखी होने का फल लोगों के सहानुभूति के प्रदर्शन में हैं. जितनी सहानुभूति आप अर्जित कर पायेंगे उतना ही खुद को सुख के करीब पायेंगे.

दुनिया का हर व्यक्ति दुखी होने की योग्यता रखता है. आप दलित हैं तो सवर्णो को गाली दे सकते हैं उनके व्यवहार पर दुखी हो सकते हैं. उनके पूर्वजों द्वारा आपके पूर्वजों पर किये गये अत्याचारों का बदला आप आरक्षण की तलवार से आने वाली कई पीढ़ियों तक ले सकते हैं.हर अवसर पर सवर्णों को लतियाना और अपने हर दुख का कारण सवर्णों द्वारा की गयी किसी गलती पर थोपना आपके व्यक्तित्व के दो प्रमुख लक्षण होने चाहिये. आप सवर्ण है तो आरक्षण के खिलाफ बोलकर दुखी हो सकते हैं.आप सहित आपके जितने भी अयोग्य रिश्तेदार सरकारी नौकरी प्राप्त करने में असफल रहे उन सबका का ठीकरा आप आरक्षण के सर पर फोड़ सकते हैं.आप आरक्षण के खिलाफ मोर्चा भी खोल सकते हैं,आत्मदाह की धमकी भी दे सकते हैं.

आप महिला हैं तो पुरुषों द्वारा किये जा रहे हर अच्छे और बुरे काम को कोसकर दुखी हो सकती हैं. आपकी हर परेशानी के मूल में कोई ना कोई पुरुष है. आप उस पुरुष को ढूंढ निकालिये और उसकी कारिस्तानियों पर दुखी होकर सहानुभूति की बेल पर चढ़ सुख सुविधा के नये नये फलों का स्वाद चखिये. आपके लड़की होने से आपको अतिरिक्त लाभ है.दुखी होने की कला हर औरत को विरासत में मिलती है. दुखी होना हर औरत का जन्मसिद्ध अधिकार है इसलिये आपके आंसू आपके आंखो के एकदम किनारे पर निवास करते हैं जिन्हे आप बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के अपनी इच्छानुसार जब चाहें तब निकाल सकती हैं. आधे से ज्यादा पुरुष आपके दुखी होने का अभिनय करने से पहले ही अपनी संवेदनाओं के रुमाल ले के सहानुभूति प्रदर्शन के लिये तैयार बैठे रहते हैं.कुछ अन्य ,जो अपने पुरुषत्व के अहम के कारण अपने मन को मार कर अपनी संवेदनाओं के प्रदर्शन में संकोच करते हैं, वो भी आपकी आंसुओं की अनवरत धारा को देखकर अपने रुमालों को अपनी जेबों में नहीं रख पायेंगे.आपके लिये बाजी जीतना आसान है लेकिन ध्यान रहे आप लक्ष्य केवल रुमाल हासिल करना नहीं है इसलिये भावनाओं के अतिरेक में ना बहें.अपनी नजर पुरुष की जेब के उस पर्स पर बनाये रखें जिसमें सुख-सुविधा रूपी गहने रखे गये हैं. यदि आप पुरुष है तब भी आप महिलाओं की स्थिति पर दुखी हो सकते हैं. घर में पत्नी को पीट कर हुई खुशी को महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर भाषण देकर मिटा सकते हैं.   

कल भी जारी रहेगा……….

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य, हास्य व्यंग्य, काकेश

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है. देश के खाये पिये लोग खुश हैं.वे ठंड का इंतजार करते हैं. ठंड उन्हे अच्छे कपड़े पहनने का अवसर देती है. ठंड में आपकी पाचन क्षमता बढ़ जाती है तो कुछ लोग इसी को और अधिक खाने का अवसर बना लेते हैं.वैसे खाने वाले लोग किसी भी मौसम में खाने का तरीका ढूंढ ही लेते हैं. जैसे पीने वाले लोग किसी भी अवसर पर पीने का बहाना ढूंढते हैं. खाने-पीने वाले लोग हर मौसम को एक दृष्टि से देखते हैं पर ठंड उन्हे अपनी दृष्टि को और व्यापक बनाने की प्रेरणा देती है. कुछ अपने बढ़े हुए वजन से इसी ठंड में निजात पाना चाहते हैं. ठंड बहुत अच्छी है जो हमें इस तरह के अवसर देती है.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.वो लोग जो अभी तक किसी भी फुटपाथ,किसी भी डिवाइडर या किसी भी पुल के नीचे चैन से सो जाते थे उन्हे अब नया घर तलाशना होगा. वो अधनंगे लोग जो किसी तरह से गुदड़ियों में अपनी इज्जत बचाये घूम रहे हैं उन्हे अब इज्जत के साथ साथ खुद को भी बचाना होगा. ठंड उनके शरीर पर अब फिर से वार करेगी वैसे ही जैसे पिछ्ले कई सालों से कर रही है.वैसे ही जैसे कुछ दिनों पहले तक सावन कर रहा था , बारिश कर रही थी , बाढ कर रही थी. उन्हे फिर से रात भर जागना होगा,सुबह कोई काम तलाशने से पहले.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है. बजार में कितनी नई नई तरह के गरम कपड़े आये हैं. नये तरह के कोट , जैकेट , उनी स्वेटर , मफ़लर , टोपी और भी ना जाने क्या क्या. लोग ठंड के लिये अभी से खरीदकारी करने निकल चुके हैं. अपने क्रेडिट कार्ड का उपयोग कर आज वो कोई इम्पोर्टेड जैकेट लेने की सोच रहे हैं.टोपी से सर को ढंककर,मफ़लर से कानों को ढंककर वो जब ऑफिस को निकलेंगे तो कितना मजा आयेगा.पिछ्ले साल उनको इस तरह देख कर मुन्नू कितने तो प्यार से बोला था ‘पापा आप तो बिल्कुल उल्लू लग रहे हैं’ और वो कितने खुश हुए थे, असली मजा तो ठंड का ही है. देश प्रगति पर है. गीजर के गरम पानी से नहाने का सुख तो आप ठंड में ही उठा सकते हैं.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.कुछ लोगों की चिंताऎं भी इसके साथ साथ बढ़ने लगी है. अपने चार महीने के बच्चे को इस ठंड से बचाने के लिये वो अधनंगी औरत चिंतित है. वो दो साल पहले की घटना को दुहराना नहीं चाहती जिसमें उसका एक बच्चा इसी तरह की ठंड की भेंट चढ़ गया था. वो कपड़े इकट्टा कर रही है.कुछ पुरानी फटी धोतियां शायद उसकी मालकिन दे देगी. वो इस बार मालकिन को बोलेगी कि कोई पुराना ऊनी कपड़ा भी दे दे.वो ठंड के बारे में सोच कर दुखी हो रही है. सुबह सुबह ठंडे पानी से रात के जूठे बर्तन बर्फ जैसे ठंडे पानी से जब वह मांजती है तो पूरा शरीर सिहर जाता है. हाथ अकड़ जाते हैं. लेकिन उसे मालकिन के उठने से पहले बर्तन मांजने होंगे नहीं तो कहीं मालकिन नाराज होकर हमेशा की तरह चिल्लाने लगेंगी तो फिर उसे ऊनी कपड़े नहीं देंगी.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.गाजर का हलवा,गजक,मूंगफली आहा ये सब ठंड के ही तो तोहफे हैं.गुनगुनी रजाई के अन्दर बैठकर प्लाज्मा टी.वी पर पिक्चर देखना कितना सुखद है. जिनके शरीर पर स्वेटर है,जेब में पैसे है, खाने का पर्याप्त स्कोप है उसे ठंड से खूबसूरत कोई मौसम नहीं लगता. वह इस मौसम में कविता भी करता है. बिरयानी और व्हिस्की की पर्याप्त व्यवस्था होने पर इस ठंड के ऊपर किसी भी कॉंफ्रेंस में भाषण भी दे सकता है.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.हमेशा की तरह रात सिर्फ सुबह उगने वाले सूरज की आशा में काटी जायेगी.वही सूरज, जिसे गरमी में जी भर कोसा करते थे ,अभी एकमात्र सहारा है.घुटनों को छाती से चिपकाकर बैठने से ठंड को कम करने का प्रयास किया जायेगा.एक अदद अलाव जलाने के लिये सूखी लकड़ियों की तलाश की जायेगी. कड़कड़ाती ठंड का किटकिटाते दांतो और बंधी हुई मुट्ठी के जरिये ही सामना करना होगा. वो प्रार्थना कर रहे हैं कि काश इस बार फिर चुनाव हो जाते. दो साल पहले जब चुनाव हुए थे किसी नेता ने कंबल बांटे थे.वो कंबल कितने अच्छे थे वो नेता कितना अच्छा था. सुना है वो जीत गया इसीलिये तब से दिखायी नहीं दिया. खैर चुनाव हो जायें तो वो फिर आयेगा और कंबल बांटेगा.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.एक ही मौसम कितने रूप दिखाता है ना. दोष किसका है क्या मौसम का ?

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश

(आज फिर से व्यंग्य लिख रहा हूँ.मधुशाला की दुकान कोई खास चल नहीं रही.इससे पहले कि बाकि बचे ग्राहक भी लौट कर चले जायें और हमें दुकान समेटनी पड़े हमने सोचा कि चलो फिर से अपनी ऑकात पे आ ही जाते हैं.)

बच्चू सिंह जो कल तक मुँह उठाये घूम रहे थे आज मुँह छुपाये घूम रहे हैं.ऎसा नहीं कि उन्होने पहली बार मुँह की खायी है. लेकिन इस बार ये वाकिया तब हुआ जब अभी कुछ ही दिनों पहले उनकी बहू-यानि की उनके सुपुत्र मुन्ना सिंह की पत्नी- की मुँह दिखायी हुई थी.क्या कहेंगे वो लोग जिनके सामने उन्होने अपनी मूंछे उठा कर कहा था “अब हमका कोनो डर नाँही अब हमरो बिटवा कोतवाल हुई गवा.”

मुन्ना सिंह वल्द बच्चू सिंह बचपन से ही पढ़ने में पैदल और लड़ने में माहिर थे.जहाँ बातों से काम चल जाता वहां गाली दे देते. जहां गाली से काम हो सकता था वहाँ डंडा चला देते.कई बार डंडे की आवश्यकता वाली सिचुएसन में कट्टा (देशी तमंचा) भी चला चुके थे. लोगों को डरा धमकाकर अपनी बात मनवाना उनकी छोटी सी गाली का खेल था.आधे लोग उनकी गाली सुनने से पहले ही उनकी बात मान लेते जो नहीं मानते उनके लिये मुन्ना सिंह के पास गालियों का अच्छा खासा खजाना था. यदि मुन्ना सिंह क्रिकेट खेलने जाते तो कोई भी अम्पायर बनने को तैयार नहीं होता था.वो खुद अम्पायर बनने की पेशकश करते तो कोई खेलने को तैयार नहीं होता था. इसीलिये मुन्ना सिंह क्रिकेट नहीं सीख पाये.सीख तो वो फुटबाल भी नहीं पाये थे लेकिन उनको लगता था कि फुटबाल के वह अच्छे खिलाड़ी हैं. वह जगह जगह लात लगाने में माहिर थे और वो फुटबाल को भी ऎसा ही कुछ समझते थे जिसमें सिर्फ लात ही लगायी जाती है.हॉकी को वो डंडा चलाना जैसा मानते थे और उनका विचार था कि इसमें भी वो माहिर हैं हालाँकि इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि वो डंडा चलाने में सचमुच माहिर थे.

गांवो में अक्सर लोग पैदा होते ही नौकरी के बारे नहीं सोचने लगते. शहरों के बच्चों की तरह अनेक योग्यताओं को हासिल कर लेना भी वहाँ की संस्कृति में शामिल न था.शहरों में तो लोग अपने बच्चों को इतनी चीजें इसलिये सिखा देते हैं कि बच्चे ये ना सही तो वो तो बन ही जायें यानि क्रिक्रेटर ना बन पाये तो एक्टर ही बन जायें,एक्टर ना बन पाये तो सिंगर ही बन जायें,सिंगर नहीं तो डॉक्टर बन जाये. कुछ नहीं बन पाये तो नौकर तो बन ही जायें यानि कहीं नौकरी कर लें और हर महीने की पहली तारीख को वेतन के रूप में पूरनमासी का चांद देख लें. मुन्ना सिंह इन सब चिंताओ से दूर थे. वो प्रकृति के साथ साथ बढ़ रहे थे.बैल,भेड़,गधे,कुत्ते सभी उनके सहचर थे और इन सभी की कुछ आदतें भी मुन्ना सिंह को ज्वर की भांति लग गयी थी. कुसंग का ज्वर भयानक होता है लेकिन वो भयानक होते हुए भी किसी के लिये मददगार साबित हो सकता है इसका पता लोगों को तब तक ना था जब तक कि मुन्ना सिंह का नौकरी का बुलावा ना आ गया.

मुन्ना सिंह ऎसे होनवार विरवान थे कि उनके चिकने पातों का पता दूसरे गांवो तक के लोगों को बहुत पहले ही लग गया था. लोग कहते थे कि मुन्ना सिंह एक दिन जरूर नाम करेगा. उनके उज्जडपने,आवारागर्दी और किसी से भी कुछ भी छीन लेने की प्रवृति से प्रभावित होकर लोग कहते थे कि या तो मुन्ना सिंह पुलिस बनेगा या डाकू.मुन्ना सिंह का विश्लेषण था कि जब से घोड़ों का प्रचलन लूटपाट के लिये कम और रेसकोर्स के लिये ज्यादा होने लगा है और जब से लोगों ने सोना चांदी खरीदना छोड़ शेयर खरीदना चालू किया हैं तब से डाकू बनना कोई प्रॉफिटेबल बिजनेस नहीं रहा.और फिर जब वैसी ही लूटने की खुली छूट और सुविधाऎं पुलिस के पास भी हों तो कोई डाकू क्यों बने पुलिस ही न बने? क्यों कोई दस-बीस साल लूट-मार कर अपनी प्रतिभा का परिचय देने के बाद समर्पण कर नेता बनने का इंतजार करे?

पुलिस विभाग में एक सिपाही भी बनने की सोचना जितना आसान होता है बनना उतना ही कठिन.ऎसा ना होता तो देश का हर नागरिक पुलिस विभाग में ही होता. लेकिन मुन्ना सिंह, जो किताब का मुँह देखे बिना मात्र नकल के भरोसे ग्रेजुएट पास हो गये थे, उनके लिये कुछ भी कार्य कठिन नहीं था. उनके लिये यह कुछ पैसों और सही लोगों तक उन पैसों को पहुचाने का ही खेल मात्र  था.अपनी इसी अद्भुत योग्यता के कारण वो पुलिस की भर्ती में चुन लिये गये. सारे गांव में खुशी की लहर तैर गयी. बच्चू सिंह की मूंछे ऊंची हो गयीं. आसपास के गांव के लोग अपनी विवाह योग्य और विवाह अयोग्य कन्याओं के रिश्ते मुन्ना सिंह से जोड़ने के जोड़तोड़ में लग गये.दहेज की मांग का बढ़ना तो जायज था पर अब उसमें कन्या के सुन्दर,सुशील और सुसंस्कृत होने की मांग भी जुड़ गयी.       

जोड़तोड़ जहाँ हो वहाँ कुछ ना कुछ हासिल होता ही है. इस परंपरा से ही विगत कई सालों से देश का शासन चल रहा है. उसी तरह के जोड़तोड़ के फलस्वरूप मुन्ना सिंह की शादी भी पक्की हो गयी. बरात के दिन दहेज के साथ साथ  दारू की नदियां कुछ इस तरह बहीं जिस तरह जिस तरह अपने देश में कभी दूध की नदियां बहती होंगी.चारों ओर उत्सव का माहौल था. मुन्ना सिंह ने शादी के दिन भी पुलिस की वर्दी पहनी और सेहरे के बदले सर पे पुलिसिया टोपी लगायी.उनका कहना था इससे इम्प्रेशन बराबर पड़ता है….और इम्प्रेशन सही पड़ा भी. रास्ते में वसूली करते हुए कुछ अतिरिक्त दहेज का  जुगाड़ भी कर लिया. इस तरह विवाह संपन्न हुआ.

गांव वालों ने चैन की सांस ली.उन्हे शुकून हुआ कि अब गांव की लड़कियाँ बिना मुन्ना सिंह से डरे हुए आ जा सकेंगी क्योंकि अब स्थायी रूप से मिसेज मुन्ना सिंह आ गयी थी.मिसेज मुन्ना सिंह ने ससुराल में आकर अपनी गायन कला से सबको प्रभावित करने के लिये गाया. ‘सैंया भये कोतवाल अब डर काहे का’.ये अलग बात है कि उन्हें खुद ही अपने सैया यानि मुन्ना सिंह से डर लगता था. बात बात पर उसे घुड़क देते और वो निरीह जनता की तरह कुछ कह भी नहीं पाती थी.लेकिन फिर भी उन्हें संतोष था कि वो एक पुलिस वाले की धर्मपत्नी हैं.  

कुछ दिन अपनी पत्नी के साथ हँसी खुशी रह मुन्ना सिंह नौकरी करने शहर लौट आये.सब कुछ सही जा रहा था.लेकिन होनी को कौन टाल सकता है.प्रदेश में सरकार बदल गयी और जैसा अक्सर होता है कि सरकार बदलने पर तबादले करने की परम्परा का पालन किया जाता है पूर्ववर्ती सरकार के बनाये नियमों को भ्रष्टाचार की आड़ में  बदल दिया जाता हैं वैसा ही कुछ हुआ.सरकार को पता लगा कि पुलिस की भर्ती में जमकर धांधली हुई है हाँलाकि सभी जानते थे कि ऎसी धाधली हमेशा से होती आयी है लेकिन इस बार आदेश हुआ कि कई पुलिस वालों को निकाला जायेगा.संयोग या दुर्योग से मुन्ना सिंह का नाम भी निकाले जाने वालों में शामिल था.मुन्ना सिंह बेरोजगार हो गये. सारे घर में कोहराम मच गया. मिसेज मुन्ना सिंह को अपना पुराना बेरोजगार प्रेमी याद आने लगा. हाँलाकि मुन्ना सिंह आश्वस्त थे कि अगली भर्ती में भी वो पुलिस के लिये चुन लिये जायेंगे. उनको अपनी योग्यता और भर्ती करने वालों के चरित्र पर पूरा भरोसा था. लेकिन एक बार के लिये तो बेइज्जती खराब हो ही गयी थी.इसी बात का दुख था उन्हें. वो रह रहकर बड़े शौक से सिलवायी हुई अपनी नयी वर्दियों को देख रहे थे.रह रहकर उनके सामने रिश्वत लेकर जेब में रखने के सपने आते रहते लेकिन क्या किया जा सकता था. दुखी मन से मुन्ना सिंह गांव जाने वाली ट्रेन में सवार हो गये.

पिछ्ले दिनों एक कार्यक्रम में जाना हुआ. वो कार्यक्रम एक किताब के विमोचन के अवसर पर रखा गया था. किताब चुंकि व्यंग्य संग्रह थी इसलिये तमाम व्यंग्यकारों को भी दावत दी गयी थी.दावत दी गयी थी मैने इसलिये लिखा कि छपे हुए निमंत्रण पत्र में नीचे हाथ से लिखा था कि कार्यक्रम के बाद आप मेरे निवास स्थान पर भोजन के लिये आमंत्रित हैं. निमंत्रण भेजने वाले खुद एक व्यंग्यकार थे और उन्ही की पुस्तक का विमोचन भी होना था तो हम उनका व्य़ंग्य समझ गये और घर में ये ताकीद करके गये कि मेरा खाना बना देना वरना घर में इस लिये उल्लास का माहौल था कि चलो एक दिन खाना कम बनाना पड़ेगा. खाना कम मतलब पच्चीस रोटी,जो कि खाकसार कि डाइट थी जब वह डाइटिंग में थे,कम बनानी पड़ेगी.कार्यक्रम व्यंग्यकारों का था और उसमें हम समेत अनेक ऎसे लोगों को बुलाया गया था जो इस खुशफहमी में थे कि वो व्यंग्यकार है जबकि दरअसल बुलाने  की वजह ये थी कि इसी खुशफहमी में सब लोग अपनी अंटी ढीली कर उनकी किताब तो खरीद ही लें.

निमंत्रणकर्ता ने कार्यक्रम वाले दिन फोन भी किया ये आश्वस्त करने के लिये कहीं मुझे उनकी चाल का पता ना चल जाये और मैं अपना जाना कैंसल ना कर दूँ. उन्होने विशेषकर यह भी बताया कि कार्यक्रम ठीक छ्ह बजे प्रारम्भ हो जायेगा आप समय से आ जायें. कार्यक्रम में मुख्य अथिति एक पूर्व मंत्री थे. मुझे इसी से समझ जाना चाहिये था कि कार्यक्रम साढ़े सात बजे से पहले चालू नहीं होगा फिर भी उनकी बात को रखने और अपने टाइम को पास करने के लिये मैं साढ़े छ:ह बजे मौकाये-वारदात पर पहुंच गया. वहां जाकर लगा कि देश सचमुच की तरक्की कर रहा है जहां हम जैसे मूर्खों की संख्या कम होती जा रही है. वहां मेरे अलावा कुल मिला के सात-आठ अन्य मूर्ख और थे उनमें से भी पांच-छ्ह आयोजक मंडली के सदस्य थे.

ऎसे मौकों पर जाते हुए मुझे हमेशा ड्रेस की समस्या होती है कि क्या पहनूं. टी-शर्ट जींस या कुर्ता-पायजामा. आमतौर पर ऎसे मौकों पर खादी के कुर्ता पायजामा और झोले का प्रचलन रहा है लेकिन आजकल एक तो खादी के बारे में लोग गांधी जयेंती के अलावा और किसी दिन बात करना पसंद नहीं करते दूसरे आजकल हिन्दी के तथाकथित साहित्यकार खादी के कुर्ता पायजामा को पिछ्ड़ेपन की निशानी मानते हैं. वैसे भी देश की आजादी के बाद नेताओं ने खादी के कुर्ता पायजामें की इतनी मट्टी पलीत की है कि आजकल आप खादी का कुर्ता पायजामा पहन कर निकल जाओ तो सामने कोई कुत्ता भी ना आये.हर कुत्ता अपने से बड़े कुत्ते से स्वभावत: डरता ही है. खैर मैं इसी उहापोह में था कि क्या पहनूं कि पत्नी जी ने कहा कि कुर्ता और जींस पहन लो. उन्हे इस बात का डर भी था कि कहीं मैं ड्रेस का चुनाव ना कर पाने की स्थिति में अपना कार्यक्रम बदल ना दूँ. मैने उनकी बात वैसे ही मान ली जैसे करुणानिधि की बात सरकार मान लेती है.

इधर मंत्री जी का कहीं नामोनिशान नहीं था.आयोजक महोदय ने माइक पर आकर कहा कि नॉर्मली हम आधे घंटे की लेट करते हैं लेकिन आज थोड़ा विलंब हो रहा है मंत्री जी बस पधारने ही वाले हैं. हम समझ गये कि अभी और एक घंटा लगना तय है. हम अपने आसपास की स्थिति परिस्थितियों का जायजा लेने लगे. क्या तो सुन्दर दृश्य था.लोग धीरे धीरे आना शुरु हुए. कोई किसी के गले मिलकर अपने झूठी प्रसन्नता दिखा रहा था कोई हाथ जोड़ के मन ही मन अगले को गाली दे रहा था. लोगों की मुख की प्रसन्नता और बढ़ती हुई तोंद इस बात की गवाही दे रही थी कि वो कितने बड़े साहित्यकार हैं. अपने चारों और व्यंग्य की इतनी बड़ी बड़ी फैक्ट्रियों को देख के मन गदगद हो गया. हमारे देश में इतना कुछ मसाला है कि इतने सारे व्यंगकारों की रोजी रोटी चल रही है. जीवन में पहली बार मुझे अपने नेताओं,टी वी चैनलों,फिल्मवालों,क्रिकेटरों को धन्यवाद देने का मन किया कि चलो किसी का भला तो उन्होने किया.मुझे लगा कि मैं जैसे व्यंग्य की बाढ़ के मध्य अपना तिनके का सहारा ढूंढ रहा हूँ. ‘संतो भाई आई व्यंग्य की आंधी’ वाली अवस्था थी.

देर सबेर मंत्री जी आये और उन्होने अपनी आदत के मुताबिक देरी के लिये क्षमा मांगी.फिर भाषणों का सिलसिला चालू हुआ. जैसा कि श्रद्धांजली सभाओं में होता है कि मरने वाले की तारीफ ही की जाती है वैसी ही परंपरा विमोचन समारोहों की भी है. इनमें विमोचित किताब की जम कर तारीफ की जाती है. लेकिन इस कार्यक्रम में कुछ और भी हुआ. किताब की तारीफ के साथ साथ दूसरों की बुराई भी की गयी.ये विमोचन की परम्परा में एक नया आयाम था.ये भी कहा गया कि हिन्दी में अच्छे व्यंग्य नहीं लिखे जाते. हिन्दी में अच्छे व्यंग्य उपन्यासों का अभाव है. सामने तथाकथित व्यंग्यकार बैठे थे फिर भी कहा गया कि अक्छे व्यंग्यकारों की कमी है.मंच पर विमोचित हो रही पुस्तक के लेखक भी बैठे थे.वो मंद मंद मुसका रहे थे.अपने दुश्मनों को गाली खाता देख जो शुकुन मन में होता है वैसा हे शुकुन उनके चेहरे पर पसरा था. वो सोच रहे थे मानों कह रहे हों कि देखो तुम्हें खाने का लालच देके बुलाया गया ,फिर गरियाया गया अभी तुमसे किताब भी खरिदवायी जायेगी. सब लोगों ने किताब की खूब तारीफ की. मंत्री जी ने माइक पर आ के उन्ही तारीफों को फिर से दोहराया. किताब के कुछ अंश पढकर सुनाये गये.जिन पर ना चाहते हुए भी सारे लोग हँसे.मंत्री जी ने सबकी आत्मा को उलाहना भी दिया कि हिन्दी के लोग खरीदकर किताबें नहीं पढ़ते.सबको अपराधभाव महसूस हुआ. ये कहते कहते कैमरे की लाइटों के मध्य किताब विमोचित हो गयी.

कार्यक्रम की समप्ति पर जैसे लोग चैन की सांस लेते होंगे वैसे ही हमने भी ली. मजबूत इरादे और अपनी आत्मा की इज्जत को बनाये रखने की खातिर हमने भी किताब खरीदने का निर्णय किया. किताब के काउंटर पर बहुत भीड़ थी.किताब के लिये मारामारी थी. एक बार फिर सिद्ध हो गया कि दुनिया में केवल हम ही मूर्ख नहीं थे. किसी तरह से एक किताब खरीदकर बिना खाना खाये हम भी घर आ गये. मन में शुकून था कि चलो किताब मिल गयी.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश, विमोचन, हिन्दी

हाय…!

हाय…!!

कैसी हो ?

आइ एम फाइन…अच्छी हूँ….

सो यू आर कमिंग ना…?

हाँ प्लान तो कर रही हूँ..बट तुमने बताया नहीं कि आज हॉलीडे क्यों है…?

अरे सम फादर ..गॉडफादर का बर्थडे है…

ओ…तुम्हारे फादर का बर्थडे है…!!

अरे नहीं यार देश के फादर का बर्थडे है..

देश के फादर ..व्हाट डू यू मीन… ??

अरे सम गांधी यार…उनका बर्थ डे है…

ओ ..सोनिया ..नो यार वो फादर कैसे हो सकती है ( हँसी) ..हाउ सिली..

हाउ क्यूट .. !! अरे वो बापू है ना ..वो यार संजय दत्त वाले…

ओ..या.. वो गांधीगिरी जो करते थे ना…

हाँ हाँ वही….

बट उनके बर्थ डे पे छुट्टी क्यो?

आइ डॉंट नो यार ..बट समबडी वाज टैलिंग ही इज ए ग्रेट मैन…

रियली यार…ईवन आई लाइक हिम.. सारी की सारी फिल्में उसकी बहुत अच्छी हैं.. वो मुन्नाभाई एम बी बी एस इज माय फैवरिट..

नो आइ एम टॉक़िंग ऑफ बापू….

ओ ………इवन बापू इज ए ग्रेट मैन … ?? दिस इज ए न्यूज टू मी…

अरे तभी तो आज हॉलीडे है ना..

ओ ..या…बट ..व्हाई ही इज ग्रेट..

अरे वो घर में चरखा चलाके सूत कातते थे ना…

व्हाट ‘चरखा’ ..व्हाट ‘सूत’… कांट यू स्पीक इन प्रॉपर हिन्दी और इंगलिश …

अ..अ..अ..आई मीन वो यार्न बनाते थे यार… फिर उसी से फैब्रिक भी बनाते थे…

सो व्हाट ..ईवन माइ डैड डज दा सेम…उनकी भी तीन चार मिल्स हैं फैब्रिक की….

और वो कपड़े भी कम पहनते थे…

दिस इज नॉट डन…कितनी तो बॉलीवुड की हिरोइन कम कपड़े पहनती है… इवन ..मैं भी कितने कम पहनती हूँ…

बट …वो सुबह सुबह रामधुन भी गाते थे..

ओ..इट मीन ही वाज ए ग्रेट सिंगर…??

नोट ओनली सिंगर बट ….बट ..उनके पास तीन बंदर भी थे…

यू मीन मॉंकीज (monkeys)…

या….

हाउ स्वीट…

या…एंड जितने भी रुपये हमारे इंडिया के हैं ना…उनमें भी जो फोटो है ना वो बापू की फोटो है….

ओ ग्रेट ..ही मस्ट भी हैविंग ए प्रिंटिग प्रेस…

मे बी..एंड यू नो व्हाट … उन्होने साल्ट भी बनाया था….नमक…

ग्रेट…

एंड ही यूज तो कैरी ए स्टिक आलसो..यू नो लाठी…

या….

ही यूज टु मॉटीवेट पीपल…

लाइक मैनेजमैंट गुरुज…??

या…

ही वाज रियली ए वर्सेटाइल पर्सनालिटी….मैं भी डैड को बोलुंगी ये सब काम करने को…

दैट्स गुड..हू नोज कि कल को डैड भी ऎसे ही ग्रेट हो जायें…

हाँ यार ..फिर एक छुट्टी और मिल जायेगी…(हँसी)

(हँसी)..तो यू आर कमिंग ना..

डैफिनिटली…

सो सीयू दैन …

बाय……….

बाय…

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश, गान्धी, हिन्दी

मुन्नू को आज फिर डांट पड़ी.उसे ये डांट रोज ही पड़ती है जब भी वो क्रिकेट खेल के घर आता है.उसके पापा कहते कि उसे क्रिकेट पर ध्यान ना देकर पढ़ाई पर  ध्यान देना चाहिये. वो युवराज सिंह की तरह बनना चाहता है पर उसके पापा उसे कुछ और ही बनाना चाहते हैं. आज फिर वही हुआ यानि आने के बाद वही डांट और वही लैक्चर. उसके पापा ने समझाया बेटा यदि पढ़ोगे लिखोगे नहीं तो जिन्दगी में कुछ नहीं कर पाओगे. केवल क्रिकेट खेलने से कुछ नहीं होगा.उन्होने एक पुरानी कहावत भी बोली ” खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब,पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाब“. पापा के सामने बोलने की हिम्मत मुन्नू की नहीं थी लेकिन उसे पापा की बात कुछ समझ नहीं आयी. उसके लिये ‘नबाब’ नया शब्द था तो वो समझ नहीं सका कि वो पढ़ लिख भी लेगा तो आखिर बनेगा क्या.उसने अपने दादा से पूछा कि ये ‘नबाब’ क्या होता है. दादा ने बताया कि आजकल नबाब नहीं होते. नबाब पहले के जमाने में होते थे. उसकी समझ में आ गया कि इसका मतलब आजकल कोई पढ़ता लिखता नहीं है. वो सोने चला गया. वो दुखी था. 

पापा की डांट मुन्नू के कानों में गूंज रही थी.”नबाब” शब्द भी बारबार दिमाग में आ जाता. वो उलझन में था.

“खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब,पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाब”…. उसे ध्यान आया कि उसने सुना था कि वीरेन्द्र सहवाग को “नजफगढ़ का नबाब” कहा जाता है. पर दादा जी तो कह रहे थे कि नबाब आजकल नहीं होते. क्या चक्कर है?? यही सोचते सोचते उसे नींद आ गयी. 

उसे लगा कि एक बड़े स्टेडियम में पहुंच गया है.चारों ओर से दर्शक उसे देख रहे हैं.रंग बिरंगे कपड़े. बाउंड्री के किनारे तरह तरह के वाद्यों की धुन पर नाचते कुछ लड़के लड़्की.वो मैदान में है.वो क्रीज पर बैटिंग कर रहा है.दर्शक उसे उत्साहित कर रहे हैं. मुन्नू ….मुन्नू…..मुन्नू…… चारों और से आवाजें आ रही थी. “चक दे इंडिया” वाला गाना भी बज रहा था. उसके सामने दूसरे देश का बॉलर था.मुन्नू बहुत खुश हो रहा था. अगली गैंद पर उसने एक छ्क्का जड़ दिया. तालियों का शोर बढ़ता गया. इसी खुशी में उसने एक एक करके छ:ह छ्क्के मार दिये. उसने ईश्वर को धन्यवाद देने के लिये आसमान की ओर देखा. देखता क्या है कि आसमान एकदम काला है. चारों ओर काले घने बादल हैं.काले बादलों के बीच कुछ कुछ सफेद कपड़े पहने टोपी लगाये आकृतियां जैसी भी दिखायी दी. वो डरने लगा उसे लगा कि शायद वो भूत हैं तभी उसे ध्यान आया उसने ऎसे ही कपड़े पहने कुछ लोग किसी जुलूस में देखे थे. पापा से पूछने पर उन्होने बताया था कि ये हमारे देश के नेता हैं ये लोग देश चलाते हैं. उसे समझ नहीं आया कि देश चलाने वाले लोग अपना काम धाम छोड़कर  बादलों के बीच में बैठकर क्रिकेट में क्यों झांक रहे हैं. वो कुछ समझ पाता अचानक बारिश होने लगी. वो खुद को भीगने से बचाने के लिये भागना ही चाहता था कि उसे पता चला कि पानी तो बरस ही नहीं रहा बल्कि रुपये-पैसे बरस रहे हैं.उसके समझ में कुछ नहीं आ रहा था.उसने आसमान से नजरें हटा कर दर्शकों की ओर देखना चाहा. उसे लगा की दर्शकों की आंखों की जगह टी वी के कैमरे हैं. जो उसे ही देख रहे हैं.

मुन्नू बुरी तरह डर गया था. उसने भागना चाहा. उसे लगा कि उसका घर पास ही है.लेकिन उसके घर के जाने के सारे रास्ते भीड़ से भरे हुए हैं.चारों ओर एक विशाल जन समूह है और वो लोगों से घिरा हुआ है.धन-वर्षा अभी भी हो रही थी.लोग नाच रहे हैं गा रहे हैं.शोर ही शोर है. टी वी वाले है. पटाखे फूट रहे हैं. वहीं उसे वो सफेद कपड़े पहने आकृतियां भी दिखी. वो लोग भी खुश थे. मुन्नू जल्दी से जल्दी अपनी मां के पास पहुंचना चाहता था. लेकिन इतनी भीड़ से घिरा होने के कारण उसका घर पहुंचना लगभग मुश्किल था. उसे पसीना आ गया.वो रोने लगा. …तभी उसकी आंख खुल गयी. सामने माँ खड़ी थी.

उसे थोड़ा आराम मिला…पर उसके कानों में अभी भी शोर गूँज रहा था.. “चैक दे ..चैक दे.. इंडिया” ..

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: क्रिकेट, काकेश, हास्य व्यंग्य

सारा जमाना एस.एम.एस का है. “इंडियन आइडल” में एस.एम.एस. से सात करोड़ से भी ज्यादा वोट पड़े.लोग बोल रहे हैं इंडियन सही में आइडल बैठे हैं. वेल्ले बैठे हैं ..काम धाम है नहीं इसलिये मार एस.एम.एस पर एस.एम.एस  कर रहे हैं. लेकिन इन लोगों को ये नहीं मालूम जब एस.एम.एस नहीं था तब भी हम आइडल ही बैठे थे. इसलिये इसके लिये एस.एम.एस को दोष देना ठीक नहीं है. इनको ये भी नहीं पता कि एस.एम.एस की क्या महत्ता है. इनको ये भी नहीं मालूम कि हम केवल इंडियन आइडल चुनने के लिये ही एस.एम.एस नहीं करते बल्कि वॉयस ऑफ इंडिया, लाफ्टर चैम्पियन, नच जोड़ी और भी ना जाने क्या चुनने के लिये भी एस.एम.एस करते हैं. इन्हें ये भी नहीं मालूम कि हम किसी मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करने, लोन लेने, नयी प्रॉपर्टी खरीदने, करोड़पति बनने की संभावना तलाशने और भी ना जाने क्या क्या के लिये  भी एस.एम.एस करते हैं.कुछ दिनों में हम अपने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चुनने के लिये भी एस.एम.एस ही करने वाले हैं.

कुछ लोग मोबाइल फोन के घटते दामों और सब्जियों और अनाज के बढ़ते दामों पर भी चिंता जताते हैं.उन्हे शायद ये नहीं मालूम कि वैज्ञानिक एक नयी खोज में लगे हैं कि कैसे रोटी ,चावल के बदले केवल एस.एम.एस खाके काम चलाया जाय. ये सरकार की दूरदर्शिता है कि वो अभी से मोबाइल फोन के दाम कम कर रही है.ताकि जब तक वैज्ञानिक अपनी खोज में सफल हों तब तक एक मोबाइल सैट की कीमत एक टाइम के खाने की कीमत से कम हो जाये.

एस.एम.एस की भविष्य में बहुत संभावनाऎं हैं. आजकल के युवक युवतियों की विशेषकर युवकों की ये शिकायत है कि आजकल प्रेम करना और उसके बाद शादी करना बहुत खर्चीला होता जा रहा है. वो जमाना और था जब स्वयंबर रचाये जाते थे. आजके जमाने में यदि राजा जनक स्वयंबर रचाते तो ना तो सीता को अपनी काल सैंटर की जॉब से छूट्टी मिलती ना राम को अपनी एम एन सी कंपनी से. फिर कैसे होता स्वयंबर. इसलिये भविष्य में प्रेम और विवाह (हालांकि दोनों विपरीत चीज है लेकिन जैसे सुख-दुख , जन्म-मृत्यु , लाभ-हानि ,जय-पराजय एक साथ आते हैं वैसे प्रेम-विवाह भी एक साथ ही रखने का प्रचलन है) भी एस.एम.एस के जरिये ही होंगे.आप अपने एस.एम.एस जोक,शायरी,कविता और गुड मॉर्निंग,गुड नाइट वाले मैसेज अपने दोस्तों को फॉरवर्ड करते भेजते रहिये यदि किसी सुन्दरी को पसंद आ गया तो वो भी बदले में आपको मैसेज भेज देगी.फिर इसी तरह संदेशो का आदान-प्रदान करें जब आपको लगे कि जो मैसेज आप फॉरवर्ड करने की सोच रहे थे वो अगली ने पहले ही आपको फॉरवर्ड कर दिया तो समझ लीजिये कि आप दोनों के विचार कितने मिलते है और बस आइ लव यू वाला मैसेज भेज डालिये.तो लो जी हो गया प्यार.अपना प्रेम जारी रखें और फिर इसी तरह के लाखों प्रेम संदेशों के आदान प्रदान के बाद जब आपको लगे कि कि …जी बहुत हो गया प्रेम अब शादी कर लेनी चाहिये तो डॉंट वरी …डेट डिसाइड कीजिये और भेज दीजिये अपने सारे दोस्तों को एस.एम.एस.पंडित जी को भी एस.एम.एस कर दें. जिस दिन आपकी शादी हो उस दिन पंडित जी एस.एम.एस कर मंत्र भेजते रहेंगे और जब वो बोलें आप अपने मोबाइल के चारों और चक्कर लगा कर सात फेरे लगा लें और पंडित जी को एस.एम.एस करें. वो आपको फायनल मंत्र एस.एम.एस कर देंगे और हो गयी आपकी शादी.आपके सारे दोस्त और परिवार वाले अपनी शुभकामनाऎं और आशीर्वाद आपको एस.एम.एस के जरिये भेज देंगे.बाद में अपने फेरों का (हनीमून का नहीं) एम.एम.एस. बना के अपने सारे दोस्तों और परिवार वालों को एस.एम.एस कर दें. तो हो गयी ना सस्ते में शादी.

सबसे ज्यादा सरप्राइज तो आपको तब होगा जब आपका हनीमून आपकी मोबाइल कंपनी द्वारा स्पॉंसर्ड होगा. हनीमून के लिये वो आपको झुमरी तलैया भेजेंगे या स्विटजरलैंड वो इस बात पर निर्भर करेगा कि आप लोगों ने कितना प्रेम किया था. यानि कितने एस.एम.एस भेजे थे अपने प्रेम-पीरियड के दौरान. जितने ज्यादा एस.एम.एस भेजे होंगे उतने ज्यादा ब्राइट चांस होंगे आपके स्विटजरलैंड जाने के.तो ज्यादा से ज्यादा एस.एम.एस भेजें और हनीमून के लिये जायें स्विटजरलैंड.

(अभी मैने टिप्पणी एस.एम.एस से लेने का प्रावधान नहीं किया है इसलिये एस.एम.एस ना भेज के टिप्पणी कर दें. )

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