देश चकाचक प्रगति कर रहा है.सैंसैक्स नयी ऊंचाइयां छू रहा है.पहले लखपति बहुत बड़े माने जाते थे अब करोड़पति की भी कोई औकात नहीं है.चारों और प्रगतिमय माहौल है.जितने पैसे पहले पांच दिन के मैच को जीतने पर भी नहीं मिलते थे उससे ज्यादा बीस ओवर के मैच को जीतने के मिल रहे हैं.जितने पैसे में पूरे महीने के राशन आता था उतने में एक बार का खाना आ रहा है. जो साइकिल चलाता था वो मारुति 800 चला रहा है. जो आवारा था वो मंत्री है. जो भैस दूहता था वो भी मंत्री है. जो गुंडा था…जेल में था वो अभी संसद में है. प्रगति ही प्रगति.मैं किसी अर्थशास्त्री से पूछ रहा हूँ कि क्या कारण है इतनी प्रगति हो रही है. वो मुझे समझा रहा है कि ऎसा इसलिये है कि भारत का लेबर बहुत सस्ता है और भारत का बाजार बहुत बड़ा है.मैं समझने का प्रयास कर रहा हूँ.

भारत का लेबर बहुत सस्ता है यानि आपको कुछ भी काम करने के लिये सस्ते में आदमी मिल जाते हैं.आप गैरकानूनी काम करना चाहें आप पुलिस को खरीद सकते हैं.सरकार से कुछ करवाना है सरकार के बाबू को खरीद सकते हैं.सरकार बनानी है दलबदलू नेता को खरीद सकते हैं.मंत्री को खरीद सकते हैं.लेबर बहुत सस्ता है जी.लेकिन भारत में कुछ भी काम करने के लिये लोग तो हमेशा से मिलते रहे हैं. भगवान राम  ने भी रावण के साथ लड़ाई में सस्ते लेबर का प्रयोग किया.लड़ाई करने के लिये कितने सारे बंदर मिल गये.ये और बात है कि देश में लड़ने के लिये बंदरों की कमी कभी भी नहीं रही.जब जरूरत हो जुटा लो.पिछ्ले दिनों खबर थी कि ‘संसद में बंदरों का आतंक’.खैर ..राम की सेना में दो बहुत बड़े सिविल इंजीनियर थे ..नल और नील.उन्होने समुद्र पर पुल बना दिया. उस समय लेबर बहुत सस्ता रहा होगा क्योंकि पुल टाइमली बन गया. आज के जमाने में कुछ भी टाइमली नहीं बनता. जितनी देर में राम ने पुल बनवा दिया आज उतनी देर में तो टैंडर भी नहीं निकलते.खैर हम बात कर रहे थे सस्ते लेबर की. ऎसा ही सस्ता लेबर विश्वकर्मा के पास भी रहा होगा जिन्होने ना जाने कितने नये महल और शहर बना डाले.तब भी लेबर सस्ता था लेकिन तब का लेबर उतना जागरूक नहीं था जितना आज का है. उसे मालूम नहीं था कि अपनी तनख्वाह में एक कुर्सी मेज भी ना आ पाये तो कैसे इम्पोर्टेड फर्नीचर का जुगाड़ करें. राशन खरीदने के पैसे ना होने पर व्हिस्की की विद चिकन व्य्वस्था कैसे करें. बच्चों के फीस के पैसे ना होने के बाबजूद डोनेशन कैसे दें.लेबर के सस्ते होने के साथ जुगाड़ी होना भी देश की प्रगति के लिये अच्छा है. 

debt_cartoon_lgभारत का बाजार बहुत बड़ा है. यहाँ सबकुछ बिकता है सबकुछ मिलता है. आत्मा बिकती है,परमात्मा बिकता है, ईमान बिकता है,इंसान बिकता है,रिश्ते बिकते हैं,इज्जत बिकती है, नेता बिकता है,अभिनेता बिकता है,दूल्हा बिकता है,दूल्हन बिकती है, मामला बड़ा बिकाऊ किसम का है.आप कहेंगे कि ये कुछ उपदेश टाइप हो गया.तो आपको बता दूँ कि बड़े बाजार का यही तो फायदा है..आप मिनरल वाटर बेच सकते हैं दूध के भावों में.पचास ग्राम आलू का चिप्स बेच सकते हैं एक किलो चीनी के भाव में. एक बर्गर बेच सकते हैं दो बार के खाने के भावों में. बजार है… तो सब है.बजार है ..तो तरक्की है.बजार है …तो विकास है. 

मुझे देश की प्रगति का फंडा समझ में आ रहा है.आपको भी आ रहा है ना !!

वो आजकल परेशान थे.वो आजकल बेरोजगार थे.वो रह रह कर देश के बारे में सोचने लगते. देश के बारे में सोचने से उन्हे अच्छा लगता. उनका खुद का दु:ख कुछ कम हो जाता. पनवाड़ी की दुकान पर सिगरेट के कश लगाते लगाते वो सामने से गुजरते यातायात को देख रहे थे.स्कूल बसों में जाते हुए बच्चे,डी.टी.सी. बसों में ऑफिसकर्मी,ऑटो के इंतजार में खड़ी कुछ महिला ऑफिसकर्मी,बस को पकड़ने के लिये पीछे पीछे भागते कुछ लोग. उनकी आंखों के सामने ही सब कुछ हो रहा था लेकिन उनका दिल कहीं और था. वो नेताओं की तरह सब कुछ देख के भी उसे देख नहीं पा रहे थे.

सिगरेट का आखरी कश लगाकर उसके फिल्टर को अपनी पैरों तले उन्होने ऎसे कुचला जैसे वो ही उनकी सारी समस्याओं की जड़ हो.जर्दे के पान को मुँह में डालते हुए बोले ‘ये देश रसातल में जा रहा है.कानून व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गयी है.देश आतंक की छाया में पल रहा है.आतंकवादी हमारे घर तक घुस आये हैं.कुछ करना होगा.शीघ्र ही कुछ करना होगा.” उनके चेहरा तना हुआ था.मुट्ठियां भिच गयी थी.लगा जैसे पान के साथ साथ पूरे देश को भी चबा जायेंगे.पान वाले को उनका वाक्य कुछ समझ आया कुछ नहीं.लेकिन इतना जरूर समझ में आया कि इस महीना भी वो उधार में ही पान खायेंगे. जब भी वो देश और समाज की चिता करते हुए इस तरह के डायलॉग बोलते पनवाड़ी समझ जाता कि आजकल धंधा कुछ मंदा चल रहा है.

बात को आगे बढाने के लिये पान वाला बोला.तो बाबू साहब सरकार कुछ क्यों नहीं करती?

क्या करेगी सरकार?? ये सरकार निकम्मी है.

वो तो सारी ही होती हैं.इसमें नयी बात क्या है. पान वाला सहजता से बोला.

नहीं ये सरकार विशेष रूप से निकम्मी है. कहीं कुछ नहीं होता.पिछ्ले दिनों लग रहा था कि मध्यावधि चुनाव हो जायेंगे पर उसका भी अभी कोई स्कोप नहीं दिखता.ये लैफ्ट वाले अन्दर ही अन्दर सरकार से मिले हैं.केवल धमकी देते हैं कुछ करते नहीं.भाजपा वाले भी सरकार के साथ ही मिल गये हैं.सब मिल बांट के खा रहे हैं.किसी को देश की चिता नहीं है.

आप किस पार्टी के साथ हैं.पान वाले ने जिज्ञासा व्यक्त की.

अरे हम किसी पार्टी के साथ नहीं है.हम तो मुद्दों पर बोलते हैं.देश के बारे में सोचते हैं.कोई मुद्दा ही नहीं है आजकल. सब लोग शांत बैठे हैं.सब जगह स्टेटस को है.

लेकिन शांति होना तो अच्छी बात है ना.देश में शांति है.देश विकास कर रहा है.

अरे ऎसी शांति से क्या फायदा. क्या होगा इस शांति से. ना कोई जुलूस,ना भाषण बाजी.ना कोई रैली, ना कोई लाठी चार्ज. ना अफवाहें, ना कर्फ्यू.ना आगजनी, ना लूटपाट. ना हडताल, ना मारपीट. ना तालाबंदी, ना घेराव.ना सीलिंग, ना चीटिंग.ना चंदा, ना धंधा अरे इन सब के बिना देश तरक्की नहीं कर सकता.

वो सही बोल रहे थे. देश शांत था.इसलिये वे बेरोजगार थे. उनकी क्षमताओं का उपयोग नहीं हो पा रहा था.देश प्रगति करता तो वो भाषण देते.किसी जुलूस का नेतृत्व करते.कुछ सरकारी बसों मे आग लगाते. कुछ दुकानें लूट कर घर का सामान ले आते. उनके घर का टी वी और फ्रिज पुराना हो गया था. इस बार जाड़ों से पहले वो गीजर भी घर ले आने की तमन्ना रखते थे.उनकी इन्ही क्षमताओं की वजह से ही उनको रॉयल चैलेंज व्हिस्की और दू जून का चिकन नसीब हो जाता.     

वो पनवाड़ी को देश की तरक्की से अवगत करा ही रहे थे,कि उनके एक साथी ने आके उनके कान में कुछ कहा. उनके चेहरे पर मुस्कान तैर गयी.

मैं कहता था ना कि भाजपा वाले जरूर कुछ करेंगे.

क्यों क्या हुआ.

अरे हमारी आस्था का प्रश्न है.राम हमारे आराध्य हैं.हमारी आस्था का केन्द्र हैं.आस्था का कोई प्रमाण नहीं होता. हम राम सेतू बचा कर रहेंगें.

उनकी आवाज उंची होती चली गयी. उनके चारों ओर भीड़ बढ़ने लगी.

पानवाला भी खुश था.उसे तसल्ली हुई कि वो जल्दी ही अपना बकाया चुकता कर देंगे. उन्हे रोजगार मिल चुका था.

,हिन्दी

[इससे पहले भी हरिशंकर परसाई जी की कृतियां आपके सामने ला चुका हूँ. आज पेश है एक और व्यंग्य लेख

पूर्व लेख : पवित्रता का दौरा:हरिशंकर परसाई

क्रांतिकारी की कथा : हरिशंकर परसाई]

निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं. निंदा खून साफ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है. निंदा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं. निंदा पायरिया का तो शर्तिया इलाज है. संतों को परनिंदा की मनाही होती है, इसलिए वे स्वनिंदा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं. ‘मौसम कौन कुटिल खल कामी’- यह संत की विनय और आत्मग्लानि नहीं है, टॉनिक है. संत बड़ा कांइया होता है. हम समझते हैं, वह आत्मस्वीकृति कर रहा है, पर वास्तव में वह विटामिन और प्रोटीन खा रहा है. स्वास्थ्य विज्ञान की एक मूल स्थापना तो मैंने कर दी. अब डॉक्टरों का कुल इतना काम बचा कि वे शोध करें कि किस तरह की निंदा में कौन से और कितने विटामिन होते हैं, कितना प्रोटीन होता है. मेरा अंदाज है, स्त्री संबंधी निंदा में प्रोटीन बड़ी मात्रा में होता है और शराब संबंधी निंदा में विटामिन बहुत होते हैं. मेरे सामने जो स्वस्थ सज्जन बैठे थे, वे कह रहे थे- आपको मालूम है, वह आदमी शराब पीता है?

मैंने ध्यान नहीं दिया. उन्होंने फिर कहा- वह शराब पीता है. निंदा में अगर उत्साह न दिखाओ तो करने वालों को जूता-सा लगता है. वे तीन बार बात कह चुके और मैं चुप रहा, तीन जूते उन्हें लग गए. अब मुझे दया आ गई. उनका चेहरा उतर गया था. मैंने कहा- पीने दो. वे चकित हुए. बोले- पीने दो, आप कहते हैं पीने दो?

मैंने कहा- हां, हम लोग न उसके बाप हैं, न शुभचिंतक. उसके पीने से अपना कोई नुकसान भी नहीं है. उन्हें संतोष नहीं हुआ. वे उस बात को फिर-फिर रेतते रहे. तब मैंने लगातार उनसे कुछ सवाल कर डाले- आप चावल ज्यादा खाते हैं या रोटी? किस करवट सोते हैं? जूते में पहले दाहिना पांव डालते हैं या बायां? स्त्री के साथ रोज संभोग करते हैं या कुछ अंतर देकर?

अब वे ‘हीं-हीं’ पर उतर आए. कहने लगे- ये तो प्राईवेट बातें हैं, इनसे क्या मतलब. मैंने कहा- वह क्या खाता-पीता है, यह उसकी प्राईवेट बात है. मगर इससे आपको जरूर मतलब है. किसी दिन आप उसके रसोईघर में घुसकर पता लगा लेंगे कि कौन-सी दाल बनी है और सड़क पर खड़े होकर चिल्लाएंगे- वह बड़ा दुराचारी है. वह उड़द की दाल खाता है. तनाव आ गया. मैं पोलाइट हो गया- छोड़ो यार, इस बात को. वेद में सोमरस की स्तुति में 60-62 मंत्र हैं. सोमरस को पिता और ईश्वर तक कहा गया है. कहते हैं- तुमने मुझे अमर बना दिया. यहां तक कहा है कि अब मैं पृथ्वी को अपनी हथेलियों में लेकर मसल सकता हूं.(ऋषि को ज्यादा चढ़ गई होगी.) चेतन को दबाकर राहत पाने या चेतना का विस्तार करने के लिए सब जातियों के ऋषि किसी मादक द्रव्य का उपयोग करते थे.

चेतना का विस्तार. हां, कई की चेतना का विस्तार देख चुका हूं. एक संपन्न सज्जन की चेतना का इतना विस्तार हो जाता है कि वे रिक्शेवाले को रास्ते में पान खिलाते हैं, सिगरेट पिलाते हैं, और फिर दुगने पैसे देते हैं. पीने के बाद वे ‘प्रोलेतारियत’ हो जाते हैं. कभी-कभी रिक्शेवाले को बिठाकर खुद रिक्शा चलाने लगते हैं. वे यों भी भले आदमी हैं. पर कुछ मैंने ऐसे देखे हैं, जो होश में मानवीय हो ही नहीं सकते. मानवीयता उन पर रम के ‘किक’ की तरह चढ़ती-उतरती है. इन्हें मानवीयता के ‘फिट’ आते हैं- मिरगी की तरह. सुना है मिरगी जूता सुंघाने से उतर जाती है. इसका उल्टा भी होता है. किसी-किसी को जूता सुंघाने से मानवीयता का फिट भी आ जाता है. यह नुस्खा भी आजमाया हुआ है. एक और चेतना का विस्तार मैंने देखा था. एक शाम रामविलास शर्मा के घर हम लोग बैठे थे(आगरा वाले रामविलास शर्मा नहीं. वे तो दुग्धपान करते हैं और प्रात: समय की वायु को ‘सेवन करता सुजान’ होते हैं). यह रोडवेज के अपने कवि रामविलास शर्मा हैं. उनके एक सहयोगी की चेतना का विस्तार कुल डेढ़ पेग में हो गया और वे अंग्रेजी बोलने लगे. कबीर ने कहा है- ‘मन मस्त हुआ तब क्यों बोले’. यह क्यों नहीं कहा कि मन मस्त हुआ तब अंग्रेजी बोले. नीचे होटल से खाना उन्हीं को खाना था. हमने कहा- अब इन्हें मत भेजो. ये अंग्रेजी बोलने लगे. पर उनकी चेतना का विस्तार जरा ज्यादा ही हो गया था. कहने कहने लगे- नो सर, नो सर, आई शैल ब्रिंग ब्यूटीफुल मुर्गा. ‘अंग्रेजी’ भाषा का कमाल देखिए. थोड़ी ही पढ़ी है, मगर खाने की चीज को खूबसूरत कह रहे हैं. जो भी खूबसूरत दिखा, उसे खा गए. यह भाषा रूप में भी स्वाद देखती है. रूप देखकर उल्लास नहीं होता, जीभ में पानी आने लगता है. ऐसी भाषा साम्राज्यवाद के बड़े काम की होती है. कहा- इंडिया इज ए ब्यूटीफुल कंट्री. और छुरी-कांटे से इंडिया को खाने लगे. जब आधा खा चुके, तब देशी खाने वालों ने कहा, अगर इंडिया इतना खूबसूरत है, तो बाकी हमें खा लेने दो. तुमने ‘इंडिया’ खा लिया. बाकी बचा ‘भारत’ हमें खाने दो. अंग्रेज ने कहा- अच्छा, हमें दस्त लगने लगे हैं. हम तो जाते हैं. तुम खाते रहना. यह बातचीत 1947 में हुई थी. हम लोगों ने कहा- अहिंसक क्रांति हो गई. बाहर वालों ने कहा- यह ट्रांसफर ऑफ पॉवर है- सत्ता का हस्तांतरण. मगर सच पूछो तो यह ‘ट्रांसफर ऑफ डिश’ हुआ- थाली उनके सामने से इनके सामने आ गई. वे देश को पश्चिमी सभ्यता के सलाद के साथ खाते थे. ये जनतंत्र के अचार के साथ खाते हैं.

फिर राजनीति आ गई. छोडि़ए. बात शराब की हो रही थी. इस संबंध में जो शिक्षाप्रद बातें ऊपर कहीं हैं, उन पर कोई अमल करेगा, तो अपनी ‘रिस्क’ पर. नुकसान की जिम्मेदारी कंपनी की नहीं होगी. मगर बात शराब की भी नहीं, उस पवित्र आदमी की हो रही थी, जो मेरे सामने बैठा किसी के दुराचार पर चिंतित था. मैं चिंतित नहीं था, इसलिए वह नाराज और दुखी था. मुझे शामिल किए बिना वह मानेगा नहीं. वह शराब से स्त्री पर आ गया- और वह जो है न, अमुक स्त्री से उसके अनैतिक संबंध हैं.

मैंने कहा- हां, यह बड़ी खराब बात है.

उसका चेहरा अब खिल गया. बोला- है न?

मैंने कहा- हां खराब बात यह है कि उस स्त्री से अपना संबंध नहीं है.

वह मुझसे बिल्कुल निराश हो गया. सोचता होगा, कैसा पत्थर आदमी है यह कि इतने ऊंचे दर्जे के ‘स्कैंडल’ में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा. वह उठ गया. और मैं सोचता रहा कि लोग समझते हैं कि हम खिड़की हवा और रोशनी के लिए बनवाते हैं, मगर वास्तव में खिड़की अंदर झांकने के लिए होती है. कितने लोग हैं जो ‘चरित्रहीन’ होने की इच्छा मन में पाले रहते हैं, मगर हो नहीं सकते और निरे ‘चरित्रवान’ होकर मर जाते हैं. आत्मा को परलोक में भी चैन नहीं मिलता होगा और वह पृथ्वी पर लोगों के घरों में झांककर देखती होगी कि किसका संबंध किससे चल रहा है. किसी स्त्री और पुरुष के संबंध में जो बात अखरती है, वह अनैतिकता नहीं है, बल्कि यह है कि हाय उसकी जगह हम नहीं हुए. ऐसे लोग मुझे चुंगी के दरोगा मालूम होते हैं. हर आते-जाते ठेले को रोककर झांककर पूछते हैं- तेरे भीतर क्या छिपा है?

एक स्त्री के पिता के पास हितकारी लोग जाकर सलाह देते हैं- उस आदमी को घर में मत आने दिया करिए. वह चरित्रहीन है. वे बेचारे वास्तव में शिकायत करते हैं कि पिताजी, आपकी बेटी हमें ‘चरित्रहीन’ होने का चांस नहीं दे रही है. उसे डांटिए न कि हमें भी थोड़ा चरित्रहीन हो लेने दे. जिस आदमी की स्त्री-संबंधी कलंक कथा वह कह रहा था, वह भला आदमी है- ईमानदार, सच्चा, दयालु, त्यागी. वह धोखा नहीं करता, कालाबाजारी नहीं करता, किसी को ठगता नहीं है, घूस नहीं खाता, किसी का बुरा नहीं करता. एक स्त्री से उसकी मित्रता है. इससे वह आदमी बुरा और अनैतिक हो गया. बड़ा सरल हिसाब है अपने यहां आदमी के बारे में निर्णय लेने का. कभी सवाल उठा होगा समाज के नीतिवानों के बीच के नैतिक-अनैतिक, अच्छे-बुरे आदमी का निर्णय कैसे किया जाए. वे परेशान होंगे. बहुत सी बातों पर आदमी के बारे में विचार करना पड़ता है, तब निर्णय होता है. तब उन्होंने कहा होगा- ज्यादा झंझट में मत पड़ो. मामला सरल कर लो. सारी नैतिकता को समेटकर टांगों के बीच में रख लो.

हमारे पड़ोस के झा जी सरकारी कर्मचारी हैं. कल ट्रैफिक जाम को झेलते,कोसते घर पहुंचे ही थे कि उनकी धर्मपत्नी जी आ के खड़ी हो गयी और पूछ्ने लगी. आप कितना घूस लेते है जी? इस हमले के लिये वो तैयार ना थे.उन्होने थूक को निगलते हुए,स्थिति को संभालते हुए हिम्मत कर पूछा. लेकिन तुम क्यों पूछ रही हो? तो पत्नी ने बताया कि मिसेज चावला पूछ रही थी कि तुम्हारे पति कितना घूस खाते हैं.इससे पहले कि वो कुछ बोलते और अपनी घूस ना खा पाने की नग्नता को ईमानदारी की चादर से ढंकने की कोशिश करते वो बोल पड़ीं. देखिये आप खूब घूस खाइये क्योंकि हमे अगले महीने स्विटजरलैंड जाना है.पता है मिसेज चावला पिछ्ले हफ्ते ही स्विटजरलैंड घूम कर आयी है.उनकी ये पूरी ट्रिप उनके विभाग के एक कॉंट्रेक्टर द्वारा स्पॉंसर थी. झा जी को अल्टीमेटम दे दिया गया. अब झा जी परेशान है. अपनी ये परेशानी उन्होने हमें भी बता डाली.   

हमने उनसे कहा तो इसमें क्या है घूस लेना शुरु कर दीजिये. झा जी थोड़ा ज्यादा सैंसिबल नहीं थे.पुराने विचारों के आदमी थे और डरपोक टाइप थे.जो सरकारी कर्मचारी घूस नहीं लेता वो पुराने विचारों का ही होगा ना.मॉडर्न जमाने के लोग तो इस संकट में पड़ते ही नहीं हैं. हमने उन्हें उपदेश देना शुरु किया. 

Bribe देखिये झा जी, डरने से कुछ नहीं होता.घूस खाना भ्रष्टाचार का नहीं शिष्टाचार का लक्षण है.जरा सोचिये यदि घूस ना होती तो क्या होता.फाइलें पड़ी रहती.उनको आगे खिसकाने वाला कोई नहीं होता.तो कैसे होते आपके,हमारे इतने सारे काम? घूस है तो दुनिया चल रही है. आप ये ना समझे केवल सरकारी कर्मचारी ही घूस लेते हैं.ये प्रथा तो सदियों पुरानी है. क्या आपने कभी भगवान को घूस नहीं दी.आप जब अपनी मन्नत पूरी करने के लिये भगवान को प्रसाद चढ़ाते हैं या कोई और चीज करते हैं तो भी घूस ही है ना. और सरकार खुद भी घूस लेती है.सरकार फ्लाईओवर बनाती है.पहले उसे बनाने के लिये टैक्स लेती है और फिर बनाने के बाद टॉल टैक्स.स्कूल वाले पढ़ाने के लिये फीस तो लेते ही हैं लेकिन साथ में डोनेसन भी लेते हैं. रेलवे टिकट के पैसे तो लेती है.टिकट को तत्काल करवाने के लिये पैसे भी लेती.पहले केवल सरकारी कर्मचारी ही घूस लेते थे अब सरकार भी लेती है. गाजियाबाद में भी म्युनिसपालिटी पन्द्रह परसैट लेती है.

घूस खाना स्टेटस सिंबल है.यदि आप घूस नहीं खाते तो आप पिछ्ड़े हैं ऎसे पिछ्ड़े कि आपको आरक्षण भी नहीं मिल सकता. देखिये आपके विभाग में पहले भी लोग घूस ले रहे थे अब भी ले रहे हैं और आगे भी लेते रहेंगे. आपके लेने या ना लेने से कोई फरक नहीं पड़ता.आप नहीं लेंगे तो आपका हिस्सा कोई और लेगा. आप घूस नही लेंगे तो आप पर कोई विश्वास नहीं करेगा.सब सोचेंगे जो आदमी घूस नहीं लेता वो काम क्या करेगा.घूस आपकी पुरानी किताब पर लगा हुआ नया कवर है. घूस सार्वभौमिक सत्य है. घूस वर्तमान है.घूस उज्जवल भविष्य है. घूस आश्वाशन है. घूस भ्रष्टाचार की लहलहाती फसल को पोषने वाली खाद है. घूस लेना आपका कर्तव्य है.घूस लेना आपका अधिकार है. घूस देना आपकी मजबूरी. यदि आप घूस दे सकते हैं तो घूस ले क्यों नहीं सकते.

मेरे उपदेशों का झा जी पर कुछ असर सा हुआ. लेकिन यदि कभी पकड़े गये तो?उन्होने पूछा. देखिये झा जी अव्वल तो घूस लेने वाले यदि अपने ऊपर वालों को खुश रखें तो पकड़े ही नहीं जाते और यदि पकड़े भी गयी तो घूस तो है ही ना. घूस दे के तुरंत छूट भी जाते हैं. 

मेरी बातें अब उन्हें पूरी तरह समझ में आ गयी थी.उनके चेहरे पर दृढ़ता थी. उन्होने मुझे धन्यवाद किया और बिना कुछ बोले चल दिये.

सुना है अगले महीने झा जी गोवा जा रहे हैं. कल मिसेज झा ने क्लब में गाना भी गाया ” घूस खायें सैंया हमारे”.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश

 

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश

आदरणीय श्री गणेश जी,

आप प्रात: पूजनीय हैं और सर्वप्रथम पूजनीय भी. आपकी पूजा किये बिना यदि कोई कार्य किया जाये तो वो सफल नहीं होता. आपको चढ़ावा दिये बगैर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. आपका मुँह हाथी का है यनि आपके खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग अलग है.आपका पेट भी थोड़ा बड़ा है.आप लड्डूओं और मोदकों का भोग लगाते हैं. लोग आपको लालफीताशाही लालबाग के राजा के नाम से भी पुकारते हैं. यकीन मानिये गजानन जी हमें आपसे कोई शिकायत नहीं. हम आपके अस्तित्व पर उसी तरह से विश्वास करते हैं जैसे लोग सरकारी दफ्तरों में घूसखोर के अस्तित्व पर करते हैं.इसके लिये किसी को कोई प्रमाण की आवश्यकता नहीं. आपसे भी भारत सरकार कभी प्रमाण नहीं मांगेगी ऎसा मेरा मानना है क्योंकि सरकार में क्या होगा या क्या हो रहा है उसकी खबर जब सरकार को ही नहीं रहती तो अपन तो बहुत छोटी चीज है.

आज मेरा यह प्रार्थना पत्र आपके वाहन कहे जाने वाले चूहों से उत्पन्न समस्याओं को लेकर है.हालाँकि आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि जिस प्रकार आपके अस्तित्व को लेकर कोई प्रश्न नहीं है उसी प्रकार कुछ चूहों के अस्तित्व को लेकर भी कोई प्रश्न नहीं करता.सभी ये मानते हैं Ganesh_drawingकि आप हैं तो कुछ चूहे तो होंगे ही.आखिर आप को भी कभी इधर उधर जाने के लिये वाहन की आवश्यकता होती ही है क्योंकि हर समय तो आपको ट्रक वगैरह नसीब नहीं होते वो तो केवल गणेश चतुर्थी के आसपास ही कुछ दिनों मिलते हैं. और फिर आप सरकारी कर्मचारी भी नहीं कि हर समय आपको सरकारी वाहन उपलब्ध हो. तो कुछ चूहे तो रहेंगे ही.चूहे होंगे तो कुछ ना कुछ खायेंगे ही.उसी के लिये सरकार ने सरकारी गोदामों की व्यवस्था की है.जिन पर पिछ्ले साठ सालों से कई चूहे पल बढ़ रहे हैं.मेरी आपसे शिकायत तो उन चूहों के लिये जिनका पता अभी अभी चला है.एक रिपोर्ट के हिसाब से इन चूहों का पेट बहुत बड़ा है और ये पिछ्ले तीन सालों में तीस हजार करोड़ से ज्यादा का अनाज चट कर गये हैं. वैसे ऎसा तो ये कई सालों से कर रहे होंगे पर ये जो तीस हजार करोड़ का अनाज उन गरीबों के लिये था जो देश की चकाचक उन्नति और आजादी के साठ सालों बाद भी बाजार मूल्य पर अनाज नहीं खरीद पाते.  

आपकी एक स्तुति है निर्विघ्नं कुरू में देव, सर्व कार्येषु सर्वदा.आप हमेशा अपने भक्तों के  सारे काम निर्विघ्न संपन्न करवा देते हो. आपकी यह अदा प्रसंशनीय है. लेकिन सर कम से कम इतना तो ध्यान रखें कि बेचारे गरीब के पेट पर तो लात ना पड़े.वैसे आपके चूहों की एक बात का हमेशा Ratकायल रहा हूँ. इस देश मे लोकतंत्र होने और इतनी सारी पार्टियां होने के बाबजूद आपके चूहे निरपेक्ष हैं. वो जिस भी दल में रहें खाते ही हैं. साठ साल हो गये हमें स्वतंत्र हुए.हम स्वतंत्र हो गये खाने के लिये.हम स्वतंत्र हो गये लूटने के लिये.हमारा विकास हुआ. जहां जंगल थे वहां घर बन गये.जहां घर थे वहां अपार्ट्मेंट बने हैं. विकास की दर तेज है. गरीबों का भी विकास हो रहा है.अमीरों की संख्या बढ़ रही है तो गरीबों की संख्या भी बढ रही है. ऎसे में आपके चूहे भी विकास पथ पर अग्रसर है. मुझे इससे भी कोई इनकार नहीं है. पहले लोग प्लेग से मर रहे हैं अब प्लेग की जरूरत ही नहीं रही किसान वैसे ही आत्महत्या कर लेते हैं. आपके चूहों का काम कम हुआ है प्रभू. ऎसे में कम से कम थोड़ा लिहाज कर लें तो क्या बेहतर ना होगा.

आप सर्वव्यापी है. आप सर्वज्ञानी हैं,सब जानते हैं. मैं समझ सकता हूँ कि आजकल आप को इतने सारे मंडपों मे विजिट करनी होती है. जगह जगह आपको भोग लगाया जाता है.जब भोग कम हो जाता है तो आप दूध पीने लगते हैं. आप व्यस्त हैं. लेकिन फिर भी उन गरीबों के लिये अपने चूहों को थोड़ा कंट्रोल करिये लम्बोदर. कोई व्हिप जारी कर दीजिये.एक आध चूहे हो सकता है फिर भी विरोध कर दे जय राम रमेश की तरह लेकिन अधिकतर तो समझ ही जायेंगें.

आपसे निवेदन है कि कृपया इस भक्त के प्रार्थना पत्र को सरकारी फाइल मे डाल कर भूल मत जाइयेगा. जरूरत होगी तो पर्याप्त मात्रा में पत्र -पुष्प साथ में भिजवा दुँगा.

आपका भक्त

काकेश      

जैसे बरसात में कुकुरमुत्ते और चुनाव में टिकटार्थी अपना सर उठाये प्रकट हो जाते हैं वैसे ही हिन्दी दिवस और हिन्दी पखवाड़े पर बहुत से हिन्दी के वरद पुत्र धन की फसल काटने को प्रकट हो जाते हैं.कुछ जुनियर टाइप मिनि पुत्र केवल 20-30 हिन्दी की प्रतियोगिताओं मे जज बनकर हजार वजार के लिफाफे जुगाड़ते हैं पर कुछ पर्मानेंट वरद पुत्र ‘पांचो उंगलिया घी में और सर कड़ाई में’ वाली स्थिति को प्राप्त कर परम सुख का अनुभव करते हैं. इधर ऎसे ही एक मिनि पुत्र ने हिन्दी में स्मार्ट निवेश कर लाखों की फसल काटने की इच्छा जाहिर की. फिर क्या था खाकसार जुट गये रिसर्च में. रिसर्च से जो बहुमूल्य नुस्खे मिले वो जनता की बेहद मांग पर एक्स्लूसिवली यहां पेश किये जा रहे हैं. ये सारे नुस्खे ‘सेवन स्टेप्स फॉर चर्निंग मनी थ्रू हिन्दी सेवा’ नामक शोध पत्र में जारी किये गये हैं. 

1. मनी फोकस : आपको सबसे पहले अपना फोकस ठीक करना होगा.आपको ये निर्धारित करना होगा कि आप क्या करना चाहते हैं साहित्यिक उन्नति या आर्थिक उन्नति.इन दोनों उन्नतियों में वैसा ही संबंध है जैसा कि भारत की उन्नति और विदर्भ के किसान की उन्नति में. नेता और ईमानदारी में भी ऎसे ही संबंध आमतौर पर पाये जाते हैं. यदि आप लक्ष्मी चाहते हैं तो आपको सरस्वती को टाटा बाय बाय बोलना ही पड़ेगा.सैट योर फोकस ऑंनली ऑन मनी हनी.   

2.अंग्रेजी दक्षता: यदि आपको हिन्दी के खेत में  धन की फसल काटनी हो तो आपके पास अंग्रेजी का हंसिया होना आवश्यक है.यानि आपकी हिन्दी भले ही बहुत अच्छी ना हो लेकिन आपकी अंग्रेजी अच्छी होनी चाहिये.इस हेतु पूरे प्रयास करें यदि ना हो पाये तो एक खूबसूरत आवाज की मलिका अंग्रेजी में दक्ष सैक्रेटरी को रख लीजिये. जो आपके अपॉइटमेंट ले के डेट्स मैनेज कर सके.डेट मैनेजमेंट एक कला है.इसमें अगले को डेट तब तक नहीं दी जाती जब तक वो मनमाफिक रोकड़े का वादा ना कर दे साथ ही यह भी ध्यान रखा जाता है कि कहीं वो दूसरे हिन्दी सेवी के द्वार ना खटखटाने लगे.   

3. चेला चमचा चमत्कार : चमचों और चेलों के चमत्कार से यदि आप परिचित नहीं तो आप सच्चे सेवक नहीं हो सकते. राजनीति और साहित्य के सभी पुराने खिलाड़ी इन चमत्कारी चिरकुटों से परिचित होते हैं. आपके चेले चमचे ही आपकी असल पूंजी हैं.ये चमत्कारी ही आपके बारे में ऎसी अनुकूल हवा बनाते हैं कि आपकी साहित्य की पतंग, धन वर्षा करती हुई, नित नयी उंचाइयाँ तय करती है.तो जितना हो सके चेले और चमचे बनायें.   

4.मार्केटिंग मंत्रा:एक सफल प्रोड्क्ट के पीछे अतिसफल मार्केटिंग होती है.अपनी मार्केटिंग करें तो अपने नाम और काम के आगे प्रभावशाली विशेषणों का धुंआधार प्रयोग करें जैसे “एक शाम चतुर चक्रम के नाम.हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि के साथ गुदगुदाती,चुभती,हँसाती और ठहाकों भरी कविताओं का वायदा शुद्ध हास्य कवि सम्मेलन.” विशेषण देखिये गुदगुदाती,चुभती,हँसाती जैसे कविता ना हुई गुलाब का फूल हो गया… और ‘शुद्ध’ वैसे ही जैसे वनस्पति घी से मिठाइयां बनाने वाला हलवाई लिखता है शुद्ध देसी घी से बनी.

5. अनिवासी ऎडवांटेज : यदि आप एन आर आई हैं तो समझिये कि आपने आधी बाजी जीत ली.इस देश में आदिवासी और अनिवासी दोनों की बहुत इज्जत है.एक की वोट के लिये दूसरे की नोट के लिये.यदि आप देश के बाहर रहते हैं और हिन्दी साहित्य के नाम पर कूड़ा साहित्य भी पटक देते हैं तो वो भी कालजयी हो अनेक किताबों में परिलक्षित होता है. 

6. एक्स्पोर्ट ओरियेंटेसन: अपने देश में जिस चीज की कदर नहीं उसकी कदर अमरीका,ब्रिटेन में है.यहां के फ्लॉप संत अमरीका में योगी बन जाते हैं यहां की फ्लॉप फिल्में अमरीका,ब्रिटेन में हिट हो जाती है यहां के बॉलीवुडी हीरी भी जब फ्लॉप होने लगते हैं तो शो करने वहां पहुंच जाते है और हिट हो जाते हैं.डॉक्टर,इंजीनियर और आई टी प्रोफेशनल्स का इतिहास तो खैर पुराना है ही. तो आप भी लिखिये अमरीका के लिये ब्रिटेन के लिये.फिर देखिये कैसे बरसते हैं डॉलर और पाउंड.    

7. ए एम सी नहीं पी एम सी:हिन्दी के जुनियर पुत्र हिन्दी सेवा को ऎनुअल मैंटीनैंस कॉंट्रैक्ट की तरह देखते हैं बस एक दिन पैसा लिया और साल भर का जुगाड़ पक्का.अब फिर प्रतीक्षा अगले साल की.ये पिछ्ड़ा तरीका माना जाता है. नयी तकनीक के अनुसार धुरंधर वरद पुत्र हिन्दी सेवा को पर्मानैट मनी चर्नर मानते हैं यानि ऎसी कामधेनु गाय जो हमेशा दूही जा सकती है.  

ये सातों नुस्खे साहित्य के सब्जी बजार में आपकी दुकान अच्छे से चला सकते हैं.आदरणीय शरद जोशी जी ने कहा था ‘साहित्य के सब्जी बजार में तीन तरह के आलू पाये जाते हैं – श्रद्धालू,कृपालू और ईर्ष्यालू “ ये आप को निर्धारित करना है कि आप कौन सा आलू बेचना चाहते हैं. हमारी इन नुस्खों को अपनाये तो आप भी बन सकते हैं एक सफल ‘चतुर चक्रम’

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश, हिन्दी सेवा

वो आज खुश है.पत्नी के प्रेम के वशीभूत भी है.आज उनकी पत्नी ने अपनी हिन्दी की थिसिस जमा कर दी.वे पुलकित भी हैं और किलकित भी. उनकी मेहनत रंग लायी.उनकी मेहनत में उनकी पत्नी का भी हाथ हैं या ये कहें कि पत्नी का पूरा का पूरा किचन भी इसमे शामिल है.जब वह इंटरनैट से कट-पेस्ट कर एक नये ज्ञान की खोज कर रहे थे तब उनकी पत्नी ही तो थी जो उन्हे चाय और कभी कभी प्याज के पकोड़े खिलाकर मोटीवेट कर रही थी.और वो पूरी तरह मोटीवेट हुए भी.यानि चमड़ी मोटी हो गयी और वेट तीस किलो बढ़ गया.लेकिन फिर भी संतुष्टि का कारण यह कि थिसिस पूरी हो गयी. उनको लगा कि हिन्दी सेवा करने का उनका सपना पूरा हो गया. आखिर वो खुद हिन्दी के इतने महान शिक्षक हैं अब पत्नी भी हिन्दी मे रिसर्च कर कहीं ना कहीं शिक्षिका हो ही जायेंगी. दोनों हाथों से हिन्दी के नाम पर पैसे लूटेंगे जो बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने के काम आयेंगें.

उनकी खूबी यह थी हिन्दी के मास्साब होते हुए भी वो नयी तकनीक से पूरी तरह वाकिफ थे. उनके विद्यालय में कई दिनो से धूल खा रहा कंप्यूटर उन्ही के सहयोग से अपग्रेड (रिप्लेस) करवाया गया था क्योकि उनका कहना था कि कंप्यूटर बहुत ही नाजुक मिजाज होता है जैसे आमतौर पर गंदगी में जाने से हैजे या अन्य बीमारियों के वायरस लग जाते हैं वैसे ही कंप्यूटर में भी धूल के कारण वायरस के प्रवेश की पूरी पूरी संभावना है.इसलिये ऎसे बीमारू कंप्यूटर के साथ काम करने की बजाय नया स्वस्थ कंप्यूटर मगाया जाय. उनकी बात मान ली गयी और नया कंप्यूटर आ गया. ये बात और है कि उन्होने पुराने बीमार कंप्यूटर को अपने घर में रखने की हिम्मत की और आज वह कंप्यूटर उनके घर की शोभा बढ़ा रहा है.

आज उन्हें हिन्दी पखवाड़े का उदघाटन करना है.वो उसके लिये नोट्स तैयार कर रहे हैं.उसके लिये भी उनका तकनीकी दिमाग सरपट दौड़ रहा है. हिन्दी दिवस या हिन्दी पखवाड़े की घुड़दौड़ अंग्रेजी को गाली देने से प्रारम्भ होती हुई , अंग्रेजी के मुकाबले हिन्दी की तुलना के मार्ग से जाती है और अंत में हिन्दी के व्यापक प्रयोग की अतृप्त कामना पर समाप्त हो जाती है.उन्होने भी शुरुआत की.अंग्रेजी को गाली दी. क्यों कोई अंग्रेजी दिवस या पखवाड़ा नही मनाता? मनाता तो इंटरनैट पर उन्हें आज के भाषण के लिये कच्चा माल मिल जाता जैसे न जाने कितनी रिसर्चों और भाषणों के लिये मिल जाता है.

उन्हे आज मुख्य अतिथि बनना था.आज उन्होने अपना पुराना कुर्ता पहना. एक झोला लटकाया ताकि मिलने वाले पत्र-पुष्प और कुछ किताबें जो कि हर साल की तरह इस साल भी उन्हें भेंट की जानी थी उनको झोले के हवाले किया जा सके और फिर हिन्दी की फटेहाल झोले वाली इमेज भी बरकरार रहे.हर साल हिन्दी की मिलने वाली किताबों से वो तंग आ चुके थे. उन्हे अपनी लाइब्रेरी में सजाने में उन्हे शरम आती थी कि कहीं उन्हे लोग डाउनमार्केट ना समझने लगें.एक डर और था कि कहीं बच्चे वो किताबें देख उनको पढ़ने ना लग जायें.जादुई छड़ी वाले हैरी पॉटर के सामने चिमटे वाले हामिद मियां को पढ़ लिया तो पिछ्ड़े ही कहलायेंगे ना.लाइब्रेरी में तो वो अंग्रेजी की मोटी मोटी किताबें सजाते थे जिन्हे वो रविवार को सस्ते में पुरानी किताबों की दुकान से खरीद लाते थे. हिन्दी की किताबें अन्दर वाली अलमारी में रख दी जाती थी या फिर किसी को उपहार स्वरूप भेट कर दी जाती थी.इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि किताब के पहले पन्ने में भेंटकर्ता के रूप में वो अपना नाम लिख दें.

हिन्दी अच्छी भाषा है,कम से कम उन लोगों के लिये जो इसकी वदौलत रोटी खा रहे हैं ये पिछ्ड़ी हुई है उसी देश में जिस देश की राष्ट्र भाषा होने का गौरव इसे प्राप्त है. इस देश में हिन्दी सेवा के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है.हिन्दी के पिछड़ेपन का रोना रोने वाले लोग न्यूयार्क की सैर करते हैं. ऎसे में यदि वो भी हिन्दी पखवाड़े में इधर उधर भाषण देके चन्द हिन्दी की किताबें,कुछ पत्र पुष्प और चंद अच्छे संबंध अपनी झोली में रख लें तो क्या गलत है.उन्होने खुद को समझाया. जैसे रिश्वत लेने के बाद नेता लोग देश के भर्ष्टाचार का रोना रोते हुए खुद को समझाते हैं.

वो खुश हैं.उन्होने अभी अभी एक धांसू सा भाषण दिया है,हिन्दी की इस पिछ्ड़ी अवस्था के लिये सरकार से ले के अन्य विभिन्न संस्थाओं और लोगों को गरियाने से खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं. उनकी चाल में विद्वानों सी नजाकत है.अपने गले के हार को शास्त्री जी पकड़ाकर वो मंच से उतर रहे हैं. श्रोताओं में बैठी कुछ भविष्य की शोध छात्राऎं उन्हे अभी से गुरु मान बैठी हैं. वो खिल खिल कर हंसती हैं उन्हे देखती हैं वो भी तिरछी नजर से उनको देखते हैं. सभा खतम हुई. मेज पर डिस्पोजेबल प्लेटों में पैटीज और पेस्ट्रीज हैं. उनसे आग्रह किया जा रहा है वो कुछ ग्रहण करें. वो ना-नुकुर का नाटक कर एक पेस्ट्री अपने मुँह मे डाल ही लेते हैं. उन्ही के अनुरोध पर एक डिब्बे में कुछ पैटीज और पेस्ट्रीज उनके झोले में रख दी गयी हैं. वो खुश हैं कि हिन्दी की सेवा में इस साल का उनका कोटा पूरा हुआ. वो बेसब्री से अगले साल की प्रतीक्षा में हैं.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, हिन्दी, काकेश

Akshargram Anugunjनौ-दो-ग्यारह रहने वाले यदि सुबह के भूले की तरह शाम को घर आकर “अनुगूंज बाइस” करें तो क्या हो ? किसी नये ब्लॉगर ने चुपके से मेरे कान में सवाल पूछा. अब हम भी कोई पुराने ब्लॉगर तो थे नहीं कि अपनी फुरसत का उपयोग,कुछ नया ना लिख पाने की हताशा में, अपने पुराने संस्मरणों को लिखने के लिये करने लगते :-) और ना ही इतने नये कि आज से 90 साल बाद के हिन्दुस्तान की झलक ही दिखला देते. तो पहले तो हम चुप ही रहे लेकिन जब एक नयी नयी ब्लॉगरनि (महिला ब्लॉगर) ने यही सवाल किया तो हमें भी अपना ब्लॉगज्ञान बधारने कि खुजली सी महसूस हुई. हमने उन दोनों को समझाया और कहा देखिये जब वन डे के खिलाड़ी को टैस्ट में खिलाया जाय तो उसे थोड़ी याद रहेगा कि वो किस इनिंग्स में खेल रहा है ..वो तो केवल ओवरों के आंकड़े रखता है या रन रेट के;वो भी पूरे डीटेल में…. उसी तरह जब टेलीग्राम लिखने वाला चिट्ठी लिखने लगे वो भी ई-मेल के जमाने में तो ऎसी गलतियां होना लाजमी है ना..

दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट के सवाल थे और जानने की जिज्ञासा..पर हम चालू थे सत्यनाराय़ण कथा बाचने वाले पंडित जी की तरह.. अब हिन्दुस्तान अमरीका बने इसमें किस को क्या एतराज हो सकता है आज नहीं तो कल बन ही जायेगा शायद 90 साल का इंतजार भी ना करना पड़े पर तब अमरीका क्या होगा ?..इस पर तो कोई चर्चा ही नहीं है… अब हम हिन्दुस्तानी बड़े आशावादी हैं जब कोई कहता है “हिन्दुस्तान अमरीका बन जाये” तो यह मान ही लेते हैं कि इसका मतलब “अमरीका हिन्दुस्तान हो जायेगा”.. हो सकता है जब तक हिन्दुस्तान अमरीका बने तक अमरीका “सुपर-अमरीका” बन जाये… 40 रुपये का डालर 400 रुपये का हो जाये .. लेकिन ऎसा मानना हमारे देश के प्रति अन्याय होगा वो भी साठोत्तर स्वातंत्र्य वाले वर्ष में.. इसलिये हम अपनी पसंद के हिसाब से जो भी हो माने जाते हैं….माने भी क्यों ना जब अनुगुंज 22 दूसरी बार होगी तो ऎसा ही तो होगा ना … संजय भाई भी चुप हैं जो पहले भी अनुगूंज 22 करवा चुके हैं…तरुण जी भी अमरीका में अपने कंट्रोल पैनल के पेंच खुलवा रहे;होंगे समीर जी के स्क्रूड्राइवर से कि ये क्या हो गया 23 के बाद 22 कैसे आ गया..खैर ये तो अक्षरग्राम चौपाल के पंच जाने ..हम तो अभी पांच जबर्दस्त पंच तलाश रहे है कि इस बार कि अनुगूंज (नम्बर में क्या जी..) में क्या लिखें… 

गहन विचार करते करते;हम गहन निद्रा में विलीन हो गये,जैसे संसद में संसद सदस्य हो जाते हैं…और देखते क्या हैं कि हिन्दुस्तान सचमुच अमरीका हो गया… आपको ये शायद बहुत खुशी की बात लग रही हो लेकिन हम बहुत दुखी हैं… आई. टी. के आदमी हैं ना..लास्ट फ्राइडे को ही हमको पिंक स्लिप पकड़ा दी गयी… यानि हम को नौकरी से निकाल दिया गया..क्योकि जो काम हम करते थे वो सारा काम अब एक छोटे से अफ्रीकन देश जिंगाड़ा मे आउटसोर्स कर दिया गया है… जिस काम के हम को महीने में 20 हजार मिलते थे उसी काम को जिंगाडू 500 रुपये महीने में करने के लिये तैयार है ..क्योकि वहां की मुद्रा जुगाड़ी एक रुपये में 40 के आसपास मिलती है …

बहुत से जिंगाड़ू आजकल भारत में भी आ रहे हैं… सुना गया है कि जिंगाड़ा में भारत का वीजा लेने के लिये लाइने लगती हैं…भारत का बिहार राज्य भी आजकल तरक्की पर है क्योंकि अधिकतर जिंगाड़ू बिहार में बस रहे हैं… उन्हे बिहार में अपने देश की जैसी अनुभुति होती है…जिंगाड़ूओं को आकर्षित करने के लिये भारत सरकार ने भी कई नयी नयी योजनाऎं बनायी हैं..वीजा की संख्या भी इस साल बढ़ायी जा रही है…

भारत की युनिवर्सिटियों मे भी जिंगाड़ू उच्च शिक्षा ग्रहण करने आ रहे हैं ..पिछ्ले “पूस सैसन” में 2 लाख जिंगाड़ूओं के भारत आने का समाचार है ..ज्ञात रहे भारत मे अभी युनिवर्सिटी मे चार सैसन होते है .. जेठ सैसन,सावन सैसन,पूस सैसन और बसंत सैसन ..सरकार एक नया सैसन भादो सैसन चालू करवाने पर भी विचार कर रही है…

पिछले दिनों जब हमारा  कंपूटरवा खराब हुआ और हमने “सहायता सेवा” में फोन किया तो एक महिला ने कहा “कहिये श्रीमान जी मैं रजनी आप की किया सहायिता कर सकती हूँ… “..और भी बहुत कुछ वो बोलीं….उनकी हिन्दी समझने के लिये मुझे शब्दकोष का सहारा लेना पड़ा…. मैं उसे अपने कंपूटर की समस्या बता रहा था वो शायद कहीं से देख के मेरे ब्लड प्रेसर के आंकड़े बता रही थी…. किसी ने बताया कि आजकल सारी सहायता सेवा जिंग़ाड़ा से संचालित होती हैं… जिंगाड़ा गये कुछ लोगों ने बताया कि वहां गली गली में हिन्दी सिखाने वाले इंस्टीट्यूट खुल गये हैं… जहां अलग अलग ऎक्सैंट में हिन्दी सिखायी जाते है ..जैसे भोजपुरी हिन्दी , मराठी हिन्दी , बंगाली हिन्दी, पंजाबी हिन्दी आदि…

भारत के प्रमुख पेय चाय ,लस्सी और सत्तू आजकल जिंगाड़ा में बहुत प्रसिद्ध हैं …वहां हर पार्टी में लोग कत्थक और भरतनाट्यम की धुन पर नाचते हैं और इन पेयों का आनंद लेते हैं… इन पेयों की रेसिपी भी वहां के लोग अपने अपने ब्लॉग मे बता रहे हैं… भारत में आने वाले जिंगाड़ू भी अब भारत की फ्लाइट में बैठते ही चाय या सत्तू की मांग करने लगते हैं.. हाँलाकि उनकी पत्नियों थोड़ी चितित भी रहती हैं और उन्हे मना भी करती हैं पर जिंगाड़ी पुरुष मानते थोड़े हैं… उसी तरह से बीड़ी भी जिंगाड़ा में बहुत फेमस है ..भारत से भी कई चीजों का निर्यात पिछ्ले कुछ सालों में बढ़ा है ..इनमे ‘बिपाशा छाप बीड़ी’ और ‘राखी सावंत छाप यूज मी डस्टबिन’ प्रमुख हैं…. 

भारत के कई त्यौहार भी भारत से ज्यादा जिंगाड़ा में मनाये जाते हैं… दिवाली , होली , ईद सभी जिंगाड़ा में लोकप्रिय हुए हैं..यहां तक कि वहां के लोग जिंगाड़ियन त्योहार भले ही भूल गये हों लेकिन भारतीय त्योहारों को पूरे उत्साह से मनाते हैं… जनम दिन पर दिया जलाके मिठाई भी बांटते हैं… ये और बात है कि भारत में अधिकतर लोग अभी भी मोमबत्ती बुझा के केक काट रहे हैं…

उधर जिंगाड़ा प्रगति पर है इधर हम अपनी नौकरी को रो रहे हैं..पहले ही आरक्षण की मार से नौकरियों का अकाल था अब जिंगाडूओं के आने से कंपटीशन और बढ़ गया है…. ये लोग इतने सस्ते में सारे काम कर डालते हैं कि भारतीयों को कोई पूछ्ता ही नहीं है… हम भी परेशान हैं सोचते हैं जितने रुपये हैं उनसे जिंगाड़ा में कोई बढिया सा फार्म हाउस खरीदें और वहीं बस जायें…. काश हिन्दुस्तान अमरीका ना होकर हिन्दुस्तान ही रहता….

यही सोचते सोचते आंख खुल गयी…उफ नींद भी ना …!! तब ही आती है जब इतनी महत्वपूर्ण चीज सोच रहे होते हैं….अब क्या करें??? कब सोचें पंच लाइन अनूगूंज के लिये और आज तो पंच अगस्त भी हो गया जी..यानि लास्ट डेट..चलो छोड़ो अब अगली अनूगूंज में ही लिखेंगे…. उसका जो भी नम्बर हो ..हम अपना नम्बर तो लगा ही देंगे….

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: अनुगूंज, हास्य व्यंग्य

(ये रचना, व्यंग्य की तोप,हमारे सह ब्लॉगर श्री आलोक पुराणिक जी पर नहीं है.)

एक मास्साब थे,काफी सेंसिबल टाइप थे.सारे मास्साब सैसिबल हों ये जरूरी नहीं पर वो थे.लेकिन वो थे थोड़ा पुराने जमाने के मास्साब …यानि पुराणिक टाइप …अभी भी बच्चों को पढ़ाकर उन्हे आदमी बनाने की पुरानी सोच रखते थे.दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंच रही है बच्चे अपने मास्साब को इंसान बनाने की सोच रहे हैं और ये बेचारे..खैर …

ऎसा नहीं था कि इस बात को समझते नहीं थे कि दुनिया बदल रही है इसीलिये दुखी भी थे लेकिन अपना दुख वो कभी भी जाहिर नहीं करते थे दुनिया के सामने उनके बत्तीसी लगातार चमकती रहती थी.हाल ही उनकी एक पुरानी डायरी मेरे हाथ लग गयी.उसी के कुछ अंश पेश कर रहा हूँ.हिन्दी के मास्साब हैं इसलिये शब्द कहीं कहीं अंग्रेजीनुमा हो गये हैं.

आज सुबह उठा तो सुबह अभी भी सोयी ही पड़ी थी.देर रात तक पार्टी किये लोग अभी किसी स्वप्न नगरी की अट्ठालिकाओं में विचरण कर रहे थे.काम करने वाली बाइयों ने अपने घर के काम निपटाने चालू कर दिये ताकि उनके मालिकान उठें तो वो उनके काम निपटा सकें.अलसायी गायें अपने दूहे जाने के लिये तैयार हो रही थी.कुछ कुत्ते नये सुर में भौकने का रियाज कर रहे थे.गधे लदे जाने के लिये मन बना रहे थे. मैंने भी सोचा कुछ लिखने पढ़ने का काम करूं.लेकिन मेरे आसपास की घटनाऎं मेरे दिल को बोझिल कर रही हैं. परिवार में एक अदद मोटी पत्नी और दो अदद खोटे बच्चों के बोझ को नव-श्रवण कुमार की तरह ढो रहा हूँ.आजकल कोई मेरे को नहीं पूछ्ता. ना परिवार वाले ना शिष्यगण.क्या जमाना था जब गुरु को पूरा आदर व सम्मान दिया जाता था. गुरु और भगवान में पहले गुरु के पांव छूने की परम्परा थी.परसों जब बेटे को किसी के पांव छूने को बोला तो कहता है “व्हाट ए नॉन हाइजीनिक ट्रेडीसन” कहता है “डैड यू नो पांव छूने से ना जाने कितने डैंजरस जर्म्स ट्रांसफर हो सकते हैं”.वो हमें पाठ सिखा कर चला गया.क्या करें आजकल हर कोई एक दूसरे को पाठ पढ़ाने में लगा है.पहले तो केवल कवि और लेखकों की पत्नियां ही अपने पतियों को सुनाया करती थी कि तुम कुछ काम धाम नहीं करते अब मैं तुम्हारी कविताओं का अचार बनाऊं या लेखों की चपातियां.घर तुम्हारी कविताओं से नहीं चलता.इन्ही तानों के डर बहुत से प्रतिभावान लेखकों ने या तो लिखना छोड़ दिया या उन्होने कुंवारा रहना स्वीकार किया.इन्ही तानों के डर से हम भी अपना लेखन का काम, जो भी अगड़म-बग़ड़म लिखते हैं, मुँह अन्धेरे ही कर लेते हैं जब पत्नी जी सोयी रहती हैं.हम खुश थे कि हमें लेखकों वाले ताने भी नहीं सुनने पड़ते और लेखन भी हो जाता है.जैसे बहुत से हिन्दी सेवीजन न्यूयार्क के सम्मेलनों में भाग लेने इसलिये जाते हैं ताकि हिन्दी की सेवा भी हो जाये और न्यूयार्क दर्शन भी.

हम ताने ना खाने की खुशफहमी में थे कि कल हमारी पत्नी जी बोली कि  कैसे मास्टर हो जी आजतक इस किराये के मकान में हमें रखे हुए हो वो बगल की बहन जी को देखो उनके नाम कितनी प्रापर्टी है कोई बोल रहा था कि करोड़ों की है.कुछ करते क्यों नहीं ? मैने कहा क्या करूं तो कहती हैं तीन-चार घोटाले ही कर दो.

गुरु शिष्य परंपरा भी पतन की ओर है.जब मैं अपने एक शिष्य को गुरुकुल के बारे में समझाता हूँ तो वो कहता है “कूल!!.. गुरू कूल …!! टैंशन लेने का नहीं गुरू!!.. टैंशन देने का” और वो ढेर सारा टैंशन मेरे को दे बाइक में अपनी महिला मित्र को लेकर फुर्र हो जाता है.

बच्चों को तुलसीदास के बारे में बताता हूँ तो कहते हैं कि आपको नहीं मालूम तुलसी पुरुष नहीं वरन स्त्री हैं.चाहें तो घर घर में पूछ लें आपको सब जगह तुलसी के एक ही कहानी सुनने को मिलेगी. कुछ दिनों पहले जब अपने एक और शिष्य अरुण को एक पंक्ति “बंदउ गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ ” का अर्थ बताने लगा तो वो कहता है कि इसका अर्थ है कि अपने टीच्रर यानो सो-कॉल्ड गुरु को पैरों से बांधकर कहीं बंद कर दो ..खुद पान पराग खाओ..मुँह से अच्छी सुगंध भी आयेगी और अच्छा रस भी मिलेगा. फिर उसने मेरा ज्ञान बढ़ाते हुए कहा लेकिन तुलसी की ये लाइन अब आउटडेटेड है आजकल पान पराग से ज्यादा रजनीगंधा का जमाना है और तुलसी तो साथ है ही.

मेरी समझ में नहीं आता कि मैं आउटडेटेड हूँ या बच्चे अपडेटेड.कुछ दिनों पहले तक मैं समझता था कि ‘डेट’ मतलब ‘दिनांक’ या ‘तारीख’ होता है लेकिन जब शिष्या ‘शर्मीली’ किसी को बता रही थी कि वो कल डेट पर जा रही है तो समझा कि ये तारीख से भी ऊंची कोई चीज होती है. किसी ने बताया कि ‘डेट’ भविष्य की किसी तारीख में मुकदमे का अनुकूल फैसला हो जाने के लिये लगायी जाने वाली तारीख है.मुझे कानून की तो जानकारी ज्यादा नहीं है किसी कानूनविद से पूछुंगा कि ये क्या बला है.

आज का दिन फिर उन्ही लड़ाई झगड़ों में बीत गया जो आजकल आम होते जा रहे हैं.मिसेज गुप्ता अपनी किटी पार्टी में कोई नया गहना पहन कर आयी तो मेरी पत्नी ने भी एक नये गहने की मांग कर डाली.ना मानने पर उन्होने भूख हड़ताल करने की घोषणा की है..भूख हड़ताल-यानि कि वो खाना नहीं बनायेंगी और मेरे को भूखा रहना पड़ेगा.इसीलिये परेशान हूँ सोच रहा हूँ कि पत्नी की बात मान ही लूँ ..यानि एक आध घोटाला कर ही डालूँ.

काकेश

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य

पिछ्ली बार जब हरिशंकर परसाई जी कि एक रचना प्रस्तुत की थी तो युनुस भाई ने कहा था

“परसाई जी की और रचनाएं लाएं”

आज पेश उनकी एक और रचना.

सुबह की डाक से चिट्ठी मिली, उसने मुझे इस अहंकार में दिन-भर उड़ाया कि मैं पवित्र आदमी हूं क्योंकि साहित्य का काम एक पवित्र काम है. दिन-भर मैंने हर मिलने वाले को तुच्छ समझा. मैं हर आदमी को अपवित्र मानकर उससे अपने को बचाता रहा. पवित्रता ऐसी कायर चीज है कि सबसे डरती है और सबसे अपनी रक्षा के लिए सचेत रहती है. अपने पवित्र होने का एहसास आदमी को ऐसा मदमाता है कि वह उठे हुए सांड की तरह लोगों को सींग मारता है, ठेले उलटाता है, बच्चों को रगेदता है. पवित्रता की भावना से भरा लेखक उस मोर जैसा होता है जिसके पांव में घुंघरू बांध दिए गए हों. वह इत्र की ऐसी शीशी है जो गंदी नाली के किनारे की दुकान पर रखी है. यह इत्र गंदगी के डर से शीशी में ही बंद रहता है. वह चिट्ठी साहित्य की एक मशहूर संस्था के सचिव की तरफ से थी. मैं उस संस्था का, जिसका लाखों का कारोबार है, सदस्य बना लिया गया हूं. स्थायी समिति का सदस्य हूं. यह संस्था हम लोगों को बैठकों में शामिल होने का खर्च नहीं देती क्योंकि पैसा साहित्य के पवित्र काम में लगे हुए पवित्र पदाधिकारियों के हड़पने में ही खर्च हो जाता है. सचिव ने कि साहित्य भवन के सामने एक सिनेमा बनाने की मंजूरी मिल रही है. सिनेमा बनने से साहित्य भवन की पवित्रता, सौम्यता और शांति भंग होगी. वातावरण दूषित होगा. हम मुख्यमंत्री को सिनेमा निर्माण न होने देने के लिए ज्ञापन दे रहे हैं. आप भी इस पर दस्तखत कर दीजिए. इस चिट्ठी से मुझे बोध हुआ कि साहित्य पवित्र है, हम साहित्यकार पवित्र हैं और साहित्य की यह संस्था पवित्र है. मेरे दुष्ट मन ने एक शंका भी उठाई कि हो सकता है किसी ऐसे पैसेवाले ने, जिसे उस जगह दुकान खोलनी है, हमारे पवित्र साहित्य के पवित्र सचिव को पैसा खिला दिया हो कि सिनेमा न बनने दो. पर मैंने इस दुष्ट शंका को दबा दिया. नहीं, नहीं, साहित्य की संस्था पवित्र है, सिनेमा अपवित्र है. हमें अपवित्रता से अपना पल्ला बचा लेना चाहिए.

शाम की डाक से संस्था के विपक्षी गुट के नेता की चिट्ठी आई जिसमें संस्था में किए जा रहे भ्रष्टाचार का ब्यौरा दिया गया था.इस पत्र ने मुझे झकझोरा. अपनी पवित्रता पर मुझे शंका हुई. साहित्य के काम की पवित्रता पर शंका हुई. साहित्य की संस्था की पवित्रता की मेरी उठान शांत हुई और मैं नॉर्मल हो गया. इतने साल साहित्य के क्षेत्र में हो गए. मैं कई बार पवित्र होने की दुर्घटना में फंसा, पर हर बार बच गया. मुझे लिखते जब कुछ ही समय हुआ था, तभी बुजुर्ग साहित्यकार मुझसे कहते थे- आपने साहित्य रचना का कार्य अपने हाथ में लिया है. माता वीणा-पाणि के मंदिर की पवित्रता बनाए रखिए. मैं थोड़ा फूलता था. सोचता था, सिगरेट पीना छोड़ दूं क्योंकि इस धुंए से देवी के मंदिर के धूप की सुगंध दबती होगी. पर मैं उबर आया. वे बुजुर्ग कहते- मां भारती ने आपके सामने आंचल फैलाया है. उसे मणियों से भर दीजिए. (वैसे कवि ‘अंचल’ उस दिन कह रहे थे कि हम तो अब ‘रजाई’ हो गए). जी हाँ, मां भारती के अंचल में आप कचरा डालते जाएं और उसी में मैं मणि छोड़ता जाऊं. ये पवित्र लोग और पवित्र ही लिखने वाले लोग बड़े दिलचस्प होते हैं. एक मुझसे बार-बार कहते- आप अब कुछ शाश्वत साहित्य लिखिए. मैं तो शाश्वत साहित्य ही लिखता हूं. वे सट्टे का फिगर रोज नया लगाते थे, मगर साहित्य शाश्वत लिखते थे. वे मुझे बाल्मीकि की तरह दीमकों के बमीठे में दबे हुए लगते थे. शाश्वत साहित्य लिखने का संकल्प लेकर बैठने वाले मैंने तुरंत मरते देखे हैं. एक शाश्वत साहित्य लिखने वाले ने कई साल पहले मुझसे कहा था- अरे, आप स्कूल मास्टर होकर भी इतना अच्छा लिखते हैं. मैं तो सोचता था, आप प्रोफेसर होंगे. उन्होंने स्कूल-मास्टर लेखक की हमेशा उपेक्षा की. वे खुद प्रोफेसर रहे. पर आगे उनकी यह दुर्गति हुई कि उन्हें कोर्स में लगी मेरी ही रचनाएं कक्षा में पढ़ानी पड़ीं. उनका शाश्वत साहित्य कोर्स में नहीं लगा. सोचता हूं, हम कहां के पवित्र हैं. हममें से अधिकांश ने अपनी लेखनी को रंडी बना दिया है, जो पैसे के लिए किसी के भी साथ सो जाती है. सत्ता इस लेखनी से बलात्कार कर लेती है और हम रिपोर्ट तक नहीं करते. कितने नीचों की तारीफ मैंने नहीं लिखी. कितने मिथ्या का प्रचार मैंने नहीं किया. अखबारों के मालिकों का रुख देखकर मेरे सत्य ने रूप बदले हैं. मुझसे सिनेमा के चाहे जैसे डायलाग कोई लिखा ले. मैं इसी कलम से बलात्कार की प्रशंसा में भी फिल्मी गीत लिख सकता हूं और भगवद् भजन भी लिख सकता हूं. मुझसे आज पैसे देकर मजदूर विरोधी अखबार का संपादन करा लो और कल मैं उससे ज्यादा पैसे लेकर ट्रेड-यूनियन के अखबार का संपादन कर दूं. इसी कलम से मैंने पहले ‘इंदिरा गांधी जिंदाबाद’ लिखा था, फिर ‘इंदिरा गांधी मुर्दाबाद’ लिखा था, और अब फिर ‘इंदिरा भारत है’ लिख रहा हूं. क्या हमारी पवित्रता है? साहित्य भवन की पवित्रता को सिनेमा भवन क्या नष्ट कर देगा? पर होता तो है पवित्रता, शराफत, चरित्र का एक गुमान. इधर ही एक मुहल्ले में सिनेमा बनने वाला था, तो शरीफों ने बड़ा हल्ला मचाया- यह शरीफों का मोहल्ला है. यहां शरीफ स्त्रियां रहती हैं और यहां सिनेमा बन रहा है. गोया सिनेमा गुंडों के मोहल्ले में बनना चाहिए ताकि इनके घरों की शरीफ औरते सिनेमा देखने गुंडों के बीच जाएं. मुहल्ले में एक आदमी रहता है. उससे मिलने एक स्त्री आती है. एक सज्जन कहने लगे- यह शरीफों का मुहल्ला है. यहां यह सब नहीं होना चाहिए. देखिए, फलां के पास एक स्त्री आती है. मैंने कहा- साहब, शरीफों का मुहल्ला है, तभी तो वह स्त्री अपने पुरुष मित्र से मिलने बेखटके आती है. क्या वह गुंडों के मुहल्ले में उससे मिलने जाती?

पवित्रता का यह हाल है कि जब किसी मंदिर के पास से शराब की दुकान हटाने की मांग लोग करते हैं, तब पुजारी बहुत दुखी होता है. उसे लेने के लिए दूर जाना पड़ेगा. यहां तो ठेकेदार भक्ति-भाव में कभी-कभी मुफ्त भी पिला देता था. मैं शाम वाले पत्र से हल्का हो गया. पवित्रता का मेरा नशा उतर गया. मैंने सोचा, साहित्य भवन के सचिव को लिखूं- मुझे दूसरे पक्ष का पत्र भी मिल गया है जिसमें बताया गया है कि अपनी संस्था में कितना भ्रष्टाचार है. अब तो सिनेमा-मालिक को ही मांग करनी चाहिए कि यह साहित्य की संस्था यहां से हटाई जाए, जिससे दर्शकों की नैतिकता पर बुरा असर न पड़े. इसमें बड़ा भ्रष्टाचार है.

कैसी लगी!!

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हरिशंकर परसाई, हास्य व्यंग्य
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