चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य

नये युग के बच्चे अब नये तरीके सीखना चाहते हैं.उन्हे अब पुराने तरीको से कोई मतलब नहीं.नये युग के कुछ बच्चों को इतिहास पढ़ाना चाह रहा था.ताकि वो भी समझे कि उनके पूर्वजों ने कितने कितने त्याग किये.कितने दिन सुनहले होते होते रह गये और रातें काली हो गयी.लेकिन बच्चों की इच्छा अब इस चवन्नी छाप इतिहास जैसे विषयों में कहाँ रही.वह रातों रात प्रसिद्ध होना चाहते हैं-येन केन प्रकारेण.भले ही उसके लिये उन्हें किसी को गरिया कर उसकी वाट लगानी पड़े या फिर मालिक के सामने कुत्ते की तरह दुम हिलानी पड़े. प्रसिद्ध होने की राह यदि बदनामी के मोहल्ले से भी गुजरती हो तो भी स्वीकार्य है.

मैं बच्चों को जैनुइनली इतिहास पढ़ाना चाहता था. मैने सोचा की चलो उन्हे कोई कहानी सुनाऊं..नये जमाने के बच्चे थे ‘कहानी घर घर की’ में इंट्रस्ट रखते थे इतिहास में नहीं.मैने उन्हे पढ़ाते हुए कहा कि एक राजा था जो… एक बालक बोल उठा कि ‘ये राजा क्या होता है..??’. मैने कहा राजा याने किंग.बच्चे आजकल जो बात हिन्दी में नहीं समझते वो अंग्रेजी में आसानी से समझ जाते हैं. वो बोला अच्छा किंग यानि किंग खान यानि शाहरुख खान…मैं बोला अरे वो किंग खान नहीं बादशाह,शहंशाह..मैने उर्दूमय होना चाहा पर मनमोहनमय होकर रह गया.लड़के ने कड़कके पलटके जबाब दिया ..वो इतना जोर से बोला कि एक पल को तो मै भी ऎसे हिल गया जैसे करुणानिधि की धमकी से मनमोहन सरकार हिल जाती है…वो बोला देख बे मास्टर ठीक ठीक बता राजा मतलब बादशाह यानि शाहरुख या शहंशाह यानि अमिताभ बच्चन ….दोनों में कौन है राजा.. ? ये तो अपने आपमें एक बहस का मुद्दा था कि कौन है राजा और मैं लैफ्ट पार्टी की तरह मुद्दों में नही उलझना चाहता था.तो मैं अपने को संयत करते हुए बात को दूसरी तरफ ले गया और मेरी सरकार गिरते गिरते बची…मैं बोला कि अरे राजा.. समझो जैसे हमारे देश के राजा मनमोहन सिंह ..अरे तो बोल ना राजा मतलब बिना पैंदी का लोटा होता है.जिसकी जमीन का पता नहीं लेकिन आसमान में उड़ता है,व्यर्थ ही कुड़ता है ...मैं वाद-विवाद को संसद के नेताओं की तरह खींचना नहीं चाहता था इसलिये मैने मान लिया हाँ हाँ वही…

तो एक भूतपूर्व राजा था… भूतपूर्व बोले तो …पहले वो राजा था आजकल नहीं है ..आजकल कौन है ? किसी ने सवाल किया ..आजकल कौन है वो कहानी का हिस्सा नहीं है… ये राजा केवल नाम का राजा था यानि कि भारत की स्वतंत्रता के बाद का राजा …सरकार से कुछ रकम मिलती थी उसी से गुजर बसर होती थी..थोड़ा बहुत कमाई अपने शहर की प्रजा से लिये गये चंदे के ब्याज से हो जाती. लेकिन ठाठ बाठ वही राजाओं वाले ..यानि कड़क के बोलता मगर हड़क के रहता था.. और मूछें रखता था ..कभी कभी उन पर ताव भी देता था…

ताव मने ..?? मैने ताऊ तो सुना था ..क्या ताव और ताऊ एक ही है ?? एक जिज्ञासु बालक ने शंका जाहिर की. मैने उस बच्चे के शब्द ज्ञान की तारीफें करते हुए कहा कि नहीं बेटा ताव मतलब जैसे कभी कभी गुस्सा हो जाना …गुस्से में अंट शंट बक देना जैसे बाल ठाकरे जी बोल देते है कभी कभी..बच्चा समझ गया या फिर उसने मुझे आगे छेड़ना उचित नहीं समझा पता नहीं पर हमने अपनी कहानी आगे बढ़ायी.

एक बार राजा को जिद सवार हुई की मेरा थोबड़ा टी वी पर आना चाहिये.क्यों आना चाहिये ये नही मालूम पर आना चाहिए.अब राजा की जिद थी… आना है तो आना है..राजा भले ही भूतपूर्व था पर उसके कुछ पुराने चमचे टाइप लोग थे जो हर समय उसके साथ रहते और उसकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते.ये चमचे टाइप लोग भी अजीब होते हैं. राजा ने कहा रात है तो चमचों ने भी कहा रात है..राजा ने कहा सुहानी रात है चमचों ने भी कहा सुहानी रात है और ये सुबह सुबह की बात है..  अब राजा की औकात चमचों से थी या चमचों की औकात राजा से या फिर दोनों की कोई औकात ही नहीं थी इस बात का पता लगाना बड़ा कठिन था. 

चमचों ने इधर उधर हाथ पांव मारे.. अच्छे अच्छे चैनल के कच्चे पक्के पत्रकारों को पटाने की कोशिश की आखिर चमचों की मेहनत रंग लायी और एक पत्रकार पट ही गया..पत्रकारों को कैसे पटाया जाता है ? एक बच्चे ने जानना चाहा.. ये किसी और क्लास में पढ़ाया जायेगा.मैने उसे चुप कराया..हां तो चमचों ने पता लगाया कि अधिकतर टी वी चैनल दिल्ली में हैं तो राजा को दिल्ली जाना पड़ेगा… दिल्ली नेताओं की नगरी तो थी ही अब चैनल नगरी भी हो गयी थी….राजा पूरी तैयारियों के साथ दिल्ली पह्ंचा और उसके थोबड़े के टीवी में आने की उल्टी गिनती शुरु हो गयी. 

इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है बच्चों ने जो उत्तर दिये उनमें से प्रमुख थे.

1.हर भूतपूर्व अभूतपूर्व नहीं होता.

2.ये  चमचे बड़े काम की चीज होते हैं.इसलिये हर व्यक्ति को चमचे रखने चाहिये.
3. यदि सही तरीका अपनाया जाये तो पत्रकारों को पटाना आसान काम होता है..

काकेश

इस सीरीज के अन्य लेख : रंगबाजी का रंग बच्चों के संग

लंगी लगाने की विशुद्ध भारतीय कला

 

नेतागिरी स्कूल में भर्ती होने वाले कुछ दुहारू (दूसरों को दूहने में माहिर) छात्रों की परीक्षा चल रही थी.वहां के प्रश्नपत्र में आये निबंध पर एक मेघावी और भावी इतिहास पुरुष छात्र का निबंध.

लंगी लगाना भारतीय मूल की प्रमुख कला है.लंगी लगाना यानि किसी बनते बनते काम को लास्ट मूमेंट में रोक देना.जैसे आप अपनी प्रेमिका को फोन लगाने के लिये मन बनायें और आपकी बीबी पीछे से आपको आवाज दे दे.वैसे बीबीयाँ ही लंगी लगायेंगी ये जरूरी नहीं ये काम आपके चिर परिचित हें हें हें या नॉन हें हें हें टाइप मित्र भी कर सकते है.हर बात पर क्रांति की धमकी देने वाले नये क्रांतिकारी भी और सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहने वाले महान बुद्धिजीवी भी इस कला में माहिर होते हैं. अब वो चाहें लल्लू हों या चिरकुट लंगी लगाने के मामले में हम भारतीय जन्मजात एक्सपर्ट होते हैं.एशियाई खेलों में कबड्डी में स्वर्ण पदक हमारी इसी जन्मजात प्रतिभा का कमाल है. कुछ विश्वस्त सूत्रो ने खबर दी है कि भारत सरकार लंगी लगाने की इस विशुद्ध भारतीय कला का पेंटेट कराने की भी सोच रही है.नहीं तो क्या पता कोई विदेश में रहने वाला चौधरी, जो इस मामले में पहले से ही बदनाम है,इसका भी पेटेंट करवाले.

यह कला आजकल ही सामने आयी है यह कहना उचित नहीं होगा. इतिहास गवाह है कि यह कला तो युगों पुरानी है. किसी भी चीज का इतिहास उस चीज से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है,हालांकि इतिहास झूठ को सच और सच को झूठ करने की सफल कोशिश का नाम  भी है फिर भी इतिहास ही किसी भी चीज को समझने का पैमाना भी है.

त्रेता युग में रामचन्द्र जी के साथ ऎसा ही हुआ था.जब रामचन्द्र जी को सारा राजपाट मिलने की तैयारियां हो रही थी तो उनकी सौतेली माता कैकयी ने लंगी लगा दी और बेचारे राम को 14 वर्ष जंगलों की धूल छाननी पड़ी.वैसे उन्होने भी शूर्पनखा के लखन जी से और रावण के सीता से विवाह करने के  सपनों पर लंगी लगाकर बदला चुकाने की कोशिश की पर वो खुद ओरिजिनल भुक्त भोगी थे.

द्वापर युग में लंगी लगाने के अनेक हिट सीन हुए हैं.जिन पर आज भी दर्शक चवन्नी फैंक के ताली बजा सकता है.अर्जुन घूमती मछली की आंख पर निशाना साध कर (जिसके लिये वो बचपन से प्रैक्टिस कर रहे थे) द्रोपदी को जीतकर लेकर घर आ रहे थे और सुहागरात के सपनों में  खोये हुए थे कि माता कुंती ने लंगी लगा दी और द्रोपदी को पांचो पांडवों में बांट दिया. युधिष्ठिर को राजपाट मिलने की बातें पक्की होने वाली थी कि दुर्योधन ने लंगी लगा दी और उन्हें वनवास में भिजवा दिया.द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था.दु:शाशन नग्न द्रोपदी को देखने के सपनों में खोया था.सभा के अन्य लोग भी भारतीय जनता की तरह शांत हो तमाशा देख रहे थे कि कृष्ण जी ने लंगी लगा दी.कुछ लोगों के अनुसार कृष्ण को इतिहास के प्रमुख लंगीबाजों में शामिल किया जा सकता है. अर्जुन जब युद्ध से विमुख हो कुछ भला काम करने की सोच रहा था तो उसे गीता का उपदेश देकर युद्ध में भिजवाने की लंगी मारने में भी कृष्ण जी का ही हाथ था.

कलियुग में भी ऎसी कई घटनाऎं मिल जायेंगी,जैसे जयचन्द का पृथ्वीराज चौहान को लंगी मारना. आधुनिक भारत में ऎसी कई मिसाल ढुंढी जा सकती हैं जैसे सोनिया गाधी को कोई अदृस्य लंगी लगना जिसकी वजह से उनका पी एम बनने से रह जाना.वैसे भी लंगी मारक क्रियाओं और नेतागिरी में चोली दामन का साथ है. लैफ्ट पार्टियां इस कला की जीतीजागती मिसाल पेश करते ही रहती हैं.कुछ लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि CPI(L) का L और CPI(M) का M मूलत: क्रमश: लंगी और मारने के लिये ही प्रयुक्त होते है.लेखक इस बारे में और गहन शोध कर रहे हैं.

कुछ लोग “लंगी लगाना” की तुलना “लकड़ी करना”,”बांस करना”,”डंडा करना” या “टांग अड़ाना” जैसे अन्य विशुद्ध भारतीय क्रियाओं से करते हैं पर मेरा मानना है कि ये सब अलग अलग क्रियाऎं है और अलग अलग मौकों पर प्रयुक्त की जाती है.

लंगी लगाने की क्रिया में कैटेलिस्ट यानि उत्प्रेरक का भी बहुत बड़ा योगदान होता है. कई बार इन कैटेलिस्टों के बारे में हमें जानकारी रहती है कभी नहीं रहती लेकिन अधिकतर मामलों में कोई ना कोई कैटेलिस्ट होता ही है. कुछ प्रमुख इतिहास प्रसिद्ध कैटेलिस्ट है कुबड़ी दासी  मंथरा, मामा शकुनि आदि.

तो इससे हमें पता चलता है कि लंगी मारना एक विशुद्ध भारतीय कला है इस का अधिक से अधिक उपयोग कर हमें इस (विलुप्त होती ..हो नहीं रही कहीं हो ना जाये ..वैसे चांसेज कम ही हैं पर क्यों रिस्क लें)कला को डूबने से बचाना चाहिये.तो क्यों ना आज से लंगी मारना प्रारम्भ करें.

काकेश

इस सीरीज के अन्य लेख : रंगबाजी का रंग बच्चों के संग

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य
 

एक मास्साब क्लास में बच्चों को रंगो के बारे में पढ़ा रहे थे.उन्होने मास्साबों की चिर परिचित इस्टाईल में पूछा कि “बच्चो रंगो के बारे में तुम लोग क्या जानते हो? “.
अब हमारे जमाने के बच्चे होते तो चुप होकर नीचे देखने लगते कि कहीं मास्साब से नजर मिली और उन्होने उठा कर पूछ लिया तो !! और मन ही मन सोचते कि अरे जानते ही होते तो तेरी क्लास में क्या झक मारने आते….पर आजकल के बच्चे बड़े समझदार हैं.इधर मास्साब ने सवाल पूछा और उधर जबाब हाजिर इसीलिये समझदार मास्टर लोग आजकल सवाल  पूछने का जोखिम ही नहीं उठाते.

एक बच्चा उठा और बोला जी “रंगबाजी” वो होती है जिसमें सामने वाले को अपने सारे रंग तब तक दिखाये जाते हैं  जब तक कि वो डर के मारे कोई भी रंग ना देखने की कसम ना खाले. मैने रंगबाजी नहीं केवल रंग के बारे में पूछा था.मास्टर ने बच्चे को जबरदस्ती बैठाते हुए कहा.मास्टर ने सोचा अब तो कोई बता नहीं पायेगा और फिर अपनी विद्वता का चोला ओड़ वो बच्चों को समझायेगा.गलती यहीं हो गयी मास्टर से… मास्टर पुराने जमाने का था बच्चे नये जमाने के.

एक और बच्चा उठा और बोला जी रंग वो होता है जो आमिरखान बसंती से मांगते है (सन्दर्भ : रंग दे बसंती .. रंग दे बसंती ).बसंती कौन ..?? मास्टर ने पूछा ..अरे वही धन्नो की मालकिन,वीरु की माशूका और कौन… किसी ने पीछे से ज्ञान वर्धन करते हुए कहा…. और सर रंग वो होता है जो बादलों में भरा रहता है ( सन्दर्भ : रंग भरे बादल में) और जब वह बरसता तो और कुछ भी नहीं भीगता सिर्फ चुनर वाली गोरी ही भीगती है ( सन्दर्भ : रंग बरसे ..भीगे चुनर वाली ).

बच्चा कुछ और ज्ञानवर्धन करता मास्टर ने उसे बैठाते हुए कहा अरे रंग जैसे हरा..पीला..लाल… एक बच्चा बोला जी जैसे सर “लाल किला” ..जहां झंडा फहराने का सपना हर कोई नेता देखता है. ..”लाल बत्ती” जो हर नेता की जरूरत है… और आजकल तो सर ये रंग और भी फेमस हो रहा है ..”लाल मस्जिद” की वजह से…अब सर लाल मस्जिद के मदरसों में पढ़ रहे लाल ऎसा ही तो करेंगे ना कमाल ..

मास्साब ने बीच में किसी तरह बोलने की कोशिश की और कहा कि रंगो के अंग्रेजी नाम होते है जैसे ग्रीन , रैड , ब्लू …जी हां अमिताभ अंकल अंग्रेजी में ही रंग मांगते है कहते है “गिव मी रैड” ..मांगने के मामले में आमिर खान और अमिताभ अंकल समान हैं.. बच्चा बोलता रहा …और ब्लू ये तो मेरा फैवरिट कलर है… दिल्ली सरकार का भी ये फैवरिट कलर होता था जब उन्होने रैड लाइन बसें हटाकर ब्लू लाइन बसें चलायी.. इस फैवरेटिज्म को बरकरार रखने के लिये कई बसे पुलिस वालों ने खरीद ली कुछ अपने रिश्तेदारों को भी खरीदवा दी.. अब शीला जी कह रही हैं कि “मैं ब्लू लाइन बस की बजाय पैदल जाना पसंद करुंगी”..वो तो करेंगी ही ..अब पैदल चलेंगी तो रास्ते में सब लोग फूलों से स्वागत करेंगे..हो सकता है कोई एकाध गिफ्ट भी पकड़ा दे .. ब्लू लाइन बस में क्या मिलेगा ..?? उलटा कंडक्टर पैसे और मांग लेगा टिकट नहीं देगा .. कोई भद्र इंसान चिंकोटी काट देगा या धक्का लगा देगा… ज्यादा ही कोई मेहरबान हुआ तो पर्स पर हाथ साफ कर लेगा.. अब इत्ते से के लिये क्यों बस में जाना..?? हाँ यदि आपकी किस्मत अच्छी हुई और बस ने किसी को टक्कर मार दी तो हो सकता है कि आपको बीच रास्ते उतरना पड़े ताकि आपकी जनता बस को तोडने फोड़ने का काम सुचारू रूप से संपन्न कर सके… और फिर आपकी पैदल चलने की लालसा पूरी हो सकती है…लेकिन ये तो किस्मत के ऊपर डिपेंड करता है … और किस्मत का रिस्क क्यों लेना वैसे ही अभी अभी चुनावों में किस्मत ऎन वक्त पर धोखा देके भाग गयी थी…ना जी ना …आप तो पैदल ही चलिये….

लेकिन ब्लू लाइन ..मास्साब ने अपनी कोई बात रखने की कोशिश की .. एक बच्चे ने बात को उसी तरह काटते हुए अपनी बात जारी रखी जैसे संसद में अध्यक्ष की बात काटते हुए सांसद जारी रहते हैं…देखिये सर अभी सरकार को ब्लू रंग से थोड़ी चिढ़ हो रही है .क्योकि जैसे ब्लू फिल्में बैन है (सिर्फ बैन हैं अनुपलब्ध नहीं ..पीछे बैठा लड़का कल रात की देखी हुई फिल्म को याद कर धीरे से बोला) ..सरकार ब्लू लाइन को भी बंद करने जा रही है ..अब कोई नया रंगा आई मीन रंग आयेगा और नये ढंग से पब्लिक की सेवा करेगा ..इसी को कहते है सर.. सरकार की रंगबाजी …

मास्साब कुछ बोलते इससे पहले ही घंटी बज गयी और मास्साब अपना रजिस्टर उठा कर बाहर निकल गये….

 

कल जब मित्र समीरलाल जी ने “मोटों की महिमा” छापी तो अपने मोटापे पर आती जाती शरम फिर गायब हो गयी और एक पुरानी पढी कविता याद आ गयी.. लीजिये कविता प्रस्तुत है…

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आराम करो

आराम करो

एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।

क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।

करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।

मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।

मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।

मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।

मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

- गोपालप्रसाद व्यास

 

ये तो आपको मालूम ही है कि हिन्दी ब्लॉग की दुनिया के एकमात्र पंगेबाज ने 6 जुलाई को संन्यास लेने की घोषणा की थी.ये एक बड़ी घटना थी कम से कम उन लोगों के लिये जो पंगेबाज के पंगों से परिचित थे.हर एक ब्लॉगर से पंगे लेने वाला बन्दा  ऎसा कैसे कर सकता है.हमने तुरंत काकेश ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेसन (KBI) के कुछ जाबांज सिपाहियों को काम पर लगा दिया कि वो पता कर के आयें कि आखिर बात क्या है.उन्होने जो रपट भेजी उसी के आधार पर प्रस्तुत है ये विशेष रिपोर्ट एक्सक्लूसिबली इसी ब्लॉग पर. आइए उस पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें…लेकिन पंगेबाज वापस लौटे या नहीं ये हम आपको बतायेंगे एक छोटे से नॉन कॉमर्शियल ब्रेक के बाद. अभी आप पूरी घटना पर एक नजर डालें.

जब पंगेबाज ने अपना पोस्ट लिखा तब वो बहुत बैचैन थे ..अब वह भले ही कहते हों कि उन्होने केवल नारद से जाने का फैसला लिया है लेकिन उनकी पोस्ट देखिये क्या कहती है…

ब्लोग की दुनिया के दोस्तो को पंगेबाज का नमस्कार
दोस्तो,ब्लोग बनाते समय मजाक मजाक मे ले लिया गया नाम एक पहचान बन जायेगा,एक मजाक से शुरु हुई पंगेबाज की ये यात्रा इतना खुबसूरत मोड लेकर यहा पहुचेगी कभी सोचा ना था,पर हुआ .आप सब लोगो का असीम प्यार का हकदार बना मै.आज दिनांक ६ जुलाई को मै पंगेबाज आप सब को अलविदा कहते हुये आप सब से विदा ले रहा हू.
आप सब से मिले प्यार दुलार का बहुत बहुत धन्यवाद,शुक्रिया,
आपका
पंगेबाज

यानि वो ब्लौग की दुनिया से जाने का मन बना चुके थे ..उस समय उन्होने अपनी नारद वाली चिट्ठी भी नहीं चिपकायी थी… हमारी आदत है कि हम सुबह सुबह बिना किसी ऎग्रीग्रेटर की मदद लिये कुछ चुनिंदा ब्लौग जरूर खोल के देखते है .. उनका ब्लॉग देखा तो वो एक संन्यासी की तरह सब कुछ छोड़ छाड़ कर जाने की घोषणा कर चुके थे…तुरंत लगा कि या तो वो नाटक कर रहें हैं या फिर रात की अभी तक उतरी नहीं ..इसिलिये हम तो टिपिया भी दिये.. लेकिन उधर से कोई जबाब आता नहीं दिखायी दिया… तो तुरंत फोन लगाया गया कि आखिर बात क्या है…??

उनकी आवाज सुनके ही लगा कि चोट कहीं गहरी लगी है.. वही निर्विकार भाव और वही बच्चों जैसी बातें….कि नहीं रहना मुझे यहां .. क्या होगा ये सब ब्लॉग लिख कर … फालतू की बातें करते हैं सब… एक दूसरे को गाली देने के अलावा कुछ काम ही नहीं रह गया है …..क्या समझता है वो @#$ अपने आपको …

हम ध्यान पूर्वक उनको सुनते रहे …ये तो साफ हो गया कि रात कि चढ़ी हुई तो नहीं ही है…. कुछ और बात है …वो बदस्तूर जारी थे..

मैं अपने काम में मन लगाउंगा ..ये करुंगा वो करुंगा …सारी की सारी पोस्टे डिलीट कर दुंगा…

हमने उन्हें समझाया …जैसे शराबी फिल्म में अमिताभ बच्चन को उनके छोटे भाई समझाते हैं… कि भैया पोस्ट डिलीट करके क्या होगा..उलटा आपकी पोस्ट को कोई कॉपी कर लेगा (कुछ लोग इसमें बहुत माहिर हैं) ..फिर अपने ब्लॉग पर छापकर अपनी हिटास बुझायेगा…. अब तो लोगों की चिट्ठा जगत के सक्रियता क्रम पर भी नजर है भाई …

तो उस समय तो मान गये कि नहीं वो पोस्ट डिलीट नहीं करेंगे …हम अपनी सफलता पर वैसे ही  खुश नजर आये जैसे माननीय प्रतिभा पाटिल को देख के शिव सेना वाले खुश होते हैं…. लेकिन मन तो खिन्न था ही कि आखिर क्या हो रहा है हिन्दी चिट्ठा जगत को….तुरंत एक पोस्ट चढ़ायी जिसको शुरु तो किया था अपनी यात्रा के बारे में बताने के लिये पर उसके बीच में ही हमने भी इन सब झमेलों से दूर रहने की घोषणा कर दी….  

पंगेबाज से दिन में फिर वार्तालाप का दूसरा राउंड हुआ ..हमने उनसे कहा कि आप भले ही पंगेबाज नाम से ना लिखें या फिर ब्लॉग ही ना लिखें पर लिखना बन्द मत करें …माशाअल्लाह अच्छा लिखते हैं…!! अब अपनी तारीफ सुनकर नाग भी काटना छोड़कर नाचना शुरु कर देता है ..वो भी पिघल ही गये … :-) बोले नहीं नहीं लिखना बन्द नहीं करेंगे ….क्यों करेंगे इन @#$@ के लिये ..??? हम लिखेंगे और तुमको दे देंगे…तुम अपने ब्लॉग पर छाप देना….

हमने मन ही मन सोचा कि इतना अच्छा भी नहीं लिखते कि हम अपने ब्लॉग पर छाप दें.. :-) पर इनसे कहा ….नहीं नहीं इसकी क्या जरूरत है ..हम आपके लिये एक नया ब्लॉग बना देंगे .. और ये ब्लॉग बना भी दिया…

कल अपनी पोस्ट चढ़ायी  और फिर इन्हें फोन लगाया और जनाब इनको पूरे 35 मिनट झेला..अब तक सारा सीन बदल चुका था ..वे घोषणा कर चुके थे ….

तो भाइ जी हम,हम है कह दिया तो कह दिया,हम पंगेबाज पर ही है और चिट्ठा जगत,ब्लोगवाणी तथा हिंदी ब्लोग पर भी होगे पर नारद पर नही परसो सुबह शायद ..अगर आप मिलना चाहे तो आ जाईयेगा

और फिर हमारी 11 सड़ी हुई कविताओं के बदले उन्होने पूरी की पूरी 12 अच्छी कविताऎं भी टिप्पणी में डाल दी…लीजिये वो भी देखिये….

धड़-धड़-धड़-धड़,
बम बम बम बम,
काहे लडें हम,
मौका देखा,
रणछोड़ चले हम.

आबाद करेंगे हम जहा नया,
ये यहा बरबाद करेंगे.
निपटा लेगे जब ये सब को
सब भस्मासुर को
याद करेंगे,

हर दम लेना तू,
ऐसे ही पंगा हमसे,
जवाब मिलेगे
पूरे दम से.

भाड़ में जाये,
तेरी दुनिया
तेरी उलझन
तेरी पलटन,
हम तो हैं,
भइ मन के राजा
जहा बैठ गये
वही पे मधुबन.

हम तो चले यहा से बच्चे
अब तू है और तेरे चच्चे
गली गली में नाला बहता,
बदबू से चाहे सर फटता,
पर कीड़ों की मौज हुई है,
गूंगा कहता,बहरा सुनता.

आओ राजा, आओ रानी,
सुन लो, सुन लो, नयी कहानी,
एक गली में कुत्ता बोला,
मेरी ब्लोगिंग बडी पुरानी.

धाक धिनक धिन,
ताक तिनक तिन,
इस्को भोकू,उस्को काटू
प्लानिंग मे
कट जाये दिन.

अब तो कर ले,
अपने मन की.
जल्द ही होगा सारा चौपट,
तू तो है ही घोषित सनकी.

लगा रहेगा
जाना जाना,
ऐसे ही बस कसते रहना
हाथ मे लेकर के तू पाना

आग लगाई
भागो ज्ञानी
नारद की बस
यही कहानी

इस जंग से तू,
क्या पायेगा,
खाली टप्पर
रह जायेगा,

बिन सोचे तू
लेता पंगे
फ़िसल पडे
तो हर हर गंगे

पंगेबाज

यानि वो वापस आने का मन बना चुके थे …और अभी अभी सूत्रों से पता चला है कि वो फिर आ रहे हैं …नहीं जी आ गये हैं……

 


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कल आपकी टिप्पणीयों से कुछ तो साहस मिला कि कुछ भी लिखें पर लिखना चाहिये…वैसे मेरा भी मानना यही रहा है कि किसी भी चीज को छोड़ के भागने की प्रवृति ठीक नहीं है ..इसलिये अभी पंगेबाज जी को भी मनाने में लगे हैं कि वो भी वापस आ ही जायें… देखिये मान जायें तो आप तक खबर पहुंचायी जायेगी….

इधर बाल कविताओं का सीजन चल रहा है ..अभय जी ने इब्नबतूता फिर हल्लम हल्लम हौदा कविता चढ़ायी ..और और आज देवाषीश जी भी कविता कर बचपन को याद करने लगे … उसी के देखा देखी कुछ बड़े बच्चों के लिये कविता हमने भी लिखने की सोची … पर कविता तो आती ही नहीं लिखनी ..इसलिये कुछ तो बना ..क्या बना पता नहीं ..आप ही बताइये….

धड़-धड़-धड़-धड़,
बम बम बम बम,
चलो लड़ें हम,
काहे का गम.

आबाद करें ना,
बरबाद करेंगे.
भस्मासुर को
याद करेंगे,

ना लेना तू,
पंगा हमसे,
हम ठनके हैं
पूरे सर से.

भाड़ में जाये,
तेरी उलझन,
हम तो हैं,
थाली के बैगन.

गली गली में नाला बहता,
बदबू से चाहे सर फटता,
पर कीड़ों की मौज हुई है,
ना ये सुनता ना वो सुनता.

आओ राजा, आओ रानी,
सुन लो, सुन लो, नयी कहानी,
एक गली में कुत्ता बोला,
बिल्ली रानी बड़ी सयानी.

धाक धिनक धिन,
ताक तिनक तिन,
चूं, चूं, चूं  में
कट जाये दिन.

कर ले कर ले,
अपने मन की.
चेला चौपट,
गुरु जी सनकी.

लगी रहेगी
आनी जानी,
ले आओ बस
थोड़ा पानी.

आग बुझा के
पानी पीलो,
छोटी जिनगी
पूरी जी लो,

इस जग से तू,
क्या पायेगा,
खाली खप्पर
रह जायेगा,

कैसी लगी ये लाइनें ..बताना जरूर ..मेरे हुजूर !!

 

आजकल हिन्दी ब्लॉगजगत में क्रांति का माहोल है,हाँलाकि कुछ लोगों का मानना है कि चिट्ठे क्रांति नहीं ला सकते…पर फिर भी कोशिश जारी है.कुछ लोग जन्मजात क्रांतिकारी होते है और कुछ लोग किताबें पढ़कर क्रांतिकारी हो जाते हैं.आज आपके सामने हरिशंकर परसाई का एक व्यंग्य प्रस्तुत है.जो एक “क्रांतिकारी की कथा” है. इसमें “चे-ग्वेवारा” का नाम भी आया है तो इन महानुभाव के बारे में थोड़ा बता दूं. अर्जेंटीना में जंन्मे “चे-ग्वेवारा” मार्क्सवादी क्रातिकारी थे.पेशे और पढ़ाई से वो डॉक्टर थे लेकिन उन पर मार्क्स साहित्य का गहरा प्रभाव पढ़ा और वे फीदेल कास्त्रो की क्रातिकारी सेना में सम्मिलित हुए.उन्होने कई पुस्तकें भी लिखी जो मूलत: स्पैनिश में थी पर उनके अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में भी खासे अनुवाद हुए.तो ये तो था चे-ग्वेवारा का परिचय.अब आप व्यंग्य का आनन्द लें.

क्रांतिकारी की कथा : हरिशंकर परसाई

‘क्रांतिकारी’ उसने उपनाम रखा था। खूब पढ़ा-लिखा युवक। स्वस्थ,सुंदर। नौकरी भी अच्छी। विद्रोही। मार्क्स-लेनिन के उद्धरण देता, चे-ग्वेवारा का खास भक्त। कॉफी हाउस में काफी देर तक बैठता। खूब बातें करता। हमेशा क्रांतिकारिता के तनाव में रहता। सब उलट-पुलट देना है। सब बदल देना है। बाल बड़े, दाड़ी करीने से बढ़ाई हुई। विद्रोह की घोषणा करता। कुछ करने का मौका ढूंढ़ता। कहता- “मेरे पिता की पीढ़ी को जल्दी मरना चाहिए। मेरे पिता घोर दकियानूस, जातिवादी, प्रतिक्रियावादी हैं। ठेठ बुर्जुआ। जब वे मरेंगे तब मैं न मुंडन कराऊंगा, न उनका श्राद्ध करूंगा। मैं सब परंपराओं का नाश कर दूंगा। चे-ग्वेवारा जिंदाबाद।”

कोई साथी कहता, “पर तुम्हारे पिता तुम्हें बहुत प्यार करते हैं।”

क्रांतिकारी कहता, “प्यार? हॉं, हर बुर्जुआ क्रांतिकारिता को मारने के लिए प्यार करता है। यह प्यार षडयंत्र है। तुम लोग नहीं समझते। इस समय मेरा बाप किसी ब्राह्मण की तलाश में है जिससे बीस-पच्चीस हजार रुपये लेकर उसकी लड़की से मेरी शादी कर देगा। पर मैं नहीं होने दूंगा। मैं जाति में शादी करूंगा ही नहीं। मैं दूसरी जाति की, किसी नीच जाति की लड़की से शादी करूंगा। मेरा बाप सिर धुनता बैठा रहेगा।”

साथी ने कहा, “अगर तुम्हारा प्यार किसी लड़की से हो जाए और संयोग से वह ब्राह्मण हो तो तुम शादी करोगे न?”

उसने कहा, “हरगिज नहीं। मैं उसे छोड़ दूंगा। कोई क्रांतिकारी अपनी जाति की लड़की से न प्यार करता है, न शादी। मेरा प्यार है एक कायस्थ लड़की से। मैं उससे शादी करूंगा।”

एक दिन उसने कायस्थ लड़की से कोर्ट में शादी कर ली। उसे लेकर अपने शहर आया और दोस्त के घर पर ठहर गया। बड़े शहीदाना मूड में था। कह रहा था, “आई ब्रोक देअर नेक। मेरा बाप इस समय सिर धुन रहा होगा, मां रो रही होगी। मुहल्ले-पड़ोस के लोगों को इकट्ठा करके मेरा बाप कह रहा होगा ‘हमारे लिए लड़का मर चुका’। वह मुझे त्याग देगा। मुझे प्रापर्टी से वंचित कर देगा। आई डोंट केअर। मैं कोई भी बलिदान करने को तैयार हूं। वह घर मेरे लिए दुश्मन का घर हो गया। बट आई विल फाइट टू दी एंड-टू दी एंड।”

वह बरामदे में तना हुआ घूमता। फिर बैठ जाता, कहता, “बस संघर्ष आ ही रहा है।”

उसका एक दोस्त आया। बोला, “तुम्हारे फादर कह रहे थे कि तुम पत्नी को लेकर सीधे घर क्यों नहीं आए। वे तो काफी शांत थे। कह रहे थे, लड़के और बहू को घर ले आओ।”

वह उत्तेजित हो गया, “हूँ, बुर्जुआ हिपोक्रेसी। यह एक षडयंत्र है। वे मुझे घर बुलाकर फिर अपमान करके, हल्ला करके, निकालेंगे। उन्होंने मुझे त्याग दिया है तो मैं क्यों समझौता करूं। मैं दो कमरे किराए पर लेकर रहूंगा।”

दोस्त ने कहा, “पर तुम्हें त्यागा कहां है?”

उसने कहा, “मैं सब जानता हूं- आई विल फाइट।”

दोस्त ने कहा, “जब लड़ाई है ही नहीं तो फाइट क्या करोगे?”

क्रांतिकारी कल्पनाओं में था। हथियार पैने कर रहा था। बारूद सुखा रहा था। क्रांति का निर्णायक क्षण आने वाला है। मैं वीरता से लडूंगा। बलिदान हो जाऊंगा। तीसरे दिन उसका एक खास दोस्त आया। उसने कहा, “तुम्हारे माता-पिता टैक्सी लेकर तुम्हें लेने आ रहे हैं। इतवार को तुम्हारी शादी के उपलक्ष्य में भोज है। यह निमंत्रण-पत्र बांटा जा रहा है।”

क्रांतिकारी ने सर ठोंक लिया। पसीना बहने लगा। पीला हो गया। बोला, “हाय, सब खत्म हो गया। जिंदगी भर की संघर्ष-साधना खत्म हो गयी। नो स्ट्रगल। नो रेवोल्यूशन। मैं हार गया। वे मुझे लेने आ रहे है। मैं लड़ना चाहता था। मेरी क्रांतिकारिता! मेरी क्रांतिकारिता! देवी, तू मेरे बाप से मेरा तिरस्कार करवा। चे-ग्वेवारा! डियर चे!”

उसकी पत्नी चतुर थी। वह दो-तीन दिनों से क्रांतिकारिता देख रही थी और हँस रही थी। उसने कहा, “डियर एक बात कहूँ। तुम क्रांतिकारी नहीं हो।”

उसने पूछा, “नहीं हूँ। फिर क्या हूँ?”

पत्नी ने कहा, “तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो। पर मैं तुम्हें प्यार करती हूँ।”

( कैसी लगी ये रचना ..टिप्पणी के द्वारा बतायें)

 


बहुत हो गया.अब लगता है ज्यादा चुप नहीं बैठा जायेगा.साथी लोग उकसा रहे हैं… भय्या काहे चुप बैठे हो कुछ तो बोले …कोई तो पक्ष लो…कह रहे हैं… चारों ओर हल्ला गुल्ला है और तुम चुपचाप बैठे हो.यह सब सुन कर बचपन की एक घटना याद आ गयी.एक बार बंदरों का झुंड हमारे मोहल्ले में आया.जाड़ों के दिन थे.हमारे जैसा एक मोटा बंदर धूप में आराम से लेटा धूप सेक रहा था.सारे बंदर कभी इस डाल तो कभी उस डाल मस्ती कर रहे थे.तभी उन में आपस में ना मालूम किस बात पर झगड़ा हुआ. सारे बंदर एक दूसरे पर खों खों करके टूट पड़े..लगता था सब एक दूसरे को गाली दे रहे हों…मोटे बंदर को कोई फरक नहीं पड़ा वो अभी भी धूप सेकने में मस्त था.सारे बंदर उसे बीच बीच में छेड़ के चले जाते.शायद उसे अपने गुट में शामिल करने की कोशिश कर रहे थे.पर उसे कोई फरक नहीं पड़ा वो वैसे ही सोया रहा… थकहार के सारे बंदर इधर उधर हो गये…वो तो बंदर थे उन्होने उस मोटे बंदर को बख्स दिया … यदि वो इंसान होते तो !!… शायद पूरी कोशिश करते की वो उनके गुट में शामिल हो जाये.ना शामिल होने पर गाली भी देते …उसे हिन्दू विरोधी या हिन्दू हितैषी की संज्ञा भी दे डालते पर थैंक गॉड !! वो तो महज बंदर थे …इंसान नहीं..

आजकल लोग चिंतित हैं.लोगों की चिंता गालियों के समाजशास्त्र को ले के भी है.. गालियों के राजनीतिशास्त्र पर कोई नहीं बोलता …समाजशास्त्र की चिंता की जा रही है….कोई कह रहा है शीतल हवा आने को है ..कोई कहता है लू (अंग्रेजी वाला)की बदबू है या लू (हिन्दी वाली) की गर्मी है … तुमने तो सब कुछ सड़ा ही दिया ..इतना ना सड़ाओ भय्या ..ये रिलांयस फ्रैश का जमाना है..कुछ फ्रैश फ्रैश बातें करो.. बाल्टियों पानी बहाया जा चुका है ..सारे नारे अपनाये जा चुके हैं.. लोग गुस्से में हैं.. वैसे ही ना लाइट का भरोसा है ना पानी का …जब साला कोई इम्पोर्टेंट मेल लिखनी होती है या पोस्ट तो बिजली बिना बताये चली जाती है और लोग हमें गलत समझने लगते हैं .. हम यह ही सोचते रह जाते है कि किसकी तानाशाही है..? किसे गरियायें….? तानाशाही नहीं चलेगी ..? ठीक है भाई नहीं चलेगी .. अब क्या करें ..? आत्महत्या कर लें .. ? नौकरी से इस्तीफा दे दें ? घर से बाहर निकलना बंद कर दें और कहें आपातकाल जैसी स्थिति है ? क्या करें ? पुरानी कविताऎं गुनगुनाने लगें ? गड़े मुर्दे उखाड़ने लगें ? क्या करें ?? पता नहीं आप भी ना .. बेचारे जीव को कितना सताते हैं.. क्या कहा ? बकर बकर ना करें ….तो क्या करें ? क्या ?? सिर्फ मेल कर दें ?? कर देंगे भाई मेल भी कर देंगें ..आजकल हर कोई सिर्फ एक मेल की दूरी पर ही तो है फिर भी साला आपस में मेल नहीं..पहले सालों बाद मेले में ही मिलते थे फिर भी मेलभाव था …आजकल मेल का कोई भाव नहीं रहा.. पता नहीं क्या हो गया है..

आप भी सोच रहे होंगे कि मैं इतना अनर्गल प्रलाप क्यों कर रहा हूँ .. एकच्यूअली आजकल भौत टेनसन है यार ..हर कोई गुमनामी से उठकर लाइम लाइट में आ जा रहा है ..अब हमारे राष्ट्रपति के कैंडिडेट्स को ही देख लें… कल हम को ले के भी खींचातानी होने लगी कि आप भी अपना पर्चा दाखिल कर ही दो… हमने पहिले तो सोचा कि क्या करें लेकिन फिर साफ मना कर दिया ..ना जी ना हमें नहीं बनना राष्ट्रपति …एक पत्नी के पति तो बन नहीं पाये ठीक से.. क्या खाक राष्ट्रपति बनेंगे… और फिर केवल रबर स्टैम्प बनके क्या फायदा ..कोई बम-गोला बनना होता तो ठीक भी था.. हिन्दी ब्लॉगजगत के ही काम आ जाते .. और फिर राष्ट्रपति बन के ढेर सारे शास्त्रीय संगीत की महफिलों में बैठना पड़ेगा ..ना जाने किस किस की जुगलबंदी सुननी पड़ेगी .. हम तो तैयार नहीं हैं.. तो हमने तो अपना निर्णय सुना दिया .. क्या फालतू के राष्ट्रपति बनने के चक्कर में एक हफ्ता ब्लॉग नहीं लिख पाये ..यदि बन ही जाते तो … ?? ना जी ना हम तो अपने ब्लॉग में ही मस्त हैं.. कल से लिखते हैं फिर कुछ … राष्ट्रपति पद के बाँकी सारे उम्मीदवारों को बैस्ट ऑफ लक जी …

 

कल प्रमोद दद्दा पूछे कि “आप लिंक्ड है कि नहीं” हम सोचे ई का हो गया ….दद्दा सकाले सकाले का पूछ रहे हैं …वो भी सार्वजनिक रूप से . अब हम कैसे बतायें कि हम लिंक्ड है कि नहीं..वो भी सबके सामने…..घर में एक अदद बीबी भी है ना…. फिर जब पोस्ट में पढ़े तो उ तो एक नयी ही बात बताये कि लिंक करने से क्या क्या होता है… तो हम भी सार्वजनिक रूप से लोक लाज की फिकर किये बिना कह दिये … अरे इ बड़े काम का बात बताये हैं… हम को तो इस लिकिंत कलंकित के बारे में पता ही नहीं था..वरना पहले ही तकादा करने आये होते ..कि हमरा लिंक काहे नहीं दिये ..चलिये तब ना सही अब कर देते हैं..लगा दीजिये ना जी एक ठो हमार भी लिंक …कर दीजिये ना हमको भी लिंकित ..हमको बहूत अच्छा लगेगा जी …वैसे मालुम है कि आप लिंकित तो ना ही करेंगे पर तकादा करने में क्या हरज …वैसे भी हम लेडी नहीं लेडा हूँ…” हम सोचे कि कहां हम भरभण्‍ड के चक्‍कर में पड़ रहा हूं ..लिंकित तो ना ही होंगे …लेकिन सांझ को देखा तो हम भी लिंकित थे… तब रात को खूब सूतल…. और सपने देखने लगे और बड़बड़ाने लगे…

“लिंक न होने से लिंकन की स्थिति बेहतर है”.हमरा सौभाग्य है कि हम “अ”,”अ”,”अ” के एक “अ” से तो लिंक हो ही गये.. आपको शायद मालूम हो हिन्दी चिट्ठाजगत के अमर,अकबर और अन्थोनी (एंथोनी इंगलिश में होता है) के बारे में …क्या कहा नहीं मालूम !!..ये लो जी ..इतना भी नहीं मालूम. ये तीन है “अ” हैं अभय ,अजदक और अनामदास.अक्सर साथ साथ ही पाये जाते हैं….हाँलांकि वो कहते हैं “लेखक हमेशा अकेला होता है, संघी नहीं” ..लेकिन जो दिखता है हम तो वही बोले… वैसे इनके साथ छोटी लाईन से सफर करने वाले एक “अ” और हैं…कोई सिदो हैमबर्गर हैम्ब्रम टाईप .. लेकिन वो अभी ट्रेनिंग ले रहे हैं…किसी छोटे शहर से आये हैं ..इसलिये नींद में बड़बड़ाकर उपन्यास लिखने की प्रैक्टिस कर रहे हैं… इस बात से इनकी पत्नी बहुत परेशान हैं… आप पूछेंगे वो कैसे ..वो होता क्या है ..ये नींद में बड़बड़ाते हैं और उनकी पत्नी हाथ में कॉपी,पैन लेकर बैठी रहती हैं कि जैसे ही ये बोलें वो नोट कर लें…. इनको किसी ने बता दिया कि ब्लॉग एक डॉट कॉम होता है…तब से हर नंगे और भूखे को खोज रहे हैं कि भला ये कौन सी नयी कौम आ गयी..जिस दिन इनको वो कौम मिल जायेगी उस दिन ये भी छोटी लाईन से बड़ी लाईन में आकर लाईन मारने लगेंगे…
pyar kee pahalee awasthaa
अब हम अपने लिंकन के बारे में बता रहे थे.. हमारे लिंकन की तीन अवस्था हैं जो हर लिंक्ड के जीवन में आती ही हैं .. जब कोई नया नया लिंक्ड होके प्यार की पहली अवस्था को प्राप्त होता है तो वो स्थिति सबसे सुखद और बेहतर होती है…. आपको अपने लिंकित के प्रति अगाध श्रद्धा होती है… उसकी काँव काँव भी कोयल की कूक लगती है… आप उसके कांटो को भी पुराण की भाँति बांचते हैं.. दुनिया में उसके सिवा कोई नहीं होता ..सिर्फ आप और आपका लिंकित … आपको “लिंकित” होकर “कलंकित” होने का कोई डर नहीं होता .. आप हवा में उड़ने लगते हैं ..आपके पास सारी दुनिया से लड़ने की ताकत आ जाती है…आप और आपका लिंकित अक्सर ये सोचते हैं ..कि काश ऎसे ही जिन्दगी की शाम हो जाये… कल रात तक हमारी भी ऎसी ही स्थिति थी ..जब हम लिंकन की पहली अवस्था में थे …चित्र एक देखें … सिर्फ हम और हमारा लिंकित …

Pyar kee doosaree awasthaa

फिर जब आप हवा से जमीन की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं …तो आपको जिन्दगी की कुछ कुछ हकीकत मालूम होती जाती है….समझ में आता है कि “और भी लिंक हैं जमाने में इसके सिवा” .. तो फिर “पुराण” “कांटे” में परिवर्तित हो जाता है ..पूछ्ने पर पता चलता है अब इन्हें “ज्ञानदत का ज्ञान” प्राप्त हो रहा है ..बुरा हो इस “ज्ञान” का जो हमारे बीच में आ गया . चित्र 2 देखें … इसी “ज्ञान” के कारण सारा झमेला हो गया.. लेकिन फिर भी मन में संतोष की चलो कोई बात नहीं चला लेंगे .थोड़ा बहुत टाइम तो मिलेगा ही ना लिंकित का….चला लेंगे जी वैसे भी ज्ञान प्राप्त होना अच्छी बात है… लोग तो अपनी बीबी बच्चे कि छोड़ कर ज्ञान की तलाश करने भाग जाते हैं ..इन्हें तो घर बैठे ही ज्ञान प्राप्त हो गया….

Pyar kee teesari awasthaa

ये दुनिया का नियम है कि यहां परिवर्तन के अलावा कुछ भी स्थायी नहीं ..परिवर्तन ही पृकृति का नियम है… यही प्यार की तीसरी अवस्था होती है… जब आप पूरी तरह जमीन में आ चुके होते हो तब आपको पता लगता है असली जिन्दगी का स्वाद ..आप नून तेल लकड़ी के चक्कर में पड़ जाते हैं ..आप का लिंकित दुनिया के झमेलों के बीच कहीं छूट सा जाता है… चित्र 3 देखें…यही है असल जिन्दगी जहां आप जीवन की धमाचौकड़ी में केवल एक लिंकन से काम नहीं चला सकते… आपको कई जगह लिंक बनाने होते है.. “बिना लिंक सब सून” वाली अवस्था है…. जितने ज्यादा लिंक उतना ज्यादा नाम और दाम … अब ये बात हमारे भी समझ में आ गयी इसलिये हमें कोई ऎतराज नहीं ..हम तो खुश हैं कि हम लिंकित हैं……

** एक चीज और देखियेगा …पहले अंतरंग तीन थे अब सिर्फ दो ..ये क्या माजरा है…ये तो भाई अजदक ही जानें…

 

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आज बात करते हैं हिन्दी के कुछ चिट्ठाकारों के साथ हुए मेरे अनुभवों की ..

कल लंच के समय बाहर निकला ही थी कि हिन्दी के एक चिट्ठाकार मिल गये.टीका-वीका लगाये थे और इतनी गर्मी में भी फ्रैश फ्रैश लग रहे थे … रिलांयस फ्रैश की तरह….लगता था जैसे अभी अभी हिल स्टेशन घूम के आये हों. कोई व्यक्ति जब परिवार के साथ किसी धाम की यात्रा करके आता है …विशेषकर बद्रीनाथ,केदारनाथ की …तो कुछ दिनों बड़ा ही आध्यात्मिक सा बना घूमता रहता है …वैसे ही वह भी घूम रहे थे.हमें देख वैसे तो गाली देने का मन कर रहा होगा (प्रोफेशनल राइवैलरी जनाब!! ) लेकिन अच्छी अच्छी बातें करने लगे.अरे आप तो कभी मिलते ही नहीं… मिलिये ना कभी कहीं….हमने कहा ….अरे अभी नहीं कुछ दिनों रुक जाइये… थोड़ा नाम वाम हो जाने दीजिये … फिर आयेंगे ताकि ज्यादा नहीं तो कुछ गोपियां तो हमारा भी इंतजार करते मिलें…

अरे नहीं जी आपका नाम तो हो ही गया ….कल ही हम तीन चार हिन्दी चिट्ठाकार मिले थे तो आपकी ही चर्चा कर रहे थे.

हाँ चर्चा तो कर ही रहे होंगे…. पीठ पीछे गाली देने का अवसर कौन जाने देना चाहेगा….

अरे नहीं जी वहां तो ये चर्चा हो रही थी कि आप कितना अच्छा लिखते हैं.

हम समझ गये कि ये पक्का बद्रीनाथ,केदारनाथ का असर है वरना हम यदि चर्चा में ही होते तो क्या टाइम्स मैगजीन में जगह ना पाते.अरे चिट्ठाजगत की टाइम्स मैगजीन फुरसतिया टाइम्स. लेकिन वो चढ़ाते रहे और हम चढ़ते रहे चने के झाड़ पर.

उनसे तो किसी तरह पीछा छुड़ाया लेकिन फिर हम सोचने लगे “चने के झाड़ पर चढ़ने-चढ़ाने” के बारे में.इसकी चर्चा बाद में ….पहले आपको एक और घटना के बारे में बता दें.

पिछ्ले दिनो जब गधों और घोड़ों का बोलबाला था तब एक दिन कुछ घोड़े मिल गये.घोड़े वैसे ही गधों से दोस्ती करना पसंद नहीं करते.. इसीलिये शायद वो हम से नहीं बोले लेकिन आपस में कुछ गहन वार्तालाप सा करते प्रतीत हुए . हम ध्यान लगाकर उनका वार्तालाप सुनने की कोशिश करने लगे.

अरे हमें सरकार से इस बाबत बात करनी चाहिये…

हाँ हाँ ..क्यों नहीं ये तो हमारी इंटेल्क्चुअल प्रोपर्टी है…

हमारे दिमाग में बात समझ में नहीं आयी..दो विद्वानों की बातचीत के बीच में घुसने वाले मूर्ख को वैसे भी कोई बात समझ नहीं आती.. तो हमने पूछ ही लिया कि क्या बात है…

पहले तो एक युवा घोड़े ने हमें अपनी आक्रामक नजरों से घूरा …जैसे कोई तथाकथित धर्मरक्षक किसी नग्न पेंटिंग बनाने वाले चन्द्रमोहन को घूर रहा हो… फिर जब उसने परख लिया कि इस बंदे में भी मनमोहन सिंह की तरह कोई दम नहीं है तो वो बोला…अरे हमें एम एफ हुसैन और बहुत सी कंपनियों के खिलाफ आन्दोलन छेड़ना है …क्यों भाई .. अरे हुसैन साहब हम घोड़ों पर पेंटिग बनाते हैं और हमें रॉंयल्टी भी नहीं देते .. कनाडा वाले हमारे ऊपर पूरी की पूरी पोस्ट लिखते हैं ..खूब टिप्पणी भी पाते हैं पर हमें कुछ नहीं देते.. खुद कॉकटेल पी-पीकर मुटा रहे हैं … हिन्दुस्तान में जितनी भी शक्तिवर्धक दवायें बनती हैं उन में भी हमारी फोटो होती है .. लेकिन कोई हमें रॉयल्टी नहीं देता बल्कि हमें जेल डाला जा रहा है.. और तो और सारी मशीनों की रेटिंग भी घोड़ा-पावर यानि हौर्श-पावर में होती है…. उसके लिये भी हमें कुछ नहीं मिलता … उनकी बात में दम तो था….इसलिये हम चुप हो गये … लेकिन उन्होने अपना डिसकसन जारी रखा …

अरे यार आजकल तो मनुष्य अपनी बातों में भी गधो के साथ साथ हमें शामिल कर रहा है….

क्या बोलते हो बॉस!! एक छुटभैये “तोड़ देंगे फोड़ देंगे” नेता-टाइप घोड़े ने कहा.

हाँ !! कल दो तीन मनुष्य बात कर रहे थे …कंप्यूटर इन्ड्स्ट्री में देखो ना सारे गधे-घोड़े घुसे जा रहे हैं. आधे से ज्यादा तो इसमें गधे हैं और जो घोड़े भी थे उनसे भी गधों की तरह काम लिया जा रहा है…

तो क्या हम गधों के साथ मिलकर कोई मोर्चा खोलें… आजकल वैसे भी कई गधे विभिन्न मुद्दों पर कई शहरों में अपना मोर्चा खोल रहे हैं….

अरे वो ” मोर्चा अगेंस्ट खर्चा “वाले भी गधे ही हैं क्या … एक युवा उत्साही घोड़े ने पूछा…

चुप रहो यार सीरियस बात में भी बिना कुछ समझे बूझे कूद पड़ते हो यार ..हिन्दी चिट्ठाकार की तरह….

अब बहुत ज्यादा गालियां हम से सहन नहीं हुई ….वो लोग अपनी बात कर रहे थे पर हम वहां से सरक लिये …..

अब बतायें आपको चने के झाड़ वाली बात. चने के झाड़ की बात भी घोड़ों से ही सबंधित है. “चने के झाड़ पर चढ़ाना” एक मुहावरा है जो तब प्रयोग में लाया जात जब किसी भी व्यक्ति को ये झूठा अहसास दिलाना होता है कि वो श्रेष्ठ है. इसलिये उसे चने के झाड़ पर चढ़ाया जाता है कि बेटा तू अभी कुछ भी नहीं कर सकता चल पहले इस झाड़ पर चढ़ कुछ चने खा..थोड़ी ताकत वाकत बना घोड़े जैसी फिर तू कुछ कर पायेगा.अभी तो तू फिसड्डी है , बेकार है तुझे चने की सख्त जरूरत है.. इसीलिये हमारे वो चिट्ठाकार हमें कल चने की झाड़ पर चढ़ा रहे थे.

तो आपको बात समझ में आ ही गयी होगी ..

कल महिला सशक्तीकरण के विषय में हमारा बहुत ज्ञान बढ़ा जब कहा गया ” महिला सशक्तीकरण के चक्कर में पड़ने वाले बहुत जल्दी किसी भी किस्म की शक्ति से वंचित हो जाते हैं।” शायद इसीलिये बेचारे मनमोहन सोनिया जी के सशक्तीकरण के चक्कर में शक्ति से वंचित हो गये …

एक और चिट्ठाकर टिप्पणीओफोबिया से ग्रस्त हैं और कह रहे हैं “कोई बचाओ मुझे इस टिप्पणीओफोबिया से” हम तो उनको ये ज्ञान दे आये

आओ आओ ना घबराओ..
हाथ खोल के हाथ दिखाओ
टिपियासा के मारे हम भी
थोड़ा आके तुम टिपियाओ

देखना है कि वो आज आते हैं कि

बस एक बात और …. कल शाम एक चिट्ठाकार ने कुछ अच्छे अच्छे गाने सुनवाये …गाने बहुत अच्छे थे ..मैलोडियस ..हमने भी तारीफ कर दी ..कि हां जी अच्छा लगा गाने सुनकर ..पर ये क्या वो जेब से एक छोटी सी डायरी निकाल लिये ..बोले यहां लिख कर दीजिये ..हमने कहा क्यों? बोले …अरे सबको दिखायेंगे ना कि आपको अच्छा लगा..वो भी टिपियासा से ग्रस्त एक चिट्ठाकार थे….

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