Jul 162008
 

कका बालकनी में बैठे हुए सामने पार्क में खेलते हुए बच्चों को देख रहे थे.साथ ही पातड़ा (पंचाग) भी देख रहे थे. मैने उनसे पूछा.

"कका.. पंचाग में क्या देख रहे हो..? "

"अरे देख रहा था हरेला कब है. भोल (कल) हरेला है."

"ओ..कल है! कका बताइये कल क्या क्या करना है. "

"अरे यहां शहर में क्या हुआ. पहाड़ में होते तो कल बोया हुआ हरेला काटते,सर में हरेला लगाते, डिकारे बनाते, मातृका पट्टा पूजते. यहां ये सब जो क्या होने वाला ठहरा. बस शगुन का बड़ा बना देंगें. अपनी ईजा को बोल कि कल बड़ा बनाने के लिये रात से मास (उड़द की दाल) भिगो देना."

कका की बातों से थोड़ी निराशा झलक रही थी. मैने उनसे पूछा.

harela

"कका बताओ ना… ये हरेला क्या होता और पहाड़ में हरेला कैसे मनाते है. "

कका तो जैसे तैयार ही बैठे थे.

"अब क्या बताऊं भुला.पहाड़ की बात ही कुछ और हुई. हरेला साल में तीन बार मनाया जाने वाला हुआ. एक तो चैत (चैत्र) के महीने में,दूसरा सौण (श्रावण) में और तीसरा असोज (आस्विन) में. जिस दिन हरेला होता है उसके नौ-दस दिन पहले पांच या सात प्रकार के बीजों को एक टोकरी,थाली या पुराने मिठाई के डब्बे में मिटटी डाल के बो दिया जाता है."

"कका ये कौन कौन से बीज होते हैं."

"अरे घरपन जो बीज मिल गये सबको बो दिया जाने वाला हुआ. जैसे गेहूं, धान, जौ, भट्ट,जुनाव (मक्का),मादिरा, राई, गहत, मास (उड़द),चना, सरसों. जो हाथ पड़ गया.इसका कोई खास विधान नहीं हुआ. लेकिन यह विषम संख्या पांच या सात होने चाहिये. फिर इन सबके ऊपर मिटटी डाल के उस टोकरी या थाली को घर में ही द्याप्ताथान (मन्दिर) में रख दिया जाता है. हर दिन पूजा करते समय थोड़ा थोड़ा पानी छिड़का जाता है. तीन-चार दिन के बाद उन बीजो में से अंकुर निकल जाते है.इन्हे ही हरयाव (हरेला) कहा जाता है.नौवे या दसवे दिन इनको काटा जाता है.जैसे चैत वाला हरेला चैत के पहले दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है. सौण का हरेला सौण लगने से नौ दिन पहले अषाड़ में बोया जाता है और दस दिन बाद काटा  जाता है. असोज (आश्विन) वाला हरेला नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरे  के दिन काटा जाता है."

"ओ…लेकिन हरेला मनाया क्यों जाता है कका."

"भुला हमारी लोक-संस्कृति में बहुत सी चीजें.. वो क्या कहते हैं… साइंटिफिक तरीके से बनायी गयी ठहरी."

"वाह कका आप तो अंग्रेजी भी बोलने लगे."

"तीन हरेले तीन मौसमों के आने की सूचना देने वाले हुई. चैत का हरेला मतलब गरमी आ गयी,सौण का हरेला मतलब बरसा का मौसम आ गया और असोज का हरेला मतलब …"

"ठंड का मौसम शुरु हो गया."

"बिल्कुल सही."

"लेकिन आप कह रहे थे ना आप लोग डिकारे बनाते थे. वह क्या होता है कका."

"बताता हूँ चेला वह भी बताता हूँ. पहले अपनी ईजा को बोल ना एक गिलास चहा बणै दे."

"ठीक है."… मैंने माँ को चाय बनाने को कहा और आकर फिर कका के पास बैठ गया.

"सौण (श्रावण) महीने के हरेले का विशेष महत्व होने वाला हुआ. यह महीना तो शंकर जी का महीना हुआ. इसलिये इस हरेले को कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है.तो सौण वाले हरेले में मिट्टी से शिव ज्यू का पूरा परिवार बनाया जाने वाला हुआ और फिर उसकी पूजा की जाने वाली हुई."

"मिट्टी से! ..मिट्टी से कैसे."

"अरे डिकारे का मतलब ही हुआ प्राकृतिक चीजों का प्रयोग कर मूर्तियाँ बनाना…. तो डिकारे ऐसी ही चीजों के बनाये जाने वाले ठहरे.बचपन में हम लोग लाल मिट्टी लेकर आने वाले ठहरे और फिर महीन कर उसमें रुई मिला कर सानने वाले हुए.उसे थोड़ी देर छोड़ देने वाले हुई. फिर उसी मिट्टी से शिव ज्यू, पार्वती ज्यू और गणेश बनने वाले हुए.बांकी तो लोग अपनी मर्जी से देवी-देवता बना लेने वाले हुए.कुछ लोग केले के तने और पत्तों से भी मूर्ति बनाने वाले हुए. डिकारे बनाकर उनको हलकी धूप या छाया में सुखाया जाने वाला हुआ ताकि उसके चटकने का डर ना हो.सूखने के बाद चावल के विश्वार (घोल) से हल्के सफेद रंग का लेप करने वाले हुए.कई बार गोंद मिले रंग भी लगाये जाने वाले हुए. पहले से तो रंग भी घर में बन जाने वाले हुए.ये रंग किलमोड़े के फूल, अखरोट व पांगर के छिलकों से बनने वाले हुए.काला रंग बनाने के लिये कोयला पीस देने वाले हुए.आजकल तो बाजार में मिलने वाले सिन्थेटिक रंग ही प्रयोग में लाये जाते हैं.फिर उन रंगों से देवी-देवताओं के आंख,नाक,मुँह बनाने वाले हुए."

"तो फिर डिकारों में नाक,मुँह बनाने के लिये कोई ब्रश वगैरह यूज करते हैं क्या." ..मुझे जिज्ञासा हुई.

"बुरुश कहां मिलने वाला हुआ.हम या तो लकड़ी की तीलियों से रंग करने वाले हुए या माचिस की तीली में रुई लगाकर उससे रंग भरने वाले हुए."

"और हरेले के दिन क्या क्या होता है ?"

"हरेले वाले दिन घर में पूरी,पकवान जैसे पुआ,बड़ा बनाये जाते हैं.हरेला काटने के बाद इसमे अक्षत-चंदन डालकर भगवान को लगाया जाता है.मंत्रोच्चार किया जाता है रोग शोक निवारणार्थ प्राण रक्षक वनस्पते, इदा गच्छ नमस्तेस्तु हर देव नमोस्तुते. फिर घर के सभी सदस्यों को हरेला लगाया जाता है. हरेला लगाने के लिये सर व कान पर हरेले के तिनके रखे जाते है.एक दूसरे को "जी रया, जागि रया यो दिन यो मास भेटने रैया" कह के आशीर्वाद दिया जाता है. छोटे बच्चो को हरेला पैर से ले जाकर सर तक लगाया जाता है."

"हाँ मुझे याद है जब में छोटा था तो आमा ऐसे ही लगाती थी और साथ में कुछ मंत्र जैसा भी कहती थी."

"हाँ सबके दीर्घायू होने की कामना की जाती है और कहा जाता है."

लाग हरेला, लाग बग्वाई,
जी रए, जाग रए.
स्याव जस बुद्धि हैजो, सूर्ज जस तरान हैजो 
आकाश बराबर उच्च है जै, धरती बराबर चकाव है जै
दूब जस फलिये
हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पानी छन तक
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये

"इसका मतलब क्या हुआ कका."

इसका मतलब हुआ कि "तुझे यह हरेला मिले,जीते रहो,जागरूक रहो,तुम्हारी सियार के समान तेज बुद्धि हो,सूर्य के समान त्राण हो,तुम आकाश के समान ऊंचाइयां छुओ, पृथ्वी के समान धैर्ययुक्त बनो, दूर्वा के तृणों के समान पनपो,जब तक हिमालय में हिम रहे गंगा नदी में पानी रहे तब तक जियो,इतने दीर्घायु हो कि तुम्हें भात भी पीस कर खाना पड़े (दांत टूट जाने पार) और शौच जाने के लिए भी लाठी का उपयोग करना पड़े."

"वाह यह तो बहुत अच्छी कामना है."

"और हरेले के पीछे एक मतलब और भी है कि हम प्रकृति का सम्मान करें,आदर करें.कुछ इलाकों में हरेले के दिन नये पेड़ लगाये जाते हैं.हरेला वैसे तो कुमाऊं का मुख्य त्यौहार है लेकिन यह गढ़वाल में भी मनाया जाता है,वहां इसे हरियाली पर्व कहा जाता है."

"मुझे याद है बेटा… बचपन में तो हरेले के दिन गोठ के जानवरों को भी हम हरेला लगाने वाले हुए.अपने नाते-रिश्तेदारों को लिफाफे में सूखा पिठ्या,अक्षत और हरेले के तिनड़े (तिनके) भेजने वाले हुए.साथ में लिखने वाले हुए "आज हरेला भेज रहे हैं सिरोधार्य करना".चिट्ठी मिलने पर हरेला सिर पर रखने वाले भी हुए.हरेले के दिन कान में हरेला लगा कर बढ़े-बूढ़ों का आशीर्वाद लेकर स्कूल जाने वाले हुए."

तब तक चाय आ गयी.कका चाय लेकर पीने लगे और पुरानी यादों में खो गये.मैं भी कका को उन यादों के साथ छोड़कर चल दिया.मुझे हरेले के बारे में कई नई बातें पता चल गयीं थी. 

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आप सभी को हरेले की शुभकामनाऐं.

May 232008
 

डार द्रुम पलना,बिछौना नवपल्लन के
सुमन झँगूला सौहे तन छवि भारी दें
मदन महीपजू को बालक बसंत
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दे.

- कविवर देव

पिछ्ले अंक में हमने होली में शास्त्रीय होली की बात की थी आज उसे ही आगे बढ़ाते हैं. कुछ लोग मानते हैं पर्वतीय क्षेत्र में और विशेषकर कुमाऊं में होली की शुरुआत बसंत पंचमी से होती है लेकिन बैठकी होली की शुरुआत इससे भी काफी पहले हो जाती है. पौष माह (जिसे पहाड़ में पूस मास कहा जाता है) के पहले रविवार से बैठी होली प्रारम्भ हो जाती है.लेकिन इस होली का स्वरूप और इसके कथ्य का स्वरूप बदलते रहता है. बसंत पंचमी तक कथ्य आध्यात्मिक रहता है, शिवरात्रि तक आते आते यह अर्ध-श्रंगारिक हो जाता है,शिवरात्रि की बाद पूर्ण श्रंगारिक होलियां गायी जाती हैं. तो बैठकी होली में भक्ति, छेड़-छाड़,वैराग्य,विरह, हंसी-ठिठोली, कृष्ण-गोपी प्रेम, कृष्ण की रास लीला, प्रेमी-प्रेमिका की रार तकरार, पति पत्नी का विरह, संयोग, देवर-भाभी की छेड़-छाड़ सभी तरह के रसों का अनोखा मिश्रण है.

बैठकी होली पर्वतीय अंचल की संस्कृति में रची-बसी होने के बावजूद ‘न्योली’ जैसे पारंपरिक लोकगीतों से भिन्न है. सबसे खास बात इस होली की है कि इसे कुमाऊंनी में नहीं गाया जाता. इसकी भाषा ब्रज की बोली है या फिर मिलीजुली है जिसमें अवध का प्रभाव भी स्पष्ट दिखता है. सभी बदिंशें राग-रागिनियों में गाई जाती हैं. यानी यह शुद्ध शास्त्रीय गायन है लेकिन यह शास्त्रीय गायन से कुछ मामलों में भिन्न भी है.यह शास्त्रीय गायन की तरह एकल गायन नहीं है और ना ही इसे सामूहिक गायन की श्रेणी में रखा जा सकता है.होली में भाग लेने वालों को होलियार कहा जाता है. मुख्य होलयार (जो अपनी अपनी बारी के हिसाब से बदल सकते हैं) गीत का मुखड़ा गाता है और बांकी लोग जो श्रोता भी है और होलियार भी वह बीच बीच में साथ देते हैं जिसे यहां ‘भाग लगाना’ कहते हैं.इस मामले में बैठक़ी होली महिलाओं की होली से अलग है जहाँ महिलाऐं समवेत स्वरों में होली गाती हैं.बैठकी होली में गीत घर की बैठक में राग रागनियों के साथ हारमोनियम और तबले पर गाए जाते हैं. इन गीतों में मीराबाई से लेकर नज़ीर और बहादुर शाह ज़फ़र की रचनाएँ सुनने को मिलती हैं.होली में जब रंग छाने लगता है तो बारी बारी से हर कोई छोड़ी गई तान उठाता है.

बैठक होली में श्रंगार है,लेकिन अश्लीलता नहीं है,भोंडापन नहीं है.प्रसिद्ध साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी ने कहीं कहा था ‘‘होली जैसे धमाल भरे त्यौहार को ‘बैठक होली’ गरिमा प्रदान करती है.’’

इसमें मूलत: पुरुष भाग लेते हैं लेकिन आजकल महिलायें भी इसमें शामिल होती हैं. यह होली रात में शुरु होती है और अक्सर सुबह दो-तीन बजे तक चलती रहती है.होली का राग धमार से आह्वान कर पहली होली राग श्याम कल्याण में गाई जाती है. समापन राग भैरवी पर होता है. बीच में समयानुसार अलग-अलग रागों में होलियां गाई जाती हैं. सभी तरह के राग और ताल इन होलियों में प्रयोग किये जाते हैं. जैसे राग काफी, जंगला, खम्माज, साहना,जैजैवंती, झिंझोटी, भैरवी में क्रमश: जैसे जैसे थकान  बढ़ती है, गाये जाते हैं. भीम पलासी, कलावती, हमीर राग भी चलता है.दादरा,कहरवा ताल सभी में होलियां गायी जाती हैं.होली को लोकप्रिय बनाने के भी प्रयास हुए.इसे लोकप्रिय बनाने के लिए जानकारों ने होली की धमार और चांचर ताल में परिवर्तन किया. सो, 14 मात्रा की धमार और चांचर तालें 16 मात्रा की हो गईं. रागों के अंग या चलन में भी थोड़ा-सा परिवर्तन किया गया. इससे होली गायन की एक नई शैली विकसित हुई और वह सहज आम जन की हो गई.

यहाँ आपको अलग अलग रंग की होली देखने को मिलती है. जैसे

” ये कैसी होरी खिलाई श्याम तुम बड़े हरजाई “

” जगाय दीन्हो रे मोहे निंदिया में आके “

” मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे “

” साकी लिये सागरे मुश्क बू है.

गुलिस्तां में जाकर हरेक गुल को देखा,

न तेरी सी रंगत न तेरी सी बू है”

और नजीर की होली तो खैर गायी ही जाती है.

“जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीशए*  जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
गुलज़ार*  खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की। “

- नजीर अकबराबादी

* शीशए : सागर / * गुलजार : बाग

गंगोलीहाट, लोहाघाट, चंपावत, पिथौरागढ़ , अल्मोड़ा, नैनीताल अपनी शास्त्रीय होलियों के लिये प्रसिद्ध हैं. लोहाघाट अपनी खड़ी होलियों के लिये भी प्रसिद्ध है.

बैठकी होली के कुछ गायकों की बात करें तो “चंचल प्रसाद जी” अभी भी होली गायक के रूप में विख्यात है. दिल्ली और उत्तरांचल के कद्रदानों में होली गायन के लिए खासे लोकप्रिय चंचल प्रसाद अपनी वंश परंपरा में तीसरी पीढ़ी के गायक हैं. कहते हैं, उनके दादा उस्ताद कालिया को नेपाल की राजशाही का वरदहस्त प्राप्त था, तो पिता राम गुलाम रामपुर के सहसवान घराने के पारंगत गायक और सारंगी वादक थे.कहा जाता है कि  होली की बैठकों में जान डालने वाले “गुलाम उस्ताद की” आवाज और अंगुली दोनों में जादू था. उनके बाद यहां किसी को ‘उस्ताद’ नहीं कहा गया.इन सबके अलावा जो नाम होली गायन से जोड़े जाते हैं उनमें रामप्यारी, अमानत खां, शिवलाल वर्मा, कांती लला, मोहन रईस, तारा प्रसाद पांडे, नारायण दत्त जोशी जैसे कलाकारों को ‘बैठक होली’ के दिग्गजों के रूप में याद किया जाता है.

अल्मोड़ा में ही एक प्रमुख क्लब है “हुक्का क्लब”. 1907 में स्थापित यह क्लब सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है.यह क्लब हर साल कुमाऊं की प्रसिद्ध रामलीला भी करवाता है. यहां नियमित रूप से होली की बैठकें आयोजित होती रही हैं. पिछले दशक से यह क्लब हर वर्ष अल्मोड़ा में ‘होलिकोत्सव’ का आयोजन कर रहा है, जिसमें उत्तरांचल के अलावा देश के कई भागों जैसे मथुरा, वृंदावन, जम्मू, कोलकाता इत्यादि की टीमें भी भाग लेती हैं.

अल्मोड़ा की शास्त्रीय होली की बात हो और स्वर्गीय तारा प्रसाद पांडे यानि तारी मास्साब की बात ना हो ऐसा कैसे हो सकता है. मेरा यह सौभाग्य रहा है दर्जा सात-आठ में वो हमारे संगीत के मास्साब थे. मुझे एक बैठी होली में बैठने का सौभाग्य भी मिला है जिसके तारी मास्साब ने भी होली गायी थे. संगीत में तारी मास्साब की पकड़ तो थी ही वो बहुत मजाकिया भी थे. अपना गायन खत्म करने के बाद वह ऐसी चुटकी लेते कि आसपास बैठे लोग हँसते रहते और वह “चहा लाओ हो” (चाय लाओ जी) या “आलू-गुटुक कां छ्न” (आलू के गुटके कहाँ हैं)  कह के दूसरी होली शुरु कर देते.उस जमाने में सीडी या एम.पी.3 तो चला नहीं था. रिकॉर्डिग की उन्नत सुविधायें भी नहीं थी और ना ही लोग रिकॉर्ड करने या व्यवसायिक उद्देशय के लिये होली गाते थे. यह सब तो एक स्वांत: सुखाय संस्कृति का हिस्सा था.इसलिये तारी मास्साब या उन जैसे कई अच्छे गायको की होलीयां समय के साथ खो गयीं.तारी मास्साब की कुछ कैसेट उनके चाहने वालों ने बनाये थे जो एक जमाने में अल्मोड़ा में बिके भी. ऐसा ही काफी पुराना कैसेट मेरे पास भी है. आइये उसी में से एक होली आपको सुनवाते चलूं.

मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे, मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे,
सब   सखियन संग मैं भी गयी थी ,  सब    सखियन   संग मैं भी गयी थी
रंग की   भरी   मोरि   उमंग नयी थी ,  रंग   की   भरी मोरि उमंग नयी थी
ऐसी ढीढ    डंगर   देखो रंग के रंगीलो , ऐसी ढीढ डंगर देखो रंग के रंगीलो
मोरि नरम कलाई मरोड़ गयो रे,    धक्का मार   गयो रे मोहे नंद को दुलारो
मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे, मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे,
मोरि नयी सी चुनरिया   फार  गयो रे,   मोरि नयी सी चुनरिया फार गयो रे
धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो,मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे

सरका के   अंगरुवा देखे मोरे अंग रे,  सरका  के   अंगरुवा देखे मोरे अंग रे,
लाज  से  सिमटी कोई नहीं संग रे , लाज से सिमटी कोई नहीं संग रे
सांवरों कान्ह  कैसो  छैल  छ्बीलो देखो ,सांवरों कान्ह कैसो छैल छ्बीलो देखो
देखो अंगिया मोरी उतार गयो रे, देखो अंगिया मोरी उतार गयो रे
धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो
मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे, मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे,
मोरि नयी सी चुनरिया   फार  गयो रे,   मोरि नयी सी चुनरिया फार गयो रे
धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो,मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे

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1. कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग 2. कुमांउनी होली: भक्ति भी,अश्लीलता भी 3. कुमांऊनी होली: छालड़ी के रंग

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May 012008
 

“गिरीश तिवारी जी” अर्थात गिरदा पर ना जाने कब से लिखना चाहता था.लेकिन समय ही नहीं मिल पा रहा था. शाम को जब युनुस भाई की पोस्ट पर फैज की रचना का जिक्र सुना तो अपना खजाना देखा कि यह रचना तो मेरे पास थी ही और वह भी ‘गिरदा’ की आवाज में. ‘गिरदा’ ने यह रचना पिछ्ले साल दिल्ली में एक कार्यक्रम में गाई थी और सौभाग्य से उस कार्यक्रम में मैं भी शामिल था. मैने तब वह रचना रिकॉर्ड कर ली थी. उसे सहेज कर तो रखा था कि गिरदा पर पूरी एक श्रंखला के लिये लेकिन आज युनुस भाई ने जब अपनी पोस्ट डाली तो मुझे लगा कि मुझे इसे डाल देना चाहिये.

तो लीजिये पेश है गिरदा की आवाज में फैज की रचना जिसे गिरदा ने हिन्दी और कुमांऊनी दोनों में गाया है.

हिन्दी में

हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.
यहां पर्वत पर्वत हीरे हैं, यहां सागर सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे
जो खून बहे, जो बाग उजड़े, जो गीत दिलों में कत्ल हुए,
हर कतरे का,हर गूंचे का,हर ईंट  का  बदला मांगेगे
हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.

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कुमांऊनी में

हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो.
यां डाना काना हीरा हरया छ्न,यां गाढ़ गध्यारा मोत्यूं भरया छ्न,
यो माल खजान सब हमरै तो छू, हम एक एक पाई को हिसाब ल्यूंलो
जो ल्वै को सिखा जो मौकु गुजरी, जौ मन सुकू मन मे कतल भईं
हर ल्वै को तोपक, हर धुरि को ढुंगक, हर एक कतल को जबाब ल्यूंलों
हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो.

कैसी लगी यह रचना मज़दूर दिवस पर टिप्पणी द्वारा बतायें.

Apr 162008
 

आज परुली बहुत खुश थी.आज उसकी बारात जो आने वाली थी. उसकी सखियाँ उसे तैयार करते करते बार बार उसे चिढ़ाती और परु इस बात का बुरा भी नहीं मानती.सर में माँगटीका, नाक में नथ, हाथों में पहुंची और पिछोड़ा ओढ़ी हुई परु बहुत सुन्दर लग रही थी. बारात आने में अभी देर थी. परुली सोच में डूब गयी.

जब वह बीमार हुई थी तब उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी खुशियाँ उसे एक साथ मिल जायेंगी. वह समय दुख, क्षोभ और किस्मत को कोसने वाला समय था. उस समय तो उसकी बीमारी की बात सब जगह फैल गयी थी. पहाड़ों में बातें छिपती कहाँ है.बिना टेलीफोन, मोबाइल जैसे संचार के साधनो के बिना भी सभी बातें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाती. यह बात और थी कि मूल बात में नमक मिर्च की मात्रा बताने वाले की योग्यता और सुनने वाले की क्षमता के आधार पर घटती बढ़ती जाती. परुली की बीमारी की चर्चा मलगाड़ भी पहुंच गयी. पांडे जी को जब पता चला तो वह बेचैन हो गये. अभी तक वह मंगसीर में शादी करने के लिये जोस्ज्यू को तैयार कर रहे थे.लेकिन अब उन्होने सोच लिया कि वह इस बारे में और जोर नहीं देंगे बल्कि वह तो ऐसे मौके की तलाश में थे जिससे की वह किसी तरह इस ब्या के लिये मना कर सकें.

इधर जोस्ज्यू को जब परुली की ईजा ने परुली की सारी बात बतायी तो वह और चिंतित हो गये.उन्होने निश्चय किया कि वह पांडे ज्यू से सीधे सीधे कहेंगे कि वह परुली की शादी अभी नहीं करना चाहते.साथ ही वह परुली को दिखाने के लिये शहर भी ले गये जहाँ कोई डाक्टर पुनेठा थे. वह सप्ताह में दो दिन नंदादेवी मंदिर के पास बैठते थे.पहाड़ की चढ़ाई को चढ़ना कमजोर परुली के लिये काफी मुश्किल था फिर भी किसी तरह उसने उसे पार किया. रास्ते में बाबू ने उसे बताया कि उन्होने अभी उसका ब्या ना करने का फैसला लिया है.

पुनेठा डाक्टर की दवाई से परुली को काफी फायदा हुआ. एक महीने के अन्दर परुली स्कूल जाने लायक और घर के छोटे छोटे काम करने लायक हो गयी. वह मन लगाकर पढ़ाई भी करती.ब्या टूटने के कारण उन लोगों की कुछ बदनामी तो हो ही चुकी थी.गांव में उसके बारे में भी लोग तरह तरह की बाते करते लेकिन परुली इन बातों को अनसुना कर देती. बोर्ड का रिज़ल्ट आया तो परुली अच्छे नम्बरों से सैकेंड डिवीजन में पास हो गयी.आगे की पढ़ाई के लिये उसने बायलॉजी ले ली. उसका एक ही लक्ष्य था कि उसे डॉक्टर बनना है. जो विश्वास उस पर उसके ईजा बोज्यू ने दिखाया था उसे वह तोड़ना नहीं चाहती थी.

आखिर वह दिन आ ही गया जब मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में उसका नाम आ ही गया.पहली बार वह शहर से बहुत दूर लखनऊ गयी, बाबू के साथ. कितना बड़ा शहर. इतना बड़ा शहर देखकर ही उसे घबराहट सी होने लगी लेकिन उसने अपनी घबराहट को किसी तरह काबू किया और वह बाबू को विश्वास दिलवाते रही कि वह हॉस्टल में आराम से रहेगी. जोस्ज्यू ने भी अपनी खत्याड़ी वाली जमीन बेच दी थी ताकि परुली की पढ़ाई के लिये पैसे का इंतजाम हो सके.

परुली की पढ़ाई पूरी हो गयी. वह अपरेंटिस के लिये अपने गांव के पास वाले शहर के बेस अस्पताल में आ गयी. यहीं उसकी मुलाकात डाक्टर अतुल से हुई. डाक्टर प्रिया जोशी और डाक्टर अतुल पंत की आपस में बहुत अच्छी बनती थी. इसके पीछे एक कारण यह भी था कि दोनों ही बहुत गरीब परिवार से आये थे और दोनों के दिल में काम करने और अपने पहाड़ के लिये बहुत कुछ करने के सपने बसे थे. विधाता को भी उनका मेल शायद मंजूर था इसलिये जब प्रिया का चिन्ह ,अतुल के चिन्ह के साथ मिलाया गया तो वह मिल गया और दोनों का शादी पक्की हो गयी.

“बारात बस पहुचने वाली ही है दुल्यर्घ की तैयारी करो हो.” किसी ने कहा तो जैसे उसकी तंद्रा टूटी.वहा भाग कर अन्दर वाले कमरे में जाकर अपनी नथ ठीक करने लगी. इधर पटांगण में ऐपण से दुल्यर्घ चौकी बनायी गयी थी. वहाँ पर सारी तैयारी पूरी थी. परु का छोटा भाई भी बारात का स्वागत करने के लिये रंग बिरंगी छाता लेकर तैयार खड़ा था.बाहर की लाइट में चमक रहा था. प्रिया वैड्स अतुल…….

समाप्त……

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा 7. परुली:ब्या टालने की उहापोह 8. परुली : अभी नानतिन ही हुई हो 9. परुली : यह कैसी बीमारी?

Apr 092008
 

“परु तो जर से हणक रही है हो.” (परु को तेज बुखार है). परुली की ईजा ने जजमानी के लिये निकलते हुए जोस्ज्यू से कहा.

“ठीक है मैं गड़वा बॉज्यू के वहां से ब्याव को (शाम को) मिक्सचर लेते आउंगा.”

परुली स्कूल भी नहीं गयी. दिन भर बुखार से तपती रही. उसकी ईजा ने ही घर के अधिकतर काम किये. फिर उसे बुखार में तड़पता छोड़कर ही वण (जंगल) चले गयी. परुली सोचती रही अपने संभावित भविष्य के बारे में.ब्या होने पर उसे हमेशा धोती पहनकर ही रहना होगा. सास-ससुर के आगे बड़ा सा घूंघट निकाल कर रखना होगा.पांच पांच गोरुओं का सारा काम करना होगा.उनका दूध लगाना होगा.उन्हें वण हंकाने जाना होगा. लकड़ियाँ,पिरूल,घास,पानी सब ही कुछ तो लाना होंगा, गुपटाले बनाने होंगे. कई सारे काम. इन कामों के बीच वह पढ़ तो नहीं ही पायेगी. यानि यदि ब्या हुआ तो उसे डॉक्टर तो क्या पढ़ाई के बारे में भी भूलना ही पड़ेगा.सोचते सोचते उसकी तबियत और खराब हो गयी.  

शाम को बाबू आये तो मिक्सचर लेते आये. उससे परुली को कुछ आराम तो मिला लेकिन पूरी तरह बुखार नहीं उतरा.लेकिन फिर भी उसने ईजा के साथ घर का काम कराया. ईजा के मना करने के बाबजूद भी वह गोरु-बाछों को घास डाल आयी. आटा ओल दिया और फिर चूल्हे में रोटी सैंकती रही. खाना खा चुकने के बाद बुखार फिर बढ़ गया लेकिन वह ईजा को कुछ बताये बिना वह सो गयी.

आज परु की बीमारी का सातवां दिन था. इस दौरान वह स्कूल भी नहीं गयी थी. हाँ जब भी बीच बीच मे आराम मिलता वह अपनी किताबों से कुछ कुछ पढ़ती रहती.मिक्सचर से फायदा ना होते देख बाबू प्रकाश मेडिकल से दूसरी दवाई भी लाये. दवाई खाने से बुखार कम होता लेकिन फिर आ जाता.जोस्ज्यू भी उसे मोरपंख से एक दो बार झाड़ चुके थे. कुछ लोगों ने कहा परु को नजर लग गयी है,पूछ कराओ. ईजा घर से थोड़े चावल लेकर पंडित जी से पूछ भी करवा आयी. पंडित जी ने भोलनाथज्यू थान की धूणी से कुछ भभूत भी दी. लेकिन उससे भी कुछ फायदा नहीं हुआ.

परु की आंखें एक्दम गड्ढे में चलीं गयी थी. फूल सा सुन्दर चेहरा एक्दम मुरझा गया था. बालों में इतने दिन ना नहाने की वजह से गांठे पड़ गयी थी.वह कुछ भी खाती तो उलटी हो जाती. शरीर भी धीरे धीरे सूख जैसा रहा था. किसी ने कहा कि इससे छॉ (भूत) लग गया है.किसी ने कहा कि किसी ने जादू कर दिया है परु पर, किसी ने कहा कि जागर लगाओ. किसी ने कहा वो शिब्बन पानवाला है वह कुछ दवाई देता है. परु के बाबू वह दवाई भी लाये लेकिन नतीजा वही रहा. पूरे गांव में तरह तरह की बातें होने लगी. कोई कहता कि परु को टी.बी. हो गयी है.ज्यादा थोड़े बचेगी अब यह. इसे भवाली सैनिटोरियम में भरती करो. उन दिनों टीबी से कई मौतें होती भी थीं. कोई कहता कि परुली तो हमेशा से ही बीमार रहती थी. इसीलिये तो ये लोग इसकी शादी जल्दी जल्दी करना चाहते थे. सामने अच्छी अच्छी बातें करने वाले भी पीठ पीछे तरह तरह की बातें बनाते.

परुली जब तेज बुखार में होती तो नीम-बेहोशी की जैसी हालत में कुछ बड़बड़ाती रहती.उसकी यह हालत देख उसकी ईजा भी बहुत दुखी थी.घर भी बिखरा ही रहता क्योंकि पहले घर की साफ सफाई का जिम्मा परू के ऊपर था.वह सुबह सुबह ही चीड़ की पत्तियों के बने झाडू से पूरे घर की सफाई करती. सारा सामान सही जगह पर रखती. अब वही बीमार थी तो घर को साफ करने की किसे सुध.ईजा परु के सिराने पर बैठी थी…और परु के सिर पर हाथ फेरे रही थी. परुली बेहोसी की जैसी हालत में पड़ी थी.वह कुछ बड़बड़ा रही थी. परु की ईजा ने ध्यान से सुनना चाहा. परु बड़बड़ा रही थी. मेरा ब्या मत करो ईजा….. बाबू मुझे डाक्टर बनने दो बाबू….. ईजा ..मैं ब्या नहीं करुंगी ईजा…मैं मर जाउंगी ईजा….ब्या नहीं करुंगी…..

ईजा ने सब कुछ साफ साफ सुना तो उसकी आंखों से आँसुओं की धारा बह निकली. वह फिर परु के सिर पर हाथ फेरने लगी. हाथ फेरते फेरते उसने मन ही मन कुछ निश्चय किया.   

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा 7. परुली:ब्या टालने की उहापोह 8. परुली : अभी नानतिन ही हुई हो

Apr 022008
 

मलगाड़ से लौटते समय जोसज्यू सोच रहे थे कि पांडे ज्यू का कहना भी सही ही ठहरा. परुली तो अभी नानतिन ही हुई. उसे अभी अकल जो क्या हुई अरे हम लोगो को ही उतनी अकल जो क्या ठहरी. पांडे ज्यू की रिश्तेदारी तो लखनऊ, दिल्ली सभी जगह ठहरी. वह बराबर दिल्ली, लखनऊ जाते रहने वाले ठहरे. उनकी बहन दसोली के पाठकों के वहाँ हुई.बहन का पूरा परिवार दिल्ली में ही ठहरा. गोपाल को भी उन्होने ही दिल्ली में नौकरी में लगाया ठहरा बल.वह ठीक ही कह रहे ठहरे. घर जाके परु की ईजा को भी समझाता हूँ.

रात को परुली की ईजा आई तो उसे जोसज्यू पूरी घटना बताने लगे और साथ समझाने भी लगे. 

पांडे ज्यू कह रहे थे. ‘परुली को कुछ मालूम जो क्या हुआ. डॉक्टरी करना इतना सित्तिल (सरल) नहीं हुआ जोसज्यू. उसका कोई ट्रेंस (इंट्रैंस) एग्जाम होता है बल. उसमें तो बाजे बाजे लोग ही निकलने वाले हुए. परु थोड़े निकलेगी.” वो कह रहे थे “अरे बोर्ड का इंत्यान भी बहुत टफ ठहरा. उसमें ही परु का पास होना मुश्किल हुआ.”

“ठीक ही कह रहे होंगे फिर.” …ईजा कुछ समझी कुछ नहीं.

वो कह रहे थे कि उनके घर का कारबार ही इतना बढ़ा हुआ. परुली को और कुछ करने जी क्या जरूरत ठहरी. वो तो गोपाल यहाँ रहकर बिगड़ जायेगा करके उसे उन्होने दिल्ली भेजा ठहरा. नहीं तो वो तो यहीं उसके लिये दुकान खोलने की सोच रहे थे बल.

जोस्ज्यू आगे बोले “फिर मैन कौ (मैने कहा) कि यदि परू की इंटर तक पढ़ाई पूरी करवा दें तो जैसा उसकी किस्मत होगी वैसा कर लेगी. तो वो कहने लगे.”

“घरपन के काम से फुरसत कहाँ मिलेगी परु को जोसज्यू. पांच पांच गोरु हैं. उनका घास-पात, मोव निकालना, गुपटाले पाथना,दूध निकालना, ठेकी में दही जमाना कितने तो काम हुए घर में.”

“तो घर के सारे काम क्या हमारी परु करेगी??” …ईजा की आवाज में थोड़ी चिंता थी.

“अब पांडे ज्यू की सैणी तो बीमार रहने वाली हुई. पिछ्ले बार तो दिल्ली तक दिखाया था बल.कुछ दिन वहाँ भरती भी रही ठहरी लेकिन वहाँ की दवाई से भी कोई खास फरक नहीं पड़ा बल. इसीलिये तो पांडे ज्यू जल्दी जलदी ब्वारी लाना चाह रहे हैं.”

“पर परु तो अभी नानि ही हुई हो इत्ती बड़ी घर गृस्थी संभाल पायेगी वो.”

“अरे संभाल लेगी. यहाँ भी तो सारा काम करने वाली हुई. तू उसे दूध लगाना और सिखा देना.”

उसकी ईजा का मन थोड़ा भारी हो गया. “उ तो सिखे द्यून (वो तो सिखा दुंगी) लेकिन परु अभी भौ (बच्ची) ही हुई. इतना बोझ उसके सर पर देना ठीक होगा क्या हो.”

“अरे परु सब कर लेगी. फिर संबंध भी तो देखो. इनके संबंध अल्मोड़ा गल्ली के दीवानों से भी हुए बल.”

परुली लेटे लेटे सब सुन रही थी.आमतौर पर यह सब सुनकर उसकी रुलाई फूट पड़ती थी. लेकिन आज ना जाने क्यों वो नहीं रोई बल्कि वह जितना सुनती जाती उतनी उसकी हिम्मत बढ़ते जाती. इस अवस्था में वह क्या करे वह यही सोच रही थी.

वह उठी और बिचाखंड से चाख में आ गयी जहाँ उसके ईजा बाबू बात कर रहे थे और ईजा के पास जाकर उससे बोली.

“ईजा मुझे मारना है तो वैसे ही गला घोट के मार दे ईजा. ब्या करके क्यों मारना चाहती है.” उसके आवाज में गुस्सा भी था , निरीहता भी और हल्की सी रुलाई भी.

“यो के कुणेछी ? (ये क्या कह रही है)”.ईजा ने पूछा

” क्या हुआ परू  ??” अंगीठी में  हाथ सेकते हुए बाबू बोले.उन्होने पूरी बात ठीक से नहीं सुनी थी.

” सही कह रही हूँ ईजा. मैं भार हूँ ना तुम लोगों …  ” . वह बात पूरी भी नहीं कर पायी और ईजा के गोद में सर रख कर रोने लगी.

“नहीं परु. “उसके सर पर हाथ फेरते हुए ईजा बोली.तू पड़ जा (सो जा) . मैं आती हूँ अभी.

परुली चले गयी. बाबू को पूरी तरह से बात समझ में नहीं आयी. क्योकि यह बात इतने धीरे धीरे बोली गयी कि उनके कान में पूरी बात नहीं पड़ी.

” के भौ…(क्या हुआ) “. परुली के जाने के बाद बाबू ने पूछा.

” के नै (कुछ नहीं) ..तुम ले पड़ जाओ (तुम भी सो जाओ)…भोल बतून (कल बताऊंगी).”

परुली की ईजा भी उठकर बिचाखंड में आकर परुली के पास लेट गयी जहाँ परुली अभी भी सिसकियाँ भर रही थी. 

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा 7. परुली:ब्या टालने की उहापोह

Mar 272008
 

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आज पिछ्ले अंक में की गयी छालड़ी की चर्चा को ही आगे बढ़ाते हैं और छालड़ी में गायी जाने वाली कुछ प्रमुख होलियों की चर्चा करते हैं.

होल्यार छालड़ी में तरह तरह की होली गाते हैं. कुछ होलियां ऐसी भी गायी जाती हैं जो मुख्यत: महिला पात्रों द्वारा गायी जानी चाहिये लेकिन छालड़ी में इन होलियों को पुरुष होल्यार भी गाते हैं.

बलमा घर आये कौन दिना. सजना घर आये कौन दिना…
मेरे बलम के तीन शहर हैं
मेरे बलम के तीन शहर हैं
दिल्ली, आगरा और पटना..
बलमा घर आये कौन दिना. बलमा घर आये कौन दिना .. सजना घर आये कौन दिना।
मेरे बलम की तीन रानियां – २
मेरे बलम की तीन रानियां
पूनम, रेखा और सलमा 
बलमा घर आये कौन दिना. बलमा घर आये कौन दिना .. सजना घर आये कौन दिना।

इस होली में समय और परिस्थिति के अनुसार स्थानीय मुद्दे या जिस के घर हो रही है उससे संबंधित चीजें भी जोड़ दी जाती हैं. जैसे एक बार जब मैं भी छालड़ी में भाग ले रहा था तो एक घर में जिसका मुखिया अक्सर शराब पीके आता था तो हम लोगों ने गाया.

मेरे बलम के तीन ठिकाने
मेरे बलम के तीन ठिकाने
घर, ऑफिस और दारू का भट्टा 
बलमा घर आये कौन दिना. बलमा घर आये कौन दिना .. सजना घर आये कौन दिना।

इसके अलावा एक और होली जो प्रमुख रूप से गायी जाती है वह है.

रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….
अबीर उड़ता गुलाल उड़ता, उड़ते सातों रंग…सखी री उड़ते सातों रंग
भर पिचकारी ऐसी मारी, अंगियां हो गयी तंग…
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….
तबला बाजे, सारंगी बाजे, और बाजे मिरदंग…सखी री और बाजे मिरदंग
कान्हा जी की बंसी बाजे, राधा जी के संग…
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….
कोरे कोरे माट मंगाये, तापर घोला रंग, सखी री तापर घोला रंग
भर पिचकारी सनमुख मारी, अंखिंया हो गयी बंद…
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….
लंहगा तेरा घूम घुमेला, चोली तेरी तंग
खसम तुम्हारे बड़ निकट्ठू , चलो हमारे संग
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….

इस होली की अंतिम लाइनों को हम लोग बहुत जोर देकर गाते थे. अगले अंक में इसकी पॉडकास्ट भी आप तक पहुचाने की कोशिश करुंगा.

किसी घर में होली खतम करने के बाद एक घर से दूसरे घर के बीच में कुछ होलियाँ गायी जाती हैं.जिसमें कुछ स्थानीय मुद्दे , कुछ ‘उन्मुक्त्तता’ ( पिछ्ले अंक में मेरे द्वारा लिखी गये शब्द ‘अश्लीलता’ को हेम पंत जी ने ‘उन्मुक्त्तता’ का नाम दिया था तो मैं उसी का प्रयोग कर रहा हूँ.) का पुट आता है. इस होली को बंजारा होली भी कहा जाता है.

आपू बनजारो बनज गयो बनजारो छ:
भाई आंगन निम्बू लगाय पिय बनजारो छ:
आपू बनजारो बनज गयो बनजारो छ:
नीम निमोड़ा पाकि जाला बनजारो छ:
भाई खैज बटोवा लौंग पिय बनजारो छ:

छालड़ि का एक प्रमुख हिस्सा होता है अशीष (आशीर्वाद) देने का. हर घर में होली गाने के बाद होली का मुखिया अपने साथियों के साथ घर के मुखिया और उसके पूरे परिवार को लाख बरस जीने का आशीर्वाद देता है. यह आशीर्वाद पहले एक गाने के रूप में सभी देवताओं को दिया जाता है.

केसरी रंग डारो भिगावन को, सांवरी रंग डारो भिगावन को
गणपति जीवै , लाख बरीषा , ब्रह्मा , विष्णु जीवे लाख बरीषा,
उनकी नारी रंग भरे , केसरी रंग डारो भिगावन को
शिवजी जीवै , लाख बरीषा , रामचन्द्र जीवे लाख बरीषा,लछ्मन जीवै लाख बरीषा
उनकी नारी रंग भरे , केसरी रंग डारो भिगावन को

इसमें अन्य देवी-देवताओं के नाम भी जोड़े जाते हैं.

इसके बाद घर के सभी पुरुष सदस्यों का नाम लेकर उनको भी आशीर्वाद दिया जाता है. 

मुख्य होलियार : मथुरादत्त ज्यू जी रौ लाख सैवरी
बांकी होल्यार :  हो हो हो लख रे.
मुख्य होलियार : उनर पूत परिवार जी रौ लाख सैवरी
बांकी होल्यार :  हो हो हो लख रे.
मुख्य होलियार : उनर गोरु बाछ, भेड़ बाकर, भान-कुन जी रौ लाख सैवरी
बांकी होल्यार :  हो हो हो लख रे.

यानि मुख्य होल्यार कह रहा है कि मथुरा दत्त जी, उनका समस्त पूत परिवार, उनके गाय-बैल , भेड़ बकरी, बर्तन सभी चीज लाख वर्ष तक जीवित रहे. बाक़ी लोग आमीन जैसी ध्वनि के साथ कहते हैं जरूर लाख वर्ष तक जियें.

जब गांव या मोहल्ले के अंतिम घर में होली की आशीष हो जाती है तो अंत में सब लोग एक दूसरे के हाथों में हाथ डाल अपनी जेब का सारा अबीर-गुलाल , रंग जमीन में फैक देते हैं, कुछ लोग अपनी टोपियाँ भी फैक देत हैं और सब मिल कर गाते हैं.

आज कन्हैया रंग भरे , रंग की गागर सर पे धरे
होली खेली खहली मथुरा को चले ,आज कन्हैया रंग भरे
आज की होली न्हैं गेछ , जी रया जाग रया कै गेछ
अब फागुन उलौ कै गेछ, जी रया जाग रया कै गेछ

कन्हैया अपने घर मथुरा की ओर गये.इस बार की होली खतम हुई.सभी लोग जीते रहें खुश रहें. अगले बरस फागुन में होली फिर आयेगी तब तक सब लोग जीते रहें और खुश रहें.

तो इस बार की छ्लड़ी खतम हुई. अगले अंक में कुछ शास्त्रीय होलियों की चर्चा करेंगें.

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संतनगर के खीम सिंह रावत जी ने दो होलियाँ और भेजी हैं. रावत जी को ढेर सारा धन्यवाद.

1.

शिव दर्शन देऊ जटाधारी , शिव दर्शन देऊ जटाधारी
ये कौन जी झूले लडिया हिनोला,ये कौन झुलावन आयो हरी.
शम्भू जी खेलें लडिया हिनोला , गौरा झुलावन आयो हरी.
राम जी खेलें लडिया हिनोला , सीता झुलावन आयो हरी.
कृष्णा जी खेलें लडिया हिनोला , राधा झुलावन आयो हरी.

2.

द्वारे जो देखूँ ठाडो देवरिया , म्यरा स्वामी परदेश रहनी हो ला.
पूरब दिशा में कालो बदरिया , पश्चिम दिशा घनघोरा हो ला.
चाला जो चमके बिजूरी जो धमके , रिमझिमे बरसे मेघा हो ला.
स्वामी की भीगे लाल पगड़िया , मेरी रेशमिया साड़ी हो ला.
बाली उमरिया तरुणी हैगेछा, म्यारा स्वामी घर कब ऐला हो ला.
तरुणी उमरिया कसिक निभानूँ , म्यारा स्वामी निर्दयी हैगी हो ला.

जारी …………………….

इस श्रंखला के अन्य लेख

1. कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग 2. कुमांउनी होली: भक्ति भी,अश्लीलता भी

Mar 262008
 

परुली के बाबू रात को ठीक से सो भी नहीं पाये. रात भर सोचते रहे कि क्या किया जाये. एक ओर वह चाहते थे कि परुली डॉक्टर बन जाये और दूसरी ओर वह परुली के लिये इतने अच्छे संबंध को छोड़ना भी नहीं चाहते थे. यदि वह किसी तरह अपने मन को इस बात के लिये तैयार भी कर लेते कि वह परुली का ब्या अभी ना करें तो वह किस तरह से इस संबंध के लिये मना करेंगे. एक बार बिरादरी में बदनामी हो गयी तो लोग तरह तरह की बातें बनायेंगे. फिर आगे भी रिश्ते नहीं आयेंगे.इसी तरह सोचते सोचते सुबह हो गयी. घर में घड़ी तो थी नहीं. पास के शहर में एक जेल था उसमें हर घंटे घंटी बजायी जाती जिससे समय का पता चलता. अभी अभी पांच घंटे बजे तो जोसज्यू उठ गये. आज उन्हें बगल के गांव में एक जजमान के वहाँ नामकन्द (नामकरण) करवाने जाना था.

आते समय जाखनदेवी में उपाध्याय ज्यू की दुकान में बैठना जोसज्यू का लगभग रोज का ही नियम था. कभी कभी वह पास की ही भोलदा की दुकान से एक पान भी खा लेते. लेकिन उपाध्याय ज्यू की दुकान से उधार में सामान लेने के अलावा वह उन्हें अपने घर की बातें भी बता आते.उपाध्याय ज्यू जानते थे कि परुली का ब्या ठीक हो गया है. इसलिये आज जोस्ज्यू ने सोचा कि इस बारे में एक बार उपाध्याय ज्यू से भी सलाह कर ली जाये.

“आओ हो जोस्ज्यू ..आज कांबटी (आज कहाँ से) “

“बगल के गांव में खीमदत्त ज्यू के वहाँ नामकन्द था हो.”

“खूब माल-टाल मिला होगा तब तो. खीमद्त्त ज्यू का तो पांच नातनियों के बाद नाती हुआ ठहरा. खूब झर-फर कर रखी है बल.”

“हाँ पूरे गांव को खाने का न्यूता था. हमारे तो पुराने जजमान हुए क्या माल-टाल देंगे. हाँ इस बार सवा रुपये की जगह सवा पांच रुपये की दक्षिणा दी हो.”

“भल हुआ यह तो.तब तो चहा बढ़ूं पे मैं.”

“हाँ बढ़ांओ……कुछ रुककर ….उपाध्याय ज्यू..एक बात में आपकी राय लेनी थी हो.”

“क्या…चाय की केतली में पत्ती डालते हुए उपाध्याय ज्यू बोले. “

“परुली के बारे में….”

“अरे उसके ब्या में कुछ रुपये पैसे की मदद चाहिये क्या. “

“नहीं ..वो तो नहीं …पर परुली कह रही है वह यह ब्या नहीं करेगी. वह पहले डॉक्टर बनना चाहती है. “

“अरे वह तो नानतिन ठहरी.उसका क्या. आप तो ब्या कर दो जी. बनना होगा तो बन जायेगी.”

“लेकिन यार …चाहता तो मैं भी हूँ कि वह डॉक़्टर बन जाये.इसलिये सोच रहा हूँ कि इस ब्या को अभी रुकवा दूँ.”

“जोस्ज्यू तुम्हारी तो मति मारी गयी है.इतना अच्छा घर कहाँ मिलेगा परुली को. चिंन्ह भी कैसा बढिय़ा साम्य हुआ ठहरा. शादी ब्या तो अंजल (संजोग) की बात होने वाली हुई. पहले तो डॉक्टर बनना ही कितना मुश्किल हुआ फिर परुली को डॉक्टर बना भी लिया तो कौन सा उसको जनम भर अपने घर में रख लोगे. ब्या तो तब भी करना ही पड़ेगा ना.फिर अभी बिना किसी कारण के ब्या रोक दिया तो तुम्हारे जजमान ही क्या कहेंगे. कस बामण छा हो तुम ?(कैसे ब्राह्मण हो हो तुम?) …. लो चहा पियो.”

चहा पीते पीते जोसज्यू ने भविष्य की सभी संभावनाओं पर विचार किया. उनको सचमुच अपने जजमानों और बिरादरों की बातें सुनायी देने लगी.बदनामी के डर से वह थोड़े घबरा गये.लेकिन साथ साथ ही जब वह परुली के बारे में सोचते कि जब उसने कहा था ” बाबू मैं यह ब्या नहीं करुंगी” तो कितनी इच्छाऐं उसके एक वाक्य में छिपीं थी.वह कुछ भी निर्णय ले पाने में असमर्थ थे. 

घर जाके भी वह परेशान ही थे. परुली उनके सामने से गुजरी तो उसकी आंखें लाल थी.लगता था वह खूब रोयी है. अब तक उन्होने ध्यान नहीं दिया था. लेकिन अब वह सोच रहे थे कि जब से परुली के ब्या की बात शुरु हुई तब से वह उदास ही रहती थी. इसका कारण अब उनकी समझ में आ रहा था.वह परुली का बुरा थोड़े चाहते थे लेकिन वह क्या कर सकते थे.जिससे भी वह बात करते वह यही सलाह देता कि परुली का ब्या कर दो.

उन्होने निर्णय लिया कि कल वह मलगाड़ जा के एक बार पांडे ज्यू से बात करेंगे. वह भले आदमी हैं हो सकता वही कोई सलाह दें. यदि वह खुद ही परुली को डॉक्टरी पढ़ाने के लिये राजी हो जायें तो फिर परुली का ब्या भी हो जायेगा और वह डॉक्टर भी बन जायेगी. अपनी इस सोच से वह खुद भी हैरान थे कि पहले यह विचार क्यों उनके दिमाग में नहीं आया.आज वह जल्दी जल्दी खाना खा के सो गये ताकि वह कल रत्तब्याण ही मलगाड़ के लिये रवाना हो जायें.

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा

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पिछ्ले अंक में मैने बताया था कि आज वाले भाग में कहानी का अंत कर दुंगा. एक अंत सोचा भी था.लेकिन मुझे खुद भी लग रहा था वह कुछ कुछ फिल्मी अंत हो रहा है  और फिर  पिछ्ले भाग में आयी टिप्पणीयों से हौसला मिला कि मुझे कहानी का अंत फिल्मी करने की कोई आवश्यकता नहीं है. आज सुबह लिखने बैठा तो इसी उहापोह में रहा कि कहानी का अंत करूं या फिर इसे इसी रफ्तार से आगे बढ़ने दूँ. कही ऐसा ना हो कि लगे कि कहानी जबरदस्ती खींची जा रही है. फिर लिखते लिखते लिख ही गया. अभी लगता है कि कहानी जारी रहेगी. तो अगले हफ्ते भी आइयेगा पढ़ने.

कल कुमांऊनी होली का अगला अंक प्रस्तुत किया जायेगा कृपया जरूर पधारें.

1. कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग 2. कुमांउनी होली: भक्ति भी,अश्लीलता भी

Mar 202008
 

पिछ्ले अंक में हमने होली के तीन प्रमुख रूपों की चर्चा की थी. आज हम उसी में से एक रूप खड़ी होली की चर्चा ‘छालड़ी’ के संबंध में करेंगे.जिस दिन देश, दुनिया के अन्य भागों में होली मनायी जाती है उस दिन कुमांऊ में मुख्य होली होती है जिसे “छरड़ी” या “छालड़ी” कहते हैं. यह फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनायी जाती है. इस दिन पानी और रंगों से होली खेली जाती है.

सुबह होते ही घरों में इस होली की तैयारियाँ शुरु हो जाती हैं.एक थाली में अबीर गुलाल रखा जाता है.घर के सदस्यों के लिये आमतौर पर पूरी और आलू के गुटके (आलू की सूखी सब्जी) बनाये जाते हैं. होली में अबीर लगाने वाले लोगों के लिये कुछ चिप्स,पापड़ तले जाते हैं. कुछ लोग आलू,चने या छोले,पकोड़ी आदि भी बनाते हैं. भांग की पकोड़ी भी कुछ जगह बनायी जाती है. पूरी-आलू खाने के बाद घर के पुरुष पहले अबीर लगाने के लिये निकलने की तैयारी करते हैं. अपने होली के कपड़े पहनते हैं. रुमाल की एक पोटली में सूखा अबीर गुलाल रखते हैं. आजकल रुमाल की जगह पॉलीथीन के पैकेट का इस्तेमाल भी लोग करते हैं. जो लोग गीला रंग लगाना चाहते हैं वो एक रुमाल में कोई गाढ़ा रंग रख कर उसे हल्के पानी से भिगा देते हैं और उसे भी एक पॉलीथीन के पैकेट में रख अपनी जेब में डाल लेते हैं.जब भी किसी को गीला रंग लगाना हो तो रुमाल को थोड़ा गीला किया और चुपड़ दिया मुंह में रंग.       

होली की पोशाक पहनने के बाद सबसे पहले द्य्प्ताथान (घर का मंदिर) में भगवान को अबीर-गुलाल लगाया जाता है. फिर घर के सभी सदस्य एक दूसरे को अबीर-गुलाल का टीका लगाते हैं. अपने से बड़े लोगों को पांव छूके या हाथ जोड़ कर नमस्कार किया जाता है. समवयस्क पुरुष और महिलाएं एक दूसरे के गले मिलते हैं.उसके बाद घर के पुरुष अपने अपने दोस्तों के साथ पूरे गांव, मोहल्ले या अपने नाते-रिश्तेदारों के यहाँ अबीर का टीका करने के लिये निकलते हैं.

सुबह दस – साढ़े दस बजे तक सब गांव या मोहल्ले के प्रमुख शिव मन्दिर पर एकत्र होते हैं.यह शिव मंदिर वही होता है जहां सामुहिक चीर बांधी गयी थी. ‘छलड़ी’ के पहले दिन इसी स्थान पर चीर दहन होता है.”छलड़ी’ के दिन होल्यार सबसे पहले चीर दहन की राख का टीका करते हैं और फिर  कोई ढोलक पकड़ता है, कोई मजीरा, कोई झांझर,तो कोई ढपली. होली खेलने वालों को होल्यार कहा जाता है. यह सभी होल्यार शिवमंदिर में शिव की होली से शुरुआत करते हैं.

” अरे हाँ हाँ जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला,
अच्छा हाँ हाँ जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला.
ब्रह्मा जी खेलें , बिष्णु जी खेलें. खेलें गणपति देव
शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला.
हाँ हाँ जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला. ”

फिर अन्य होलियां गायी जाती हैं जैसे.

“अरे अंबारी एक जोगी आया लाल झुमैला वाला वे
ओहो लाल झुमैला वाला वे ”

होल्यार अपने जुलूस का एक मुखिया चुन लेते हैं जो पूरी होली को नियंत्रित करता है. इसके बाद गांव/मोहल्ले के हर घर में होल्यार जाते हैं जहाँ उनके लिये पहले से दरियां बिछायी गयी होती हैं.सभी होल्यार पहले बैठ के होली गाते हैं. घर के लोग होल्यारों का स्वागत करते हैं. घर का मुखिया सभी होल्यारों को अबीर का टीका लगाता है. उनका स्वागत चिप्स,पापड़,कटे हुए फल, गुझिया, सौप,सुपारी, गरी आदि से किया जाता है कुछ लोग चाय भी पिलाते हैं. घर का मुखिया जुलूस के मुखिया को कुछ पैसे भी देता है. हर घर से कुछ कुछ पैसे लिये जाते हैं. इन पैसों से या तो सामुहिक भंडारा होता है या पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी जाती है या फिर सामुहिक महत्व की चीजें जैसे ढोलक,मजीरा आदि खरीद लिया जाता है.

अंत में होल्यार दरी से उठ कर खड़े होकर होली गाते हैं…घर के सदस्य घर के खिड़कियों जिन्हे पहाड़ में छाजा कहा जाता है उससे रंग वाला पानी डालते हैं. तब बढ़े बूढ़े आगे पीछे हो जाते हैं और युवा लोग मोर्चा संभालते हैं और भीगते भीगते चिढ़ाने के लिये होली गाते रहते हैं.इसमें थोड़ी अश्लीलता का पुट भी कभी कभी आ जाता है जैसे

“कहो तो यहीं रम जायें गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे,
कहो तो यहीं रम जायें गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे
उलटि पलट करि जायें  गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे
कहो तो यहीं रम जायें गोरी तबले तुम्हारे कसे हुए

या फिर

“सिप्पय्या आंख मार गयो रात मोरे सय्यां ,
सिप्पय्या आंख मार गयो रात मोरे सय्यां “
जबहि सिपय्या ने ….. भरतपुर लुट गयो रात मोरे सय्यां
 

कुछ दिनों पहले इस गाने को किसी फिल्म में भी लिया गया था लेकिन मैने यह गाना फिल्म से बहुत पहले होलियों में सुना व गाया था.

यह सफर आगे जारी रहेगा …अभी कुछ अच्छे गाने आपको सुना दूँ….

सतरंगी रंग बहार ,  होली खेल रहे नर नारी
कोई लिये हाथ पिचकारी,कोई लिये फसल की डारी
घर घर में धूम मचाय,होली खेल रहे नर नारी
सतरंगी रंग बहार ,  होली खेल रहे नर नारी
कोई नाच रहा कोई गाये कोई ताल मृदंग बजाये
घर घर में धूम मचाय, होली खेल रहे नर नारी.

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झुकि आयो शहर में ब्यौपारी, झुकि आयो शहर में ब्यौपारी
इस ब्यौपारी को भूख बहुत है,पुरियां पकाय दे नथवाली.
झुकि आयो शहर में ब्यौपारी
इस ब्यौपारी को प्यास बहुत है,पनिया पिलाय दे नथवाली.
झुकि आयो शहर में ब्यौपारी
इस ब्यौपारी को नींद बहुत है,पलेंग बिछाय दे नथवाली.
झुकि आयो शहर में ब्यौपारी

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पिछले भाग की पॉडकास्ट यदि आप सुनना चाहें तो वह भी सुनें. इस पॉडकास्ट के अंत में दो होलियाँ भी गायी गयी हैं जिसका अनुरोध संजू भाई ने किया था.

[इस पॉडकास्ट को mp3 फोर्मेट में डाउनलोड करने के लिये यहाँ क्लिक करें. साइज 4.28 MB]

 

पिछ्ले अंक में दिल्ली संतनगर बुराडी से खीम सिंह रावत जी ने एक बहुत ही अच्छी होली भेजी थी. वह होली इस प्रकार थी.

प्रभु ने धारो वामन रूप , राजा बली के दुआरे हरी
राजा बली को अरज सुना दो , तेरे दुआरे अतिथि हरी
मांग रे वमणा जो मन ईच्छा , सो मन ईच्छा में देऊं हरी

हमको दे राजा तीन पग धरती, काँसे की कुटिया बनाऊं हरी
मांग रे बमणा मांगी नी ज्याण , के करमो को तू हीना हरी
दू पग नापो सकल संसारा , तिसरौ पग को धारो हरी
राजा बलि ने शीश दियो है, शीश गयो पाताल हरी

पांचाला देश की द्रोपदी कन्या, कन्या स्वयंबर रचायो हरी
तेल की चासनी रूप की मांछी, खम्बा का टूका पर बांधो हरी
मांछी की आंख जो भेदी जाले, द्रोपदी जीत लिजालो हरी
दुर्योधनज्यू उठी बाण जो मारो, माछी की आंख ना भेदो हरी
द्रौपदी उठी बोल जो मारो , अन्धो पिता को तू चेलो हरी
कर्णज्यू उठी बाण जो मारो, माछी की आंख ना भेदो हरी
द्रौपदी उठी बोल जो मारो , मैत घरौ को तू चेलो हरी
अर्जुनज्यू उठी बाण जो मारो, माछी की आंख को भेदो हरी
अर्जुनज्यू उठें द्रौपदी लै उठी, जयमालै पहनायो हरी

पैली शब्द ओमकारा भयो है, पीछे विष्णु अवतार हरी
बिष्णु की नाभी से कमलक फूला, फूला में ब्रह्मा जी बैठे हरी
ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची है , तीनों लोक बनायो हरी
पाताल लोक में नाग बसो है , मृत्युलोक में मनुया हरी
स्वर्गालोक में देव बसे हैं , आप बसे बैकुंठ हरी

रावत जी से निवेदन है कि यदि वह पढ़ रहे हैं तो अपना ई-मेल आई डी बतायें जो आई-डी उन्होने पिछ्ली बार छोड़ा था उस पर मेल करने से मेल वापस आ गयी.

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1. कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग

जारी …………………….

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Mar 192008
 

बाबू से बात करने के बाद परुली सोच में पड़ गयी.वह ऐसा क्या करे कि उसका ब्या रुक जाये. उसके सामने बहुत से विकल्प नहीं थे. वह एक दो बार मना जरूर कर सकती थी कि वह ब्या नहीं करेगी.लेकिन फिर भी उसके ईजा बाबू ना माने तो उसके हाथ में कुछ नहीं था और यदि उसका स्कूल जाना बंद हो गया तब…तब तो जैसे सारे रास्ते ही बंद हो जायेंगे. परुली का मन हुआ कि वह कहीं भाग जाये लेकिन कहाँ जायेगी वह उसे तो कुछ भी नहीं मालूम. वह तो अपने गांव और पास के शहर के रास्ते के अलावा कुछ भी नहीं जानती.

सामने के पहाड़ों के ऊपर से शाम धीरे धीरे उतर रही थी. घर के बहुत से काम पड़े थे. लेकिन परुली चाख के छाजे में बैठ कर सामने के पहाडों को ताक रही थी. उसके अन्दर एक तूफान उठ रहा था. वह सोच रही थी कि कितनी विवश है वह. वह जो चाहती है उसे पूरा भी नहीं कर सकती.सामने के पहाड़ों पर कुछ बत्तियां अब जलने लगीं थी लेकिन अभी परुली के घर में अंधेरा ही था. शाम को चिमनी वाला लैम्प और लम्फू जलाने की जिम्मेवारी परुली की ही थी.लेकिन आज उसे कुछ भी याद ना था. 

इधर उसके बाबू गुस्से में थे.बीढ़ी पीते हुए वह सोच रहे थे कि किसी तरह से यह ब्या हो जाये तो उनकी सांस में सांस आये.मन ही मन वह यह भी सोच रहे थे कि यदि परुली डॉक्टर बन जाये तो पूरे गांव में उनका नाम तो हो ही जायेगा. लेकिन डॉक्टर बनना कोई आसान काम तो है नहीं. छ्ह सात साल तो लगेंगे ही. फिर डाक्टर बनने के बाद बिरादरी में लड़का कहाँ मिलेगा. कोई भी लड़का यहाँ इतना पढ़ा लिखा होता ही नहीं है. बहुत से बहुत  इंटर कर लिया और लग गये कहीं नौकरी में या चले गये लखनऊ, दिल्ली. कोई ज्यादा ही अच्छा हुआ पढ़ने में तो बी.ए. कर लिया, बी.टी.सी. कर लिया और बन गये किसी स्कूल के मास्टर.परुली डाक्टर बन भी गयी तो सारी उमर कुंवारा बैठना पड़ेगा.बदनामी होगी सो अलग.लोग तरह तरह की बातें बनायेगें कि लड़की में पक्का कोई खोट होगा तभी तो इसका ब्या नहीं हो रहा.ना हो ना … इससे तो अच्छा है कि किसी तरह से ब्या हो जाये तो पिंड छूटे. 

ईजा ने अपने सर के ऊपर से हरी घास का गट्ठा भीणे (चबूतरा) में रखा तो उसकी आवाज से परुली और उसके बाबू दोनों की सोच टूटी. शाम अब पहाड़ों से उतरकर पेड़ों के रास्ते होते हुए आंगन में आ चुकी. पर्याप्त अन्धेरा हो चुका था. गोठ में गोरु-बाछ भी भूख के मारे अड़ाट कर रहे थे. उनको भी अभी तक घास नहीं डाली थी. ईजा के आते ही परुली हाथ के झूठे गिलास को लेकर उठी.

“परुली …के हगो रे तुकु (क्या हो गया रे तुझे) ..अभी तक घर में उजेला नहीं किया.”

“हाँ ..ईजा ..कर रही हूँ …”.परुली उठते हुई बोली और जल्दी जल्दी घर के सारे काम निपटाने लगी .परुली को खुद अपनी सोच पर गुस्सा आया कि घर के इतने सारे काम पड़े थे और वह ना जाने क्या सोच रही थी.

“जा ..भ्योल घुरी जा … (गुस्से में एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है) .. अभी तक गोर-बाछों को घास भी नहीं डाली.अब मैं दूध क्या तेरे कपाव से निकालूं. तेरी पढाई के चक्कर में घर का सत्यानाश हो रहा है. रुक… कहती हूँ तेरे बाबू से कि इसका स्कूल बन्द करवा दो”

जिसको देखो उसके स्कूल के पीछे पड़ा है. छारे (राख) से चाय के बर्तन मांजते हुए वह सोच रही थी कि उसका ब्या हो जायेगा तो फिर ये सब काम कौन करेगा. तब तो ईजा को ही यह सब करना पड़ेगा तो फिर अभी क्यों उसकी ईजा उस पर इतना चिल्लाती है. ठीक है …हो जाने दो मेरा ब्या …फिर पता चलेगा कि मैं कितना काम करती हूँ.वह बड़बड़ाई. 

उसके बाबू शाम से ही ईजा से एकांत में बात करने का मौका ढूंढ रहे थे.लेकिन ईजा आते ही सारे कामों व्यस्त हो गयी.रात का खान भी हो गया लेकिन बात करने का मौका ही नहीं मिला.बाबू चाख में बड़बाज्यू के साथ सोते थे. बड़बाज्यू जल्दी सो जाते थे और उनको कान भी कम ही सुनाई पड़ता था. तो आमतौर पर सोने से पहले ईजा-बाबू थोड़ी देर बात करते. तब तक बच्चे बिचाखंड (बीच वाला कमरा) में सो जाते. आज भी वही हुआ.

“हवे… सुणो त्वील (सुना तुमने) ..कि परुली क्या कह रही थी आज “

गरम दूध को ठंडा करने के लिये गिलास से लोटे में डाल कर गिलास में फूँक मारते हुए ईजा बोली…” ना हो …के कुणेछि ? ( क्या कह रही थी)”

” कह रही थी कि मैं ब्या नहीं करुंगी ..”

“किलै (क्यों) ?? ” दूध से ध्यान हटा कर बाबू की ओर हल्की से नजर उठा कर देखते हुए ईजा चौंकते हुए बोली.

” कुणै (कह रही है) कि मैं डाक्टर बनुंगी”

ईजा की जान में जान आयी.वह तो सोच रही थी कि कोई गंभीर बात है. वह फिर से दूध के काम में व्यस्त हो गयी.

“हाँ वो तो मेरे को भी कह रही थी…कहने दो हो उसे …अभी नानतिन ठहरी ..किसी टीचर ने कुछ बोल दिया तो उसके दिमाग में बात बैठ गयी….ब्या हो जायेगा तो धीरे धीरे सब भूल जायेगी….” 

” लेकिन …उसने सब पता कर रखा है कि डॉक्टरी कैसे होती है …कौन सा इम्तान देना पड़ता है…”

“अच्छा”

” और आज बता रही थी कि कोई बैक से पैसा भी मिल जाता है बल डॉक्टरी पढ़ने के लिये.”

” होश्यार तो परु हुई ही .. शिबौ-शिब ..कितनी हौस (शौक) हो रही ठहरी उसे डॉक्टर बनने की. बन जाती तो पूरे गौं (गांव) में अपना नाम तो हो ही जाता…”. दूध का गिलास और मिसरी बाबू को पकड़ाते हुए ईजा बोली.

” वो तो ठीक ही ठहरा…मन तो मेरा भी यही कह रहा है.. लेकिन डॉक्टरी करने में छ: सात साल लगने वाले हुए ..फिर कौन करेगा इससे शादी… ” . मिसरी का टपुका लगाते हुए बाबू ने कहा.

“अरे हमारी परु इतनी देखण-चाण है ..इससे तो कोई भी ब्या कर लेगा हो …”

“तू भी पगली है… अरे डॉक्टरी करने के बाद कोई इंटर पास लड़के से जो क्या कर देंगे शादी. पढ़ा लिखा लड़का भी तो चाहियेगा ना ….वह कां (कहाँ) मिलेगा.. ”

” तो फिर ….यदि पांडे ज्यू से बात करें कि वो ब्या के बाद इसे पढ़ायें तो ब्या के बाद भी तो डॉक्टर बन सकती है …परु….”

” अरे पांडे ज्यू की इतनी खेतीबाड़ी है …चार चार गोरु हैं.. उनको कौन संभालेगा. उनकी घरवाली से अब नहीं संभलता इसीलिये तो वो काम करने वाली ब्वारी (बहू) लाना चाह रहे ठहरे…ब्या हो गया तो फिर थोड़ी होने वाली हुई पढ़ाई …घर के कामों में लगी रहेगी ये तो ..और फिर ब्या के बाद तो उनकी अमानत हुई ना ….हम जोर जो क्या डाल सकने वाले हुए…जैसा वो ठीक समझेंगे करेंगे…”    

” तब तो परु को डॉक्टर बनाने के लिये उसके ब्या को रोकना ही होगा…”

“तू भी ना क्या भ्यास (मूर्खों) जैसे बात करती है…सारे बिरादरी में सबको मालूम है परु के ब्या के बारे में ..यदि अब हम मना करेंगे तो  बिरादरी में नाक कट जायेगी.. सब लोग थू थू करेंगे..परु का जीना भी मुश्किल कर देंगे… ”

“तो के करी जौ (तो क्या किया जाय ) …”

“करना क्या है … जैसे गोल्ज्यू की दया से ब्या ठीक हुआ है …ब्या कर देते हैं…उसकी किस्मत में होगा तो बन जायेगी डॉक्टर… ”

” लेकिन किसी वजह से पांडे ज्यू राठ ही ब्या के लिये मना कर दें तो बात आयी गयी हो जायेगी. ”

” लेकिन वह मना क्यों करने वाले हुए अब तो चिन्ह भी साम्य हो गया ठहरा…बस लगन निकलना बांकी है ..वह भी कुछ दिनों में निकल जायेगा”

” के तो करौ हो (कुछ तो करो जी) “

” तू पड़ जा …मैं कुछ सोचुं.. ( तू सो जा मैं सोचता हूँ )

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..

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पिछ्ले अंक में नवीन पाठक जी ने कहा कि ” काकेश दा इसको लम्बा खीच रहे है…काकेश दा…… एक दिन पुरा बुद्दवार बैठ के कहानी को अन्जाम दे दो…” तो उनसे मैने कहा था कि इस इतवार इसको पूरा लिखने की कोशिश करुंगा लेकिन इतवार को समय ही नहीं मिल पाया. इसलिये आज सुबह चार बजे उठकर लिखने बैठा. काफी हद तक कहानी लाइन पर आ रही है. सोचता हूँ कि अगले अंक में इसे खतम कर ही  दूँ. जो भी होगा परुली का देखा जायेगा. हाँलाकि पाठकों का दबाब है कि परुली डाक्टर बन जाये लेकिन जैसा पिछ्ले अंक में मनीष सिंह बिष्ट ने कहा कि वह देखना चाहते हैं कि कैसे एक पहाड़ी लड़की संघर्ष करते हुए आगे बढ़ती है. तो सच कहूँ तो मुझे इस बात की बहुत कम संभावना लगती है कि परुली डॉक्टर बन पायेगी. लेकिन कहानी में एक लेखक के पास यह शक्ति होती है कि वह परिस्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन कर पाये. तो देखें अगले बुधवार क्या होता है.

कल कुमांऊनी होली का अगला अंक प्रस्तुत किया जायेगा कृपया जरूर पधारें.