उत्तराखंड
Articals On Uttarakhand Culture.( उत्तराखंड की संस्कृति पर आधारित लेख।)
नराई हरेले की
By काकेश on July 16, 2008
कका बालकनी में बैठे हुए सामने पार्क में खेलते हुए बच्चों को देख रहे थे.साथ ही पातड़ा (पंचाग) भी देख रहे थे. मैने उनसे पूछा. "कका.. पंचाग में क्या देख रहे हो..? " "अरे देख रहा था हरेला कब है. भोल (कल) हरेला है." "ओ..कल है! कका बताइये कल क्या क्या करना है. " "अरे [...]
Posted in नराई, उत्तराखंड | 34 Responses
पर्वतीय क्षेत्र की शास्त्रीय होली
By काकेश on May 23, 2008
डार द्रुम पलना,बिछौना नवपल्लन केसुमन झँगूला सौहे तन छवि भारी देंमदन महीपजू को बालक बसंत प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दे. – कविवर देव पिछ्ले अंक में हमने होली में शास्त्रीय होली की बात की थी आज उसे ही आगे बढ़ाते हैं. कुछ लोग मानते हैं पर्वतीय क्षेत्र में और विशेषकर कुमाऊं में होली की शुरुआत [...]
Posted in उत्तराखंड | 7 Responses
हम मैहनतकश जग वालों से
By काकेश on May 1, 2008
शाम को जब युनुस भाई की पोस्ट पर फैज की रचना का जिक्र सुना तो अपना खजाना देखा कि यह रचना तो मेरे पास थी ही और वह भी ‘गिरदा’ की आवाज में. ‘गिरदा’ ने यह रचना पिछ्ले साल दिल्ली में एक कार्यक्रम में गाई थी और सौभाग्य से उस कार्यक्रम में मैं भी शामिल था. मैने तब वह रचना रिकॉर्ड कर ली थी.
Posted in पॉडकास्टिंग, उत्तराखंड | 15 Responses
परुली: आज शादी है.
By काकेश on April 16, 2008
आज परुली बहुत खुश थी.आज उसकी बारात जो आने वाली थी. उसकी सखियाँ उसे तैयार करते करते बार बार उसे चिढ़ाती और परु इस बात का बुरा भी नहीं मानती.सर में माँगटीका, नाक में नथ, हाथों में पहुंची और पिछोड़ा ओढ़ी हुई परु बहुत सुन्दर लग रही थी. बारात आने में अभी देर थी. परुली [...]
Posted in कहानी, उत्तराखंड | 20 Responses
परुली : यह कैसी बीमारी?
By काकेश on April 9, 2008
“परु तो जर से हणक रही है हो.” (परु को तेज बुखार है). परुली की ईजा ने जजमानी के लिये निकलते हुए जोस्ज्यू से कहा. “ठीक है मैं गड़वा बॉज्यू के वहां से ब्याव को (शाम को) मिक्सचर लेते आउंगा.” परुली स्कूल भी नहीं गयी. दिन भर बुखार से तपती रही. उसकी ईजा ने ही [...]
Posted in कहानी, उत्तराखंड | 12 Responses
परुली : अभी नानतिन ही हुई हो
By काकेश on April 2, 2008
मलगाड़ से लौटते समय जोसज्यू सोच रहे थे कि पांडे ज्यू का कहना भी सही ही ठहरा. परुली तो अभी नानतिन ही हुई. उसे अभी अकल जो क्या हुई अरे हम लोगो को ही उतनी अकल जो क्या ठहरी. पांडे ज्यू की रिश्तेदारी तो लखनऊ, दिल्ली सभी जगह ठहरी. वह बराबर दिल्ली, लखनऊ जाते रहने [...]
Posted in कहानी, उत्तराखंड | 19 Responses
कुमांऊनी होली: छालड़ी के रंग
By काकेश on March 27, 2008
छालड़ि का एक प्रमुख हिस्सा होता है अशीष (आशीर्वाद) देने का. हर घर में होली गाने के बाद होली का मुखिया अपने साथियों के साथ घर के मुखिया और उसके पूरे परिवार को लाख बरस जीने का आशीर्वाद देता है. यह आशीर्वाद पहले एक गाने के रूप में सभी देवताओं को दिया जाता है.
Posted in उत्तराखंड | 9 Responses
परुली:ब्या टालने की उहापोह
By काकेश on March 26, 2008
जोस्ज्यू तुम्हारी तो मति मारी गयी है.इतना अच्छा घर कहाँ मिलेगा परुली को. चिंन्ह भी कैसा बढिय़ा साम्य हुआ ठहरा. शादी ब्या तो अंजल (संजोग) की बात होने वाली हुई. पहले तो डॉक्टर बनना ही कितना मुश्किल हुआ फिर परुली को डॉक्टर बना भी लिया तो कौन सा उसको जनम भर अपने घर में रख लोगे. ब्या तो तब भी करना ही पड़ेगा ना.
Posted in कहानी, उत्तराखंड | 25 Responses
कुमांउनी होली: भक्ति भी,अश्लीलता भी
By काकेश on March 20, 2008
घर के सदस्य घर के खिड़कियों जिन्हे पहाड़ में छाजा कहा जाता है उससे रंग वाला पानी डालते हैं. तब बढ़े-बूढ़े आगे पीछे हो जाते हैं और युवा लोग मोर्चा संभालते हैं और भीगते भीगते चिढ़ाने के लिये होली गाते रहते हैं.इसमें थोड़ी अश्लीलता का पुट भी कभी कभी आ जाता है जैसे…
Posted in उत्तराखंड | 18 Responses
परुली : ब्या कैसे टलेगा
By काकेश on March 19, 2008
ईजा ने अपने सर के ऊपर से हरी घास का गट्ठा भीणे (चबूतरा) में रखा तो उसकी आवाज से परुली और उसके बाबू दोनों की सोच टूटी. शाम अब पहाड़ों से उतरकर पेड़ों के रास्ते होते हुए आंगन में आ चुकी. पर्याप्त अन्धेरा हो चुका था. गोठ में गोरु-बाछ भी भूख के मारे अड़ाट कर रहे थे. उनको भी अभी तक घास नहीं डाली थी. ईजा के आते ही परुली हाथ के झूठे गिलास को लेकर उठी.
Posted in कहानी, उत्तराखंड | 24 Responses