Jul 162008
 

कका बालकनी में बैठे हुए सामने पार्क में खेलते हुए बच्चों को देख रहे थे.साथ ही पातड़ा (पंचाग) भी देख रहे थे. मैने उनसे पूछा.

"कका.. पंचाग में क्या देख रहे हो..? "

"अरे देख रहा था हरेला कब है. भोल (कल) हरेला है."

"ओ..कल है! कका बताइये कल क्या क्या करना है. "

"अरे यहां शहर में क्या हुआ. पहाड़ में होते तो कल बोया हुआ हरेला काटते,सर में हरेला लगाते, डिकारे बनाते, मातृका पट्टा पूजते. यहां ये सब जो क्या होने वाला ठहरा. बस शगुन का बड़ा बना देंगें. अपनी ईजा को बोल कि कल बड़ा बनाने के लिये रात से मास (उड़द की दाल) भिगो देना."

कका की बातों से थोड़ी निराशा झलक रही थी. मैने उनसे पूछा.

harela

"कका बताओ ना… ये हरेला क्या होता और पहाड़ में हरेला कैसे मनाते है. "

कका तो जैसे तैयार ही बैठे थे.

"अब क्या बताऊं भुला.पहाड़ की बात ही कुछ और हुई. हरेला साल में तीन बार मनाया जाने वाला हुआ. एक तो चैत (चैत्र) के महीने में,दूसरा सौण (श्रावण) में और तीसरा असोज (आस्विन) में. जिस दिन हरेला होता है उसके नौ-दस दिन पहले पांच या सात प्रकार के बीजों को एक टोकरी,थाली या पुराने मिठाई के डब्बे में मिटटी डाल के बो दिया जाता है."

"कका ये कौन कौन से बीज होते हैं."

"अरे घरपन जो बीज मिल गये सबको बो दिया जाने वाला हुआ. जैसे गेहूं, धान, जौ, भट्ट,जुनाव (मक्का),मादिरा, राई, गहत, मास (उड़द),चना, सरसों. जो हाथ पड़ गया.इसका कोई खास विधान नहीं हुआ. लेकिन यह विषम संख्या पांच या सात होने चाहिये. फिर इन सबके ऊपर मिटटी डाल के उस टोकरी या थाली को घर में ही द्याप्ताथान (मन्दिर) में रख दिया जाता है. हर दिन पूजा करते समय थोड़ा थोड़ा पानी छिड़का जाता है. तीन-चार दिन के बाद उन बीजो में से अंकुर निकल जाते है.इन्हे ही हरयाव (हरेला) कहा जाता है.नौवे या दसवे दिन इनको काटा जाता है.जैसे चैत वाला हरेला चैत के पहले दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है. सौण का हरेला सौण लगने से नौ दिन पहले अषाड़ में बोया जाता है और दस दिन बाद काटा  जाता है. असोज (आश्विन) वाला हरेला नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरे  के दिन काटा जाता है."

"ओ…लेकिन हरेला मनाया क्यों जाता है कका."

"भुला हमारी लोक-संस्कृति में बहुत सी चीजें.. वो क्या कहते हैं… साइंटिफिक तरीके से बनायी गयी ठहरी."

"वाह कका आप तो अंग्रेजी भी बोलने लगे."

"तीन हरेले तीन मौसमों के आने की सूचना देने वाले हुई. चैत का हरेला मतलब गरमी आ गयी,सौण का हरेला मतलब बरसा का मौसम आ गया और असोज का हरेला मतलब …"

"ठंड का मौसम शुरु हो गया."

"बिल्कुल सही."

"लेकिन आप कह रहे थे ना आप लोग डिकारे बनाते थे. वह क्या होता है कका."

"बताता हूँ चेला वह भी बताता हूँ. पहले अपनी ईजा को बोल ना एक गिलास चहा बणै दे."

"ठीक है."… मैंने माँ को चाय बनाने को कहा और आकर फिर कका के पास बैठ गया.

"सौण (श्रावण) महीने के हरेले का विशेष महत्व होने वाला हुआ. यह महीना तो शंकर जी का महीना हुआ. इसलिये इस हरेले को कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है.तो सौण वाले हरेले में मिट्टी से शिव ज्यू का पूरा परिवार बनाया जाने वाला हुआ और फिर उसकी पूजा की जाने वाली हुई."

"मिट्टी से! ..मिट्टी से कैसे."

"अरे डिकारे का मतलब ही हुआ प्राकृतिक चीजों का प्रयोग कर मूर्तियाँ बनाना…. तो डिकारे ऐसी ही चीजों के बनाये जाने वाले ठहरे.बचपन में हम लोग लाल मिट्टी लेकर आने वाले ठहरे और फिर महीन कर उसमें रुई मिला कर सानने वाले हुए.उसे थोड़ी देर छोड़ देने वाले हुई. फिर उसी मिट्टी से शिव ज्यू, पार्वती ज्यू और गणेश बनने वाले हुए.बांकी तो लोग अपनी मर्जी से देवी-देवता बना लेने वाले हुए.कुछ लोग केले के तने और पत्तों से भी मूर्ति बनाने वाले हुए. डिकारे बनाकर उनको हलकी धूप या छाया में सुखाया जाने वाला हुआ ताकि उसके चटकने का डर ना हो.सूखने के बाद चावल के विश्वार (घोल) से हल्के सफेद रंग का लेप करने वाले हुए.कई बार गोंद मिले रंग भी लगाये जाने वाले हुए. पहले से तो रंग भी घर में बन जाने वाले हुए.ये रंग किलमोड़े के फूल, अखरोट व पांगर के छिलकों से बनने वाले हुए.काला रंग बनाने के लिये कोयला पीस देने वाले हुए.आजकल तो बाजार में मिलने वाले सिन्थेटिक रंग ही प्रयोग में लाये जाते हैं.फिर उन रंगों से देवी-देवताओं के आंख,नाक,मुँह बनाने वाले हुए."

"तो फिर डिकारों में नाक,मुँह बनाने के लिये कोई ब्रश वगैरह यूज करते हैं क्या." ..मुझे जिज्ञासा हुई.

"बुरुश कहां मिलने वाला हुआ.हम या तो लकड़ी की तीलियों से रंग करने वाले हुए या माचिस की तीली में रुई लगाकर उससे रंग भरने वाले हुए."

"और हरेले के दिन क्या क्या होता है ?"

"हरेले वाले दिन घर में पूरी,पकवान जैसे पुआ,बड़ा बनाये जाते हैं.हरेला काटने के बाद इसमे अक्षत-चंदन डालकर भगवान को लगाया जाता है.मंत्रोच्चार किया जाता है रोग शोक निवारणार्थ प्राण रक्षक वनस्पते, इदा गच्छ नमस्तेस्तु हर देव नमोस्तुते. फिर घर के सभी सदस्यों को हरेला लगाया जाता है. हरेला लगाने के लिये सर व कान पर हरेले के तिनके रखे जाते है.एक दूसरे को "जी रया, जागि रया यो दिन यो मास भेटने रैया" कह के आशीर्वाद दिया जाता है. छोटे बच्चो को हरेला पैर से ले जाकर सर तक लगाया जाता है."

"हाँ मुझे याद है जब में छोटा था तो आमा ऐसे ही लगाती थी और साथ में कुछ मंत्र जैसा भी कहती थी."

"हाँ सबके दीर्घायू होने की कामना की जाती है और कहा जाता है."

लाग हरेला, लाग बग्वाई,
जी रए, जाग रए.
स्याव जस बुद्धि हैजो, सूर्ज जस तरान हैजो 
आकाश बराबर उच्च है जै, धरती बराबर चकाव है जै
दूब जस फलिये
हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पानी छन तक
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये

"इसका मतलब क्या हुआ कका."

इसका मतलब हुआ कि "तुझे यह हरेला मिले,जीते रहो,जागरूक रहो,तुम्हारी सियार के समान तेज बुद्धि हो,सूर्य के समान त्राण हो,तुम आकाश के समान ऊंचाइयां छुओ, पृथ्वी के समान धैर्ययुक्त बनो, दूर्वा के तृणों के समान पनपो,जब तक हिमालय में हिम रहे गंगा नदी में पानी रहे तब तक जियो,इतने दीर्घायु हो कि तुम्हें भात भी पीस कर खाना पड़े (दांत टूट जाने पार) और शौच जाने के लिए भी लाठी का उपयोग करना पड़े."

"वाह यह तो बहुत अच्छी कामना है."

"और हरेले के पीछे एक मतलब और भी है कि हम प्रकृति का सम्मान करें,आदर करें.कुछ इलाकों में हरेले के दिन नये पेड़ लगाये जाते हैं.हरेला वैसे तो कुमाऊं का मुख्य त्यौहार है लेकिन यह गढ़वाल में भी मनाया जाता है,वहां इसे हरियाली पर्व कहा जाता है."

"मुझे याद है बेटा… बचपन में तो हरेले के दिन गोठ के जानवरों को भी हम हरेला लगाने वाले हुए.अपने नाते-रिश्तेदारों को लिफाफे में सूखा पिठ्या,अक्षत और हरेले के तिनड़े (तिनके) भेजने वाले हुए.साथ में लिखने वाले हुए "आज हरेला भेज रहे हैं सिरोधार्य करना".चिट्ठी मिलने पर हरेला सिर पर रखने वाले भी हुए.हरेले के दिन कान में हरेला लगा कर बढ़े-बूढ़ों का आशीर्वाद लेकर स्कूल जाने वाले हुए."

तब तक चाय आ गयी.कका चाय लेकर पीने लगे और पुरानी यादों में खो गये.मैं भी कका को उन यादों के साथ छोड़कर चल दिया.मुझे हरेले के बारे में कई नई बातें पता चल गयीं थी. 

====

आप सभी को हरेले की शुभकामनाऐं.

Feb 062008
 

दिल्ली की बढ़ती ठंड को देख मुझे इच्छा हुई कि मैं कका से पूछूं कि पहाड़ में जब कड़ाके की ठंड पड़ती थी या बरफ पड़ती थी तो कैसा माहौल होता था और कैसे लोग उस ठंड का सामना करते थे.

क्या बताऊँ भुला… पहाड़ में ठंड तो यहाँ की ठंड से भौते ज्यादा हुई लेकिन वहाँ इस तरह के इनजाम हुए कि इतनी ठंड लगने वाली ही नहीं ठहरी. हां हम जैसे बुड़-बाड़ियों (वृद्ध) के लिये थोड़ी परेशानी होने वाली हुई लेकिन बुड़-बाड़ियों के लिये घर में मेथी के लाड़ू (लड्डू) बन जाने वाले हुए जो ठंड में बहुत काम आने वाले हुए और बुड़बाड़ी एक सगड़ (छोटी अंगीठी) में आग तापते हुए क्वीड़ करने वाले हुए.पीतल के गिलास में गुड़ की टपुक के साथ सुड़ुक सुड़ुक चहा पीने वाले ठहरे. जाड़ों में पुरानी लोहे वाली बाल्टियों को काटकर लोग अंगीठी बना लेने वाले हुए और उसी में कोयले जला लेने वाले हुए.ऑफिसों में भी वही अंगीठी जलने वाली हुई. जाड़ों का खाना भी गरम तासीर वाला हुआ.अधिकतर सब्जियों में भांगा पड़ने वाला हुआ.गडेरी की भांगा डाली हुई सब्जी या लाई की भांगा डाली हुई सब्जी बहुत खायी जाने वाली हुई. घर भी ऎसे हुए कि उनमें उतनी ठंड थोड़े लगने वाली हुई.पटाल की तिरछी छ्त,बड़ी सी खोली, खोली का मोटे लकड़ी वाला दरवाजा,चाख, मिट्टी के फर्श,कम ऊंचाई वाले गोठ.अब ऎसे में ठंड कहां लगने वाली हुई.गोरु-बल्दों के लिये पिरूल बिछा देने वाले हुए गोठ में.

पहनने के लिये बास्कट हुआ और दो टांग का पजामा (इनर) हुआ..टोपी हुई..दस्ताने, ऊनी मौजे , मफलर हुआ.एक मेरा दगड़िया ठहरा पदम सिंह.उसके लिये तो जाड़े और भी अच्छे हुए.उसने तो एक चिलम जलाई. कभी कभी उसमें अत्तर (चरस) भी डाल देने वाला हुआ -अत्तर तो तब घर घर में रहने वाली हुई,आज का जैसा जो क्या ठहरा.लेकिन लोग उसे दवा की तरह इस्तेमाल करने वाले हुए.अत्तर तो कभी कटे-फटे में खून को रोकने के काम आने वाले हुई. हां तो पदमुवा बम बम भोले कहते हुए चिलम पीने वाला हुआ. मेरे से कहने वाला हुआ “दाज्यू एक सूट्टा मारो हो सब ठंड गोल हो जायेगी”. अब पता नहीं उससे ठंड गोल होने वाली हुई या नहीं लेकिन पदम सिंह का कहना हुआ भोलनाथ ज्यू की बूटी है सारी ठंड भगा देती है.

जब भी ह्यूं (बरफ) पड़ने का माहौल होता था उससे पहले कुछ दिनों द्यो (बारिश) होने वाला हुआ. ह्यूं से पहले बजरी जैसी गिरने वाली हुई जिसे बड़े लोग “बरम्याऊ” कहने वाले हुए तब जा के ह्यूं पड़ने वाला हुआ.उस समय माहौल एक दम शांत हो जाने वाला हुआ.आकाश से रुई के गोले जैसे गिरने वाले हुए. धिनाई (ब्याई हुई गाय) तो तब सभी घरों में होने वाली हुई. हम लोग एक कान्से की थाली में थोड़ा मलाई वाला दूध लेकर बाहर रख देने वाले हुए वह जब जम जाने वाला हुआ तो उसे ही खाने वाले हुए. कैसा तो दिखने वाला हुआ पूरा शहर तब.सब कुछ सफेद सफेद हो जाने वाला हुआ.पेड़,पहाड़,जमीन,छ्त सब एक दम सफेद. जैसे सब जगह सफेद चादर बिछी हो. बरफ के रुक जाने पर नानातिना (बच्चे) बरफ के गोले बनाने वाले हुए…एक दूसरे पर फैकने वाले हुए. कोई कोई कलाकार लोग बरफ की मूर्तियां भी बना लेने वाले हुए.ये मुर्तियां पन्द्रह पन्द्रह दिन तक नहीं गलने वाली हुई.

बरफ पड़ने के बाद धूप निकलने वाली हुई.तब ठंडा बढ़ जाने वाला हुआ. लेकिन नौले का पानी उस समय भी गरम लगने वाला हुआ.तब कोई आज की तरह बाथरूम जो क्या हुए.बाहर पटागंण में ही नहाने वाले हुए.हम जनेऊ पहनने वालों को तो नहाना जरूर पड़ने वाला हुआ.बिना नहाये हुए तो खाना ही नहीं खाना ठहरा तो चाहे ह्यूं पड़े चाहे द्यो रोज नहाना हुआ.देवी कवच का पाठ करते करते नहा ही लेने वाले हुए.

तुम लोग तो इस दिल्ली की ठंड से परेशान हो जाते हो.हमने देखी ठहरी यार वो पहाड़ वाली ठंड. तुम तो बस टीवी में ही ह्यूं देखकर कांपने लगते हो. जिसने पहाड़ में रहकर पहाड़ का ह्यूं नहीं देखा क्या देखा. जब हम लोग जवान थे तो एक कमीज पहनके निकल जाने वाले हुए फावड़ा ले के ह्यूं साफ करने.. तब गरम खून हुआ आजकल के छोकरों की तरह थोड़े…

मुझे लगा कि कका अभी अपनी फसक-फराल (गप) शुरु करेंगे तो मुझ समेत मेरी पूरी जनरेशन की ऎसी तैसी करने लगेंगें..इसलिये मैं उन्हे प्रणाम कर वहां से धीरे से कट लिया..कका हीटर में हाथ सेंकते सेंकते पुरानी यादों में खो गये……

अब देखिये इस साल के हिमपात का वीडियो सुभाष कांडपाल जी के सौजन्य से.

अन्य लेख :

केमो बस की सर्-रर प्वां प्वां..

आमा और जंबू का धुंगार..

नराई ठंड की …

नराई के बहाने सिर्फ नराई

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: नराई, पहाड़, उत्तराखंड, काकेश

Technorati Tags: नराई, पहाड़, उत्तराखंड, काकेश, kakesh, hindi blogging, narai, uttarakhand

Jan 302008
 

बस पहाड़ी रास्तों पर हाँफते धीमे रफ्तार डीज़ल का धुँआ उगलते चढ़ रही है.केमो* की उस बस में बैठते ही उसे लगा था कि वह जैसे अपने घर पहुंच गया.ट्रेन की सारी रात की थकन बस में अपना सूटकेस रखते ही जैसे उड़न छू हो गयी. उन टेढ़े मेढ़े,ऊंचे नीचे रास्तों में हिचकोले खाती बस एक के बाद एक मोड़ों पर हॉर्न देते हुए ठिठक ठिठक कर चल रही थी. एक तेरह चौदह साल की लड़की उलटी कर करके परेशान है. वो लोग सैलानी हैं शायद. लड़की की माँ सब जतन कर हार गयी लेकिन उलटी रह रह कर हो ही जाती है.वो याद करता कि जब वह अपनी ईजा (माँ) के साथ कभी ऎसे ही केमो की गाड़ी में जाता था तो उसकी माँ उलटी जैसी कुछ शिकायत होने पर माल्टा (संतरे जैसा एक फल) चूस लेती और उलटी रुक जाती.

बस की खिड़की से बाहर जैसे सब कुछ चलचित्र की भांति चल रहा है.बरफ से ढके पहाड़, उनके नीचे छोटी छोटी चोटियाँ, चीड़ देवदारु के जंगल और उनके नीचे छोटे छोटे गांव,स्कूल से घर लौटते बच्चे किसी छोटे पत्थर या पांगर के दाने को पैर से फुटबाल की तरह लुढ़काते, दातुले को अपनी कमर में खोस कर सिर पर हरी घास का गट्ठा लाते पहाड़ी औरतें, कहीं किसी जंगल में गाय चराते लड़के,उसी जंगल के बीच भूमिया देवता का मंदिर, किसी गाढ़ (छोटी नदी) के किनारे चलता हुआ घट (पनचक्की), किसी चाय की दुकान पर फसक (गप) मारते कोई ठुलबाबू (ताऊ जी).

एक मोड़ आया तो चीड़ का जंगल शुरु हो गया. चीड़ के जंगल उसे हमेशा से ही बड़े मोहित करते रहे हैं.बचपन में अपनी ईजा के साथ पिरूल लेने जाता तो चीड़ के टूटे फूल ले आता जिसे ऊन में बांध कर सारे पटांगड़ में चलाता रहता और कहता कि यह मेरी बकरी है. चीड़ के पेड़ की देह पर चीरा लगाकर बनाये लीसा निकालने वाले खप्पर भी उसे आकर्षित करते कि यह है क्या जिससे यह चिपचिपा पदार्थ निकल रहा है.ये तो उसे बाद में पता चला कि ये लीसा है जो तारपीन तेल बनाने के काम आता है.

ड्राइवर का हाथ सधा हुआ है. वह मोड़ों पर बड़ी आसानी से बस को मोड़ देता है. सैलानी लड़की खिड़की से बाहर नीचे गहरी घाटी देखती तो एक अनजाने भय से सिहर जाती है.लेकिन ड्राइवर के चेहरे पर कोई भाव नहीं. बस का कंडक्टर बीड़ी फूंक रहा है और साथ ही किसी डेली पसैंजर से बात भी कर रहा है. “पदम ज्यू आज बोरे में क्या भर लाये हो?”… “कुछ नहीं चेला… बस लाई के पत्ते और नीम्बू है यार.”…..बीड़ी खतम कर वह शहर के कंडक्टरों की तरह दरवाजे से नहीं लटकता बल्कि अपनी सीट में बैठ कर अपने रैक्सीन के थैले में रखे पैसों का हिसाब करने लगा है.पैन उसने अपने कान के ऊपर रख रखी है. कभी किसी सवारी को उतरना होता तो वो दरवाजे के पास लटकती रस्सी को खींच देता और ड्राइवर के पास घंटी बज जाती और वह गाड़ी रोक देता. कंडक्टर का हिसाब शायद पूरा हो चुका है. पदम दत्त जी भी उतर चुके हैं.बीच बीच में कंडक्टर अपनी माशूका की याद भी आ जाती जिसके लिये पिछ्ले हफ्ते ही वो गोल्ल ज्यू के मंदिर में घंटी चढ़ाने की मन्नत मांग कर आया था.

लगभग आधा रस्ता कट चुका है. उसे अब चाय की तलब लग रही है.वह सोच रहा कि कब ड्राइवर ज्यू गाड़ी रोकें और वह पहाड़ी रायते और पकोड़ी का स्वाद ले और साथ में गरमा गरम चाय भी. वह सोच ही रहा था कि एक झटके से गाड़ी (बस) रुक गयी. ‘चाय-पानी पी लो हो फटाफट’ …कंडक्टर बस से उतरते उतरते बोला. वो भी उतरा. सामने वही चिर परिचित दुकाने और उनमें आलू के गुटके, काले चने, प्याज की गरमा गरम उतरती पकोडियां , पहाड़ी रायता. उसके मुँह में हमेशा की तरह पानी आ गया.वह रायता-पकोड़ी का ऑर्डर देकर बैठ गया. पार्श्व में  पहाड़ी गाना बज रहा था…”टक टका टक कमला बाटुली लगाये…”.रायता-पकौड़ी के अनोखे स्वाद के बीच उसे भी अपनी कमला याद आने लगी. ….अब तो बस आधा ही सफर और बांकी था…..

======================================

के.मो.ओ.यू. (KMOU) : कुमाऊँ मोटर्स ओनर्स यूनियन की प्राइवेट बसें जिन्हे उत्तराखंड के पहाड़ों में केमो की बस के नाम से जाना जाता है.

======================================

साथ में बोनस के रूप में सुनिये नरेन्द्र सिंह नेगी का गाया गढ़वाली गीत. “चली बे मोटर चली…सर-रर..प्वां..प्वां……”

Get this widget | Track details | eSnips Social DNA

ऊपर वाला गाना तकनीकी समस्या के कारण थोड़ा फास्ट सुनायी दे रहा है. जल्दी ही इसे ठीक करता हूँ.

तब तक आप यह गाना सुनिये….”टक टका कमला बाटुली लगाये…” …मस्त गाना है… जरूर सुनियेगा….

Get this widget | Track details | eSnips Social DNA
Jan 232008
 

कल से तो सतझड़ (बारिश होना) पड़ रहे हैं भुला. सारे लकड़ी, गुपटाले भीग गये हैं. चूल्हा जलाने में धुंआ तो होगा ही. आमा (दादी) चूल्हे में फूंक मारते मारते अपने नाती को समझा रही है. लेकिन नाती जो अभी मात्र पांच साल का ही है उसे इस सतझड़ और गुपटालों (उपले)  से क्या मतलब. वो तो हाथ में कटोरी ले के आ गया गोठ (नीचे का कमरा) में जहाँ रसोई भी है. भुला की आंखों से धुंए के कारण पानी निकल रहा है लेकिन वो फिर भी रसोई में खड़ा है.

आमा दाल-भात दे ना.भुला बोला…. भुला की नाक से सिंगाणा निकल रहा है. जिसे वो बार बार अपने कमीज की बांह से पोछ लेता था.

अल्ल द्यूँ चेला..बनने तो दे. वैं (वहीं) बैठ जा

आमा धोती लगा के खाना बनाती थी …इसलिये रिस्या में किसी को नहीं आने देती थी. अपने चारों ओर कोयले से एक लकीर खींच देती थी और किसी को भी उस लकीर के अन्दर पांव छूने की भी छूट नहीं थी. आज आमा ने पालक का कापा और दाल बनायी थी. दाल बन चुकी थी बस जम्बू का धुंगार लगाना बांकी था.चावल बन रहा था. आमा ने पतीली का ढ्क्कन निकाल कर चावल को पणुवे से चलाया. चावल के दो दानों को हाथ से मसल कर देखा. …और किसी तरह से फूंक मार मार कर चूल्हा जलाया… लकड़ियों को ऊपर कर आंच तेज की.भुला हाथ की कटोरी को एक छोटी लकड़ी से बजाता हुआ वहीं बैठ गया.

आमा को सोच पड़ गये.बाहर धीमे धीमे द्यो (बारिश) पड़ रहा है. ऎसी बारिस में गोरू-बल्दों के लिये सूखी घास का इनजाम पहले से करना होगा.अच्छा किया ब्वारी (बहू) को रतैब्याण ही जंगल में भेज दिया. कुछ हरी घास काट के ले आयेगी तो गोठ में रखी सूखी घास थोड़ी ज्यादा चल जायेगी…. नहीं तो फिर वो नये वाले लूटे से घास निकालनी पड़ेगी. तीन दिन से मोव (गोबर) भी नहीं निकाला.थोड़ा द्यो कम हो तो आज मोव निकाला जाय.हाथ के सारे पैसे भी खतम हो गये. खिमुवा का मनीआर्डर आने में तो अभी और दस दिन में बांकी है. आज बुबु (दादा) किसी जजमानी में जायें तो कुछ पैसा मिले. अभी हरिया को पैसे भी देने है. पिछ्ले हफ्ते मडुवा पिसाया था ना. …खिमुवा की चिट्ठी आये भी पन्द्रह दिन से ऊपर हो गये.सब कुशल ही होगी. ये फौज की नौकरी भी ना एकदम बेकार है… एक साल से खिमुवा घर नहीं आया. इस बार आयेगा तो उसको बोलुंगी..क्या फायदा ऎसी नौकरी का..अब यहीं रह जा..यहीं कोई छोटी मोटी दुकान खोल ले नहीं तो कही चपरासी की नौकरी ही कर ले.. शायद मान जाये… लेकिन कहीं वो अपने दगड़ुवों के चक्कर में पड़ गया तो..रोज शाम को सब शराब पीके आते हैं फिर अपनी सैणी (पत्नी) को मारते हैं.. ना हो ना..उससे तो मेरा खिमुवा ही अच्छा..साल में एक बार घर आता है तो सब उसकी कितनी इज्जत करते हैं..सबको वो मिलट्री के रम की बोतल दे देता है तो साल भर सब उसके गुणगान करते है.. कल ही चिमुली के बौज्यू ब्वारी से कह रहे थे.. धुल्हैणी (बहू) ..कब आ रहा है हो खिमुवा….वो भी अपनी रम की बोतल के जुगाड़ में होंगे…

तभी चावल उबल कर उसका पानी चूल्हे में गिरने लगा. छ्यां की आवाज से आमा की तंद्रा भंग हुई.

लगता है चावल पक गया. आमा पतीली को हटा जंबू के धुंगार की तैयारी करने लगी.

सामने भुला लिपी हुई जमीन में कोयले से कोई नयी आकृति बना रहा था.

Nov 012007
 

[पहाड़ की ठंड का अपना एक अलग ही आनन्द है. इस आनन्द को वही महसूस कर सकता है जिसने इसको जिया है,एक टूरिस्ट की भांति एक-दो दिन के लिये नहीं बल्कि कई दिनों तक. उस पर से पहाड़ी भाषा,जो मूल रूप से कुमांउनी या गढ़वाली बोली के रूप में जानी जाती है,उसकी अपनी अलग ही मिठास है..पहाड़ी भाषा में बोलने वाला यदि हिन्दी भी बोलेगा तो उसका अपना एक अलग ही अन्दाज होगा. उसमें पहाड़ी के शब्द तो आयेंगे ही साथ ही एक नये तरीके के वाक्य-विन्यास की भी रचना होगी. लीजिये आज उसी का एक नमूना प्रस्तुत है.यह एक अधेड अप्रवासी व्यक्ति से की गयी काल्पनिक बातचीत है जो अपने घर को छोड़ कर अपने भाई भतीजों के साथ मैदानी इलाके में रह रहा है.कुछ शब्दों के अर्थ हो सकता है आपकी समझ में ना आयें.हाँलाकि मैने कहीं कहीं शब्दों के हिन्दी पर्याय भी लिख दिये हैं फिर भी कोई समस्या हो तो टिप्पणियो से बतायें. ]  

मैने कका से पूछा.कका कुछ पहाड़ की ठंड के बारे में भी बताओ ना.

अब क्या बताऊं भुला.. ठंड वो भी पहाड़ की …सुनके ही जैसे ठंड लग जा रही है हो….गरम कपड़े तो लगभग साल भर निकले ही रहने वाले हुए …थोड़े से द्यो की तोप ( बारिश की बूंदें) क्या पड़ी तो कंबल रजाई सब निकल जाने वाली हुई.पांच पांच किलो की रजाई होने वाली हुई वहाँ तो ….यहाँ कि चाव (कपड़े का टुकड़ा) जैसी रजाई से काम थोड़े चलने वाला हुआ. पंत ज्यू अपना बास्कट निकालने को जैसे तैयार ही ठहरे बल. द्यो पड़ा और उनका बास्कट,बंद गले का कोट निकल जाने वाला हुआ.कानों को मफलर से ढंक कर,हाथों में ऊन के दस्ताने पहने पांडे ज्यू गूड़ की टपुक के साथ घर में चहा पीने वाले ठहरे और ऑफिस में घाम (धूप) सेकते सेकते फसक (गप) मारने वाले ठहरे.काम ना करने के जितने paharबहाने ले लो उनसे.

‘अब इतने जाड़े में कैसे काम होने वाला ठहरा.हाथ की उंगलियां जैसे पताल चली गयी हैं. मुँह से सांस की जगह भाप निकल रही है.ला हो बिसन सिंह एक चहा और पिला यार.‘ पूरा दिन जैसे चाय पीने और घाम सेकने में ही निकल जाने वाला हुआ.

तेरी काखी (चाची) का हाल भी बुरा हुआ.सुबह उठ कर पहला काम हुआ बाहर पटांगण (आंगन) में चूल्हा जलाना. वो छिलुके से पहले चूल्हा जलायेगी और फिर पानी गरम करने वाले डेक (भगोना) को पानी से भर कर रख देगी. अब उस समय ना तो गैस हुई ना ही पानी गरम करने के लिये गीजर.ये सब तो आजकल के साधन हुए भुला हमारे जमाने में ये सब कहाँ हुआ.फिर नौले से फौंले (तांबे की गगरी) में सर में रखकर पानी लाने वाली हुई तब ताजे पानी से चाय बनने वाली हुई.ज्यादा ठंड हुई तो मेथी भूंट के उसकी चाय बना ली.तू तो तब छोटा ही था रे.तू तो तब सात सात दिन तक बिना नहाये हुए रहने वाला हुआ. बस मुँह धो के स्कूल चला जाने वाले हुआ.

बनियान (स्वेटर) उस समय हाथ से बुनी जाने वाली हुई.यह आजकल के मशीन वाले स्वेटर जो क्या हुए उस समय. पुराने स्वेटरों को उधाड़ कर रंग बिरंगी स्वेटर घर-पन के लिये और बजार के लिये खजूरे के डब्बे जैसी बुनाई वाला स्वेटर. जाड़ों में तो तुम लोगों की छुट्टी हो जाने वाले ठहरी . तू तो भींणे में घाम की झलक दिखी नहीं वहीं पर खड़ा हो जाने वाला ठहरा.

आदमी लोगों के ऑफिस जाने के बाद औरतों का काम जल्दी जल्दी पूरा होने वाला हुआ.औरतें पटांगण में बैठ के भान (बरतन) माजने वाली ठहरी फिर गोरु,बल्द हका के, मोव-वोव निकाल के गुपटाले पाथने वाली ठहरी. सब काम होने के बाद दिन का कुछ समय मिलने वाला हुआ ‘क्वीड़’ (बातें) करने के लिये. उसमे भी एक दूसरे की बुनाई देखने और इधर उधर की कितनी तो बातें हुई. ‘अभी तो महालछ्मी के ऎपण भी देने हैं हो मुन्ना की ईजा. मैं बिस्वार पीस दुंगी फिर साथ ही मिल के दे देंगे.एक दिन तुमारा द्याप्ताथान (मंदिर) हो जायेगा एक दिन हमारा कर देंगे.’ या फिर ‘ चलो रे नीबू सानते हैं …जा रे हरिया एक निमू तोड़ ल्या तो और दुई जाड़ मुलैक लै लिये.’ इकादसी का बर्त (व्रत) हुआ तो मूमफली (मूंगफली) मंगा ली और सब मिलके खाने वाले हुए. 

लाई की सब्जी, आलू मेथी की सब्जी, गडेरी की भांग डाली हुई सब्जी,घौत की दाल तो जाड़ों में ही भल (अच्छी)  लगने वाली हुई.ब्याव (शाम) होते ही सब लोग अंगीठी जला लेने वाले हुए.घर के बुड़-बाड़नियों के लिये सगड़ में गुपटाले लगा के कोयले के चूरे के लड्डू सिलका देना हुआ.वो आराम से हाथ तापने वाले हुए.

क्या करें भुला अब तो घर में सब कुछ है…हीटर है ,गीजर है सब तरह की सुविधायें हैं फिर भी मन करता है कि जैसे भाग के चले जायें अपने उसी पटाल वाले आंगन में और धूप सेंकने लगें.कोई दही मूली वाला नीबू सान के लाये और उसे चट चट करते हुए खायें.जंबू का धुंगार लगाये हुए भट के डुबके हों, दाणिम की चटनी हो….भांगे का नमक हो…क्या क्या सोचूँ ..क्या क्या इच्छा करूँ …पूरी थोड़े होनी है रे अब इस उमर में..

कका की आँखो के कोने गीले थे. मैं उनसे पूछ्ना चाहता था कि पहाडों में जब बरफ पड़ती है तो कैसा लगता है.लेकिन अभी नहीं फिर कभी पूछुंगा….

इससे पहले की नराई…

1. नराई के बहाने सिर्फ नराई

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: नराई, पहाड़, उत्तराखंड, काकेश
Apr 102007
 

मेरा पहाड़ से क्या रिश्ता है ये बताना मैं आवश्यक नहीं मानता पर पहाड़ मेरे लिये ना तो प्रकृति को रोमांटिसाईज करके एक बड़ा सा कोलार्ज बनाने की पहल है ना ही पर्यावरणीय और पहाड़ की समस्या पर बिना कुछ किये धरे मोटे मोटे आँसू बहाने का निठल्ला चिंतन.ना ही पहाड़ मेरा अपराधबोध है,ना ही मेरा सौन्दर्यबोध. मेरे लिये पहाड़ माँ का आंचल है,मिट्टी की सौंधी महक है, ‘हिसालू’ के टूटे मनके है, ‘काफल’ को नमक-तेल में मिला कर बना स्वादिष्ट पदार्थ है,‘क़िलमोड़ी’ और ‘घिंघारू’ के स्वादिष्ट जंगली फल हैं,‘भट’ की ‘चुणकाणी’ है,‘घौत’ की दाल है,मूली-दही डाल के ‘साना हुआ नीबू’ है,‘बेड़ू पाको बारामासा’ है,‘मडुवे’ की रोटी है ,’मादिरे’ का भात है,‘घट’ का पिसा हुआ आटा है,’ढिटालू’ की बंदूक है,‘पालक का कापा’ है,‘दाणिम की चटनी’ है क्या क्या कहूँ …लिखने बैठूं तो सारा पेज यूँ ही भर जायेगा.मैं पहाड़ को किसी कवि की आँखों से नयी-नवेली दुल्हन की तरह भी देखता हूं जहां चीड़ और देवदारु के वनों के बीच सर सर सरकती हुई हवा कानों में फुसफुसाकर ना जाने क्या कह जाती है और एक चिंतित और संवेदनशील व्यक्ति की तरह भी जो जन ,जंगल ,जमीन की लड़ाई के लिये देह को ढाल बनाकर लड़ रहा है.लेकिन मैं नहीं देख पाता हूँ पहाड़ को तो.. डिजिटल कैमरा लटकाये पर्यटक की भाँति जो हर खूबसूरत दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर अपने दोस्तों के साथ बांटने पर अपने की तीस-मारखां समझने लगता है.

पहाड़,शिव की जटा से निकली हुई गंगा है.कालिदास का अट्टाहास है.पहाड़ सत्य का प्रतीक है.जीवन का साश्वत सत्य है.कठिन परिस्थितियों में भी हँस हँस कर जीने की कला सिखाने वाली पाठशाला है. गाड़, गध्यारों और नौले का शीतल,निर्मल जल है.तिमिल के पेड़ की छांह है,बांज और बुरांस का जंगल है.आदमखोर लकड़बग्घों की कर्मभूमि है.मिट्टी में लिपटे ,सिंगाणे के लिपोड़े को कमीज की बांह से पोछ्ते नौनिहालों की क्रीड़ा-स्थली है.मोव (गोबर) की डलिया को सर में ले जाती महिला की दिनचर्या है.पिरूल सारती ,ऊंचे ऊंचे भ्योलों में घास काटती औरत का जीवन है.

कैसे भूल सकता है कोई ऎसे पहाड़ को .पहाड़ तूने ही तो दी थी मुझे कठोर होकर जीवन की आपाधापियों से लड़ने की शिक्षा.कैसे भूल सकता हूँ मैं असोज के महीने में सिर पर घास के गट्ठर का ढोना ,असोज में बारिश की तनिक आशंका से सूखी घास को सार के फटाफट लूटे का बनाना, फटी एड़ियों को किसी क्रैक क्रीम से नहीं बल्कि तेल की बत्ती से डामना फिर वैसलीन नहीं बल्कि मोम-तेल से उन चीरों को भरना, लीसे के छिलुके से सुबह सुबह चूल्हे का जलाना,जाड़े के दिनों में सगड़ में गुपटाले लगा के आग का तापना,“भड्डू” में पकी दाल के निराले स्वाद को पहचानना. तू शिकायत कर सकता है पहाड़ ..कि भाग गया मैं,प्रवासी हो गया,भूल गया मैं ….लेकिन तुझे क्या मालूम अभी भी मुझे इच्छा होती है

“गरमपानी” के आलू के गुटके और रायता खाने की .अभी भी होली में सुनता हूँ ‘तारी मास्साब’ की वो होली वाली कैसेट …अभी भी दशहरे में याद आते है “सीता का स्वय़ंबर”,“अंगद रावण संवाद”, “लक्ष्मण की शक्ति”.अभी भी ढूंढता हूँ ऎपण से सजे दरवाजे और घर के मन्दिर .अभी भी त्योहार में बनते हैं घर में पुए,सिंघल और बड़े. कहाँ भूल पाऊंगा मैं वो “बाल मिठाई” और “सिंघोड़ी”,मामू की दुकान के छोले और जग्गन की कैंटीन के बिस्कुट.

तेरे को लगता होगा ना कि मैं भी पारखाऊ के बड़बाज्यू की तरह गप मारने लगा लेकिन सच कहता हूं यार अभी भी जन्यू –पून्यू में जनेऊ बदलता हूं,चैत में “भिटोली” भेजता हूं,घुघुतिया ऊतरैणी में विशेष रूप से नहाता हूं ( हाँ काले कव्वा ,काले कव्वा कहने में शरम आती है ,झूठ क्यूं बोलूं ),तेरी बोजी मुझे पिछोड़े और नथ में ही ज्यादा अच्छी लगती है .मंगल कार्यों में यहाँ परदेश में “शकुनाखर” तो नहीं होता पर जोशी ज्यू को बुला कर दक्षिणा दे ही देता हूं .

तू तो मेरा दगड़िया रहा ठहरा.. अब तेरे को ना बोलूं तो किसे बोलूं .तू बुरा तो नहीं मानेगा ना ..मैं आऊंगा तेरे पास.गोलज्यू के थान पूजा दूंगा ..नारियल ,घंटी चढाऊंगा .. बाहर से जरूर बदल गया हूँ पर अंदर से अभी भी वैसा ही हूँ रे ..तू
फिकर मत करना हाँ..मैं अपने पहाड़ को कभी नहीं भूल सकता.

==============

ना जाने क्या-क्या लिख डाला, ना जाने कितनी नराई लगा बैठा .बहुत से शब्द आपकी समझ में नहीं आये होंगे ना…अभी क्षमा करें ..हो सका तो अर्थ बाद में बताऊंगा.