नराई
Nostalagia About My Motherland Uttarakhand.(मेरे पहाड़ की नराई)
नराई ह्यूं (बरफ) की
दिल्ली की बढ़ती ठंड को देख मुझे इच्छा हुई कि मैं कका से पूछूं कि पहाड़ में जब कड़ाके की ठंड पड़ती थी या बरफ पड़ती थी तो कैसा माहौल होता था और कैसे लोग उस ठंड का सामना करते थे. क्या बताऊँ भुला… पहाड़ में ठंड तो यहाँ की ठंड से भौते ज्यादा हुई [...]
केमो बस की सर्-रर प्वां प्वां..
बस पहाड़ी रास्तों पर हाँफते धीमे रफ्तार डीज़ल का धुँआ उगलते चढ़ रही है.केमो* की उस बस में बैठते ही उसे लगा था कि वह जैसे अपने घर पहुंच गया.ट्रेन की सारी रात की थकन बस में अपना सूटकेस रखते ही जैसे उड़न छू हो गयी. उन टेढ़े मेढ़े,ऊंचे नीचे रास्तों में हिचकोले खाती बस [...]
आमा और जंबू का धुंगार..
कल से तो सतझड़ (बारिश होना) पड़ रहे हैं भुला. सारे लकड़ी, गुपटाले भीग गये हैं. चूल्हा जलाने में धुंआ तो होगा ही. आमा (दादी) चूल्हे में फूंक मारते मारते अपने नाती को समझा रही है. लेकिन नाती जो अभी मात्र पांच साल का ही है उसे इस सतझड़ और गुपटालों (उपले) से क्या मतलब. [...]
नराई ठंड की …
[पहाड़ की ठंड का अपना एक अलग ही आनन्द है. इस आनन्द को वही महसूस कर सकता है जिसने इसको जिया है,एक टूरिस्ट की भांति एक-दो दिन के लिये नहीं बल्कि कई दिनों तक. उस पर से पहाड़ी भाषा,जो मूल रूप से कुमांउनी या गढ़वाली बोली के रूप में जानी जाती है,उसकी अपनी अलग ही [...]
नराई के बहाने सिर्फ नराई
मेरा पहाड़ से क्या रिश्ता है ये बताना मैं आवश्यक नहीं मानता पर पहाड़ मेरे लिये ना तो प्रकृति को रोमांटिसाईज करके एक बड़ा सा कोलार्ज बनाने की पहल है ना ही पर्यावरणीय और पहाड़ की समस्या पर बिना कुछ किये धरे मोटे मोटे आँसू बहाने का निठल्ला चिंतन.ना ही पहाड़ मेरा अपराधबोध है,ना ही [...]
