होली का त्यौहार मस्ती,उल्लास और मौज मजे का पर्व है. दुनिया में सभी जगह होली बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है.लेकिन कुमाऊंनी होली का अपना एक अलग ही रंग है, पूरे विश्व में इस होली की अलग पहचान है. यहाँ होली मात्र एक दिन का त्यौहार नहीं बल्कि कई दिनों तक चलने वाला त्यौहार है. इसके साथ जो एक और चीज जुड़ी है वह है संगीत. बिना संगीत के कुमांऊनी होली की कल्पना करना भी मुश्किल है. संगीत के साथ साथ होली से जुड़े गीतों में कथ्य का भी बहुत महत्व है. होली यहाँ सिर्फ होली ही नहीं बल्कि एक सामुहिक अभिव्यक्ति का माध्यम है. इसमें सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दे भी हैं और तात्कालिक परिस्थितियों का चित्रण भी है.

कुमांऊनी होली एक पर्व ही नहीं है बल्कि इसकी एक सांस्कृतिक विशेषता है. यहाँ की होली मुख्यत: तीन तरह की होती है. 1. बैठी होली 2. महिला होली 3. खड़ी होली. इसके अलावा खड़ी होली का ही एक हिस्सा बंजारा होली कहलाता है. इन सब होलियों की चर्चा विस्तार से इस लेख के आगे के हिस्सों में की जायेगी.

मुख्य होली की शुरुआत फाल्गुन मास की एकादसी से होती है. जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है. इस दिन भद्रा-रहित काल में देवी-देवताओं में रंग डालकर पुन: अपने कपड़ों में रंग छिड़कते हैं, और गुलाल डालते हैं. होली के लिये विशेष कपड़े बनवाये जाते हैं जो मुख्यत: सफेद रंग के होते हैं. पुरुष सफेद रंग के कुर्ता पायजामा पहनते हैं और कुछ लोग सर पर गान्धी टोपी पहनते हैं .महिलाऎं सफेद धोती या सफेद सलवार कमीज पहनती हैं. एकादशी के दिन जब रंग पड़ता है तो इन्ही कपड़ो में रंग डाल दिया जाता है. यह कपड़े अब मुख्य होली के दिन तक बिना धोये पहने जाते हैं. जिस दिन देश-दुनिया के अन्य जगहों में होली मनायी जाती है उस दिन कुमाऊं में पानी और रंगो से होली खेली जाती है. इस दिन को “छरड़ी” या “छलड़ी” कहा जाता है.

एकादशी के ही दिन चीर बंधन होता है. इस दिन व्यक्तिगत रूप से या सामुहिक रूप से एक जगह चीर बांधा जाता है. इसके लिये “पद्म” की टहनी (इसे पहाड़ में “पैय्यां” या “पईंया” कहा जाता है) पर रंग बिरंगे कपडों की चीर बांधी जाती है. इसके अलावा सामुहिक रूप से जो चीर बांधी जाती है वह बांस के डंडे में बांधी जाती है लेकिन उसमें पद्म की एक टहनी, जौं की कुछ बालीयां और खीशे का फूल होना जरूरी होता है.पुराने जमाने में इस तरह की सामुहिक चीर को बांधने की अनुमति कुछ ही गांवों को होती थी.जिस गांव के लोग इस चीर को बांधते थे वो लोग रात भर इस चीर का पहरा भी करते थे ताकि कोई इस चीर को चुरा ना पाये. यदि किसी साल यह चीर किसी अन्य गांव के लोगों ने चोरी कर ली तो इस गांव से चीर बांधने का अधिकार छिन जाता था.फिर से इस अधिकार को प्राप्त करने के लिये गांव वालों को किसी अन्य गांव की चीर चुराना जरूरी होता था. इसी का सन्दर्भ होली के गानों में भी आता है कि “चीर चुराय कदम्ब चढ़ी बैठो, यो छो ऐसो मतवालो”. यह शायद इसी ओर इंगित करता है.        

अगले भागों में गीतों के कथ्य की भी चर्चा करेंगे अभी एक गाना जो मुझे याद आ रहा है उसके बोल आप को बता दूँ.यह मुख्यत: महिलाओं की होली है,

जल कैसे भरूं जमुना गहरी,

जल कैसे भरूं जमुना गहरी,

ठाड़े भरूं राजा राम देखत हैं,

बैठी  भरूं  भीजे  चुनरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

धीरे चलूं घर सास बुरी है,   

धमकि चलूं छ्लके गगरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

गोदी में बालक सर पर गागर,

परवत से उतरी गोरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

 

जारी ………………………………..

 

परुली मन में सोच चुकी थी कि अब उसे हिम्मत से काम लेना है.मन ही मन उसने कुछ सोचा और अपने अन्दर बैठे हुए डर से लड़ने की कोशिश करने लगी.आज पहली बार उसे गोल्ज्यू का ध्यान आया. उसने सुना था गोल्ज्यू से कुछ भी मांगो वह मिल जाता है. उसने सवा रुपये का उचैण (करार) अलग रखा और मन ही मन गोल्ज्यू से कहा कि गोल्ज्यू मुझे डॉक्टर बना देना.आपके थान आके एक घंटी जरूर चढ़ाउंगी. स्कूल जाते समय भी वह चुप ही थी. उसकी सहेलियां उसे छेड़ रहीं थी.

“क्यों परु भिंन्ज्यू के साथ दिल्ली कब जा रही है रे…” …परुली चुप

“अरे ये तो इंतजार ही कर रही है कब इसका ब्या हो और यह यहाँ से भागे.”

“परु तेरी किस्मत बहुत अच्छी है रे. बहुत पुन्न किये होंगे तूने.कौन कौन से बर्त (व्रत) रखे रे तू ने हमको भी बता ना”

“दिल्ली जा के हमें भूल मत जान रे…” उसकी सहेलिया उसे अंगाव लगाती और हँसती लेकिन परुली चुपचाप अपनी सोच में चली जा रही थी.

स्कूल में भी हाफ-टाइम (इंटरवल) में परुली सीधे अपनी मैम के पास पहुंची.उसने विस्तार से अपनी मैम से पूछा कि डॉक्टर बनने के लिये क्या क्या करना पड़ता है. यह पढ़ाई कहाँ कहाँ से होती है और इसमें लगभग कितना खर्चा आता है. मैम ने भी उसे पूरी बात बतायी.

शाम को बाबू घर आये तो उनको चाय बनाके देते हुए वह बोली.

“बाबू आज मैने अपनी एक मैडम से बात की थी.”

“क्या बात की थी परु…”..बड़े प्यार से जोस्ज्यू ने पूछा. जब से उसका ब्या ठीक हुआ है तब से वह उससे ऐसे ही प्यार से बात करने लगे थे.

“यही कि डॉक्टर बनने के लिये क्या क्या करना पड़ता है.”

“डॉक्टर….?? “. जोसज्यू भी मुस्कुराये बिना न रह सके. “कौन डॉक्टर बन रहा है …तू… तू डॉक्टर बनेगी ?” उपहासात्मक लहजे में जोस्ज्यू ने कहा….

“हाँ बाबू ” उसकी आवाज में दृढ़ता थी.

“तो बन जाना बेटा पहले तेरा ब्या हो जाये फिर जो चाहे बन जाना.” जोस्ज्यू ने बबाल टालने के लहजे में कहा.

“नहीं बाबू मैं यह ब्या नहीं करुंगी …” उसी दृढ़ता से परुली ने जबाब दिया.

अब जोस्ज्यू चौंके….”क्या कहा ब्या नहीं करेगी… क्यों नहीं करेगी…”. अपने हाथ की चाय को जमीन में रखते हुए वह बोले.

“मुझे डॉक्टर बनना है बाबू…”

“अरे डॉक़्टर बनना इतना आसान नहीं है बेटा…”

“मुझे मालूम है बाबू उसके लिये पी.एम.टी का इमत्यान देना पड़ता है. मैं वह इम्त्यान पास कर लुंगी बाबू…”

“लेकिन डॉक्टरी में तो ढेर सारे डबल भी लगेंगे ना.”

“मेरी मैम कह रही थी कि मेरे बोर्ड में अच्छे नम्बर आये तो मुझे वजीफ़ा (स्कॉलरशिप) मिल जायेगा. फिर किसी बैंक से बात करने से वहाँ से भी कुछ डबल मिल सकते है. जब मेरी नौकरी लग जायेगी तो बैक का पैसा तार (चुका) देंगे.”

जोस्ज्यू के पास उसकी बातों का कोई जबाब ना था उनको गुस्सा आ गया उनकी समझ में आ गया था कि यह सारा किया धराया उसकी किसी टीचर का ही है.

“तो तू स्कूल में जाके पढ़ने की बजाय यही सब करती है. यही सिखाते हैं तुझे स्कूल में.रुक मैं तेरी टीचर से बात करुंगा. कौन टीचर है उसका नाम बताना तो. “     

परुली तो बाबू के गुस्से को देख के डर गयी.

नहीं बाबू…मैं तो….

” ज्यादा करेगी तो तेरा स्कूल जाना बंद करा दुंगा.वैसे भी अब तेरा ब्या ठीक हो गया है अब तुझे पढ़ने की क्या जरूरत है.  “

“नहीं बाबू ….लेकिन …”

“आने दे तेरी ईजा को आज…उसने ही तुझे कपाव (सर) पर चढ़ा रखा है ”

जोस्ज्यू गुस्से में उठकर चले गयी. परुली बाबू के गुस्से को देख के डर तो गयी लेकिन इस बात से उसकी हिम्मत और बढ़ गयी. उसने सोच लिया कि अब जो भी हो वह साफ साफ कह देगी उसे यह ब्या नहीं करना फिर बदनामी हो तो हो….

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ?

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पिछले भाग को पढ़कर मेरे को एक पाठक ने मेल किया कि मैं उन्हे परुली की पूरी कहानी मेल पर भेज दूँ क्योंकि उनको इतना इंतजार करना अच्छा नहीं लगता.मैं उनकी भावना की कद्र करता हूँ.उनको तो मैने उत्तर दे दिया लेकिन बाँकी पाठको की जानकारी के लिये बता दूँ मैने परुली की कहानी अभी लिखी नहीं है. मैं इसके प्रत्येक भाग को बुधवार की सुबह ही लिखता हूँ. उस समय जैसे भाव मन में आते हैं वैसा ही लिख देता हूँ. कभी कभी सोचता हूँ कि यदि पूरी तरह सोच समझ के इस कहानी को लिखता तो शायद और अच्छा लिख पाता लेकिन फिर यह भी लगता है कि ऐसे लिख भी पाता कि नहीं. तो परुली का क्या होगा यह मेरे को भी नहीं मालूम. कभी कभी लगता है उस परिस्थिति में वह डॉक्टर नहीं बन पायेगी तो शायद वह भी गाढ़ में कूद मार दे या फिर ब्या कर के गोपाल के साथ ही चले जाये…लेकिन फिर लगता है उसने गोल्ज्यू से मन्नत मांगी है तो वह डॉक्टर बन ही जायेगी. …लेकिन क्या होगा यह तो अभी मेरे को भी नहीं मालूम …मेरी तरह आप भी इंतजार कीजिये.

आज परुली ने सोच के रखा था कि आज ईजा से वह बात करके रहेगी. उसने जल्दी जल्दी घर के काम करने शुरु किये. लाई की सब्जी काट के छौंक  दी,आटा ओल दिया, नौले से पानी लेकर आयी, गोरु-बल्दों को घास डाल दी,बड़बाज्यू का हुक्का सुलगा दिया. ईजा खेतों से आयी तो परुली घर के आधे काम कर चुकी थी. ईजा को गुड़ की डली के साथ चाय देकर वह पास ही बैठ गयी.

हिम्मत ही नहीं कर पा रही थी परुली कि कैसे अपनी बात शुरु करे.उसे लग रहा था कि ईजा उसकी बात सुनकर क्या सोचेगी. लेकिन परुली ने हिम्मत जुटायी और नजरें नीची करके बोली.

“ईजा…., मेरा ब्या ठीक हो गया ना.”

“हाँ चेली. गोल्ज्यू की आशीरवाद से हो गया चेली. नहीं तो इतना अच्छा संबंध कैसा मिलता. तेरी किसमत अच्छी ठहरी.तू बहुत भागवान हुई..”

“लेकिन ईजा मुझे तो अभी और पढना है.”

“अरे पढ़ना लिखना तो जिनगी भर लगा ही रहने वाला ठहरा.एक बार शादी हो जाय फिर जैसा पांडेज्यू राठ बोलें वैसा करना.मन हो तो पढ़ लेना लेकिन लड़कियों को पढ़ लिख के क्या करना हुआ… ”

“ईजा…. , मेरी मैडम कह रही थी कि मैं डाक्टरी का इन्तेहान दूँ.”

ईजा को परुली के बचपने पर हँसी आ गयी. “चेली डाक्टर बनना हम लोगों के भाग में जो क्या ठहरा. बहुत मुश्किल होने वाला ठहरा बल. और फिर डाक्टरी की पढ़ाई यहाँ जो क्या होने वाली हुई …बाहर होने वाली ठहरी.हमारे गाँव से तो कोई डाक्टर ठहरा भी नहीं.पारगाँव के मुरुलीदत्त जी का लड़का हुआ. कहाँ से तो किया ठहरा वह डाक्टरी की पढ़ाई. नखलऊ …ना …लखनऊ …क्या तो कहने वाले हुए हो मुझे तो बोलना भी नहीं आने वाले हुआ.” ईजा अपनी ही बात पर हँस दी.परुली के अन्दर कोई शीशा सा दरक गया. एक रुलाई फूट पड़ी.वो खुद को संयत करते हुए बोली.

“लेकिन ईजा…. बहुत सी लड़कियां तो करने वाली हुई डाक्टरी की पढ़ाई.मुझे भी भेज देना शहर.मैं कर लुंगी ईजा..”.. परुली ने बोल तो दिया लेकिन अन्दर ही अन्दर वह खुद भी डर रही थी कि कैसे वह अकेले रह पायेगी.  

“अब ज्वान जवान लड़की को कैसे भेज देंगे हो बाहर.कोई जान न पहचान. तेरे को सार भी तो नहीं ठहरी.हम लोग तो भुस्स (गँवार) हुए बेटा. इतना बड़ा शहर हमारे लिये तो क्याप्प हुआ. ना हो ना. तू भी कहाँ के चक्कर में पड़ गयी. अभी तू बोर्ड के इंत्यान दे.ब्या कर ले फिर जैसी गोल्ज्यू की इच्छा होगी.” ईजा की चाय खतम हो गयी थी. वो उठते हुए बोली. “परु ये गिलास भान माँज दे और दूध की बाल्टी ला मैं दूध लगा लेती हूँ.अभी कितने सारे काम पड़े हैं. “

परुली की बात फिर अधूरी रह गयी.उसने ईजा के बताये काम किये और सोच में पड़ गयी.दूर पहाड़ों को देखते देखते ही तो उसने कल्पना की थी कि इन्ही पहाड़ों के उस पार होगा कोई एक शहर. जहाँ यह लाइट टिम टिम करती हैं. उसके घर में तो लम्फू (मिट्टी तेल का लैम्प) का उजाला होता है या छिलुके का. वह सोचती थी कि कभी वह उस पार जायेगी. एक बड़े शहर में कदम रखेगी.बिजली के लैप देखेगी. न जाने कितनी कल्पनाऎं.

वह चाहती तो थी डाक्टर बनना लेकिन उसे इसके बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी. उस दिन चमुली ने कहा था कि ढेर सारे डबल लगते हैं और आज ईजा कहती है कि बाहर जाना पड़ता है बल. इतना तो उसे विश्वास हो गया कि इस घर से अकेले तो उसे कोई भी बाहर नहीं भेजने वाला.और फिर गांव वाले भी तो क्या क्या बातें बनाऐंगे. तलखाऊ की बिट्टू बुआ जो आंगनबाड़ी में काम करती हैं उनके बारे में ही जाने क्या क्या बोलते हैं. और फिर पैसे का सवाल तो है ही…. सचमुच ..कहाँ से लायेंगे उसके बाबू इत्ता पैसा. तो क्या करे परुली. क्या शादी कर ले. वो सोचने लगी…वैसे यदि मैं शादी कर लूँ और इनके साथ दिल्ली चले जाऊँ तो शायद वहाँ से डाक्टरी हो सकती है. लेकिन उसने देखा है शादी के बाद जो ब्योली आती हैं उन्हें घर के कित्ते तो काम करने पड़ते हैं. और जब उसके ईजा बाबू उसे बाहर नहीं भेज रहे तो सास ससुर तो बिल्कुल ही नहीं भेजेंगे.तो क्या करे? शादी करके जुत जाये घर के जुए में कोल्हू के बैल की तरह. या फिर बगल की माया दीदी की तरह गाढ़ में कूद मार दे…. हाँ वह भी कूद मार देगी.खतम कर देगी खुद को. सारा बबाल खतम…

लेकिन फिर उसके अन्दर से जैसे किसी ने पुकारा ..नहीं परु तू इतनी कमजोर नहीं हो सकती.उसकी मैम भी तो उस दिन उसे समझा रही थी. कि इंसान को हर परिस्थिति का हिम्मत से सामना करना चाहिये… और फिर परुली ने सोच लिया कि वह अब हिम्मत के साथ इस परिस्थिति का सामना करेगी.

जारी…..[ अगले अंक में देखिये परुली का बदला हुआ रूप]

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी

परुली की शादी के बारे में कोई धारणा नहीं थी. वह तो यह भी नहीं जानती थी कि शादी का मतलब क्या होता है. उसके लिये तो शादी का मतलब सिर्फ इतना था कि शादी के बाद लड़की को घर छोड़ के जाना होता है,पढ़ाई बन्द हो जाती है,साड़ी पहननी पड़ती है और दूसरे घर में जाके घूंघट के अन्दर ही रहना पड़ता है.एक डेढ़ साल बाद एक बच्चा भी हो जाता है. यह कैसे होता है इसके बारे में भी उसे कोई विशेष जानकारी नहीं थी. स्कूल में बड़ी लड़कियां शादी और बच्चे की बातें रस ले लेकर करती. मुँह नीचे कर हँसती पर परुली को कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता.  

उसके बाबू आज मलगाड़ गांव गये थे पांडे जी से बात पक्की करने. परुली के दिल में जाने कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे. वह मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि किसी तरह बात टल जाये और वह अभी शादी करने से बच जाये.लेकिन ऐसा कैसे होगा यह उसे मालूम नहीं था. स्कूल में भी आज वह खोयी खोयी से रही.शाम को बाबू आये तो बहुत खुश थे.चाख (पहला कमरा) में बैठ कर घर वालों को पूरी बात रहे थे.हर बात में पांडे ज्यू की तारीफ..

“पांडे ज्यू भल मैस (अच्छे आदमी) ठहरे. भौत बढिया घर हुआ हो वह. घर में गोरु,बल्द सब ही हुए. जमीन भी भौत ठहरी. कित्ते नाली तो बता रहे थे. पांडे ज्यू आदमी भी अच्छे हुए.गोपाल भी अच्छा ही हुआ. कोई ऐब नहीं ठहरा उसे. दिल्ली जैसी जगह में ठहरा फिर भी कितना सौम्य. शिबौ-शिब भौत काम करना पड़ने वाला हुआ बल उसे. पांडे ज्यू कह रहे थे कि परुली को थोड़ी ‘सार-पतार’ ( तमीज, मैनर्स) आ जाये तो इसे भी कुछ दिनों के लिये दिल्ली भेज देंगे.मैने कहा आप जैसा भी करेंगे आप की ही हुई अब परुली……

आगे नहीं सुन पायी परुली. मलखंड (ऊपर वाला कमरा) में जाके रजाईयों के बीच मुँह छिपा कर रोने लगी. उसका डाक्टर बनने का सपना आंसूओं के साथ बहने लगा. आज पहली बार उसे अपनी लड़की होने का अहसास हुआ. एक लड़की किस हद तक मजबूर हो सकती है इस बात से मन ही मन उसे खुद से घृणा होने लगी. सब कितने खुश थे. वो उनकी खुशी नहीं छीनना चाहती थी लेकिन जो हो रहा था उसके लिये वह खुद को तैयार भी नहीं कर पा रही थी. मन में आता कि वह कह दे कि नहीं करनी उसे शादी. लेकिन क्या कह पायेगी वह यह सब और फिर लोग क्या कहेंगे..”जोस्ज्यू की लड़की ने शादी के लिये मना कर दिया” …कितनी तो बातें बनेंगी.. उसकी खुद की सहेलियाँ उससे बातें नहीं करेंगी…आंसूओं का सैलाब लगता था कि उसे बहा ले जायेगा… 

उधर घर में खुशी का माहौल था. परुली की ईजा भी बहुत खुश थी. बगल की काखी (चाची), कैंजा (मौसी), जेठज्या (ताई) और अन्य औरतें भी घर में बधाईयां देने आयीं

“भल भौ हो (अच्छा हुआ).. बड़ा अच्छा संबंध मिला बल.. ” .

हाँ हो सब गोल्ज्यू की किरपा हुई हो..” ..

“तो कब कर रहे हो ब्या ….मंगसीर (नवंबर-दिसंबर) में करोगे कि जेठ (मई-जून) में   

“इस साल तो परुली का बोर्ड हुआ .. इम्तयान (परीक्षा) हो जाये तो जेठ में ही करेंगे. पिठ्या (टीका,सगाई) कोई भल दिन देख के लगा देंगे”

यह बात परुली ने भी सुनी.रो रो कर उसकी आंखे लाल हो गयी थी पर उसे सुखद आश्चर्य हुआ कि शादी के लिये भी उसके बोर्ड की परीक्षाओं को को ध्यान में रखा जा रहा है. वह सोचने लगी कि यदि वह ईजा से डाक्टर बनने वाली बात करे तो शायद ईजा की समझ में बात आ जाये और अभी शादी ना करने के लिये मान जाये…लेकिन उसके बाबू और घर के अन्य लोग ईजा की बात मानेंगे यह अपने आप में एक बड़ा प्रश्न था. फिर भी उसे लगा कि उसे कम-से-कम अपनी ईजा से तो बात करनी ही चाहिये… उसे आशा की एक धुधली किरण दिखायी देने लगी…लेकिन फिर उसे चमुली की बात याद आयी…. “डॉक्टर बनना इतना आसान नही है परुली. ढेर सारे डबल (पैसे) लगते है बल. इत्ते सारे डबल तेरे बौज्यू कहाँ से लायेंगे.तेरे को तो हाईस्कूल ही करा रहे हैं वही बहुत है.”.यदि ईजा सब लोगों को मना भी ले तो उसे पढ़ायेंगे कैसे.

यह सब सोचते सोचते परुली के सर में दर्द होने लगा और वह ईजा का इंतजार करते करते सो गयी… 

जारी…..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ??

परुली सो तो गयी. दिन भर की थकी थी नींद भी आ गयी. लेकिन ना जाने कितने देर तक सपनों से लड़ती रही. कभी लगता कि वह एक भ्योल (ऊंची पहाड़ी) से नीचे गिरती जा रही है.चारों और कंटीली झाडियां हैं जिनको वह पकड़ने की कोशिश कर रही है पर वह हाथ नहीं आ रहीं.कभी लगता कि वह नौले से पानी ला रही है और उसकी तांबे की गगरी उसके सर से छिटक कर गिर गयी है और वह उसे पकड़ने दौड़ रही है या उसकी ईजा गाय को बांधने गोठ गयी तो गाय ने उसे ही सींग से मार दिया वह गिरी तो गाय उसे अपने पैरों के तले रौदते हुए चली गयी. रात भर इस तरह के सपनों से लड़ती रही. एक दो बार आंख भी खुली तो घुप्प अंधेरा था कुछ दिखायी नहीं दिया. सिर्फ बीतती हुई रात थी.सुबह अभी भी कहीं दूर थी.

रात की बात आयी गयी हो गयी. सुबह से परुली फिर अपने काम में जुट गयी.रोज की तरह छिलुके से चूल्हा जलाया. ईजा के साथ घर का काम किया.स्कूल की ड्रेस के कपड़े बिस्तर के नीचे से निकाल कर पहने और बाकी लड़कियों के साथ स्कूल के लिये चल दी.रास्ते में उसने लड़कियों को कल रात की ईजा-बाबू की बातचीत के बारे में बताया. तो चमुली बोली

“यह तो बहुत बढिया हुआ. तेरा चिंन्ह साम्य हो जायेगा तो तू तो ब्योली (दुल्हन) बन के चले जायेगी. तेरा तो नाक नक्स इतना अच्छा है तभी तो तेरा चिन्ह मांगा है.हम लोगों का तो कोई भी नहीं मांगता. हम भी ब्योली बने तो इस पढ़ाई से तो छुटकारा मिले”.

बाकी लड़कियां उसके साथ हँसी ठिठोली करने लगीं. लेकिन परुली को यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था.

“लेकिन मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ.” परुली की आवाज में एक दृढ़ता थी.

अरे पढ़ लिख के क्या बैरिस्टर बनेगी. ब्या तो तब भी होगा ना और फिर तो वही भनपान, गोरु-बाछों का मोव निकलना, गुपटाले पाथना, पानी सारना और घरपन के सारे काम, इन सब में तेरी पढ़ाई क्या काम आयेगी रे परुली..और अच्छे रिश्तो के लिये मना नहीं करना चाहिये. वो पारघर की बिन्दी बुआ को नहीं देखा. पढ़ाई के चक्कर में उनके बौज्यू (पिताजी) ने पहले उनका ब्या नहीं किया. अब कब के एम.ए. तो कर लिया लेकिन अब घर में बैठी हैं. कहीं बात ही नहीं बन रही. अब इस उमर में कहाँ होता है ब्या उनका.

उसने भी बिन्दी बुआ के बारे में अपनी ईजा से सुना था कि वह पहले सारे रिश्तों के लिये मना कर देती थी. लेकिन अब तो किसी उमरदार या दूसरे ब्या वाले से भी शादी करने को भी तैयार है लेकिन कोई मिलता ही नहीं. फिर भी परुली को लगा कि वह यदि डॉक्टर बन गयी तो शायद फिर तो रिश्तों की कमी नहीं होगी. यह सोच कर वह बोली.

“लेकिन मैं डॉक्टर बन गयी तो !”

सुनके सभी लड़कियां जैसे एक साथ हँसी. “डॉक्टर बनना इतना आसान नही है परुली. ढेर सारे डबल (पैसे) लगते है बल. इत्ते सारे डबल तेरे बौज्यू कहाँ से लायेंगे.तेरे को तो हाईस्कूल ही करा रहे हैं वही बहुत है.”

यह तो परुली भी जानती थी कि बाबू की जजमानी से घर का खर्च भी मुश्किल से निकल पाता था. आये दिन पैसों को लेकर घर में खिच खिच होती थी.

परुली सोच में पड़ गयी. आज उसका स्कूल की पढ़ाई में भी मन नहीं लगा. उसके डॉक्टर बनने के सपने जैसे हवा में उड़ गये थे.वो तो सोच रही थी कि वह सवा रुपये का उचैण (मन्नत) गोल ज्यू के नाम का रखेगी कि उसका चिन्ह साम्य ना हो और वो ब्या करने से बच जाये.लेकिन अब तो उसको लगने लगा कि यदि उसका ब्या नहीं हुआ तो उसके बोज्यू पर वह एक भार की तरह पड़ी रहेगी. वह अपने बौज्यू पर भार भी नहीं बनना चाहती थी. उसकी ईजा भी कहती थी कि “परुली तेरा ब्या हो जाये तो एक बहुत बड़ा भार सर से निकल जायेगा.” तो क्या वह घर वालों पर एक भार थी? ऎसी ही बातें उसने अपने पड़ोस की माया दीदी से भी बहुत पहले सुनी थी.तब उसे इन सब बातों का मतलब समझ नहीं आया था.कुछ महीने पहले माया दीदी ने जब एक गाड़ में छ्लांग लगा कर अपनी जान दे दी तो उसे बहुत बुरा लगा था और गुस्सा भी आया था. लेकिन अब उसे लग रहा था शायद माया दीदी भी ऎसी ही किसी परिस्थिति से गुजरी होगी.तो क्या उसे भी ……

“प्रिया! आज तुम्हारा ध्यान किधर है !!” मैडम की आवाज आयी.

“मै…म …”

“पढ़ाई में ध्यान लगाओ..”

परुली ने फिर पढ़ाई में ध्यान लगा लिया.दिन बीतते गये. बोर्ड की परीक्षाऎं करीब आ रही थीं. परुली सब कुछ भूल कर बोर्ड की तैयारियों में जुट गयी.एक दिन उसके बाबू आये. आज वह बड़े खुश थे. थोड़ा सा गुड़ और बताशे लाये थे.आमतौर यह वह तब लाते जब कोई खुशी का मौका होता. ईजा तो तब घर पर थी नहीं उन्होने परुली से कहा “परु बेटा जरा चहा तो बना दे”. उनके बातों से अतिरिक्त प्यार झलक रहा था.वह बड़बाज्यू से बात करने लगे, जो पटांगण में बैठ कर अपना हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे.

“बाबू आज पांडे ज्यू मिले थे. कह रहे थे कि गोपाल और परुली का चिन्ह साम्य हो गया.इस मंगशीर में जल्दी से कोई लगन निकाल कर ब्या कर लेंगें”

यह बात चाय बनाती परुली ने भी सुनी. वह पानी में चाय की पत्ती डाल चुकी थी और अब वह पत्ती साफ पानी में अपना मटमैला रंग छोड़ रही थी.

जारी….

पिछला भाग : परुली….

परुली ही कहते थे सब उसे. लेकिन उसका स्कूल का नाम प्रिया था. प्रिया जोशी.गरीब घर था और फिर लड़कियों को ज्यादा क्यों पढ़ाना… शादी करके घर का काम ही तो करना है.फिर भी परुली उर्फ प्रिया स्कूल जाती थी.उसके बाबू (पिताजी) जिनको सब जोस्ज्यू (जोशी जी) के नाम से ज्यादा जानते थे जजमानी (पंडिताई) करते थे. वो तो तब भी परुली को पढ़ाना चाहते थे लेकिन उसकी ईजा (मां) का मानना था कि ज्यादा से ज्यादा हाईस्कूल कर लेगी तो कोई अच्छा सा लड़का ढूंढ के इसकी शादी कर देंगे.

परुली को खुद का परुली कहा जाना खराब लगता था. स्कूल में सब उसे प्रिया कहते तो उसे बहुत अच्छा लगता था. स्कूल जाने की उसकी इच्छा के पीछे पढ़ने से ज्यादा खुद को प्रिया कहलाये जाने का लालच था.मैडम कुछ भी पूछ्ती तो वह हाथ खड़ा करती और जब मैडम कहती कि “हाँ प्रिया तुम बताओ” तो उसके कानों में जैसे घुंघरू बजते और पूरे जोश के साथ पूछे गये प्रश्न का गलत-सही उत्तर देती.हाँलाकि उत्तर अधिकतर सही ज्यादा होते गलत कम. इसलिये स्कूल में उसकी गिनती होशियारों में होने लगी.

परूली को घर में पढ़ने का बिल्कुल भी समय नहीं मिलता था. उसका स्कूल पांच-छ्ह किलोमीटर दूर था. अब पहाड़ में कोई साधन तो थे नहीं तो पैदल ही आना जाना होता. स्कूल से आते आते उसको भूख लग जाती. आते ही वह बस्ता एक ओर रख देती और घर में ढूंढती कि कहीं कुछ खाने को है क्या. उसका छोटा भाई उससे पहले घर आ जाता था. तो अक्सर यह होता था कि सुबह की बची हुई रोटियां वह खा चुका होता…और परुली के लिये कुछ भी ना बचता.

जब वह आती तो ईजा जंगल गयी होती.कभी घास लाने तो कभी लकड़ी लाने.बाबू जजमानी में गये होते.घर में बड़बाज्यू (दादा) और आमा (दादी) होती और अक्सर बड़बाज्यू के कुछ दोस्त भी साथ होते.उसके एक कका जो बी.ए. कर रहे थे वो भी तब तक कॉलेज से आ जाते थे.परूली के स्कूल से आते ही चाय की फरमाईश होने लगती. “परूली तू आ गयी है….चहा पिला हो सबको”. वो अनमने मन से चहा बनाने जाती. घर में एक बत्ती वाला स्टोव था …”नूतन” स्टोव. उसी को किसी तरह से जलाती और चाय के लिये केतली में पानी रख देती.खाने को कुछ ना होता तो चहा बनाने के बाद अपने लिये थोड़े भट भूट लेती.

स्कूल से आने के बाद कित्ते सारे काम करने होते परुली को.पाखे (छ्त) से कपड़े उठा के लाना.उनको तह करके रखना. गोरु बल्दों के वण (जंगल) से आने के बाद उनको गोठ में बांधना.उनको घास डालना. नौले से पानी लाकर रखना.रात की सब्जी का इनजाम (इंतजाम) करना.कभी कभी ईजा के आने में देर होने पर सब्जी भी छोंक के रखना.आटा ओल के रखना. ईजा वण से आ जाती तो दोनों मिलके खाना बनाते और फिर साथ ही भानकुन (बर्तन) मांजते. तब तक परुली इतनी थक जाती कि उसे नींद आने लगती और वह दिसाण (बिस्तर) में सर रखते ही सो जाती. सुबह उसके बाबू जल्दी जजमानी में जाते तो उसे उठा देते. वह बाबू को चहा बना के देती.बाबू चले जाते तो वह बांकी सबके उठने से पहले कुछ पढ़ पाती और फिर काम में लग जाती.

स्कूल में प्रिया जोशी काफी लोकप्रिय होती जा रही थी. पढ़ाई के साथ साथ वह खेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी आगे रहती. इसीलिये वह अपनी सारी मैडमों की लाड़ली थी.इस साल उसका हाईस्कूल का बोर्ड था.जितना भी समय उसे मिलता वह मन लगा कर पढ़ती. आज उसकी मैडम ने उससे कहा. प्रिया तुम अपनी बायलॉजी और स्ट्रॉंग करो.आगे भी बायलॉजी ही लेना और कोशिश करना पी.एम.टी. क्लियर करने की ताकि तुम डॉक्टर बन सको. यह सुन कर प्रिया को बहुत अच्छा लगा.उसको लगा कि जल्दी ही वह प्रिया से डा. प्रिया जोशी बन जायेगी. वह जल्दी से जल्दी यह बात अपनी ईजा को बताना चाहती थी.

घर आके परुली फिर उसी तरह काम में जुट गयी.डाक्टर वाली बात अभी भी उसके मन में थी. लेकिन ईजा के वण से आने के बाद उसे एकांत मिला ही नहीं कि वह अपनी बात ईजा को बता पाती.भनपान करने (बर्तन मांजने) के बाद वह अभी दिसाण लगा ही रही थी और सोच रही थी कि अभी ईजा आयेगी तो उसको अपनी दिल की बात कहेगी उसको अपनी बाबू की आवाज सुनायी दी. ईजा-बाबू आपस में बात कर रहे थे. उनकी बातों में अपना नाम सुनकर वह बाबू की बात ध्यान से सुनने लगी.

“आज मलगाड़ के पांडे ज्यू मिले थे. कह रहे थे कि परुली का चिन्ह (कुंडली) दे देना गोपाल के लिये.” गोपाल पांडे ज्यू का लड़का था.

“हाँ हो तो भोल (कल) ले जाना. पांडे ज्यू का संबंध तो अच्छा ठहरा. साम्य (कुंडली मिल गयी तो) हो गया तो भल हो जायेगा….”

“हाँ ये लोग तो बैरती के पांडे हुए..संबंध तो अच्छा ही हुआ..लेकिन अभी परूली तो नान नानि (छोटी) ही हुई.”

“तुम्हें तो नान नानि ही लगेगी..ढांट सी तो बड़ी हो गयी है.. इस साल बोर्ड भी हो जायेगा…फिर मंगसीर तक ब्या कर देंगे.तुम तो ले जाओ हो भोल चिन्ह”

“लेकिन गोपाल की कुछ खास नौकरी चाकरी तो है नहीं…”

“क्या करता है…?”

” पांडे ज्यू बता रहे थे कि दिल्ली में किसी ठुल (बड़े) अफसर के बंगले में नौकर है. क्वाटर भी मिला है.”

” अरे तो ठीक ही तो हुआ… इतना अच्छा संबंध मिल रहा है.. नौकरी का क्या है..यह नहीं तो कोई और मिल जायेगी…”

“तुम तो चिन्ह ले जाओ..और साम्य हो जाये तो बात पक्की कर दो हो”

इससे आगे क्या बातें हो रही थी वह परुली ने नहीं सुनी. वह चुपचाप तकिये पर सर रखकर सो गयी.

दिल्ली की बढ़ती ठंड को देख मुझे इच्छा हुई कि मैं कका से पूछूं कि पहाड़ में जब कड़ाके की ठंड पड़ती थी या बरफ पड़ती थी तो कैसा माहौल होता था और कैसे लोग उस ठंड का सामना करते थे.

क्या बताऊँ भुला… पहाड़ में ठंड तो यहाँ की ठंड से भौते ज्यादा हुई लेकिन वहाँ इस तरह के इनजाम हुए कि इतनी ठंड लगने वाली ही नहीं ठहरी. हां हम जैसे बुड़-बाड़ियों (वृद्ध) के लिये थोड़ी परेशानी होने वाली हुई लेकिन बुड़-बाड़ियों के लिये घर में मेथी के लाड़ू (लड्डू) बन जाने वाले हुए जो ठंड में बहुत काम आने वाले हुए और बुड़बाड़ी एक सगड़ (छोटी अंगीठी) में आग तापते हुए क्वीड़ करने वाले हुए.पीतल के गिलास में गुड़ की टपुक के साथ सुड़ुक सुड़ुक चहा पीने वाले ठहरे. जाड़ों में पुरानी लोहे वाली बाल्टियों को काटकर लोग अंगीठी बना लेने वाले हुए और उसी में कोयले जला लेने वाले हुए.ऑफिसों में भी वही अंगीठी जलने वाली हुई. जाड़ों का खाना भी गरम तासीर वाला हुआ.अधिकतर सब्जियों में भांगा पड़ने वाला हुआ.गडेरी की भांगा डाली हुई सब्जी या लाई की भांगा डाली हुई सब्जी बहुत खायी जाने वाली हुई. घर भी ऎसे हुए कि उनमें उतनी ठंड थोड़े लगने वाली हुई.पटाल की तिरछी छ्त,बड़ी सी खोली, खोली का मोटे लकड़ी वाला दरवाजा,चाख, मिट्टी के फर्श,कम ऊंचाई वाले गोठ.अब ऎसे में ठंड कहां लगने वाली हुई.गोरु-बल्दों के लिये पिरूल बिछा देने वाले हुए गोठ में.

पहनने के लिये बास्कट हुआ और दो टांग का पजामा (इनर) हुआ..टोपी हुई..दस्ताने, ऊनी मौजे , मफलर हुआ.एक मेरा दगड़िया ठहरा पदम सिंह.उसके लिये तो जाड़े और भी अच्छे हुए.उसने तो एक चिलम जलाई. कभी कभी उसमें अत्तर (चरस) भी डाल देने वाला हुआ -अत्तर तो तब घर घर में रहने वाली हुई,आज का जैसा जो क्या ठहरा.लेकिन लोग उसे दवा की तरह इस्तेमाल करने वाले हुए.अत्तर तो कभी कटे-फटे में खून को रोकने के काम आने वाले हुई. हां तो पदमुवा बम बम भोले कहते हुए चिलम पीने वाला हुआ. मेरे से कहने वाला हुआ “दाज्यू एक सूट्टा मारो हो सब ठंड गोल हो जायेगी”. अब पता नहीं उससे ठंड गोल होने वाली हुई या नहीं लेकिन पदम सिंह का कहना हुआ भोलनाथ ज्यू की बूटी है सारी ठंड भगा देती है.

जब भी ह्यूं (बरफ) पड़ने का माहौल होता था उससे पहले कुछ दिनों द्यो (बारिश) होने वाला हुआ. ह्यूं से पहले बजरी जैसी गिरने वाली हुई जिसे बड़े लोग “बरम्याऊ” कहने वाले हुए तब जा के ह्यूं पड़ने वाला हुआ.उस समय माहौल एक दम शांत हो जाने वाला हुआ.आकाश से रुई के गोले जैसे गिरने वाले हुए. धिनाई (ब्याई हुई गाय) तो तब सभी घरों में होने वाली हुई. हम लोग एक कान्से की थाली में थोड़ा मलाई वाला दूध लेकर बाहर रख देने वाले हुए वह जब जम जाने वाला हुआ तो उसे ही खाने वाले हुए. कैसा तो दिखने वाला हुआ पूरा शहर तब.सब कुछ सफेद सफेद हो जाने वाला हुआ.पेड़,पहाड़,जमीन,छ्त सब एक दम सफेद. जैसे सब जगह सफेद चादर बिछी हो. बरफ के रुक जाने पर नानातिना (बच्चे) बरफ के गोले बनाने वाले हुए…एक दूसरे पर फैकने वाले हुए. कोई कोई कलाकार लोग बरफ की मूर्तियां भी बना लेने वाले हुए.ये मुर्तियां पन्द्रह पन्द्रह दिन तक नहीं गलने वाली हुई.

बरफ पड़ने के बाद धूप निकलने वाली हुई.तब ठंडा बढ़ जाने वाला हुआ. लेकिन नौले का पानी उस समय भी गरम लगने वाला हुआ.तब कोई आज की तरह बाथरूम जो क्या हुए.बाहर पटागंण में ही नहाने वाले हुए.हम जनेऊ पहनने वालों को तो नहाना जरूर पड़ने वाला हुआ.बिना नहाये हुए तो खाना ही नहीं खाना ठहरा तो चाहे ह्यूं पड़े चाहे द्यो रोज नहाना हुआ.देवी कवच का पाठ करते करते नहा ही लेने वाले हुए.

तुम लोग तो इस दिल्ली की ठंड से परेशान हो जाते हो.हमने देखी ठहरी यार वो पहाड़ वाली ठंड. तुम तो बस टीवी में ही ह्यूं देखकर कांपने लगते हो. जिसने पहाड़ में रहकर पहाड़ का ह्यूं नहीं देखा क्या देखा. जब हम लोग जवान थे तो एक कमीज पहनके निकल जाने वाले हुए फावड़ा ले के ह्यूं साफ करने.. तब गरम खून हुआ आजकल के छोकरों की तरह थोड़े…

मुझे लगा कि कका अभी अपनी फसक-फराल (गप) शुरु करेंगे तो मुझ समेत मेरी पूरी जनरेशन की ऎसी तैसी करने लगेंगें..इसलिये मैं उन्हे प्रणाम कर वहां से धीरे से कट लिया..कका हीटर में हाथ सेंकते सेंकते पुरानी यादों में खो गये……

अब देखिये इस साल के हिमपात का वीडियो सुभाष कांडपाल जी के सौजन्य से.

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बस पहाड़ी रास्तों पर हाँफते धीमे रफ्तार डीज़ल का धुँआ उगलते चढ़ रही है.केमो* की उस बस में बैठते ही उसे लगा था कि वह जैसे अपने घर पहुंच गया.ट्रेन की सारी रात की थकन बस में अपना सूटकेस रखते ही जैसे उड़न छू हो गयी. उन टेढ़े मेढ़े,ऊंचे नीचे रास्तों में हिचकोले खाती बस एक के बाद एक मोड़ों पर हॉर्न देते हुए ठिठक ठिठक कर चल रही थी. एक तेरह चौदह साल की लड़की उलटी कर करके परेशान है. वो लोग सैलानी हैं शायद. लड़की की माँ सब जतन कर हार गयी लेकिन उलटी रह रह कर हो ही जाती है.वो याद करता कि जब वह अपनी ईजा (माँ) के साथ कभी ऎसे ही केमो की गाड़ी में जाता था तो उसकी माँ उलटी जैसी कुछ शिकायत होने पर माल्टा (संतरे जैसा एक फल) चूस लेती और उलटी रुक जाती.

बस की खिड़की से बाहर जैसे सब कुछ चलचित्र की भांति चल रहा है.बरफ से ढके पहाड़, उनके नीचे छोटी छोटी चोटियाँ, चीड़ देवदारु के जंगल और उनके नीचे छोटे छोटे गांव,स्कूल से घर लौटते बच्चे किसी छोटे पत्थर या पांगर के दाने को पैर से फुटबाल की तरह लुढ़काते, दातुले को अपनी कमर में खोस कर सिर पर हरी घास का गट्ठा लाते पहाड़ी औरतें, कहीं किसी जंगल में गाय चराते लड़के,उसी जंगल के बीच भूमिया देवता का मंदिर, किसी गाढ़ (छोटी नदी) के किनारे चलता हुआ घट (पनचक्की), किसी चाय की दुकान पर फसक (गप) मारते कोई ठुलबाबू (ताऊ जी).

एक मोड़ आया तो चीड़ का जंगल शुरु हो गया. चीड़ के जंगल उसे हमेशा से ही बड़े मोहित करते रहे हैं.बचपन में अपनी ईजा के साथ पिरूल लेने जाता तो चीड़ के टूटे फूल ले आता जिसे ऊन में बांध कर सारे पटांगड़ में चलाता रहता और कहता कि यह मेरी बकरी है. चीड़ के पेड़ की देह पर चीरा लगाकर बनाये लीसा निकालने वाले खप्पर भी उसे आकर्षित करते कि यह है क्या जिससे यह चिपचिपा पदार्थ निकल रहा है.ये तो उसे बाद में पता चला कि ये लीसा है जो तारपीन तेल बनाने के काम आता है.

ड्राइवर का हाथ सधा हुआ है. वह मोड़ों पर बड़ी आसानी से बस को मोड़ देता है. सैलानी लड़की खिड़की से बाहर नीचे गहरी घाटी देखती तो एक अनजाने भय से सिहर जाती है.लेकिन ड्राइवर के चेहरे पर कोई भाव नहीं. बस का कंडक्टर बीड़ी फूंक रहा है और साथ ही किसी डेली पसैंजर से बात भी कर रहा है. “पदम ज्यू आज बोरे में क्या भर लाये हो?”… “कुछ नहीं चेला… बस लाई के पत्ते और नीम्बू है यार.”…..बीड़ी खतम कर वह शहर के कंडक्टरों की तरह दरवाजे से नहीं लटकता बल्कि अपनी सीट में बैठ कर अपने रैक्सीन के थैले में रखे पैसों का हिसाब करने लगा है.पैन उसने अपने कान के ऊपर रख रखी है. कभी किसी सवारी को उतरना होता तो वो दरवाजे के पास लटकती रस्सी को खींच देता और ड्राइवर के पास घंटी बज जाती और वह गाड़ी रोक देता. कंडक्टर का हिसाब शायद पूरा हो चुका है. पदम दत्त जी भी उतर चुके हैं.बीच बीच में कंडक्टर अपनी माशूका की याद भी आ जाती जिसके लिये पिछ्ले हफ्ते ही वो गोल्ल ज्यू के मंदिर में घंटी चढ़ाने की मन्नत मांग कर आया था.

लगभग आधा रस्ता कट चुका है. उसे अब चाय की तलब लग रही है.वह सोच रहा कि कब ड्राइवर ज्यू गाड़ी रोकें और वह पहाड़ी रायते और पकोड़ी का स्वाद ले और साथ में गरमा गरम चाय भी. वह सोच ही रहा था कि एक झटके से गाड़ी (बस) रुक गयी. ‘चाय-पानी पी लो हो फटाफट’ …कंडक्टर बस से उतरते उतरते बोला. वो भी उतरा. सामने वही चिर परिचित दुकाने और उनमें आलू के गुटके, काले चने, प्याज की गरमा गरम उतरती पकोडियां , पहाड़ी रायता. उसके मुँह में हमेशा की तरह पानी आ गया.वह रायता-पकोड़ी का ऑर्डर देकर बैठ गया. पार्श्व में  पहाड़ी गाना बज रहा था…”टक टका टक कमला बाटुली लगाये…”.रायता-पकौड़ी के अनोखे स्वाद के बीच उसे भी अपनी कमला याद आने लगी. ….अब तो बस आधा ही सफर और बांकी था…..

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के.मो.ओ.यू. (KMOU) : कुमाऊँ मोटर्स ओनर्स यूनियन की प्राइवेट बसें जिन्हे उत्तराखंड के पहाड़ों में केमो की बस के नाम से जाना जाता है.

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साथ में बोनस के रूप में सुनिये नरेन्द्र सिंह नेगी का गाया गढ़वाली गीत. “चली बे मोटर चली…सर-रर..प्वां..प्वां……”

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ऊपर वाला गाना तकनीकी समस्या के कारण थोड़ा फास्ट सुनायी दे रहा है. जल्दी ही इसे ठीक करता हूँ.

तब तक आप यह गाना सुनिये….”टक टका कमला बाटुली लगाये…” …मस्त गाना है… जरूर सुनियेगा….

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कल से तो सतझड़ (बारिश होना) पड़ रहे हैं भुला. सारे लकड़ी, गुपटाले भीग गये हैं. चूल्हा जलाने में धुंआ तो होगा ही. आमा (दादी) चूल्हे में फूंक मारते मारते अपने नाती को समझा रही है. लेकिन नाती जो अभी मात्र पांच साल का ही है उसे इस सतझड़ और गुपटालों (उपले)  से क्या मतलब. वो तो हाथ में कटोरी ले के आ गया गोठ (नीचे का कमरा) में जहाँ रसोई भी है. भुला की आंखों से धुंए के कारण पानी निकल रहा है लेकिन वो फिर भी रसोई में खड़ा है.

आमा दाल-भात दे ना.भुला बोला…. भुला की नाक से सिंगाणा निकल रहा है. जिसे वो बार बार अपने कमीज की बांह से पोछ लेता था.

अल्ल द्यूँ चेला..बनने तो दे. वैं (वहीं) बैठ जा

आमा धोती लगा के खाना बनाती थी …इसलिये रिस्या में किसी को नहीं आने देती थी. अपने चारों ओर कोयले से एक लकीर खींच देती थी और किसी को भी उस लकीर के अन्दर पांव छूने की भी छूट नहीं थी. आज आमा ने पालक का कापा और दाल बनायी थी. दाल बन चुकी थी बस जम्बू का धुंगार लगाना बांकी था.चावल बन रहा था. आमा ने पतीली का ढ्क्कन निकाल कर चावल को पणुवे से चलाया. चावल के दो दानों को हाथ से मसल कर देखा. …और किसी तरह से फूंक मार मार कर चूल्हा जलाया… लकड़ियों को ऊपर कर आंच तेज की.भुला हाथ की कटोरी को एक छोटी लकड़ी से बजाता हुआ वहीं बैठ गया.

आमा को सोच पड़ गये.बाहर धीमे धीमे द्यो (बारिश) पड़ रहा है. ऎसी बारिस में गोरू-बल्दों के लिये सूखी घास का इनजाम पहले से करना होगा.अच्छा किया ब्वारी (बहू) को रतैब्याण ही जंगल में भेज दिया. कुछ हरी घास काट के ले आयेगी तो गोठ में रखी सूखी घास थोड़ी ज्यादा चल जायेगी…. नहीं तो फिर वो नये वाले लूटे से घास निकालनी पड़ेगी. तीन दिन से मोव (गोबर) भी नहीं निकाला.थोड़ा द्यो कम हो तो आज मोव निकाला जाय.हाथ के सारे पैसे भी खतम हो गये. खिमुवा का मनीआर्डर आने में तो अभी और दस दिन में बांकी है. आज बुबु (दादा) किसी जजमानी में जायें तो कुछ पैसा मिले. अभी हरिया को पैसे भी देने है. पिछ्ले हफ्ते मडुवा पिसाया था ना. …खिमुवा की चिट्ठी आये भी पन्द्रह दिन से ऊपर हो गये.सब कुशल ही होगी. ये फौज की नौकरी भी ना एकदम बेकार है… एक साल से खिमुवा घर नहीं आया. इस बार आयेगा तो उसको बोलुंगी..क्या फायदा ऎसी नौकरी का..अब यहीं रह जा..यहीं कोई छोटी मोटी दुकान खोल ले नहीं तो कही चपरासी की नौकरी ही कर ले.. शायद मान जाये… लेकिन कहीं वो अपने दगड़ुवों के चक्कर में पड़ गया तो..रोज शाम को सब शराब पीके आते हैं फिर अपनी सैणी (पत्नी) को मारते हैं.. ना हो ना..उससे तो मेरा खिमुवा ही अच्छा..साल में एक बार घर आता है तो सब उसकी कितनी इज्जत करते हैं..सबको वो मिलट्री के रम की बोतल दे देता है तो साल भर सब उसके गुणगान करते है.. कल ही चिमुली के बौज्यू ब्वारी से कह रहे थे.. धुल्हैणी (बहू) ..कब आ रहा है हो खिमुवा….वो भी अपनी रम की बोतल के जुगाड़ में होंगे…

तभी चावल उबल कर उसका पानी चूल्हे में गिरने लगा. छ्यां की आवाज से आमा की तंद्रा भंग हुई.

लगता है चावल पक गया. आमा पतीली को हटा जंबू के धुंगार की तैयारी करने लगी.

सामने भुला लिपी हुई जमीन में कोयले से कोई नयी आकृति बना रहा था.

[पहाड़ की ठंड का अपना एक अलग ही आनन्द है. इस आनन्द को वही महसूस कर सकता है जिसने इसको जिया है,एक टूरिस्ट की भांति एक-दो दिन के लिये नहीं बल्कि कई दिनों तक. उस पर से पहाड़ी भाषा,जो मूल रूप से कुमांउनी या गढ़वाली बोली के रूप में जानी जाती है,उसकी अपनी अलग ही मिठास है..पहाड़ी भाषा में बोलने वाला यदि हिन्दी भी बोलेगा तो उसका अपना एक अलग ही अन्दाज होगा. उसमें पहाड़ी के शब्द तो आयेंगे ही साथ ही एक नये तरीके के वाक्य-विन्यास की भी रचना होगी. लीजिये आज उसी का एक नमूना प्रस्तुत है.यह एक अधेड अप्रवासी व्यक्ति से की गयी काल्पनिक बातचीत है जो अपने घर को छोड़ कर अपने भाई भतीजों के साथ मैदानी इलाके में रह रहा है.कुछ शब्दों के अर्थ हो सकता है आपकी समझ में ना आयें.हाँलाकि मैने कहीं कहीं शब्दों के हिन्दी पर्याय भी लिख दिये हैं फिर भी कोई समस्या हो तो टिप्पणियो से बतायें. ]  

मैने कका से पूछा.कका कुछ पहाड़ की ठंड के बारे में भी बताओ ना.

अब क्या बताऊं भुला.. ठंड वो भी पहाड़ की …सुनके ही जैसे ठंड लग जा रही है हो….गरम कपड़े तो लगभग साल भर निकले ही रहने वाले हुए …थोड़े से द्यो की तोप ( बारिश की बूंदें) क्या पड़ी तो कंबल रजाई सब निकल जाने वाली हुई.पांच पांच किलो की रजाई होने वाली हुई वहाँ तो ….यहाँ कि चाव (कपड़े का टुकड़ा) जैसी रजाई से काम थोड़े चलने वाला हुआ. पंत ज्यू अपना बास्कट निकालने को जैसे तैयार ही ठहरे बल. द्यो पड़ा और उनका बास्कट,बंद गले का कोट निकल जाने वाला हुआ.कानों को मफलर से ढंक कर,हाथों में ऊन के दस्ताने पहने पांडे ज्यू गूड़ की टपुक के साथ घर में चहा पीने वाले ठहरे और ऑफिस में घाम (धूप) सेकते सेकते फसक (गप) मारने वाले ठहरे.काम ना करने के जितने paharबहाने ले लो उनसे.

‘अब इतने जाड़े में कैसे काम होने वाला ठहरा.हाथ की उंगलियां जैसे पताल चली गयी हैं. मुँह से सांस की जगह भाप निकल रही है.ला हो बिसन सिंह एक चहा और पिला यार.‘ पूरा दिन जैसे चाय पीने और घाम सेकने में ही निकल जाने वाला हुआ.

तेरी काखी (चाची) का हाल भी बुरा हुआ.सुबह उठ कर पहला काम हुआ बाहर पटांगण (आंगन) में चूल्हा जलाना. वो छिलुके से पहले चूल्हा जलायेगी और फिर पानी गरम करने वाले डेक (भगोना) को पानी से भर कर रख देगी. अब उस समय ना तो गैस हुई ना ही पानी गरम करने के लिये गीजर.ये सब तो आजकल के साधन हुए भुला हमारे जमाने में ये सब कहाँ हुआ.फिर नौले से फौंले (तांबे की गगरी) में सर में रखकर पानी लाने वाली हुई तब ताजे पानी से चाय बनने वाली हुई.ज्यादा ठंड हुई तो मेथी भूंट के उसकी चाय बना ली.तू तो तब छोटा ही था रे.तू तो तब सात सात दिन तक बिना नहाये हुए रहने वाला हुआ. बस मुँह धो के स्कूल चला जाने वाले हुआ.

बनियान (स्वेटर) उस समय हाथ से बुनी जाने वाली हुई.यह आजकल के मशीन वाले स्वेटर जो क्या हुए उस समय. पुराने स्वेटरों को उधाड़ कर रंग बिरंगी स्वेटर घर-पन के लिये और बजार के लिये खजूरे के डब्बे जैसी बुनाई वाला स्वेटर. जाड़ों में तो तुम लोगों की छुट्टी हो जाने वाले ठहरी . तू तो भींणे में घाम की झलक दिखी नहीं वहीं पर खड़ा हो जाने वाला ठहरा.

आदमी लोगों के ऑफिस जाने के बाद औरतों का काम जल्दी जल्दी पूरा होने वाला हुआ.औरतें पटांगण में बैठ के भान (बरतन) माजने वाली ठहरी फिर गोरु,बल्द हका के, मोव-वोव निकाल के गुपटाले पाथने वाली ठहरी. सब काम होने के बाद दिन का कुछ समय मिलने वाला हुआ ‘क्वीड़’ (बातें) करने के लिये. उसमे भी एक दूसरे की बुनाई देखने और इधर उधर की कितनी तो बातें हुई. ‘अभी तो महालछ्मी के ऎपण भी देने हैं हो मुन्ना की ईजा. मैं बिस्वार पीस दुंगी फिर साथ ही मिल के दे देंगे.एक दिन तुमारा द्याप्ताथान (मंदिर) हो जायेगा एक दिन हमारा कर देंगे.’ या फिर ‘ चलो रे नीबू सानते हैं …जा रे हरिया एक निमू तोड़ ल्या तो और दुई जाड़ मुलैक लै लिये.’ इकादसी का बर्त (व्रत) हुआ तो मूमफली (मूंगफली) मंगा ली और सब मिलके खाने वाले हुए. 

लाई की सब्जी, आलू मेथी की सब्जी, गडेरी की भांग डाली हुई सब्जी,घौत की दाल तो जाड़ों में ही भल (अच्छी)  लगने वाली हुई.ब्याव (शाम) होते ही सब लोग अंगीठी जला लेने वाले हुए.घर के बुड़-बाड़नियों के लिये सगड़ में गुपटाले लगा के कोयले के चूरे के लड्डू सिलका देना हुआ.वो आराम से हाथ तापने वाले हुए.

क्या करें भुला अब तो घर में सब कुछ है…हीटर है ,गीजर है सब तरह की सुविधायें हैं फिर भी मन करता है कि जैसे भाग के चले जायें अपने उसी पटाल वाले आंगन में और धूप सेंकने लगें.कोई दही मूली वाला नीबू सान के लाये और उसे चट चट करते हुए खायें.जंबू का धुंगार लगाये हुए भट के डुबके हों, दाणिम की चटनी हो….भांगे का नमक हो…क्या क्या सोचूँ ..क्या क्या इच्छा करूँ …पूरी थोड़े होनी है रे अब इस उमर में..

कका की आँखो के कोने गीले थे. मैं उनसे पूछ्ना चाहता था कि पहाडों में जब बरफ पड़ती है तो कैसा लगता है.लेकिन अभी नहीं फिर कभी पूछुंगा….

इससे पहले की नराई…

1. नराई के बहाने सिर्फ नराई

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