Archive for the 'उत्तराखंड' Category
कका बालकनी में बैठे हुए सामने पार्क में खेलते हुए बच्चों को देख रहे थे.साथ ही पातड़ा (पंचाग) भी देख रहे थे. मैने उनसे पूछा.
"कका.. पंचाग में क्या देख रहे हो..? "
"अरे देख रहा था हरेला कब है. भोल (कल) हरेला है."
"ओ..कल है! कका बताइये कल क्या क्या करना है. "
"अरे यहां [...]
July 16th, 2008 | Posted in उत्तराखंड, नराई | 31 Comments
डार द्रुम पलना,बिछौना नवपल्लन केसुमन झँगूला सौहे तन छवि भारी देंमदन महीपजू को बालक बसंत प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दे.
- कविवर देव
पिछ्ले अंक में हमने होली में शास्त्रीय होली की बात की थी आज उसे ही आगे बढ़ाते हैं. कुछ लोग मानते हैं पर्वतीय क्षेत्र में और विशेषकर कुमाऊं में होली की शुरुआत बसंत पंचमी [...]
May 23rd, 2008 | Posted in उत्तराखंड | 5 Comments
शाम को जब युनुस भाई की पोस्ट पर फैज की रचना का जिक्र सुना तो अपना खजाना देखा कि यह रचना तो मेरे पास थी ही और वह भी ‘गिरदा’ की आवाज में. ‘गिरदा’ ने यह रचना पिछ्ले साल दिल्ली में एक कार्यक्रम में गाई थी और सौभाग्य से उस कार्यक्रम में मैं भी शामिल था. मैने तब वह रचना रिकॉर्ड कर ली थी.
May 1st, 2008 | Posted in उत्तराखंड, पॉडकास्टिंग | 14 Comments
आज परुली बहुत खुश थी.आज उसकी बारात जो आने वाली थी. उसकी सखियाँ उसे तैयार करते करते बार बार उसे चिढ़ाती और परु इस बात का बुरा भी नहीं मानती.सर में माँगटीका, नाक में नथ, हाथों में पहुंची और पिछोड़ा ओढ़ी हुई परु बहुत सुन्दर लग रही थी. बारात आने में अभी देर थी. परुली [...]
April 16th, 2008 | Posted in उत्तराखंड, कहानी | 19 Comments
“परु तो जर से हणक रही है हो.” (परु को तेज बुखार है). परुली की ईजा ने जजमानी के लिये निकलते हुए जोस्ज्यू से कहा.
“ठीक है मैं गड़वा बॉज्यू के वहां से ब्याव को (शाम को) मिक्सचर लेते आउंगा.”
परुली स्कूल भी नहीं गयी. दिन भर बुखार से तपती रही. उसकी ईजा ने ही [...]
April 9th, 2008 | Posted in उत्तराखंड, कहानी | 11 Comments
मलगाड़ से लौटते समय जोसज्यू सोच रहे थे कि पांडे ज्यू का कहना भी सही ही ठहरा. परुली तो अभी नानतिन ही हुई. उसे अभी अकल जो क्या हुई अरे हम लोगो को ही उतनी अकल जो क्या ठहरी. पांडे ज्यू की रिश्तेदारी तो लखनऊ, दिल्ली सभी जगह ठहरी. वह बराबर दिल्ली, लखनऊ जाते रहने [...]
April 2nd, 2008 | Posted in उत्तराखंड, कहानी | 19 Comments
छालड़ि का एक प्रमुख हिस्सा होता है अशीष (आशीर्वाद) देने का. हर घर में होली गाने के बाद होली का मुखिया अपने साथियों के साथ घर के मुखिया और उसके पूरे परिवार को लाख बरस जीने का आशीर्वाद देता है. यह आशीर्वाद पहले एक गाने के रूप में सभी देवताओं को दिया जाता है.
March 27th, 2008 | Posted in उत्तराखंड | 7 Comments
जोस्ज्यू तुम्हारी तो मति मारी गयी है.इतना अच्छा घर कहाँ मिलेगा परुली को. चिंन्ह भी कैसा बढिय़ा साम्य हुआ ठहरा. शादी ब्या तो अंजल (संजोग) की बात होने वाली हुई. पहले तो डॉक्टर बनना ही कितना मुश्किल हुआ फिर परुली को डॉक्टर बना भी लिया तो कौन सा उसको जनम भर अपने घर में रख लोगे. ब्या तो तब भी करना ही पड़ेगा ना.
March 26th, 2008 | Posted in उत्तराखंड, कहानी | 24 Comments