<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="0.92">
<channel>
	<title>काकेश की कतरनें</title>
	<link>http://kakesh.com</link>
	<description>Kakesh's KudKud</description>
	<lastBuildDate>Mon, 28 Feb 2011 22:10:14 +0000</lastBuildDate>
	<docs>http://backend.userland.com/rss092</docs>
	<language>en</language>
	<!-- generator="WordPress/3.1" -->

	<item>
		<title>लिखना जरूरी क्यों है?</title>
		<description><![CDATA[जब से ब्लॉगिंग से अल्पविराम(?) लिया है तब से कई मित्रों, पाठकों, शुभचिंतकों ने कई तरीकों से उलाहना दिया है कि मैं लिखता क्यों नहीं। बीच में ऐसे ही कुछ उलाहने सुनने के बाद आने का मन बना लिया था लेकिन एक पोस्ट लिखने के बाद मन बना ही नही। इधर अतुल भाई कई बार <a href='http://kakesh.com/2010/why-to-blog-or-write/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2010/why-to-blog-or-write/</link>
			</item>
	<item>
		<title>महबूबा ..महबूबा ..</title>
		<description><![CDATA[यदि इस पोस्ट का टाइटल पढ़कर आपको फिल्म शोले की याद आ जाये तो इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, लेकिन मैं ना तो आज आपको फिल्म शोले का गाना सुना रहा और ना ही अपनी महबूबा के बारे में बता &#8216;सच का सामना&#8216; कर अपने एक अदद पत्नी को परेशान ही कर रहा हूँ। <a href='http://kakesh.com/2009/mahbooba-mahbooba-not-sholey-but-something-else/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2009/mahbooba-mahbooba-not-sholey-but-something-else/</link>
			</item>
	<item>
		<title>रुका हूँ &#8230;चुका नहीं हूँ&#8230;</title>
		<description><![CDATA[इस ब्लॉग पर कुछ भी लिखे हुए एक साल से ऊपर हो गया है। इस बीच ना जाने कितने नये ब्लॉग आ गये होंगे.. कितने इस ब्लॉगजगत से उकता कर जा चुके हौंगे..लेकिन मैं ना तो उकताया हूँ ना ही ब्लॉग से बोर हुआ हूँ। हाँ&#8230; कुछ दिनों के लिये अपने दूसरी जिम्मेवारियों को निभाने <a href='http://kakesh.com/2009/i-will-be-back-soon/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2009/i-will-be-back-soon/</link>
			</item>
	<item>
		<title>कोई दीवार सी गिरी है अभी</title>
		<description><![CDATA[सरकस में करतब दिखाने वाली लड़की तने हुए तार पर चलती है। लेकिन क्या बात है, वो तो अपने आप को खुली छतरी से संतुलित करती रहती है। जरा डगमगा कर गिरने लगती है तो दर्शक पलकों पर झेल लेते हैं।]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/khoya-pani-3-13/</link>
			</item>
	<item>
		<title>नराई हरेले की</title>
		<description><![CDATA[कका बालकनी में बैठे हुए सामने पार्क में खेलते हुए बच्चों को देख रहे थे.साथ ही पातड़ा (पंचाग) भी देख रहे थे. मैने उनसे पूछा. &#34;कका.. पंचाग में क्या देख रहे हो..? &#34; &#34;अरे देख रहा था हरेला कब है. भोल (कल) हरेला है.&#34; &#34;ओ..कल है! कका बताइये कल क्या क्या करना है. &#34; &#34;अरे <a href='http://kakesh.com/2008/harela-festival-of-uttarakhand/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/harela-festival-of-uttarakhand/</link>
			</item>
	<item>
		<title>मुगल वंश हो तो ऐसा</title>
		<description><![CDATA[झुग्गी और कीचड़ देखकर उन्हें अचानक ख़याल आया कि मेरी शिकायत पर इस व्यक्ति को अगर जेल हो भी जाये तो इसके तो उल्टे ऐश हो जायेंगे। मौलाना पर फेंकने के लिये लानत-मलामत के जितने पत्थर वो जमा करके आये थे, उन सब पर दाढ़ियां लगाकर नमाज की चटाइयां लपेट दी थीं ताकि चोट भले ही न आये, शर्म तो आये-वो सब ऐसे ही धरे रह गये। उनका हाथ जड़ हो गया था। इस व्यक्ति को गाली देने से फ़ायदा? इसका जीवन तो ख़ुद एक गाली है।]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/what-a-mughal-dynasty/</link>
			</item>
	<item>
		<title>&quot;दैनिक भास्कर&quot; में &quot;विस्फोट&quot;</title>
		<description><![CDATA[कुछ समय पहले समकाल में संजय तिवारी जी का लेख छ्पा था जिसमें उन्होने हिन्दी ब्लॉग जगत के बारे में लिखा था. उसके बाद भी वह कुछ समय तक समकाल में लिखते रहे. पिछ्ले कई महीनों से वह अपने अलग डोमेन पर चले गये हैं और अपनी पत्रिका विस्फोट के द्वारा कई सामयिक मुद्दों को <a href='http://kakesh.com/2008/visfot-in-dainik-bhaskar-indore/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/visfot-in-dainik-bhaskar-indore/</link>
			</item>
	<item>
		<title>कौन किसका खाना है?</title>
		<description><![CDATA[अकेलेपन का साथी इस क़िस्से से हमने उन्हें सीख दिलायी। क़िबला ने दूसरे पैंतरे से घोड़ी खरीदने का विरोध किया। वो इस बात पर ग़ुस्से से भड़क उठते थे कि बिशारत को उनके चमत्कारी वजीफ़े पर विश्वास नहीं। वो ख़ासे गलियर थे। बेटे को खुल कर तो गाली नहीं दी। बस इतना कहा कि अगर <a href='http://kakesh.com/2008/we-are-food-of-each-other-2/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/we-are-food-of-each-other-2/</link>
			</item>
	<item>
		<title>कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी</title>
		<description><![CDATA[किसी शुभचिंतक ने उन्हें सलाह दी थी कि जिस घर में कुत्ते हों, वहां फ़रिश्ते, बुजुर्ग और चोर नहीं आते। उस जालिम ने यह न बताया कि फिर सिर्फ़ कुत्ते ही आते हैं। अब सारे शहर के बालिग़ कुत्ते उनकी कोठी का घेराव करे पड़े रहते हैं। शहजादी स्वयं शत्रु से मिली हुई है।]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/khoya-pani-3-what-to-do-with-horse-now/</link>
			</item>
	<item>
		<title>घोड़े का इलाज जादू से</title>
		<description><![CDATA[जादू मंत्र द्वारा उपचार रिश्वत और मालिश की रक़म अब घोड़े की क़ीमत और उनकी सहनशक्ति की सीमा को पार कर चुकी थी। पकड़-धकड़ का सिलसिला किसी प्रकार समाप्त होने में नहीं आता था। तंग आकर उन्होंने रहीम बख़्श की जबानी इंस्पेक्टर को यह तक कहलाया कि तुम मेरी दुकान में उगाही की नौकरी कर <a href='http://kakesh.com/2008/horse-and-magical-treatment/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/horse-and-magical-treatment/</link>
			</item>
	<item>
		<title>महात्मा बुद्ध बिहारी थे</title>
		<description><![CDATA[गुजराती में कहावत है कि पैसा तो शेरनी का दूध है! इसे हासिल करना और पचाना दोनों बराबर मुश्किल है। पर तुम तो साला शेर को ही दुहना मांगता है । हम करोड़ों का बिजनेस करेला है। आज दिन-तलक जबान दे-के नईं फिरेला। अच्छा अगर तुम क़ुरान पर हाथ रख के बोल दो कि तुम घोड़ा ख़रीदते टेम पियेला था तो हम तुरंत एक-एक पाई रिफ़ंड कर देगा।’’]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/khoya-pani-3-buddha-was-a-bihari/</link>
			</item>
	<item>
		<title>इंजी मैं तुम्हारे साथ हूँ</title>
		<description><![CDATA[इंजी पेन्नू का अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होने http://kerals.com/ पर एक मलयालम ब्लॉग द्वारा सामग्री को चुराने का आरोप लगाते हुए एक ई-मेल लिखा था. बदले में इस साइट की ओर से उन्हे धमकी भरे ई-मेल भेजे गये. उन्हे शारीरिक क्षति पहुंचाने की धमकी दी गयी. उनके प्रोफाइल को एक पोर्न साइट से लिंक <a href='http://kakesh.com/2008/stealing-threat-abuse-to-a-woman-blogger/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/stealing-threat-abuse-to-a-woman-blogger/</link>
			</item>
	<item>
		<title>शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर</title>
		<description><![CDATA[जब शेर और बकरी एक ही घाट पानी पीने लगें तो समझ लो कि शेर की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर है। महमूद व अयाज का एक ही पंक्ति में बैठकर खाना भी ‘‘ऑडिट एंड इंस्पेक्शन’’ का हिस्सा है। सेठ साहब वास्तव में यह पता लगाना चाहते हैं कि खाने वाले अस्ली फ़क़ीर हैं या मैनेजर ने अपने यारों-रिश्तेदारों की पंगत बिठा दी है।]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/khoya-pani-3-a-horse-and-goat/</link>
			</item>
	<item>
		<title>अलाहदीन अष्टम</title>
		<description><![CDATA[अलाहदीन अष्टम उनके रोग न केवल बहुत से थे, बल्कि बहुत बढ़े हुए भी थे। इनमें सबसे खतरनाक रोग बुढ़ापा था। उनका एक दामाद विलायत से सर्जरी में नया-नया एफ़आर. सी.एस. करके आया था। उसने अपनी ससुराल में किसी का एपेंडिक्स बाक़ी नहीं छोड़ा। किसी की आंख में भी तकलीफ़ होती तो उसका एपेंडिक्स निकाल <a href='http://kakesh.com/2008/khoya-pani3-alahdin-ashtam/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/khoya-pani3-alahdin-ashtam/</link>
			</item>
	<item>
		<title>कविता की किलकारी</title>
		<description><![CDATA[1. रेबीज के नये इंजेक्शन की कसम, किसी कुत्ते में कहां है वह दम, जो भोंकता भी हो, चाटता भी हो,गरियाता भी हो, काटता भी हो,हम तो ऐसे ही थे, औरऐसे ही रहेंगे सनम. 2. तेरे बिना जिन्दगी का नूर चला जायेगा,बिन काटे किसी को क्या मजा आयेगा,गाली खाने से नहीं डरते हैं हम,मेरे दोस्तखायी <a href='http://kakesh.com/2008/funny-poem-on-blogging/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/funny-poem-on-blogging/</link>
			</item>
	<item>
		<title>कवि का कलपना</title>
		<description><![CDATA[केडीके महोदय बालकिशन जी की इस पोस्ट पर अपना कुदरती कवितायी हुनर दिखाना चाहते थे लेकिन सफल नहीं हुए तो हमको बोले कि इस &#8220;कवि की कल्पना&#8221; को किसी तरह ठेल दो. हमको भला क्या तकलीफ.हम ठेल रहे हैं. गाली.प्रसंशा सब केडीके साहब की.&#160;&#160; बालकिशन जी आप किस शोध के चक्कर में पढ़ गये. हमें <a href='http://kakesh.com/2008/kavi-ki-kalpana/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/kavi-ki-kalpana/</link>
			</item>
	<item>
		<title>जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये</title>
		<description><![CDATA[लज्जा और अपमान की सबसे जलील सूरत यह है कि व्यक्ति स्वयं अपनी दृष्टि में भी कुछ न रहे। सो वो इस नर्क से भी गुजरे-उनका बायां बेजान हाथ अलग लटका इस गुजरने की तस्वीर खींचता रहता।]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/khoya-pani3-horse-type-life/</link>
			</item>
	<item>
		<title>कौन हैं आप यह महत्वपूर्ण नहीं!</title>
		<description><![CDATA[आप बहुत बड़े हो सकते हैं.उच्च पद पर आसीन हो सकते है, बड़े ब्लॉगर हो सकते हैं, बड़े साहित्यकार हो सकते हैं, दार्शनिक भी हो सकते हैं, बड़े और गरिष्ठ वरिष्ठ कवि भी, बड़े कलाकार भी,बड़े व्यवहार कुशल भी,बड़े लेखक भी,बड़े व्यंग्यकार भी.लेकिन इन सबसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप परिणाम कैसे दे रहे <a href='http://kakesh.com/2008/result_that_matters/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/result_that_matters/</link>
			</item>
	<item>
		<title>सवारी हो तो घोड़े की</title>
		<description><![CDATA[शाही सवारी उन्हें इस घोड़े से पहली नजर में मुहब्बत हो गयी और मुहब्बत अंधी होती है, चाहे घोड़े से ही क्यों न हो। उन्हें यह तक सुझायी न दिया कि घोड़े की प्रशंसा में उस्तादों के जो शेर वो ऊटपटांग पढ़ते फिरते थे, उनका संबंध तांगे के घोड़े से नहीं था। यह मान लेने <a href='http://kakesh.com/2008/khoya-pani-horse-ride/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/khoya-pani-horse-ride/</link>
			</item>
	<item>
		<title>पर्वतीय क्षेत्र की शास्त्रीय होली</title>
		<description><![CDATA[डार द्रुम पलना,बिछौना नवपल्लन केसुमन झँगूला सौहे तन छवि भारी देंमदन महीपजू को बालक बसंत प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दे. - कविवर देव पिछ्ले अंक में हमने होली में शास्त्रीय होली की बात की थी आज उसे ही आगे बढ़ाते हैं. कुछ लोग मानते हैं पर्वतीय क्षेत्र में और विशेषकर कुमाऊं में होली की शुरुआत <a href='http://kakesh.com/2008/classical-holi-of-kumaon/'>[...]</a>]]></description>
		<link>http://kakesh.com/2008/classical-holi-of-kumaon/</link>
			</item>
</channel>
</rss>

