पिछ्ले दिनों एक सेमिनार में गया था और एअरर्पोर्ट पर एक किताब दिखायी थी “डब्बेवाले”. डब्बेवालों के बारे में काफी कुछ सुना था. सुना था कि आई-आई-एम वाले लोग उन पर अध्ययन कर चुके हैं. एक बार बंगलौर में मुझे भी एक सेमिनार में इस संस्था के लोगों द्वारा ही तैयार किया प्रजेंटेसन देखने को मिला था. जिसमें इस बात का भी जिक्र था कि किस प्रकार यह लोग सिक्स सिगमा ( Six Sigma) के मानकों को पूरा करते हैं. इसी जिज्ञासावस वह किताब खरीद ली. मात्र 110 रुपये में. डायमंड पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक श्रीनिवास पंडित ने लिखी है. हाँलाकि जिस जिज्ञासा के साथ यह किताब खरीदी थी वह पूरी तो नहीं हुई लेकिन कुछ बातें जरूर सीखने को मिली.

अपनी भूमिका में श्रीनिवास कहते हैं.

मैं आपको एक व्यावसायिक सफलता की कहानी की तलाश के बारे में बताने को उत्सुक हूँ. क्योंकि मैंने इस दीर्घकालीन सफलता के बीच गहरे मूल्यों की जानकारी  को जाना है. यहां मैं वही कीमती जानकारी आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे पढ़कर आप इस व्यवसाय की सफलता का आनंद ले सकेंगे.जो संगठन दिमाग चकरा देने वाले बदलाव के पहलुओंdabbe-wale का सामना कर रहा हो, उसके कार्यकर्त्ताओं के रचनात्मक प्रयास सफलता की कहानी के सच्चे पात्र बनते हैं.

*****

इससे मुझे लाओत्से की प्रसिद्ध उक्ति याद आती है—‘‘निरंतरता की पहचान से ही निष्पक्ष नजरिया पैदा होता है.’’ इसका अर्थ है कि हमें बदलाव की इस उलझी हुई पहेली में निरंतर ‘स्थिरता’ को पहचानना चाहिए. ‘स्थिरता’ व ‘अस्थिरता’ में भेद करने के लिए हमें उन व्यवसायों व उनसे जुड़े लोगों का, जिन्होंने प्रतिवर्ष-स्थायी सफलता अर्जित की है, का अध्ययन करना आवश्यक है.

*************

यह 115 साल पुराने व्यवसाय की कहानी है, जिसे 5000 कम पढ़े-लिखे लोग मिलकर चलाते हैं. यहाँ मेरे सहित चार पात्रों के संवादों द्वारा कहानी प्रस्तुत की गई है. रघुनाथ मेगड़े (रघु) (48), व गंगाराम तालेकर (गंगा) (55), मुंबई के टिफिन बॉक्स कोरियर यानि डिब्बेवाले हैं. रघु कला स्नातक है जबकि गंगा आठवीं पास है. वे गांव के सीधे-साधे कृषि समुदाय में पले-बढ़े उन्होंने स्थानीय मराठी भाषा में अपनी पढ़ाई की.

******

हालांकि वे ‘मराठी युक्त अंग्रेजी’ में अपने भाव आसानी से प्रकट कर देते हैं. वे बड़े जोश से अपनी कहानियाँ सुनाते हैं. फिर भी वे गप्पी नहीं हैं. जैसा कि रघु ने मुझे बताया—‘‘अंग्रेजी भाषी लोगों से मिलने के कारण हमारी बातचीत की कला में निखार आया.’’ रघु का स्वभाव थोड़ा शुष्क है जबकि गंगा का स्वभाव मस्त है.

मैं डब्बेवालों की धीमी सांस्कृतिक पर्यावरण को अच्छी तरह जानता हूँ अतः यह निरीक्षण वास्तव में काफी अद्भुत रहा कि वे किस तरह घनी आबादी वाले मुंबई की सड़कों के व्यस्त घंटों में डिब्बे ले जाते हैं.

महानगरी मुंबई के रंग-बिरंगी पोशाकों में सजे स्त्री-पुरुष व बच्चों के बीच इनकी धुंधली सफेद कमीज़, पजामा व स्काउट की तरह पहनी गई टोपी, बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है. आप डिब्बेवालों को लगातार गाड़ियों, बसों, कारों, वैनों, ट्रकों, ऑटों, साइकिलों, ठेलों, पदयात्रियों व बर्फ लाने वाले ठेलों की मैराथन में सबसे आगे दौड़ता पाएँगे. जहाँ सारा दिन लापरवाही से सड़क क्रॉसिंग, ओवरटेकिंग, गति सीमा, भोंपू का स्वर इत्यादि कार्य ही होते रहते हैं.

यह भी एक पहेली है कि वे पिछले 115 वर्षों से किस तरह रोज-दर-रोज, सप्ताह-दर-सप्ताह, माह-दर-माह, साल-दर-साल, सारे मौसमों में अपने डिब्बों को सही समय पर पहुँचाने के लिए, अपने ठेलों को सड़क पर भगाते आ रहे हैं.
*******

अनीता (अ), रघु (र) गंगा (ग) व स्वयं (श्री) की बातचीत आपको एक ऐसे साधारण व्यावसायिक नमूने के बारे में बताएगी, जो एशिया की 11 करोड़ आवादी  वाली विशालतम महानगरी में शून्य वास्तविकता के आधार पर काम करता है. संवाद भी बुद्धिमत्ता व तर्क से भरपूर हैं.

******

पहला अध्याय

यह जीवंत संवाद परंपरा व आधुनिकता, मनुष्य व मशीन, पर्यावरण व तकनीक तथा उपयोग व उपभोक्तावाद के शाश्वत संघर्षों पर रोशनी डालते हैं. पाने व संतुष्ट होने की लड़ाई लगातार जारी है. डिब्बेवालों ने अपने मूल्यों में ही छिपा जीवन अमृत पा लिया है. उपलब्धि, महत्ता, धरोहर व प्रसन्नता का संगम ही उन्हें कामकाजी जीवन का संतुलन देता है.

अनीता ने काव्यात्मक शैली में इस वातावरण का वर्णन किया. उसके पास विद्वतापूर्ण नजरिया है, जो उसे उत्सुकतापूर्वक अच्छी बातें बाँटने की प्रेरणा देता है. इसी बातचीत के दौरान उसने रघु व गंगा से हुई भेंट के बारे में बताया.

अ.    क्या आप इन डब्बेवालों व उनके अविश्वसनीय डिलीवरी रिकॉर्ड के बारे में जानते हैं ?

श्री. हाँ, मैं जानता हूँ.

अ.    यह अर्धशिक्षित 5000 डब्बेवाले, 60 कि.मी. के दायरे में, 2,00,000 लोगों को, केवल 3 घंटे के भीतर घर का पका भोजन पहुँचाते हैं. हर रोज 4,00,000 बार लेन-देन होता है. कार्यस्थल व आवासीय क्षेत्र किसी बिखरे हुए चित्र की तरह फैले हुए हैं. सचमुच एक अद्भुत कहानी है.

श्री. इसमें कोई शक नहीं है.

अ.    16 मिलियन लेन-देन में मूल दर 1% है. यह एक अविश्वसनीय समय प्रबंध है. मुंबई तेजी से अपने पाँव फैलाती जा रही है. इस समय इसकी जनसंख्या 10.3 मिलियन के करीब है. फास्ट-फूड, रेस्त्रां व पटरी पर खाने-पीने का सामान बेचने वाले खोमचे भी चारों ओर फैले हुए हैं. फिर भी नूतन मुंबई टिफिन बाक्स सप्लायर्स एसोसिएशन धीरे-धीरे तरक्की कर रहा है.

श्री. तुम्हारे हिसाब से इसकी खास वजह क्या है ?

अ.    घर का बना भोजन पाने की इच्छा. अगर उचित कीमत पर घर से ऑफिस तक टिफिन पहुँच जाए. अब भी ज्यादातर लोग घर के बने भोजन को ही प्राथमिकता देते हैं. दूरी, वजन या स्थान जैसी बातों को ध्यान में न रखते हुए, एक डब्बावाला ग्राहक से प्रतिमाह 200 रुपए (या 4.6 डालर) लेता है. इसके बदले में वह अपने 25-30 ग्राहकों से 5000-6000 रु. (तकरीबन 116-140 डालर) कमा लेता है. दूसरे देशों में लोगों के पास ऐसी सुविधा नहीं है. लेकिन आप किसी से भी पूछें, खासतौर पर कहीं के भी निम्न आय-वर्गीय लोग, घर का बना भोजन ही लेना पसंद करेंगे. यह इच्छा इतनी बुनियादी है कि इसमें बदलाव आ ही नहीं सकता. बाहरी भोजन की उपलब्धता व आकर्षण के बावजूद घर का पका भोजन सदैव सराहा जाता रहेगा.

पिछ्ली समीक्षा :
चयनम् : क्या साहित्य विफल है ?

 

इस अंक में देखिये कि बिशारत, जो मास्टरी की नौकरी के लिये तहसीलदार मौलवी मज्जन के पास जा रहे हैं, उनको मौलवी के बारे में क्या क्या बातें पता चलती हैं.

***

मौलवी मज्जन से तानाशाह तकः तहसीलदार तक सिफ़ारिश पंहुचाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। अलबत्ता मौलवी मुजफ़्फ़र (जो तिरस्कार, संक्षेप और प्यार में मौली मज्जन कहलाते थे) के बारे में जिससे पूछा, उसने नया ऐब निकाला। एक साहब ने कहा, क़ौम का दर्द रखता है हाकिमों से मेलजोल रखता है पर कमीना है, बच के रहना। दूसरे साहब बोले मौलवी मज्जन एक यतीमख़ाना शम्स-उल-इस्लाम भी चलाता है। यतीमों से अपने पैर दबवाता है। स्कूल की झाड़ू दिलवाता है और मास्टरों को यतीमों की टोली के साथ चंदा इकट्ठा करने कानपुर और लखनऊ भेजता है, वो भी बिना टिकिट। मगर इसमें कोई शक नहीं कि धुन का पक्का है। धीरजगंज के मुसलमानों की बड़ी सेवा की है। धीरजगंज के जितने भी मुसलमान आज पढ़े-लिखे और नौकरी करते नजर आते हैं वो सब इसी स्कूल के जीने से ऊपर चढ़े हैं। कभी-कभी लगता था कि लोगों को मौलवी मुजफ़्फ़र से ईश्वरीय बैर हो गया है। बिशारत को उनसे एक तरह की हमदर्दी हो गई। यूं भी मास्टर फ़ाख़िर हुसैन ने एक बार बड़े काम की नसीहत की थी कि कभी अपने बुजुर्ग या बॉस या अपने से अधिक बदमाश आदमी को सही रास्ता बताने की कोशिश न करना। उन्हें ग़लत राह पर देखो तो तीन ज्ञानी बंदरों की तरह अंधे, बहरे और गूंगे बन जाओ! ठाठ से राज करोगे!

एक दिलजले बुजुर्ग, जो ‘जमाना’ पत्रिका में काम करते थे, फ़र्माया, वो छाकटा ही नहीं, चरकटा भी है। पच्चीस रुपये की रसीद लिखवा कर पन्द्रह रुपल्ली हाथ पे टिका देगा। पहले तुम्हें जांचेगा, फिर आंकेगा, इसके बाद तमाम उम्र हांकेगा। उसने दस्तख़त करने उस वक़्त सीखे जब चंदे की जाली रसीदें काटने की जुरूरत पड़ी। अरे साहब! सर सय्यद तो अब जा के बना है मैंने अपनी आंखों से उसे अपने निकाहनामे पे अंगूठा लगाते देखा है। ठूंठ जाहिल है मगर बला का गढ़ा हुआ, घिसा हुआ भी। ऐसा-वैसा चपड़क़नात नहीं है, लुक़्क़ा भी है, लुच्चा भी और टुच्चा भी। बुजुर्गवार ने एक ही सांस में पाजीपन के ऐसे बारीक शेड्स गिनवा दिये कि जब तक आदमी हर गाली के बाद शब्दकोष न देखे या हमारी तरह लम्बे समय तक भाषाविदों की सुहबत के सदमे न उठाये हुए हो वो जबान और नालायक़ी की उन बारीकियों को नहीं समझ सकता।

सय्यद एजाज हुसैन ‘वफ़ा’ कहने लगे ‘‘मौली मज्जन पांचों वक़्त टक्करें मारता है। घुटने, माथे और जमीर पर ये बड़े-बड़े गट्टे पड़ गये हैं। थानेदार और तहसीलदार को अपनी मीठी बातचीत, इस्लाम-दोस्ती, मेहमान-नवाजी और रिश्वत से क़ाबू में कर रखा है। दमे का मरीज है। पांच मिनट में दस बार आस्तीन से नाक पोंछता है।’’ दरअस्ल उन्हें आस्तीन से नाक पोंछने पर इतना एतराज न था जितना इस पर कि आस्तीन को अस्तीन कहता है, यख़नी को अख़नी और हौसला का होंसला। उन्होंने अपने कानों से उसे मिजाज शरीफ़ और शुबरात कहते सुना था। जुहला (गंवारों) किसानों और बकरियों की तरह हर वक़्त मैं! मैं! करता रहता है। लखनऊ के शुरफ़ा (शरीफ़ का बहुवचन-भद्र लोग) अहंकार से बचने की ग़रज से ख़ुद को हमेशा हम कहते हैं। इस पर एक कमजोर और सींक-सलाई बुजुर्ग ने फ़र्माया कि जात का क़साई, कुंजड़ा या दिल्ली वाला मालूम होता है, किस वास्ते कि तीन बार गले मिलता है। अवध में शुरफ़ा केवल एक बार गले मिलते हैं।

ये अवध के साथ सरासर जियादती थी इसलिये कि सिर्फ़ एक बार गले मिलने में शराफ़त का शायद उतना दख़्ल न था जितना नाजुक-मिजाजी का और ये याद रहे कि यह उस जमाने के पारम्परिक चोंचले हैं जब नाजुक-मिजाज बेगमें ख़ुश्के और ओस का आत्महत्या के औजार की तरह प्रयोग करती थीं और यह धमकी देती थीं कि ख़ुश्कख़ार ओस में सो जाऊंगी। वो तो खैर बेगमें थीं, तानाशाह उनसे भी बाजी ले गया। उसके बारे में मशहूर है कि जब वो बंदी बना कर दरबार में बेड़ियां पहना कर लाया गया तो सवाल ये पैदा हुआ कि इसे मरवाया कैसे जाये। दरबारियों ने एक से एक उपाय पेश किये। एक ने तो मशवरा दिया कि ऐसे अय्याश को तो मस्त हाथी के पैर से बांध कर शहर का चक्कर लगवाना चाहिये। दूसरा कोर्निश बजा कर बोला, दुरुस्त, मगर मस्त हाथी को शहर का चक्कर कौन माई का लाल लगवायेगा। हाथी शहर का चक्कर लगाने के लिये थोड़े ही मस्त होता है, अलबत्ता आप तानाशाह की अय्याशियों की सजा हाथी को देना चाहते हैं तो और बात है। इस पर तीसरा दरबारी बोला कि तानाशाह जैसे अय्याश को इससे जियादा तकलीफ़ देने वाली सजा नहीं हो सकती कि इसे हीजड़ा बना कर इसी के हरम में खुला छोड़ दिया जाये। एक और दरबारी ने तजवीज पेश की कि आंखों में नील की सलाई फिरवा कर अंधा कर दो, फिर क़िला ग्वालियर में दो साल तक रोजाना ख़ाली पेट पोस्त का पियाला पिलाओ कि अपने जिस्म को धीरे-धीरे मरता हुआ ख़ुद भी देखे। इस पर किसी इतिहासकार ने विरोध किया कि सुल्तान का तानाशाह से ख़ून का कोई रिश्ता नहीं है, ये बरताव तो सिर्फ़ सगे भाइयों के साथ होता आया है। एक दिलजले ने कहा कि क़िले की दीवार से नीचे फेंक दो, मगर यह तरीक़ा इसलिए रद्द कर दिया गया कि इसका दम तो मारे डर के रस्ते में ही निकल जायेगा, अगर मक़सद तकलीफ़ पहुंचाना है तो वो पूरा नहीं होगा। अंत में वजीर ने, जिसका योग्य होना साबित हो गया, ये मुश्किल हल कर दी। उसने कहा कि मानसिक पीड़ा देकर और तड़पा-तड़पाकर मारना ही लक्ष्य है तो इसके पास से एक ग्वालिन गुजार दो।

जिन पाठकों ने बिगड़े रईस और ग्वालिन नहीं देखी उनकी जानकारी के लिये निवेदन है कि मक्खन और कच्चे दूध की बू, रेवड़ बास में बसे हुए लंहगे और पसीने के नमक से सफ़ेद पड़ी हुई काली क़मीज के एक भबके से अमीरों और रईसों का दिमाग़ फट जाता था। फिर उन्हें हिरन की नाभि से निकली हुई कस्तूरी के लख़लख़े सुंघा कर होश में लाया जाता था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

नेकचलनी का साइनबोर्ड : विज्ञापन में मौलवी सय्यद महुम्मद मजुफ्फर ने, कि यही स्कूल के संस्थापक, व्यवस्थापक, संरक्षक, कोषाध्यक्ष और ग़बनकर्ता का नाम था, सूचित किया था कि उम्मीदवार को लिखित आवेदन करने की आवश्यकता नहीं, अपनी डिग्री और नेकचलनी के दस्तावेजी सुबूत के साथ सुब्ह आठ बजे स्वयं पेश हो। बिशारत की समझ में न आया कि नेकचलनी का क्या सुबूत हो सकता है, बदचलनी का अलबत्ता हो सकता है। उदाहरण के लिये चालान,मुचलका, गिरफ़्तारी-वारंट, सजा के आदेश की नक़्ल या थाने में दस-नम्बरी बदमाशों की लिस्ट। पांच मिनट में आदमी बदचलनी तो कर सकता है नेकचलनी का सुबूत नहीं दे सकता। मगर बिशारत की चिंता अकारण थी। इसलिये कि जो हुलिया उन्होंने बना रक्खा था यानी मुंडा हुआ सर, आंखों में सुरमे की लकीर, एड़ी से ऊंचा पाजामा, सर पर मख़मल की काली रामपुरी टोपी, घर, मस्जिद और मुहल्ले में पैर में खड़ाऊं….. इस हुलिये के साथ वो चाहते भी तो नेकचलनी के सिवा और कुछ संभव न था। नेकचलनी उनकी मजबूरी थी, स्वयं अपनायी हुई अच्छाई नहीं और उनका हुलिया इसका सुबूत नहीं साइनबोर्ड था।

यह वही हुलिया था जो इस इलाक़े के निचले मिडिल क्लास ख़ानदानी शरीफ़ घरानों के नौजवानों का हुआ करता था। ख़ानदानी शरीफ़ से अभिप्राय उन लोगों से है जिन्हें शरीफ़ बनने, रहने और कहलाने के लिये व्यक्तिगत कोशिश बिल्कुल नहीं करनी पड़ती थी। शराफ़त, जायदाद और ऊपर वर्णित हुलिया पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस तरह विरसे में मिलते थे जिस तरह आम आदमी को जीन्स और वंशानुगत रोग मिलते हैं। आस्था, प्रचार, ज्ञान और हुलिये के लिहाज से पड़पोता अगर हू-ब-हू अपना पड़दादा मालूम हो तो ये ख़ानदानी कुलीनता, शराफ़त और शुद्धता की दलील समझी जाती थी।

इन्टरव्यू के लिये बिशारत ने उसी हुलिये पर रगड़ घिस करके नोक-पलक संवारी। अचकन धुलवाई, बदरंग हो गई थी इसलिये धोबी से कहा क़लफ़ अधिक लगाना। सर पर अभी शुक्रवार को जीरो नम्बर की मशीन फिरवाई थी, अब उस्तरा और उसके बाद आम की गुठली फिरवा कर आंवले के तेल की मालिश करवाई। देर तक मिर्चें लगती रहीं। टोपी पहन कर आइना देख रहे थे कि अन्दर मुंडे हुए सर से पसीना इस तरह रिसने लगा जिस तरह माथे पर विक्स या बाम लगाने से झरता है। टोपी उतारने के बाद पंखा चला तो ऐसा लगा जैसे किसी ने हवा में पिपरमेन्ट मिला दिया हो। फिर बिशारत ने जूतों पर फ़ौजियों की तरह थूक से पालिश करके अपनी पर्सनेलिटी को फ़िनिशिंग टच दिया।

सलेक्शन कमेटी का चेयरमैन तहसीलदार था। सुनने में आया था कि एपाइन्टमेन्ट के मुआमले में उसी की चलती है। फक्कड़, फ़िक़रेबाज, साहित्यिक, मिलनसार, निडर और रिश्वतख़ोर है। घोड़े पर कचहरी आता है, ‘नादिम’ (शर्मिन्दा) उपनाम रखता है, आदमी बला का जहीन और तबीयतदार है। उसे अपना तरफ़दार बनाने के लिये [बिशारत ने] बादामी काग़ज का एक दस्ता, छह-सात निब वाले क़लम ख़रीदे और रातों-रात अपनी शायरी का चमन यानी सत्ताईस ग़जलों का गुलदस्ता स्वयं तैय्यार किया। [बिशारत] ‘मखमूर’ उपनाम रखते थे जो उनके उस्ताद जौहर इलाहाबादी का दिया हुआ था। इसी लिहाज से अपनी अधूरी आद्योपान्त किताब का नाम ‘ख़ुमख़ाना-ए-मख़मूर कानपुरी सुम लखनवी’ रखा (लखनऊ से केवल इतना सम्बन्ध था कि पांच साल पहले अपना पित्ता निकलवाने के सिलसिले में दो सप्ताह के लिये अस्पताल में लगभग अर्धमूर्छित हालत में रहे थे) फिर उसमें एक विराट संकलन भी मिला दिया।

इस विराट संकलन की कहानी यह है कि अपनी ग़जलों और शेरों का चयन उन्होंने दिल पर पत्थर बल्कि पहाड़ रख कर किया था। शेर कितना ही घटिया और कमजोर क्यों न हो उसे स्वयं काटना और रद्द करना उतना ही मुश्किल है जितना अपनी औलाद को बदसूरत कहना या जंबूर से ख़ुद अपना हिलता हुआ दांत उखाड़ना। ग़ालिब तक से ये पराक्रम न हो सका। कांट-छांट मौलाना फ़ज्ले-हक़ खैराबादी के सुपुर्द करके ख़ुद ऐसे बन के बैठ गये जैसे कुछ लोग इंजेक्शन लगवाते वक़्त दूसरी तरफ़ मुंह करके बैठ जाते हैं।

बिशारत ने शेर छांटने को तो छांट दिये मगर दिल नहीं माना, इसलिये अंत में एक परिशिष्ट अपनी रद्द की हुई शायरी का सम्मिलित कर दिया। यह शायरी उस काल से संबंधित थी जब वो बेउस्ताद थे और ‘फ़रीफ़्ता’ उपनाम रखते थे। इस उपनाम की एक विशेषता यह थी कि जिस पंक्ति में भी डालते वो छंद से बाहर हो जाती। चुनांचे अधिकतर ग़जलें बग़ैर मक़्ते के थीं। चंद मक़्तों में शेर का वज्न पूरा करने के लिये ‘फ़रीफ़्ता’ की जगह उसका समानार्थक ‘शैदा’ और ‘दिलदादा’ प्रयोग किया, उससे शेर में कोई और दोष पैदा हो गया। बात दरअस्ल यह थी कि आकाश से जो विचार उनके दिमाग़ में आते थे उनके दैवीय जोश और तूफ़ानी तीव्रता को छंद की गागर में बंद करना इंसान के बस का काम न था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

साहित्य अकादमी एक संस्था है जो भारतीय भाषाओं के छ्पी विभिन्न रचनाओं को सामने लाने का माध्यम बनी है.यह अंग्रेजी में 1957 से इंडियन लिटरेचर तथा हिन्दी में 1980 के समकालीन भारतीय साहित्य जैसी पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन भी करती आ रही है.ये पत्रिकाएँ विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित श्रेष्ठ समकालीन साहित्य को प्रस्तुत करती रही हैं.chayanam

वर्ष 2006 में साहित्य अकादेमी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर अरुण प्रकाश द्वारा संपादित एक पुस्तक का प्रकाशन किया था जिसका नाम है “चयनम्” .यह अकादमी की द्विमासिक हिन्दी पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य के पिछले 25 वर्षों में प्रकाशित रचनाओं से एक चयन है, इसमें कविता कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, साक्षात्कार तथा आलोचनात्मक लेखों के साथ-साथ एक उपन्यासिका का भी समावेश किया गया है.

इसमें उर्दू के ख्याति प्राप्त आलोचक आले अहमद सुरूर, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, प्रसिद्ध नाट्यकर्मी शुंभ मित्र, भैरप्प, विजय तेन्दुलकर, फणीश्वरनाथ रेणु, त्रिलोचन शास्त्री, नागार्जुन, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, गोपीचंद्र नारंग, अली सरदार जाफ़री, प्रतिभा राय, सुनील गंगोपाध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय, अमृता प्रीतम, केशव रेड्डी, योसफ़ मेकवान, शरणकुमार लिम्बाले, ओ.एन.वी. कुरुप से लेकर युवा अंग्रेजी कथाकार मित्रा फुकन की रचनाऎं हैं.

आज प्रस्तुत है इसी पुस्तक से आले अहमद सुरुर की एक रचना “क्या साहित्य विफल है ?” के प्रमुख अंश. 

लगभग सत्तर वर्ष पहले जब टी.एस. एलियट ने कहा कि उपन्यास मर चुका है, और बाद में जब एडमंड विल्सन ने घोषणा की कि एक ‘मरती हुई विधा’ है, तो उनका आशय यही था कि दूसरे रूप और पद्धतियाँ उनका स्थान ले लेंगी. उन्होंने यह नहीं कहा कि साहित्य एक मरती हुई कला है. लेकिन इन दिनों कोई ख़ास रूप या विधा नहीं, बल्कि संरचित भाषिक प्रवचन का संपूर्ण माध्यम ही आक्रमणों के घेरे में है. दूरदर्शन और अन्य आधुनिक तकनीकी चमत्कारों के सम्मुख मुद्रित शब्द अपना आकर्षण खो रहा है. यह एक वास्तविक ख़तरा है कि किताबें बेकार हो चलें और मुद्रण केवल अल्पतम उपयोगितापरक कामों तक सीमित हो जाए.

******* तथ्य फिर भी यह है कि किताबें पहले से ज़्यादा छप और बिक रही हैं और शायद पढ़ी जाती होंगी. यह सही है, जैसा कि एक समीक्षक ने टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेण्ट में कुछ अरसा पहले इशारा किया था कि उनमें अधिकांश ‘कूड़ा’ होंगी. भारत में हालत और भी बदतर होगी, लेकिन शायद कुछ विश्वास के साथ यह दावा किया जा सकता है कि अधिकांश भारतीय भाषाओं में अभी भी कुछ उम्दा किताबें आ रही हैं और कविता तथा गद्य में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोग किए जा रहे हैं. भारतीय भाषाओं में आपस में और विदेशी साहित्य से पहले से अधिक अनुवाद देखे जा सकते हैं.

साहित्य के विभिन्न रूपों और विधाओं के बीच की सीमा-रेखाएँ धुँधली पड़ने लगी है. भाषा ख़ुद बदल रही है, नैतिक सवालों पर बहस जारी है, यद्यपि नैतिक समाधानों का प्रचलन नहीं रहा, विचारधारा की पकड़ ढ़ीली होती जा रही है तथा संशयवाद, संदेह और निराशा, अँधी आस्था, सुनिश्चित मताग्रहों और अस्पष्ट सामान्यीकरण की जगह लेते जा रहे हैं. भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में टैगोर, इक़बाल और प्रेमचंद्र जैसे महान नाम इस समय नहीं हैं. महानों का दौर समाप्त हो गया है. आकाश पर कवि छाए नहीं हैं. यह गद्य का, उपन्यास, कहानी, आत्मकथा और आलोचना का दौर है. कुछ रचनाकारों ने आलोचकों की वर्तमान हैसियत पर विरोध प्रकट किया है. आलोचक कई बार नए लेखकों की प्रतिभा को पहचानने में असफल रहे हैं; वे अधिकांशतः पुरानी अभिरुचियों में ही शरण लेते रहे हैं; विचारधारा की अपनी तालाश के मारे वे साहित्य के मूल्यांकन में नाकामयाब रहे हैं; फिर भी एक परिप्रेक्ष्य के लिए, एक मूल्यबोध और संस्कृति की खोज के लिए और इस दौर की बढ़ती हुई बर्बरता में एक सामाजिक चेतना, एक नैतिक ताने-बाने के लिए और भाषा नामक रहस्य के सम्मान के लिए आलोचक का महत्त्व है.

*******पाठक आमतौर पर रूढ़िवादी होते हैं, वे सामान्यतया साहित्य में अपनी स्थापित मर्यादाओं की स्वीकृति या एक स्वप्न-जगत में पलायन चाहते हैं. साहित्य एक झटके में उन्हें अपने आस-पास के उस जीवन के प्रति सचेत करता है, जिससे उन्होंने आँखें मूँद रखी थीं. शुतुरमुर्ग़ अफ्रीका के रेगिस्तानों में नहीं मिलते; वे हर जगह बहुतायत में उपलब्ध है. प्रौद्योगिकी के इस दौर का नतीजा जीवन के हर गोशे में नक़द फ़सल के लिए बढ़ता हुआ पागलपन है; और हमारे राजनीतिज्ञ, सत्ता के दलाल, व्यापारी, नौकरशाह- सभी लोगों को इस भगदड़ में नहीं पहुँचने, जैसा दूर करते हैं वैसा करने, चूहादौड़ में शामिल होने और कुछ-न-कुछ हासिल कर लेने को जिए जा रहे हैं. हम थककर साँस लेना और अपने चारों ओर निहारना, हवा के पेड़ में से गुज़रते वक्त पत्तियों की मनहर लय-गतियों को और फूलों के जादुई रंगों को, फूली सरसों के चमकदार पीलेपन को, खिले मैदानों की घनी हरीतिमा को मर्मर ध्वनि के सौन्दर्य, हिमाच्छादित शिखरों की भव्यता, समुद्र तट पर पछाड़ खाकर बिखरती हुई लहरों के घोस को देखना-सुनना भूल गए हैं.

कुछ लोग सोचते हैं कि पश्चिम का आधुनिकतावाद और भारत तथा अधिकांश तीसरी दुनिया के नव औपनिवेशिक चिन्तन के साथ अपनी जड़ों से अलगाव, व्यक्तिवादी अजनबियत में हमारा अनिवार्य बेलगाम धँसाव, अचेतन के बिम्ब, बौद्धिकता से विद्रोह, यह घोषणा की ‘दिमाग़ अपनी रस्सी के अंतिम सिरे पर है’, यथार्थवाद का विध्वंस, काम का ऐन्द्रिक सुख मात्र रह जाना और मानवीय भावनाओं का व्यावसायीकरण तथा निम्नस्तरीयकरण इस अँधी घाटी में आ फँसने की वजह है. लेकिन वे भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण इतिहास की एक सच्चाई है, कि नई समस्याओं को जन्म देने और विज्ञान को अधिक जटिल बनाने के बावजूद आधुनिकीकरण, एक तरह से, मानव जाति की नियति है.

वे यह भी भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण सौ फीसदी पश्चिमी करण नहीं है, बल्कि एक बिन्दु के बाद यह अपना रास्ता ख़ुद बनाता है. हमें इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि भारतीय पुनर्जागरण उदीयमान बुर्जुआ वर्ग़ द्वारा अपनी ज़रूरतों के लिए अपहृत कर लिया गया और अधूरा ही रह गया. हमें मशीम द्वारा मनुष्य के विस्थापन, महानगरों के जंगलों का निर्माण और प्रगति के नाम पर सत्ता की राजनीति को भी समझना चाहिए. आधुनिकता के बहुत से आयाम हैं, लेकिन पश्चिम में पूँजीवाद की भूमिका से सीख लेते हुए भारत में भी इसे समग्र मनुष्य के बारे में महसूस करने और सोचने को हतोत्साहित किया और ऊब तथा मनुष्य में छिपे पशुत्व के रसातल में उदास चिन्तन के रेगिस्तान को बढ़ावा दिया है. मानवता और मानवीयता की जगह बर्बरता और पशुत्व ने ले ली है. ‘नवता’, स्टीफ़ोन स्पेण्डर द्वारा प्रयुक्त पद, की तालाश में कुछ लोगों ने अच्छे लेखन को ‘प्रतिक्रांतिकारी’ मान लिया. उनकी राय में साहित्य यथास्थिति पर हमारे अक्रोश की धीर को कुंठित करता और हमें केवल मानसिक जगत में रहने के लिए प्रेरित करता है.

मेरा सुझाव है कि विवेकहीन आधुनिकता के बावजूद आधुनिकता की दिशा में धैर्यपूर्वक सुयोजित प्रयास होने चाहिए. यथार्थवाद का अर्थ व्यर्थ के ब्यौरे नहीं होने चाहिए और न स्वस्थ काम को अश्लील लेखन में ढलना चाहिए. हमें याद रखना चाहिए कि क्लासिकी साहित्य ने काम-व्यवहार को भी अपनी परिधि में लिया, पर उसमें लोलुप संतोष नहीं हैं. एक आलोचक किसी नाली में भी झाँक सकता है, पर वह नाली-निरीक्षक नहीं होता. लेखक का कार्य दुनिया को बदलना नहीं, समझना है.

साहित्य क्रांति नहीं करता; वह मनुष्यों के दिमाग़ बदलता और उन्हें क्रांति की ज़रूरत के प्रति जागरूक बनाता है. हमें स्मरण रखना चाहिए कि पक्षधर साहित्य, साहित्य का एक प्रकार मात्र है, कि विचारधारा सर्जनात्मक दृष्टि को बाधित कर सकती है, गो यह उसे एक दिशा भी देती है. साहित्य में ‘चाहिए’ को भी ध्यान में रखा जा सकता है, पर उसका मुख्य सरोकार ‘है’ से होता है. जब पाठक को लगता है कि उसे एक शो-रूम में ले आया गया है तो वह फँसा हुआ महसूस करता है; जब वह एक खिड़की से दुनिया को देखता है तो उसमें प्रत्येक चीज़ को देखने की उत्सुकता और जिज्ञासा जागती है. साहित्य राजनीतिक हो सकता है और धार्मिक, रहस्यवादी, दार्शनिक भी, लेकिन उसे किसी दर्शन या विचारधारा को हथौड़ा नहीं बनाना चाहिए. दोस्तोएव्स्की ने एक बार कहा था कि केवल ‘सौंदर्य’ ही दुनिया को बचा सकता है. मेरे ख़याल में सौन्दर्य से उसका तात्पर्य उपयोगिता के उस संकीर्ण अर्थ से था, जिसका उपदेश कॉडवेल ने दिया. सौन्दर्य से उसका तात्पर्य शायद था पूर्णता की खोज में सक्रिय मनुष्य : परिचित और अपरिचित में, जीवन की खुशी और दुःख में, संगति और असंगति के सौंदर्य, वक्र गतियों और उज्जवल भावों का, उत्प्रेरक विचारों का, निराशा के अतल में आशा का, प्रभावित यौवन और थके-हारे युग का सौंदर्य; मनुष्य में दिव्यत्व के कंपन का और आज एक पेड़ लगाने का सौंदर्य; मार्टिन लूथर के शब्दों में, यह जानते हुए भी कि यह दुनिया कल समाप्त हो सकती है.

*************

अच्छे साहित्य के चहेताओं को यह किताब खरीद लेनी चाहिये.

 

बिशारत और शाहजहां की तमन्नाः

अन्ततोगत्वा दूसरा अंदेशा पूरा हुआ. वो पास हो गये। जिस पर उन्हें ख़ुशी, प्रोफ़ेसरों को आश्चर्य और बुजुर्गों को शॉक हुआ। उस दिन कई बार अपना नाम, उसके आगे बी.ए. लिख-लिख कर, देर तक भिन्न-भिन्न कोणों से देखा किये, जैसे हुसैन अपनी पेन्टिंग को समझने के लिए पीछे हट-हट कर देखते हैं। एक बार तो बी.ए. के बाद ब्रेकिट में (फर्स्ट ऎटेम्प्ट) भी लिखा, मगर इसमें वाचालता और घमण्ड का पहलू दिखाई दिया। थोड़ी देर बाद गत्ते पर अंग्रेजी में नीली रौशनाई से नाम और लाल रौशनाई से बी.ए. लिख कर दरवाजे पर लगा आये। पन्द्रह-बीस दिन बाद उर्दू के एक स्थानीय समाचार-पत्र में विज्ञापन देखा कि धीरजगंज के मुस्लिम स्कूल में, जहां इसी साल नवीं क्लास शुरु होने वाली है, उर्दू टीचर की जगह ख़ाली है। विज्ञापन में यह लालच भी दिया गया था कि नौकरी स्थायी, वातावरण पवित्र और शांत तथा वेतन उचित है। वेतन की उचितता का स्पष्टीकरण ब्रैकिट में कर दिया गया था कि एलाउन्स समेत पच्चीस रुपये मासिक होगा। सवा रुपया वार्षिक उन्नति अलग से। मल्कुश्शोअरा-ख़ाकानी-ए-हिन्द शेख़ मुहम्मद इब्राहीम ‘जौक़’ को बहादुर शाह जफ़र ने अपना उस्ताद बनाया तो पोषण की दृष्टि से चार रुपये मासिक राशि तय की। मौलाना मुहम्मद हुसैन आजाद लिखते हैं कि “वेतन की कमी पर नजर करके बाप ने अपने इकलौते बेटे को इस नौकरी से रोका…..लेकिन क़िस्मत ने आवाज दी कि चार रुपये न समझना। ये ऐवाने-मल्कुशोराई के चार खम्भे हैं, मौके को हाथ से न जाने देना।“ इनकी इच्छा का महल तो पूरे पच्चीस खम्भों पर खड़ा होने वाला था।

लेकिन वो शांत वातावरण पर मर मिटे। धीरजगंज कानपुर और लखनऊ के बीच में एक बस्ती थी जो गांव से बड़ी और क़स्बे से छोटी थी। इतनी छोटी कि हर एक शख़्स एक दूसरे के बाप-दादा तक की करतूतों तक से परिचित था और न सिर्फ़ ये जानता था कि हर घर में जो हांडी चूल्हे पर चढ़ी है उसमें क्या पक रहा है बल्कि ये भी कि किस-किस के यहां तेल में पक रहा है। लोग एक दूसरे की जिन्दगी में इस बुरी तरह घुसे हुए थे कि आप कोई काम छुप कर नहीं कर सकते थे। ऐब करने के लिये भी सारी बस्ती का हुनर और मदद चाहिए थी। बहुत दिनों से उनकी इच्छा थी कि भाग्य ने साथ दिया तो टीचर बनेंगे। लोगों की नजर में शिक्षक का बड़ा सम्मान था। कानपुर में उनके पिता की इमारती लकड़ी की दुकान थी, मगर घरेलू कारोबार के मुक़ाबले उन्हें दुनिया का हर पेशा जियादा दिलचस्प और कम जलील लगता था। बी.ए. का नतीजा निकलते ही पिता ने उनके हृदय की शांति के लिये अपनी दुकान का नाम बदल कर ‘‘एजुकेशनल टिम्बर डिपो’’ रख दिया, मगर तबीयत इधर नहीं आई। मारे-बांधे कुछ दिन दुकान पर बैठे, मगर बड़ी बेदिली के साथ। कहते थे कि भाव-ताव करने में सुब्ह से शाम तक झूठ बोलना पड़ता है। जिस दिन सच बोलता हूं उस दिन कोई बोहनी-बिक्री नहीं होती, दुकान में गर्दा बहुत उड़ता है, ग्राहक चीख-चीख कर बात करते हैं। होश संभालने से पहले वो इंजन-ड्राइवर और होश संभालने के बाद स्कूल टीचर बनना चाहते थे। क्लास रूम भी किसी सल्तनत से कम नहीं। शिक्षक होना भी एक तरह का शासन है, तभी तो औरंगजेब ने शाहजहां को कैद में पढ़ाने की अनुमति नहीं दी। बिशारत स्वयं को शाहजहां से अधिक सौभाग्यशाली समझते थे, विशेष रूप से इसलिये कि इन्हें तो बदले में पच्चीस रुपये भी मिलने वाले थे। इसमें शक नहीं कि उस जमाने में शिक्षण का पेशा बहुत सम्मानित और गरिमामय समझा जाता था। जिन्दगी और कैरियर में दो चीजों की बड़ी अहमियत थी। पहला इज्जत और दूसरे मानसिक शांति। दुनिया के और किसी देश में इज्जत पर कभी इतना जोर नहीं रहा जितना कि इस महाद्वीप में। अंग्रेजी में तो इसका कोई ढंग का समानार्थक शब्द भी नहीं है, इसलिये अंग्रेजी के कई पत्रकारों तथा प्रसिद्ध लिखने वालों ने इस शब्द को अंग्रेजी में ज्यों-का-त्यों इस्तेमाल किया है।

आज भी दुनिया देखे हुए बुजुर्ग किसी को दुआ देते हैं तो चाहे सेहत, सुख-चैन, अधिक संतान, समृद्धि का जिक्र करें या न करें, यह दुआ जुरूर करते हैं कि ख़ुदा तुम्हें और हमें इज्जत-आबरू के साथ रक्खे, उठाये। नौकरी के संदर्भ में भी हम गुणसम्पन्नता, तरक़्क़ी की दुआ नहीं मांगते, अपने लिये हमारी अकेली दुआ होती है कि सम्मान के साथ विदा लें। यह दुआ आपको दुनिया की किसी और जबान या मुल्क में नहीं मिलेगी। कारण ये कि बेइज्जती के जितने प्रचुर अवसर हमारे यहां हैं दुनिया में कहीं और नहीं। नौकरी पेशा आदमी बेइज्जती को प्रोफ़ेशनल हेजर्ड समझ कर स्वीकार करता है। राजसी परम्पराएं और उनकी जलालतें जाते-जाते जायेंगी। उन दिनों नौकरी-पेशा लोग ख़ुद को नमकख़्वार कहते और समझते थे;रोम में तो प्राचीन काल में नौकरों को वेतन के बदले नमक दिया जाता था और दासों की क़ीमत नमक के रूप में दी जाती थीद्ध, वेतन मेहनत के बदले नहीं बल्कि बतौर दान और बख्शीश दिया और लिया जाता था। वेतन बांटने वाले विभाग को बख़्शीख़ाना कहते थे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की पहली कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

बिशारत कहते है कि बी.ए. का इम्तहान देने के बाद यह चिन्ता सर पड़ी कि अगर फ़ेल हो गये तो क्या होगा, वजीफ़ा पढ़ा तो खुदा पर भरोसे से यह चिन्ता तो दूर हो गई लेकिन इससे बड़ी एक और समस्या गले आ पड़ी कि खुदा-न-ख्व़ास्ता पास हो गये तो क्या होगा। नौकरी मिलनी मुहाल, यार दोस्त सब तितर-बितर हो जायेंगे, वालिद हाथ खींच लेंगे। बेकारी, बेरोज़गारी,बेपैशे, बेकाम…..जीवन नर्क हो जायेगा। अंग्रेज़ी अखबार सिर्फ ”वान्टेड” विज्ञापन देखने के लिये खरीदना पड़ेगा। फ़िर हर बौड़म मालिक के सांचे में अपनी क्वालिफ़िकेशन को इस तरह ढाल कर प्रार्थना-पत्र देना पड़ेगा कि हम मृत्युलोक में इसी नौकरी के लिए अवतरित हुए हैं। इक-रंगे विषय को सौ-रंग में बांधना पड़ेगा। रोज़ एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक ज़लील होना पड़ेगा, जब तक कि एक ही दफ्तर में इसकी स्थायी व्यवस्था न हो जाये। हर चंद कि फ़ॆल होने की संभावना थी मगर पास होने का डर भी लगा हुआ था। कई लड़के इस ज़िल्लत को और दो साल स्थगित करने के लिए एम.ए. और एल.एल.बी. में प्रवेश ले लेते थे। बिशारत की जान-पहचान में जिन मुसलमान लड़कों ने तीन साल पहले यानी १९२७ में बी.ए. किया था वो सब जूतियां चटखाते फ़िर रहे थे, सिवाय एक सौभाग्यशाली के, जो मुसलमानों में सर्वप्रथम आया और अब मुस्लिम मिडिल स्कूल में ड्रिल मास्टर हो गया था। १९३० की भयानक विश्व-स्तरीय बेरोज़गारी और मंहगाई की तबाहियां समाप्त नहीं हुई थीं। माना कि एक रुपये का गेहूं १५ सेर और देसी घी एक सेर मिलता था, लेकिन एक रुपया था किसके पास?

कभी-कभी वो डर-डर के, मगर सचमुच की इच्छा करते कि फ़ेल ही हो जायें तो बेहतर है, कम से कम एक साल निश्चिन्तता से कट जायेगा। फ़ेल होने पर बक़ौल मिर्ज़ा सिर्फ एक दिन आदमी की बेइज्जती खराब होती है इसके बाद चैन ही चैन। बस यही होगा ना कि जैसे ईद पर लोग मिलने आते हैं उसी तरह उस दिन खानदान का हर बड़ा बारी-बारी से बरसों की जमा धूल झाड़ने आयेगा और फ़ेल होने तथा खानदान की नाक कटवाने का एक अलग ही कारण बतायेगा। उस ज़माने में नौजवानों का कोई काम, कोई हरकत ऐसी नहीं होती थी जिसकी झपट में आ कर खानदान की नाक न कट जाये। आजकल की-सी स्थिति नहीं थी कि पहले तो खानदानों के मुंह पर नाक नज़र नहीं आती और होती भी है तो ट्यूबलेस टायर की तरह जिसमें आये दिन हर साइज के पंक्चर होते रहते हैं और अन्दर ही अन्दर आप-ही-आप जुड़ते रहते हैं। यह भी देखने में आया है कि कई बार खानदान के दूर-पास के बुज़ुर्ग छठी-सातवीं क्लास तक फ़ेल होने वाले लड़कों की, संबंधों की निकटता व क्षमता के हिसाब से अपने निजी हाथ से पिटाई भी करते थे, लेकिन जब लड़का हाथ-पैर निकालने लगे और इतना सयाना हो जाये कि दो आवाज़ों में रोने लगे यानी तेरह, चौदह साल का हो जाये तो फ़िर उसे थप्पड़ नहीं मारते थे, इसलिये कि अपने ही हाथ में चोट आने और पहुंचा उतरने का अन्देशा रहता था, केवल चीख-पुकार, डांट से काम निकालते थे। हर बुज़ुर्ग उसकी सर्टिफ़ाइड नालायक़ी की अपने झूठे शैक्षिक रिकार्ड से तुलना करता और नई पौध में अपनी दृष्टि की सीमा तक कमी और गिरावट के आसार देख कर इस सुखद निर्णय पर पहुंचता कि अभी दुनिया को उस जैसे बुज़ुर्ग की ज़ुरूरत है। भला वो ऐसी नालायक नस्ल को दुनिया का चार्ज देकर इतनी जल्दी कैसे विदा ले सकता है। मिर्ज़ा कहते हैं कि हर बुज़ुर्ग बड़े सिद्ध पुरुषों के अंदाज़ में भविष्यवाणी करता था कि तुम बड़े होकर बड़े आदमी नहीं बनोगे। साहब यह तो अन्धे को भी …हद तो ये है कि खुद हमें भी….नज़र आ रहा था। भविष्यवाणी करने के लिए सफेद दाढ़ी या भविष्यवक्ता होना आवश्यक नहीं था। बहरहाल यह सारी FARCE एक ही दिन में खत्म हो जाती थी, लेकिन पास होने के बाद तो एक उम्र का रोना था। ज़िल्लत ही ज़िल्लत, परेशानी ही परेशानी।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से”

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

पिछ्ले अंक में अतुल जी ने कहा “ये व्यंग्य तो अंत में बड़ा ही मार्मिक हो गया है। किबला से एक जुड़ाव सा हो गया था अब उनका यूँ टूट जाना दु:खदायी लग रहा है।”. युसुफी साहब की यही खासियत है कि उनके व्यंग्य एक और जहां शुद्ध हास्य हैं वहीं दूसरी ओर मार्मिक भी है और उनमें जिन्दगी का पूरा फ़लसफा भी है. आज पढिये किबला की कहानी का अंतिम भाग. अगले शुक्रवार से दूसरी कहानी प्रस्तुत की जायेगी.

===========================================

मैं पापन ऎसी जली कोयला भई न राख

उन्हें उस रात नींद नहीं आयी। फ़ज़्र (सूरज निकलने से पहले की नमाज़) की अज़ान हो रही थी कि टिम्बर मार्किट का एक चौकीदार हांपता-कांपता आया और खब़र दी कि “साहब जी! आपकी दुकान और गोदाम में आग लग गई है। आग बुझाने के इंजन तीन बजे ही आ गये थे। सारा माल कोयला हो गया। साहब जी! आग कोई आप ही आप थोड़ी लगती है।“ वो जिस समय दुकान पर पहुंचे तो सरकारी ज़बान में आग पर काबू पाया जा चुका था। जिसमें फ़ायर बिग्रेड की मुस्तैदी और भरपूर कार्यक्षमता के अलावा इसका भी बड़ा दख्ल़ था कि अब जलने के लिये कुछ रहा नहीं था। शोलों की लपलपाती ज़बानें काली हो चुकी थीं।

अलबत्ता चीड़ के तख्त़े अभी तक धड़-धड़ जल रहे थे, और वातावरण दूर-दूर तक उनकी तेज़ खुशबू में नहाया हुआ था। माल जितना था सब जल कर राख हो चुका था, सिर्फ़ कोने में उनका छोटा सा दफ़्तर बचा था।

अरसा हुआ, कानपुर में जब लाला रमेश चन्द्र ने उनसे कहा कि हालात ठीक नहीं हैं, गोदाम की इंश्योरेंस पालिसी ले लो, तो उन्होंने मलमल के कुर्ते की चुनी हुई आस्तीन उलट कर अपने बाज़ू की फड़कती हुई मछलियां दिखाते हुए कहा था। “ यह रही यारों की इंश्योरेंस पालिसी! “ फिर अपने डंटर फुला कर लाला रमेश चन्द्र से कहा, ”ज़रा छू कर देखो“ लाला जी ने अचम्भे से कहा ”लोहा है लोहा!” बोले ”नहीं फ़ौलाद कहो।“

दुकान के सामने लोगों की भीड़ लगी थी। उनको लोगों ने इस तरह रास्ता दिया जैसे जनाज़े को देते हैं। उनका चेहरा एकदम भावहीन था। उन्होंने अपने दफ्तर का ताला खोला। इनकमटैक्स का हिसाब और रजिस्टर बगल़ में दाबे और गोदाम के पश्चिमी हिस्से में जहां चीड़ से अभी शोले और खुशबू की लपटें उठ रही थीं, तेज़-तेज कदमों से गये। पहले इनकमटैक्स के खाते और उनके बाद चाबियों का गुच्छा आग में डाला। फिर आहिस्ता-आहिस्ता दायें-बायें नज़र उठाये बिना दुबारा अपने दफ्त़र में दाखिल हुए। हवेली का फ़ोटो दीवार से उतारा। रूमाल से पोंछ कर बगल़ में दबाया और दुकान जलती छोड़ कर घर चले आये।

बीबी ने पूछा ”अब क्या होयेगा?“

उन्होंने सर झुका लिया।

अक्सर ख्याल आता है, अगर फ़रिश्ते उन्हें जन्नत की तरफ़ ले गये जहां मोतिया धूप होगी और कासनी बादल, तो वो जन्नत के दरवाज़े पर कुछ सोच कर ठिठक जायेंगे। दरबान जल्दी अंदर दाखिल होने का इशारा करेगा तो वो सीना ताने उसके पास जा कर कुछ दिखाते हुए कहेंगे:

“यह छोड़ कर आये हैं।“

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[अगले शुक्रवार से नयी कहानी प्रस्तुत की जायेगी]

===========================================

1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था 17. बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है. 18. खरबूजा खुद को गोल कर ले तब भी तरबूज नहीं बन सकता 19. कौन कैसे टूटता है ?

===========================================

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

जो लोग इस श्रंखला को पढ़ रहे होंगे वो किबला के बारे में जानते हैं कि वह कैसे हैं. उन्होने किबला के अपनी पत्नी के प्रति वफादारी निभाने वाले मानवीय रूप को भी देखा है. आज किबला टूट रहे हैं. यह बहुत ही मार्मिक है और इसमें जीवन का पूरा दर्शन भी है. ऎसी कई अवस्थाऎं कईयों की जीवन में अक्सर आती है. आदमी जब टूटता है तो कैसे बदलता है? कैसे उसका अभिमान नष्ट होता है. आइये पढें….

===========================================

कौन कैसे टूटता है

दस पंद्रह मिनट बाद वो दुकान में ताला डाल कर घर चले आये और बीबी से कह दिया, अब हम दुकान नहीं जायेंगे। कुछ देर बाद मोहल्ले की मस्जिद से इशा (रात की नमाज़) की आवाज़ बुलन्द हुई और वो दूसरे ही “अल्ला हो अकबर” पर हाथ-पांव धो कर कोई चालीस साल बाद नमाज़ के लिये खड़े हुए तो, बीबी धक से रह गयीं कि खैर तो है। वो खुद भी धक से रह गये। इसलिये कि उन्हें दो सूरतों के अलावा कुछ याद नहीं रहा था। वितरे भी अधूरे छोड़ कर सलाम फेर लिया कि यह तक याद नहीं आ रहा था कि दुआये-क़ुनूत (नमाज़ में पढ़ी जाने वाली दुआ) के शुरू के शब्द क्या हैं।

वो सोच भी नहीं सकते थे कि आदमी अंदर से टूट भी सकता है और यूं टूटता है। और जब टूटता है तो अपनों, बेगानों से, हद यह कि अपने सबसे बड़े दुश्मन से भी सुल्ह कर लेता है यानी अपने-आप से। इसी मंज़िल पर अंत:दृष्टि खुलती है, बुद्धि और चेतना के दरवाज़े खुलते हैं।

ऐसे भी लोग हैं जो ज़िंदगी की सख्त़ियों, परेशानियों से बचने की खातिर खुद को अकर्मण्यता के घेरे में कैद रखते हैं। ये भारी और क़ीमती पर्दों की तरह लटके-लटके ही लीर-लीर हो जाते हैं। कुछ गुम-सुम गम्भीर लोग उस दीवार की तरह तड़ख़ते हैं जिसकी महीन-सी दरार, जो उम्दा पेंट या किसी सजावटी तस्वीर से आसानी से छुप जाती है, इस बात की चुगल़ी खाती है कि नींव अंदर ही अंदर सदमे से ज़मीन में ध्ंस रही है। कुछ लोग चीनी के बर्तन की तरह टूटते हैं कि मसाले से आसानी से जुड़ तो जाते हैं, मगर बाल और जोड़ पहले नज़र आता है, बर्तन बाद में। कुछ ढीठ और चिपकू लोग ऐसे अटूट पदार्थ के बने होते हैं कि च्विगंम की तरह कितना ही चबाओ टूटने का नाम नहीं लेते। ”खींचने से खिंचते हैं छोड़े से जाते हैं सुकड़” आप उन्हें हिक़ारत से थूक दें तो जूते से इस बुरी तरह चिपकते हैं कि छुटाये नहीं छूटते। रह-रह कर ख्याल आता है कि इससे तो दांतों तले ही भले थे कि पपोल तो लेते थे। ये च्विंगम लोग खुद आदमी नहीं पर आदमी की पहचान रखने वाले लोग हैं। यह कामयाब लोग हैं। इन्होंने इंसान को देखा, परखा और बरता है और उसे खोटा पाया तो खुद भी खोटे हो गये, और कुछ ऐसे भी हैं कि कार के विंड स्क्रीन की तरह होते हैं। साबुत और ठीक हैं तो ऐसे पारदर्शी कि दुनिया का नज़ारा कर लो और एकाएक टूटे तो ऐसे टूटे कि न बाल पड़ा न दरके, न तड़खे ऐसे रेज़ा रेज़ा हुए कि न वो पहचान रही, न दुनिया की जलवागरी रही, न आईने का पता कि कहां था, किधर गया।

और एक अभिमान है कि यूं टूटता है जैसे राजाओं का प्रताप। हज़रत सुलेमान छड़ी की टेक लगाये खड़े थे कि मृत्यु आ गयी लेकिन उनका बेजान शरीर एक मुद्दत तक उसी तरह खड़ा रहा और किसी को शक तक न गुज़रा कि वो इंतक़ाल फ़र्मा चुके हैं। वो उसी तरह बेरूह खड़े रहे और उनके रोब व दबदबे से कारोबारे-सल्तनत नियम के अनुसार चलता रहा। उधर छड़ी को धीरे-धीरे घुन अंदर से खाता रहा। यहां तक कि एक दिन वो चटाख से टूट गई और हज़रत सुलेमान की नश्वर देह ज़मीन पर आ गई। उस समय उनकी प्रजा पर खुला कि वो दुनिया से पर्दा फ़र्मा चुके हैं।

सो वो दीमक लगी गुरूर-गुस्से की छड़ी, जिसके बल क़िबला ने ज़िंदगी गुज़ारी थी, आज शाम टूट गयी और जीने का वो जोश और हंगामा भी खत़्म हो गया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[ रविवार को किबला की कहानी का अंतिम भाग प्रस्तुत किया जायेगा ]

===========================================

पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था 17. बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है. 18. खरबूजा खुद को गोल कर ले तब भी तरबूज नहीं बन सकता

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

© 2012 काकेश की कतरनें Suffusion theme by Sayontan Sinha