इस अंक में देखिये कि बिशारत, जो मास्टरी की नौकरी के लिये तहसीलदार मौलवी मज्जन के पास जा रहे हैं, उनको मौलवी के बारे में क्या क्या बातें पता चलती हैं.

***

मौलवी मज्जन से तानाशाह तकः तहसीलदार तक सिफ़ारिश पंहुचाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। अलबत्ता मौलवी मुजफ़्फ़र (जो तिरस्कार, संक्षेप और प्यार में मौली मज्जन कहलाते थे) के बारे में जिससे पूछा, उसने नया ऐब निकाला। एक साहब ने कहा, क़ौम का दर्द रखता है हाकिमों से मेलजोल रखता है पर कमीना है, बच के रहना। दूसरे साहब बोले मौलवी मज्जन एक यतीमख़ाना शम्स-उल-इस्लाम भी चलाता है। यतीमों से अपने पैर दबवाता है। स्कूल की झाड़ू दिलवाता है और मास्टरों को यतीमों की टोली के साथ चंदा इकट्ठा करने कानपुर और लखनऊ भेजता है, वो भी बिना टिकिट। मगर इसमें कोई शक नहीं कि धुन का पक्का है। धीरजगंज के मुसलमानों की बड़ी सेवा की है। धीरजगंज के जितने भी मुसलमान आज पढ़े-लिखे और नौकरी करते नजर आते हैं वो सब इसी स्कूल के जीने से ऊपर चढ़े हैं। कभी-कभी लगता था कि लोगों को मौलवी मुजफ़्फ़र से ईश्वरीय बैर हो गया है। बिशारत को उनसे एक तरह की हमदर्दी हो गई। यूं भी मास्टर फ़ाख़िर हुसैन ने एक बार बड़े काम की नसीहत की थी कि कभी अपने बुजुर्ग या बॉस या अपने से अधिक बदमाश आदमी को सही रास्ता बताने की कोशिश न करना। उन्हें ग़लत राह पर देखो तो तीन ज्ञानी बंदरों की तरह अंधे, बहरे और गूंगे बन जाओ! ठाठ से राज करोगे!

एक दिलजले बुजुर्ग, जो ‘जमाना’ पत्रिका में काम करते थे, फ़र्माया, वो छाकटा ही नहीं, चरकटा भी है। पच्चीस रुपये की रसीद लिखवा कर पन्द्रह रुपल्ली हाथ पे टिका देगा। पहले तुम्हें जांचेगा, फिर आंकेगा, इसके बाद तमाम उम्र हांकेगा। उसने दस्तख़त करने उस वक़्त सीखे जब चंदे की जाली रसीदें काटने की जुरूरत पड़ी। अरे साहब! सर सय्यद तो अब जा के बना है मैंने अपनी आंखों से उसे अपने निकाहनामे पे अंगूठा लगाते देखा है। ठूंठ जाहिल है मगर बला का गढ़ा हुआ, घिसा हुआ भी। ऐसा-वैसा चपड़क़नात नहीं है, लुक़्क़ा भी है, लुच्चा भी और टुच्चा भी। बुजुर्गवार ने एक ही सांस में पाजीपन के ऐसे बारीक शेड्स गिनवा दिये कि जब तक आदमी हर गाली के बाद शब्दकोष न देखे या हमारी तरह लम्बे समय तक भाषाविदों की सुहबत के सदमे न उठाये हुए हो वो जबान और नालायक़ी की उन बारीकियों को नहीं समझ सकता।

सय्यद एजाज हुसैन ‘वफ़ा’ कहने लगे ‘‘मौली मज्जन पांचों वक़्त टक्करें मारता है। घुटने, माथे और जमीर पर ये बड़े-बड़े गट्टे पड़ गये हैं। थानेदार और तहसीलदार को अपनी मीठी बातचीत, इस्लाम-दोस्ती, मेहमान-नवाजी और रिश्वत से क़ाबू में कर रखा है। दमे का मरीज है। पांच मिनट में दस बार आस्तीन से नाक पोंछता है।’’ दरअस्ल उन्हें आस्तीन से नाक पोंछने पर इतना एतराज न था जितना इस पर कि आस्तीन को अस्तीन कहता है, यख़नी को अख़नी और हौसला का होंसला। उन्होंने अपने कानों से उसे मिजाज शरीफ़ और शुबरात कहते सुना था। जुहला (गंवारों) किसानों और बकरियों की तरह हर वक़्त मैं! मैं! करता रहता है। लखनऊ के शुरफ़ा (शरीफ़ का बहुवचन-भद्र लोग) अहंकार से बचने की ग़रज से ख़ुद को हमेशा हम कहते हैं। इस पर एक कमजोर और सींक-सलाई बुजुर्ग ने फ़र्माया कि जात का क़साई, कुंजड़ा या दिल्ली वाला मालूम होता है, किस वास्ते कि तीन बार गले मिलता है। अवध में शुरफ़ा केवल एक बार गले मिलते हैं।

ये अवध के साथ सरासर जियादती थी इसलिये कि सिर्फ़ एक बार गले मिलने में शराफ़त का शायद उतना दख़्ल न था जितना नाजुक-मिजाजी का और ये याद रहे कि यह उस जमाने के पारम्परिक चोंचले हैं जब नाजुक-मिजाज बेगमें ख़ुश्के और ओस का आत्महत्या के औजार की तरह प्रयोग करती थीं और यह धमकी देती थीं कि ख़ुश्कख़ार ओस में सो जाऊंगी। वो तो खैर बेगमें थीं, तानाशाह उनसे भी बाजी ले गया। उसके बारे में मशहूर है कि जब वो बंदी बना कर दरबार में बेड़ियां पहना कर लाया गया तो सवाल ये पैदा हुआ कि इसे मरवाया कैसे जाये। दरबारियों ने एक से एक उपाय पेश किये। एक ने तो मशवरा दिया कि ऐसे अय्याश को तो मस्त हाथी के पैर से बांध कर शहर का चक्कर लगवाना चाहिये। दूसरा कोर्निश बजा कर बोला, दुरुस्त, मगर मस्त हाथी को शहर का चक्कर कौन माई का लाल लगवायेगा। हाथी शहर का चक्कर लगाने के लिये थोड़े ही मस्त होता है, अलबत्ता आप तानाशाह की अय्याशियों की सजा हाथी को देना चाहते हैं तो और बात है। इस पर तीसरा दरबारी बोला कि तानाशाह जैसे अय्याश को इससे जियादा तकलीफ़ देने वाली सजा नहीं हो सकती कि इसे हीजड़ा बना कर इसी के हरम में खुला छोड़ दिया जाये। एक और दरबारी ने तजवीज पेश की कि आंखों में नील की सलाई फिरवा कर अंधा कर दो, फिर क़िला ग्वालियर में दो साल तक रोजाना ख़ाली पेट पोस्त का पियाला पिलाओ कि अपने जिस्म को धीरे-धीरे मरता हुआ ख़ुद भी देखे। इस पर किसी इतिहासकार ने विरोध किया कि सुल्तान का तानाशाह से ख़ून का कोई रिश्ता नहीं है, ये बरताव तो सिर्फ़ सगे भाइयों के साथ होता आया है। एक दिलजले ने कहा कि क़िले की दीवार से नीचे फेंक दो, मगर यह तरीक़ा इसलिए रद्द कर दिया गया कि इसका दम तो मारे डर के रस्ते में ही निकल जायेगा, अगर मक़सद तकलीफ़ पहुंचाना है तो वो पूरा नहीं होगा। अंत में वजीर ने, जिसका योग्य होना साबित हो गया, ये मुश्किल हल कर दी। उसने कहा कि मानसिक पीड़ा देकर और तड़पा-तड़पाकर मारना ही लक्ष्य है तो इसके पास से एक ग्वालिन गुजार दो।

जिन पाठकों ने बिगड़े रईस और ग्वालिन नहीं देखी उनकी जानकारी के लिये निवेदन है कि मक्खन और कच्चे दूध की बू, रेवड़ बास में बसे हुए लंहगे और पसीने के नमक से सफ़ेद पड़ी हुई काली क़मीज के एक भबके से अमीरों और रईसों का दिमाग़ फट जाता था। फिर उन्हें हिरन की नाभि से निकली हुई कस्तूरी के लख़लख़े सुंघा कर होश में लाया जाता था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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नेकचलनी का साइनबोर्ड : विज्ञापन में मौलवी सय्यद महुम्मद मजुफ्फर ने, कि यही स्कूल के संस्थापक, व्यवस्थापक, संरक्षक, कोषाध्यक्ष और ग़बनकर्ता का नाम था, सूचित किया था कि उम्मीदवार को लिखित आवेदन करने की आवश्यकता नहीं, अपनी डिग्री और नेकचलनी के दस्तावेजी सुबूत के साथ सुब्ह आठ बजे स्वयं पेश हो। बिशारत की समझ में न आया कि नेकचलनी का क्या सुबूत हो सकता है, बदचलनी का अलबत्ता हो सकता है। उदाहरण के लिये चालान,मुचलका, गिरफ़्तारी-वारंट, सजा के आदेश की नक़्ल या थाने में दस-नम्बरी बदमाशों की लिस्ट। पांच मिनट में आदमी बदचलनी तो कर सकता है नेकचलनी का सुबूत नहीं दे सकता। मगर बिशारत की चिंता अकारण थी। इसलिये कि जो हुलिया उन्होंने बना रक्खा था यानी मुंडा हुआ सर, आंखों में सुरमे की लकीर, एड़ी से ऊंचा पाजामा, सर पर मख़मल की काली रामपुरी टोपी, घर, मस्जिद और मुहल्ले में पैर में खड़ाऊं….. इस हुलिये के साथ वो चाहते भी तो नेकचलनी के सिवा और कुछ संभव न था। नेकचलनी उनकी मजबूरी थी, स्वयं अपनायी हुई अच्छाई नहीं और उनका हुलिया इसका सुबूत नहीं साइनबोर्ड था।

यह वही हुलिया था जो इस इलाक़े के निचले मिडिल क्लास ख़ानदानी शरीफ़ घरानों के नौजवानों का हुआ करता था। ख़ानदानी शरीफ़ से अभिप्राय उन लोगों से है जिन्हें शरीफ़ बनने, रहने और कहलाने के लिये व्यक्तिगत कोशिश बिल्कुल नहीं करनी पड़ती थी। शराफ़त, जायदाद और ऊपर वर्णित हुलिया पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस तरह विरसे में मिलते थे जिस तरह आम आदमी को जीन्स और वंशानुगत रोग मिलते हैं। आस्था, प्रचार, ज्ञान और हुलिये के लिहाज से पड़पोता अगर हू-ब-हू अपना पड़दादा मालूम हो तो ये ख़ानदानी कुलीनता, शराफ़त और शुद्धता की दलील समझी जाती थी।

इन्टरव्यू के लिये बिशारत ने उसी हुलिये पर रगड़ घिस करके नोक-पलक संवारी। अचकन धुलवाई, बदरंग हो गई थी इसलिये धोबी से कहा क़लफ़ अधिक लगाना। सर पर अभी शुक्रवार को जीरो नम्बर की मशीन फिरवाई थी, अब उस्तरा और उसके बाद आम की गुठली फिरवा कर आंवले के तेल की मालिश करवाई। देर तक मिर्चें लगती रहीं। टोपी पहन कर आइना देख रहे थे कि अन्दर मुंडे हुए सर से पसीना इस तरह रिसने लगा जिस तरह माथे पर विक्स या बाम लगाने से झरता है। टोपी उतारने के बाद पंखा चला तो ऐसा लगा जैसे किसी ने हवा में पिपरमेन्ट मिला दिया हो। फिर बिशारत ने जूतों पर फ़ौजियों की तरह थूक से पालिश करके अपनी पर्सनेलिटी को फ़िनिशिंग टच दिया।

सलेक्शन कमेटी का चेयरमैन तहसीलदार था। सुनने में आया था कि एपाइन्टमेन्ट के मुआमले में उसी की चलती है। फक्कड़, फ़िक़रेबाज, साहित्यिक, मिलनसार, निडर और रिश्वतख़ोर है। घोड़े पर कचहरी आता है, ‘नादिम’ (शर्मिन्दा) उपनाम रखता है, आदमी बला का जहीन और तबीयतदार है। उसे अपना तरफ़दार बनाने के लिये [बिशारत ने] बादामी काग़ज का एक दस्ता, छह-सात निब वाले क़लम ख़रीदे और रातों-रात अपनी शायरी का चमन यानी सत्ताईस ग़जलों का गुलदस्ता स्वयं तैय्यार किया। [बिशारत] ‘मखमूर’ उपनाम रखते थे जो उनके उस्ताद जौहर इलाहाबादी का दिया हुआ था। इसी लिहाज से अपनी अधूरी आद्योपान्त किताब का नाम ‘ख़ुमख़ाना-ए-मख़मूर कानपुरी सुम लखनवी’ रखा (लखनऊ से केवल इतना सम्बन्ध था कि पांच साल पहले अपना पित्ता निकलवाने के सिलसिले में दो सप्ताह के लिये अस्पताल में लगभग अर्धमूर्छित हालत में रहे थे) फिर उसमें एक विराट संकलन भी मिला दिया।

इस विराट संकलन की कहानी यह है कि अपनी ग़जलों और शेरों का चयन उन्होंने दिल पर पत्थर बल्कि पहाड़ रख कर किया था। शेर कितना ही घटिया और कमजोर क्यों न हो उसे स्वयं काटना और रद्द करना उतना ही मुश्किल है जितना अपनी औलाद को बदसूरत कहना या जंबूर से ख़ुद अपना हिलता हुआ दांत उखाड़ना। ग़ालिब तक से ये पराक्रम न हो सका। कांट-छांट मौलाना फ़ज्ले-हक़ खैराबादी के सुपुर्द करके ख़ुद ऐसे बन के बैठ गये जैसे कुछ लोग इंजेक्शन लगवाते वक़्त दूसरी तरफ़ मुंह करके बैठ जाते हैं।

बिशारत ने शेर छांटने को तो छांट दिये मगर दिल नहीं माना, इसलिये अंत में एक परिशिष्ट अपनी रद्द की हुई शायरी का सम्मिलित कर दिया। यह शायरी उस काल से संबंधित थी जब वो बेउस्ताद थे और ‘फ़रीफ़्ता’ उपनाम रखते थे। इस उपनाम की एक विशेषता यह थी कि जिस पंक्ति में भी डालते वो छंद से बाहर हो जाती। चुनांचे अधिकतर ग़जलें बग़ैर मक़्ते के थीं। चंद मक़्तों में शेर का वज्न पूरा करने के लिये ‘फ़रीफ़्ता’ की जगह उसका समानार्थक ‘शैदा’ और ‘दिलदादा’ प्रयोग किया, उससे शेर में कोई और दोष पैदा हो गया। बात दरअस्ल यह थी कि आकाश से जो विचार उनके दिमाग़ में आते थे उनके दैवीय जोश और तूफ़ानी तीव्रता को छंद की गागर में बंद करना इंसान के बस का काम न था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ

पहला भाग

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लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
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सेक्टर 11, नोएडा-201301
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साहित्य अकादमी एक संस्था है जो भारतीय भाषाओं के छ्पी विभिन्न रचनाओं को सामने लाने का माध्यम बनी है.यह अंग्रेजी में 1957 से इंडियन लिटरेचर तथा हिन्दी में 1980 के समकालीन भारतीय साहित्य जैसी पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन भी करती आ रही है.ये पत्रिकाएँ विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित श्रेष्ठ समकालीन साहित्य को प्रस्तुत करती रही हैं.chayanam

वर्ष 2006 में साहित्य अकादेमी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर अरुण प्रकाश द्वारा संपादित एक पुस्तक का प्रकाशन किया था जिसका नाम है “चयनम्” .यह अकादमी की द्विमासिक हिन्दी पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य के पिछले 25 वर्षों में प्रकाशित रचनाओं से एक चयन है, इसमें कविता कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, साक्षात्कार तथा आलोचनात्मक लेखों के साथ-साथ एक उपन्यासिका का भी समावेश किया गया है.

इसमें उर्दू के ख्याति प्राप्त आलोचक आले अहमद सुरूर, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, प्रसिद्ध नाट्यकर्मी शुंभ मित्र, भैरप्प, विजय तेन्दुलकर, फणीश्वरनाथ रेणु, त्रिलोचन शास्त्री, नागार्जुन, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, गोपीचंद्र नारंग, अली सरदार जाफ़री, प्रतिभा राय, सुनील गंगोपाध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय, अमृता प्रीतम, केशव रेड्डी, योसफ़ मेकवान, शरणकुमार लिम्बाले, ओ.एन.वी. कुरुप से लेकर युवा अंग्रेजी कथाकार मित्रा फुकन की रचनाऎं हैं.

आज प्रस्तुत है इसी पुस्तक से आले अहमद सुरुर की एक रचना “क्या साहित्य विफल है ?” के प्रमुख अंश. 

लगभग सत्तर वर्ष पहले जब टी.एस. एलियट ने कहा कि उपन्यास मर चुका है, और बाद में जब एडमंड विल्सन ने घोषणा की कि एक ‘मरती हुई विधा’ है, तो उनका आशय यही था कि दूसरे रूप और पद्धतियाँ उनका स्थान ले लेंगी. उन्होंने यह नहीं कहा कि साहित्य एक मरती हुई कला है. लेकिन इन दिनों कोई ख़ास रूप या विधा नहीं, बल्कि संरचित भाषिक प्रवचन का संपूर्ण माध्यम ही आक्रमणों के घेरे में है. दूरदर्शन और अन्य आधुनिक तकनीकी चमत्कारों के सम्मुख मुद्रित शब्द अपना आकर्षण खो रहा है. यह एक वास्तविक ख़तरा है कि किताबें बेकार हो चलें और मुद्रण केवल अल्पतम उपयोगितापरक कामों तक सीमित हो जाए.

******* तथ्य फिर भी यह है कि किताबें पहले से ज़्यादा छप और बिक रही हैं और शायद पढ़ी जाती होंगी. यह सही है, जैसा कि एक समीक्षक ने टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेण्ट में कुछ अरसा पहले इशारा किया था कि उनमें अधिकांश ‘कूड़ा’ होंगी. भारत में हालत और भी बदतर होगी, लेकिन शायद कुछ विश्वास के साथ यह दावा किया जा सकता है कि अधिकांश भारतीय भाषाओं में अभी भी कुछ उम्दा किताबें आ रही हैं और कविता तथा गद्य में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोग किए जा रहे हैं. भारतीय भाषाओं में आपस में और विदेशी साहित्य से पहले से अधिक अनुवाद देखे जा सकते हैं.

साहित्य के विभिन्न रूपों और विधाओं के बीच की सीमा-रेखाएँ धुँधली पड़ने लगी है. भाषा ख़ुद बदल रही है, नैतिक सवालों पर बहस जारी है, यद्यपि नैतिक समाधानों का प्रचलन नहीं रहा, विचारधारा की पकड़ ढ़ीली होती जा रही है तथा संशयवाद, संदेह और निराशा, अँधी आस्था, सुनिश्चित मताग्रहों और अस्पष्ट सामान्यीकरण की जगह लेते जा रहे हैं. भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में टैगोर, इक़बाल और प्रेमचंद्र जैसे महान नाम इस समय नहीं हैं. महानों का दौर समाप्त हो गया है. आकाश पर कवि छाए नहीं हैं. यह गद्य का, उपन्यास, कहानी, आत्मकथा और आलोचना का दौर है. कुछ रचनाकारों ने आलोचकों की वर्तमान हैसियत पर विरोध प्रकट किया है. आलोचक कई बार नए लेखकों की प्रतिभा को पहचानने में असफल रहे हैं; वे अधिकांशतः पुरानी अभिरुचियों में ही शरण लेते रहे हैं; विचारधारा की अपनी तालाश के मारे वे साहित्य के मूल्यांकन में नाकामयाब रहे हैं; फिर भी एक परिप्रेक्ष्य के लिए, एक मूल्यबोध और संस्कृति की खोज के लिए और इस दौर की बढ़ती हुई बर्बरता में एक सामाजिक चेतना, एक नैतिक ताने-बाने के लिए और भाषा नामक रहस्य के सम्मान के लिए आलोचक का महत्त्व है.

*******पाठक आमतौर पर रूढ़िवादी होते हैं, वे सामान्यतया साहित्य में अपनी स्थापित मर्यादाओं की स्वीकृति या एक स्वप्न-जगत में पलायन चाहते हैं. साहित्य एक झटके में उन्हें अपने आस-पास के उस जीवन के प्रति सचेत करता है, जिससे उन्होंने आँखें मूँद रखी थीं. शुतुरमुर्ग़ अफ्रीका के रेगिस्तानों में नहीं मिलते; वे हर जगह बहुतायत में उपलब्ध है. प्रौद्योगिकी के इस दौर का नतीजा जीवन के हर गोशे में नक़द फ़सल के लिए बढ़ता हुआ पागलपन है; और हमारे राजनीतिज्ञ, सत्ता के दलाल, व्यापारी, नौकरशाह- सभी लोगों को इस भगदड़ में नहीं पहुँचने, जैसा दूर करते हैं वैसा करने, चूहादौड़ में शामिल होने और कुछ-न-कुछ हासिल कर लेने को जिए जा रहे हैं. हम थककर साँस लेना और अपने चारों ओर निहारना, हवा के पेड़ में से गुज़रते वक्त पत्तियों की मनहर लय-गतियों को और फूलों के जादुई रंगों को, फूली सरसों के चमकदार पीलेपन को, खिले मैदानों की घनी हरीतिमा को मर्मर ध्वनि के सौन्दर्य, हिमाच्छादित शिखरों की भव्यता, समुद्र तट पर पछाड़ खाकर बिखरती हुई लहरों के घोस को देखना-सुनना भूल गए हैं.

कुछ लोग सोचते हैं कि पश्चिम का आधुनिकतावाद और भारत तथा अधिकांश तीसरी दुनिया के नव औपनिवेशिक चिन्तन के साथ अपनी जड़ों से अलगाव, व्यक्तिवादी अजनबियत में हमारा अनिवार्य बेलगाम धँसाव, अचेतन के बिम्ब, बौद्धिकता से विद्रोह, यह घोषणा की ‘दिमाग़ अपनी रस्सी के अंतिम सिरे पर है’, यथार्थवाद का विध्वंस, काम का ऐन्द्रिक सुख मात्र रह जाना और मानवीय भावनाओं का व्यावसायीकरण तथा निम्नस्तरीयकरण इस अँधी घाटी में आ फँसने की वजह है. लेकिन वे भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण इतिहास की एक सच्चाई है, कि नई समस्याओं को जन्म देने और विज्ञान को अधिक जटिल बनाने के बावजूद आधुनिकीकरण, एक तरह से, मानव जाति की नियति है.

वे यह भी भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण सौ फीसदी पश्चिमी करण नहीं है, बल्कि एक बिन्दु के बाद यह अपना रास्ता ख़ुद बनाता है. हमें इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि भारतीय पुनर्जागरण उदीयमान बुर्जुआ वर्ग़ द्वारा अपनी ज़रूरतों के लिए अपहृत कर लिया गया और अधूरा ही रह गया. हमें मशीम द्वारा मनुष्य के विस्थापन, महानगरों के जंगलों का निर्माण और प्रगति के नाम पर सत्ता की राजनीति को भी समझना चाहिए. आधुनिकता के बहुत से आयाम हैं, लेकिन पश्चिम में पूँजीवाद की भूमिका से सीख लेते हुए भारत में भी इसे समग्र मनुष्य के बारे में महसूस करने और सोचने को हतोत्साहित किया और ऊब तथा मनुष्य में छिपे पशुत्व के रसातल में उदास चिन्तन के रेगिस्तान को बढ़ावा दिया है. मानवता और मानवीयता की जगह बर्बरता और पशुत्व ने ले ली है. ‘नवता’, स्टीफ़ोन स्पेण्डर द्वारा प्रयुक्त पद, की तालाश में कुछ लोगों ने अच्छे लेखन को ‘प्रतिक्रांतिकारी’ मान लिया. उनकी राय में साहित्य यथास्थिति पर हमारे अक्रोश की धीर को कुंठित करता और हमें केवल मानसिक जगत में रहने के लिए प्रेरित करता है.

मेरा सुझाव है कि विवेकहीन आधुनिकता के बावजूद आधुनिकता की दिशा में धैर्यपूर्वक सुयोजित प्रयास होने चाहिए. यथार्थवाद का अर्थ व्यर्थ के ब्यौरे नहीं होने चाहिए और न स्वस्थ काम को अश्लील लेखन में ढलना चाहिए. हमें याद रखना चाहिए कि क्लासिकी साहित्य ने काम-व्यवहार को भी अपनी परिधि में लिया, पर उसमें लोलुप संतोष नहीं हैं. एक आलोचक किसी नाली में भी झाँक सकता है, पर वह नाली-निरीक्षक नहीं होता. लेखक का कार्य दुनिया को बदलना नहीं, समझना है.

साहित्य क्रांति नहीं करता; वह मनुष्यों के दिमाग़ बदलता और उन्हें क्रांति की ज़रूरत के प्रति जागरूक बनाता है. हमें स्मरण रखना चाहिए कि पक्षधर साहित्य, साहित्य का एक प्रकार मात्र है, कि विचारधारा सर्जनात्मक दृष्टि को बाधित कर सकती है, गो यह उसे एक दिशा भी देती है. साहित्य में ‘चाहिए’ को भी ध्यान में रखा जा सकता है, पर उसका मुख्य सरोकार ‘है’ से होता है. जब पाठक को लगता है कि उसे एक शो-रूम में ले आया गया है तो वह फँसा हुआ महसूस करता है; जब वह एक खिड़की से दुनिया को देखता है तो उसमें प्रत्येक चीज़ को देखने की उत्सुकता और जिज्ञासा जागती है. साहित्य राजनीतिक हो सकता है और धार्मिक, रहस्यवादी, दार्शनिक भी, लेकिन उसे किसी दर्शन या विचारधारा को हथौड़ा नहीं बनाना चाहिए. दोस्तोएव्स्की ने एक बार कहा था कि केवल ‘सौंदर्य’ ही दुनिया को बचा सकता है. मेरे ख़याल में सौन्दर्य से उसका तात्पर्य उपयोगिता के उस संकीर्ण अर्थ से था, जिसका उपदेश कॉडवेल ने दिया. सौन्दर्य से उसका तात्पर्य शायद था पूर्णता की खोज में सक्रिय मनुष्य : परिचित और अपरिचित में, जीवन की खुशी और दुःख में, संगति और असंगति के सौंदर्य, वक्र गतियों और उज्जवल भावों का, उत्प्रेरक विचारों का, निराशा के अतल में आशा का, प्रभावित यौवन और थके-हारे युग का सौंदर्य; मनुष्य में दिव्यत्व के कंपन का और आज एक पेड़ लगाने का सौंदर्य; मार्टिन लूथर के शब्दों में, यह जानते हुए भी कि यह दुनिया कल समाप्त हो सकती है.

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अच्छे साहित्य के चहेताओं को यह किताब खरीद लेनी चाहिये.

बिशारत और शाहजहां की तमन्नाः

अन्ततोगत्वा दूसरा अंदेशा पूरा हुआ. वो पास हो गये। जिस पर उन्हें ख़ुशी, प्रोफ़ेसरों को आश्चर्य और बुजुर्गों को शॉक हुआ। उस दिन कई बार अपना नाम, उसके आगे बी.ए. लिख-लिख कर, देर तक भिन्न-भिन्न कोणों से देखा किये, जैसे हुसैन अपनी पेन्टिंग को समझने के लिए पीछे हट-हट कर देखते हैं। एक बार तो बी.ए. के बाद ब्रेकिट में (फर्स्ट ऎटेम्प्ट) भी लिखा, मगर इसमें वाचालता और घमण्ड का पहलू दिखाई दिया। थोड़ी देर बाद गत्ते पर अंग्रेजी में नीली रौशनाई से नाम और लाल रौशनाई से बी.ए. लिख कर दरवाजे पर लगा आये। पन्द्रह-बीस दिन बाद उर्दू के एक स्थानीय समाचार-पत्र में विज्ञापन देखा कि धीरजगंज के मुस्लिम स्कूल में, जहां इसी साल नवीं क्लास शुरु होने वाली है, उर्दू टीचर की जगह ख़ाली है। विज्ञापन में यह लालच भी दिया गया था कि नौकरी स्थायी, वातावरण पवित्र और शांत तथा वेतन उचित है। वेतन की उचितता का स्पष्टीकरण ब्रैकिट में कर दिया गया था कि एलाउन्स समेत पच्चीस रुपये मासिक होगा। सवा रुपया वार्षिक उन्नति अलग से। मल्कुश्शोअरा-ख़ाकानी-ए-हिन्द शेख़ मुहम्मद इब्राहीम ‘जौक़’ को बहादुर शाह जफ़र ने अपना उस्ताद बनाया तो पोषण की दृष्टि से चार रुपये मासिक राशि तय की। मौलाना मुहम्मद हुसैन आजाद लिखते हैं कि “वेतन की कमी पर नजर करके बाप ने अपने इकलौते बेटे को इस नौकरी से रोका…..लेकिन क़िस्मत ने आवाज दी कि चार रुपये न समझना। ये ऐवाने-मल्कुशोराई के चार खम्भे हैं, मौके को हाथ से न जाने देना।“ इनकी इच्छा का महल तो पूरे पच्चीस खम्भों पर खड़ा होने वाला था।

लेकिन वो शांत वातावरण पर मर मिटे। धीरजगंज कानपुर और लखनऊ के बीच में एक बस्ती थी जो गांव से बड़ी और क़स्बे से छोटी थी। इतनी छोटी कि हर एक शख़्स एक दूसरे के बाप-दादा तक की करतूतों तक से परिचित था और न सिर्फ़ ये जानता था कि हर घर में जो हांडी चूल्हे पर चढ़ी है उसमें क्या पक रहा है बल्कि ये भी कि किस-किस के यहां तेल में पक रहा है। लोग एक दूसरे की जिन्दगी में इस बुरी तरह घुसे हुए थे कि आप कोई काम छुप कर नहीं कर सकते थे। ऐब करने के लिये भी सारी बस्ती का हुनर और मदद चाहिए थी। बहुत दिनों से उनकी इच्छा थी कि भाग्य ने साथ दिया तो टीचर बनेंगे। लोगों की नजर में शिक्षक का बड़ा सम्मान था। कानपुर में उनके पिता की इमारती लकड़ी की दुकान थी, मगर घरेलू कारोबार के मुक़ाबले उन्हें दुनिया का हर पेशा जियादा दिलचस्प और कम जलील लगता था। बी.ए. का नतीजा निकलते ही पिता ने उनके हृदय की शांति के लिये अपनी दुकान का नाम बदल कर ‘‘एजुकेशनल टिम्बर डिपो’’ रख दिया, मगर तबीयत इधर नहीं आई। मारे-बांधे कुछ दिन दुकान पर बैठे, मगर बड़ी बेदिली के साथ। कहते थे कि भाव-ताव करने में सुब्ह से शाम तक झूठ बोलना पड़ता है। जिस दिन सच बोलता हूं उस दिन कोई बोहनी-बिक्री नहीं होती, दुकान में गर्दा बहुत उड़ता है, ग्राहक चीख-चीख कर बात करते हैं। होश संभालने से पहले वो इंजन-ड्राइवर और होश संभालने के बाद स्कूल टीचर बनना चाहते थे। क्लास रूम भी किसी सल्तनत से कम नहीं। शिक्षक होना भी एक तरह का शासन है, तभी तो औरंगजेब ने शाहजहां को कैद में पढ़ाने की अनुमति नहीं दी। बिशारत स्वयं को शाहजहां से अधिक सौभाग्यशाली समझते थे, विशेष रूप से इसलिये कि इन्हें तो बदले में पच्चीस रुपये भी मिलने वाले थे। इसमें शक नहीं कि उस जमाने में शिक्षण का पेशा बहुत सम्मानित और गरिमामय समझा जाता था। जिन्दगी और कैरियर में दो चीजों की बड़ी अहमियत थी। पहला इज्जत और दूसरे मानसिक शांति। दुनिया के और किसी देश में इज्जत पर कभी इतना जोर नहीं रहा जितना कि इस महाद्वीप में। अंग्रेजी में तो इसका कोई ढंग का समानार्थक शब्द भी नहीं है, इसलिये अंग्रेजी के कई पत्रकारों तथा प्रसिद्ध लिखने वालों ने इस शब्द को अंग्रेजी में ज्यों-का-त्यों इस्तेमाल किया है।

आज भी दुनिया देखे हुए बुजुर्ग किसी को दुआ देते हैं तो चाहे सेहत, सुख-चैन, अधिक संतान, समृद्धि का जिक्र करें या न करें, यह दुआ जुरूर करते हैं कि ख़ुदा तुम्हें और हमें इज्जत-आबरू के साथ रक्खे, उठाये। नौकरी के संदर्भ में भी हम गुणसम्पन्नता, तरक़्क़ी की दुआ नहीं मांगते, अपने लिये हमारी अकेली दुआ होती है कि सम्मान के साथ विदा लें। यह दुआ आपको दुनिया की किसी और जबान या मुल्क में नहीं मिलेगी। कारण ये कि बेइज्जती के जितने प्रचुर अवसर हमारे यहां हैं दुनिया में कहीं और नहीं। नौकरी पेशा आदमी बेइज्जती को प्रोफ़ेशनल हेजर्ड समझ कर स्वीकार करता है। राजसी परम्पराएं और उनकी जलालतें जाते-जाते जायेंगी। उन दिनों नौकरी-पेशा लोग ख़ुद को नमकख़्वार कहते और समझते थे;रोम में तो प्राचीन काल में नौकरों को वेतन के बदले नमक दिया जाता था और दासों की क़ीमत नमक के रूप में दी जाती थीद्ध, वेतन मेहनत के बदले नहीं बल्कि बतौर दान और बख्शीश दिया और लिया जाता था। वेतन बांटने वाले विभाग को बख़्शीख़ाना कहते थे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की पहली कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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बिशारत कहते है कि बी.ए. का इम्तहान देने के बाद यह चिन्ता सर पड़ी कि अगर फ़ेल हो गये तो क्या होगा, वजीफ़ा पढ़ा तो खुदा पर भरोसे से यह चिन्ता तो दूर हो गई लेकिन इससे बड़ी एक और समस्या गले आ पड़ी कि खुदा-न-ख्व़ास्ता पास हो गये तो क्या होगा। नौकरी मिलनी मुहाल, यार दोस्त सब तितर-बितर हो जायेंगे, वालिद हाथ खींच लेंगे। बेकारी, बेरोज़गारी,बेपैशे, बेकाम…..जीवन नर्क हो जायेगा। अंग्रेज़ी अखबार सिर्फ ”वान्टेड” विज्ञापन देखने के लिये खरीदना पड़ेगा। फ़िर हर बौड़म मालिक के सांचे में अपनी क्वालिफ़िकेशन को इस तरह ढाल कर प्रार्थना-पत्र देना पड़ेगा कि हम मृत्युलोक में इसी नौकरी के लिए अवतरित हुए हैं। इक-रंगे विषय को सौ-रंग में बांधना पड़ेगा। रोज़ एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक ज़लील होना पड़ेगा, जब तक कि एक ही दफ्तर में इसकी स्थायी व्यवस्था न हो जाये। हर चंद कि फ़ॆल होने की संभावना थी मगर पास होने का डर भी लगा हुआ था। कई लड़के इस ज़िल्लत को और दो साल स्थगित करने के लिए एम.ए. और एल.एल.बी. में प्रवेश ले लेते थे। बिशारत की जान-पहचान में जिन मुसलमान लड़कों ने तीन साल पहले यानी १९२७ में बी.ए. किया था वो सब जूतियां चटखाते फ़िर रहे थे, सिवाय एक सौभाग्यशाली के, जो मुसलमानों में सर्वप्रथम आया और अब मुस्लिम मिडिल स्कूल में ड्रिल मास्टर हो गया था। १९३० की भयानक विश्व-स्तरीय बेरोज़गारी और मंहगाई की तबाहियां समाप्त नहीं हुई थीं। माना कि एक रुपये का गेहूं १५ सेर और देसी घी एक सेर मिलता था, लेकिन एक रुपया था किसके पास?

कभी-कभी वो डर-डर के, मगर सचमुच की इच्छा करते कि फ़ेल ही हो जायें तो बेहतर है, कम से कम एक साल निश्चिन्तता से कट जायेगा। फ़ेल होने पर बक़ौल मिर्ज़ा सिर्फ एक दिन आदमी की बेइज्जती खराब होती है इसके बाद चैन ही चैन। बस यही होगा ना कि जैसे ईद पर लोग मिलने आते हैं उसी तरह उस दिन खानदान का हर बड़ा बारी-बारी से बरसों की जमा धूल झाड़ने आयेगा और फ़ेल होने तथा खानदान की नाक कटवाने का एक अलग ही कारण बतायेगा। उस ज़माने में नौजवानों का कोई काम, कोई हरकत ऐसी नहीं होती थी जिसकी झपट में आ कर खानदान की नाक न कट जाये। आजकल की-सी स्थिति नहीं थी कि पहले तो खानदानों के मुंह पर नाक नज़र नहीं आती और होती भी है तो ट्यूबलेस टायर की तरह जिसमें आये दिन हर साइज के पंक्चर होते रहते हैं और अन्दर ही अन्दर आप-ही-आप जुड़ते रहते हैं। यह भी देखने में आया है कि कई बार खानदान के दूर-पास के बुज़ुर्ग छठी-सातवीं क्लास तक फ़ेल होने वाले लड़कों की, संबंधों की निकटता व क्षमता के हिसाब से अपने निजी हाथ से पिटाई भी करते थे, लेकिन जब लड़का हाथ-पैर निकालने लगे और इतना सयाना हो जाये कि दो आवाज़ों में रोने लगे यानी तेरह, चौदह साल का हो जाये तो फ़िर उसे थप्पड़ नहीं मारते थे, इसलिये कि अपने ही हाथ में चोट आने और पहुंचा उतरने का अन्देशा रहता था, केवल चीख-पुकार, डांट से काम निकालते थे। हर बुज़ुर्ग उसकी सर्टिफ़ाइड नालायक़ी की अपने झूठे शैक्षिक रिकार्ड से तुलना करता और नई पौध में अपनी दृष्टि की सीमा तक कमी और गिरावट के आसार देख कर इस सुखद निर्णय पर पहुंचता कि अभी दुनिया को उस जैसे बुज़ुर्ग की ज़ुरूरत है। भला वो ऐसी नालायक नस्ल को दुनिया का चार्ज देकर इतनी जल्दी कैसे विदा ले सकता है। मिर्ज़ा कहते हैं कि हर बुज़ुर्ग बड़े सिद्ध पुरुषों के अंदाज़ में भविष्यवाणी करता था कि तुम बड़े होकर बड़े आदमी नहीं बनोगे। साहब यह तो अन्धे को भी …हद तो ये है कि खुद हमें भी….नज़र आ रहा था। भविष्यवाणी करने के लिए सफेद दाढ़ी या भविष्यवक्ता होना आवश्यक नहीं था। बहरहाल यह सारी FARCE एक ही दिन में खत्म हो जाती थी, लेकिन पास होने के बाद तो एक उम्र का रोना था। ज़िल्लत ही ज़िल्लत, परेशानी ही परेशानी।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से”

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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मैं बुद्धिजीवी नहीं हूँ यानि मैं कोई ऎसा काम नहीं करता जिसमें बुद्धि की तनिक भी जरूरत होती है. इससे कहीं आप यह ना समझें कि मैं एक नेता हूँ या हिन्दी का कवि हूँ इसलिये साफ कर दूँ कि मैं यह दोनों भी नहीं हूँ. लेकिन फिर भी मैं हूँ. मेरा अस्तित्व है. इसलिये देखता हूँ.मन हो तो कभी कभी सोचता भी हूँ. सोचने के लिये मुझे बुद्धि की जरूरत नहीं होती. मैं कुछ सोचना ना भी चाहूँ तो भी दिमाग कुछ ना कुछ सोचता ही है.इसलिये मैं सोचने का क्रेडिट नहीं लेना चाहता. कुछ लोग इसी सोच का क्रेडिट ले लेते है.वह इस सोच को अपनी बुद्धि समझते है और खुद को बुद्धिजीवी.

हमारा देश बुद्धिजीवीयों का देश है.लोग हर काम में अपनी बुद्धि लगाते हैं. ऎसा वह खुद के कामों में नहीं दूसरे के कामों में करते हैं. खुद के काम बिना बुद्धि के भी हों तो चलता है बस किसी भी काम में सिर्फ इतना होना चाहिये कि पैसा बराबर आता रहे. बुद्धि लगे ना लगे. पैसा बुद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसे कमाने के लिये बुद्धि लगे यह जरूरी नहीं है. लेकिन दूसरे के हर काम में अपनी बुद्धि लगाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. मुझे लगता है जब इस देश के लोग स्वतंत्रता की मांग कर रहे होंगे तो उनका लक्ष्य यह ही रहा होगा कि हम स्वतंत्र हो जायें  ताकि दूसरे के कामों में अपनी बुद्धि लगा सकें. माफ कीजिये मैं स्वतंत्र भारत में पैदा हुआ इसलिये सिर्फ अनुमान ही लगा सकता हूँ और फिर मैं इतिहासकार भी नहीं हूँ-बुद्धिजीवी तो नहीं ही हूँ, कि अपने अनुमानों को किसी तरह से सिद्ध भी कर सकूँ.

दूसरे के कामों में अपनी बुद्धि लगाना हमारे अस्तित्व का प्रतीक है. यदि हम हैं तो बुद्धि लगायेंगे.दूसरों के चलने से लेकर खाने तक, उठने से लेकर बैठने तक, पत्नी से लेकर लिखने तक (यहाँ आशय पत्नी द्वारा लिखे को छापने से नहीं है) सब जगह अपनी बुद्धि का खटोला बिछाना जरूरी है.इसी खटोले पर जब हमारे तर्कों,वितर्को और कुतर्को के बच्चे अठखेलियां करें तो कलेजे में ठंडक सी होती हैं. वाह बच्चे बड़े हो रहे हैं और हम बूढ़े.

पहले बढ़ी हुई दाढ़ी, कंधे से लटका हुआ झोला-उसमें चंद किताबें और लिफाफे,हाथों में सिगरेट यह एक बुद्धिजीवी की पहचान थी.कालांतर में इस छवि में परिवर्तन हुआ. अब आप क्लीन शेव भी हो सकते हैं, झोला विहीन भी भ्रमण कर सकते हैं,सिगरेट छोड़ भी सकते हैं लेकिन दूसरो के कामों में बुद्धि लगाना नहीं छोड़ सकते. वही आपका असली धंधा है.

भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है. हम बुद्धि की खेती करते हैं. बुद्धिजीवीयों की फसलें लहलहाती है.फसल ज्यादा होने पर हम बुद्धिजीवी एक्स्पोर्ट भी करते हैं.लेकिन ध्येय यही रहता है कि बुद्धिजीवी जहां जाये वहाँ कमाता खाता रहे. बोझा ना बने. दूसरों को बोझा उठाना सिखाये और खुद मजदूरी ले.हमारा यह परम कर्तव्य है कि हम खुशी खुशी यह मजदूरी दे दें.यह एक स्वचालित प्रक्रिया है. हमें इसके लिये सोचना नहीं पड़ता. बचपन से हम देखते आये हैं जो नेता झूठ के ज्यादा पुलिंदे बांध सकता है वही हमारे वोट का अधिकारी होता है.अब नेता बुद्धिजीवी नहीं हो सकता यह सर्वमान्य है लेकिन बुद्धिजीवी तो नेता हो ही सकता है. इसमें कहां कैसा प्रश्न.

पिछ्ले अंक में अतुल जी ने कहा “ये व्यंग्य तो अंत में बड़ा ही मार्मिक हो गया है। किबला से एक जुड़ाव सा हो गया था अब उनका यूँ टूट जाना दु:खदायी लग रहा है।”. युसुफी साहब की यही खासियत है कि उनके व्यंग्य एक और जहां शुद्ध हास्य हैं वहीं दूसरी ओर मार्मिक भी है और उनमें जिन्दगी का पूरा फ़लसफा भी है. आज पढिये किबला की कहानी का अंतिम भाग. अगले शुक्रवार से दूसरी कहानी प्रस्तुत की जायेगी.

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मैं पापन ऎसी जली कोयला भई न राख

उन्हें उस रात नींद नहीं आयी। फ़ज़्र (सूरज निकलने से पहले की नमाज़) की अज़ान हो रही थी कि टिम्बर मार्किट का एक चौकीदार हांपता-कांपता आया और खब़र दी कि “साहब जी! आपकी दुकान और गोदाम में आग लग गई है। आग बुझाने के इंजन तीन बजे ही आ गये थे। सारा माल कोयला हो गया। साहब जी! आग कोई आप ही आप थोड़ी लगती है।“ वो जिस समय दुकान पर पहुंचे तो सरकारी ज़बान में आग पर काबू पाया जा चुका था। जिसमें फ़ायर बिग्रेड की मुस्तैदी और भरपूर कार्यक्षमता के अलावा इसका भी बड़ा दख्ल़ था कि अब जलने के लिये कुछ रहा नहीं था। शोलों की लपलपाती ज़बानें काली हो चुकी थीं।

अलबत्ता चीड़ के तख्त़े अभी तक धड़-धड़ जल रहे थे, और वातावरण दूर-दूर तक उनकी तेज़ खुशबू में नहाया हुआ था। माल जितना था सब जल कर राख हो चुका था, सिर्फ़ कोने में उनका छोटा सा दफ़्तर बचा था।

अरसा हुआ, कानपुर में जब लाला रमेश चन्द्र ने उनसे कहा कि हालात ठीक नहीं हैं, गोदाम की इंश्योरेंस पालिसी ले लो, तो उन्होंने मलमल के कुर्ते की चुनी हुई आस्तीन उलट कर अपने बाज़ू की फड़कती हुई मछलियां दिखाते हुए कहा था। “ यह रही यारों की इंश्योरेंस पालिसी! “ फिर अपने डंटर फुला कर लाला रमेश चन्द्र से कहा, ”ज़रा छू कर देखो“ लाला जी ने अचम्भे से कहा ”लोहा है लोहा!” बोले ”नहीं फ़ौलाद कहो।“

दुकान के सामने लोगों की भीड़ लगी थी। उनको लोगों ने इस तरह रास्ता दिया जैसे जनाज़े को देते हैं। उनका चेहरा एकदम भावहीन था। उन्होंने अपने दफ्तर का ताला खोला। इनकमटैक्स का हिसाब और रजिस्टर बगल़ में दाबे और गोदाम के पश्चिमी हिस्से में जहां चीड़ से अभी शोले और खुशबू की लपटें उठ रही थीं, तेज़-तेज कदमों से गये। पहले इनकमटैक्स के खाते और उनके बाद चाबियों का गुच्छा आग में डाला। फिर आहिस्ता-आहिस्ता दायें-बायें नज़र उठाये बिना दुबारा अपने दफ्त़र में दाखिल हुए। हवेली का फ़ोटो दीवार से उतारा। रूमाल से पोंछ कर बगल़ में दबाया और दुकान जलती छोड़ कर घर चले आये।

बीबी ने पूछा ”अब क्या होयेगा?“

उन्होंने सर झुका लिया।

अक्सर ख्याल आता है, अगर फ़रिश्ते उन्हें जन्नत की तरफ़ ले गये जहां मोतिया धूप होगी और कासनी बादल, तो वो जन्नत के दरवाज़े पर कुछ सोच कर ठिठक जायेंगे। दरबान जल्दी अंदर दाखिल होने का इशारा करेगा तो वो सीना ताने उसके पास जा कर कुछ दिखाते हुए कहेंगे:

“यह छोड़ कर आये हैं।“

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[अगले शुक्रवार से नयी कहानी प्रस्तुत की जायेगी]

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1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था 17. बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है. 18. खरबूजा खुद को गोल कर ले तब भी तरबूज नहीं बन सकता 19. कौन कैसे टूटता है ?

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किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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जो लोग इस श्रंखला को पढ़ रहे होंगे वो किबला के बारे में जानते हैं कि वह कैसे हैं. उन्होने किबला के अपनी पत्नी के प्रति वफादारी निभाने वाले मानवीय रूप को भी देखा है. आज किबला टूट रहे हैं. यह बहुत ही मार्मिक है और इसमें जीवन का पूरा दर्शन भी है. ऎसी कई अवस्थाऎं कईयों की जीवन में अक्सर आती है. आदमी जब टूटता है तो कैसे बदलता है? कैसे उसका अभिमान नष्ट होता है. आइये पढें….

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कौन कैसे टूटता है

दस पंद्रह मिनट बाद वो दुकान में ताला डाल कर घर चले आये और बीबी से कह दिया, अब हम दुकान नहीं जायेंगे। कुछ देर बाद मोहल्ले की मस्जिद से इशा (रात की नमाज़) की आवाज़ बुलन्द हुई और वो दूसरे ही “अल्ला हो अकबर” पर हाथ-पांव धो कर कोई चालीस साल बाद नमाज़ के लिये खड़े हुए तो, बीबी धक से रह गयीं कि खैर तो है। वो खुद भी धक से रह गये। इसलिये कि उन्हें दो सूरतों के अलावा कुछ याद नहीं रहा था। वितरे भी अधूरे छोड़ कर सलाम फेर लिया कि यह तक याद नहीं आ रहा था कि दुआये-क़ुनूत (नमाज़ में पढ़ी जाने वाली दुआ) के शुरू के शब्द क्या हैं।

वो सोच भी नहीं सकते थे कि आदमी अंदर से टूट भी सकता है और यूं टूटता है। और जब टूटता है तो अपनों, बेगानों से, हद यह कि अपने सबसे बड़े दुश्मन से भी सुल्ह कर लेता है यानी अपने-आप से। इसी मंज़िल पर अंत:दृष्टि खुलती है, बुद्धि और चेतना के दरवाज़े खुलते हैं।

ऐसे भी लोग हैं जो ज़िंदगी की सख्त़ियों, परेशानियों से बचने की खातिर खुद को अकर्मण्यता के घेरे में कैद रखते हैं। ये भारी और क़ीमती पर्दों की तरह लटके-लटके ही लीर-लीर हो जाते हैं। कुछ गुम-सुम गम्भीर लोग उस दीवार की तरह तड़ख़ते हैं जिसकी महीन-सी दरार, जो उम्दा पेंट या किसी सजावटी तस्वीर से आसानी से छुप जाती है, इस बात की चुगल़ी खाती है कि नींव अंदर ही अंदर सदमे से ज़मीन में ध्ंस रही है। कुछ लोग चीनी के बर्तन की तरह टूटते हैं कि मसाले से आसानी से जुड़ तो जाते हैं, मगर बाल और जोड़ पहले नज़र आता है, बर्तन बाद में। कुछ ढीठ और चिपकू लोग ऐसे अटूट पदार्थ के बने होते हैं कि च्विगंम की तरह कितना ही चबाओ टूटने का नाम नहीं लेते। ”खींचने से खिंचते हैं छोड़े से जाते हैं सुकड़” आप उन्हें हिक़ारत से थूक दें तो जूते से इस बुरी तरह चिपकते हैं कि छुटाये नहीं छूटते। रह-रह कर ख्याल आता है कि इससे तो दांतों तले ही भले थे कि पपोल तो लेते थे। ये च्विंगम लोग खुद आदमी नहीं पर आदमी की पहचान रखने वाले लोग हैं। यह कामयाब लोग हैं। इन्होंने इंसान को देखा, परखा और बरता है और उसे खोटा पाया तो खुद भी खोटे हो गये, और कुछ ऐसे भी हैं कि कार के विंड स्क्रीन की तरह होते हैं। साबुत और ठीक हैं तो ऐसे पारदर्शी कि दुनिया का नज़ारा कर लो और एकाएक टूटे तो ऐसे टूटे कि न बाल पड़ा न दरके, न तड़खे ऐसे रेज़ा रेज़ा हुए कि न वो पहचान रही, न दुनिया की जलवागरी रही, न आईने का पता कि कहां था, किधर गया।

और एक अभिमान है कि यूं टूटता है जैसे राजाओं का प्रताप। हज़रत सुलेमान छड़ी की टेक लगाये खड़े थे कि मृत्यु आ गयी लेकिन उनका बेजान शरीर एक मुद्दत तक उसी तरह खड़ा रहा और किसी को शक तक न गुज़रा कि वो इंतक़ाल फ़र्मा चुके हैं। वो उसी तरह बेरूह खड़े रहे और उनके रोब व दबदबे से कारोबारे-सल्तनत नियम के अनुसार चलता रहा। उधर छड़ी को धीरे-धीरे घुन अंदर से खाता रहा। यहां तक कि एक दिन वो चटाख से टूट गई और हज़रत सुलेमान की नश्वर देह ज़मीन पर आ गई। उस समय उनकी प्रजा पर खुला कि वो दुनिया से पर्दा फ़र्मा चुके हैं।

सो वो दीमक लगी गुरूर-गुस्से की छड़ी, जिसके बल क़िबला ने ज़िंदगी गुज़ारी थी, आज शाम टूट गयी और जीने का वो जोश और हंगामा भी खत़्म हो गया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[ रविवार को किबला की कहानी का अंतिम भाग प्रस्तुत किया जायेगा ]

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था 17. बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है. 18. खरबूजा खुद को गोल कर ले तब भी तरबूज नहीं बन सकता

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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आप कहीं यह अनुमान ना लगा लें कि मैं किसी कविता नामक सुकन्या के प्रेमपाश में बंधकर कवि बनना चाहता हूँ इसलिये मैं यह घोषणा करना चाहता हूँ कि मुझ बाल बच्चेदार को किसी से प्यार व्यार नहीं है (अपनी पत्नी से भी नहीं :-) ) बल्कि मैं तो लिखी जाने वाली कविता से प्रेम की पींगे बढ़ाना चाह रहा हूँ और ऎसा मैं इसलिये कर रहा हूँ क्योंकि आज के जमाने में मुझे कविता का महत्व पता चल गया है.

मैं अक्सर कुडकुड़ करता हूँ और दिन में एक बार ही इस कुड़कुड़ को करना मेरे को बड़ा भारी लगता है. मेरे पूरे लेख को पढ़ने के बाद लोगों के समझ में भी नहीं आता कि  आखिर मैं क्या कहना चाह रहा हूँ.इसका एक  फायदा तो यह है ही कि भविष्य में मुझमें नेता बनने के पूरे गुण हैं लेकिन अभी हाल फिलहाल मैं कवि भी बन सकता हूँ. जिस लेख के लिये मैं तीन सौ चार सौ शब्दों का जाल बुनूँ वह बात महज पचास साठ शब्दों में भी कह सकता हूँ. बात वह तब भी समझ में नहीं आयेगी लेकिन मैं तो कवि बन ही जाऊंगा.

कविता भले की किसी भी अर्थ में उपयोगी ना हो पर उस पर वाह वाही मिलने के भरपूर तत्व होने चाहिये. वह भले ही किसी के समझ में ना आये लेकिन आप का लहजा और व्यक्तित्व का प्रभाव ऎसा हो कि सामने वाला चाहे वह आपकी कविता पढ़ रहा हो या सुन रहा हो वो वाह वाह कहने को विवश हो जाये. कविता एक कला है और कला किसी काम की भी हो यह जरूरी नहीं. कला में कोई तथ्य हों या वह हर किसी के पल्ले पड़ जाये यह भी आवश्यक नहीं है. कविता शब्द सम्मोहन की विधा है जो किसी भी कवि सम्मेलन में पहलवान की धोबी पछाड़ सी चलती है और सामने बैठे लोगों को चारों खाने चित्त कर देती है. वाह वाह…क्या बात है .. मजा आ गया .. जैसे प्रोत्साहनी वाक्य हवा में तैरने लगें तो समझिये कविता ने मैदान मार लिया.

उर्दू वालों ने कविता की बहुत सेवा की है. ग़ालिब से लेकर मीर ने ऎसे ऎसे शेर लिखे कि वो आज भी किसी महफिल की जान बने रहते हैं. हर मौके और हर अवसर के लिये एक शेर हाजिर हो जायेगा. लेकिन कौन ऎसा माई का लाल होगा जिसने पूरा उर्दू साहित्य पढ़ा होगा इसलिये आप उर्दू शायरी से कुछ भी लेके (वैसे हिन्दी से भी ले सकते हैं लेकिन थोड़ा रिस्क है) उसमें अपने शब्दों का थोड़ा छोंक लगाकर झोंक दीजिये फिर देखिये….शत प्रतिशत सफलता आपके चरण चूमेगी यदि आप जारी रहे तो यही सफलता चरणों से होंठों तक भी जा सकती है फिर भले ही बांकियों के सर में दर्द हो पर आपके होंठों पर मुस्कान रहेगी.  

कविता सामुहिक चेतना की संस्थापक है. आप अपने जैसे बेकार कवियों को ढूंढने निकलिये… एक को ढूंढेंगे हजार मिलेंगे और फिर आप सामुहिक रूप से कविता कीजिये.वाह वाही बिना ब्याज का कर्ज है. यानि आप कविता करें तो अगला वाह वाह कर आपको कर्ज दे और उसकी कविता में आप वाह वाह कर उस कर्ज को उतार दें. समूह में कविता से कई फायदे हैं आप एक पूरे समूह को मूर्ख बना सकते हैं और बार बार बना सकते हैं. सब घुलमिल कर कविता करें… वाह वाही लूटें.

सामुहिक कविताओं के श्रोता और पाठक बड़े पारखी हैं. भले ही आपकी कविता उनके समझ ना आये. भले ही आप सदियों से कही जा रही बात को बिना किसी आधार के फिर फिर कहें. भले ही आपको ना शब्दों की समझ हो ना उनके अर्थों की. लेकिन यदि आप एक नेता की तरह भीड़ को मूर्ख बनाना जानते हैं तो वह वाह वाह करेंगे ही. आप सफल कवि हैं. आपकी जय जयकार होगी.आप खुश रहिये. आपके स्थायी चमचे आपके साथ हैं. अभी आपको पार्टी बदलने की जरूरत नहीं.

मैं सोच रहा हूँ कि मैं भी कवि बन ही जाऊं और पकड़ूं अपने जैसे कुछ और मूर्खों को….. आप क्या कहते हैं ???..आप साथ आना चाहेंगे… :-)

अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे कि उमर खैय्याम की रुबाइयों में कितनी व्यापकता है. जब मैं उमर खैय्याम की रुबाइयों और उनके उन अनुवादों के बारे में सोचता हूँ जो भारत में हुए तो उनमें एक साम्य जैसा लगता है. पहले उमर खैय्याम की मूल रचना की बात करें. उमर खैयाम ने इतिहास के उस युग में जन्म लिया जब युरोप के लोग इतने सभ्य नहीं थे…या यूं कहें कि निरे जंगली थे तो अतिशयोक्ति ना होगी. उस समय स्कॉटलैंड में मैलकम कैमोर का दबदबा था और इंग्लैंड में सैक्सन राजाओं का आधिपत्य था. ये सब राजा प्रजा को गुलाम की तरह रखते थे…लेकिन इसके विपरीत फारस (पारस) में ज्योति थी, जीवन था, ज्ञान था और साहित्य था. सूफी संस्कृति, वैज्ञानिक सोच की अपनी महत्ता थी. ऎसे सामाजिक परिदृश्य में उमर ने सांसारिकता को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर रखने के अपनी रुबाइयों का सहारा लिया.

जॉन फिटजराल्ड सहित कई अनुवादकों का मानना है कि उमर खुद सुरा-प्रेमी थी और उनके इन पदों में केवल सुरा,सुन्दरी का ही जिक्र है लेकिन उमर की रुबाईयों को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर देखने वालों की भी कमी नहीं है. मैने भी अब तक जितना उमर को पढ़ा उसके आधार पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि ये रुबाइयाँ मात्र सुरा-वन्दना हीं है. यह रुबाइयाँ उससे अधिक बहुत कुछ कह जाती हैं.मैं अपने और विचार लेख के अगले अंक में आने वाले सप्ताह में रखूंगा.

उमर की रुबाइयों के अनुवाद हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में 1930 से 1945 के बीच हुए. इस समय देश में अंग्रेजों का शासन था लेकिन स्वतंत्रता का सूरज भी धीरे धीरे आंखे खोल रहा था. यह नवजागरण का काल था. लोगों में पर्याप्त मात्रा में असंतोष था. यह ऎसा समय था जब लोग खुद-ब-खुद उमर की दार्शनिकता की ओर खिंचे चले आये.लोगों की आंखों में सपने थे, दिलों में जोश था और चाल में मस्ती. यह समय था जब लोगों ने उमर को पढना और गुनना प्रारम्भ किया.

हरिवंश राय बच्चन ने एक जगह इसी परिस्थिति का वर्णन कुछ ऎसे किया है.

” सात-आठ बरस बाद जब मैंने उमर खैयाम की रुबाइयों को पहली बार पढ़ा, तो मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने उनमें किसी रोदन, किसी वेदना या किसी निराशा की प्रत्याशा करते हुए पढ़ा था। मेरी यही प्रत्याशा कहाँ तक पूरी हुई होगी इसे ‘रुबाइयात उमर खैयाम’ का हरेक पाठक अपने आप समझ सकता है। मुमकिन है, यहाँ मेरी बात काटकर कुछ लोग मुझसे अपनी असहमति जताएँ। साधारण जनता के बीच, और इसमें प्रायः ऐसे लोग अधिक हैं जिन्होंने उमर खैयाम की कविता स्वयं नहीं पढ़ी, बस यदा-कदा दूसरों से उसकी चर्चा सुनी है, या कभी उसके भावों को व्यक्त करने वाले चित्रों को उड़ती नज़र से देखा है, कवि की एक और ही तसवीर घर किए हुए है। उनके ख़याल में उमर खैयाम आनन्दी जीव है, प्याली और प्यारी का दीवाना है, मस्ती का गाना गाता है, सुखवादी है या जिसे अंग्रेज़ी में ‘हिडोनिस्ट’ या ‘एपीक्योर’ कहेंगे। इतिहासी व्यक्ति उमर खैयाम ऐसा ही था या इससे विपरीत, इस पर मुँह खोलने का मुझे हक़ नहीं है। फ़ारसी की रुबाइयों में उमर ख़ैयाम का जो व्यक्तित्व झलका है, उस पर अपनी राय देने का मैं अधिकारी नहीं हूँ क्योंकि फ़ारसी का मेरा ज्ञान बहुत कम है, लेकिन, एडवर्ड फ़िट्ज़जेरल्ड ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में अपने अंग्रेज़ी तरजुमे के अन्दर उमर खैयाम का जो खाका खींचा है उसके बारे में बिना किसी संकोच या सन्देह के मैं कह सकता हूँ कि वह किसी सुखवादी आनन्दी जीवन अथवा किसी हिडोनिस्ट या ‘एपीक्योर’ का नहीं है।

इन रुबाइयों का लिखने वाला वह व्यक्ति है जिसने मनुष्य की आकांक्षाओं को संसार की सीमाओं के अन्दर घुटते देखा है, जिसने मनुष्य की प्रत्याशाओं को संसार की प्राप्तियों पर सिर धुनते देखा है, जिसने मनुष्य के सुकुमार स्वप्नों को संसार के कठोर सत्यों से टक्कर खाकर चूर-चूर होते देखा है। इन रूबाइयों के अन्दर एक उद्विग्न और आर्त आत्मा की पुकार है, एक विषण्ण और विपन्न मन का रोदन है, एक दलित और भग्न हृदय का क्रन्दन है। संक्षेप में कहना चाहें तो यह कहेंगे कि रुबाइयात मनुष्य की जीवन के प्रति आसक्ति और जीवन की मनुष्य के प्रति उपेक्षा का गीत है-रुबाइयों का क्रम जैसा रक्खा गया है उससे वे अलग-अलग न रहकर एक लम्बे गीत के ही रूप में हो गई हैं। यह गीत जीवन-मायाविनी के प्रति मानव का एकांतिक प्रणय निवेदन है। पर कौन सुनता है ? वह अपना क्रोध-विरोध प्रकट करता है-पर उसे हार ही माननी पड़ती है। मानव की दुर्बलता, उसकी असमर्थता, उसकी परवशता, उसकी अज्ञानता और उसकी लघुता के साथ उसका दम्भ, उसका क्रोध-विरोध और उसकी क्रान्ति उसे कितना दयनीय बना देती है ! रुबाइयात सुख का नहीं दुख का गीत है, सन्तोष का नहीं असन्तोष का गान है।”

बच्चन जी की ’मधुशाला‘ में ही देखें तो पायेंगे कि इसके पूर्वाद्ध में यदि कवि ने मरणोपरांत क्रियाओं में भी मधु की महत्ता स्थापित की है तो इसके उत्तरार्द्ध में दर्द,अस्थिरता,क्षण भंगुरता और मोह भंग का यह रूप भी है -

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गई सुरभित हाला

कहाँ गया स्वप्निल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला

पीने वालों ने मदिरा का मूल्य हाय कब पहचाना

फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला

तो उमर की रुबाइयों को मात्र सुरा,सुन्दरी से जोड़कर देखना शायद सही नहीं है. इसके और भी कई पहलू हैं…जिनकी चर्चा अगले अंक में करेंगे.

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

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