काकेश की कतरनें
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मौलवी मज्जन से तानाशाह तक

By काकेश on February 24, 2008

कभी अपने बुजुर्ग या बॉस या अपने से अधिक बदमाश आदमी को सही रास्ता बताने की कोशिश न करना। उन्हें ग़लत राह पर देखो तो तीन ज्ञानी बंदरों की तरह अंधे, बहरे और गूंगे बन जाओ!

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नेकचलनी का साइनबोर्ड

By काकेश on February 22, 2008

समझ में न आया कि नेकचलनी का क्या सुबूत हो सकता है, बदचलनी का अलबत्ता हो सकता है। उदाहरण के लिये चालान,मुचलका, गिरफ़्तारी-वारंट, सजा के आदेश की नक़्ल या थाने में दस-नम्बरी बदमाशों की लिस्ट।पांच मिनट में आदमी बदचलनी तो कर सकता है नेकचलनी का सुबूत नहीं दे सकता।

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चयनम् : क्या साहित्य विफल है ?

चयनम् : क्या साहित्य विफल है ?

By काकेश on February 21, 2008

साहित्य क्रांति नहीं करता; वह मनुष्यों के दिमाग़ बदलता और उन्हें क्रांति की ज़रूरत के प्रति जागरूक बनाता है.

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पास हुआ तो क्या हुआ

By काकेश on February 17, 2008

बेइज्जती के जितने प्रचुर अवसर हमारे यहां हैं दुनिया में कहीं और नहीं। नौकरी पेशा आदमी बेइज्जती को प्रोफ़ेशनल हेजर्ड समझ कर स्वीकार करता है।

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फ़ेल होने के फायदे

By काकेश on February 15, 2008

फ़ेल होने पर सिर्फ एक दिन आदमी की बेइज्जती खराब होती है इसके बाद चैन ही चैन।

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बुद्धिजीवियों के देश में…..

By काकेश on February 12, 2008

भारत विकट बुद्धिजीवियों का देश है. एक को ढूंढो हजार मिलते हैं. कमी नहीं ग़ालिब.

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मैं पापन ऎसी जली कोयला भई न राख

By काकेश on February 10, 2008

जीवन की नश्वरता की कहानी….

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कौन कैसे टूटता है ?

By काकेश on February 8, 2008

एक मार्मिक प्रस्तुति

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मैं कहीं कवि ना बन जाऊं….

By काकेश on February 5, 2008

आप कहीं यह अनुमान ना लगा लें कि मैं किसी कविता नामक सुकन्या के प्रेमपाश में बंधकर कवि बनना चाहता हूँ इसलिये मैं यह घोषणा करना चाहता हूँ कि मुझ बाल बच्चेदार को किसी से प्यार व्यार नहीं है (अपनी पत्नी से भी नहीं ) बल्कि मैं तो लिखी जाने वाली कविता से प्रेम की [...]

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उमर की मधुशाला के निहितार्थ

By काकेश on January 31, 2008

अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे कि उमर खैय्याम की रुबाइयों में कितनी व्यापकता है. जब मैं उमर खैय्याम की रुबाइयों और उनके उन अनुवादों के बारे में सोचता हूँ जो भारत में हुए तो उनमें एक साम्य जैसा लगता है. पहले उमर खैय्याम की मूल रचना की बात करें. उमर खैयाम ने [...]

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