साहित्य अकादमी एक संस्था है जो भारतीय भाषाओं के छ्पी विभिन्न रचनाओं को सामने लाने का माध्यम बनी है.यह अंग्रेजी में 1957 से इंडियन लिटरेचर तथा हिन्दी में 1980 के समकालीन भारतीय साहित्य जैसी पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन भी करती आ रही है.ये पत्रिकाएँ विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित श्रेष्ठ समकालीन साहित्य को प्रस्तुत करती रही हैं.chayanam

वर्ष 2006 में साहित्य अकादेमी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर अरुण प्रकाश द्वारा संपादित एक पुस्तक का प्रकाशन किया था जिसका नाम है “चयनम्” .यह अकादमी की द्विमासिक हिन्दी पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य के पिछले 25 वर्षों में प्रकाशित रचनाओं से एक चयन है, इसमें कविता कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, साक्षात्कार तथा आलोचनात्मक लेखों के साथ-साथ एक उपन्यासिका का भी समावेश किया गया है.

इसमें उर्दू के ख्याति प्राप्त आलोचक आले अहमद सुरूर, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, प्रसिद्ध नाट्यकर्मी शुंभ मित्र, भैरप्प, विजय तेन्दुलकर, फणीश्वरनाथ रेणु, त्रिलोचन शास्त्री, नागार्जुन, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, गोपीचंद्र नारंग, अली सरदार जाफ़री, प्रतिभा राय, सुनील गंगोपाध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय, अमृता प्रीतम, केशव रेड्डी, योसफ़ मेकवान, शरणकुमार लिम्बाले, ओ.एन.वी. कुरुप से लेकर युवा अंग्रेजी कथाकार मित्रा फुकन की रचनाऎं हैं.

आज प्रस्तुत है इसी पुस्तक से आले अहमद सुरुर की एक रचना “क्या साहित्य विफल है ?” के प्रमुख अंश. 

लगभग सत्तर वर्ष पहले जब टी.एस. एलियट ने कहा कि उपन्यास मर चुका है, और बाद में जब एडमंड विल्सन ने घोषणा की कि एक ‘मरती हुई विधा’ है, तो उनका आशय यही था कि दूसरे रूप और पद्धतियाँ उनका स्थान ले लेंगी. उन्होंने यह नहीं कहा कि साहित्य एक मरती हुई कला है. लेकिन इन दिनों कोई ख़ास रूप या विधा नहीं, बल्कि संरचित भाषिक प्रवचन का संपूर्ण माध्यम ही आक्रमणों के घेरे में है. दूरदर्शन और अन्य आधुनिक तकनीकी चमत्कारों के सम्मुख मुद्रित शब्द अपना आकर्षण खो रहा है. यह एक वास्तविक ख़तरा है कि किताबें बेकार हो चलें और मुद्रण केवल अल्पतम उपयोगितापरक कामों तक सीमित हो जाए.

******* तथ्य फिर भी यह है कि किताबें पहले से ज़्यादा छप और बिक रही हैं और शायद पढ़ी जाती होंगी. यह सही है, जैसा कि एक समीक्षक ने टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेण्ट में कुछ अरसा पहले इशारा किया था कि उनमें अधिकांश ‘कूड़ा’ होंगी. भारत में हालत और भी बदतर होगी, लेकिन शायद कुछ विश्वास के साथ यह दावा किया जा सकता है कि अधिकांश भारतीय भाषाओं में अभी भी कुछ उम्दा किताबें आ रही हैं और कविता तथा गद्य में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोग किए जा रहे हैं. भारतीय भाषाओं में आपस में और विदेशी साहित्य से पहले से अधिक अनुवाद देखे जा सकते हैं.

साहित्य के विभिन्न रूपों और विधाओं के बीच की सीमा-रेखाएँ धुँधली पड़ने लगी है. भाषा ख़ुद बदल रही है, नैतिक सवालों पर बहस जारी है, यद्यपि नैतिक समाधानों का प्रचलन नहीं रहा, विचारधारा की पकड़ ढ़ीली होती जा रही है तथा संशयवाद, संदेह और निराशा, अँधी आस्था, सुनिश्चित मताग्रहों और अस्पष्ट सामान्यीकरण की जगह लेते जा रहे हैं. भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में टैगोर, इक़बाल और प्रेमचंद्र जैसे महान नाम इस समय नहीं हैं. महानों का दौर समाप्त हो गया है. आकाश पर कवि छाए नहीं हैं. यह गद्य का, उपन्यास, कहानी, आत्मकथा और आलोचना का दौर है. कुछ रचनाकारों ने आलोचकों की वर्तमान हैसियत पर विरोध प्रकट किया है. आलोचक कई बार नए लेखकों की प्रतिभा को पहचानने में असफल रहे हैं; वे अधिकांशतः पुरानी अभिरुचियों में ही शरण लेते रहे हैं; विचारधारा की अपनी तालाश के मारे वे साहित्य के मूल्यांकन में नाकामयाब रहे हैं; फिर भी एक परिप्रेक्ष्य के लिए, एक मूल्यबोध और संस्कृति की खोज के लिए और इस दौर की बढ़ती हुई बर्बरता में एक सामाजिक चेतना, एक नैतिक ताने-बाने के लिए और भाषा नामक रहस्य के सम्मान के लिए आलोचक का महत्त्व है.

*******पाठक आमतौर पर रूढ़िवादी होते हैं, वे सामान्यतया साहित्य में अपनी स्थापित मर्यादाओं की स्वीकृति या एक स्वप्न-जगत में पलायन चाहते हैं. साहित्य एक झटके में उन्हें अपने आस-पास के उस जीवन के प्रति सचेत करता है, जिससे उन्होंने आँखें मूँद रखी थीं. शुतुरमुर्ग़ अफ्रीका के रेगिस्तानों में नहीं मिलते; वे हर जगह बहुतायत में उपलब्ध है. प्रौद्योगिकी के इस दौर का नतीजा जीवन के हर गोशे में नक़द फ़सल के लिए बढ़ता हुआ पागलपन है; और हमारे राजनीतिज्ञ, सत्ता के दलाल, व्यापारी, नौकरशाह- सभी लोगों को इस भगदड़ में नहीं पहुँचने, जैसा दूर करते हैं वैसा करने, चूहादौड़ में शामिल होने और कुछ-न-कुछ हासिल कर लेने को जिए जा रहे हैं. हम थककर साँस लेना और अपने चारों ओर निहारना, हवा के पेड़ में से गुज़रते वक्त पत्तियों की मनहर लय-गतियों को और फूलों के जादुई रंगों को, फूली सरसों के चमकदार पीलेपन को, खिले मैदानों की घनी हरीतिमा को मर्मर ध्वनि के सौन्दर्य, हिमाच्छादित शिखरों की भव्यता, समुद्र तट पर पछाड़ खाकर बिखरती हुई लहरों के घोस को देखना-सुनना भूल गए हैं.

कुछ लोग सोचते हैं कि पश्चिम का आधुनिकतावाद और भारत तथा अधिकांश तीसरी दुनिया के नव औपनिवेशिक चिन्तन के साथ अपनी जड़ों से अलगाव, व्यक्तिवादी अजनबियत में हमारा अनिवार्य बेलगाम धँसाव, अचेतन के बिम्ब, बौद्धिकता से विद्रोह, यह घोषणा की ‘दिमाग़ अपनी रस्सी के अंतिम सिरे पर है’, यथार्थवाद का विध्वंस, काम का ऐन्द्रिक सुख मात्र रह जाना और मानवीय भावनाओं का व्यावसायीकरण तथा निम्नस्तरीयकरण इस अँधी घाटी में आ फँसने की वजह है. लेकिन वे भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण इतिहास की एक सच्चाई है, कि नई समस्याओं को जन्म देने और विज्ञान को अधिक जटिल बनाने के बावजूद आधुनिकीकरण, एक तरह से, मानव जाति की नियति है.

वे यह भी भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण सौ फीसदी पश्चिमी करण नहीं है, बल्कि एक बिन्दु के बाद यह अपना रास्ता ख़ुद बनाता है. हमें इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि भारतीय पुनर्जागरण उदीयमान बुर्जुआ वर्ग़ द्वारा अपनी ज़रूरतों के लिए अपहृत कर लिया गया और अधूरा ही रह गया. हमें मशीम द्वारा मनुष्य के विस्थापन, महानगरों के जंगलों का निर्माण और प्रगति के नाम पर सत्ता की राजनीति को भी समझना चाहिए. आधुनिकता के बहुत से आयाम हैं, लेकिन पश्चिम में पूँजीवाद की भूमिका से सीख लेते हुए भारत में भी इसे समग्र मनुष्य के बारे में महसूस करने और सोचने को हतोत्साहित किया और ऊब तथा मनुष्य में छिपे पशुत्व के रसातल में उदास चिन्तन के रेगिस्तान को बढ़ावा दिया है. मानवता और मानवीयता की जगह बर्बरता और पशुत्व ने ले ली है. ‘नवता’, स्टीफ़ोन स्पेण्डर द्वारा प्रयुक्त पद, की तालाश में कुछ लोगों ने अच्छे लेखन को ‘प्रतिक्रांतिकारी’ मान लिया. उनकी राय में साहित्य यथास्थिति पर हमारे अक्रोश की धीर को कुंठित करता और हमें केवल मानसिक जगत में रहने के लिए प्रेरित करता है.

मेरा सुझाव है कि विवेकहीन आधुनिकता के बावजूद आधुनिकता की दिशा में धैर्यपूर्वक सुयोजित प्रयास होने चाहिए. यथार्थवाद का अर्थ व्यर्थ के ब्यौरे नहीं होने चाहिए और न स्वस्थ काम को अश्लील लेखन में ढलना चाहिए. हमें याद रखना चाहिए कि क्लासिकी साहित्य ने काम-व्यवहार को भी अपनी परिधि में लिया, पर उसमें लोलुप संतोष नहीं हैं. एक आलोचक किसी नाली में भी झाँक सकता है, पर वह नाली-निरीक्षक नहीं होता. लेखक का कार्य दुनिया को बदलना नहीं, समझना है.

साहित्य क्रांति नहीं करता; वह मनुष्यों के दिमाग़ बदलता और उन्हें क्रांति की ज़रूरत के प्रति जागरूक बनाता है. हमें स्मरण रखना चाहिए कि पक्षधर साहित्य, साहित्य का एक प्रकार मात्र है, कि विचारधारा सर्जनात्मक दृष्टि को बाधित कर सकती है, गो यह उसे एक दिशा भी देती है. साहित्य में ‘चाहिए’ को भी ध्यान में रखा जा सकता है, पर उसका मुख्य सरोकार ‘है’ से होता है. जब पाठक को लगता है कि उसे एक शो-रूम में ले आया गया है तो वह फँसा हुआ महसूस करता है; जब वह एक खिड़की से दुनिया को देखता है तो उसमें प्रत्येक चीज़ को देखने की उत्सुकता और जिज्ञासा जागती है. साहित्य राजनीतिक हो सकता है और धार्मिक, रहस्यवादी, दार्शनिक भी, लेकिन उसे किसी दर्शन या विचारधारा को हथौड़ा नहीं बनाना चाहिए. दोस्तोएव्स्की ने एक बार कहा था कि केवल ‘सौंदर्य’ ही दुनिया को बचा सकता है. मेरे ख़याल में सौन्दर्य से उसका तात्पर्य उपयोगिता के उस संकीर्ण अर्थ से था, जिसका उपदेश कॉडवेल ने दिया. सौन्दर्य से उसका तात्पर्य शायद था पूर्णता की खोज में सक्रिय मनुष्य : परिचित और अपरिचित में, जीवन की खुशी और दुःख में, संगति और असंगति के सौंदर्य, वक्र गतियों और उज्जवल भावों का, उत्प्रेरक विचारों का, निराशा के अतल में आशा का, प्रभावित यौवन और थके-हारे युग का सौंदर्य; मनुष्य में दिव्यत्व के कंपन का और आज एक पेड़ लगाने का सौंदर्य; मार्टिन लूथर के शब्दों में, यह जानते हुए भी कि यह दुनिया कल समाप्त हो सकती है.

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अच्छे साहित्य के चहेताओं को यह किताब खरीद लेनी चाहिये.

परुली ही कहते थे सब उसे. लेकिन उसका स्कूल का नाम प्रिया था. प्रिया जोशी.गरीब घर था और फिर लड़कियों को ज्यादा क्यों पढ़ाना… शादी करके घर का काम ही तो करना है.फिर भी परुली उर्फ प्रिया स्कूल जाती थी.उसके बाबू (पिताजी) जिनको सब जोस्ज्यू (जोशी जी) के नाम से ज्यादा जानते थे जजमानी (पंडिताई) करते थे. वो तो तब भी परुली को पढ़ाना चाहते थे लेकिन उसकी ईजा (मां) का मानना था कि ज्यादा से ज्यादा हाईस्कूल कर लेगी तो कोई अच्छा सा लड़का ढूंढ के इसकी शादी कर देंगे.

परुली को खुद का परुली कहा जाना खराब लगता था. स्कूल में सब उसे प्रिया कहते तो उसे बहुत अच्छा लगता था. स्कूल जाने की उसकी इच्छा के पीछे पढ़ने से ज्यादा खुद को प्रिया कहलाये जाने का लालच था.मैडम कुछ भी पूछ्ती तो वह हाथ खड़ा करती और जब मैडम कहती कि “हाँ प्रिया तुम बताओ” तो उसके कानों में जैसे घुंघरू बजते और पूरे जोश के साथ पूछे गये प्रश्न का गलत-सही उत्तर देती.हाँलाकि उत्तर अधिकतर सही ज्यादा होते गलत कम. इसलिये स्कूल में उसकी गिनती होशियारों में होने लगी.

परूली को घर में पढ़ने का बिल्कुल भी समय नहीं मिलता था. उसका स्कूल पांच-छ्ह किलोमीटर दूर था. अब पहाड़ में कोई साधन तो थे नहीं तो पैदल ही आना जाना होता. स्कूल से आते आते उसको भूख लग जाती. आते ही वह बस्ता एक ओर रख देती और घर में ढूंढती कि कहीं कुछ खाने को है क्या. उसका छोटा भाई उससे पहले घर आ जाता था. तो अक्सर यह होता था कि सुबह की बची हुई रोटियां वह खा चुका होता…और परुली के लिये कुछ भी ना बचता.

जब वह आती तो ईजा जंगल गयी होती.कभी घास लाने तो कभी लकड़ी लाने.बाबू जजमानी में गये होते.घर में बड़बाज्यू (दादा) और आमा (दादी) होती और अक्सर बड़बाज्यू के कुछ दोस्त भी साथ होते.उसके एक कका जो बी.ए. कर रहे थे वो भी तब तक कॉलेज से आ जाते थे.परूली के स्कूल से आते ही चाय की फरमाईश होने लगती. “परूली तू आ गयी है….चहा पिला हो सबको”. वो अनमने मन से चहा बनाने जाती. घर में एक बत्ती वाला स्टोव था …”नूतन” स्टोव. उसी को किसी तरह से जलाती और चाय के लिये केतली में पानी रख देती.खाने को कुछ ना होता तो चहा बनाने के बाद अपने लिये थोड़े भट भूट लेती.

स्कूल से आने के बाद कित्ते सारे काम करने होते परुली को.पाखे (छ्त) से कपड़े उठा के लाना.उनको तह करके रखना. गोरु बल्दों के वण (जंगल) से आने के बाद उनको गोठ में बांधना.उनको घास डालना. नौले से पानी लाकर रखना.रात की सब्जी का इनजाम (इंतजाम) करना.कभी कभी ईजा के आने में देर होने पर सब्जी भी छोंक के रखना.आटा ओल के रखना. ईजा वण से आ जाती तो दोनों मिलके खाना बनाते और फिर साथ ही भानकुन (बर्तन) मांजते. तब तक परुली इतनी थक जाती कि उसे नींद आने लगती और वह दिसाण (बिस्तर) में सर रखते ही सो जाती. सुबह उसके बाबू जल्दी जजमानी में जाते तो उसे उठा देते. वह बाबू को चहा बना के देती.बाबू चले जाते तो वह बांकी सबके उठने से पहले कुछ पढ़ पाती और फिर काम में लग जाती.

स्कूल में प्रिया जोशी काफी लोकप्रिय होती जा रही थी. पढ़ाई के साथ साथ वह खेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी आगे रहती. इसीलिये वह अपनी सारी मैडमों की लाड़ली थी.इस साल उसका हाईस्कूल का बोर्ड था.जितना भी समय उसे मिलता वह मन लगा कर पढ़ती. आज उसकी मैडम ने उससे कहा. प्रिया तुम अपनी बायलॉजी और स्ट्रॉंग करो.आगे भी बायलॉजी ही लेना और कोशिश करना पी.एम.टी. क्लियर करने की ताकि तुम डॉक्टर बन सको. यह सुन कर प्रिया को बहुत अच्छा लगा.उसको लगा कि जल्दी ही वह प्रिया से डा. प्रिया जोशी बन जायेगी. वह जल्दी से जल्दी यह बात अपनी ईजा को बताना चाहती थी.

घर आके परुली फिर उसी तरह काम में जुट गयी.डाक्टर वाली बात अभी भी उसके मन में थी. लेकिन ईजा के वण से आने के बाद उसे एकांत मिला ही नहीं कि वह अपनी बात ईजा को बता पाती.भनपान करने (बर्तन मांजने) के बाद वह अभी दिसाण लगा ही रही थी और सोच रही थी कि अभी ईजा आयेगी तो उसको अपनी दिल की बात कहेगी उसको अपनी बाबू की आवाज सुनायी दी. ईजा-बाबू आपस में बात कर रहे थे. उनकी बातों में अपना नाम सुनकर वह बाबू की बात ध्यान से सुनने लगी.

“आज मलगाड़ के पांडे ज्यू मिले थे. कह रहे थे कि परुली का चिन्ह (कुंडली) दे देना गोपाल के लिये.” गोपाल पांडे ज्यू का लड़का था.

“हाँ हो तो भोल (कल) ले जाना. पांडे ज्यू का संबंध तो अच्छा ठहरा. साम्य (कुंडली मिल गयी तो) हो गया तो भल हो जायेगा….”

“हाँ ये लोग तो बैरती के पांडे हुए..संबंध तो अच्छा ही हुआ..लेकिन अभी परूली तो नान नानि (छोटी) ही हुई.”

“तुम्हें तो नान नानि ही लगेगी..ढांट सी तो बड़ी हो गयी है.. इस साल बोर्ड भी हो जायेगा…फिर मंगसीर तक ब्या कर देंगे.तुम तो ले जाओ हो भोल चिन्ह”

“लेकिन गोपाल की कुछ खास नौकरी चाकरी तो है नहीं…”

“क्या करता है…?”

” पांडे ज्यू बता रहे थे कि दिल्ली में किसी ठुल (बड़े) अफसर के बंगले में नौकर है. क्वाटर भी मिला है.”

” अरे तो ठीक ही तो हुआ… इतना अच्छा संबंध मिल रहा है.. नौकरी का क्या है..यह नहीं तो कोई और मिल जायेगी…”

“तुम तो चिन्ह ले जाओ..और साम्य हो जाये तो बात पक्की कर दो हो”

इससे आगे क्या बातें हो रही थी वह परुली ने नहीं सुनी. वह चुपचाप तकिये पर सर रखकर सो गयी.

मैं बुद्धिजीवी नहीं हूँ यानि मैं कोई ऎसा काम नहीं करता जिसमें बुद्धि की तनिक भी जरूरत होती है. इससे कहीं आप यह ना समझें कि मैं एक नेता हूँ या हिन्दी का कवि हूँ इसलिये साफ कर दूँ कि मैं यह दोनों भी नहीं हूँ. लेकिन फिर भी मैं हूँ. मेरा अस्तित्व है. इसलिये देखता हूँ.मन हो तो कभी कभी सोचता भी हूँ. सोचने के लिये मुझे बुद्धि की जरूरत नहीं होती. मैं कुछ सोचना ना भी चाहूँ तो भी दिमाग कुछ ना कुछ सोचता ही है.इसलिये मैं सोचने का क्रेडिट नहीं लेना चाहता. कुछ लोग इसी सोच का क्रेडिट ले लेते है.वह इस सोच को अपनी बुद्धि समझते है और खुद को बुद्धिजीवी.

हमारा देश बुद्धिजीवीयों का देश है.लोग हर काम में अपनी बुद्धि लगाते हैं. ऎसा वह खुद के कामों में नहीं दूसरे के कामों में करते हैं. खुद के काम बिना बुद्धि के भी हों तो चलता है बस किसी भी काम में सिर्फ इतना होना चाहिये कि पैसा बराबर आता रहे. बुद्धि लगे ना लगे. पैसा बुद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसे कमाने के लिये बुद्धि लगे यह जरूरी नहीं है. लेकिन दूसरे के हर काम में अपनी बुद्धि लगाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. मुझे लगता है जब इस देश के लोग स्वतंत्रता की मांग कर रहे होंगे तो उनका लक्ष्य यह ही रहा होगा कि हम स्वतंत्र हो जायें  ताकि दूसरे के कामों में अपनी बुद्धि लगा सकें. माफ कीजिये मैं स्वतंत्र भारत में पैदा हुआ इसलिये सिर्फ अनुमान ही लगा सकता हूँ और फिर मैं इतिहासकार भी नहीं हूँ-बुद्धिजीवी तो नहीं ही हूँ, कि अपने अनुमानों को किसी तरह से सिद्ध भी कर सकूँ.

दूसरे के कामों में अपनी बुद्धि लगाना हमारे अस्तित्व का प्रतीक है. यदि हम हैं तो बुद्धि लगायेंगे.दूसरों के चलने से लेकर खाने तक, उठने से लेकर बैठने तक, पत्नी से लेकर लिखने तक (यहाँ आशय पत्नी द्वारा लिखे को छापने से नहीं है) सब जगह अपनी बुद्धि का खटोला बिछाना जरूरी है.इसी खटोले पर जब हमारे तर्कों,वितर्को और कुतर्को के बच्चे अठखेलियां करें तो कलेजे में ठंडक सी होती हैं. वाह बच्चे बड़े हो रहे हैं और हम बूढ़े.

पहले बढ़ी हुई दाढ़ी, कंधे से लटका हुआ झोला-उसमें चंद किताबें और लिफाफे,हाथों में सिगरेट यह एक बुद्धिजीवी की पहचान थी.कालांतर में इस छवि में परिवर्तन हुआ. अब आप क्लीन शेव भी हो सकते हैं, झोला विहीन भी भ्रमण कर सकते हैं,सिगरेट छोड़ भी सकते हैं लेकिन दूसरो के कामों में बुद्धि लगाना नहीं छोड़ सकते. वही आपका असली धंधा है.

भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है. हम बुद्धि की खेती करते हैं. बुद्धिजीवीयों की फसलें लहलहाती है.फसल ज्यादा होने पर हम बुद्धिजीवी एक्स्पोर्ट भी करते हैं.लेकिन ध्येय यही रहता है कि बुद्धिजीवी जहां जाये वहाँ कमाता खाता रहे. बोझा ना बने. दूसरों को बोझा उठाना सिखाये और खुद मजदूरी ले.हमारा यह परम कर्तव्य है कि हम खुशी खुशी यह मजदूरी दे दें.यह एक स्वचालित प्रक्रिया है. हमें इसके लिये सोचना नहीं पड़ता. बचपन से हम देखते आये हैं जो नेता झूठ के ज्यादा पुलिंदे बांध सकता है वही हमारे वोट का अधिकारी होता है.अब नेता बुद्धिजीवी नहीं हो सकता यह सर्वमान्य है लेकिन बुद्धिजीवी तो नेता हो ही सकता है. इसमें कहां कैसा प्रश्न.

आप कहीं यह अनुमान ना लगा लें कि मैं किसी कविता नामक सुकन्या के प्रेमपाश में बंधकर कवि बनना चाहता हूँ इसलिये मैं यह घोषणा करना चाहता हूँ कि मुझ बाल बच्चेदार को किसी से प्यार व्यार नहीं है (अपनी पत्नी से भी नहीं :-) ) बल्कि मैं तो लिखी जाने वाली कविता से प्रेम की पींगे बढ़ाना चाह रहा हूँ और ऎसा मैं इसलिये कर रहा हूँ क्योंकि आज के जमाने में मुझे कविता का महत्व पता चल गया है.

मैं अक्सर कुडकुड़ करता हूँ और दिन में एक बार ही इस कुड़कुड़ को करना मेरे को बड़ा भारी लगता है. मेरे पूरे लेख को पढ़ने के बाद लोगों के समझ में भी नहीं आता कि  आखिर मैं क्या कहना चाह रहा हूँ.इसका एक  फायदा तो यह है ही कि भविष्य में मुझमें नेता बनने के पूरे गुण हैं लेकिन अभी हाल फिलहाल मैं कवि भी बन सकता हूँ. जिस लेख के लिये मैं तीन सौ चार सौ शब्दों का जाल बुनूँ वह बात महज पचास साठ शब्दों में भी कह सकता हूँ. बात वह तब भी समझ में नहीं आयेगी लेकिन मैं तो कवि बन ही जाऊंगा.

कविता भले की किसी भी अर्थ में उपयोगी ना हो पर उस पर वाह वाही मिलने के भरपूर तत्व होने चाहिये. वह भले ही किसी के समझ में ना आये लेकिन आप का लहजा और व्यक्तित्व का प्रभाव ऎसा हो कि सामने वाला चाहे वह आपकी कविता पढ़ रहा हो या सुन रहा हो वो वाह वाह कहने को विवश हो जाये. कविता एक कला है और कला किसी काम की भी हो यह जरूरी नहीं. कला में कोई तथ्य हों या वह हर किसी के पल्ले पड़ जाये यह भी आवश्यक नहीं है. कविता शब्द सम्मोहन की विधा है जो किसी भी कवि सम्मेलन में पहलवान की धोबी पछाड़ सी चलती है और सामने बैठे लोगों को चारों खाने चित्त कर देती है. वाह वाह…क्या बात है .. मजा आ गया .. जैसे प्रोत्साहनी वाक्य हवा में तैरने लगें तो समझिये कविता ने मैदान मार लिया.

उर्दू वालों ने कविता की बहुत सेवा की है. ग़ालिब से लेकर मीर ने ऎसे ऎसे शेर लिखे कि वो आज भी किसी महफिल की जान बने रहते हैं. हर मौके और हर अवसर के लिये एक शेर हाजिर हो जायेगा. लेकिन कौन ऎसा माई का लाल होगा जिसने पूरा उर्दू साहित्य पढ़ा होगा इसलिये आप उर्दू शायरी से कुछ भी लेके (वैसे हिन्दी से भी ले सकते हैं लेकिन थोड़ा रिस्क है) उसमें अपने शब्दों का थोड़ा छोंक लगाकर झोंक दीजिये फिर देखिये….शत प्रतिशत सफलता आपके चरण चूमेगी यदि आप जारी रहे तो यही सफलता चरणों से होंठों तक भी जा सकती है फिर भले ही बांकियों के सर में दर्द हो पर आपके होंठों पर मुस्कान रहेगी.  

कविता सामुहिक चेतना की संस्थापक है. आप अपने जैसे बेकार कवियों को ढूंढने निकलिये… एक को ढूंढेंगे हजार मिलेंगे और फिर आप सामुहिक रूप से कविता कीजिये.वाह वाही बिना ब्याज का कर्ज है. यानि आप कविता करें तो अगला वाह वाह कर आपको कर्ज दे और उसकी कविता में आप वाह वाह कर उस कर्ज को उतार दें. समूह में कविता से कई फायदे हैं आप एक पूरे समूह को मूर्ख बना सकते हैं और बार बार बना सकते हैं. सब घुलमिल कर कविता करें… वाह वाही लूटें.

सामुहिक कविताओं के श्रोता और पाठक बड़े पारखी हैं. भले ही आपकी कविता उनके समझ ना आये. भले ही आप सदियों से कही जा रही बात को बिना किसी आधार के फिर फिर कहें. भले ही आपको ना शब्दों की समझ हो ना उनके अर्थों की. लेकिन यदि आप एक नेता की तरह भीड़ को मूर्ख बनाना जानते हैं तो वह वाह वाह करेंगे ही. आप सफल कवि हैं. आपकी जय जयकार होगी.आप खुश रहिये. आपके स्थायी चमचे आपके साथ हैं. अभी आपको पार्टी बदलने की जरूरत नहीं.

मैं सोच रहा हूँ कि मैं भी कवि बन ही जाऊं और पकड़ूं अपने जैसे कुछ और मूर्खों को….. आप क्या कहते हैं ???..आप साथ आना चाहेंगे… :-)

अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे कि उमर खैय्याम की रुबाइयों में कितनी व्यापकता है. जब मैं उमर खैय्याम की रुबाइयों और उनके उन अनुवादों के बारे में सोचता हूँ जो भारत में हुए तो उनमें एक साम्य जैसा लगता है. पहले उमर खैय्याम की मूल रचना की बात करें. उमर खैयाम ने इतिहास के उस युग में जन्म लिया जब युरोप के लोग इतने सभ्य नहीं थे…या यूं कहें कि निरे जंगली थे तो अतिशयोक्ति ना होगी. उस समय स्कॉटलैंड में मैलकम कैमोर का दबदबा था और इंग्लैंड में सैक्सन राजाओं का आधिपत्य था. ये सब राजा प्रजा को गुलाम की तरह रखते थे…लेकिन इसके विपरीत फारस (पारस) में ज्योति थी, जीवन था, ज्ञान था और साहित्य था. सूफी संस्कृति, वैज्ञानिक सोच की अपनी महत्ता थी. ऎसे सामाजिक परिदृश्य में उमर ने सांसारिकता को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर रखने के अपनी रुबाइयों का सहारा लिया.

जॉन फिटजराल्ड सहित कई अनुवादकों का मानना है कि उमर खुद सुरा-प्रेमी थी और उनके इन पदों में केवल सुरा,सुन्दरी का ही जिक्र है लेकिन उमर की रुबाईयों को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर देखने वालों की भी कमी नहीं है. मैने भी अब तक जितना उमर को पढ़ा उसके आधार पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि ये रुबाइयाँ मात्र सुरा-वन्दना हीं है. यह रुबाइयाँ उससे अधिक बहुत कुछ कह जाती हैं.मैं अपने और विचार लेख के अगले अंक में आने वाले सप्ताह में रखूंगा.

उमर की रुबाइयों के अनुवाद हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में 1930 से 1945 के बीच हुए. इस समय देश में अंग्रेजों का शासन था लेकिन स्वतंत्रता का सूरज भी धीरे धीरे आंखे खोल रहा था. यह नवजागरण का काल था. लोगों में पर्याप्त मात्रा में असंतोष था. यह ऎसा समय था जब लोग खुद-ब-खुद उमर की दार्शनिकता की ओर खिंचे चले आये.लोगों की आंखों में सपने थे, दिलों में जोश था और चाल में मस्ती. यह समय था जब लोगों ने उमर को पढना और गुनना प्रारम्भ किया.

हरिवंश राय बच्चन ने एक जगह इसी परिस्थिति का वर्णन कुछ ऎसे किया है.

” सात-आठ बरस बाद जब मैंने उमर खैयाम की रुबाइयों को पहली बार पढ़ा, तो मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने उनमें किसी रोदन, किसी वेदना या किसी निराशा की प्रत्याशा करते हुए पढ़ा था। मेरी यही प्रत्याशा कहाँ तक पूरी हुई होगी इसे ‘रुबाइयात उमर खैयाम’ का हरेक पाठक अपने आप समझ सकता है। मुमकिन है, यहाँ मेरी बात काटकर कुछ लोग मुझसे अपनी असहमति जताएँ। साधारण जनता के बीच, और इसमें प्रायः ऐसे लोग अधिक हैं जिन्होंने उमर खैयाम की कविता स्वयं नहीं पढ़ी, बस यदा-कदा दूसरों से उसकी चर्चा सुनी है, या कभी उसके भावों को व्यक्त करने वाले चित्रों को उड़ती नज़र से देखा है, कवि की एक और ही तसवीर घर किए हुए है। उनके ख़याल में उमर खैयाम आनन्दी जीव है, प्याली और प्यारी का दीवाना है, मस्ती का गाना गाता है, सुखवादी है या जिसे अंग्रेज़ी में ‘हिडोनिस्ट’ या ‘एपीक्योर’ कहेंगे। इतिहासी व्यक्ति उमर खैयाम ऐसा ही था या इससे विपरीत, इस पर मुँह खोलने का मुझे हक़ नहीं है। फ़ारसी की रुबाइयों में उमर ख़ैयाम का जो व्यक्तित्व झलका है, उस पर अपनी राय देने का मैं अधिकारी नहीं हूँ क्योंकि फ़ारसी का मेरा ज्ञान बहुत कम है, लेकिन, एडवर्ड फ़िट्ज़जेरल्ड ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में अपने अंग्रेज़ी तरजुमे के अन्दर उमर खैयाम का जो खाका खींचा है उसके बारे में बिना किसी संकोच या सन्देह के मैं कह सकता हूँ कि वह किसी सुखवादी आनन्दी जीवन अथवा किसी हिडोनिस्ट या ‘एपीक्योर’ का नहीं है।

इन रुबाइयों का लिखने वाला वह व्यक्ति है जिसने मनुष्य की आकांक्षाओं को संसार की सीमाओं के अन्दर घुटते देखा है, जिसने मनुष्य की प्रत्याशाओं को संसार की प्राप्तियों पर सिर धुनते देखा है, जिसने मनुष्य के सुकुमार स्वप्नों को संसार के कठोर सत्यों से टक्कर खाकर चूर-चूर होते देखा है। इन रूबाइयों के अन्दर एक उद्विग्न और आर्त आत्मा की पुकार है, एक विषण्ण और विपन्न मन का रोदन है, एक दलित और भग्न हृदय का क्रन्दन है। संक्षेप में कहना चाहें तो यह कहेंगे कि रुबाइयात मनुष्य की जीवन के प्रति आसक्ति और जीवन की मनुष्य के प्रति उपेक्षा का गीत है-रुबाइयों का क्रम जैसा रक्खा गया है उससे वे अलग-अलग न रहकर एक लम्बे गीत के ही रूप में हो गई हैं। यह गीत जीवन-मायाविनी के प्रति मानव का एकांतिक प्रणय निवेदन है। पर कौन सुनता है ? वह अपना क्रोध-विरोध प्रकट करता है-पर उसे हार ही माननी पड़ती है। मानव की दुर्बलता, उसकी असमर्थता, उसकी परवशता, उसकी अज्ञानता और उसकी लघुता के साथ उसका दम्भ, उसका क्रोध-विरोध और उसकी क्रान्ति उसे कितना दयनीय बना देती है ! रुबाइयात सुख का नहीं दुख का गीत है, सन्तोष का नहीं असन्तोष का गान है।”

बच्चन जी की ’मधुशाला‘ में ही देखें तो पायेंगे कि इसके पूर्वाद्ध में यदि कवि ने मरणोपरांत क्रियाओं में भी मधु की महत्ता स्थापित की है तो इसके उत्तरार्द्ध में दर्द,अस्थिरता,क्षण भंगुरता और मोह भंग का यह रूप भी है -

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गई सुरभित हाला

कहाँ गया स्वप्निल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला

पीने वालों ने मदिरा का मूल्य हाय कब पहचाना

फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला

तो उमर की रुबाइयों को मात्र सुरा,सुन्दरी से जोड़कर देखना शायद सही नहीं है. इसके और भी कई पहलू हैं…जिनकी चर्चा अगले अंक में करेंगे.

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

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