भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी क्यों नहीं है??

आप को लग रहा होगा कि मैं क्या बकवास कर रहा हूँ…. हिन्दी चिट्ठा लिखता हूँ लेकिन अंग्रेजी की वकालत कर रहा हूँ. लेकिन नहीं जी … मैं ऎसा सोच समझ कर कह रहा हूँ. कारण है कि हमारे महान देश भारत में कोई भी काम अंग्रेजी के बिना नहीं होता. किसी भी प्राइवेट कंपनी के कार्यालय में जायें आपको सारे लोग अंग्रेजी में ही काम करते मिल जायेंगें.

कल एक सज्जन से इसी विषय पर बातचीत हो रही थी. उनका कहना था कि सॉफ्टवेयर और काल सैंटर के क्षेत्र में हम इतने आगे इसलिये है क्योकि हम अच्छी अंग्रेजी जानते हैं. उनका यह भी कहना था कि अंग्रेजी के बिना कोई भी तकनीकी पढ़ाई पूरी नहीं हो सकती. इसलिये अंग्रेजी को तो बचपन से ही अनिवार्य कर देना चाहिये. वर्तमान स्थितियों में उन सज्जन की बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता.

क्या अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए?

मुझे अपनी कहानी याद आ गयी. मेरी पढ़ाई हिन्दी माध्यम से हुई है. तो बचपन मेंमेरी अंग्रेजी भी वैसे ही थी जैसे एक आम हिन्दी माध्यम से पढे हुए विधार्थी की होती है यानि वो अंग्रेजी व्याकरण के तो बहुत से नियम जानता है लेकिन फिर भी ना सही सही अंग्रेजी लिख पाता ना बोल पाता है.मुझे लगता है कि हम लोग बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर जो व्याकरण पढ़ाते हैं वो फायदे की जगह नुकसान ही करती है. कुछ भी लिखने व बोलने से पहले व्यक्ति उस वाक्य को व्याकरण की कसौटी पर तोलता है कि यह सही है या नहीं.खैर यह तो विषयातंर हो रहा है…. मैं जब आई.आई.टी. की तैयारी कर रहा था तो लोगों ने कुछ विशेष किताबों को पढने की सलाह दी. जैसे भौतिकी के लिये रैशनिक हैलीडे ( जो कि एक रशियन किताब का अंग्रेजी अनुवाद था) या गणित के लिये एम.एल.खन्ना. उस छोटे शहर में यह किताबें भला कहाँ मिलती…. तो किसी तरह यह किताबें दिल्ली से मंगवायी गयी. किताबें तो आगयीं लेकिन किताबें थीं तो अंग्रेजी में. भौतिकी का “जड़त्व आघूर्ण” किताब में ‘Moment of Inertia’ हो गया और समबाहू त्रिभुज ‘Equilateral Triangle’ बन गया.तो मुझे दो-तीन महीने तो यही सब समझने में लग गये कि किस तकनीकी शब्द को अंग्रेजी में क्या कहते हैं ….पढ़ाई क्या खाक करते. इस वजह से या किसी और वजह से आई.आई.टी. में सलैक्सन तो नहीं हुआ. लेकिन इस बात की कोफ्त हमेशा रही कि अगर आगे चलकर हमें यही सब अंग्रेजी में ही पढ़ना था तो हमें बचपन से ही अंग्रेजी में यह सब क्यों नहीं पढ़ाया गया. इसलिये हम जैसे चोट खाये और समझदार माँ बाप अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम से नहीं पढ़ाना चाहते.

http://kakesh.comवैसे मुझे यह तर्क बेमानी लगता है कि अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है.क्या अंग्रेजी के बिना विकास सचमुच संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए? जरूरत है तो इस दिशा में सही सोच की. आज हम गलत सलत ही सही लेकिन अग्रेजी लिखने बोलने को ही अपनी शान समझते हैं. यदि ऎसा ही है तो क्यों ना अंग्रेजी को ही राष्ट्रभाषा बना दिया जाये. कम से कम मेरे जैसे हिन्दी माध्यम से पढ़े बच्चों का तो भला हो ही जायेगा और वो मेरी तरह हीन भावना का शिकार तो नहीं होंगे कि वो आई.आई.टी. वालो से कमतर हैं इसलिये क्योकि वो अंग्रेजी नहीं जानते थे.

[ ऊपर का चित्र आई.आई.एम. की मेलिंग लिस्ट में आया था जिसे मेरे एक मित्र ने मेरे को मेल पर भेजा था. इसमें ठंडी बियर यानि “CHILLED BEER” को “CHILD BEAR” यानि भालू का बच्चा लिखा गया है.साइड में अखबारी जुगाड़ सागर चंद नाहर जी के सौजन्य से है.]

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

28 comments

  1. काकेशजी
    आपकी बात एकदम सही है। अंग्रेजी का हमारे मानस पर प्रभाव कुछ ऐसा ही है। और, आप तो गांव की उस दुकान का चित्र दिखा रहे हैं। मेरे एकाध मित्र ऐसे भी अमेरिका में हैं जो, सही अंग्रेजी कई साल तक वहां रहने के बाद भी नहीं बोल पाते लेकिन, कुछ भी बोलते हैं तो, अंग्रेजी में ही, की वजह से वहां हैं। और, मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि
    “वैसे मुझे यह तर्क बेमानी लगता है कि अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है.क्या अंग्रेजी के बिना विकास सचमुच संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए?”

  2. आज अग्रेजी जनमानस में छा रही है, सब का विकास हो किन्‍तु हिन्‍दी या अन्‍य के पतन के बल पर नही।
    सार्थक लेख है, जो विचार मंथन के लिये प्रेरित करता है।

  3. काकेश जी
    इस लेख में तो विषयांतर हुआ कोई बात नहीं पर इस लेख की अगली कड़ी में उसे भी पूरा करें। क्यों कि मुझे यह लग रहा है कि आप मेरी कहानी लिख रहे हैं।
    मैने हिन्दी माध्यम से ११वीं तक पढ़ाई की। बच्चों का भी यही हाल है। वे पहले राजस्थान में हिन्दी माध्यम से पढ़े।अब हम हैदराबाद में हैं, हिन्दी माध्यम की स्कूल पास ना होने की वजह से अंग्रेजी स्कूल में बच्चों को दाखिला दिलवाया। अब उनकी वह हालत है कि ना तो वे सही अंग्रेजी जानते हैं ना ही हिन्दी!
    रोज हम सब इस वजह से तनाव में जीते हैं क्यों कि मैं भी व्यवसाय में अंग्रेजी ना जानने की वजह से सफल नहीं हो पा रहा ना बच्चे अध्ययन में।
    बहुत कुछ कहना है पर और कभी,…

  4. हमारी मानसिकता ने हमे ऐसा बना दिया है. हम उदार नही है और जब कभी उदार होते हैं तो इसे अपनी कमजोरी बना लेते हैं. आपको दो लोग मिलेंगे जो केवल हिन्दी की वकालत करेंगे हिन्दी में ये है, वो है …. दूसरा केवल अंग्रेजी की वकालत करेगा इंग्लिश हैस दिस हँस दैट. सच तो ये है की भारत में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही राष्ट्रभाषा के रूप में सम्मिलित हैं. दोनों को पढिये और अपना ज्ञान बढाइये.

  5. ऐसा भी हो सकता है कि सभी जगह स्थानीय भाषा में पढ़ाई हो और अंग्रेजी को विदेशी भाषा के रूप में अलग से पढ़ा जाए। हर किसी को तो कॉल सेंटर में काम नहीं करना है। डॉक्टर, इंजीनियर या अन्य पेशेवर लोगों को भी आम जनता से हिन्दी या अन्य स्थानीय भाषा में ही बात करना होती है तो फिर ये बोझ क्यों?

  6. काकेश जी नमस्कार,
    हमारी देश की जनता बहुत रेसोर्सफुल (जुगाडू) हैं. चिंता न करें हिन्दी का भविष्य सुरक्षित हाथों में है.
    सौरभ

  7. काकेश जी,आप बिल्कुल सही कह रहे हैं..आज बिना अग्रेजी के हम जैसे हिन्दी भाषी बहुत परेशानी झेल रहें हैं।मै तो इस दोष को उन के मथे मड़ूँगा जो देश की कुरर्सीयॊ पर बैठ ,हमें तो देश भगती का पाठ पढाते रहे और अपने बच्चों को विदेशों मे शिक्षा दिलाते रहे।यदि अजादी के एक दम बाद से ही ऐसी व्यवस्था कर दी जाती की हिन्दी पूरे देश में सभी को पढ़्नी पढेगी और अग्रेजी के लिए यह विकल्प रखते कि या तो अपनी मातृभाषा ले या अग्रेजी तो शायद बहुत भला होता हम जैसे लोगों का।लेकिन अब तो हमारी दुर्गति हो चुकी है।अब क्या करें??

  8. सबसे पहले मे इस कमेन्ट मे श्री सागर चंद नाहर जी से क्षमा मांगना चाहती हूँ क्योकि एक बार ईमेल पर उन्होने मुझसे कहा था की उन्हे इंग्लिश नहीं आती और मै हिन्दी मे मेल दू। मैने इस बात को सच नहीं माना क्योकि मुझे लगा की वह मुझे हिन्दी मे लिखने को मजबूर करना चाहते है । तब मै इस हिन्दी ब्लोग्गिंग मै नयी थी , और कई बार उसके बाद सागर जी के ब्लोग पर गयी पर क्षमा मागने का कोई अवसर नहीं मिला । आज मिला है तो सागर भाई क्षमा कर दे।
    अब बात इग्लिश और हिन्दीकी , मैने इस विषय को कई बार उठाया है की सबको इंग्लिश कि जानकारी होनी चाहीये पर हर बार मुझे कमेंट्स मे गालिया तक मिली है । आज मै इस ब्लोग पर ये कहना चाहती हूँ की अगर किसी को भी इंग्लिश मै कोई भी साहयता चाहिये , जैसे कहीं अप्लिकेशन देनी हो , या किसी के भी बच्चे को इंग्लिश मै फॉर्म इत्यादी भरना हो तो मुझ से निः संकोच ईमेल पर सम्पर्क कर सकते है । कोई भी बात जो आप दूसरो से पूछने मै हिचकते हो कि कोई क्या कहेगा उसे मुझे ईमेल कर दे , यथा संभव मै आप को उसकी Hindi बता दूगी । अगर रोमन मै आप समझे लेगे तो मेरा वक्त कम लगेगा पर अगर आय्श्यक है तो मै Hindi मे भी लिख दूगी । इग्लिश मुश्किल नहीं है , आपकी हिचक इस को मुश्किल बनाती है । अगर आप को नहीं भी आती है तो भी अपने बच्चो को अवश्य इग्लिश माध्यम से ही पढाए । हिन्दी हमारा दिल है और इंग्लिश हमारा दिमाग और तरक्की के लिये दिमाग की जरुरत ज्यादा होती है । मातृ भाषा या राष्ट्र भाषा बदने की जरुरत नहीं है , जरुरत हैं अपनी सोच बदलने की , देश का विकास बिना इग्लिश के हो सकता है पर व्यक्ती का विकास मै इंग्लिश का योग दान लेना कुछ बुरा नहीं है । और वह जितने लोग इंग्लिश कि बुराई करते हैं , यहाँ हिन्दी ब्लोग्गिंग समुदाये मै भी उन सब के इंग्लिश मे भी ब्लोग है !!! उनसब के घर मै इंग्लिश के अखबार भी आते है और उनमे बहुत से केवल टाइम पास के लिये भाषा पर वाद विवाद कर ते हैं ।

  9. इंग्लिश ओर हिन्दी पर वहस, आप मे से जब भी कोई बिदेश मे आए, ओर देखे दुनिया बिना इंग्लिश के तरक्की भी करती हे,ओर उन लोगो को अपनी भाषा पर मान भी हे,इंग्लिश या बिदेशी भाषा सिखना गलत नही, लेकिन उसे रोजम्रा के कम मे लाना,या उसे सफ़ालता की सीडी मानाना गलत ही नही, बेब्कुफ़ी हे,**यह विचार कि इंग्लिश के बिना हम सफ़लता नही मिल सकती, या भारत उन्नति नही कर पायेगा सिर्फ़ बीमार ओर गुलाम दिमागो का विचार हे** हमारे नेता जब भी विदेशो मे जा कर इंग्लिश मे भाषण देते हे तो दुभाषिया उसी भाषण को दुवारा इंग्लिश मे बोलता हे, कारण ???, हम यहा (विदेश) पर रह कर विदेशी भाषाए जान कर भी आपने लोगो से आपनी भाषा मे बात कर के जो खुशी मह्सुस करते हे, आपने बच्चो को आपनी मातृ भाषा सिखाते हे क्यो कि मातृ भाषा ओर देश ही हमारी पह्चान हे, (इंग्लिश हमारी पह्चान नही, विदेश मे इंग्लिश बोलते ही सामने बाला झट से बोलता हे इनडियान इस लिए इंग्लिश जानते हे कयो की तुम १०० साल तक गुलाम रहे हो,)लेकिन भारत मे कदम रखते ही वहा हिन्दी बोलने बाले ही नही मिलते,मे उन से बात सिरफ़ हिन्दी ओर अन्य भारतिय़ा भाषा ही बात करता हु, मे गुलाम नही हु,मे अपन्ग नही जो भारत मे आ कर भी इंग्लिश के सहारे चलू,

  10. काकेशजी,
    अगर राष्ट्रभाषा शबद के तकनीकी अर्थ देखें तब तो कुछ लोचा है, पर जैसा हम लगातार कक्षाओं में जोर देते हैं (और हिंदी, हिंदू हिंदुस्‍तान छाप लोगों की गालियॉं खाते हैं) शुरुआत अंगेजी को 8वीं अनुसूची में शामिल करके की जानी चाहिए। लेकिन भाषा विवाद पर नजर रखने वाला कोई भी जानता है कि अंगेजी के भारतीय भाषा स्‍वीकार न किए जाने के पीछे ‘हिंदीवालों’ की कोई कुचाल नहीं है, वरन खुद अंगेजी वालों का अहम जिस वजह से वे अपनी भाषा को असमी, तेलुगू या हिंदी जैसी ‘नेटिव्स’ की भाषा की कतार में रखना नहीं चाहती। अंगेजी बाकायदा भारतीय भाषा बन चुकी है, बशर्ते बंददिमाग अंग्रेजी वाले उस वैसा सवीकार करें

    पर इतना भी तय है कि अब हिंदी वाले उतने दयनीय होकर गिड़गिड़ाते नहीं हैं, जितनी अंगेजी सीख पाते हैं (आपकी तरह, मेरी तरह) सीखते हैं और भड़भड़ाते हुए इनके दफ्तर में, सेमिनार कक्ष में, टीवी पर या इंटरनेट पर जा विराजते हैं

    इसलिए अपने छात्रों को हमारी तो एक ही सलाह होती है, जितनी सीख सको अंगेजी भी सीखो पर पहली लड़ाई उस हीनता बोध से लड़ो जो अकारण अपने अंदर जमने देते हो। और हॉं राष्ट्रभाषा किसी के बनाने से नहीं बनती (संविधान में राजभाषा का प्रावधान है, राष्ट्रभाषा का नहीं, राजभाषा तो अंगेजी है ही (अनु 343)

  11. @ raj bhatia
    bahar bedh kar aap badii aasani se indians jo inglish mae parangat hean un par ungli udha sakte haen . aap ke liyae ” desh prem ” ka matlab videsh mae rehkar apne bacho se hindi bolna aur unko ye batana kee unka desh “bharat ” hae hota hae . aap ko to yae batane mae bhi problem hae kii aap kaun hae . italy , china , japan , bangkok , aap kahin bhi jaayae to vahaan bhi jo english bolne aur seekhnae kee laalsa sab mae hae . mujeh pataa nahin aap kis desh mae han , jahaan aaj bhi bahartiton ko inglish aane per gulam samjha jaata hae . aur agar esa haen toh aap us desh mae kya kar rahen hae ? kyon apne desh ki bejatii kara rahen haen , vapas aaker desh me reh kar desh prem nibhaye . bharat mae base logo ko desh prem ka bhashan aur matr bhasha kee importance naa samjhayae videsh mae base log toh ham sab per badii meharbani hogi .

  12. मुझे लगता है की हिन्दी और अंग्रेजी दो अलग भाषाये है, और दोनो को एक दूसरे की रोशनी मे देखने की बजाय अलग अलग करके देखना चाहिये। हिन्दी को लेकर मुझे कोई उहापोह नहीं है और ये भी नहीं लगता की ये किसी मायने में कमतर है। हिन्दी की अपनी विकास यात्रा है, और अपनी ऎतिहासिक यात्रा भी। इतना जरूर है की हिन्दी में विज्ञान और तकनीकी के संबंध मे कुछ नही है, और हिन्दी या आंचलिक भाषा मे शिक्षा के बाद युनिवर्सिटी मे अचानक से जो अंग्रेजी मे परिवर्तन होता है, वो एक तूफान तो लाता है, पर उसे पार किया जा सकता है, हममें से अधिकतर ने ये किया है।

    हिन्दी में या भारतीय भाषाओं मे तकनीकी ज्ञान का न होना या हमारी शब्दावली में सही शब्दों का न होना इसीलिए भी है क्योंकि आधुनिक विज्ञान या फिर तकनीकी में भारत का कोई योगदान नहीं है। आधुनिक विज्ञान की शुरुआत १७-१८वीं शताब्दी के बीच है जब औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई, नयी अवधारणाऎं बनी, सामाजिक उथलपुथल हुई और हमारे जैसे देशों मे उपनिवेश बने। तब से आज तक किसी भी मौलिक अवधारणा में हमारा कोई हाथ नही है। ये अलग बात है की भारतीय चाहे वो सी.वी.रमण हो या फिर अमेरिका में बसे हरगोविन्द खुराना , और ऐसे कई लोग , उनको विज्ञान की समझ पश्चिमी सभ्यता की ही देन है और यह उन्होने सीखा भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बनकर। बार बार हम अतीत मे लौटकर आर्य भट्ट तक जाते है, और अपने शून्य और दशमलव पर अटक जाते हैं।

    हिन्दी में तकनीकी भाषा का और ज्ञान का न होना , ये अंग्रेजी की वजह से नही है। इस संदर्भ में अगर समझे तो हिन्दी को विज्ञान और तकनीकी ज्ञान से समर्थ करने की ज़रूरत है. और इसके लिए अच्छी अंग्रेजी की समझ भी जरूरी है. दूसरी बात यह कि हर अंग्रेजी शब्द का हिन्दी में ऊलजलूल अनुवाद नही होना चाहिये, या उटपटांग नये शब्द नही बनने चाहिये, कुछ शब्दावली दूसरी भाषा से भी ली जा सकती है. कुछ दिन पहले मैने डी.एन.ए. का हिन्दी अनुवाद देखा तो मेरा सिर चकरा गया. इसीलिए कामकाजी शब्दों की टर्मीनॉलॉजी को जैसे का तैसा हिन्दी में इस्तेमाल होना चाहिये. इसीलिए हिन्दी के लोगों को घटक अनुवाद से बचना चाहिये,ये भाषा के इस्तेमाल को अनुपयोगी बना देते है . हिन्दी के कई शब्द अब अंग्रेजी वालों ने जस के तस ले लिए है, गुरु, पंडित, करिश्मा आदि आदि.

    अंग्रेजी ख़त्म करके हिन्दी समृद्ध नही होगी. जर्मनी और रूस का आधुनिक विज्ञान और तकनीकी में ऎतिहासिक योगदान है.यह पूरब के नही पश्चिमी सोच की सभ्यता है. वो उसी भट्टी से निकली है जहाँ से अंग्रेजी निकली है। चीन आज भी आधुनिक विज्ञान मे लंगडी दौड़ लगा रहा है। भारतीय वैज्ञानिको से चीनियों की समझ ज्यादा नही है। पर उनके पास इस वक्त शिक्षा के लिए भारत से ज्यादा पैसे है, जो उन्होने कम तकनीक के समान को बेच कर बनाये है। दूसरा उनके पास राजनैतिक इच्छा है, और उन्होने विश्व समुदाय में बढचढ़़ कर शिरकत की है.

  13. जो भाषा जमे, उसमें ठेलो। सम्प्रेषण चकाचक होना चाहिये – बस यही प्री-कण्डीशन है।

  14. मेरी आवाज जी,आप के नाम
    नमस्कार जी, मेरा मकसद आप को या किसी को ठेस पहुचना नही था, अगर ऎसा हुआ तो माफ़ी मागता हू.बेसे जिन देशो के नाम आप ने लिखे हे उन मे से bangkok को छोड कर बाकी किसी भी देश मे लोग english तो सिखते हे लेकिन उन की रष्ट्भाषा उन की आपनी हे, मे जिस देश मे रह्ता हु, वहा उस देश की भाषा ही बोलता हू,भारत मे पेदा हुआ हु भारतिया कहलाना मेरी शान हे, ओर मेरी पह्चान हे.
    माफ़ करना अगर किसी बात से ठेस लगे.

  15. हम और आप एक की नाव में सवार थे, विकास किसी भी भाषा में संभव है जब तक कि सर्वत्र वो ही उपयोग में आ रही हो। जो देश आपने गिनाये वहाँ उसी भाषा में काम होता था या है। लेकिन अपने यहाँ दो नावों में सवारी की जाती है, छोटे शहरो और गाँवों में हिन्दी, बड़े शहरों में अंग्रेजी। जब पढ़ लिख कर नाच चेंज करने का वक्त आता है तो कदम फिर से लड़खड़ाने लगते हैं, एक बार फिर से उन्हें जमाना पड़ता है।

    एक भाषा होनी चाहिये अब वो चाहे हिन्दी हो या अंग्रेजी।

  16. इस लेख पर जो प्रतिक्रियायें आईं वह बहुत खुशी की बात है.

    किसी भी भाषा से किसी भी व्यक्ति को बैर नहीं करना चाहिये. लेकिन दूसरी ओर, किसी भी भाषा को दबाया नहीं जाना चाहिये.

    भारत में समस्या यह है कि बहुत ही व्यवस्थित तरीके से हिन्दी को दबाया जा रहा है, हिन्दी की उपेक्षा की जा रही है. इस कारण बिन अंग्रेजी ज्ञान के आदमी के आगे बढने के अवसर रुक जाते हैं.

    चीन, कोरिया, जापान, इस्राएल, फ्रांस, जर्मनी, रशिया आदि देश आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से आज कितने आगे हैं. लेकिन इन में से किसी भी देश में उच्च शिक्षा अंग्रेजी में नहीं होती है. स्पष्ट है कि हिन्दी में भी उच्च शिक्षा दी जा सकती है. लेकिन हो नहीं रहा है क्योंकि हिन्दी को दबाया जा रहा है.

    विरोध इस बात का है, अंग्रेजी का नहीं — शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
    हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
    मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
    लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

  17. मुझे लगता है हम इंग्लिश को लेकर इतना आगे आ चुके है की अब सब कुछ हिन्दी मे कर लेने का समय शायद निकल चुका है. पर आशा है. जब जागो तब सबेरा.

  18. mera janm, uttarakhand ki vadiyoun mey hua aur 18 sal vahaan rahney key bad, mai paryavaran aur parvatarohan ki oor apna dhyan bataney laga, bideshioun key sath mera sampark 1969 sey honey laga jab mey, sikkim, darjeling,dalhausie, uttarakasi adi adi sthanou mei parvatarohi bideshiuon ko ghumata raha.

    sanyog sey, mera bidesh mey ana hua aur ab tak in pichaley 36 saloun mey mainey lagbhag 38 deshoun ki yatra kii hai aur ab Scandinavia mey rah raha huun.

    yahann par, mainey dekha ki angrezi bhasha bolney se desh tarakki nahi karata hai.

    Dweden ki log swedish bolatey heyn, Finland key log Finnish boltey hein, Norway key log norway boltey hein, Danmark key log dannish boltey hein, German key log German boltey hein, France key log france boltey hein,baltic deshoun key log baltic bhasha boltey hein, russian russha boltey hein,Italian italy aur spanish spain aur Purtagali Purtgali boltey hein aur lagbhag, ye sabhi desh tarakki kar rahey hain.

    to mera matlab yah hai ki hmey bhi hindi bolni chahiye bhaat mey.

    jab kabhi mey 4-5 sal mey ek do haftey key liye bharat aata hun ,to muchjey bada acchambha hota hey ki wanhaa ab log sirf angrezi bol rahey hein aur hindi bolney mei unhein khuch jhijhak sii mahsuus hoti hei.

    meri prarthna hei ki hindi bolo kuonki wo hamari matri boli hey phit angrezi adi bhasha bhi bolu,wah koi gandi bat nahin hey,parantu desh ki tarakki apni bhasha bolney sey hogi aur mera sujhav hey ki har hindustani bachha-bacchi kam sey kam 12 kaksha tak bidyalaouyn mey gyan ley.

    gyan apni bhasha mey hone bahut zaruuri hey.

    acch to aapkey hriday mey baithy us Parmatma ko mera pranaam aur aap sab ko mera sneh bhara ashiis.

    Swamiji girimaharaji from Kedarnath uttarakhand

    [काकेश : देवनागरी रूपांतरण

    मेरा जन्म,उत्तराखंड की वादियों मे हुआ और 18 साल वहाँ रहने के बाद, मै पर्यावरण और पर्वतारोहण की ऊपर अपना ध्यान लगाने लगा, बिदेशियों के साथ मेरा संपर्क 1969 से होने लगा जब मैं, सिक्किम, दार्जिलिंग,डलहौजी, उत्तरकाशी आदि आदि स्थानों में पर्वतारोही बिदेशियों को घूमाता रहा.संयोग से, मेरा विदेश मे आना हुआ और अब तक इन पिछले 36 सालों में मैने लगभग 38 देशों की यात्रा की है और अब स्कैंडैविया मे रह रहा हूँ.यहां पर, मैने देखा की अँग्रेज़ी भाषा बोलने से देश तरक्की नही करता है. स्वीडन के लोग स्वीडिश बोलते हैं, फिनलैंड के लोग फिनिश बोलते हैं, नॉर्वे के लोग नॉर्वेजियन बोलते हैं, डेनमार्क के लोग डैनीश बोलते हैं, जर्मन के लोग जर्मन बोलते हैं, फ्रांस के लोग फ्रैंच बोलते है,बॉल्टिक देशौं के लोग बॉल्टिक भाषा बोलते हैं, रशियन रुसी बोलते हैं,इटॅलियन इटली और स्पॅनिश स्पेन और पुर्तगाली पुर्तगाली बोलते हैं और लगभग, ये सभी देश तरक्की कर रहे हैं. तो मेरा मतलब यह है की हमें भी हिन्दी ही बोलनी चाहिए भारत में.

    जब कभी मे 4-5 साल मे एक दो हफ्ते के लिए भारत आता हूँ ,तो मुझे बड़ा अचंभा होता हे की वहां अब लोग सिर्फ़ अँग्रेज़ी बोल रहे हैं और हिन्दी बोलने में उन्हें कुछ झिझक सी महसूस होती है.मेरी प्रार्थना है की हिन्दी बोलो क्योंकि वो हमारी मातृबोली है फिर? अँग्रेज़ी आदि भाषा भी बोलो ,वह कोई गंदी बात नहीं हे,परंतु देश की तरक्की अपनी भाषा बोलने से होगी और मेरा सुझाव हे की हर हिन्दुस्तानी बच्चा-बच्ची कम से कम 12 कक्षा तक विद्यालयों में ज्ञान ले. ज्ञान अपनी भाषा मे होना बहुत ज़रुरी हे.

    अच्छा तो आपके हृदय मे बैठे उस परमात्मा को मेरा प्रणाम और आप सब को मेरा स्नेह भरा आशीष. स्वामीजी गिरिमहारज़ फ्रॉम केदारनाथ उत्तराखंड. ]

  19. नमस्कार काकेश भाई,
    एक लंबे अरसे बाद ब्लॉग पर आ पाई हूँ.जो विषय आपने उठाया है,हमेशा ही इस तरह मुझे सालता रहा है कि वर्तमान परिस्थिति देख मन बड़ा ही आहत होता है. आहत अंग्रेजी के दिनोदिन बड़ते प्रभाव को देखकर नही, बल्कि अपनी हिन्दी भाषा, जो आज भी अपने देश के एक बहुत बड़े भाग मे आमजनों की भाषा है.गाँवों और कस्बों मे प्रादेशिक भाषा के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है, दिनोदिन आज की पीढ़ी द्वारा उपेक्षित त्याज्य होती जा रही है.यह सही है की अंग्रेजी एक ऐसी भाषा है जो विश्व मे सर्वाधिक प्रचलित भाषा है,पर हमारे मातृभाषा का हमारे अपने देश मे जो निरादर बढ़ता जा रहा है,विश्व के और कोई भी देश अपनी मातृभाषा के प्रति यह रवैया नही रखते. हिन्दीभाषी क्षेत्र मे कुछेक सरकारी विद्यालयों को छोड़ हिन्दी माधयम के स्कूल लुप्तप्राय होते जा रहे हैं.करें भी तो क्या आज गावों कस्बों मे भी गरीबी से मुहाल वो अभिभावक जो अपने बच्चों के शिक्षा के प्रति जागरूक है हिन्दी माध्यम से अपने बच्चों को पढ़वा पाने की हिम्मत नही जुटा पता. कारण सबको पता है जीविकोपार्जन का कोई माध्यम नही जहाँ की अनिवार्यता यह भाषा न हो गई हो.
    किंतु समस्या भाषा मे नही समस्या वह सोच पैदा करती है जो अंग्रेजी भाषा को ही सभ्रान्तता का मानक मानती है.और हिन्दीभाषी को हेय दृष्टि से देखती है. भाषा की परिभाषा जो हमने पढी जानी वह यही थी कि ” भाषा अपने भावों को सामने वाले तक पहुँचाने का,अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है” और यह ऐसी ही होनी चाहिए जिसके माध्यम से हम अधिक से अधिक सुगमता और प्रभावी ढंग से सामने वाले तक अपने उदगार संप्रेषित कर पाएं.भाषा एक ऐसा जरिया है जिसके माधयम से हम सामने वाले के ह्रदय मे अपना स्थान बना सकते हैं. फ़िर यह चाहे अंग्रेजी,फ्रेंच,जर्मन,हिन्दी या और कोई भी भाषा हो.अंग्रेजी ही क्यों, देश विदेश के अधिक से अधिक जितने भाषाओं का ज्ञान हो उतना अच्छा है.इस बात से कोई असहमत नही हो सकता कि जो सम्बन्ध मातृभाषा के जरिये बन सकती है वह अन्य भाषा के जरिये नही.फ़िर बात तो आपसी सम्पर्क को सुदृढ़ बनाने की ही हुई न. इसमे यह उच्च निम्न की बात क्यों.
    एक दिन मेरी एक सहेली बड़े ही गर्व से बता रही थी कि उसकी बेटी के अंग्रेजी माध्यम स्कूल मे अंग्रेजी बोलने पर जितना ध्यान दिया जाता है और जिस प्रकार से बच्चों को ट्रेंड किया जाता है,वह लाजवाब है.एक घटना उसने बताई कि,आज सुबह उसकी ६ वर्ष की बेटी की क्लास टीचर ने एक दूसरी क्षात्र को क्लास मे हिन्दी मे बात करने पर उसकी बेटी से उस क्षात्र की जमकर पिटाई करवाई.यही नही क्योंकि उसकी बेटी सबसे अच्छे ढंग से अंग्रेजी मे बात कर पाती है इसलिए उसे यह अधिकार दिया गया है कि कभी भी किसी सहपाठी को हिन्दी मे बात करते हुए सुने तो उसे पीट सकती है. घटना सुन मुझे इतना क्षोभ हुआ कि सहेली को लताडे बिना न रह पाई.एक नन्हें से कोमल मन को क्या संस्कार दिए गए?यही न कि पहले तो हिन्दी एक हीन भाषा है और उसके प्रति इस तरह अहिष्णु हुआ जा सकता है कि अपने सहपाठी या आस पास बोलने वाले को प्रताड़ना भी दी जा सकती है.
    यह केवल एक घटना नही,एक पूरी कौम तैयार की जा रही है जो -सी ऐ टी कैट से शुरू होकर अंग्रेजी भाषा खान पान संस्कार को ओढ़कर जीना जीवन की अपरिहार्यता और सफलता के लिए आवश्यक सिद्ध करती है. योग्यता का मानक ही एक भाषा की बंधक हो चुकी है. तकलीफ उन बच्चों को देखकर होती है जो हर प्रकार से योग्य होते हुए भी केवल अंग्रेजी न लिख बोल पाने के कारण रोजी रोटी के दौड़ मे पिछड़ जाते हैं. आज की पढी लिखी सभ्रांत मानी जाने वाली युवा पीढ़ी ने केवल भाषा को ही नही बल्कि एक पूरे पश्चिमी सभ्यता,संस्कृति का ही अपने संस्कारों का त्याग कर अंगीकार,अंधानुकरण करने का बीडा उठा रखा है.यह कोई शुभ संकेत नही.बहुत बड़ी बात नही जब हिन्दी भी संस्कृत की तरह केवल एक किताबी भाषा बनकर रह जाए.

  20. काकेश जी, आप इंजीनियर हैं तो इंजीनियरिंग से संबंधित लेख हिन्दी विकिपीडिया पर क्यों नहीं लिखते? अनुनाद वहाँ अकेले हैं उनका हाथ बटाएँ। आपने लिखा है कि इंजीनियरिंग की किताबें अंग्रेज़ी में होती थीं क्यों न ऐसी किताबों का हिंदी अनुवाद कर डालें ताकि अगली पीढ़ी को यह शिकायत हमसे न रहे। कहीं न कहीं कभी न कभी मेहनत से किया गया काम देश और भाषा के काम आता है। सिर्फ बातें करने से कुछ होता नहीं इसलिए साथी हाथ बढ़ाना…

  21. वैसे तो मैं अभी भी छात्र हु, पर मेरे विचार से तो यह बात सच ही hai की
    “मुझे लगता है हम इंग्लिश को लेकर इतना आगे आ चुके है की अब सब कुछ हिन्दी मे कर लेने का समय शायद निकल चुका है.”
    अब जब सारी उच्च शिक्षा अंग्रेजी में है. सारा इन्टरनेट अंग्रेजी में है. हमारी आईटी और कॉल सेण्टर नौकरी अंग्रेजी में है, यहाँ तक टाइपिंग के fonts भी अंग्रेजी में है| हम कैसे हिंदी मैं उन्नति करे ??

    अगर हम जर्मनी, रशिया, चाइना से तुलना करते है तो पते है की उनकी अर्थव्यवस्था मनुफक्टुरिंग पे टिकी है और हमारी सर्विसेस पे (वो भी US, UK, europe को)
    आज हम अपनी अंग्रेजी की वजह से ही आईटी और कॉल सेण्टर उद्याग मे आगे है | चाइना, जर्मनी भी हमारी देखा देखि अपनी उच्च शिक्षा अंग्रेजी में कर रहे है ताकि आईटी सेक्टर में भी आगे बढ़ सके |

    मैं अभी बंगलौर मे हु, यहाँ आके पता चला जब आधा भारत हिंदी नहीं सम्झ ही नहीं सकता तो हिंदी-हिंदी आलाप से क्या फायदा ?? यहाँ के लोग कहेते हैं की हम क्यों हिंदी सीखे जब ये हमारी राज्य भाषा ही नहीं है |

  22. “भारत में समस्या यह है कि बहुत ही व्यवस्थित तरीके से हिन्दी को दबाया जा रहा है, हिन्दी की उपेक्षा की जा रही है. इस कारण बिन अंग्रेजी ज्ञान के आदमी के आगे बढने के अवसर रुक जाते हैं.” शास्त्री जे सी फिलिप् के इस विचार में समस्त सार निहित है।

    दस जमात फेल अर्धनग्न मूर्ख बालाएं व छोरे भारतीय भाषी फिल्मों का खाते हैं और उनके सारे साक्षात्कार अंग्रेजी में होते हैं।

    रैशनिक हैलीडे की किताब मूल रूप से रूसी में है। रूस विज्ञान में बहुत आगे रहा है। यहां अंग्रेजी का कोई बहाना नहीं है। भौतिकी (रसायन शास्त्र) के नियम हिन्दी में अनुवाद से कोई बदल नहीं जाते। आई.आई.टी. में परीक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं भी हों, यह आग्रह रहना चाहिए। अंग्रेजी हमारे लिए एच्छिक हो, लेकिन गुलाम मानसिकता वाले नेताओं ने योजनाबद्ध तरीके से अंग्रेजी को हम पर लाद दिया है।

    मेरा आग्रह है कि बेशक अंग्रेजी सीखिए, लेकिन प्रयत्न करें कि आपकी हिन्दी आपकी अंग्रेजी से सदा उन्नत रहे। अंग्रेजी में वही कार्य करें जो हिन्दी में संभव न हो।

  23. मेरे देश के शुभ चिंतकों मै आपलोगो की बात से सहमत हूं लेकिन अंग्रेंजी भाषा पर सहमत नहीं हुं क्‍योंकि हमारे देश को 60 वर्ष आजाद हुए हो गये हैं लेकिन आज भी भाषा की गुलामी झेल रहा है, और भारतीय भाषाओं की दुरगति हो रही है नेता अपने बच्‍चों को अंग्रेजी और गरीब के बच्‍चों को हिन्‍दी पढने के लिए कहा रहा है जब वह चुनाव मैदान में होता है तब वह हिन्‍दी में बात करता है। जब जीत जाता है तो पॉच सितारा होटल से नीचे नहीं देखा और 5 से 10 की के बारे में सोचना शुरू करता है। क्‍योंकि फिर वह चुनाव जीतता है कि नहीं
    हिन्‍दी के नाम पर राजनीति होती है सभी कंपनी/सरकारी कार्यालय/उपक्रम अंग्रेंजी के सॉफ्टवेयर खरीद रहे है।
    संसदीय राजभाषा समिति ऑंख बन्‍द करके पॉंच सितार होटल में हिन्‍दी का निरीक्षण कर रही है। जब तक फिर से इस देश में भाषा की आजादी के लिए अन्‍दोलन नहीं किया जायेगा तब तक ना तो देश विकसित होगा और ना ही हमारी कोई राष्‍ट्रभाषा
    मेरी विचार से आप लोगों को कष्‍ट हुआ होगा तो मैं आपसे दोनों हाथ जोड़ कर क्षमा मांगता हुं।
    आप अगर भारत का हित में लिखना चाहते हैं तो हिन्‍दी के सभी अधिकारी कर्मचारी एवं कंपनी, सरकारी कंपनी, सरकारी कार्यालय के उच्‍च अधिकारी के विरूध लिखे जिसे देश की भाषा हिन्‍दी हो सके और कानून के माध्‍यम से सभी अधिकारी कर्मचारी हिन्‍दी में काम कर सके और भारतीय भाषाओं में काम करें।
    मुझे किसी भाषा से बैर नहीं है लेकिन देश की अपनी भाषा होनी चाहिए और इस पर सभी विद्वानों ने हिन्‍दी पर ही जो दिया है इस लिए मैं हिन्‍दी को ही सबसे अधिक भू-भाग में बोली जानी वाली भाषा समझता हुं।

    अगर मेरे लेख की आवश्‍यकता है तो मुझे ई-मेल कर सकते हैं।
    धन्‍यवाद
    बाल कृष्‍ण काला
    जय उत्‍तराखंड जय भारत

  24. आज देश में नेताओं ने हिन्‍दी को एक रूपये लोने एवं गिफ्ट लेने का सदन बनान लिया मेरे देखते देखते संसादीय राजभाषा समिति के सदस्‍यों ने गिफ्ट एवं पॉच सितार होटल में रूकना एवं कंपनी के प्रश्‍नवली देखना और कंपनी के अधिकारियों के अनुसार हिन्‍दी का प्रतिशत को मान लेना बस ही कार्य उनके पास रहा गया है।
    मैंने संसादीय राजभाषा समिति से हिन्‍दी अधिकारियों की योग्‍यता के संबंध में पूछा तो संसादीय राजभाषा समिति के लोक सूचना अधिकारी ने सूचना दी की हिन्‍दी अधिकारी योग्‍यता संबंधित प्रश्‍नावली में नहीं है।
    बड़े दु:ख की बात है कि हमारे देश को 60 साल आजादी के हो गये हैं 60 साल से देश में संसादी राजभाषा समिति हिन्‍दी के विकास के लिए कार्य कर रही है लेकिन हिन्‍दी आज देश में उतना काम भी नहीं कर रही है जितना की 60 साल पहले करती थी।
    महोदय मेरे लेखन से कई लोगों को बुरा लग रहा है लेकिन यह कडवा सच है हमारी जो फार्ज बनता है वह हम ईमनादारी से नहीं करते और सरकारी कर्मचारी तो केवल खाना पूर्ति करता है। और अपने कागज में 78 प्रतिशत तक हिन्‍दी का काम को दर्शायेगा। लेकिन निरीक्षण किया जायेगा तो हिन्‍दी का कार्य 10 से 15 प्रतिशत ही पाया जायेगा।
    जब तक सरकार ने कोई कडा कदम नहीं उठाया और हमारे नेता गिफ्ट की जगह हिन्‍दी के विकास पर जोर नहीं देंगें तक तक ना तो कोई राष्‍ट्रभाषा होगी और ना ही देश की जनता के पैसों का खर्चा होना रूकेगा।
    इसलिए मैं आपने विचार का इस लेख से व्‍यक्ति कर रहा हुं कि जिस तरह हम हिन्‍दी बोलते हैं उसी तरह हम हिन्‍दी को कार्यालय में भी उपयोग करें। और संविधान के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी रखें।
    देश के सभी बुद्धि जीवियों ने कहा है कि देश की राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी हो सकती है लेकिन आज देश के गुलम लोग कहते हैं की देश की राष्‍ट्रभाषा अंग्रेजी होती है।
    मैं कहता हुं कि राज्‍यों की भाषा राजभाषा है और राष्‍ट्र की भाषा हिन्‍दी है। सभी राज्‍यों की भाषा में कार्य होना चाहिए एवं अंग्रेजी की जगह हिन्‍दी होना चाहिए।
    तभी हमारा देश आजाद होगा जब हमारी भाषा अपनी होगी।
    धन्‍यवाद
    बाल कृष्‍ण काला
    9555940613
    जय भारत

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