बेनामी सूनामी से भी ज्यादा भयंकर !!??

आज मैं बैचेन हूँ.. इसलिये नहीं की मेरी पिछली पोस्ट “निश:ब्द” की तरह पिट गयी.. इसलिये भी नहीं कि मुझे फिर से “नराई” लगने लगी … इसलिये भी नहीं कि मुझे किसी ‘कस्बे’ या ‘मौहल्ले’ में किसी ने हड़का दिया हो .. इसलिये भी नहीं कि मेरा किसी ‘पंगेबाज’ से पंगा हो गया हो .बल्कि इसलिये कि मुझे ‘नाम’ की चाह ना रखने वाले अनामों ,बेनामों का गालियां सुनना अच्छा नहीं लग रहा .

मैं एक चिट्ठाकार हूँ …क्या मुझे चिंतित होना चाहिये कि मेरा अस्तित्व खतरे में है . क्या मेरा लेखन किसी की टिप्पणी के कारण ही अच्छा या बुरा हो सकता है. मुझे ‘आत्मावलोकन’ करना चाहिये (!! ?? ) …क्योकि ‘मैं’ ये निर्धारित करना चाहता हूं कि किसी और के चिट्ठे पर बेनामी टिप्पणी ना हो …. आप अपने चिट्ठे पर बेनामी चिप्पी नहीं चाहते तो उस के लिये आपके पास तकनीकी समाधान है …बन्द कर दीजिये ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ …पर हम यह नहीं चाहते क्योकि इस से तो मेरी चिप्पियां कम हो जायेंगी और मैं , टी आर पी की दौड़ में नही आ पाऊंगा या फिसड्डी रह जाऊंगा … टी आर पी रेटिंग लोकप्रियता से निर्धारित होती है और लोकप्रियता टिप्पणीयों से . मैं ‘अप्रगतिशील’ साहित्यकार बन सकता हूँ.. ‘अलोकप्रिय’ नहीं .

हम क्यों चाहते हैं ‘नाम युक्त टिप्पणी’.. क्योंकि हम नाम देखकर निर्धारित करेंगे कि उस टिप्पणी को किस खाँचे में फिट करना है … कैसा बरताव करना है उसके साथ… मैने पिछ्ली पोस्ट में भी कहा था हमारे यहाँ खाँचा बनाने कि प्रक्रिया नाम से शुरु हो जाती .य़े एक बुनियादी सवाल है …हमें इस पर चिट्ठाकारिता के इतर भी विचार करना है . क्यों हम कही हुई ‘बात पर ना जाकर जात पर’ ( नाम पर ) जाते हैं . क्यों मेरी कही हुई ठीक वही बात अलग अलग नामों से अलग अलग अर्थ दे जाती है .

हम अनाम-बेनाम-गुमनाम के चंगुल में क्यों फ़ँस जाते है . यदि में अपना नाम अनाम की जगह अनामदास रख लूं तो ठीक है लेकिन मैं अनाम नहीं रह सकता..ऎसा क्यों …??

किसी ने कहा कि ‘बेनाम लिखने वाला कायर है’ . मैं कहता हूं ‘बेनाम लिखने वाला सभ्य है’ . वो आपकी इज्जत कर रहा है . वो आपके खिलाफ बुरे विचार ,आपकी बात की खिलाफत सीधे मुंह पर नहीं कर रहा . वो आपसे वार्तालाप का एक नया माध्यम तलाश रहा है . इसमें तकनीक भी उसका साथ दे रही है फिर आपको क्या समस्या है ?…. आपके लिये क्या महत्वपूर्ण है वार्तालाप या व्यक्ति .यदि आप कहें ‘वार्तालाप’ .. तो नाम पर क्यों जाते है वो अनाम हो या अनामदास क्या अंतर पड़ता है और यदि आप कहें नहीं ‘नाम’ ज्यादा महत्वपूर्ण है तो बन्द कर दो ना ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ .क्यों बेचारों को गरियाकर अपनी सभ्यता का परिचय दे रहे हो .

बेनाम लिखने वाला कायर नहीं है वो आप जैसे छद्मनामधारी लोगों से ज्यादा साहसी है . कितने ऎसे लोग होंगे जो किसी चिट्ठे को पढ़कर मन ही मन कुलबुलाते रहते होंगे … बहुत कुछ कहने को ….पर सामने वाले को नाराज न कर बैठें इस आशंका से मन मसोसकर रह जाते होंगे. जैसे कभी कभी आपको अपने पिताजी या बड़े भाई की बात अच्छी नहीं लगती तो आप सामने कुछ नहीं कहते पर मन ही मन कहीं कोई दरार पाल लेते हैं. बेनाम व्यक्ति साहस तो करता है अपनी बात को रखने का . मुझे लगता है हमारी पीड़ा का कारण बेनाम व्यक्ति नहीं वरन उसकी कही हुई कड़वी ( सच्ची ) बातों को हजम नहीं कर पाना है . आप मेरे को ईमानदारी से जबाब दीजिये यदि यही बेनाम व्यक्ति आप की ढेर सारी (झूठी) तारीफें करता , जैसा कि कई नामधारी व्यक्ति करते हैं , तो भी क्या उसे मारने दौड़े चले आते . तब तो आप इंटरनैट के अनाम चरित्र को सादर प्रणाम करते . उसकी प्रसंशा में कसीदे गढ़ते .

पिछली पोस्ट में भी मैने इसी प्रश्न को रखने का प्रयास किया था कि हम लोगों को किसी भी खांचे में फिट करने की बजाय उसके लेखन को खाँचों में फिट कीजिए . तकनीक आप को सहायता देती है .आप अपने लेखों को श्रेणीबद्ध करते है .ठीक इसी प्रकार आप दूसरे चिट्ठों को भी श्रेणी बद्ध करें और अपनी रुचि के अनुसार पढ़ें . हमारा ध्यान विषयवस्तु पर ज्यादा हो सन्दर्भ पर कम . कॉंनटेन्ट कॉनटैक्सट से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

मैं क्यों लिखता हूँ… टिप्पणी के लिये या स्वात: सुखाय के लिये … यदि मैं कहूं कि मैं केवल स्वात: सुखाय के लिये लिखता हूँ तो ये तत्वविहीन कोरा आदर्श होगा. मेरे लिये टिप्पणी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि एक फिल्म के लिये दर्शक . सिनेमाहॉल मालिक के लिये भी दर्शक ही महत्वपूर्ण है तो फिर यदि दर्शक ही महत्वपूर्ण है तो हम दर्शक के पहनावे पर क्यों ध्यान दें … .आप कहेंगे मेरा हॉल है मैं निर्धारित करुंगा कि कौन मेरे हॉल में फिल्म देखे कौन नहीं …मैं किसी भी तरह का ड्रेस कोड बना सकता हूं …. बनाईये ना आप …. दरवाजे पर सिक्यूरिटी गार्ड लगाइये . बड़े बड़े अक्षरों में लिख दीजिये कि कौन सा ड्रेस कोड अलाऊड है लेकिन ये मत कीजिये कि आप दर्शक को अंदर आने का टिकट भी दे दें और वो जब फिल्म देख रहा हो तो आप उसे गरियाने लगें … खुद ‘लुंगी’ पहनें.. ड्रेस कोड ‘सूट विद बूट’ का निर्धारित करें और बेचारे ‘कुर्ता पायजामा पहने’ दर्शक को ..जो टिकट ले के अंदर घुसा है उसे बाहर निकालने की पहल करें.

चलो बहुत निकाल ली अपनी भड़ास अब आपको काम की बात बताता हूँ.

अब आप भी इस ‘बेनामी सूनामी’ से बचना चाहते हो तकनीकी रास्ता मैं बता सकता हूं . माफ कीजिये मैं तकनीकी व्यक्ति हूं इसलिये तकनीकी सुझाव ही दे सकता हूं गरियाने की कला में ,मैं माहिर नहीं.

1.आप अपने चिट्ठे पर ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ बन्द कर दें .
2.यदि आप चाहते हैं ..कि नहीं आप सब को आने देना चाहते लेकिन चन्द लोगों की ( इसमें अनाम-बेनाम-गुमनाम-नामवर-छ्द्मनामधारी सभी हो सकते हैं ) बातों को सार्वजनिक नहीं करना चाहते तो अपने चिट्ठे पर टिप्पणीयों पर मॉडरेशन लगा दें

बेनामों के लिये सुझाव

1.भाई मेरे… क्यों गाली खा रहे हो वो भी बिना मतलब की. अरे एक आई-डी की छतरी ले ही लो ना . फ्री में मिलती है यार… और नाम चाहे कुछ भी रख लो … कोई फोटो प्रूफ थोड़े मांग रहा है . आपको नाम नहीं सूझ रहा तो मैं कुछ सहायता कर सकता हूं.

आप अनाम-बेनाम-गुमनाम नहीं हो सकते लेकिन आप चाहें तो अनामचंद , बेनामदास या गुमनाम कुमार रख सकते हो . आजकल बाजों का भी बहुत महत्व है ( बहुत दूर दूर की देख लेते हैं ) तो आप चालबाज , तिकड़मबाज , दंगेबाज रख सकते हैं . यदि कोई नया सा नाम रखना हो तो फिर फंटूस , कवि कानपुरी , निंदक , चिंतक जैसे नाम रख लें . वैसे एक राज की बात बताऊं आप अपना नाम कोई स्त्रीलिंग में रख सकें तो बहुत अच्छा . इससे एक तो आपको पप्पी चिप्पी लगाने वाले ज्यादा मिलेंगे और फिर कोई आपको इस तरह से गरियाएगा भी नहीं . जी हां सही बात है . कल के गाली समारोह में सुना नही .. .. हमारे ‘बेनाम साहब’ , ‘हलवाई की लौंडिया’ से नयन-मटक्का करते पकड़े गये थे तो वो पुरुष ही थे ना .. ओ क्या कहा ..नहीं भी हो सकते ..लगता है आपने भी ‘फायर’ फिल्म देख रखी है ..लेकिन जनाब दिवाल गीली करने वाले तो पुरुष ही होंगे ना . जमीन गीली होती तो हम कुछ और सोचते … . हाँ तो मैं आपको नाम बता रहा था.
आप ‘भैनजी’ रख सकते हैं … इससे एक तो आपको य़ू.पी. के चुनावों में कुछ माइलेज मिल जायेगा और फिर आप मासूम से सवाल भी उठा सकती है …“ नेता क्यूं बने अभिनेता “ टाइप …. आप वर्ड्पैड भी रख सकती है इससे आपकी छवि महिलाधिकारों के लिये जागरूक स्वयं सुखी पर दूसरों को दुखी करने देखने वाली महिला की बन जायेगी. यदि आप कोई शोध छात्रा की छवि चाहें तो आप ‘चित्रित मन’ रख लें …. किसने बोला है आपको सही नाम बताने को … बस ‘नामवर’ चाहिये ‘बेनाम’ नहीं चलेगा.

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

19 comments

  1. “…मुझे लगता है हमारी पीड़ा का कारण बेनाम व्यक्ति नहीं वरन उसकी कही हुई कड़वी ( सच्ची ) बातों को हजम नहीं कर पाना है ….”

    नहीं, संभवतः ये बात नहीं है. दरअसल कड़वी से कड़वी बात भी सभ्यता से रखी जा सकती है. बात गंदी भाषा के असभ्यता पूर्वक इस्तेमाल को लेकर ज्यादा है. और, इसे तो कोई भी बर्दाश्त नहीं करेगा- शायद वे अनाम भी जो ऐसी भाषा लिखते हैं!

  2. काकेश जी

    आप व्यर्थ ही परेशान हो गये..
    यदि टिप्पणी नाम के साथ हो चाहे कटाक्ष ही हो तो पता चलता है कि कौन हितैषी है जो हमें सुधारना चाहता है. बेनामी टिप्पणी में तोडी कायरता का एहसास जरूर होता है… सच्चाई को साफ़ साफ़ कहने मे‍ क्या बुराई है.
    वैसे टिप्पणी, आपके विचारो‍ का प्रतिबिम्ब नही‍ वो तो व्यक्ति विशेष के विचार है‍.. और कोई जरूरी नही की आप उससे सहमत ही हो‍

    सस्नेह
    मोहिन्दर

  3. आपकी पिछली पोष्ट पिटी नही है, वो ऐसा है टिप्पणीयो की संख्या या नारद का हिट काउंटर किसी पोष्ट की सफलता का पैमाना नही है।
    मेरी किसी भी चिठ्ठे पर हिट नारद का हिट काउंटर मे जोड़ा नही जाता क्योंकि मै फीडरीडर का प्रयोग करता हूं।
    बेनामी टिप्पणीयो से कोई परेशानी तब तक नही है जब तक वह सभ्य भाषा मे हो !

  4. काकेश,

    मैंने हिन्दी और अंग्रेजी में लिखने वाले एक से एक धुरंधर ब्लागर्स पढे. बहुत लाजवाब शैली और शब्द-विन्यास वाले, किसी को लेखक हो चुकने की चाह, किसी को लोकप्रिय होने की, किसी को प्रसिद्ध होने की तो किसी को हिट काऊंटर की चिंता तो कोई बेवजह आत्ममोहित.

    मुझे किसी और के लेखन ने इतनी जल्दी प्रभावित नहीं किया जितना आपके लेखन ने किया है! आपने स्ट्राईक-आऊट का प्रयोग बहुत सुंदरता से किया है – क्या सोच रहे हैं और क्या लिखना पडेगा दोनो दर्शाने के लिये.

    लेखन में निरपेक्ष विश्लेषण और वैचारिक स्पष्टता के अलावा अपनी बात तार्किक तरीके से रखने का दम है आप में.

    पाठक को समझता है की आप ब्लागर होने के लिये लिख रहे हैं, पाठकों का सम्मान करते हुए संवाद स्थापित करने और संप्रेषण की समझ विकसित करने के लिये. हर लेख से एक ऊंची छंलाग लगा रहे हैं. इसे कहते हैं ब्लागिंग!

    एक और बात, कहीं कहीं आपकी शैली अनुभवी ब्लागर रमण कौल भाई की शैली से भी मिलती है और ये एक बहुत बडा कांप्लिमेंट है! बधाई. 🙂

  5. आपका अन्दाज़ बढ़िया है भाई..मगर यहाँ मुद्दा वही है जो रवि जी और आशीष कह रहे हैं..ग़ुमनामी की आड़ से गाली गलौज.. अति-स्वतंत्र समाज में भी मर्यादायें तो होंगी..मामला उसी सीमा का है.. कल को कोई अपनी एक पहचान लेकर गाली गलौज करने लगे तो भी आप प्रकाशित तो नहीं कर देंगे..

  6. “क्यों हम कही हुई ‘बात पर ना जाकर जात पर’ ( नाम पर ) जाते हैं . क्यों मेरी कही हुई ठीक वही बात अलग अलग नामों से अलग अलग अर्थ दे जाती है .”
    बिल्कुल सही!!
    सामने एक नाम हो तो शायद कोसने के लिए पहचान मिल जाती है।
    वैसे आप, “आप ‘भैनजी’ रख सकते हैं … इससे एक तो आपको य़ू.पी. के चुनावों में कुछ माइलेज मिल जायेगा और फिर आप मासूम से सवाल भी उठा सकती है …“ नेता क्यूं बने अभिनेता “ टाइप” ऐसे रहस्य ना खोले…. :))

  7. जब तक बेनामों की भाषा संयत है तो कोई समस्या ही नहीं है और जिन लोगों को असंयत भाषा का भय है वे लोग अपने चिट्ठे पर कमेंट मॉडरेशन की सेंसरशिप लागू कर सकते हैं। लोग बेनामों को लतियाए जा रहें हैं केवल इसलिए कि वे बेनाम हैं। इन ब्लॉगर्स की भाषा भी असंयत है ‘कौन है इन बेनामों का बाप’, भला ये स्वयं क्या बताना चाह रहे हैं। यदि टिप्पणी की भाषा ठीक है तो भी बेनाम को क्यों कोसे जा रहे हैं।

  8. बहुत खूब अंदाज में आपने विषय को समाप् करने के लिये अंतिम भाषण जैसा दे डाला है. मैं समझता हूं कि आपकी इस पोस्ट में इतना दम है कि अब इसे पढने के बाद बेनामी विषय पर कोई पोस्ट नहीं लिखी जानी चाहिये. सब खल्लास कर दिया आपने. एक एक तर्क मानो तरकश से आ रहा कोई ब्रह्मास्त्र हो.
    “किसी ने कहा कि ‘बेनाम लिखने वाला कायर है’ . मैं कहता हूं ‘बेनाम लिखने वाला सभ्य है’ . वो आपकी इज्जत कर रहा है . वो आपके खिलाफ बुरे विचार ,आपकी बात की खिलाफत सीधे मुंह पर नहीं कर रहा . वो आपसे वार्तालाप का एक नया माध्यम तलाश रहा है . इसमें तकनीक भी उसका साथ दे रही है फिर आपको क्या समस्या है ?…. आपके लिये क्या महत्वपूर्ण है वार्तालाप या व्यक्ति .यदि आप कहें ‘वार्तालाप’ .. तो नाम पर क्यों जाते है वो अनाम हो या अनामदास क्या अंतर पड़ता है और यदि आप कहें नहीं ‘नाम’ ज्यादा महत्वपूर्ण है तो बन्द कर दो ना ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ .क्यों बेचारों को गरियाकर अपनी सभ्यता का परिचय दे रहे हो ”
    बात एकदम सही है. हमें बुरे से बुरा सुनना आना चाहिये. पर यह बात भी है कि हममें बुरे से बुरा खुल कर कहने कि हिममत भी हो तो हम ज्यादा दिलदार साबित हो सकते हैं.

  9. मैं ई-स्वामी से पूरी तरह सहमत हूं। यही वजह है कि मैंने तमाम नये चिट्ठों में सबसे अधिक टिप्पणी आपके चिट्ठे पर की है। आपका स्वागत भी एक अलग और खास अंदाज में किया। 🙂

    जहां तक बेनाम टिप्पणियों की बात है, ऐसी टिप्पणियों से तब तक किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए जब तक कि उसमें सत्य कहा गया हो, भले ही उसकी भाषा कुछ हद तक अप्रिय हो। सच को कहने का अंदाज और लहज़ा इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि स्वयं सच। लेकिन एक इंसान को किसी दूसरे इंसान से जिस न्यूनतम तमीज की अपेक्षा होती है, कम से कम उतनी तमीज तो हम आपस में संवाद करते समय अपनी भाषा में दिखा ही सकते हैं।

  10. आज तक मैने कोई टिप्पणी नहीं हटाई, चाहे वह कितनी ही अरूचीकर क्यों न हो, या ऐसी टिप्पणी किसी गुमनाम ने ही क्यों न की हो.
    मगर एक बेनामी टिप्पणी को मैने हटाया क्यों कि उसमे मुझे मुस्लिम की औलाद बताते हुए बहुत सी गालियाँ लिखी थी. अगर यह टिप्पणी नाम के साथ आती तो मैं नहीं हटाता. लोग भी देखे की कोई कितना नीचतापूर्वक लिख सकता है. मगर जनाब में इतनी हिम्मत नहीं थी. उसे क्या कहें? कायर या बहादूर?

  11. मैं आपकी कुछ बातों से सहमत हूं लेकिन सच्‍चे मित्र और हितैषी मेरी नजर में वे ही जो सामने मुंह पर सच कह दे1 बगैर लाग लपेट के बगैर भूमिका बांधे लगे बुरा तो लगे1 लेकिन मुंह पर कहो1 नाराज हो तो हो बला से1 मैंने सेठ होशंगाबादी के ब्‍लॉग पर देखा था कि एक बेनाम ने जमकर मां बहिन की गालियां दे मारी जो मैं यहां नहीं बता सकता पर आप हम सब समझते हैं मां बहिन की क्‍या क्‍या गालियां हिंदुस्‍तान में बकी जाती है1 यह काम वह नाम के साथ करता तो मजा आता1 बेनामी साहसी होते हैं तो सीधे मुंह पर आकर क्‍यों नहीं कह देते1 मैं सुनना चाहता हूं मेरे खिलाफ सही बात बोलिए जिसे बोलना है1 मैं नहीं परेशान होता अपनी निंदा से1

  12. परेशानी बेनाम से नहीं उसकी आजादी से है। बेनाम कुछ भी लिखने को आजाद हो जाता है। नाम(छद्म ही सही) बाले की एक पहवान धीरे धीरे बन जाती है तो हम उसके अंदाज और शैली को समझने लगते हैं। हम जिसे जान जाते हैं उसकी आलोचना को सकरात्मक तरीके से ले पाते हैं, अनजान की आलोचना, बुराई या गाली कोई बर्दाश्त कैसे करेगा?

  13. वाह! पिटी-पिटाई लीक छोड़कर बहुत अच्छा लिखा है आपने . यह नई उद्भावना है . सच में इसे इस नए कोण से भी देखा जा सकता है .

  14. आप हिट हैं और आपके नारद हिंट उतने नहीं दिखेंगे क्‍योंकि अब अधिक लोग आपको सब्‍सक्राईब करके पढ रहे हैं। टिप्‍पणी का कुछ हिस्‍सा वही है जो अल्‍लसुबह अनामदास के यहॉं की थी क्‍योंकि इस मुद्दे पर पिछले 10 घंटे में मेरी राय बदल नहीं गई है :)। कुछ बातें अंत में नई जोड़ी हैं

    यह ठीक है कि अक्‍सर बेनाम अपने दिमाग की गंदगी ही इधर उधर टिकाते ज्‍यादा नजर आते हैं और हमसे अधिक इस बात को शायद ही किसी ने सहा होगा। पर ये भी सच है कि वे इस पाखंड से दूर होते हैं कि भई देखो हमारे दिमाग में कोई गंदगी है ही नहीं। इसलिए हमने लगातार सबसे कुत्सित और कायर के बेनाम रहने के अधिकार का पूरा सम्‍मान किया भले ही उसकी कुत्सिकता और कायरता को रद्दी की टोकरी के हवाले किया। हमारे इस मुखौटेपन के विरोध में भी कई बाकायदा चेहरेवालों ने बेनाम मुखौटे पहने और अपनी दस्‍त और कब्‍ज का मुजाहिरा किया।

    और एक बार और हम बेनाम को गालियॉं बककर उसका एक चेहरा ही गढ़ने के व्‍याकरण में हैं जबकि शायद स्‍वाभाविक है कि बेनाम एक नहीं अनेक हैं चूकि हर बेनाम सिर्फ बेनाम होता है इसलिए हम मान लेते हैं कि हर बेनाम सिर्फ हरामी होता है नहीं साहब कुछ हरामी, कुछ कमीने, कुछ कायर, कुछ यशलिप्‍सा से मुक्‍त योगी,….अलग अलग होते होंगे।
    इसलिए वहीं किया जाना चाहिए कि किसी को कचरा फेंकने के अधिकार से इसलिए वंचित न करेंकि वह पासपोर्ट नहीं लाया है लेकिन आप उस कचरे को रखते हैं कि नहीं ये आपका ही विवेक रहेगा।
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    और एक बात। ये बेनाम पर बात सदैव पुल्लिंग में ही क्‍यों होती है। वह कमीना है-कमीनी नहीं ?? हे चिट्ठाजगत की सीमोन तुम कहा हो।

    ‘वैसे एक राज की बात बताऊं आप अपना नाम कोई स्त्रीलिंग में रख सकें तो बहुत अच्छा . इससे एक तो आपको पप्पी चिप्पी लगाने वाले ज्यादा मिलेंगे और फिर कोई आपको इस तरह से गरियाएगा भी नहीं . जी हां सही बात है….
    वैसे साथी स्‍त्री चिट्ठाकारों के विषय में आपकी राय इससे खूब जाहिर होती है और ये भी कि देखो नाम बेनाम होने का सभ्‍यता से कोई पॉजीटिव कोरिलेशन नहीं है।

  15. मैं भी स्वामीजी की बात से सहमत हूँ। और रही बात अनाम रह कर लिखने की तो नाम धारियों ने अपनी सभ्यता का परिचय दे ही दिया है कि वे कितने सभ्य है।
    आप लिखते रहिये हमें कोई फरक नहीं पड़ता कि आप राकेश हैं या कोई और हम आपके लेख उनकी गुणवत्ता की वजह से पढ़ते हैं ना कि आपके नाम की वजह से।

  16. हम स्वामीजी की बात से सहमत हूँ, बेनाम होने का बडा सही गुणा भाग किये हैं आप

  17. बहुत खूब काकेश जी ! मजा आ गया। बहुत अच्छा व मनोरंजक लिखा। नाम तो मैं भी सुझा सकती हूँ। नाम ही नाम के नाम से अपनी दुकान भी खोल सकती हूँ। उदाहरण के लिये मेरा नाम देखिये।
    घुघूती बासूती

  18. काकेश भाई कमाल का लिखते हो भैय्या, कुछ नाम मुझे भी सुझाओ क्या है की नामकरण में दाल-भात खाने को जो मिलने वाला ठैरा ..चलो वो जो भी हो पर आपके लेख होते बहुत मस्त हैं ..लिखते रहे हमें पढ़ाते रहें … with lots of नराई
    tumar dagaru
    sanjupahari

    JAI PAHAD>>JAI BADRIVISHAL

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