चयनम् : क्या साहित्य विफल है ?

साहित्य अकादमी एक संस्था है जो भारतीय भाषाओं के छ्पी विभिन्न रचनाओं को सामने लाने का माध्यम बनी है.यह अंग्रेजी में 1957 से इंडियन लिटरेचर तथा हिन्दी में 1980 के समकालीन भारतीय साहित्य जैसी पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन भी करती आ रही है.ये पत्रिकाएँ विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित श्रेष्ठ समकालीन साहित्य को प्रस्तुत करती रही हैं.chayanam

वर्ष 2006 में साहित्य अकादेमी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर अरुण प्रकाश द्वारा संपादित एक पुस्तक का प्रकाशन किया था जिसका नाम है “चयनम्” .यह अकादमी की द्विमासिक हिन्दी पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य के पिछले 25 वर्षों में प्रकाशित रचनाओं से एक चयन है, इसमें कविता कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, साक्षात्कार तथा आलोचनात्मक लेखों के साथ-साथ एक उपन्यासिका का भी समावेश किया गया है.

इसमें उर्दू के ख्याति प्राप्त आलोचक आले अहमद सुरूर, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, प्रसिद्ध नाट्यकर्मी शुंभ मित्र, भैरप्प, विजय तेन्दुलकर, फणीश्वरनाथ रेणु, त्रिलोचन शास्त्री, नागार्जुन, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, गोपीचंद्र नारंग, अली सरदार जाफ़री, प्रतिभा राय, सुनील गंगोपाध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय, अमृता प्रीतम, केशव रेड्डी, योसफ़ मेकवान, शरणकुमार लिम्बाले, ओ.एन.वी. कुरुप से लेकर युवा अंग्रेजी कथाकार मित्रा फुकन की रचनाऎं हैं.

आज प्रस्तुत है इसी पुस्तक से आले अहमद सुरुर की एक रचना “क्या साहित्य विफल है ?” के प्रमुख अंश. 

लगभग सत्तर वर्ष पहले जब टी.एस. एलियट ने कहा कि उपन्यास मर चुका है, और बाद में जब एडमंड विल्सन ने घोषणा की कि एक ‘मरती हुई विधा’ है, तो उनका आशय यही था कि दूसरे रूप और पद्धतियाँ उनका स्थान ले लेंगी. उन्होंने यह नहीं कहा कि साहित्य एक मरती हुई कला है. लेकिन इन दिनों कोई ख़ास रूप या विधा नहीं, बल्कि संरचित भाषिक प्रवचन का संपूर्ण माध्यम ही आक्रमणों के घेरे में है. दूरदर्शन और अन्य आधुनिक तकनीकी चमत्कारों के सम्मुख मुद्रित शब्द अपना आकर्षण खो रहा है. यह एक वास्तविक ख़तरा है कि किताबें बेकार हो चलें और मुद्रण केवल अल्पतम उपयोगितापरक कामों तक सीमित हो जाए.

******* तथ्य फिर भी यह है कि किताबें पहले से ज़्यादा छप और बिक रही हैं और शायद पढ़ी जाती होंगी. यह सही है, जैसा कि एक समीक्षक ने टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेण्ट में कुछ अरसा पहले इशारा किया था कि उनमें अधिकांश ‘कूड़ा’ होंगी. भारत में हालत और भी बदतर होगी, लेकिन शायद कुछ विश्वास के साथ यह दावा किया जा सकता है कि अधिकांश भारतीय भाषाओं में अभी भी कुछ उम्दा किताबें आ रही हैं और कविता तथा गद्य में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोग किए जा रहे हैं. भारतीय भाषाओं में आपस में और विदेशी साहित्य से पहले से अधिक अनुवाद देखे जा सकते हैं.

साहित्य के विभिन्न रूपों और विधाओं के बीच की सीमा-रेखाएँ धुँधली पड़ने लगी है. भाषा ख़ुद बदल रही है, नैतिक सवालों पर बहस जारी है, यद्यपि नैतिक समाधानों का प्रचलन नहीं रहा, विचारधारा की पकड़ ढ़ीली होती जा रही है तथा संशयवाद, संदेह और निराशा, अँधी आस्था, सुनिश्चित मताग्रहों और अस्पष्ट सामान्यीकरण की जगह लेते जा रहे हैं. भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में टैगोर, इक़बाल और प्रेमचंद्र जैसे महान नाम इस समय नहीं हैं. महानों का दौर समाप्त हो गया है. आकाश पर कवि छाए नहीं हैं. यह गद्य का, उपन्यास, कहानी, आत्मकथा और आलोचना का दौर है. कुछ रचनाकारों ने आलोचकों की वर्तमान हैसियत पर विरोध प्रकट किया है. आलोचक कई बार नए लेखकों की प्रतिभा को पहचानने में असफल रहे हैं; वे अधिकांशतः पुरानी अभिरुचियों में ही शरण लेते रहे हैं; विचारधारा की अपनी तालाश के मारे वे साहित्य के मूल्यांकन में नाकामयाब रहे हैं; फिर भी एक परिप्रेक्ष्य के लिए, एक मूल्यबोध और संस्कृति की खोज के लिए और इस दौर की बढ़ती हुई बर्बरता में एक सामाजिक चेतना, एक नैतिक ताने-बाने के लिए और भाषा नामक रहस्य के सम्मान के लिए आलोचक का महत्त्व है.

*******पाठक आमतौर पर रूढ़िवादी होते हैं, वे सामान्यतया साहित्य में अपनी स्थापित मर्यादाओं की स्वीकृति या एक स्वप्न-जगत में पलायन चाहते हैं. साहित्य एक झटके में उन्हें अपने आस-पास के उस जीवन के प्रति सचेत करता है, जिससे उन्होंने आँखें मूँद रखी थीं. शुतुरमुर्ग़ अफ्रीका के रेगिस्तानों में नहीं मिलते; वे हर जगह बहुतायत में उपलब्ध है. प्रौद्योगिकी के इस दौर का नतीजा जीवन के हर गोशे में नक़द फ़सल के लिए बढ़ता हुआ पागलपन है; और हमारे राजनीतिज्ञ, सत्ता के दलाल, व्यापारी, नौकरशाह- सभी लोगों को इस भगदड़ में नहीं पहुँचने, जैसा दूर करते हैं वैसा करने, चूहादौड़ में शामिल होने और कुछ-न-कुछ हासिल कर लेने को जिए जा रहे हैं. हम थककर साँस लेना और अपने चारों ओर निहारना, हवा के पेड़ में से गुज़रते वक्त पत्तियों की मनहर लय-गतियों को और फूलों के जादुई रंगों को, फूली सरसों के चमकदार पीलेपन को, खिले मैदानों की घनी हरीतिमा को मर्मर ध्वनि के सौन्दर्य, हिमाच्छादित शिखरों की भव्यता, समुद्र तट पर पछाड़ खाकर बिखरती हुई लहरों के घोस को देखना-सुनना भूल गए हैं.

कुछ लोग सोचते हैं कि पश्चिम का आधुनिकतावाद और भारत तथा अधिकांश तीसरी दुनिया के नव औपनिवेशिक चिन्तन के साथ अपनी जड़ों से अलगाव, व्यक्तिवादी अजनबियत में हमारा अनिवार्य बेलगाम धँसाव, अचेतन के बिम्ब, बौद्धिकता से विद्रोह, यह घोषणा की ‘दिमाग़ अपनी रस्सी के अंतिम सिरे पर है’, यथार्थवाद का विध्वंस, काम का ऐन्द्रिक सुख मात्र रह जाना और मानवीय भावनाओं का व्यावसायीकरण तथा निम्नस्तरीयकरण इस अँधी घाटी में आ फँसने की वजह है. लेकिन वे भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण इतिहास की एक सच्चाई है, कि नई समस्याओं को जन्म देने और विज्ञान को अधिक जटिल बनाने के बावजूद आधुनिकीकरण, एक तरह से, मानव जाति की नियति है.

वे यह भी भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण सौ फीसदी पश्चिमी करण नहीं है, बल्कि एक बिन्दु के बाद यह अपना रास्ता ख़ुद बनाता है. हमें इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि भारतीय पुनर्जागरण उदीयमान बुर्जुआ वर्ग़ द्वारा अपनी ज़रूरतों के लिए अपहृत कर लिया गया और अधूरा ही रह गया. हमें मशीम द्वारा मनुष्य के विस्थापन, महानगरों के जंगलों का निर्माण और प्रगति के नाम पर सत्ता की राजनीति को भी समझना चाहिए. आधुनिकता के बहुत से आयाम हैं, लेकिन पश्चिम में पूँजीवाद की भूमिका से सीख लेते हुए भारत में भी इसे समग्र मनुष्य के बारे में महसूस करने और सोचने को हतोत्साहित किया और ऊब तथा मनुष्य में छिपे पशुत्व के रसातल में उदास चिन्तन के रेगिस्तान को बढ़ावा दिया है. मानवता और मानवीयता की जगह बर्बरता और पशुत्व ने ले ली है. ‘नवता’, स्टीफ़ोन स्पेण्डर द्वारा प्रयुक्त पद, की तालाश में कुछ लोगों ने अच्छे लेखन को ‘प्रतिक्रांतिकारी’ मान लिया. उनकी राय में साहित्य यथास्थिति पर हमारे अक्रोश की धीर को कुंठित करता और हमें केवल मानसिक जगत में रहने के लिए प्रेरित करता है.

मेरा सुझाव है कि विवेकहीन आधुनिकता के बावजूद आधुनिकता की दिशा में धैर्यपूर्वक सुयोजित प्रयास होने चाहिए. यथार्थवाद का अर्थ व्यर्थ के ब्यौरे नहीं होने चाहिए और न स्वस्थ काम को अश्लील लेखन में ढलना चाहिए. हमें याद रखना चाहिए कि क्लासिकी साहित्य ने काम-व्यवहार को भी अपनी परिधि में लिया, पर उसमें लोलुप संतोष नहीं हैं. एक आलोचक किसी नाली में भी झाँक सकता है, पर वह नाली-निरीक्षक नहीं होता. लेखक का कार्य दुनिया को बदलना नहीं, समझना है.

साहित्य क्रांति नहीं करता; वह मनुष्यों के दिमाग़ बदलता और उन्हें क्रांति की ज़रूरत के प्रति जागरूक बनाता है. हमें स्मरण रखना चाहिए कि पक्षधर साहित्य, साहित्य का एक प्रकार मात्र है, कि विचारधारा सर्जनात्मक दृष्टि को बाधित कर सकती है, गो यह उसे एक दिशा भी देती है. साहित्य में ‘चाहिए’ को भी ध्यान में रखा जा सकता है, पर उसका मुख्य सरोकार ‘है’ से होता है. जब पाठक को लगता है कि उसे एक शो-रूम में ले आया गया है तो वह फँसा हुआ महसूस करता है; जब वह एक खिड़की से दुनिया को देखता है तो उसमें प्रत्येक चीज़ को देखने की उत्सुकता और जिज्ञासा जागती है. साहित्य राजनीतिक हो सकता है और धार्मिक, रहस्यवादी, दार्शनिक भी, लेकिन उसे किसी दर्शन या विचारधारा को हथौड़ा नहीं बनाना चाहिए. दोस्तोएव्स्की ने एक बार कहा था कि केवल ‘सौंदर्य’ ही दुनिया को बचा सकता है. मेरे ख़याल में सौन्दर्य से उसका तात्पर्य उपयोगिता के उस संकीर्ण अर्थ से था, जिसका उपदेश कॉडवेल ने दिया. सौन्दर्य से उसका तात्पर्य शायद था पूर्णता की खोज में सक्रिय मनुष्य : परिचित और अपरिचित में, जीवन की खुशी और दुःख में, संगति और असंगति के सौंदर्य, वक्र गतियों और उज्जवल भावों का, उत्प्रेरक विचारों का, निराशा के अतल में आशा का, प्रभावित यौवन और थके-हारे युग का सौंदर्य; मनुष्य में दिव्यत्व के कंपन का और आज एक पेड़ लगाने का सौंदर्य; मार्टिन लूथर के शब्दों में, यह जानते हुए भी कि यह दुनिया कल समाप्त हो सकती है.

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अच्छे साहित्य के चहेताओं को यह किताब खरीद लेनी चाहिये.

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

10 comments

  1. भईया क्रांति से कम ना मानोगे क्या. साहित्य को बहुत कुछ करना है। क्रांति भी करने दो, और भी बहुत कछ करने दो। जिसका जो मन आये, वो करने दो।

  2. इसके पहले कि मेरे मुंह से कोई ग़लत बात निकल जाये, मैं असल काम की बात कह लूं! असल काम की बात यह कि हां, साहित्‍य विफल है!

  3. “लगभग सत्तर वर्ष पहले जब टी.एस. एलियट ने कहा कि उपन्यास मर चुका है, और बाद में जब एडमंड विल्सन ने घोषणा की कि एक ‘मरती हुई विधा’ है, तो उनका आशय यही था कि दूसरे रूप और पद्धतियाँ उनका स्थान ले लेंगी”

    इनका आशय कहीं ब्लॉग से तो नहीं था?…..:-)

  4. साहित्य सोए हुए को जगाता है . जागे हुए को नहीं . सो यह सफल-विफल का मुद्दा क्यों ?

    साहित्य दुनिया के अंधेरे में जुगनू ही सही,नियोन और सोडियम लैम्पों के ज़माने में लालटेन ही सही, पर वह प्रकाश का सपना तो ज़िंदा रखता है .

    और क्रांति क्या फ़्रांस और रूस की क्रांति ही है . भारत के किसी पिछड़े गांव के अभावग्रस्त परिवार की एक बच्ची जब गांव की पगडंडी पर पहली बार साइकिल चलाते हुए नए अर्जित आत्मविश्वास के साथ निकलती है तो मेरे लिए तो वह भी किसी क्रांति से कम नहीं है . क्रांति ऐसे भी घटित हो सकती है चुपचाप .

    आले साहब का आलेख बहुत अच्छा लगा .

  5. सवाल पूछने की बात है तो पूछ सकते हैं लेकिन साहित्य का काम क्रांति लाना नहीं है. कोई क्रांति लाने के लिए साहित्य का सृजन करे, यह जरूरी नहीं. लेकिन ये बात भी ठीक है कि क्रांति क्या केवल उसे कहेंगे जो सोवियत रूस या फ्रांस में हुई है? शायद इतिहास के ‘डॉक्टरों’ के लिए उसी स्तर की क्रांति को क्रांति माना जाता है.

    लेकिन क्रांति तो हर स्तर पर हो सकती है. उसके द्वारा भी जिसने शायद साहित्य नहीं पढ़ा, या फिर उसे साहित्य की समझ नहीं है. बढ़िया प्रस्तुति.

  6. अंग्रेज़ी भाषा का एक शब्द है: Floccinaucinihilipilification. बाइ द वे यह अंग्रेज़ी का सबसे लम्बा शब्द भी माना जाता है. इस का अर्थ होता है: “किसी भी चीज़ को आदतन बुरा-भला कहते हुए खा़रिज कर देना”.

    रहा सवाल सफल-विफल का, तो उस पर कुछ कहे जाने की ज़रूरत नहीं है. जिन्हें लगता है साहित्य विफल है वे सारे कबीर-तुलसी-ग़ालिब-निराला वगैरा को खड्ड में गाड़ आएं. जिन्हें ऐसा नहीं लगता उन्हें सब कुछ मनमाफ़िक सहेजने की छूट तो दो यार.

    और ब्रह्मवाक्यों से बचो प्यारे!

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