हिन्दी की सेवा का मेवा

वो आज खुश है.पत्नी के प्रेम के वशीभूत भी है.आज उनकी पत्नी ने अपनी हिन्दी की थिसिस जमा कर दी.वे पुलकित भी हैं और किलकित भी. उनकी मेहनत रंग लायी.उनकी मेहनत में उनकी पत्नी का भी हाथ हैं या ये कहें कि पत्नी का पूरा का पूरा किचन भी इसमे शामिल है.जब वह इंटरनैट से कट-पेस्ट कर एक नये ज्ञान की खोज कर रहे थे तब उनकी पत्नी ही तो थी जो उन्हे चाय और कभी कभी प्याज के पकोड़े खिलाकर मोटीवेट कर रही थी.और वो पूरी तरह मोटीवेट हुए भी.यानि चमड़ी मोटी हो गयी और वेट तीस किलो बढ़ गया.लेकिन फिर भी संतुष्टि का कारण यह कि थिसिस पूरी हो गयी. उनको लगा कि हिन्दी सेवा करने का उनका सपना पूरा हो गया. आखिर वो खुद हिन्दी के इतने महान शिक्षक हैं अब पत्नी भी हिन्दी मे रिसर्च कर कहीं ना कहीं शिक्षिका हो ही जायेंगी. दोनों हाथों से हिन्दी के नाम पर पैसे लूटेंगे जो बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने के काम आयेंगें.

उनकी खूबी यह थी हिन्दी के मास्साब होते हुए भी वो नयी तकनीक से पूरी तरह वाकिफ थे. उनके विद्यालय में कई दिनो से धूल खा रहा कंप्यूटर उन्ही के सहयोग से अपग्रेड (रिप्लेस) करवाया गया था क्योकि उनका कहना था कि कंप्यूटर बहुत ही नाजुक मिजाज होता है जैसे आमतौर पर गंदगी में जाने से हैजे या अन्य बीमारियों के वायरस लग जाते हैं वैसे ही कंप्यूटर में भी धूल के कारण वायरस के प्रवेश की पूरी पूरी संभावना है.इसलिये ऎसे बीमारू कंप्यूटर के साथ काम करने की बजाय नया स्वस्थ कंप्यूटर मगाया जाय. उनकी बात मान ली गयी और नया कंप्यूटर आ गया. ये बात और है कि उन्होने पुराने बीमार कंप्यूटर को अपने घर में रखने की हिम्मत की और आज वह कंप्यूटर उनके घर की शोभा बढ़ा रहा है.

आज उन्हें हिन्दी पखवाड़े का उदघाटन करना है.वो उसके लिये नोट्स तैयार कर रहे हैं.उसके लिये भी उनका तकनीकी दिमाग सरपट दौड़ रहा है. हिन्दी दिवस या हिन्दी पखवाड़े की घुड़दौड़ अंग्रेजी को गाली देने से प्रारम्भ होती हुई , अंग्रेजी के मुकाबले हिन्दी की तुलना के मार्ग से जाती है और अंत में हिन्दी के व्यापक प्रयोग की अतृप्त कामना पर समाप्त हो जाती है.उन्होने भी शुरुआत की.अंग्रेजी को गाली दी. क्यों कोई अंग्रेजी दिवस या पखवाड़ा नही मनाता? मनाता तो इंटरनैट पर उन्हें आज के भाषण के लिये कच्चा माल मिल जाता जैसे न जाने कितनी रिसर्चों और भाषणों के लिये मिल जाता है.

उन्हे आज मुख्य अतिथि बनना था.आज उन्होने अपना पुराना कुर्ता पहना. एक झोला लटकाया ताकि मिलने वाले पत्र-पुष्प और कुछ किताबें जो कि हर साल की तरह इस साल भी उन्हें भेंट की जानी थी उनको झोले के हवाले किया जा सके और फिर हिन्दी की फटेहाल झोले वाली इमेज भी बरकरार रहे.हर साल हिन्दी की मिलने वाली किताबों से वो तंग आ चुके थे. उन्हे अपनी लाइब्रेरी में सजाने में उन्हे शरम आती थी कि कहीं उन्हे लोग डाउनमार्केट ना समझने लगें.एक डर और था कि कहीं बच्चे वो किताबें देख उनको पढ़ने ना लग जायें.जादुई छड़ी वाले हैरी पॉटर के सामने चिमटे वाले हामिद मियां को पढ़ लिया तो पिछ्ड़े ही कहलायेंगे ना.लाइब्रेरी में तो वो अंग्रेजी की मोटी मोटी किताबें सजाते थे जिन्हे वो रविवार को सस्ते में पुरानी किताबों की दुकान से खरीद लाते थे. हिन्दी की किताबें अन्दर वाली अलमारी में रख दी जाती थी या फिर किसी को उपहार स्वरूप भेट कर दी जाती थी.इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि किताब के पहले पन्ने में भेंटकर्ता के रूप में वो अपना नाम लिख दें.

हिन्दी अच्छी भाषा है,कम से कम उन लोगों के लिये जो इसकी वदौलत रोटी खा रहे हैं ये पिछ्ड़ी हुई है उसी देश में जिस देश की राष्ट्र भाषा होने का गौरव इसे प्राप्त है. इस देश में हिन्दी सेवा के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है.हिन्दी के पिछड़ेपन का रोना रोने वाले लोग न्यूयार्क की सैर करते हैं. ऎसे में यदि वो भी हिन्दी पखवाड़े में इधर उधर भाषण देके चन्द हिन्दी की किताबें,कुछ पत्र पुष्प और चंद अच्छे संबंध अपनी झोली में रख लें तो क्या गलत है.उन्होने खुद को समझाया. जैसे रिश्वत लेने के बाद नेता लोग देश के भर्ष्टाचार का रोना रोते हुए खुद को समझाते हैं.

वो खुश हैं.उन्होने अभी अभी एक धांसू सा भाषण दिया है,हिन्दी की इस पिछ्ड़ी अवस्था के लिये सरकार से ले के अन्य विभिन्न संस्थाओं और लोगों को गरियाने से खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं. उनकी चाल में विद्वानों सी नजाकत है.अपने गले के हार को शास्त्री जी पकड़ाकर वो मंच से उतर रहे हैं. श्रोताओं में बैठी कुछ भविष्य की शोध छात्राऎं उन्हे अभी से गुरु मान बैठी हैं. वो खिल खिल कर हंसती हैं उन्हे देखती हैं वो भी तिरछी नजर से उनको देखते हैं. सभा खतम हुई. मेज पर डिस्पोजेबल प्लेटों में पैटीज और पेस्ट्रीज हैं. उनसे आग्रह किया जा रहा है वो कुछ ग्रहण करें. वो ना-नुकुर का नाटक कर एक पेस्ट्री अपने मुँह मे डाल ही लेते हैं. उन्ही के अनुरोध पर एक डिब्बे में कुछ पैटीज और पेस्ट्रीज उनके झोले में रख दी गयी हैं. वो खुश हैं कि हिन्दी की सेवा में इस साल का उनका कोटा पूरा हुआ. वो बेसब्री से अगले साल की प्रतीक्षा में हैं.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, हिन्दी, काकेश

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

16 comments

  1. स्वागत है नये अड्डे पर. अब नये झंडे गाड़ो यहाँ पर…इन्तजार है. वैसे तो मालूम ही है कि गाड़ ही लोगे. फिर भी शुभकामनायें. अच्छा लगा एक अंतराल के बाद आया देख कर. 🙂

  2. काकेशजी भौत दिनों बाद लौटे और अब डाट काम हो लिये, बधाई, शुभकामनाएं। पहली ही पोस्ट कटाईयुक्त संभावनाओं के साथ वाह वाह, बोले तो बौहनी सही है जी। अभी अपन तो हिंदी के जूनियर पुत्र हैं, हजार वजार ही काट पाते हैं। लाखों कैसे काटते हैं,इस पर रिसर्च चल रही है। आप को कुछ फंडे हाथ लगें, तो हमें भी बताइए।

  3. हिंदी विभागों और अध्यापक-साहित्यकारों से जिनका भी पाला पड़ा है, काकेश जी आपने उन सभी के दिल की बात लिख दी। ऐसे हिंदी-सेवकों ने वाकई हिंदी का बहुत नुकसान किया है।

  4. नया घर मुबारक हो काकेश भाई . शुरु से ही फ़ास्ट बॉलिंग कर रहे हो . पहला बाउंसर मुबारक हो . इस सेवा और मेवा के कार्य-व्यापार पर एकदम सही टिप्पणी की है .

  5. बहुत दिन बाद नजर आये हो। व्यंग भी बढ़िया लाये हो।
    घुघूती बासूती

  6. “इस देश में हिन्दी सेवा के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है.हिन्दी के पिछड़ेपन का रोना रोने वाले लोग न्यूयार्क की सैर करते हैं. ऎसे में यदि वो भी हिन्दी पखवाड़े में इधर उधर भाषण देके चन्द हिन्दी की किताबें,कुछ पत्र पुष्प और चंद अच्छे संबंध अपनी झोली में रख लें तो क्या गलत ह”

    अच्छा व्यंग है. क्या बात है काफी दिन से कम दिख रहे हो — शास्त्री जे सी फिलिप

    मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
    2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार!!

  7. मुबारक हो काकेश जी खुद का घर खरीदने की।

    रघुकुल रीत यही चली आई, Blogger/WordPress.Com से निजी डोमैन पर जाई। 🙂

    बाकी मिठाई वगैरा नहीं खिलाई आपने। 🙂

  8. सभी मित्रो को धन्यवाद और आभार.लेख पसंद करने के लिये.

    पिछ्ले लगभग 2 महीने से अपनी जॉब चेंज में लगा था.अब सैटल हो रहा हूँ. कोशिश करुंगा अब नियमित लिखूँ.

    आलोक जी अगली पोस्ट आपके लिये.

    श्रीश जी मिठाई उधार रही..

  9. व्यंग्य बहुत ठीक है। वेदना भी परिलक्षित होती है
    जादुई छड़ी वाले हैरी पॉटर के सामने चिमटे वाले हामिद मियां को पढ़ लिया तो पिछ्ड़े ही कहलायेंगे ना
    ये पिछ्ड़ी हुई है उसी देश में जिस देश की राष्ट्र भाषा होने का गौरव इसे प्राप्त है
    कारण तो बहुत होंगे, पर शर्मसार तो हम (जिनको भी ऐसा लगे) होते ही हैं। इस विडम्बना के दूर होने के भी तो आसार नहीँ दीखते।

  10. अच्‍छी जँच रही है दुकान।
    बधाइ्र नए पते की। माल अच्‍छा है।

    अरे हॉं हमने बोहनी करवाने के लिए एंडसेंस क्लिक किया तो इसी विंडो में खुला…जुगाड़ करें कि नई विंडो में खुला करे ताकि आपकी कमाई हमारी पढ़ाई में बाधा न दे 🙂

  11. अच्‍छी जँच रही है दुकान।
    बधाई नए पते की। माल अच्‍छा है।

    अरे हॉं हमने बोहनी करवाने के लिए एंडसेंस क्लिक किया तो इसी विंडो में खुला…जुगाड़ करें कि नई विंडो में खुला करे ताकि आपकी कमाई हमारी पढ़ाई में बाधा न दे 🙂

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