क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का

यह क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का है

उन दिनों वो नये-नये स्कूल मास्टर नियुक्त हुए थे और फ़िटन उनकी सर्वोच्च आकांक्षा थी। सच तो यह है कि इस यूनिफ़ार्म यानी सफ़ेद अचकन, सफ़ेद जूते,सफ़ेद कुर्ते-पाजामे और सफ़ेद कमरबंद की खखेड़ केवल अपने आपको सफ़ेद घोड़े से मैच करने के लिए थी। वरना इस बत्तखा भेस पर कोई बत्तख ही आशिक़ हो सकती थी। उन्हें चूड़ीदार से सख़्त चिढ़ थी। केवल सुंदर कन्या के हाथ के बुने सफ़ेद कमरबंद का प्रयोग करने के लिए यह सितार का ग़िलाफ़ टांगों पर चढ़ाना पड़ा। इस हवाई क़िले की हर ईंट सामंती गारे से निर्मित हुई थी, जो संपन्न सपनों से गुंथा था। केवल इतना ही नहीं कि प्रत्येक ईंट का साइज और रंग भिन्न था, बल्कि उनकी आकृति भी उकेरी हुई थी। कुछ ईंटें गोल भी थीं। बारीक-से-बारीक बात यहां तक कि शालीनता की उस सीमा को भी तय कर दिया गया था कि उनकी उपस्थिति में सफ़ेद घोड़े की दुम कितनी डिग्री के कोण तक उठ सकती है और उनकी सवारी के रूट पर किस-किस खिड़की की चिक़ के पीछे किस कलाई में किस रंग की चूंड़ियां छनक रही हैं, किसकी हथेली पर उनका नाम मय बी.ए. की डिग्री, मेंहदी से लिखा है और किस-किस की सुरमई आंखें पर्दे से लगी राह तक रही हैं कि कब इंक़लाबी शाहजादा ये दावत देता हुआ आता है कि-

तुम परचम लहराना साथी मैं बरबत पर गाऊंगा

यहां ये निवेदन करता चलूं कि इससे बढ़िया तथा सुरक्षित कार्य विभाजन क्या होगा कि घमासान के रण में परचम (युद्ध ध्वज) तो साथी उठाये, कटता-मरता फिरे और ख़ुद शायर दूर किसी संगे-मरमर के मीनार पर बैठा एक फटीचर और वाहियात वाद्य ‘बरबत’ पर वैसी ही कविता यानी ख़ुद अपनी-ही कविता गा रहा है। गद्य में इसी सिचुएशन को ‘चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेंगे राम’ में जियादा फूहड़ ईमानदारी से बयान किया गया है।

लीजिये! प्रारंभ में ही गड़बड़ हो गयी, वरना कहना सिर्फ़ इतना था कि मज़े की बात यह थी कि इस सोते जागते सपने के दौरान बिशारत ने स्वयं को स्कूल मास्टर के ही ‘शैल’ में देखा, पद बदलने का साहस सपने में भी न हुआ! संभवतः इसलिए भी कि फ़िटन और रेशमी कमरबंद से केवल स्कूल मास्टरों पर ही रोब डाल सकते थे। जमींदारों और जागीरदारों के लिए इन चीजों की क्या हैसियत थी।

अपनी पीठ पर बीस वर्ष बाद भी उस आग की लकीर की जलन वो अनुभव करते थे जो चाबुक़ लगने से उस समय उभरी थी जब मुहल्ले के लौंडों के साथ शोर मचाते और चाबुक़ खाते वो एक रईस की सफ़ेद घोड़े वाली फ़िटन का पीछा कर रहे थे।

चौराहे बल्कि संकोच-राहे पर

शेरो-शायरी छोड़कर स्कूल-मास्टरी अपनायी। स्कूल मास्टरी को धता बताकर दुकानदारी की और अंततः दुकान बेच खोंच कर कराची आ गये, जहां हरचंद राय रोड पर दोबारा लकड़ी का कारोबार शुरू किया। नया देश, बदला-बदला सा रहन-सहन, एक नयी और व्यस्त दुनिया में क़दम रखा, मगर उस सफ़ेद घोड़े और फ़िटन वाली फैंटेसी ने पीछा नहीं छोड़ा। Day Dreaming और फ़ेटेंसी से दो ही सूरतों में छुटकारा मिल सकता है। पहली जब वह फ़ेंटेसी न रहे, वास्तविकता बन जाये, दूसरे इंसान किसी चौराहे बल्कि संकोच-राहे पर अपने सारे सपने माफ़ करवा के विदा हो जाये Heart breaker, dream maker, thank you for the dream और उस खूंट निकल जाये, जहां से कोई नहीं लौटा यानी घर-गृहस्थी की ओर, परंतु बिशारत को इससे भी लाभ नहीं हुआ। वो भरा-पूरा घर औने-पौने बेचकर अपने हिसाब से लुटे-पिटे आये थे। यहां एक-दो साल में ख़ुदा ने ऐसी कृपा की कि कानपुर तुच्छ लगने लगा। सारी इच्छायें पूरी हो गयीं, अर्थात घर अनावश्यक वस्तुओं से अटाअट भर गया। बस एक कमी थी।

सब कुछ अल्लाह ने दे रक्खा है घोड़े के सिवा!

अब वो चाहते तो नयी न सही, सेकेंड-हैंड कार आसानी से ख़रीद सकते थे। जितनी रक़म में आज कल चार टायर आते हैं, इससे कम में उस जमाने में कार मिल जाती थी, लेकिन कार में उन्हें वह रईसाना ठाट और जमींदाराना ठस्सा नजर नहीं आता था, जो फ़िटन और बग्घी में होता है। घोड़े की बात ही कुछ और है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से ” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच

पहला और दूसरा भाग

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

4 comments

  1. यानी हम अब वहा पहुचने ही वाले है जहा से शुरुआत हुई थी यानी लाहौर की गलियो मे 🙂

  2. सिर्फ यही भाग पढा है । पर जितना पढा है उससे आगे और पीढे का जानने की उत्सुकता जाग उठी है ।

  3. यह भी पढ़ लिया-फिर इन्तजार में लग गये. आभार.

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    आप हिन्दी में लिखती हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं, इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

    एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.

    यह एक अभियान है. इस संदेश को अधिकाधिक प्रसार देकर आप भी इस अभियान का हिस्सा बनें.

    शुभकामनाऐं.

    समीर लाल
    (उड़न तश्तरी)

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