इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया

निहारी, रसावल, जली और धुआं लगी खीर, मुहावरे, सावन के पकवान, अमराइयों में झूले, दाल, रेशमी दुलाई, ग़रारे, दोपल्ली टोपी, आल्हा-ऊदल और जबान के शेर की तरह इक्का भी यू. पी. की ख़ास चीजों में गिना जाता है। हमारा ख़याल है कि इक्के का अविष्कार किसी घोड़े ने किया होगा, इसीलिये इसके डिजाइन में इस बात का ध्यान रखा गया है कि घोड़े से अधिक सवारी को परेशानी उठानी पड़े। इक्के की विशेषता यह है कि अधिक सवारियों का बोझ घोड़े पर नहीं पड़ता बल्कि उन सवारियों पर पड़ता है जिनकी गोद में वो आ-आ कर बैठती है। जोश मलीहाबादी साहब ऐसे इक्कों के बारे में लिखते हैं कि, तमाम के तमाम इस क़दर जलील हैं कि उन पर सिकन्दर महान को भी बिठा दिया जाये तो वो भी किसी देहाती रंडी के भड़वे नजर आने लगेंगे

धीरजगंज के प्लेटफ़ार्म को स्कूल के बच्चों ने रंग-बिरंगी झंडियों से इस तरह सजाया था जैसे फूहड़ मां बच्ची का मुंह धुलाये बग़ैर बालों में शोख़ रिबन बांध देती है। ट्रेन से उतरते ही हर शायर को गेंदे का हार पहना कर गुलाब का एक-एक फूल और औटते दूध का कांसे का गिलास पेश किया गया जिसे थामते ही वो बिलबिला कर पूछता था कि इसे कहां रक्खूं? स्वागत करने वालों ने पच्चीस मील और एक घण्टे दूर, कानपुर से आने वालों से पूछा, ‘‘सफ़र कैसा रहा! कानपुर का मौसम कैसा है! हाथ मुंह धो के तीन चार घण्टे सो लें तो सफ़र की थकान उतर जायेगी।’’ प्रत्युत्तर में मेहमानों ने पूछा, ‘‘यहां मग़रिब (शाम की नमाज) किस वक़्त होती है’’ धीरजगंज वाले तो मेहमाननवाजी के लिये मशहूर हैं;यहां की कौन सी चीज मशहूर है;क्या यहां के मुसलमान भी उतने ही बुरे हाल में हैं, जितने बाक़ी हिन्दुस्तान के।’’ अट्ठारह शायर और पांच मिसरा उठाने वाले जो एक शायर अपने साथ लाया था, दो बजे की ट्रेन से धीरजगंज पहुंचे। ट्रेन पहुंचने से तीन घण्टे पहले ही यतीमख़ाना शम्स-उल-इस्लाम का बैंड बजना शुरु हो गया था, लेकिन जैसे ही ट्रेन आ कर रुकी तो कभी ढोल, कभी बांसुरी, कभी हाथी की सूंड जैसा बाजा बंद हो जाता और कभी तीनों ही मौन हो जाते, सिर्फ़ बैंड मास्टर छड़ी हिलाता रह जाता। वो इस कारण कि इन बाजों को बजाने वाले बच्चों ने इससे पहले इंजन को इतने पास से नहीं देखा था। वो उसे देखने में इतने तल्लीन हो जाते कि बजाने की सुध ही न रहती, इंजन उनके इतने पास आ कर रुका था कि उसका एक-एक प्रभावी पुरजा दिखाई दे रहा था……सीटी बजाने वाला उपकरण, कोयला झोंकने वाला बेलचा, बॅायलर दहकते- चटख़ते कोयलों का ताप और अंग्रेजी दवाओं की बू जैसा भभकता झोंका। शोलों की आंच से ऐंग्लो इन्डियन ड्राइवर का तमतमाता लाल चुक़न्दर चेहरा और कलाई पर गुदी नीली मेम, मुसलमान ख़लासी के सर पर बंधा हरा रूमाल और चेहरे पर कोयले की जैबरा धारियां, पहिये से जुड़ी हुई लम्बी सलाख़ जो बिल्कुल उनके हाथ की तरह चलती जिसे वो आगे पीछे करते हुए छुक-छुक रेल चलाते थे, इंजन की टोंटी से उबलती, शोर मचाती स्टीम का चेहरे पर स्प्रे। इन बच्चों ने धुंए के मरग़ोलों को मटियाले से हल्का सुरमई, सुरमई से गाढ़ा-गाढ़ा काला होते देखा। गले में उसकी कड़वाहट उन्हें अच्छी लग रही थी। घुंघराले धुंए का काला अजगर फुफकारें मारता आख़िरी डब्बे से भी आगे निकल कर अब आसमान की तरफ उठ रहा था। बैंड बजाने वाले बच्चे बिल्कुल चुप हो कर पास, बिल्कुल पास से इंजन की सीटी को बजता हुआ देखना चाहते थे। उनका बस चलता तो जाते समय अपनी आंखें वहीं छोड़ जाते। अगर उन बच्चों से बैंड बजवाना ही था तो ट्रेन बग़ैर इंजन के लानी चाहिये थी।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी

पहला भाग

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

3 comments

  1. क्या जमाना था! अब तो इन स्टीम इंजनों का ही बैण्ड बज गया है! 🙂

  2. हमारा ख़याल है कि इक्के का अविष्कार किसी घोड़े ने किया होगा, इसीलिये इसके डिजाइन में इस बात का ध्यान रखा गया है कि घोड़े से अधिक सवारी को परेशानी उठानी पड़

    ये इक्के को कोई घोडा नही चलाता ना ही गधा वो तो जी खच्चर होता है..:)
    बाकी आज आप इन सूक्तियो का भी मजा ले
    “रहिमन ब्लोग बनाय के टिप्पणी पोस्ट कराये
    जिसको जितनी चाहिये कापी कर ले जाये”
    कबिरा ब्लोग टिपियाईये खुद का ग्रुप बनाये
    मेम्बर सूना ना रहे,ना पोस्ट ही सूनी जाये”

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