खोया पानी-1:क़िबला का परिचय

[“खोया पानी” यह है उस व्यंग्य उपन्यास का नाम जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ जी. पुस्तक क्या है हास्य का पटाख़ा है और इतना महीन व्य़ंग्य की आपके समझ आ जाये तो मुँह से सिर्फ वाह वाह ही निकलती है. इस उपन्यास की टैग लाइन है “एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास” जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.इसी उपन्यास को छोटे छोटे भागों में यहां पेश किया जा रहा है.]

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वो आदमी है मगर, देखने की ताब नहीं

मैने 1945 में जब क़िबला (माननीय) को पहले-पहल देखा तो उनका हुलिया ऐसा हो गया था जैसा अब मेरा है। लेकिन बात हमारे अलबेले दोस्त बिशारत अली फ़ारूक़ी के ससुर की है, इसलिये परिचय भी उन्हीं की ज़बान से ठीक रहेगा। हमने तो बहुत बार सुना, आप भी सुनिये:

‘वो हमेशा से मेरे कुछ न कुछ लगते थे। जिस ज़माने में मेरे ससुर नहीं बने थे तो फूफा हुआ करते थे और फूफा बनने से पहले मैं उन्हें चचा हुज़ूर कहा करता था। इससे पहले भी वो मेरे कुछ और ज़ुरूर लगते होंगे, मगर उस वक़्त मैंने बोलना शुरु नहीं किया था। हमारे यहाँ मुरादाबाद और कानपुर में रिश्ते-नाते उबली हुई सिवइयों की तरह उलझे और पेच-दर-पेच गुंथे हुए होते हैं।

ऐसा रौद्ररूप, इतने गुस्से वाला आदमी ज़िन्दगी में नहीं देखा। उनकी मृत्यु हुई तो मेरी उम्र, आधी इधर आधी उधर, चालीस के लगभग तो होगी, लेकिन साहब! जैसा आतंकित मैं उनकी आंखें देख कर छुटपन में होता था, वैसा ही न सिर्फ उनके आखरी दम तक रहा, बल्कि अपने आखरी दम तक भी रहूंगा। बड़ी-बड़ी आंखें अपने साकेट से निकली पड़ती थी-लाल, सुर्ख़, ऐसी-वैसी? बिल्कुल कबूतर का खून। लगता था, बड़ी-बड़ी पुतलियों के गिर्द लाल डोरों से अभी खून के फव्वारे छुटने लगेंगे और मेरा मुंह खूनम-खून हो जायेगा। हर वक़्त गुस्से में भरे रहते थे।जाने क्यों गाली उनका तकिया-कलाम थी और जो रंग बोलचाल का था, वही लिखाई का भी।

रख हाथ निकलता है धुआं मग़्जे -क़लम से’

ज़ाहिर है, कुछ ऐसे लोगों से भी पाला पड़ता था जिन्हें किसी कारण से गाली नहीं दे सकते थे। ऐसे अवसरों पर ज़बान से तो कुछ न कहते, लेकिन चेहरे पर ऐसा भाव लाते कि सर से पांव तक गाली नज़र आते। किसकी शामत आई थी कि उनकी किसी भी राय से असहमति व्यक्त करता। असहमति तो दर-किनार, अगर कोई व्यक्ति सिर्फ़ डर के मारे उनसे सहमत होता तो, अपनी राय बदल कर उल्टा उसके सर हो जाते।

अरे साहब! बातचीत तो बाद की बात है, कभी-कभी सिर्फ़ सलाम से भड़क उठते थे! आप कुछ भी कहे कैसी ही सच्ची और सामने की बात कहें, वो उसका खंडन ज़रूर करेंगे। किसी से सहमत होने में अपनी हेठी समझते थे। उनका हर वाक्य ‘नहीं’ से शुरू होता था। एक दिन कानपुर में कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। मेरे मुंह से निकल गया कि आज बड़ी सर्दी है। बोले ‘नहीं कल इससे ज़ियादा पड़ेगी।’

वो चचा से फूफा बने और फूफा से ससुर, लेकिन मेरी, आखरी वक़्त तक, निगाह उठा कर बात करने की हिम्मत न हुई। निकाह के वक़्त वो क़ाज़ी के पहलू में थे, क़ाज़ी ने मुझसे पूछा ‘क़ुबूल है?’ उनके सामने मुंह से ‘हां’ कहने का साहस न हुआ-अपनी ठोड़ी से दो ठोंगें-सी मार दीं, जिन्हें क़ाज़ी और क़िबला ने रिश्ते के लिये नाकाफी समझा। क़िबला कड़क कर बोले, ‘लौंडे! बोलता क्यों नहीं?’ डांट से मैं नर्वस हो गया। अभी क़ाज़ी का सवाल पूरा भी नहीं हुआ था कि मैंने ‘जी हां! क़ुबूल है’ कह दिया। आवाज़ एकदम इतने शोर से निकली कि मैं खुद चौंक पड़ा। क़ाज़ी उछल कर सेहरे में घुस गया, सब लोग खिलखिला कर हंसने लगे। अब क़िबला इस पर भिन्ना रहे हैं कि इतने शोर की ‘हां’ से बेटी वालों की हेठी होती है। बस तमाम-उम्र उनका यही हाल रहा, तमाम-उम्र मैं रिश्तेदारी के दर्द और निकटता में घिरा रहा।

हालांकि इकलौती बेटी, बल्कि इकलौती औलाद थी और बीबी को शादी के बड़े अरमान थे, लेकिन क़िबला ने ‘माइयों’ के दिन ठीक उस वक़्त, जब मेरा रंग निखारने के लिए उबटन मला जा रहा था, कहला भेजा कि दूल्हा मेरी मौजूदगी में अपना मुंह सेहरे से बाहर नहीं निकालेगा। दो सौ क़दम पहले सवारी से उतर जायेगा और पैदल चलकर अक़्दगाह (निकाह के स्थान) तक आयेगा। अक़्दगाह उन्होंने इस तरह कहा जैसे अपने फ़ैज़ साहब (शाइर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़) क़त्लगाह का ज़िक्र करते हैं और सच तो यह है कि उनका आतंक दिल में कुछ ऐसा बैठ गया था कि मुझे छपरखट भी फांसी-घाट लग रहा था। उन्होंने यह शर्त भी लगायी कि बराती पुलाव-ज़र्दा ठूंसने के बाद यह हरगिज़ नहीं कहेंगे कि गोश्त कम डाला और शक्कर ड्योढ़ी नहीं पड़ी। ख़ूब समझ लो, मेरी हवेली के सामने बैंड-बाजा हरगिज़ नहीं बजेगा और तुम्हें रंडी नचवानी है तो अपने कोठे पर नचवाओ।

किसी ज़माने में राजपूतों और अरबों में लड़की की पैदाइश अपशकुन और ख़ुदा के क्रोध की निशानी समझी जाती थी। उनका आत्माभिमान यह कैसे गवारा कर सकता था कि उनके घर बरात चढ़े। दामाद के ख़ौफ़ से वो लड़की को ज़िंदा गाड़ आते थे। क़िबला इस वहशियाना रस्म के ख़िलाफ़ थे। वो दामाद को ज़िंदा गाड़ देने के पक्ष में थे।

चेहरे, चाल और तेवर से शहर के कोतवाल लगते थे। कौन कह सकता था कि बांस मंडी में उनकी इमारती लकड़ी की एक मामूली-सी दुकान है। निकलता हुआ क़द। चलते तो क़द, सीना और आंखें, तीनों एक साथ निकाल कर चलते थे। अरे साहब क्या पूछते हैं, अव्वल तो उनके चेहरे की तरफ देखने की हिम्मत नहीं होती थी और कभी जी कड़ा करके देख भी लिया तो बस लाल-भभूका आंखें-ही-आंखें नज़र आती थीं.

निगहे-गर्म से इक आग टपकती है असद’

जारी….
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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

 

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

10 comments

  1. वाह! वाह!! वाह!!! अति सुंदर. सच मे अद्भुत हास्य समेटे है ये रचना.

  2. आप तो डरा रहे हैं जनाब..हमाए कानपुर के के कि़बला ऐसे खड़ूस..और फिर आप ये भी दम दे रहो कि पूरा छापोगे.. चलो देखते हैं कि आगे आगे होता है क्या..

  3. इतने भयानक-किस्म के व्यक्ति का इतनी बारीकी से वर्णन, वह भी व्यंग्य के अंदाज में। भई वाह, क्या खूब !

    और पढ़वाएं……

  4. बहुत मजा आ रहा है पढ़ने में …बहुत पुण्य का काम कर रहे है जी इसे यहां लिख कर…आप पूरा उपन्यास यहां लिखेंगे?…सहस्त्र नमन

  5. बहुत आनन्द आया मित्र. और अंश लाओ. 🙂 किताब तो खैर दिल्ली पहुँच कर बहुत सारी खरीदना है.

  6. हमने तो तुफैल साहेब से किताब माँगा ली आप ही के ब्लॉग से उनका नम्बर लेकर हमें नहीं मालूम था की आप इसे किस्तों मैं छपने वाले हैं. ये किताब ऐसी है जिसे घर मैं रख के रोज पाठ किया जाए.
    आप का ये प्रयास निसंदेह प्रशंशनिये है.
    नीरज

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