क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था

पिछ्ली पोस्ट में नीरज जी ने कहा. “किताब हर लिहाज़ से विलक्षण है. शब्द यहाँ जादू से जगाते लगते हैं…हैरानी होती है पढ़ के की इंसान के जेहन में ऐसे जुमले आ कहाँ से जाते हैं…ये किताब हर समझदार इंसान को पढ़नी चाहिए…”

संजीत जी बोले ” वाकई शानदार शब्द चित्र। अभी तक आपने इस किताब के जितने भी अंश उपलब्ध करवाए उन्हे पढ़कर तो यही कहा जा सकता है कि वाकई अद्भुत!!

अब आगे पढिये..

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दरिया के बहाव के विरुद्ध तैरने में तो खैर कोई नुक्स़ान नहीं, हमारा मतलब है दरिया का नुक्स़ान नहीं, लेकिन क़िबला तो सैकड़ों फ़ुट की ऊंचाई से गिरते हुए नियाग्रा फ़ॅाल पर तैर कर चढ़ना चाहते थे या यूं कहिये कि तमाम उम्र नीचे उतरने वाले एस्केलेटर से ऊपर चढ़ने की कोशिश करते रहे और एस्केलेटर बनाने वाले को गालियां देते रहे। एक दिन कहने लगे ”मियां यह तुम्हारा शहर भी अजीब शहर है। न खरीदारी की तमीज़, न छोटों के आदाब, न किसी के बड़प्पन का लिहाज़।मैं जिस ज़माने में बिशारत मियां के साथ बिहार कालोनी में रहता था, उस ज़मानेमें रेडियो में कार की बैटरी लगानी पड़ती थी। बिहार कालोनी में बिजली नहीं थी। उसका रखना और चलाना एक दर्दे-सर था। बिशारत मियां रोज़ाना बैटरी अपने कारखाने ले जाते और चार्ज होने के लिये आरा मशीन में लगा देते। सात आठ घंटे में इतनी चार्ज हो जाती थी कि बस एकाध घंटे बी. बी. सी. सुन लेता था। इसके बाद रेडियो से आरा मशीन की आवाजें आने लगतीं और मैं उठ कर चला आता। घर के पिछवाड़े एक पच्चीस फ़ुट ऊंची, निहायत क़ीमती, बेगांठ बल्ली गाड़ कर एरियल लगा रखा था। इसके बावजूद वो रेडियो ऊंचा सुनता था। आये दिन पतंग उड़ाने वाले लौंडे मेरे एरियल से पेच लड़ाते। मतलब यह कि उसमें पतंग उलझा कर ज़ोर आज़माई करते। डोर टूट जाती, एरियल खऱाब हो जाता। अरे साहब! एरियल क्या था, पतंगों का हवाई क़ब्रिस्तान था। उस पर यह कटी पतंगें चौबीस घंटे इस तरह फड़फड़ाती रहतीं जैसे सड़क के किनारे किसी नये मरे हुए पीर के मज़ार पर झंडियां। पच्चीस फ़ुट की ऊंचाई पर चढ़ कर एरियल दोबारा लगाना, न पूछिये कैसा कष्टदायक था। बस यूं समझिये! सूली पे लटक के बी. बी. सी. सुनता था। बहरहाल, जब बर्नस रोड वाले फ्रल़ैट में जाने लगा तो सोचा वहां तो बिजली है, चलो रेडियो बेचते चलें। बिशारत मियां भी तंग आ गये थे कहते थे, इससे तो पतंगों की पफड़पफड़ाहट ब्रॉडकास्ट होती रहती है। एक दूर के पड़ोसी से २५० रुपये में सौदा पक्का हो गया। सवेरे-सवेरे वो नक़द रक़म ले आया और मैंने रेडियो उसके हवाले कर दिया। रात को ग्यारह बजे फाटक बंद करने बाहर निकला तो क्या देखता हूं कि वो आदमी और उसके बैल जैसी गर्दन वाले दो बेटे कुदाल, फावड़ा लिये मज़े से एरियल की बल्ली उखाड़ रहे हैं। मैंने डपट कर पूछा, ये क्या हो रहा है? सीना ज़ोरी देखिये! कहते हैं बड़े मियां, बल्ली उखाड़ रहे हैं, हमारी है।

”ढाई सौ रुपये में रेडियो बेचा है, बल्ली से क्या मतलब?

मतलब नहीं तो हमारे साथ चलो और ज़रा बल्ली के बिना बजा के दिखा दो। यह तो इसकी Accessory है।“

”न हुआ कानपुर, साले की ज़ुबान गुद्दी से खींच लेता और इन हरामी पिल्लों की बैल जैसी गर्दन एक ही बार में भुट्टा-सी उड़ा देता। मैंने तो ज़िंदगी में ऐसा बेईमान आदमी नहीं देखा। इस दौरान वो कमीन बल्ली उखाड़ के ज़मीन पे लिटा चुका था। एक बार जी में आया कि अंदर जा कर १२ बोर ले आऊं और इसे भी बल्ली के बराबर लम्बा लिटा दूं, फ़िर ख्याल आया कि बंदूक़ का लाइसेंस तो समाप्त हो चुका है और कमीने के मुंह क्या लगना, इसकी बेकुसूर बीबी रांड हो जायेगी। वो ज़ियादा क़ानून छांटने लगा तो मैंने कहा, जा जा, तू क्या समझता है? बल्ली की हक़ीक़त क्या है, ये देख, ये छोड़ के आये हैं।“

क़िबला हवेली की तस्वीर दिखाते ही रह गये और वो तीनों बल्ली उठा कर ले गये।

जारी………………   [अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]    

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. खोया पानी: ओलती की टपाटप

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किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

4 comments

  1. एक्सेसरी के कांसेप्ट पर किबला लद गये। इसी कांसेप्ट से बिग बाजार वाले (एक के साथ एक फ्री की तकनीक से) फल फूल रहे हैं।
    पर किबला मस्त चीज हैं!

  2. अमां काश ये किबला आज के जमाने में अपने आसपास मिलते कहीं तो कसम से मज्ज्ज्जा आ जाता 😉

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