मूलगंज: तवायफों का जिक्र

हकीम अहसानुल्लाह ‘तस्लीम’ का दावा था कि उन्होंने इमामत, हकीमी और शायरी बुजुर्गों से पाई है। गर्व से कहते थे कि उनके दादा हकीम अहतिशाम हुसैन राना की क़न्नौज में इतनी बड़ी जमींदारी थी कि एक नक़्शे में नहीं आती थी। अब नक़्शे उनके क़ब्जे में और जमींदारी महाजन के क़ब्जे में थी।हकीम साहब के पास एक ऐसा ख़ानदानी नुस्ख़ा था कि शर्तिया लड़की पैदा होती। यह एक भस्म थी जो तवायफ़ उस रात के राजा या विशेष अतिथि को चुपके से पान में डाल कर खिला देती। इस नुस्ख़े के ठीक होने की प्रसिद्धि इस क़दर थी कि कानपुर में किसी गृहस्थ के भी लड़की पैदा होती तो वो मियां के सर हो जाती हो न हो तुम वहीं से पान खा कर आये थे। तवायफ़ कितनी भी हसीन हो उनकी नीयत सिर्फ़ उसके पैसे पर बिगड़ती थी। तवायफ़ें उनसे बड़ी आस्था और श्रद्धा रखती थीं। कहने वाले तो यहां तक कहते थे कि उनके मरने का बड़ी बेचैनी से इंतजार कर रही हैं ताकि संगे-मरमर का मजार बनवायें और हर साल धूमधाम से उर्स मनायें।

मूलगंज का जिक्र ऊपर की पंक्तियों और कानपुर से संबंधित दूसरे चित्रों में जगह-जगह बल्कि जगह-बेजगह आया है। इस मुहल्ले में तवायफें रहती थी। ये विशारत का पसंदीदा विषय है,जिससे हमारे पाठक पूरी तरह से परिचित हो चुके होंगे।हांलाकि बिना संदेह के वे दूसरे ग्रुप के आदमी हैं।

बाजार से गुजरा हूँ खरीददार नहीं हूँ

जैसे कई एलर्जिक कारणों से लोगों की पित्ती उछ्ल जाती है. उसी तरह उनकी बातचीत में तवायफ …अवसर देखे न जगह …छ्न से आन खड़ी होती थी।संयमी हैं, कभी के नाना-दादा बन गये , मगर तवायफ़ है कि किसी तरह से उनके सिस्टम से निकलने के लिये राज़ी ही नहीं होती। एक बार हमने आड़े हाथों लिया। हमने कहा , हज़रत! पुरानी कहानियों में हीरो की और राक्षस की जान किसी तोते में अटकी होती है। कहने लगे, मेरी कहानी में मिट्टी डालिये। ये देखिये कि आजकल की फ़िक्शन और फ़िल्मों में हीरो और हीरोईन से कौन से धर्मग्रंथ पढ़्वाये जा रहे हैं।जिस सोच के मुताबिक पहले तवायफ़ कहानी में डाली जाती थी, अब इस काम के लिये शरीफ़ घराने की बहू-बेटियों को तकलीफ़ दी जाती है। पढ़ने वाले और फ़िल्म देखने वाले आह भी तवायफ़ को उस तरह उचक लेते हैं जैसे मरीज हकीमों के नुस्ख़े में से मुनक्क़ा।

और विशारत कुछ ग़लत नहीं कहते थे। शायद आज उस मनस्थिति का अन्दाजा करना मुश्किल हो लेकिन तवायफ़ उस डगमग़ाते हुए समाज के सम्पन्न वर्ग की इन्द्रियों पर वर्जित सुख की तरह छायी हुई थी, और ये कुछ उस दौर से ही संबंधित नहीं।औरंगजेब के बारे में मशहूर है कि उसने दुनिया के सबसे पुराने पेशे को समाप्त करने के लिये एक फ़रमान जारी किया था कि एक निश्चित तारीख़ तक सारी तवायफ़ें शादी कर लें , वरना उन सबको नाव में भरकर यमुना में डुबो दिया जायेगा। अधिकतर तवायफ़ें डूबने को हांडी-चूल्हे पर और मगरमच्छ के जबड़े को ऐसे लफंगों पर प्रमुखता देती थीं जो प्यार भी करते थे तो इबादत की तरह , यानी बड़ी पाबंदी के साथ और पूरी बेदिली के साथ। बहुत से तवायफ़ों ने इस धन्धे से तौबा कर ली और निकाह कर लिये।

हो चुकीं ग़ालिब बलायें सब तमाम

एक  अक़्दे-नागहानी      और      है

अब ज़रा इसके दौ सौ बरस बाद की एक झलक ‘तज़किरा-ए-ग़ौसिया’ में मुलाहिज़ा फ़रमायें। इसके लेखक मौलवी महम्मद एस्माईल मेरठी अपने श्रद्धास्पद पीरो-मुर्शिद (गुरु) के बारे में एक घटना लिखते हैं “ एक रोज आदेश हुआ , कि जब हम दिल्ली की मस्जिद में ठहरे हुए थे, हमारे दोस्त कम्बलपोश ने हमारी दावत की। शाम की नमाज़ के बाद हमको लेकर चले। चांदनी चौक में पहुंच एक तवायफ़ के कोठे पएअ हमको बैठा दिया और आप चंपत हो गये। पहले तो हमने सोचा कि खाना इसी जगह पकवाया होगा, मगर मालूम हुआ कि यूं ही बिठा कर चल दिया है। हम बहुत घबराये भला ऐसी जगह कमबख़्त क्यों लाया। दो घड़ी बाद हँसता हुआ आया और कहने लगा मियां साहब! मैं आपकी भड़क मिटाने यहां बैठा गया था।बाद में अपने घर ले गया और खाना खिलाया।

यद रहे कि कम्बलपोश एक आजाद और मनमौजी आदमी था, ये घटना उस समय की है जब गुरु की सोहबत में उनका दिल बदल चुका था। सोचिये , जिसकी पतझड़ का ये रंग हो उसकी बहार कैसी रही होगी।

जोश जैसा शब्दों का जादूगर , ख़ानदानी , सुरुचि सम्पन्न और नफ़ासत पसंद शायर जब जीवन के स्वर्ग और असीमित सुख की तसवीर खींचता है तो देखिये इसका क़लम क्या गुल खिलाता है

“ कूल्हे पे हाथ रखकर थिरकने लगी हयात “

कूल्हे पे हाथ रखकर थिरकने में कोई हरज नहीं , बशर्ते कूल्हा अपना ही हो। दूसरे, थिरकना पेशेवर काम हो शौक़िया ना हो। मतलब ये कि कोई कूल्हे पे हाथ रख के थिरकने लगे तो किसी को क्या एतराज हो सकता है , मगर इससे जात पहचानी जाती है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से

पहला भाग

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

6 comments

  1. अंमा मिया मुशायरे की बत चल रही थी ,आपतो सबको कोठे पर ही बैठा कर निकल लिये ,अब बुला ही लिया है तो जरा दो चार मुजरे ही हो जाय ,बहुत दिन हुये दादरा टप्पा सुने हुये ,मुशायरे मे फ़िर किसी और रोज चलेगे जी 🙂

  2. अब पंगेबाज जी की बात का विरोध तो अपन कर नई सकते समर्थन लपक के कर देते हैं 😉

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