वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है

[ कोठे की कहानियां तो अभी आनी बांकी हैं.एक से बढ़कर एक कहानियां हैं जो आप आगे के हिस्सों में पढेंगे.अभी तो हम हवेली में ही अटके हुए हैं. किबला को अपनी हवेली से कितना प्यार था कि वो अपनी हवेली को महल से कम नहीं समझते थे. किबला की बहादुरी का परिचय भी आप देख चुके हैं कि कैसे उन्होने अपनी सलीम शाही जूती की छाप से कराची में एक घर हथियाया था. किबला की हवेली के और भी कई हिस्से हैं जो उन्हें मुँह-जबानी याद हैं. युसूफी साहब ने “खोया पानी” में किबला के द्वारा इस हवेली की यादों से बखूबी जोड़ा है. आइये आनन्द लें.  ] 

===========================================  

वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है

हवेली के मुख्य दरवाज़े से कुछ क़दम के फासले पर जहां फ़ोटो में घूरे पर एक काला मुर्गा गर्दन फुलाये अज़ान दे रहा था, वहां एक टूटे चबूतरे के चिह्न नज़र आ रहे थे। उसके पत्थरों के जोड़ों और झिरियों में से पौधे रोशनी की तलाश में घबरा कर बाहर निकल रहे थे। एक दिन उस चबूतरे की ओर संकेत कर कहने लगे कि यहां साफ़ पानी से भरा हुआ पत्थर का आठ कोण वाला हौज़ हुआ करता था, जिसमें विलायती गोल्डफ़िश तैरती रहती थीं। आरिफ़ मियां उसमें पायनियर अखबार की किश्तियां तैराया करते थे। यह कहते-कहते क़िबला जोश में अपनी छड़ी लेकर उठ खड़े हुए। उससे फटी हुई दरी पर हौज़ का नक़्शा खींचने लगे। एक जगह काल्पनिक लकीर कुछ टेढ़ी खिंची तो उसे पैर से रगड़ कर मिटाया। छड़ी की नोक से शैतान मछली की तरफ़ इशारा किया जो सबसे लड़ती फ़िरती थी। फ़िर एक कोने में उस मछली की ओर भी इशारा किया जिसका जी निढाल था। उन्होंने खुल कर तो नहीं कहा कि आखिर हम उनके छोटे थे, लेकिन हम समझ गये कि इस मछली का जी खट्टी चीजें और सोंधी मिट्टी खाने को चाह रहा होगा।

क़िबला कभी तरंग में आते तो अपने इकलौते बेतकल्लुफ़ दोस्त रईस अहमद क़िदवाई से कहते कि जवानी में मई-जून की ठीक दुपहरिया में एक हसीन कुंवारी लड़की का कोठों-कोठों नंगे पांव उनकी हवेली की तपती छत पर आना अब तक (मय डायलाग के) याद है। यह बात मिर्ज़ा की समझ में आज तक न आयी। इसलिये कि उनकी हवेली तीन मन्जिला थी। जबकि दायें-बायें पड़ोस के दोनों मकान एक-एक मंज़िल के थे। हसीन कुंवारी अगर नंगे पैर हो और लाज का गहना उतारने के लिये उतावली भी हो, तब भी यह करतब संभव नहीं (जब तक कि हसीना उनके इश्क में दो टुकड़ों में न बंट जाये। )

पिलखन

फ़ोटो में हवेली के सामने एक ऊंची-घनी पिलखन उदास खड़ी थी। इसका बीज उनके परदादा काली टांगों वाले भूरे घोड़े पर सवार, कारचोबी काम के चोग़े में छुपा कर अकाल के ज़माने में दमिश्क से लाये थे। क़िबला के कहे अनुसार उनके परदादा के अब्बा जान कहा करते थे कि निर्धनता के आलम में यह नंगे-खलाइक, नंगे-असलाफ़, नंगे-वतन (लोगों, बुजुर्गों और देश के लिये अपमान का कारण) नंगे सर, नंगे पैर, घोड़े की नंगी पीठ पर, नंगी तलवार हाथ में लिये, खैबर के नंगे पहाड़ों को फलांगता हिन्दुस्तान आया। जो चित्र वो खींचते थे, उससे तो यही लगता था कि उस समय क़िबला के बुज़ुर्ग के पास बदन ढंकने के लिये घोड़े की दुम के सिवा और कुछ न था। जायदाद, महलसरा, नौकर-चाकर, सामान, रुपया पैसा सब कुछ वहीं छोड़ आये, परन्तु सामान का सबसे क़ीमती हिस्सा यानी वंशावली और पिलखन का बीज साथ ले आये। घोड़ा जो उन्हीं की तरह ख़ानदानी और वतन से बेज़ार था, बीज और वंशावली के बोझ से रानों-तले निकला पड़ रहा था।

ज़िन्दगी की धूप जब कड़ी हुई और पैरों-तले से ज़मीन-जायदाद निकल गयी तो आइन्दा नस्लों ने उसी वृक्ष और वंशावली की छांव-तले विश्राम किया। क़िबला को अपने पुरखों की बुद्धि और समझ पर बड़ा मान था। उनका प्रत्येक पुरखा अदभुत था और उनकी वंशावली की हर शाख पर एक जीनियस बैठा ऊंघ रहा था। क़िबला ने एक फ़ोटो उस पिलखन के नीचे ठीक उस जगह खड़े हो कर खिंचवाया था, जहां उनकी नाल गड़ी थी। कहते थे कि अगर किसी को मेरी हवेली की मिल्कियत में शक हो तो नाल निकाल कर देख ले। जब आदमी को यह न मालूम हो कि उसकी नाल कहां गड़ी है और पुरखों की हडि्डयां कहां दफ्न हैं, तो वो मनीप्लांट की तरह हो जाता है, जो मिट्टी के बग़ैर सिर्फ बोतलों में फलता-फूलता है। अपनी नाल, पुरखों और पिलखन का ज़िक्र इतने गर्व के साथ और इतना अधिक करते-करते हाल यह हुआ कि पिलखन की जड़ें वंशावली में उतर आयीं, जैसे घुटनों में पानी उतर आता है।

जारी………………

===========================================

पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी

===========================================

khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

4 comments

  1. इतनी किश्तें पढ़ने के बाद कहा जा सकता है कि वाकई अद्भुत व्यंग्य उपन्यास है।

    शुक्रिया

  2. भैया, यह बताना कि यूसुफी जी ने यह लिखने में कितना समय लिया था। हमें तो इस छाप का सोचने में इतना समय लगे कि उम्र निकल जाये!

Leave a comment

Your email address will not be published.