इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक

[ “खोया पानी” उस व्यंग्य उपन्यास का नाम है जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ जी.  इस उपन्यास की टैग लाइन है “एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास” जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.इसी उपन्यास को छोटे छोटे भागों में यहां पेश किया जा रहा है. यदि आपने पहले की कडियाँ ना पढ़ी हों तो आपने बहुत कुछ मिस कर दिया. आप चाहें तो पढ़ सकते हैं. अब और आगे पढिये]

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इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक

वो ज़माने और शराफ़त के ढ़ंग और थे। जब तक बुजुर्ग अस्ली इम्पोर्टिड यानी मध्य एशिया और खैबर के उस पार से आये हुए न हों, कोई हिन्दुस्तानी मुसलमान खुद को इज्जतदार और शरीफ़ नहीं कहता था। ग़ालिब को तो शेखी बघारने के लिए अपना (फ़र्ज़ी) उस्ताद मुल्ला अब्दुस्समद तक ईरान से इम्पोर्ट करना पड़ा। क़िबला के बुज़ुर्गों ने जब बेरोजगारी और ग़रीबी से तंग आकर वतन छोड़ा तो आंखें नम और दिल पिघले हुए थे। बार-बार अफ़सोस में अपना हाथ घोड़े की रान पर मारते और एक-दूसरे की दाढ़ी पर हाथ फेर के तौबा-तौबा कहते। यह नये आने वाले, जिससे भी मिले अपने आचरण से उसका दिल जीत लिया।

पहले ज़ां फ़िर जाने-ज़ां फ़िर जाने-जाना हो गये

फ़िर यही प्यारे लोग आहिस्ता-आहिस्ता पहले खां, फ़िर ख़ाने-खां, फ़िर ख़ाने-ख़ाना हो गये।

हवेली के आर्किटेक्चर की भांति क़िबला के रोग भी राजसी होते थे। बचपन में दायें गाल पर शायद आमों की फ़स्ल में फुन्सी निकली थी, जिसका दाग़ अभी तक बाक़ी था। कहते थे, जिस साल मेरे यह औरंगशेबी पफोड़ा निकला, उसी साल बल्कि उसी हफ्ते महारानी विक्टोरिया रांड हुई। साठ के पेटे में आये तो शाहजहानी ‘हब्से-बोल’ (पेशाब का बंद हो जाना) में गिरफ्तार हो गये। फ़र्माते थे कि ग़ालिब मुग़ल-बच्चा था। सितम-पेशा डोमनी को अपने इश्क के जहर से मार डाला मगर खुद इसी, यानी मेरी-वाली बीमारी में मरा। एक खत में लिखता है कि घूंट-घूंट पीता हूं और कतरा- कतरा बाहर निकालता हूं। दमे का दौरा जरा थमता तो बड़े गर्व से कहते कि फ़ैज़ी को यही रोग था। उसने एक जगह कहा है कि दो आलम मेरे सीने में समा गये, मगर आधा सांस किसी तौर नहीं समा रहा। अपने स्वर्गवासी पिता के बारे में बताते थे कि राज-रोग यानी अकबरी संग्रहणी में इंतक़ाल फ़र्माया। मतलब इससे, आंतों की टी.बी. था। मरज़ तो मरज़, नाक तक अपनी नहीं थी-यूनानी बताते थे।

मुर्दा अज ग़ै़ब बरूं आयदो-कारे-बकुनद’

(मुर्दा परोक्ष से आया और काम कर गया)

क़िबला को दो ग़म थे। पहले ग़म का बयान बाद में आयेगा। दूसरा ग़म दरअस्ल इतना उनका अपना नहीं जितना बीबी का था, वो बेटे की इच्छा में घुल रही थीं। उस ग़रीब ने बड़ी मन्नतें मानीं, शर्बत में नक़्श (क़ुरआन की आयतें लिखे पर्चे) घोल-घोल कर पिलाये। उनके तकिये के नीचे तावीज़ रखे। छुप-छुप कर मज़ारों पर चादरें चढ़ाई। हमारे यहां जब जीवित लोगों से मायूस हो जाते हैं तो बस यही आस बाक़ी रह जाती है। पचास मील के दायरे में कोई मज़ार ऐसा न बचा जिसके सिरहाने खड़े होकर वो इस तरह फूट-फूट कर न रोयी हों कि कब्र-वाले के रिश्तेदार भी दफ्न करते समय क्या रोये होंगे। उस ज़माने में कब्र के अन्दर वाले चमत्कारी हों या न हों, कम-से-कम कब्र के भीतर अवश्य होते थे। आजकल जैसा हाल नहीं था कि मज़ार अगर मैयत से ख़ाली है तो ग़नीमत जानिये, वरना अल्लाह जाने अंदर क्या दफ्न है, जिसका इस धूम-धाम से उर्स मनाया जा रहा है। खैर यह तो एक वाक्य था जो रवानी में फैल कर पूरा पैरा बन गया। निवेदन यह करना था कि क़िबला खुद को किसी सिद्ध पुरुष से कम नहीं समझते थे। उन्हें जब यह पता चला कि बीबी लड़के की मन्नत मांगने चोरी-छुपे नामहरमों (जिनके साथ निकाह जायज़ हो) के मज़ारों पर जाने लगी है, तो बहुत नाराज हुए। वो जब बहुत नाराज होते तो खाना छोड़ देते थे। हलवाई की दुकान से रबड़ी, मोती-चूर के लड्डू और कचौरी लाकर खा लेते। दूसरे दिन बीबी कासनी रंग का दुपट्टा ओढ़ लेतीं और उनकी पसंद के खाने यानी दोप्याशा, डेढ़गुनी शक्कर वाला ज़र्दा, बहुत तेज मिर्च के उड़द के दही-बड़े खिला कर उन्हें मना लेतीं। क़िबला इन्हीं खानों पर अपने ईरानी और अरबी नस्ल के पुरखों की नियाज़ दिलवाते (श्राद्ध करते), लेकिन उनके दही-बड़ों में मिर्च बस नाम को डलवाते।

मज़ारों पर जाने पर पाबंदी लगी। बीबी बहुत रोयीं-धोयीं तो क़िबला कुछ पिघले। मज़ारों पर जाने की इजाजत दे दी, लेकिन इस शर्त पर कि मज़ार में रहने वाला जाति का कम्बोह न हो। कम्बोह मर्द और ग़ज़ल के शायर से पर्दा ज़ुरूरी है चाहे वो मुर्दा ही क्यों न हो। ‘मैं इनकी रग-रग पहचानता हूं।’ उनके दुश्मनों का कहना है कि क़िबला खुद भी जवानी में शायर और ननिहाल की ओर से कम्बोह थे। अक्सर कहते कि कम्बोह के मरने पर तो जश्न मनाना चाहिये।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

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By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

6 comments

  1. चलिए पढ़ते हैं। वैसे मेरे शहर में तो कादंबिनी तक नहीं मिलती, यह क्या मिलेगी। दिल्ली से ही मँगवानी होगी।

  2. वो जब बहुत नाराज होते तो खाना छोड़ देते थे। हलवाई की दुकान से रबड़ी, मोती-चूर के लड्डू और कचौरी लाकर खा लेते।
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    यह विचार जमा – नाराज रहना प्रारम्भ करें और माल उड़ा कर सेहत बनायें। बन्धु जब भी हम आपसे मिलेंगे, नाराज ही मिलेंगे – यह ध्यान रखियेगा! 🙂

  3. प्रिय काकेश, आज 3 हफ्ते बाद वापस घरू-दफ्तर पहुंचा. मेरी प्रार्थना है कि ईश्वर आपको एक अनुग्रह से भरा त्यौहार एवं हर चीज से भरापूरा एक नया साल प्रदान करें

    इस उपन्यास के लिये आभार. अब समय मिला है आरंभ से पढने के लिये. वही करेंगे — शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
    इस काम के लिये मेरा और आपका योगदान कितना है?

  4. वाह!ज़रूर कोई बेशकीमती किताब होगी यह.काकेश जी इसके बारे में बताने का बहुत-बहुत शुक्रिया.वैसे इस लेख के कुछ हिस्से तो वाकई कमाल हैं.

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