अलाहदीन अष्टम

अलाहदीन अष्टम

उनके रोग न केवल बहुत से थे, बल्कि बहुत बढ़े हुए भी थे। इनमें सबसे खतरनाक रोग बुढ़ापा था। उनका एक दामाद विलायत से सर्जरी में नया-नया एफ़आर. सी.एस. करके आया था। उसने अपनी ससुराल में किसी का एपेंडिक्स बाक़ी नहीं छोड़ा। किसी की आंख में भी तकलीफ़ होती तो उसका एपेंडिक्स निकाल देता था। आश्चर्य इस पर होता कि आंख की तकलीफ़ जाती रहती। हालांकि वो सारीउम्र पेट के दर्द से परेशान रहे लेकिन अपने पेट पर हाथ रखकर सौगंध उठा कर कहते थे कि मैंने आज तक किसी डॉक्टर को अपने एपेंडिक्स पर हाथ नहीं डालने दिया। लंबे समय से बिस्तर पर पड़े थे लेकिन उनकी लाचारी अभी अपूर्ण थी। मतलब यह कि सहारे से चल-फिर सकते थे।

उन्होंने उद्घाटन इस प्रकार किया कि अपने कमरे के दरवाजे, जिससे निकले उन्हें कई महीने हो गये थे, एक लाल-रिबन बांध कर अपने डांवाडोल हाथ से कैंची से काटा। ताली बजाने वाले बच्चों में लड्डू बांटने के बाद शुक्राने (धन्यवाद) की नमाज अदा की। फिर घोड़े को अपने हाथ से गेंदे का हार पहनाया, उसके माथे पर एक बड़ी-सी भौंरी थी। केसर में उंगली डुबोकर उस पर ‘अल्लाह’ लिखा और कुछ पढ़कर फूंक मारी। चारों सुमों और दोनों पहियों पर शगुन के लिये सिंदूर लगाकर दुआ दी कि जीते रहो, सदा सरपट चलते रहो। रहीमबख़्श कोचवान का मुंह खुलवा कर उसमें पूरा लड्डू फ़िट किया। ख़ुद चांदी के वरक़ में लिपटा हुआ पान कल्ले में दबाया। पुरानी कश्मीरी शाल ओढ़-लपेट कर तांगे की पिछली सीट पर बैठे और अगली सीट पर अपना बीस साल पुराना हार्मोनियम रखवा कर उसकी मरम्मत कराने मास्टर बाक़र अली की दुकान रवाना हो गये।

घोड़े का नाम बदल कर उन्होंने बलबन रखा। कोचवान से कहा, हमें तुम्हारा नाम रहीमबख़्श बिल्कुल पसंद नहीं। तुम्हें अलादीन कह कर पुकारेंगे। जब से उनकी याददाश्त ख़राब हुई थी वो हर नौकर को अलादीन कह कर बुलाते थे। यह अलादीन-अष्टम था। इससे पहले वाला अलादीन सप्तम कई बच्चों का बाप था। हुक़्के के तम्बाक़ू और रोटियों की चोरी में निकाला गया। गरम रोटियां पेट पर बांध कर ले जा रहा था, चाल से पकड़ा गया। मान्यवर इस अलादीन अर्थात रहीमबख़्श को आमतौर से अलादीन ही कहते थे। हां, यदि कोई ख़ास काम जैसे पैर दबवाने हों या बेवक़्त चिलम भरवानी हो या महज प्यार जताना हो तो अलादीन मियां कहकर बुलाते। परन्तु गाली देना हो तो अस्ल नाम लेकर गाली देते थे।

हाफ़ मास्ट चाबुक़

दूसरे दिन से तांगा सुब्ह बच्चों को स्कूल ले जाने लगा। उसके बाद बिशारत को दुकान छोड़ने जाता। तीन दिन यही नियम रहा। चौथे दिन कोचवान बच्चों को स्कूल छोड़कर वापस आया तो बहुत परेशान दिखायी पड़ा। घोड़ा फाटक से बांध कर सीधा बिशारत के पास आया। हाथ में चाबुक़ ऐसे उठा रखा था जैसे पुराने समय में ध्वजवाहक युद्धध्वज लेकर चलता था, बल्कि यूं कहना चाहिये, जिस प्रकार न्यूयार्क की स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी ने अपने हाथ को आखिरी सेंटीमीटर तक ऊंचा करवा कर आजादी की मशाल बुलंद कर रखी है। आगे चलकर मालूम हुआ कि कोई बिजोग पड़ जाये या अशुभ समाचार सुनाना हो तो वो इसी प्रकार चाबुक़ का झंडा ऊंचा किये आता था। चाबुक़ को सीधी हालत में देख बिशारत ऐसे व्याकुल होते, जैसे हेमलेट घोस्ट देखकर होता था।

Here it cometh , my lord

बिशारत के निकट आकर उसने चाबुक़ को हाफ़-मास्ट किया और पंद्रह रुपये मांगे। कहने लगा ‘स्कूल की गली के नुक़्क़ड़ पे अचानक चालान हो गया। घोड़े के बायें पैर में लंगड़ापन है! स्कूल से निकला ही था कि अत्याचार वालों ने धर लिया। बड़ी मिन्नतों से पंद्रह रुपये देकर घोड़ा छुड़ाया है वरना उसके साथ सरकार भी बेफ़िजूल खिंचे-खिंचे फिरते। मेरी आंखों के सामने ‘‘अत्याचार’’ वाले एक गधागाड़ी के मालिक को चाबुक़ से मारते हुए हंकाल के थाने ले गये। उसके गधे का लंग तो अपने घोड़े के मुक़ाबले कुछ भी नहीं ‘‘कोचवान ने गधे के लंग की बात इतने मामूली ढंग से कही और अपने घोड़े का लंग इतना बढ़ा-चढ़ा कर बयान किया कि बिशारत ने क्रोध से कांपते हाथ से पंद्रह रुपये देकर उसे चुप किया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से ” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये

पहला और दूसरा भाग

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

11 comments

  1. ये मलाल बढ़ते जाता है की बीच की कई कडियाँ छुट गई है.
    समय मिलाने पर जरुर पढूंगा.
    लेकिन अगर आप किताब भिजवा दो तो क्या बात है. 🙂

  2. वाह जी वाह बिल्कुल मस्त कर दिया है इसकी भाषा ने …….जबरदस्त …..अगली कड़ी के इंतज़ार मे

  3. मज़ा आ गया यह पढ़ के तो।
    अपनी ससुराल में किसी का एपेंडिक्स बाक़ी नहीं छोड़ा। किसी की आंख में भी तकलीफ़ होती तो उसका एपेंडिक्स निकाल देता था।

    🙂
    परन्तु गाली देना हो तो अस्ल नाम लेकर गाली देते थे।
    🙂

    चारों सुमों
    सुमों यानी?

    हंकाल
    यानी?

    हुक़्का – में नुक्ता लगता है?

    जानकारी बढ़ाने के लिए अग्रिम धन्यवाद, चलते चलते यह भी बता दें कि नुक्ता में नुक्ता होता है कि नहीं तो और कृपा होगी।

    लिख दिया, अब वहीं क्लिक कर रहा हूँ 🙂

  4. आपने भूलने की बीमारी का सस्ता इलाज बता दिया। बहुत धन्यवाद। अब जिसका नाम भूलेंगे, उसे अलादीन बोल दिया करेंगे!

  5. ऐसा वर्णन, ऐसी भाषा….जबरदस्त.
    आप बाल किशन को उपन्यास भेज दीजिये. मैं जेरोक्स करवा लूंगा….:-)

  6. आलोक 9-2-11 उवाच

    चारों सुमों
    सुमों यानी?

    हंकाल
    यानी?

    आलोक जी शाब्दिक अर्थ तो नहीं मालूम. लेकिन सुमों तांगे का कोई हिस्सा होता है शायद.

    हंकाल : खींच के बाहर करना या ले जाना.

    मुक्तिबोध की एक कविता है.

    मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!!
    लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
    जन-मन-करुणा-सी माँ को हंकाल दिया,
    स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया

    किसी को इन दो शब्दों के सही अर्थ पता हों तो अवश्य बतायें.

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