‘लफ़्ज़’,तुफैल जी और ‘खोया पानी’

कुछ दिनों पहले मैने आपके सामने “खोया-पानी” नामक व्यंग्य उपन्यास का जिक्र किया था. फुरसतिया जी ने बताया कि यह उपन्यास उन्होने भी मँगवा लिया है. उन्होने इसे नैट पर डालने की इच्छा भी जताई. जब से मैने इस उपन्यास को पढ़ना शुरु किया है तब से मेरी भी यही इच्छा थी.मुझे आप सबको यह बताते हुए खुशी है इस पुस्तक के अनुवादक श्री तुफ़ैल चतुर्वेदी से मेरा पत्राचार हुआ था और उन्होने मुझे इसे नैट पर डालने की अनुमति दे दी है (कुछ शर्तों के साथ).शीघ्र ही मैं इसे आपके सामने पेश करुंगा.ताकि आप सभी इस अदभुत व्यंग्य उपन्यास को पढ़ सकें.

आपको एक जानकारी और देता चलूँ. तुफ़ैल चतुर्वेदी जो विनय कृष्ण चतुर्वेदी के नाम से भी जाने जाते हैं हिन्दी व्यंग्य और ग़ज़लों की एक पत्रिका निकालते हैं जिसका नाम है “लफ़्ज़”.

lafz2 यह पत्रिका हास्य व्यंग्य , ग़ज़लों कविताओं की एक त्रैमासिक पत्रिका है. इसी पत्रिका के अंक एक से बारह में मुस्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब की किताब ‘आबे गुम’ का अनुवाद छ्पा था. मुस्ताक साहब का ही दूसरा उपन्यास “ज़रगुज़िस्त’ , “धनयात्रा” के नाम से लफ्ज़ के अंक तेरह से धारावाहिक रूप से छ्प रहा है.ये दोनों उपन्यास पहली बार लफ़्ज़ के माध्यम से ही हिन्दी पाठकों के बीच अनुदित और चर्चित हुए. इसके अलावा लफ्ज़ में नये और पुराने व्यंग्य नियमित रूप से छ्पते रहते हैं.

लफ्ज़ समकालीन गज़लों की एक प्रतिनिधि पत्रिका है. इसमें आप ताजा तरीन और पूरी तरह ग़ज़ल के पैमाने पर कसी अच्छी अच्छी ग़ज़लों का आनन्द ले पायेंगे. 

तुफैल जी के अनुसार इस पत्रिका का स्थायी कोष बनाया गया है। इसमें आप संरक्षक अथवा आजीवन सदस्य बनकर अपना योगदान दे सकते हैं। आजीवन सदस्यता 1100 रुपये में तथा संरक्षक सदस्यता 5000 रुपये देकर प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार तीन वर्ष का अनुबंध डाक व्यय सहित 300 रुपये में होगा। विदेशों से आजीवन सदस्यता 250 डॉलर तथा संरक्षक सदस्यता 1000 डॉलर देकर प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार 3 वर्ष का अनुबंध डाक व्यय सहित 100 डॉलर में होगा।  अपनी धनराशि आप संपादक के पते पर मनीऑर्डर या ड्राफ्ट द्वारा `लफ़्ज´के नाम जो नोएडा अथवा दिल्ली में देय हो भेजा सकते है।

मुख्य संपादक
विनय कृष्ण चतुर्वेदी
(तुफ़ैल चतुर्वेदी)
फ़ोन : +91-9810387857

निवास व पत्र व्यवहार का पता
पी- 12 नर्मदा मार्ग, सेक्टर- 11,
नोएडा – 201301

मैने तो यह पत्रिका तीन साल के लिये मँगा ली है.आप भी चाहें तो मँगा लें.

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

8 comments

  1. जानकारी के लिए धन्यवाद. जल्द तुफैल जी से सम्पर्क करके मैं भी मंगवाने की व्यवस्था करूंगा.

  2. बधाई -खोया पानी को नैट पर डालने की अनुमति प्राप्त करने पर. संपर्क स्थापित करता हूँ पत्रिका प्राप्त करने के लिये.

  3. बहुत अच्छा विचार है। आशा है कि जल्द ही खोया-पानी नेट पर दिखेगा। लफ़्ज पत्रिका तो हम नियमित लेते हैं अब! सदस्य भी बन जातें हैं। 🙂

  4. काकेश भाई
    तुमने पुकारा और हम चले आए….और देखिये न आते ही फायदा हो गया, आप ने ग़ज़लों की पत्रिका का पता दे दिया, अंधे को क्या चाहिए दो आँखें…हमने फ़ैसला कर लिया है की आप के ब्लॉग का एक चक्कर तो दिन मैं लगना ही है… अब चाहे सर फूटे या माथा…
    नीरज

  5. kya aapki web k liye gzl bheji ja skti hn agar han to kis font me m lfz ka aazivn sdsya hun khoyapani bhi padhi wakyee khoobsoorat kitab h hasy vyang k sath sath marmikta bhi km nhin is me page 164 “ek aar-par jhuggi me jisme n kmren hn n diwaren n darwaje jis me awaz tees aur soch tak nangi hjahan log shayad shayad ek dusere ka sapna bhi dekh skten hn.” kya is jumle me dard ki tasveer vyang k tadke k sath nhin proosi gayee h aur nafasat k sath.

    (श्याम जी: धन्य्वाद. आप अपनी ग़जल भेज सकते हैं. हो सके तो युनिकोड में भेजें.नहीं तो शुषा या क्रुतिदेव में भी भेज सकते हैं.)

  6. खोया पानी के धारावाहिक तौर पर ‘लफ्ज़’ में छपने के सालों में ‘लफ्ज़’ के गद्य-खंड का मैं सम्पादक रहा… अनुवाद के एक-एक लफ्ज़ पर अपनी भाषा(हिन्दी-उर्दू) के कुछ नए पहलू खुलते थे. किताब को अंतिम शक्ल देने तक भी काफी मेहनत की गयी.. व्यंग्य कैसा लिखा जाए इस पर ये किताब एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है जिसे पढ़ा ही जाना चाहिए.

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