खैयाम की मधुशाला..

मधुशाला शब्द सुनते ही मस्तिष्क में एक ही नाम उभरता है और वो नाम है श्री हरिवंश राय बच्चन का. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बच्चन की मधुशाला मूलत: पारसी भाषा की रचना से प्रेरित है और मूल रचना का रचनाकाल बच्चन की मधुशाला से आठ सौ वर्ष पहले का है. जी हाँ! बच्चन की मधुशाला उमर खैयाम की रुबाइयों से प्रेरित है. उमर खैयाम की रुबाइयों के कई अनुवाद विभिन्न भाषाओं में हुए जिसमें हिन्दी में भी कई अनुवाद हुए.

मैं कई दिनों से मधुशाला पर एक विस्तृत लेख लिखने की योजना बना रहा था क्योकि मुझे भी मधुशाला का चस्का काफी पहले लग गया था लेकिन समयाभाव के कारण मामला टलता ही जा रहा था.अब सोचा कि लिख ही डालूँ और बैठ गया लिखने. हम इस लेख में उमर खैयाम के जमाने की बात से आधुनिक रूप में मधुशाला की बात करेंगे.कुछ प्रमुख अनुवादों की चर्चा भी हम इस लेख में करेंगे.

लेख का अनुक्रम कुछ ऎसा होगा.

1. उमर खैयाम का जीवन परिचय
2. उमर खैयाम की रुबाइयां(Rubaiyat of Omar Khayyam)
3. रुबाइयों के अंग्रेजी अनुवाद
4. रुबाइयों के हिन्दी अनुवाद
5. कुछ प्रमुख अनुवादों की चर्चा
6. मधुशाला और मधुज्वाल
7. कुछ अन्य अनुवाद
8. मधुशाला एक गेय रचना
9. मैं और मेरी मधुशाला

तो आज शुरु करते हैं पहला भाग.

1. उमर खैयाम का जीवन परिचय.

Umer1 उमर खैय्याम (कुछ लोग ओमार खैय्याम भी कहते हैं) का जन्म 18 मई 1048 को पर्शिया या फारस (जिसे अब ईरान कहा जाता है) में हुआ था.मूल जन्म स्थान निशापुर था जिसका जिक्र उनकी शायरी में कई बार आया है.उनका पूरा नाम ग़ियाद अल-दिन अबुह फतेह उमर इब्न अब्राहिम अल खय्यामी था.खय्याम का शाब्दिक अर्थ होता है “तंबू बनाने वाला” .

ज्ञान का तंबू सीकर के वो
कहलाया  खैय्याम.
जीवन दुख की भट्ठी में जल,
तप कर निखरा वो,  
पर जीवन रेखा को काट
भाग्य ने बेच दिया
आशा के हाथों उसे
बेदाम.

Khayyam, who stitched the tents of science,
Has fallen in grief’s furnace and been suddenly burned,
The shears of Fate have cut the tent ropes of his life,
And the broker of Hope has sold him for nothing!

खैय्याम केवल शायर ही नहीं थे वरन एक भौतिक विज्ञानी, गणितज्ञ,खगोलशास्त्री और दार्शनिक भी थे. उमर खैय्याम अपने जीवन में अधिकतर निशापुर और समरकंद में ही रहे हाँलाकि उनका बचपन का कुछ हिस्सा बाल्ख (अफगानिस्तान) में भी बीता.तत्कालीन राजनीतिक परिवेश का प्रभाव खैय्याम पर भी पड़ा. उनकी शिक्षा दीक्षा मोवाफ्फ़क निशापुरी के निर्देशन में हुई जो उस समय के जाने माने शिक्षकों में एक थे. 

उमर खैय्याम ने एक गणितज्ञ के रूप में बीजगणित के अनेक नये सिद्धांतों का प्रतिपादन किया.उन्होने कुछ पुस्तकें भी लिखी जिसमें उन्होने पास्कल और युक्लिड के सिद्धांतों को सरलीकृत किया. उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को यूरोप में खूब सराहा गया. बीजगणित के अलावा उन्होने ज्यामिति (geometry) में भी योगदान दिया.

अपने समय के अन्य गणितज्ञों की तरह उमर खैयाम भी खगोलविद्या में पारंगत थे. उन्हें तत्कालीन सम्राट ने अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर एक वेधशाला (Observatory ) बनाने को भी आमंत्रित किया था. उमर और उनके साथियों ने मिलकर उस समय एक सौर वर्ष की अवधि का निर्धारण भी किया था.जो काफी हद तक आज के मानक के करीब था.उन्होने तत्कालीन पारसी कैलेंडर में भी काफी सुधार किये.उनके द्वारा सुधारा गया कैलेंडर उस समय के सुल्तान मलिक शाह ने आधिकारिक कैलेंडर के रूप में स्वीकृत किया था.उमर द्वारा तैयार कैलेंडर ही आज के ईरानी कैलेंडर का आधार रहा है जो अभी भी ईरान और अफगानिस्तान में प्रयोग में लाया जाता है. 

एक शायर के रूप में उमर खैय्याम अपनी रुबाइयों से पहचाने गये. शायर के रूप में उन्हे इतनी पहचान मिली कि लोग भूल गये कि वे शायर के अलावा भी कुछ थे. उनके द्वारा रुबाइयों का अंग्रेजी में अनुवाद जान फिटजराल्ड अपनी बहुचर्चित पुस्तक “द रुबाइयत ऑफ उमर खैय्याम “ (The Rubáiyát of Omar Khayyám) में किया था. इस अनुवाद के अलावा अन्य अनुवादों की चर्चा भी हम इस लेख में करेंगे.

2. उमर खैयाम की रुबाइयां.

उमर खैय्याम ने अपनी रुबाइयां पारसी भाषा में लिखी थीं. अपनी काव्य रचनाऑं में उमर ने एक विशेष छंद का प्रयोग किया जो उमर खैय्याम की रुबाई के नाम से जाना जाता है. रुबाई मूलत: चार लाइन की कविता होती है (‘रुबाइयत’ ,’रुबाई’ का उर्दू में बहुवचन है अर्थात एक से अधिक रुबाई या रुबाइयां) .चार लाइन की कविता अनेक तुकों में हो सकती है पर उमर ने जिस तुकबंदी का प्रयोग किया है वह है सम-सम-विषम-सम. यानि पहली ,दूसरी और चौथी पंक्ति एक ही तुक पर समाप्त होनी चाहिये. इसी छंद का प्रयोग फ़िटजराल्ड ने अपनी अंग्रेजी अनुवाद में किया और बच्चन ने भी मधुशाला में यही छंद प्रयोग किया है.

And, as the Cock crew, those who stood before
The Tavern shouted-“Open then the Door!
“You know how little while we have to stay,
“And, once departed, may return no more.”

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला

उमर खैय्याम की रुबाइयां आपको सूफीज्म,जीवन की नश्वरता,रहस्यवाद की ओर ले जाती हैं.कुछ लोगों का मानना है कि उमर स्वय़ं भी सूफी परंपरा से प्रेरित थे.यह भी बहस का विषय रहा है कि उमर अपनी रुबाइयों के माध्यम से मदिरापान के समर्थन में बोलते हैं या विरोध में.

आगे की चर्चा अगले अंक में करेंगे….

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

23 comments

  1. सराहनीय सामग्री। कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारे बच्चन साहब पूरी तरह खय्याम (तंबू बनाने वाले) थे और आठ सौ साल पुरानी रुबाइयों को पैबंद लगाकर पेश कर दिया?

  2. वाकई काकेशजी, धांसू च फांसू काम है यह।पुराने लोग कितनी विद्याओं में एक साथ पारंगत होते थे। अब तो एकाध में हो जायें, तो ऊलने लगते हैं।
    मुझे याद पड़ता है कि पंकज उदास ने सिर्फ उमर खैयाम पर केंद्रित दो कैसेटों का एक संग्रह निकाला था। बहुत बढ़िया था।

  3. उमर ख़ैयाम के अलावा बच्चन जी की प्रथम पत्नी श्यामा के असामयिक निधन का दर्द भी शामिल है मधुशाला में.इसका ज़िक्र बच्चनजी की आत्मकथा क्या भूलूँ क्या याद करूँ में भी आया है.यदि मन्ना डे स्वरांकित और जयदेव द्वारा स्वरबध्द एलबम मधुशाला को सुना जाए तो उसके दूसरे भाग (जो शुरू हो तो है इस पंक्ति से..छोटे से जीवन में कितना प्यार करूँ,पी लूँ हाला,आने के ही साथ जगत में कहलाया जानेवाला)में भी युवावस्था में विदुर हुए बच्चन जी की पीड़ा सुनी जा सकती है.इसमें कोई शक नहीं कि मधुशाला पूरी तरह उमर ख़ैयाम की भावधारा से अनुप्राणित है लेकिन उसमें बच्चनजी जैसे वरिष्ठ काव्य हस्ताक्षर का कारनामा भी मौजूद है.

  4. ये हुई ना बात !! और “श्री बच्चन जी ” की मधुशाला ने जितना आह्लाद्` अपने श्रोताओँ मेँ बाँटा है,
    उसके लिये हिन्दी साहित्य जगत उन्हेँ सदैव, स्नेह के साथ याद करता रहेगा.
    काकेश जी, आपने बहोत अच्छी शृँखला आरँभ की है — आगे भी पढने की उत्सुकता बनी रहेगी.
    और,
    प्रेरणा कहीँ से भी मिले, एक छोटी सी कविता या आलेख लिख पाना,भी बडी सफलता होती है.
    ये मेरा मत है ~
    स्नेह के साथ ,
    — लावण्या

  5. इब्न-अल-अरबी,बाबा ताहिर और उमर खैयाम सभी तो
    आदि पुरुष हैं कविताओं के, विषय वहीं से शुरू हुए हैं
    पुन: आप जो करवाते हैं इनकी कथा वस्तु से परिचय
    धन्यवाद! दे रहे रोशनी, उनको, तम में पड़े हुए है

  6. यह बहुत बेहतरीन श्रृंखला शुरु की है, काकेश भाई. आनन्द आ गया. इन्तजार है अगली कड़ी का.

  7. umar qauam ke sabse purana sahtiya ka hindi anuvad agar bazar mai ho to batana.khayyam to khayyam uw ,bachan kaya kerenga mukabala

  8. yar, ek to bachchan g ki madhusala dusari khyaam saheb ki madhusala aur uper sy kakes bhai ki kaktel neshaa chadh gaya yar !hum to pehly hi kahty thy ki y sisy k ander wali chij nasha karti hy. pr yar log nahi many byetha diaa cumputr pr ismy bhi sisa

  9. प्रेरणा चाहे जहां से भी आयी हो लेकिन फ़िर भी मधुशाला बड़िया है जी, खैयाम के बारे में बता कर भी आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

  10. bachan ji aur khyam (tambu walo ka great combition) shahbad nahi bachey hai aankhey sajal ho gai hai——kuch karney ki thani hai–acha kadam hai

  11. SAB RINDO (GAZAL KAVITA RUPI MADIRA KA PAAN KARNE BAALE SHARAABIYO) KO SAAGARDEEP KA NAMASKAAR ! DOSTO MAIN (PESE SE TO MUNEEM/ACCOUNTANT HU, PADHAYI SE MAASTAR AUR TABIYAT SE SHAYAR/KABI HU AUR ABHI IS PORTAL PAR NAYAA HU. PARANTU MERI PAHALI HI DUBKI ME ITNE MOTI MILEMGE SOCHAA NA THA. “MADHUSHAALAA” KE BAARE ME PADHAKAR SOCHANE KO MAJBUR HUYA KI KYO NA MAIN BHI “EK AUR MADHUSHAALAA” LIKHU ………. KAAKESH JI EBAM SABHI KO SSDHUBAAD
    AAPAKAA NAYA SATHI – SAAGARDEEP

  12. mai bacchanji ka shukragujar hon jinke karan mughe umar khayaam shaheb mile. mai esha katai nahi manta ki khayaam ki madhushala our bacchanji ki madhushala mai koi mail hai . Bacchanji ne Bharat versh mai madhushala ki rachana kar bharatvashiyon ka maan badaya hai. Kya umar khayaam ji ko hum log sunpate. bacchanji ne bhale hi kabhi sharab nahi pi ho kintu itna nasha unki rubaiyon mai mila. ye gazab ka hai. mai halavadi mahan kavi bacchanji ko adranjali deta hon . apka sathi doulatsingh Thakur Indore

  13. log pata nahi kun in sabhi ko bhul jate hai ……. ye yaise log hai jinhe puri dunia me pahachan milni chahi magar mili nahi

  14. जानकारी से पता चला कि वह अपने समय के बहुत ही अच्छे विचारधारा वाले रहे है ।

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