मैं कहीं कवि ना बन जाऊं….

आप कहीं यह अनुमान ना लगा लें कि मैं किसी कविता नामक सुकन्या के प्रेमपाश में बंधकर कवि बनना चाहता हूँ इसलिये मैं यह घोषणा करना चाहता हूँ कि मुझ बाल बच्चेदार को किसी से प्यार व्यार नहीं है (अपनी पत्नी से भी नहीं 🙂 ) बल्कि मैं तो लिखी जाने वाली कविता से प्रेम की पींगे बढ़ाना चाह रहा हूँ और ऎसा मैं इसलिये कर रहा हूँ क्योंकि आज के जमाने में मुझे कविता का महत्व पता चल गया है.

मैं अक्सर कुडकुड़ करता हूँ और दिन में एक बार ही इस कुड़कुड़ को करना मेरे को बड़ा भारी लगता है. मेरे पूरे लेख को पढ़ने के बाद लोगों के समझ में भी नहीं आता कि  आखिर मैं क्या कहना चाह रहा हूँ.इसका एक  फायदा तो यह है ही कि भविष्य में मुझमें नेता बनने के पूरे गुण हैं लेकिन अभी हाल फिलहाल मैं कवि भी बन सकता हूँ. जिस लेख के लिये मैं तीन सौ चार सौ शब्दों का जाल बुनूँ वह बात महज पचास साठ शब्दों में भी कह सकता हूँ. बात वह तब भी समझ में नहीं आयेगी लेकिन मैं तो कवि बन ही जाऊंगा.

कविता भले की किसी भी अर्थ में उपयोगी ना हो पर उस पर वाह वाही मिलने के भरपूर तत्व होने चाहिये. वह भले ही किसी के समझ में ना आये लेकिन आप का लहजा और व्यक्तित्व का प्रभाव ऎसा हो कि सामने वाला चाहे वह आपकी कविता पढ़ रहा हो या सुन रहा हो वो वाह वाह कहने को विवश हो जाये. कविता एक कला है और कला किसी काम की भी हो यह जरूरी नहीं. कला में कोई तथ्य हों या वह हर किसी के पल्ले पड़ जाये यह भी आवश्यक नहीं है. कविता शब्द सम्मोहन की विधा है जो किसी भी कवि सम्मेलन में पहलवान की धोबी पछाड़ सी चलती है और सामने बैठे लोगों को चारों खाने चित्त कर देती है. वाह वाह…क्या बात है .. मजा आ गया .. जैसे प्रोत्साहनी वाक्य हवा में तैरने लगें तो समझिये कविता ने मैदान मार लिया.

उर्दू वालों ने कविता की बहुत सेवा की है. ग़ालिब से लेकर मीर ने ऎसे ऎसे शेर लिखे कि वो आज भी किसी महफिल की जान बने रहते हैं. हर मौके और हर अवसर के लिये एक शेर हाजिर हो जायेगा. लेकिन कौन ऎसा माई का लाल होगा जिसने पूरा उर्दू साहित्य पढ़ा होगा इसलिये आप उर्दू शायरी से कुछ भी लेके (वैसे हिन्दी से भी ले सकते हैं लेकिन थोड़ा रिस्क है) उसमें अपने शब्दों का थोड़ा छोंक लगाकर झोंक दीजिये फिर देखिये….शत प्रतिशत सफलता आपके चरण चूमेगी यदि आप जारी रहे तो यही सफलता चरणों से होंठों तक भी जा सकती है फिर भले ही बांकियों के सर में दर्द हो पर आपके होंठों पर मुस्कान रहेगी.  

कविता सामुहिक चेतना की संस्थापक है. आप अपने जैसे बेकार कवियों को ढूंढने निकलिये… एक को ढूंढेंगे हजार मिलेंगे और फिर आप सामुहिक रूप से कविता कीजिये.वाह वाही बिना ब्याज का कर्ज है. यानि आप कविता करें तो अगला वाह वाह कर आपको कर्ज दे और उसकी कविता में आप वाह वाह कर उस कर्ज को उतार दें. समूह में कविता से कई फायदे हैं आप एक पूरे समूह को मूर्ख बना सकते हैं और बार बार बना सकते हैं. सब घुलमिल कर कविता करें… वाह वाही लूटें.

सामुहिक कविताओं के श्रोता और पाठक बड़े पारखी हैं. भले ही आपकी कविता उनके समझ ना आये. भले ही आप सदियों से कही जा रही बात को बिना किसी आधार के फिर फिर कहें. भले ही आपको ना शब्दों की समझ हो ना उनके अर्थों की. लेकिन यदि आप एक नेता की तरह भीड़ को मूर्ख बनाना जानते हैं तो वह वाह वाह करेंगे ही. आप सफल कवि हैं. आपकी जय जयकार होगी.आप खुश रहिये. आपके स्थायी चमचे आपके साथ हैं. अभी आपको पार्टी बदलने की जरूरत नहीं.

मैं सोच रहा हूँ कि मैं भी कवि बन ही जाऊं और पकड़ूं अपने जैसे कुछ और मूर्खों को….. आप क्या कहते हैं ???..आप साथ आना चाहेंगे… 🙂

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

12 comments

  1. मुबारक हो. कवि बनने के ‘भाव’ मन में आने के लिए. आप जरूर बनिए कवि. वाह वाह करने के लिए हम हैं न. लेकिन हो सके तो ऐसी कवितायें लिखियेगा जो समझ में आयें…..:-)

    भविष्य में नेता भी बनिए. कवि अगर नेता बन जाए तो कॉम्बिनेशन बड़ा ‘डेडली’ होता है……:-)

  2. कवि तो आप हैं
    पहाड़ चिडिया
    तूफान बर्फ
    शीं शीं शीं
    शूं शूं शूं
    हा हा हा हा
    तटक करतचरत ातकरतचर
    गहदहद3 हचतज
    इस कविता का अर्थ बताइये। तो मैं आपको ब्रह्मांड का सबसे वड्डा कवि घोषित कर दूंगा।

  3. देखो कवि काकेश!

    कविता के फायदे देखो . साथी कवि मिलते हैं . दोस्त मिलते हैं . वोटर मिलते हैं . वोटर मिलने से मिलता है पुरस्कार . स्वर्णकलम का काव्य-हथियार . लगे हाथ कविता पा जाती है विस्तार .

    सो कवि हो जाओ . इसी में सार है . बाकी सब निस्सार है– नश्वर है . सिर्फ़ कविता में अमरता है . उसी से यह भुवन वाह-वाह से भरता है .

    सो कविकुसुम दल जॉइन कर लो .

  4. अब तो मैं भी सोच रहा हूँ कवि बनने का 🙂 आप तो बस कविता लिखें वाह वाह करने वाले तो हम है ना…….. और जब हम लिखें आप तो वाहवाही का कर्ज़ तो उतारेंगे ही 😉

  5. Kavi ya kavita sochkar nahin banate. Wo to maanav man ke bhavon ko abhibyakta karane ke maadhyam hain. Aap kavi hain to hain, ban nahin sakate. Phir bhi koshish karane main kya harz hai.

  6. कवि आप जरूर बनिए प्रभु लेकिन ये बताईये आप का इशारा किस और है??? ये तीर हम पे तो नहीं चला रहे…..नहीं यूँ ही पूछ रहे हैं, धनुष आप के हाथ है चाहे जिस पर चलाईये…अगर हम पर चलाये हैं तो आप का शुक्रिया की हम जैसों को आपने कवि माना…. आप लिखिए बिंदास.
    नीरज

  7. Bhai ji ,aapke vyangya ka yah haal hai to kavita ka kya hoga.Ham to ekdam se dera gaye.

  8. आप खुब कवि बने,हमे कोइ लेना देना नही है ,पर कविता से दूर ही रहे..वो हमारे साथ हमारे आफ़िस मे होती है और ये हम कतई बर्दाश्त नही करेगे कि आप उसका नाम भी ले दुबारा ये नाम भी आपके ब्लोग पर नही दिखना चाहिये…

  9. सरजी,
    मेरा एक अनुभव शेयर कर लीजिये । जिससे आपको पीछा छुड़ाना हो
    और वह अपना दर्द आपके हवाले करने की गरज़ से आपको चाट रहा
    हो, बस पकड़ कर एक कविता सुना दीजिये । अगली बार से आपके
    गिर्द नहीं फटकेगा ।
    मैं तो उसको पकड़ कर दोनों आँखें बंद कर जो जो भी शब्द वाक्य
    दिमाग में आता है, उन्हें एक लय के साथ बोलने लग पड़ता हूँ ।
    आँख खुलने पर मुसीबत नदारद !
    बहुत कारगर वैक्सीन है, इसीलिये मेरे कवितापाठ की ज़रूरत
    ज़िन्दा है !

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